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सोमवार, 21 जून 2010

क्या एलियन्स ने धावा बोल दिया ?

मशहूर साइंस फिक्शन उपन्यास वॉर आफ द वर्ल्डस में एच.जी. वेल्स लिखते हैं कि धरती पर गिरने वाली बिजलियों जैसी चमकदार किरणों की मदद से मंगल ग्रह के हमलावर धरती पर आ रहे हैं। ये तस्वीर भी क्या कुछ ऐसी ही नहीं लगती। देखकर लगता है, मानो किसी हॉलीवुड साईफाई फिल्म का कोई स्पेशल एफेक्ट वाला कोई सीन हो।
बादलों को चीरकर एक शहर के बीचोबीच गिरती रोशनी की एक चमकदार किरण। ये नजारा अपने आप में काफी रहस्यमय और रोमांचक सा लगता है। पहली बात तो ये कि ये तस्वीर बनावटी नहीं, बिल्कुल असली है और दूसरी बात ये कि ये किसी फिल्म का सेट या स्पेशल इफेक्ट नहीं है। वाक्या है बार्सिलोना का, जहां रात के वक्त बीच शहर से फूटती रोशनी की इस शानदार बीम का प्रदर्शन किया गया और ये शानदार प्रदर्शन किया है जापान के कलाकार र्योजी इकेडा ने। इस रोमांचक प्रदर्शन के लिए इकेडा ने एक सी रोशनी वाली 64 अलग-अलग किरणों का इस्तेमाल किया। रोशनी की ये किरणें जब बार्सिलोना के आसमान पर छाए बादलों से टकराईं तो वहां एक नकली चंद्रमा सा बन गया और देखने वालों को लगा कि चंद्रमा से रोशनी की किरण शहर पर गिर रही है। कुछ लोगों को ये भी लगा कि शहर के आसमान पर कोई यूएफओ आ गया है और एलियंस इस रोशनी की बीम की मदद से शहर पर उतर रहे हैं।
इकेडा ने अपने इस प्रदर्शन को स्पेक्ट्रा बार्सिलोना का नाम दिया है और वो ऐसा अनोखा प्रदर्शन जापान के नागोया शहर, नीदरलैंड्स और पेरिस में भी कर चुके हैं।

केप्लर से ‘खुशखबरी !’

स्पेस साइंस में दिलचस्पी रखने वाला हर कोई मिशन केप्लर से आने वाली ‘खुशखबरी’ का इंतजार कर रहा है। खुशखबरी ये कि हमें अपने सौरमंडल से बाहर एक दूसरी पृथ्वी का पता कब मिलता है। नासा की ये स्पेस ऑब्जरवेटरी दूसरी धरती को तलाशने में जुटी है। आकाश के एक खास हिस्से में, 1,56,000 सितारों के झुरमुट के बीच काम शुरू करने के महज 43 दिन के भीतर ही केप्लर ने 706 ऐसे सितारों की पहचान कर ली है, जहां कोई दूसरी दुनिया यानि नया ग्रह मौजूद हो सकता है।
अब आगे का काम धरती पर मौजूद ऑब्जरवेटरीज करेंगी, जो केप्लर स्पेस ऑब्जरवेटरी की इस खोज की पुष्टि करेंगी। अब तक हमने औरमंडल के बाहर 400 नए ग्रहों की खोज की है। खास बात ये कि अगर केप्लर की खोज की पुष्टि हो जाती है तो नए ग्रहों के बारे में हमारी जानकारी करीब तीन गुना तक बढ़ जाएगी।

शनिवार, 6 जून 2009

एलियन्स का ‘पृथ्वी स्टेशन’ व्यावहारिक नहीं !

फिजिसिस्ट एनरिको फर्मी हमारे वक्त के ऐसे मशहूर वैज्ञानिक हैं जिनका मानना है कि इस ब्रह्मांड में हमारे जैसी और हमसे भी उन्नत कई सभ्यताएं अलग-अलग ग्रहों पर मौजूद हैं। फिर सवाल ये उठता है कि उनसे हमारा संपर्क क्यों नहीं होता ? वो आखिर हैं कहां ? ये सवाल बहुत मशहूर है और इसे फर्मी पैराडॉक्स के नाम से जाना जाता है। सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस यानि सेटी प्रोजेक्ट इसी सवाल का जवाब करीब 40 साल से ज्यादा वक्त से तलाश रहा है। अहम सवाल ये भी है कि अगर ब्रह्मांड में हमारे जैसी या फिर हमसे उन्नत सभ्यताएं मौजूद हैं, तो फिर वो हमारे ग्रह पर कब्जा क्यों नहीं कर लेतीं ? इस पुराने सवाल का ताजा सवाल ढूंढ़ा है पेन्सिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों जैकब डी. हक, मिश्रा और सेट डी बम ने। इन वैज्ञानिकों के मुताबिक एलियन्स की दिलचस्पी हमारी पृथ्वी में इसलिए नहीं है , क्योंकि यहां कब्जा करके एक स्टेशन बनाना उनके लिए व्यावहारिक नहीं होगा। हक, मिश्रा और बम कहते हैं कि हमारे पास दूसरे ग्रहों-चंद्रमाओं पर कालोनी बनाने की टेक्नोलॉजी है, लेकिन फिरभी हम धरती से दूर अपना स्टेशन बनाने बसाने में देरी कर रहे हैं, क्योंकि ऐसा करना व्यावहारिक नहीं होगा। जिस तरह से दूसरे ग्रहों पर स्टेशन बनाना हमारे लिए व्यावहारिक नहीं है, ठीक उसी तरह पृथ्वी पर कब्जा करना भी एलियन सभ्यताओं के लिए व्यावहारिक नहीं होगा।