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सोमवार, 25 नवंबर 2013

हमें साइंस पर इसलिए खर्च करना चाहिए



भारत का मार्स ऑरबिटर मिशन के साथ ही एक पुराना सवाल फिर सामने है कि क्या भारत जैसे विकासशील देश में, जहां भारी तादाद में लोग अब भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं, वहां 450 करोड़ रुपये मंगल अभियान पर खर्च करना जायज है? ये एक सार्वकालिक सवाल है और केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी वैज्ञानिक समुदाय को इन सवालों का सामना करना पड़ता है। इस बार मंगलयान के साथ ये सवाल कुछ ज्यादा ही जोरदारी के साथ उठाया गया। एक न्यूज चैनल ने तो बकायदा ये भी दिखाया कि 450 करोड़ रुपये में सरकार लोगों के लिए क्या-क्या काम कर सकती थी।
बात केवल मंगलयान की नहीं है। भारत के कुछ और साइंस प्रोजेक्ट्स आने वाले वक्त में पूरे होने हैं, जिनकी लागत करोड़ों में है, मिसाल के तौर पर तमिलनाडु के पास बन रही देश की पहली अंडरग्राउंड न्यट्रिनो लैब, जिसकी लागत 150 करोड़ रुपये से ज्यादा है, उत्तराखंड के देवस्थल में एशिया के सबसे बड़े 13.5 मीटर के टेलिस्कोप की ऑब्जरवेटरी को बनाने का काम जारी है जिसकी लागत करीब 120 करोड़ रुपये है, चंद्रयान-2 जिसकी लागत 426 करोड़ रुपये है और इसके अलावा भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक में स्थायी स्टेशंस चला रहा है, जिसकी सालाना लागत भी कई सौ करोड़ है। सवाल फिर वही कि क्या भारत को साइंस पर भारी खर्च करना चाहिए?
 देश में बीएमडब्लू जैसी करोड़ों की कीमत वाली विदेशी गाड़ियों के बढ़ते महंगे शौक की बात न भी करें तो मंगलयान और साइंस के दूसरे प्रोजेक्ट्स पर हो रहे खर्च पर हाय-तौबा मचाने वाले लोग ये भूल जाते हैं भारत साइंस पर जितना खर्च करता है, उससे कई गुना ज्यादा पैसा इस देश में लोग सिगरेट और शराब पर उड़ा रहे हैं। भारत में सिगरेट का सालाना बाजार 720 अरब रुपये का है। आईटीसी जैसे सिगरेट के बड़े ब्रांड इसे और विस्तार देने के लिए जल्दी ही 25000 करोड़ रुपये और खर्च करने जा रहे हैं। शराब की बात करें तो देश में इस नशे का फुटकर बाजार 2100 अरब रुपये का है। इस नशीले एश्वर्य में झूमते विजय माल्या जैसे लोग फार्मूला-वन और कैसीनो जैसी चीजों को देश में ला रहे हैं और नई पीढ़ी के रोल मॉडल बन रहे हैं। लोग सिगरेट और शराब पर एक साल में 2800 अरब रुपये से ज्यादा उड़ा रहे हैं। ये रकम इस बार के केंद्रीय बजट में दर्शाये गए देश के कुल वास्तविक खर्च से भी ज्यादा है।
जब भी हम साइंस पर खर्च करते हैं, अंतरिक्ष पर खर्च करते हैं या किसी नई खोज के लिए खर्च करते हैं, तो हमेशा ये निवेश बोनस के साथ कई-कई रास्तों से वापस हमारे पास लौटता है। चंद्रयान देश के अंतरिक्ष अनुसंधान का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ था। चंद्रयान की लागत 354 करोड़ रुपये थी, लेकिन जब चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी खोज निकाला तो इससे देश को जो विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा अर्जित हुई वो नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी को दशकों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके भी नहीं मिल सकी थी।
साइंस अनुसंधान पर होने वाला खर्च मानवता के लिए जीवन बीमा के जैसा निवेश है, जो हमेशा मानवता के भविष्य को बेहतर और सुरक्षित बनाने के लिए किया जाता है। यही वजह है कि 100 साल से ज्यादा वक्त और बीत जाने के बावजूद कैंसर पर रिसर्च अब भी जारी है। एड्स पर विजय पाने की जंग भी पिछले 30 साल से लगातार जारी है। इन लड़ाइयों पर अब तक अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं, वैज्ञानिकों की कई पीढ़ियों ने बगैर किसी ठोस नतीजे के अपनी पूरी जिंदगी इन रोगों पर विजय पाने की कोशिश में खपा दी है। लेकिन समय, पैसे और प्रतिभा के इस लंबे और लगातार निवेश के बदौलत ही अब हमें इन रोगों की लड़ाईयों की अंधी सुरंगों के दूसरे सिरे पर उम्मीद की रोशनी नजर आ रही है। एचआईवी पर काबू पा लिया गया है और कैंसर के खिलाफ भी निर्णायक टीका बस आने को है।
 भारत में जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक अनुसंधान पर होने वाले सकल खर्च को व्यवस्थित और जवाबदेह बनाया जाए। मैंने जब सीएसआईआर के महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी से पूछा कि पिछले 5 साल के दौरान आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही? तो काफी याद करने के बाद उन्होंने ई-रिक्शा का नाम लिया। अब अगर देशभर में दर्जनों प्रयोगशालाओं और सरकारी वैज्ञानिकों की भारी-भरकम फौज वाला संगठन सीएसआईआर करोड़ों के बजट को खर्च कर 5 साल में देश के लिए बस ई-रिक्शा ही बना सका है। तो इससे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर जो चल रहा है, उसका खुलासा होता है और ये वाकई गहरी चिंता का विषय है। देश में वैज्ञानिकों को रिसर्च प्रोजेक्ट्स के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये आवंटित करा दिए जाते हैं। इसके बाद ऐसी कोई एजेंसी नहीं है जो वैज्ञानिकों से उनके प्रोजेक्ट्स के बारे में जवाब-तलब करे और पैसों की निगरानी करे। 15 से 20 साल तक वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स चलते रहते हैं और साथ में कई सहायक परियोजनाएं भी शुरू हो जाती हैं, विदेश यात्राएं चलती रहती हैं और पैसा बर्बाद होता रहता है। अंत में कोई भी ठोस वैज्ञानिक खोज सामने नहीं आती। जरूरत इस बात की है कि देश में वैज्ञानिक प्रोजेक्ट के लिए एक नियामक एजेंसी बने, जिसमें शीर्ष वैज्ञानिक शामिल हों और जो ये तय करे कि प्रोजेक्ट्स तय समय सीमा में ही पूरे हों, शोध कर रहे वैज्ञानिकों जवाबदेही तय हो, एक तय समयसीमा में शोध पूरे हों और उन प्रोजेक्ट्स के नतीजों का फायदा केवल उस वैज्ञानिक या उसके परिवार को नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों को मिले।
संदीप निगम

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

रॉकेट पर भारत की उड़ान की गोल्डन जुबली

21 नवंबर को भारत अपने पहले राकेट के प्रक्षेपण की स्वर्ण जयंती क्षणों में प्रवेश कर गया। यहां समीप के तटीय थुम्बा गांव में देश के अंतरिक्ष अभियान ने निर्णायक कदम उठाया था जिसकी परिणति आज चंद्रयान और मंगल अभियान के रूप में हमारे सामने हैं ।

उस वक्त नारियल के पेड़ों के झुरमुट के बीच थुम्बा में बस एक ही लांच पैड हुआ करता था। इस रॉकेट की लांचिंग के लिए वैज्ञानिकों ने लांच पैड के करीब मौजूद एक कैथोलिक चर्च सेंट मैरी मैगेडलेन को मुख्यालय के तौर पर इस्तेमाल किया था। बिशप के घर को रॉकेट तैयार करने वाली वर्कशॉप में तब्दील कर दिया गया था।

मवेशियों को बांधने वाली छायादार जगह को लैबोरेटरी बना दिया गया था, जहां अब्दुल कलाम आजाद जैसे नौजवान वैज्ञानिकों ने काम किया। ऐसी लैब और वर्कशॉप में तैयार देश के पहले रॉकेट के अलग-अलग हिस्सों को साइकिल पर लादकर लांच पैड तक पहुंचाया गया था।

इस उनींदे से गांव के आधुनिक भारत का प्रतीक बन जाने का सपना किसी ने नहीं देखा था लेकिन 21 नवंबर 1963 को यहीं से भारत ने अपना पहला अमेरिका निर्मित राकेट प्रक्षेपित किया और यह गांव रातोंरात सुखिर्यों में आ गया।

दूसरा रॉकेट, जिसे कुछ वक्त बाद लांच किया गया, वो आकार में कुछ बड़ा और वजनी था और इसे लांच पैड तक पहुंचाने के लिए बैलगाड़ी की मदद ली गई थी।  पहले रॉकेट लांच के बाद अगले 12 साल के भीतर भारत ने 350 से ज्यादा साउंडिंग रॉकेट्स बनाए और लांच किए।

बाद में इसे थुम्बा इक्वाटोरियल राकेट लांच स्टेशन (टीईआरएलएस) का नाम दिया गया लेकिन कुछ समय बाद इसे विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) कहा जाने लगा। इसरो के इस प्रमुख सेंटर का नामकरण भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर किया गया।

वो साराभाई ही थे जिन्होंने युवा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम को एकत्र कर मिशन की खातिर प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजा था। उनके द्वारा भर्ती किए गए शुरूआती वैज्ञानिकों में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी थे।

केंद्र सरकार ने अंतरिक्ष कार्यक्रम में पहला कदम अगस्त 1961 में उठाया था और परमाणु उर्जा विभाग को अंतरिक्ष शोध तथा बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की जिम्मेदारी सौंपी थी।

1962 में साराभाई की अध्यक्षता में अंतरिक्ष शोध पर एक राष्ट्रीय समिति गठित की गयी जिसने मिशन को आगे बढ़ाया और अगले वर्ष 21 नवंबर को देश ने पहले अमेरिका निर्मित नाइके अपाचे राकेट को थुम्बा से प्रक्षेपित किया।

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

मेरी ख्वाहिश है कि मौत मंगल ग्रह पर हो – इलॉन मस्क


इलॉन मस्क स्पेस एक्सप्लोरेशन कंपनी स्पेस-एक्स के सीईओ और इंटरनेट पर भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराने वाले पे-पॉल के फाउंडर हैं। वॉयेजर ने हाल ही में उनसे बातचीत की, इस बातचीत में इलॉन ने बताया कि उनकी ख्वाहिश है कि उनकी मौत मंगल ग्रह पर हो। इलॉन मस्क केवल खुद को ही नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को परिवार सहित 2025 तक मंगल ग्रह पर ले जाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने मात्र 25 करोड़ रुपये की फीस तय की है। इलॉन मस्क ने अपने करियर में कई ऐसी चीजें कर के दिखाई हैं, जिन्हें पहले नामुमकिन समझा जाता था। वो इंटरनेट पर भुगतान की सबसे बड़ी व्यवस्था पे-पॉल के सह-संस्थापक हैं। इसके अलावा वो स्टाइलिश और स्पोर्टी इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली कंपनी टेस्ला मोटर्स के संस्थापक भी हैं। और पहली निजी स्पेस एक्सप्लोरेशन कंपनी स्पेस-एक्स की लांचिंग और उसे कामयाब कर दिखाने के साथ ही उन्होंने सबसे अविश्वसनीय उपलब्धि भी हासिल कर ली। वॉयेजर अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत करता है इलॉन मस्क से बातचीत के मुख्य अंश -
लोगों को मंगल ग्रह पर ले जाने के लिए आप इतने उत्साहित क्यों हैं ?
क्योंकि हमारे ग्रह पृथ्वी के 4 अरब साल के इतिहास में ऐसा करना पहली बार मुमकिन हुआ है। ये अवसर शायद लंबे वक्त के लिए रहेगा, और मैं ऐसी उम्मीद भी करता हूं, लेकिन शायद ऐसा न भी हो। मानव सभ्यता के सामने जो खतरे हैं, हमें उनसे फायदा उठाना चाहिए। जरूरी नहीं है कि पूरी मानव जाति का कभी विनाश ही हो जाए। मैं जिस चीज का सपना देख रहा हूं, टेक्नोलॉजी के महासागर में वो बस एक बूंद के समान है।
मंगल पर जाने की जरूरत ही क्या है? जब मार्स एक्सप्लोरेशन रोवर्स और क्यूरियोसिटी जैसी टेलीप्रजेंट रोबोटिक्स की शानदार मशीनें हमें मंगल पर मौजूद होने का अनुभव करवा रही हैं?

शायद हम थोड़े रोमांटिक हो रहे हैं, लेकिन मैं मानता हूं कि मंगल पर व्यक्तिगत रूप से मौजूद होने से इस ग्रह के बारे में हमारी समझ में बहुत बड़ा बदलाव आएगा। रोबोटिक्स से हमें शानदार मदद मिल रही है और हम काफी कुछ सीख भी रहे हैं, लेकिन मंगल पर मानव की मौजूदगी का विकल्प रोबोट कभी नहीं हो सकते। मंगल पर एक स्थायी बेस के होने से और पृथ्वी और मंगल के बीच लोगों की लगातार आवाजाही से टेक्नोलॉजी के विकास को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा और इससे हम दूसरे स्टार सिस्टम्स तक सफर करने में सक्षम हो सकेंगे।
जैसेकि हमसे 4 प्रकाश वर्ष दूर मौजूद स्टार सिस्टम अल्फा सेंचुरी के एक्सोप्लेनेट पर?
मेरे विचार से आप वहां जाने का तरीका खोज सकते हैं। एक न्यूक्लियर थर्मल रॉकेट की मदद से आप प्रकाश की गति के दसवें हिस्से तक की रफ्तार आसानी से हासिल कर सकते हैं। इस रफ्तार से अल्फा सेंचुरी तक जाने में हमें 40 साल लग जाएंगे, जो कि एक लंबा वक्त है। अगर आप वाकई अल्फा सेंचुरी जैसी दुनिया में जाना चाहते हैं तो आपको अपना सफर किशोरावस्था में शुरू करना होगा। 
हम इसे कैसे बदल सकते हैं?
रैप ड्राइव के बारे में कुछ रोचक तथ्य मैंने जाने हैं। आप प्रकाश की गति से तेज नहीं जा सकते, लेकिन आप स्पेस को मनमाफिक तरीके से मोड़ सकते हैं और इस तरह प्रकाश की गति से कई गुना तेज रफ्तार के साथ प्रभावशाली तरीके से सफर कर सकते हैं। ये बेहद हैरतअंगेज और उत्साह से भर देने वाला है। लोग ऐसे जबरदस्त तरीके इस्तेमाल में ला सकते हैं, ताकि ऊर्जा कम से कम खर्च हो।
क्या आपकी स्पेस एक्सप्लोरेशन कंपनी स्पेस-एक्स रैप ड्राइव जैसी चीजों का इस्तेमाल कर सकती है?
निश्चित तौर पर, हम चाहेंगे कि रैप ड्राइव की तकनीक हमारे साथ हो।
आपने स्पेस एक्सप्लोरेशन को इनोवेशन और नई तकनीक से लैस कर दिया है। आप एक पायनियर हैं, पूरी दुनिया की निगाहें आप पर और आपके स्पेस-एक्स पर टिकीं हैं। क्या इतनी ऊंची उम्मीदों के केंद्र में होने से आपको नर्वसनेस होती है?
नहीं, मुझे इससे और आगे बढ़ने, कुछ और नया-इनोवेटिव करने की ऊर्जा मिलती है। मैं उत्साह से भर जाता हूं। शुरुआत में हमने भी कई गलतियां की हैं। अपनी चौथी उड़ान में ही हम पहला ऑरबिट पूरा कर सके। अपनी दूसरी और तीसरी उड़ान में हम अंतरिक्ष के मुहाने तक जा पहुंचे थे, लेकिन और आगे जाने के लिए जरूरी रफ्तार ही हासिल नहीं कर सके। अगर हमारी चौथी उड़ान सफल नहीं होती तो हमें स्पेस-एक्स का ख्याल छोड़ना पड़ता।
आपका स्पेस एक्स ड्रैगन कैप्स्यूल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक आने-जाने वाला एक मालवाही स्पेसशिप ही है। आप अंतरिक्षयात्रियों को ले जाना कब शुरू करेंगे?
हमें उम्मीद है कि तीन साल के भीतर हम अंतरिक्षयात्रियों के साथ पहली उड़ान भरेंगे।
क्या अंतरिक्षयात्रियों के साथ पहली उड़ान में आप भी शामिल होंगे?
वास्तव में ये नासा पर है, जो कि हमारे कस्टमर हैं। मैं कुछ खतरनाक सी किस्म की चीजें करने का आदी हूं, जैसे कि बेहद कम ऊंचाई पर फाइटर जेट को उड़ाना। मेरी कंपनी और बच्चे भी हैं, और मैं उन्हें बढ़ता हुआ देखना चाहता हूं, इसलिए फिलहाल मैंने अपने खतरनाक शौकों पर लगाम लगा रखी है। मैं अंतरिक्ष जाना चाहता हूं , लेकिन सबसे पहले नहीं। पहली उड़ान ऑटोमैटिक पायलट की मदद से होगी, यानि स्पेसशिप पर कोई मानव नहीं होगा।

सोमवार, 27 अगस्त 2012

अलविदा कमांडर, फिर मिलेंगे, किसी और डायमेंशन में...


नील आर्मस्ट्रांग संपूर्ण मानवता के महानतम नायकों में से हैं। उनके निधन पर श्रद्धांजलि स्वरूप वॉयेजरनील आर्मस्ट्रांग का ये साक्षात्कार पुन: प्रकाशित कर रहा है, जिसे मिशन अपोलो-11 की 40 वीं वर्षगांठ के मौके पर लिया गया था। प्रस्तुत है चंद्रमा के सफर की तैयारियों और वहां की उजली जमीन पर लैंड करने के अनोखे अनुभव खुद कमांडर नील आर्मस्ट्रांग की जबानी -
मुझे याद है, जब मैं छोटा बच्चा था तो लकड़ी के एयरक्राफ्ट बनाया करता था। हवा में उड़ते और कलाबाजियां खाते प्लेन्स की वो तस्वीर मेरे दिमाग में अब भी ताजा है, जिन्हें मैंने बचपन में अपने पिता के साथ एयरशो में देखा था। हम सभी वाकई बड़े खुशनसीब हैं, कि कुदरत ने हमारे लिए वक्त का ऐसा दौर चुना जब इतिहास मानव जाति की तकदीर का फैसला कर रहा था। मैं उन सब लोगों का शुक्रिया अदा करता हूं, जिनकी मेहनत और लगन की वजह से अपोलो-11 कार्यक्रम मुमकिन हो सका और हम सब इतिहास के उस गौरवशाली पन्ने पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके।
मिशन अपोलो-11 नासा के अंतरिक्ष अभियानों के इतिहास का सबसे ज्यादा प्रचारित अभियान था। इसे लेकर लोगों की अपेक्षाएं बुलंदी पर थीं। अकसर लोग मुझसे पूछते हैं कि अभियान की तैयारी के दौरान मीडिया हाइप और लोगों की अपेक्षाओं को लेकर क्या मैं किसी तरह के मानसिक दबाव से गुजर रहा था? इसका जवाब मैं आज देता हूं, हमारे अभियान को लेकर बाहर की तमाम हलचल से मैंने पीठ मोड़ ली थी। मेरा पूरा ध्यान उन तीन से चार लाख लोगों की मिलीजुली मेहनत पर था, जो इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए दिन-रात काम में जुटे थे।
मेरा पूरा ध्यान इस मिशन की कामयाबी पर फोकस था, जिसके लिए इतने सारे लोग काम कर रहे थे। बाहर के तमाशे से मैंने खुद को दूर रखा, मेरे दिमाग में केवल यही बात थी कि प्रोजेक्ट अपोलो-11 के लिए काम कर रहा हर व्यक्ति, हर एसेंबलर कुछ न कुछ बनाने में जुटा था, लोग परीक्षण पर परीक्षण कर रहे थे और लैंडर का हर नट-बोल्ट कई-कई बार परखा जा रहा था। इस मिशन से जुड़े लाखों पुरुष और महिलाएं अपने काम को लेकर इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि ये बाते आम थीं कि अगर कुछ गड़बड़ होई तो ये कम से कम हमारे काम की वजह से नहीं होगी। क्योंकि इन सैकड़ों-हजारों लोगों ने अपना काम जितना वो कर सकते थे, उससे बेहतर किया था और जब सारे लोग कुछ बेहतर काम करते हैं तो नतीजा अपने आप शानदार हो जाता है। इसीलिए मिशन अपोलो-11 कामयाब रहा था
जब मैं जॉनसन स्पेस सेंटर के मैन्ड स्पेसक्राफ्ट सेंटर में अपने मिशन का प्रशिक्षण ले रहा था, तो वहां का माहौल ऐसा था कि आप ये नहीं पूछ सकते थे कि बॉस छुट्टी कब होगी? पूरे जुनून के साथ जुटे लोग तब तक काम में जुटे रहते थे, जबतक कि वो पूरा नहीं हो जाता था। कोई अपनी कलाई घड़ी पर नजर नहीं डालता था कि वक्त क्या हुआ है? पाली खत्म होने की बेल बजती जरूर थी, लेकिन घर कोई भी नहीं जाता था। लोगों ने अपनी लगन से प्रोजेक्ट अपोलो-11 को दूसरे सरकारी कामकाजों से बिल्कुल जुदा बना दिया था। हर कोई इस प्रोजेक्ट में पूरी दिलचस्पी, लगन और उत्साह के साथ जुटा हुआ था। सबके दिलोदिमाग में बस यही बात थी कि हमें कामयाब होकर दिखाना है। ऐसे माहौल में मेरा पूरा ध्यान पूरी तरह से अपने मिशन पर टिका था। एडविन बज एल्ड्रिन और माइकल कोलिंस मेरे लिए अजनबी नहीं थे, जेमिनी और अपोलो के शुरुआती मिशन्स के दौरान हम पहले भी साथ काम कर चुके थे। हमारी टीम नासा के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से लगातार नई-नई समस्याओं पर इंप्रोवाइज किया करते थे, कि अगर ये हो गया तो हम क्या करेंगे? अगर वो हो गया तो हमारा प्लान बी क्या होगा? जितनी मुसीबतों के बारे में हम सोच सकते थे, उन्हें सामने रख कर लंबी बहसें किया करते थे।
20 जुलाई 1969 को हमारा लैंडर ईगल चांद पर लैंड कर गया और अगले दिन 21 जुलाई को मैंने चंद्रमा पर पहले कदम रखे। लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैंने पहले से सोचकर रखा था कि चंद्रमा पर उतरने के बाद मैं ये लाइनें बोलूंगा। मैं आज बताता हूं, मैंने पहले से कुछ भी सोचकर नहीं रखा था और न ही कोई तैयारी की थी, हां लैंडर की नौ कदमों वाली सीढ़ी से उतरते वक्त जरूर मेरे दिल में तेज हलचल चल रही थी और इसी बीच मुझे ...जाइंट स्टेप ऑफ मैनकाइंड, वाली लाइनें सूझ गईं। पूरी दुनिया के लिए ये बेहद खास मौका था। मेरे बाद बज एल्ड्रिन उतरे, लोग मुझसे ये भी पूछते हैं कि अपोलो-11 की ज्यादातर फोटोग्राफ्स में बज एल्ड्रिन ही नजर आते हैं, मैं क्यों नहीं? ऐसा इसलिए, क्योंकि चंद्रमा पर हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं था और मैं ज्यादा से ज्यादा फोटोग्राफ्स लेने में जुटा था।
मिशन की तैयारी के दौरान विचार-विमर्श का एक लंबा दौर इस बात को लेकर भी चला कि चंद्रमा पर पहुंचकर हम क्या-क्या करेंगे। तमाम लोगों ने अपने-अपने सुझाव दिए। कुछ का कहना था कि हमें वहां यूनाईटेड नेशंस का झंडा लगाना चाहिए। तो वहीं कुछ लोग चाह रहे थे कि चंद्रमा पर कई देशों के छोटे-छोटे झंडे वहां लगाए जाएं। आखिर में ये फैसला लिया गया और मुझे लगता है कि कांग्रेस ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई कि अपोलो-11 कोई यूनाईटेड नेशंस का मिशन नहीं था और हम कोई वहां किसी मालिकाना हक का दावा करने नहीं जा रहे थे, लेकिन हम चाहते थे कि लोगों को पता चले कि हम यहां हैं, इसलिए हमने तय किया कि अपना राष्ट्रीय ध्वज ही वहां लगाएंगे। अमेरिका के झंडे को वहां लगाना मेरा काम था, चंद्रमा पर इसे लगाया जाना चाहिए या नहीं, इन बातों पर मेरा ध्यान बिल्कुल भी नहीं था। मुझे गर्व है कि अपने देश का झंडा चंद्रमा पर पहली बार मैंने लगाया।
चंद्रमा ने हमें कई तरह से हैरानी में डाल दिया। वहां की कई चीजों से मैं गहरे ताज्जुब में पड़ गया। सबसे ज्यादा हैरानी मुझे वहां के क्षितिज को देखकर हुई, धरती के मुकाबले चंद्रमा का क्षितिज हमारे बेहद करीब था। हमारे कदमों के साथ उड़ती चंद्रमा की धूल, जिसतरह उठकर वापस गिर रही थी, मैं उसे भी देखकर हैरान था। धरती पर आप धूल पर पैर पटकें तो वो उड़कर गुबार की शक्ल में छा जाएगी, लेकिन चंद्रमा पर ऐसा नहीं हो रहा था। हमारे पैर पटकने से धूल उठ रही थी लेकिन कोई गुबार सा नहीं बन रहा था। धरती पर धूल का गुबार वायुमंडल की वजह से बनता है, चंद्रमा पर वायुमंडल न होने से धूल हमारे पैरों के आसपास ही छिटक रही थी। चंद्रमा पर धूल तेजी से जमीन पर वापस गिरकर एक नई पर्त बना देती थी। ऐसा लगता था मानो इस धूल को एक हफ्ते पहले उडा़या गया था। ये वाकई हैरतंगेज था, मैंने ऐसा पहले कभी कुछ देखा-सुना नहीं था।
पब्लिक एड्रेस के दौरान लोग सवाल पूछते हैं कि क्या चीन की दीवार और मोंटाना के फोर्ट रेक डैम जैसी इंसानों की बनाई चीजें हमें चंद्रमा से नजर आ रही थीं या नहीं? ये सब अफवाह है और कुछ नहीं, चंद्रमा के क्षितिज से ऊपर हमें नीली पृथ्वी नजर आ रही थी। हमें महाद्वीप और ग्रीनलैंड दिख रहे थे। पृथ्वी लाइब्रेरी में रखे किसी ग्लोब के जैसी लग रही थी। हमें अंटार्कटिक नहीं दिखा, क्योंकि वो हिस्सा बादलों से ढंका था। पृथ्वी के घूमने के साथ हमें अफ्रीका साफ नजर आ रहा था। सूरज की किरणें किसी चीज से परावर्तित हो रहीं थीं, शायद चाड झील से हमने भारत और एशिया भी देखा। लेकिन हमें चंद्रमा से इंसान की बनाई चीन की दीवार या कोई दूसरी चीज नजर नहीं आई। हां, कई लोग ऐसी बातें करते हैं, लेकिन मैं अब तक किसी ऐसे अंतरिक्षयात्री से नहीं मिला जिसे अंतरिक्ष से मानव निर्मित दीवार या इमारतें दिखाई दी हों। यहां तक कि मैंने बाद में स्पेस शटल के साथ जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों से भी पूछा, लेकिन चीन की दीवार या कोई दूसरी चीज किसी को अंतरिक्ष से अब तक नजर नहीं आई है।
अंत में मैं अपनी पुरानी इच्छा व्यक्त करना चाहूंगा, मैं मंगल पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों के मिशन में शामिल होना चाहता हूं। मैं मंगल जाना चाहता हूं। मुझे लगता है, अब हम मंगल के सफर पर जा सकते हैं। हम मंगल को नजरअंदाज नहीं कर सकते, आज नहीं तो कल हमें मंगल पर जाना ही होगा।
- नील आर्मस्ट्रांग
कमांडर, मिशन अपोलो-11
( कमांडर नील आर्मस्ट्रांग के शब्दों में मिशन अपोलो-11 की यादें)

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

"हमारे सूरज के जुड़वां का वजूद मुमकिन"


साइंस जर्नल इकरस के नवंबर 2010 के अंक में एक ऐसा पेपर पब्लिश हुआ जिसने स्पेस साइंस में एक नई हलचल मचा दी। ये रिसर्च पेपर था एस्ट्रोफिजिसिस्ट जॉन मैटसे और डैनियल व्हिटमायर का और अपने इस पेपर में इन दोनों वैज्ञानिकों ने संभावना जताई थी कि हमारे सौरमंडल के बाहरी आवरण ओर्ट्स क्लाउड रीजन में हमारे सूरज का जुड़वां मौजूद हो सकता है। यानि सूरज से छिटका वो पदार्थ जो सितारा नहीं बन सका और सौरमंडल की रचना की प्रक्रिया के दौरान एक विशाल गैस जाइंट की शक्ल में इस ओर्ट्स क्लाउड रीजन में छिटक गया। इन वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि सूरज का जुड़वा ये गैस जाइंस हमारे बृहस्पति से भी चार गुना ज्यादा विशाल हो सकता है। इन शोधकर्ताओं ने इस संभावित गृह का नाम टाईकी रखा और अपने इस पेपर में सिफारिश की कि उनके आंकलन की जांच वाइड-फील्ड इंफ्रारेड सर्वे एक्सप्लोरर यानि वाइस मिशन से कराई जाए। वाइस नासा का मिशन है, जो ऐसी स्पेस ऑब्जरवेटरी है जो इंफ्रारेड आंखों की मदद से अंतरिक्ष की छानबीन में जुटी है। चार अलग-अलग इंफ्रारेड वेवलेंथ से डेढ़ बार अंतरिक्ष को छान चुकी स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस ने दूर-दराज की आकाशगंगा से लेकर धरती से करीब मंडराती छोटी उल्काओं तक की ढाई करोड़ से ज्यादा तस्वीरें लेकर नासा को भेजी हैं। ये तस्वीरें ही वाइस का वो डेटा हैं जिनकी गहन जांच की जा रही है और जिनके शुरुआती डेटा इस साल अप्रैल में सार्वजनिक किए जाएंगे। स्काई स्कैनिंग के दौरान वाइस ने अल्ट्रा कोल्ड स्टार यानि ब्राउन ड्वार्फ से लेकर 20 नए धूमकेतुओं, 134 नियर अर्थ ऑब्जेक्ट्स और मंगल और बृहस्पति के बीच मौजूद उल्काओं की बेल्ट में 33,000 नई उल्काओं की खोज की है। इस महत्वपूर्ण खोज के बाद वाइस अब फरवरी 2011 से हाइबरनेशन यानि शीतनिद्रा में चली जाएगी, यानि वैज्ञानिक इस स्पेस ऑब्जरवेटरी के कंप्यूटर्स को शट डाउन कर देंगे, ताकि ये ऑब्जरवेटरी अगले एसाइनमेंट के लिए तैयार हो सके। इस दौरान वाइस के डेटा के विश्लेषण का काम चलता रहेगा और वाइस के फाइनल डेटा मार्च 2012 में रिलीज किए जाएंगे। यानि इस सवाल, कि क्या हमारे सौरमंडल के नौंवे ग्रह का अस्तित्व है, का जवाब पूरी तरह से मार्च 2012 में ही मिल सकेगा जब वाइस के फाइनल डेटा जारी किए जाएंगे। इस दौरान हमें इस सवाल से संबधित कुछ प्रमुख सवालो पर नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी के वैज्ञानिक और प्रमुख ग्रह खोजी व्हिटने क्लेविन के जवाब प्राप्त हुए हैं। पेश हैं ये सवाल-जवाब -
 सवाल - वाइस के डेटा से इस बात की पुष्टि या खंडन कब तक हो सकेगा कि टाइकी नाम का कोई ग्रह है या नहीं?
क्लेविन - अभी ये कहना बहुत जल्दबाजी होगा कि हमें ये सच्चाई कब तक मालूम हो सकेगी कि ओर्ट्स क्लाउड में टाईकी नाम का कोई विशाल ग्रह वजूद में है या नहीं। इसके लिए अभी हमें ऑब्जरवेशन में कुछ और साल लगाने होंगे तभी हम जान सकेंगे कि वाइस ने वाकई कोई ऐसी चीज देखी है या नहीं। स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस के कामकाज शुरू करने के बाद के पहले 14 हफ्तों के डेटा इस साल अप्रैल में जारी किए जा रहे हैं, लेकिन इस सवाल का जवाब देने के लिए ये नाकाफी हैं। वाइस का फुल सर्वे डेटा मार्च 2012 में जारी किया जाएगा, तभी हमें इसमें जवाब की कोई झलक दिख सकेगी। वाइस के डेटा के वैज्ञानिक विश्वेषण का काम पूरा हो जाने के बाद ही पता चलेगा कि मैटसे और व्हिटमायर के आंकलन सही है या नहीं।
सवाल - अगर ओर्ट्स क्लाउड रीजन में टाइकी जैसा कोई ग्रह हुआ तो क्या ये तय है कि वाइस ने उसे जरूर देखा होगा?
क्लेविन - हां इसकी पूरी संभावना है, लेकिन फिरभी टाइकी का वजूद है या नहीं, केवल वाइस के डेटा से इसकी पुष्टि नहीं हो सकती। देखिए पहले वाइस ने पूरे स्काई का सर्वे किया, इसके छह महीने बाद अपनी दो इंफ्रारेड बैंड्स की मदद से उसने फिर उन सभी इलाकों पर दोबारा नजर डाली। अगर टाइकी जैसी कोई बॉडी वहां मौजूद है तो छह महीने के दौरान उसकी पोजीशन में फर्क जरूर आया होगा। ये जो दो खास इंफ्रारेड बैंड्स हैं, इनके इस्तेमाल से दूसरे स्काई सर्वे के दौरान छोटे पिंड, अल्ट्रा कोल्ड स्टार्स या ब्राउन ड्वार्फ की पहचान की गई है, जो कि बृहस्पति से भी विशाल गैसीय ग्रह जैसे भी हो सकते हैं, टाइकी के बारे में भी ऐसा ही बताया गया है। लेकिन इसकी पुष्टि के लिए ग्राउंड ऑब्जरवेशन भी जरूरी है।
सवाल - अगर टाइकी का वजूद वाकई में है, तो अपने ही सौरमंडल में एक और ग्रह की खोज करने में इतना वक्त क्यों लग गया?
क्लेविन - देखिए टाइकी एक अल्ट्रा कोल्ड बॉडी होगी, जो किसी भी दृश्य रोशनी के टेलिस्कोप के लिए अदृश्य होगी। क्योंकि ऐसी अल्ट्रा कोल्ड बॉडीज से ऐसे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियन नहीं निकलते जिन्हें हम देख सकते हैं। हमारे देखने की एक सीमा है, जो बहुत थोड़ी है। ऐसी अल्ट्राकोल्ड चीजों से फूटने वाली ग्लो यानि रोशनी को किसी संवेदनशील इंफ्रारेड टेलिस्कोप की मदद से ही पकड़ा जा सकता है, बशर्ते वो सही दिशा में देख रही हों। स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस एक संवेदनशील इंफ्रारेड ऑब्जरवेटरी है, जो सभी दिशाओं में देख सकती है।
सवाल - इस संभावित ग्रह का नाम टाइकी क्यों रखा गया? आखिर एक यूनानी नाम का चुनाव क्यों किया गया, जबकि बाकी सभी दूसरे ग्रहों के नाम रोमन माइथोलॉजी से लिए गए हैं?
क्लेविन - 1980 में ये संभावना जताई गई कि शायद सूरज का भी कोई साथी है, शायद हमारी दुनिया दो सूरज वाली है, लेकिन ये दूसरा सूरज कहीं छिपा है। यूनानी देवी के नाम पर इस दूसरे सूरज का नाम रखा गया- नेमेसिस। संभावना ये भी जताई गई कि एक निश्चित अंतराल पर पृथ्वी पर हुए सामूहिक विनाश की घटनाओं के रहस्य को नेमेसिस से जोड़कर समझा जा सकता है। गणना की गई कि नेमेसिस का परिक्रमा-पथ बहुत ज्यादा इलिप्टिकल होगा, जिससे शायद हर ढाई करोड़ साल में एक बार ओर्ट्स क्लाउड रीजन में मौजूद धूमकेतुओं को भारी उथल-पुथल को जन्म देता होगा, ये घटना इतनी बड़ी होती होगी कि यहां से आंतरिक सौरमंडल के लिए धूमकेतुओं की एक बौछार सी फूट पड़ती होगी। इनमें से कुछ धूमकेतु पृथ्वी से जा टकराते होंगे, जिससे वहां मौजूद जीवन का बिल्कुल सफाया सा हो जाता होगा।
लेकिन हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से नेमेसिस परिकल्पना की पुष्टि नहीं हुई और नियमित अंतराल से पृथ्वी पर होने वाले जीवन के सफाये की घटनाओं से इसका कोई संबंध नहीं निकला। इसका मतलब ये कि नेमेसिस की परिकल्पना में कोई दम नहीं निकला और ये महज कल्पना की उड़ान से ज्यादा कुछ और साबित नहीं हुई। फिरभी, ये पूरी तरह मुमकिन है कि हमारे सूरज से बहुत दूर इसके एक ऐसे जुड़वां साथी का वजूद हो, जिसे अब तक देखा नहीं गया है और जो एक वृत्ताकार कक्षा में कुछ लाख साल में सूरज की परिक्रमा कर रहा हो। अगर ऐसा है भी तो हमारे सौरमंडल के जीवन पर इसका कोई असर नहीं है। वैज्ञानिकों ने इस जुड़वां सूरज नेमेसिस का संबंध नौंवें संभावित ग्रह से जोड़ने के लिए ही उसका नाम टाइकी रखा, जो यूनानी माइथोलॉजी के मुताबिक देवी नेमेसिस की बहन है।

सोमवार, 29 नवंबर 2010

‘स्पेक्ट्रम’ आखिर है क्या ?

17 वीं सदी में महान वैज्ञानिक इसाक न्यूटन ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसने साइंस की धारा ही बदल दी। उन्होंने अपनी प्रयोगशाला के सभी खिड़की दरवाजे बंद कर दिए। फिरभी प्रयोगशाला में पूरा अंधेरा नहीं हो सका, क्योंकि खिड़की की एक दरार से सूरज की किरण भीतर आ रही थी। न्यूटन ने मुस्कराते हुए शीशे का एक छोटा प्रिज्म उठाया और उसे सूरज की उस किरण के सामने ले गए। एक जादू सा हो गया और सूरज की रोशनी का रहस्य सामने आ गया। सामने रखे एक सफेद बोर्ड पर इंद्रधनुष खिल उठा, दरअसल शीशे के प्रिज्म ने सूरज की रोशनी में मौजूद सात उन रंगों को अलग कर दिया था। हमारी आंख जो कुछ भी देखती है वो इन सात रंगों की सीमा में ही सिमटा रहता है। न्यूटन ने सूरज की रोशनी में छिपे इन सात रंगों को स्पेक्ट्रम कहा, और फिजिक्स में एक नई शुरुआत हो गई।
हमारा सूरज और एक साधारण अणु ये दोनों ही स्पेक्ट्रम के प्राकृतिक स्रोत हैं। आज स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल हम हर रोज जाने-अनजाने करते रहते हैं, टीवी के रिमोट से लेकर लैपटॉप पर वॉयरलेस इंटरनेट, माइक्रोवेव ओवेन, खिली-खिली धूप और मोबाइल फोन तक सब स्पेक्ट्रम का ही कमाल है। न्यूटन ने हमें स्पेक्ट्रम के गुण के बारे में बताया लेकिन स्पेक्ट्रम की वजह को गहराई से समझा महान भारतीय वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन ने। रमन ने अगर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का राज नहीं समझा होता तो आज न तो रिमोट होता और न मोबाइल फोन। हर अणु परमाणुओं सो बनता है और हर परमाणु के केंद्र में एक नाभिक होता है, जिसमें प्रोटान और न्यूट्रॉन होते हैं और अलग-अलग कक्षाओं में परिक्रमा करते इलेक्ट्रान चारों ओर से नाभिक को घेरे रहते हैं। अब शुरू होता है असली खेल, जब परमाणु को गर्म किया जाता है तो नाभिक की परिक्रमा करते इलेक्ट्रान अपनी कक्षा से छलांग लगाकर और ऊपर वाली कक्षा में पहुंच जाते हैं। इसी तरह जब परमाणु को ठंडा किया जाता है तो नाभिक की परिक्रमा कर रहे इलेक्ट्रान निचली कक्षाओं में गिर जाते हैं। सबसे खास बात ये कि नाभिक के चारोंओर घूमता इलेक्ट्रान जब भी अपनी कक्षा से ऊपर छलांग लगाता है या नीचे गिरता है, उस वक्त वो खास स्पेक्ट्रम छोड़ता है। इसे कहते हैं इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम। रमन ने पता लगाया कि कुदरत में मौजूद सभी धातुओं, खनिजों, गैसों और तरल का स्पेक्ट्रम बिल्कुल अलग-अलग होता है। ये स्पेक्ट्रम बिल्कुल उंगलियों के निशान जैसा होता है यानि हर तत्व का स्पेक्ट्रम बिल्कुल अलग और अनोखा। इस खोज के लिए रमन को भौतिकी के नोबेल से सम्मानित किया गया और तत्वों से निकलने वाले स्पेक्ट्रम को रमन इफेक्ट कहा गया। आज रमन इफेक्ट से ही हम चंद्रमा और मंगल ग्रह मौजूद खनिजों का पता लगा रहे हैं, और खोजे जा रहे नए ग्रहों के बारे में यहीं बैठे-बैठे बता सकते हैं कि वहां पानी है या नहीं, या उसका वातवरण कैसा है।
इलेक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन की वजह जानने के बाद अब मनचाही स्पेक्ट्रम को हासिल करना आसान हो गया, और यहीं से स्पेक्ट्रम के कारोबारी इस्तेमाल की शुरुआत हुई। फ्रीक्वेंसी और वेवलेंथ हर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की खास पहचान होती है, और इसी के आधार पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन को रेडियो, माइक्रोवेव, इंफ्रारेड, विजिबिल, अल्ट्रावॉयलेट, एक्स-रे और गामा-रे की पहचान की गई। ये सारी स्पेक्ट्रम, जिन्हें हम रेडिएशन भी कह सकते हैं, इनमें से कुछ हमें कोई नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे बेहद काम की हैं, जैसे रेडियो जिससे हम टीवी के प्रोग्राम्स देखते हैं, माइक्रोवेव जिससे सेटेलाइट संचार और ओवन से लेकर मोबाइल फोन तक काम करते हैं और इंफ्रारेड जिसपर सभी रिमोट काम करते हैं। समुद्र के किनारे की धूप में 53 फीसदी इन्फ्रारेड, 44 फीसदी दिखाई देने वाली रोशनी और 3 फीसदी अल्ट्रावॉयलेट किरणें होती हैं। अल्ट्रावॉयलेट, एक्स-रे और गामा-रे स्पेक्ट्रम बेहद खतरनाक हैं और इनके संपर्क में कुछ देर रहने से ही हम बीमार पड़ सकते हैं।
मोबाइल, सेटेलाइट और टेलीविजन इन तीनों में माइक्रोवेव और रेडियो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जाता है। अब सवाल ये कि आखिर इसका कारोबारी इस्तेमाल कैसे होता है? दरअसल किसी स्पेक्ट्रम का कारोबारी इस्तेमाल इन बातों से तय होता है कि उसकी तरंग की लंबाई कितनी है, उसकी फ्रिक्वेंसी (वेवलेंथ या साइकल प्रति सेकंड) क्या है और वो कितनी ऊर्जा कितनी दूर तक साथ ले जा सकती है।
रेडियो वेव स्पेक्ट्रम से लंबी दूरी तय की जा सकती हैं और वह भी बिना किसी दिक्कत के। रेडियो वेव स्पेक्ट्रम  की तरंगें काफी लंबी होती हैं। इनकी वेवलेंथ 1 किलोमीटर से लेकर 10 सेंटीमीटर तक की होती है और फ्रिक्वेंसी भी 3 किलोहट्र्ज (3,000 साइकिल प्रति सेकंड) से लेकर 3 गीगाहट्र्ज (3 अरब साइकिल प्रति सेकेंड) तक के बीच होती है। रेडियो तरंगों को सबसे ज्यादा असर भाप और आयन से होता है। साथ ही, इन पर सोलर फ्लेयर और एक्सरे किरणों के विस्फोट का भी असर होता है। साथ ही, पहाड़ों की वजह से भी रेडियो तरंगों से संचार में काफी असर पड़ सकता है। छोटी फ्रिक्वेंसी मकानों और पेड़ों को भी पार कर सकती हैं। साथ ही, ये पहाड़ों के किनारे से भी निकल सकती हैं।
माइक्रोवेव स्पेक्ट्रम का सबसे फायदेमंद इस्तेमाल दूरसंचार और इंटरनेट में होता है। दूरसंचार और ब्रॉडबैंड के लिए 700-900 मेगाहट्र्ज की छोटी फ्रिक्वेंसी काफी फायदेमंद होती हैं। सेंटीमीटर और मिलीमीटर की रेंज वाली माइक्रोवेव्स की फ्रिक्वेंसी 300 गीगाहट्र्ज तक हो सकती है। इसके अलग-अलग प्रकार के इस्तेमाल को देखते हुए इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। खाना पकाने वाले माइक्रोवेव में सैकड़ों वॉट बिजली का इस्तेमाल आरएफ वेवलेंथ को पैदा करने में होता है। ये वेवलेंथ 32 सेमी (915 मेगाहट्र्ज) से लेकर 12 सेमी (2.45 मेगाहट्र्ज) तक के होते हैं। छोटी ऊर्जा स्रोतों वाले उपकरणों से पैदा होने वाले माइक्रोवेव का इस्तेमाल संचार के साधनों के रूप में होता है और ये काफी कम ऊर्जा पैदा करते हैं। इन्फ्रारेड वेव छोटी होती हैं और वे काफी गर्म होती हैं। लंबी दूरी वाले इन्फ्रारेड बैंड्स का इस्तेमाल रिमोट कंट्रोल के लिए होता है। साथ ही, इनका इस्तेमाल बहुत कम गर्मी पैदा करने वाले बल्बों में होता है।
 2जी और 3जी
किस स्पेक्ट्रम पर हम बात करेंगे और किस स्पेक्ट्रम पर सेटेलाइट डेटा भेजे जाएंगे, इस जैसे तमाम मुद्दों की बागडोर संभाल रखी है इंटरनेशनल कम्युनिकेशन यूनियन ने। संयु्क्त राष्ट्र की इस इकाई ने सभी सदस्य देशों को अलग-अलग स्पेक्ट्रम के बैंड्स आवंटित कर रखे हैं। इसमें कोई देश मनमानी या एक-दूसरे के कामकाज में बाधा नहीं पहुंचा सकता। इन नियमों के तहत 1980 में 1-जी यानि फर्स्ट जनरेशन वायरलेस टेक्नोलॉजी की शुरुआत हुई, पहले पहल जिसका इस्तेमाल कार फोन में किया गया। 2-जी यानी सेकेंड जनरेशन वायरलेस टेलीफोन टेक्नोलॉजी की शुरुआत 1990 में हुई। 1991 में पहली बार फिनलैंड में रेडियोलिंजा कंपनी की ओर से जीएसएम मोबाइल सर्विस में 2-जी टेक्नोलॉजी का कारोबारी इस्तेमाल शुरू हुआ। डाटा ट्रांसफरिंग, टेक्स विथ रेडियो सिग्नल्स आदि सुविधाओं से हुई शुरुआत में जल्दी ही सीडीएमए का प्रवेश भी हो गया। अब आ गई है बारी 3-जी यानि थर्ड जनरेशन मोबाइल टेक्नोलॉजी की। 3-जी में डाटा का हस्तांतरण तेजी से होता है और नेटवर्क भी अच्छा होता है। 2जी स्पेक्ट्रम की बात करें तो ये हमारी सरकार के पास इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन से आवंटित एक खास रेडियो वेव बैंड है। सिग्नल भेजने के लिए मोबाइल कंपनियों को फ्रिक्वेंसी रेंज की जरूरत थी। सरकार ने लाइसेंस फी लेकर स्पेक्ट्रम मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर्स को जारी किए।
खास बात ये कि 2-जी और 3-जी के स्पेक्ट्रम में कोई खास अंतर नहीं है। बस सरकार के नियमन और इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन ने सदस्य देशों के बीच बेहतर तारतम्यता के तहत इसके लिए अलग स्पेक्ट्रम घोषित किया गया है। दोनों नेटवर्क 800-900 और 1800-1900 मेगाहट्र्ज पर काम करते हैं और कर सकते हैं। कमाई में इजाफे को देखते हुए अनुमानों के मुताबिक 900 मेगाहट्र्ज के 3जी में 2.1 गीगाहट्र्ज से कम लागत लगती है। फिनलैंड, आइसलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, थाईलैंड, वेनुजुएला, डेनमार्क और स्वीडन में तो 900 मेगाहट्र्ज (2जी स्पेक्ट्रम) पर ही 3जी नेटवर्क मौजूद है। फ्रांस भी अब 2जी की जगह 3जी को बढ़ावा दे रहा है। इससे पता चलता है कि भारत में सरकारी और रक्षा इस्तेमालों की वजह से स्पेक्ट्रम की कितनी ज्यादा किल्लत है। हमें अपनी जरूरतों, लैंडलाइन फोनों की कम पहुंच और लागत को देखते हुए अपनी क्षमता के विस्तार के नए तरीकों की तलाश करनी होगी। दूसरे मुल्कों में कंपनियां इस स्पेक्ट्रम का अपनी इच्छा के मुताबिक इस्तेमाल करने के लिए मुक्त हैं, जबकि अपने मुल्क में इस बारे में कोई तस्वीर ही स्पष्ट नहीं है। हमारी नीतियों कम कीमत पर ज्यादा अच्छी कवरेज या क्षमता के बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकती हैं। इससे लोगों को कम कीमत पर अच्छी सेवा मिलेगी।