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बुधवार, 25 सितंबर 2013

300 साल पुरानी गुत्थी सुलझी, पता चला कि पृथ्वी के इनर कोर के घूमने की दिशा क्या है?


वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने पृथ्वी का कोर किस दिशा में घूमता है? इस 300 साल पुराने सवाल का जवाब ढूंढ़ निकाला है। वैज्ञानिकों के बनाए नए मॉडल से पता चला है कि ठोस लोहे की बनी पृथ्वी की इनर कोर पूरब की ओर से ‘सुपर रोटेट’ कर रही है। ‘सुपर रोटेट’ का मतलब ये कि इनर कोर की घूमने की रफ्तार पृथ्वी की गति से ज्यादा है। इस मॉडल से ये भी पता चला है कि मुख्यतौर पर पिघले लोहे से बना आउटर कोर अपेक्षाकृत धीमी गति से इनर कोर के विपरीत यानि पश्चिम की ओर से घूम रहा है।
1692 में एडमंड हैले ने पृथ्वी के जियोमैग्नेटिक फील्ड में पश्चिम दिशा को केंद्रित एक ड्रिफ्टिंग मोशन दिखाया था। तब से लेकर अब पहली बार वैज्ञानिक इनर कोर और आउटर कोर के घूमने के तरीकों को लेकर कुछ बता सके हैं। लीड्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि पृथ्वी का जियोमैग्नेटिक फील्ड ही हमारे ग्रह के कोर की इन विरोधी गतियों की वजह है।
लीड्स यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ अर्थ एंड एनवायरमेंट के डॉ। फिलिप लिवरमोर ने बताया कि भूकंप मापने वाले सीस्मोमीटर्स ने ही पहले पहल पृथ्वी की सतह के सापेक्ष ठोस इनर कोर के पूरब की ओर केंद्रित ‘सुपर रोटेशन’ को पहचाना था। न्यूटन के गति के तीसरे नियम की कसौटी पर इसे बराबर और विपरीत क्रिया के तौर पर आसानी से समझाया जा सकता है। इनर कोर पर मैग्नेटिक फील्ड पूरब की ओर केंद्रित नजर आती है, इस वजह से इनर कोर की रफ्तार पृथ्वी की गति से तेज रहती है। लेकिन पूरब की ओर घूमने के क्रम में ठोस इनर कोर अपने चारों ओर मौजूद पिघले आउटर कोर को विपरीत दिशा की ओर ठेलती रहती है, इससे आउटर कोर विपरीत दिशा यानि पश्चिम की ओर केंद्रित होकर घूमता रहता है।
हमारे ठोस इनर कोर का आकार हमारे चंद्रमा जितना है। लेकिन पृथ्वी के केंद्र में मौजूद ये लोहे का ठोस चंद्रमा चारों तरफ से पिघले लोहे के एलॉय से बने आउटर कोर से घिरा है। हालांकि पृथ्वी का इनर कोर हमारे पैरों से 5200 किलोमीटर नीचे है, फिर भी इसकी मौजूदगी प्रभाव पृथ्वी की सतह के लिए विशेषतौर पर महत्वपूर्ण है।  
जैसे-जैसे इनर कोर का आकार बढ़ता है, तो ठोस होने की इस प्रक्रिया में हीट रिलीज होती है, जिससे ऊउटर कोर में बिजली पैदा होती है। इस बिजली से ही हमारा मैग्नेटिक फील्ड जन्म लेता है।
पृथ्वी की सतह पर मौजूद जीवन के लिए ये मैग्नेटिक फील्ड सौर विकिरण से सुरक्षा के लिए एक कवच का काम करता है। इसके बगैर पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

धरती पर सबसे विशाल ज्वालामुखी की खोज


हमारी धरती पर सबसे विशाल ज्वालामुखी की खोज की गई है। ये ज्वालामुखी इतना विशाल है कि इसे पूरे सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा ज्वालामुखी कहा जा रहा है। पृथ्वी का ये सबसे विशाल ज्वालामुखी धरती पर नहीं, बल्कि प्रशांत महासागर के तल पर मौजूद है। ये ज्वालामुखी भौगेलिक आकार में ब्रिटिश या मैक्सिको देशों के जितनी विशाल है। जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जापान के पूर्वी तट से करीब 1609 किलोमीटर दूर मौजूद इस सबसे बड़े ज्वालामुखी का नाम 'टैमू मैसिफ' रखा गया है।
प्रशांत महासागर के भीतर 'शैट्सकाई राइज' नाम की विशाल पर्वतमाला है, जिसका निर्माण 13 से 14।5 करोड़ साल पहले हुआ था। ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' इसी पर्वतमाला का एक बड़ा हिस्सा है। विशालतम ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' प्रशांत महासागर के तल में करीब 310798 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला है।
अब तक 5179 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हवाई के सक्रिय ज्वालामुखी 'मौना लोआ' को पृथ्वी का सबसे विशाल ज्वालामुखी समझा जाता था, लेकिन  अगर आकार के मामले में इसकी तुलना 'टैमू मैसिफ' से की जाए, तो इसके सामने 'मौना लोआ' महज 2 फीसदी ही है। हमारे सौरमंडल का सबसे विशाल ज्वालामुखी 'ओलिंपस मॉन्स' है, जो कि मंगल ग्रह पर है। लेकिन 'ओलिंपस मॉन्स' भी पृथ्वी के इस नए ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' से केवल 25 प्रतिशत ही बड़ा है।
अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि 'टैमू मैसिफ' एक ज्वालामुखी है या फिर ये कई सारे ज्वालामुखियों का समूह है। ह्युस्टन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट आफ अर्थ एंड एटमॉस्फियरिक साइंसेज के प्रोफेसर विलियम सागर के मुताबिक 'टैमू मैसिफ' को बनाने वाले बासाल्ट की भारी-भरकम मात्रा को देखने से पता चलता है कि ये केंद्र में मौजूद एक ही रास्ते से बाहर आए हैं। इसलिए निश्चित तौर पर 'टैमू मैसिफ' एक ही और दुनिया का विशालतम ज्वालामुखी है।
2009 में 'शैट्सकाई राइज' पर्वतमाला के अध्ययन के लिए गए एक्सपीडीशन-324 के ओशन ड्रिलिंग प्रोग्राम के सदस्यों ने पता लगाया है कि ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' की भौगोलिक रचना कुछ इस प्रकार है कि इसका लावा धरती पर मौजूद किसी दूसरे ज्वालामुखी की तुलना में बहुत ज्यादा दूर तक जाता है। विशेष अध्ययन दलों ने 2010 और 2012 में भी इस ज्वालामुखी के बारे में आंकड़े जुटाए हैं। 'टैमू मैसिफ' की कोर से लेकर कई इलाकों से सैंपल इकट्ठे किए गए हैं।
वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' का शीर्ष या टॉप समुद्र की ऊपरी सतह से करीब 6500 फुट नीचे है। पृथ्वी के इस विशालतम ज्वालामुखी का अधिकतर बेस पानी के भीतर ही है और ये करीब 6 किलोमीटर गहरा है।

रविवार, 9 जनवरी 2011

क्या धरती के चुंबकीय ध्रुव पलटने वाले हैं ?


अब हमारी धरती के दो उत्तरी ध्रुव !

ये खबर वाकई एक सिहरन सी पैदा करती है - अमेरिका के अरकांसास के आसमान से 5000 मरी हुई ब्लैक बर्ड्स की बारिश, अटलांटिक महासागर को छूती अमेरिका की चेसापीके खाड़ी में दसियों हजार मछलियों की एक साथ मौत- जिनके मृत शरीरों से हजारों किलोमीटर लंबी कोस्टलाइन भर गई, स्वीडन में सैकड़ों पक्षियों की मौत- जिनके शरीर यहां-वहां बिखरे मिले, इंग्लैंड के समुद्रतट पर अचानक 40,000 मरे केकड़ों से भर गए, 530 पेंगिविन्स की मौत हो गई और लहरों पर तैरतीं हजारों समुद्री पक्षियों की लाशें मिलीं, ब्राजील में पांच डॉल्फिन्स और तीन विशाल समुद्री कछुओं की मौत हो गई, टेक्सास के एक पुल के नीचे काले सिर वाली 200 बत्तखों की लाशें तैरती हुई मिलीं, न्यूजीलैंड के तट अचानक हजारों स्नैपर मछलियों की लाशों से भर गए। नए साल की शुरुआत के साथ ही पशु-पक्षियों की इस अस्वाभाविक सामूहिक मौत का सिलसिला शुरू हुआ...और ये लिस्ट अब भी बढ़ती ही जा रही है। क्या ये महज संयोग है? या फिर ये किसी बड़े बदलाव की तरफ कुदरत का इशारा है। 
पशु-पक्षियों की इस सामूहिक मौत को एक वैज्ञानिक नाम दिया गया है- एफ्लोकालिप्स और गूगल मैप पर इसी नाम से किसी ने एक पूरा मैप पोस्ट किया है जिसमें 2011 की शुरुआत से अबतक हुई पशु-पक्षियों की सामूहिक मौत और उस जगह को दर्शाया गया है।अब सबसे बड़ा सवाल, आखिर इसकी वजह क्या है? जमीन-हवा और पानी में रहने वाले जीव आखिर सामूहिक रूप से क्यों मर रहे हैं? पशु-पक्षियों की सामूहिक मौत की ये कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है कि ये घटना दुनियाभर में करीब-करीब एकसाथ घट रही है। कुछ लोग इसे बर्ड फ्लू जैसी किसी नई महामारी से जोड़कर देख रहे हैं, तो कुछ लोग इसे धरती-हवा और पानी में बढ़ते रासायनिक जहर का नतीजा बता रहे हैं। ऐसे लोग भी कम नहीं जो इसे ग्लोबल वॉर्मिंग का नतीजा बता रहे हैं। दुनिया के खत्म होता देखने को बेचैन हुए जा रहे लोग इसे माया सभ्यता की भविष्यवाणी और 2012 के विनाश की शुरुआत भी बता रहे हैं।
इन सबके बीच एक खबर और आई, अमेरिका के फ्लोरिडा में मौजूद टाम्पा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को 13 जनवरी तक के लिए बंद कर दिया गया। वजह ये कि धरती का चुंबकीय उत्तरी ध्रुव इतना ज्यादा खिसक चुका है कि इसके मुताबिक एयरपोर्ट के रनवे को फिर से री-लोकेट करना बेहद जरूरी हो गया था। यहां एयर ट्रैफिर कंट्रोलर्स के लिए काम करना दिन-पर-दिन मुश्किल होता जा रहा था, क्योंकि विमान की कुतुबनुमा जो उत्तर दिशा बता रहा था और एटीसी जिस उत्तर दिशा में जाने का कमांड दे रहा था, उसमें भारी अंतर आ गया था।
अब असली खबर, हमारी धरती के उत्तरी ध्रुव अब दो हो गए हैं। पहला भौगोलिक उत्तरी ध्रुव और दूसरा चुंबकीय उत्तरी ध्रुव। भौगोलिक उत्तरी ध्रुव पृथ्वी की उत्तरी अक्ष यानि आर्कटिक में है, जबकि चुंबकीय उत्तरी ध्रुव, जो धरती, पानी और हवा में चलने वाली हर चीज पर असर डालता है वो इस वक्त उत्तरी कनाडा के द्वीप स्वरड्रुप के करीब मौजूद है और हर साल करीब 64 किलोमीटर की रफ्तार से रूस के साइबेरिया की ओर खिसकता जा रहा है।
चुंबकीय उत्तरी ध्रुव का खिसकना कोई नई बात नहीं, लेकिन नई बात ये है कि अब इसकी रफ्तार काफी बढ़ गई है। धरती के चुंबकीय उत्तरी ध्रुव की खोज सबसे पहले जेम्स रॉस ने 1831 में आर्कटिक अभियान के दौरान की थी, जिसमें उनका जहाज बर्फ में फंस गया था और चार साल तक वहीं फंसा रहा। रॉस के अभियान का कोई सदस्य जीवित नहीं बचा था। अगली सदी के साल 1904 में रॉल्ड एमंडसन ने चुंबकीय उत्तरी ध्रुव को फिर से खोजास लेकिन तब तक वो जेम्स रॉस की बताई जगह से कम से कम 50 किलोमीटर तक खिसक चुका था। उत्तरी ध्रुव के खिसकने पर निगरानी का काम 20 वीं सदी में भी जारी रहा। 20 वीं सदी की शुरुआत में उत्तरी ध्रुव के खिसकने की रफ्तार एक साल में 10 किलोमीटर थी जो सदी के खत्म होते-होते बढ़कर एक साल में 40 किलोमीटर तक हो गई। जियोलॉटिकल सर्वे ऑफ कनाडा हर साल इसकी खास जांच करता है। इसके मुताबिक 2001 में चुंबकीय उत्तरी ध्रुव उत्तरी कनाडा में एलेसमेयर द्वीप के करीब था जबकि 2009 में ये एक साल में 64 किलोमीटर की रफ्तार से रूस की ओर बढ़ता जा रहा है। भौगोलिक उत्तरी ध्रुव और चुंबकीय उत्तरी ध्रुव के बीच अब सैकड़ों किलोमीटर का अंतर आ चुका है और चुंबकीय उत्तरी ध्रुव की जगह अब भी स्थिर नहीं है और अब तो इसमें हर दिन के हिसाब से बदलाव आ रहा है।   
क्या दुनियाभर में पशु-पक्षियों की सामूहिक मौत और धरती के चुंबकीय उत्तरी ध्रुव के खिसकते जाने के बीच कोई संबंध है? टाम्पा इंटरनेशनल एयरपोर्ट को बंद करने से दुनियाभर में पशु-पक्षियों की सामूहिक मौतों को चुंबकीय उत्तरी ध्रुव के लगातार खिसकते जाने से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे एक नया विवाद शुरू हो गया है। क्या वाकई चुंबकीय ध्रुव के खिसकने से पशु-पक्षियों की सामूहिक मौत हो सकती है? दुनियाभर के वैज्ञानिक और पत्रकार इस गुत्थी को सुलझाने में जुटे हैं। ये मौते आखिर इतनी बड़ी तादाद में क्यों हुईं?
इटली की सड़कों पर मरे पाए गए कबूतरों का जब पोस्टमार्टम किया गया तो उनकी मौत की वजह ऑक्सीजन में कमी निकली। इससे वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि ये पक्षी शायद हवा के किसी तेज तूफान में फंसकर काफी ऊंचाई पर पहुंच गए होंगे, जहां ऑक्सीजन में कमी की वजह से उनकी मौत हो गई। अमेरिका के असकांसास और लुसियाना के साथ स्वीडन के जैकड्रास में आसमान से हुई मृत पक्षियों की बारिश की वजह नए साल के जश्न में छोड़े गए पटाखों और आतिशबाजी बताई गई है। मैरीलैंड के चेसापीके की खाड़ी पर मिली लाखों मछलियों की लाशों के बारे में अमेरिकी पर्यावरण विभाग ने सफाई दी है कि ये हादसा समुद्र के पानी का तापमान अचानक गिर जाने की वजह से हुआ है। यही वजह ब्रिटेन के सागर किनारे मरे पड़े मिले हजारों केकड़ों और दूसरे समुद्री जानवरों के लिए भी बताई गई। ब्राजील में हुई समुद्री जीवों की मौत के बारे में अधिकारियों ने कहा है कि ऐसा पानी के तापमान में गिरावट या फिर किसी किस्म के रासायनिक प्रदूषण की वजह से हुआ है।
कुछ वैज्ञानिकों को शक है कि दुनियाभर में हुई पशु-पक्षियों की सामूहिक मौत और धरती के खिसकते जा रहे चुंबकीय उत्तरी ध्रुव के बीच शायद कोई संबंध है। कुछ इसे पृथ्वी के ध्रुवों के उलटने की घटना से भी जोड़कर देख रहे हैं और अनुमान लगा रहे हैं कि भारी तादाद में पशु-पक्षियों की मौत और तेजी से लगातार खिसकता चुंबकीय उत्तरी ध्रुव दरअसल कुदरत का इस बात की ओर इशारा है कि हमारी पृथ्वी के ध्रुवों के पलटने की घटना अब शायद घटने वाली है। ये घटना अगर वाकई घटने भी वाली है तो जीवों पर इसके असर का अंदाजा लगाना मुश्किल है, क्योंकि धरती के चुंबकीय ध्रुवों के पलटने की घटना करीब 700000 साल पहले हुई थी और उस वक्त इस घटना का जीवों पर क्या असर हुआ था, इस संबंध में कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। बहरहाल पृथ्वी के ध्रुवों के पलटने की घटना क्या है? ऐसा क्यों होता है? धरती का चुंबकीय उत्तरी ध्रुव खिसकता क्यों जा रहा है? और इसकी रफ्तार बढ़ती क्यों जा रही है? इन सारे सवालों का जवाब छिपा है हमारी धरती के केंद्र में, जहां हमारी धरती का रक्षा कवच चुंबकीय क्षेत्र पैदा किया जाता है।
हमारी धरती के केंद्र में एक अनोखी दुनिया है। हमारे ग्रह का दिल एक ठोस लोहे की गेंद का है, केद्र यानि कोर में मौजूद लोहे की इस गेंद का आकार चंद्रमा जितना है और इसका तापमान सूरज के सतह के बराबर। लोहे की इस गेंद को चारों ओर से पिघले लोहे के गाढ़े मैग्मा का महासागर घेरे हुए है, जो लगातार घूमता और उमड़ता-घुमड़ता रहता है। दहकते लावे जैसे इस महासागर को आउटर कोर कहते हैं। धरती की कोर में मौजूद लोहे का ये ठोस गोला भी घूमता है, कभी घड़ी की सूइयों की दिशा में और कभी विपरीत।
पृथ्वी का आउटर कोर यानि पिघले लोहे का ये महासागर लगातार घूमता रहता है, अपने अक्ष पर पृथ्वी के घूमने के साथ ही इसमें एक अजीब सा खिंचाव पैदा होता है जिसकी वजह से आउटर कोर के इस विद्युतीय चालक बेहद गर्म लावे के महासागर में तूफान भी उठते हैं और भंवर भी। लोहे के ठोस इनर कोर के चारों ओर उमड़ते-घुमड़ते पिघले लोहे के लावे के इस महासागर की ये गति डायनामो इफेक्ट को जन्म देती है और एक मजबूत चुंबकीय क्षेत्र पैदा हो जाता है। 
यूनिवर्सिटी आप कैलीफर्निया के प्रोफेसर आफ अर्थ एंड प्लेनेटरी साइंसेस प्रो. गैरी ए.ग्लैट्जमीर और उनके सहयोगी पॉल रॉबर्ट्स ने ये जानने के लिए कि धरती के गर्भ में क्या चल रहा है, 
सुपरकंप्यूटर्स की मदद से एक कंप्यूटर सिमुलेशन तैयार किया। उनके सॉफ्वेयर ने इनर कोर को गर्म किया और उसे चारों ओर से घेरे पिघले लोहे के महासागर को गति प्रदान की, और देखते ही देखते एक मजबूत चुंबकीय क्षेत्र तैयार हो गया। प्रो. ग्लैट्जमीर और रॉबर्ट्स ने अब सुपरकंप्यूटर से लाखों साल बाद का सिमुलेशन दिखाने को कहा। वैज्ञानिकों की निगाहें स्क्रीन पर जम गईं कि देखें सुपरकंप्यूटर क्या दिखाता है। अब सुपरकंप्यूटर उन्हें धरती के गर्भ की असली झलक दिखा रहा था। चुंबकीय क्षेत्र कमजोर पड़ रहा था, चुंबकीय ध्रुव खिसक रहे थे और कभी-कभी आपस में बदल भी रहे थे।
इस सिमुलेशन से वैज्ञानिकों को पता चला कि धरती के चुंबकीय क्षेत्र का अस्थिर होना, खिसकना और यहां तक कि पलट जाना भी एक सामान्य घटना है। सिमुलेशन ने ये भी दिखाया कि चुंबकीय क्षेत्र को पैदा करने वाले आउटर कोर में भी भारी हलचल जारी है। इस सिमुलेशन ने ये भी बताया कि जब चुंबकीय क्षेत्र के ध्रुव पलटते हैं तो उस दौरान क्या होता है। ध्रुवों के पलटने की प्रक्रिया पूरी होने में कई हजार साल का समय लगता है। और सबसे बड़ी बात ये कि ध्रुव पलटने इस पूरी प्रक्रिया के दौरान ऐसा कभी नहीं होता कि चुंबकीय क्षेत्र पूरी तरह से खत्म हो जाए। बल्कि इस प्रक्रिया से चुंबकीय क्षेत्र का व्यवहार कहीं ज्यादा जटिल हो उठता है।
 ध्रुवों के पलटने की प्रक्रिया के दौरान चुंबकीय क्षेत्र का व्यवहार बेहद जटिल हो उठता है। धरती की सतह के करीब वाली चुंबकीय लाइन्स तुड़-मुड़ सी जाती हैं और बहुत सारे चुंबकीय ध्रुव अलग-अलग जगहों पर पैदा हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर दक्षिणी चुंबकीय क्षेत्र अफ्रीका के ऊपर पैदा हो सकता है और उत्तरी ध्रुव दक्षिण प्रशांत के द्वीप ताहिती पर। लेकिन चुंबकीय क्षेत्र में आई इस भारी हलचल के बाद भी हमारा चुंबकीय क्षेत्र स्पेस रेडिएशन और सोलर स्टार्म से धरती के जीवन की सुरक्षा करता रहेगा।    
पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में जबरदस्त हलचल औप चुंबकीय ध्रुवों का पलटना एक सामान्य घटना है जो धरती के इतिहास में आम तौर पर हर 250000 साल बाद घटती है। लेकिन पिछले 700000 साल में ये घटना नहीं हुई है। मुमकिन है कि धरती के चुंबकीय क्षेत्र में आ रही हलचल ध्रुवों के पलटने की ओर इशारा कर रही हो, लेकिन यकीन मानिए इससे हमें-आपको और धरती के सुंदर जीवन को कोई बड़ा नुकसान नहीं होने वाला। 

शुक्रवार, 27 मार्च 2009

धरती से प्यार है तो स्विच ऑफ करिए !


इस बार शनिवार को आप शनि से बचने का एक खास उपाय कर सकते हैं। खास बात ये कि शनि के कोप को टालने की इस कोशिश में दुनियाभर के 80 देशों के करीब एक हजार देश भी शामिल होंगे। मैं शनि के जिस कोप की बात कर रहा हूं वो है ग्लोबल वॉर्मिंग यानि हमारे घर पृथ्वी का बढ़ता हुआ ताप। कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी ग्रीन हाउस गैसों के असर से लगातार गरम होती जा रही पृथ्वी को क्या आप कुछ पलों की राहत नहीं देना चाहेंगे? अगर आप भी धरती से उतनी ही मौहब्बत करते हैं, जितना कि पृथ्वी आपसे तो शनिवार को शाम 8.30 बजे से रात 9.30 बजे तक अपने घर के तमाम बल्ब और ट्यूब लाइट्स को स्विच ऑफ कर दीजिए। ग्लोबल वॉर्मिंग के शनि के शिकंजे से एक घंटे के लिए धरती को राहत दिलाने की ये एक अंतरराष्ट्रीय कोशिश है वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड यानि डब्लूडब्लूएफ की। भारत में दिल्ली और मुंबई समेत करीब 1500 शहर इस अंतरराष्ट्रीय पहल में शामि हैं और शनिवार 28 मार्च की शाम एक घंटे के लिए बिजली बंद रखेंगे। 28 मार्च की शाम 8.30 बजे से रात 9.30 बजे तक के समय को अर्थ ऑवर का नाम दिया गया है। डब्लूडब्लूएफ ने इस साल ऐसे 60 अर्थ ऑवर मनाने का लक्ष्य तय किया है।
सवाल ये कि भला बिजली बंद करने से ग्लोबल वॉर्मिंग यानि धरती के ताप से क्या लेना-देना? बिजली बंद इसलिए की जा रही है, क्योंकि इस एक घंटे के अर्थ ऑवर से दुनियाभर में लाखों मेगावॉट बिजली की बचत होगी। ऊर्जा की बचत का सीधा संबंध कुदरत के संसाधनों के संरक्षण से है। हालांकि ये कोशिश तपते हुए तवे में पानी के छींटे जैसी ही है। लेकिन फिरभी एक छोटा सा छींटा ही सही, मां भूमि को कुछ पलों की राहत तो मिलेगी।

सोमवार, 16 मार्च 2009

पहचानिए इस तस्वीर को?

ये तस्वीर किसी नए खोजे गए ग्रह की नहीं है !…फिर ये क्या है ?...दिमाग पर थोड़ा जोर डालकर पहचानने की कोशिश कीजिए !...नहीं पहचान पाए ?...चलिए आपको बता ही देते हैं...ये है तस्वीर हमारे अपने घर, हमारी पृथ्वी की। पृथ्वी की ये तस्वीर बिल्कुल नई और अनोखी है, पृथ्वी का ऐसा रूप आपने अबतक नहीं देखा होगा। पृथ्वी की ये तस्वीर ली है नासा की कॉम्पटन गामा-रे ऑब्जरवेटरी ने। पृथ्वी की ये तस्वीर 7 साल लंबे शोध का नतीजा है। नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के डॉ. डिर्क पेट्रे ने 7 साल तक इस ऑब्जरवेटरी से डेटा कलेक्ट करने के बाद पृथ्वी की ये तस्वीर तैयार की है। डॉ. पेट्रे का कहना है कि गहन अंतरिक्ष से हमारी पृथ्वी ऐसी ही नजर आती है। इस तस्वीर में पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में लगातार होती कॉस्मिक किरणों की बौछार और इसकी वजह से पृथ्वी से फूटती गामा किरणें दिखाई गई हैं। पृथ्वी से गामा किरणें भी फूटती हैं, इस बात पर अब तक वैज्ञानिकों को संदेह था, लेकिन डॉ. पेट्रे ने अब इसका सबूत भी सामने रख दिया है।