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बुधवार, 26 सितंबर 2012

गहन ब्रह्मांड में ‘वॉयेजर’


रात के आसमान में किसी सबसे छोटे और सबसे धुंधले सितारे को देखने की कोशिश कीजिए, वॉयेजर-1 के कैमरे से हमारा सूरज बिल्कुल वैसा ही नजर आता है। वॉयेजर-1 का सफर किसी खास सितारे की ओर नहीं है, लेकिन फिरभी करीब 40,000 साल बाद ये 1.6 प्रकाशवर्ष दूर मौजूद सितारे AC + 793888 (ये उस सितारे का वैज्ञानिक कोड है) के करीब से गुजरेगा। इस सितारे की खास बात ये है कि ये 4,30,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हमारे सौरमंडल की ओर बढ़ा चला आ रहा है। वॉयेजर-1 की रफ्तार अब 61400 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच चुकी है और इस रफ्तार से ये 74,438 साल में सूरज से सबसे करीब के सितारे प्रॉक्सिमा सेंटौरी को भी पार कर जाएगा। सैद्धांतिक रूप से प्रकाश की गति यानि 300,000 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार हासिल करने में वॉयेजर-1 को अभी 17522 साल और लगेंगे। डीप स्पेस नेटवर्क में बैठे वैज्ञानिकों और वॉयेजर-1 के बीच संपर्क बनाए रखने का काम रेडियो सिगनल्स करते हैं जो प्रकाश की गति से चलते हैं। सौरमंडल को पीछे छोड़ गहन अंतरिक्ष में प्रवेश कर चुका वॉयेजर-1 मानव निर्मित ऐसा अकेला स्पेस प्रोब है जो धरती से सबसे दूर यानि पृथ्वी से 17 अरब 96 करोड़ किलोमीटर से भी दूर जा चुका है।

मिशन का मकसद

70 के दशक के अंत में एक अदभुत खगोलीय घटना घटी। बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून ऐसी विशेष स्थिति में आ रहे थे कि किसी एक स्पेसक्राफ्ट की मदद से एक के बाद एक इन चारों ग्रहों के करीब से होकर गुजरा जा सकता था। इस तरह किसी ग्रह के करीब से गुजर जाने को विज्ञान की भाषा में फ्लाई-बाई कहते हैं। सौरमंडल के ग्रहों की ये स्थिति हर 177 साल बाद बनती है। नासा की जेट प्रोपल्शन लैब के एयरोस्पेस इंजीनियर गैरी फ्लैंड्रो ने ग्रहों की बन रही इस खास स्थिति का अध्ययन कर एक अनोखी बात खोज निकाली। गैरी ने गणित की मदद से समझाया कि अगर कोई स्पेसक्राफ्ट एक खास कोण से बृहस्पति के करीब से गुजरता है तो इस ग्रह का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव उसे एक ऐसी जबरदस्त अतिरिक्त उछाल दे देगा, जिससे वो स्पेसक्राफ्ट बिना ईंधन खर्च किए सीधे शनि तक जा पहुंचेगा। ब्रहस्पति की तरह शनि के गुरुत्वाकर्षण से मिली अतिरिक्त उछाल से उसे आगे के ग्रह यूरेनस और नेपच्यून और उससे भी आगे जाना मुमकिन है। ये बिल्कुल नया विचार था, बेहद कम ईंधन खर्च करके केवल गुरुत्वाकर्षण की उछाल का इस्तेमाल करके अंतरिक्ष में दूर-दराज का सफर मुमकिन था। फौरन नासा ने एक ग्रांड टूर की योजना बनाई जिसके तहत बृहस्पति, शनि और उससे आगे नेप्च्यून, प्लूटो तक अलग-अलग जुड़वा स्पेसक्राफ्ट भेजे जाने थे। लेकिन इस ग्रांड टूर योजना का बड़ा हिस्सा रद्द हो गया, क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस ने इतना फंड देने से इनकार कर दिया। केवल इतनी मंजूरी मिल पाई कि बस दो स्पेस प्रोब भेजे जाएं। इस तरह नासा ने वॉयेजर मिशन पर काम शुरू किया, जिसके तहत दो प्रोब वॉयेजर-1 और वॉयेजर-2 बृहस्पति और शनि को भेजे जाने थे।

जुड़वां मिशन

1977 में इन जुड़वा स्पेस प्रोब्स में वॉयेजर-2 को पहले लांच किया गया। ग्रहों की अनोखी स्थिति को ध्यान में रखते हुए वॉयेजर-2 का प्रक्षेपण ऐसे खास कोण पर किया गया ताकि ये बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून तक पहुंच सके। वॉयेजर-1 की लांचिंग इसके जुड़वा प्रोब के कुछ दिन बाद हुई, लेकिन इसका प्रक्षेपण पथ छोटा और तेज रखा गया, ताकि ये बृहस्पति और शनि पर वॉयेजर-2 से पहले पहुंच सके। वॉयेजर-1 को उच्च प्राथमिकता दी गई, क्योंकि इसे शनि के एक खास चंद्रमा टाइटन के भी बेहद करीब से गुजरकर उसके वायुमंडल का अध्ययन भी करना था। 19 दिसंबर 1977 को वॉयेजर-2 को पीछे छोड़ते हुए वॉयेजर-1 उससे आगे निकल गया। 14 जून 2012 को नासा ने बताया कि वॉयेजर-1 अब सौरमंडल के अंतिम छोर से भी आगे निकलकर गहन अंतरिक्ष में लगातार आगे बढ़ता चला जा रहा है। वॉयेजर-1 और इसका जुड़वां स्पेसक्राफ्ट वॉयेजर-2 दोनों दो अलग-अलग दिशाओं में एक-दूसरे से दूर चले जा रहे हैं और वॉयेजर-1 की रफ्तार वॉयेजर-2 की तुलना में 10 प्रतिशत ज्यादा है। दोनों की बीच की दूरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पृथ्वी के कानडीप स्पेस नेटवर्क को वॉयेजर-1 से डेटा लेने के बाद वॉयेजर-2 को सुनने में 16.5 घंटे का समय लग जाता है।     
722 किलो वजनी स्पेसक्राफ्ट वॉयेजर-1 हेलियोस्फियर यानि सूर्यकिरणों की पहुंच की सीमा वाले अंतरिक्ष के इलाके को पीछे छोड़कर हेलियोशीथ यानि गहन ब्रह्मांड में प्रवेश कर चुका है। वॉयेजर-1 जल्दी ही इंटरस्टेलर स्पेस यानि अंतरिक्ष में दो सितारों के बीच के इलाके में प्रवेश करने वाला है और इसी के साथ वॉयेजर-1 हमारे सौरमंडल से भी आगे निकल जाने वाला पहला मानव निर्मित स्पेसक्राफ्ट बन जाएगा।  

मानवता का दूत - वॉयेजर


वॉयेजर जब लांच किया गया वो जमाना ग्रामोफोन और उनके एलपी रेकार्ड्स का था। वॉयेजर को बृहस्पति और शनि की दुनिया में झांकते हुए और भी आगे का सफर तय करना था, ऐसे में स्पेस मिशन्स के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने और वॉयेजर मिशन को मानवता का अग्रदूत बना देने के लिए महान एस्ट्रोफिजिसिस्ट डॉ. कार्ल सगान ने दोनों वॉयेजर स्पेसक्राफ्ट्स में सोने से बना एक खास एलपी रेकार्ड रखवाया। इस रेकार्ड का मकसद ये था कि अगर वॉयेजर स्पेसक्राफ्ट कभी किसी अनजान सभ्यता या फिर भविष्य के मानवों के संपर्क में आता है तो उन्हें पृथ्वी पर मौजूद जीवन के हजारों स्वरूपों और सांस्कृतिक विविधता का परिचय मिल सके।
दोनों वॉयेजर प्रोब्स के साथ भेजे जाने वाले इस सोने के रेकार्ड में क्या-क्या चीजें संग्रहीत की जाएं इसका चयन नासा की एक समिति ने किया खुद डॉ. कार्ल सगान जिसके अध्यक्ष थे। डॉ. सगान और उनके सहयोगियों ने दुनिया की करीब हर सभ्यता का परिचय देती हुई 116 तस्वीरें जमा कीं, इनमें ब्लैक एंड व्हाइट और रंगीन दोनों ही शामिल हैं। इनमें से कुछ तस्वीरें वैज्ञानिक महत्व की हैं, इनमें गणित और भौतिकी के फॉर्मूले, सौरमंडल और मानव डीएनए, गर्भ में बच्चे को सहेजे एक मां और एक पुरुष के रेखाचित्र, बच्चे को दूध पिलाती मां, खाते-पीते हुए लोग और इतना ही नहीं कोलकाता में लगा एक ट्रैफिक जाम, ताजमहल और चीन की दीवार की तस्वीरें भी इस रेकार्ड के लिए चुनी गईं। सागर की उफनती लहरों, बहती हुई हवा, कड़कती हुई बिजली, पक्षियों का चहचहाना, व्हेल का खास गीत, धड़धड़ाती गुजरती रेलगाड़ी जैसी कई आवाजें रेकार्ड की गईं। दुनियाभर की 55 भाषाओं में परग्रहीय सभ्यता के लोगों के नाम शुभकामना संदेश भी रेकार्ड किए गए। इसमें हिंदी समेत गुजराती, राजस्थानी, उर्दू, तमिल और कन्नड़ जैसी भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं। विश्व के सार्वकालिक महानतम संगीतकारों और गायकों की संगीत रचनाएं भी शामिल की गईं। हमारे लिए गर्व की बात ये है कि वॉयेजर के इस गोल्डेन रेकार्ड में विश्व के महान संगीतकारों बीथोवन, गुआन पिंघु, मोजार्ट, स्ट्राविंस्की, नेत्रहीन विली जॉनसन और चक बेरी जैसे श्रेष्ठ संगीतकारों के साथ महान भारतीय गायिका केसरबाई केरकर का शास्त्रीय गायन भी शामिल किया गया। इसके अलावा इस रेकार्ड में तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और संयुक्तराष्ट्र महासचिव कर्ट वाल्धीम का संदेश भी शामिल किया गया। अंतरिक्ष के विस्तार के सामने वॉयेजर स्पेसक्राफ्ट्स का आकार काफी छोटा है, इसलिए इस बात की संभावना काफी कम है कि वॉयेजर की मुलाकात किसी परग्रहीय बौद्धिक सभ्यता से कभी होगी, और अगर ये मुलाकात हो भी जाए तो उस अनजान सभ्यता के लोग इस गोल्डेन रेकार्ड को प्ले करके पृथ्वी के जीवन और सांस्कृतिक विविधता की झलक पा सकेगा। डॉ. कार्ल सगान ने इसके बारे में लिखा है, किसी अनजान सभ्यता से वॉयेजर की मुलाकात हो और वो लोग हमारे गोल्डेन रेकार्ड को प्ले करके सुनें, ऐसा केवल तभी मुमकिन है, जब इस अनंत अंतरिक्ष में भ्रमण करने वाली परग्रहीय बौद्धिक सभ्यताओं का अस्तित्व वाकई में हो। मानवता के इस संदेश को वॉयेजर की बोतल में बंद कर अंतरिक्ष के महासमुद्र में प्रवाहित करने का काम भी इस ग्रह के जीवन के बारे में एक नई उम्मीद जगाता है। इसलिए सबसे अच्छा ये है कि वॉयेजर के इस रेकार्ड को किसी परग्रहीय बौद्धिक सभ्यता से संपर्क की कोशिश समझने के बजाय इसे एक टाइम कैप्स्यूल या फिर मानव सभ्यता का एक प्रतीकात्मक वक्तव्य समझा जाए।

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

'पेल ब्लू डॉट....'


नासा ने खबर दी है कि 35 साल पहले अंतरिक्ष के सफर पर निकला स्पेसक्राफ्ट ‘वॉयेजर-1’ अब पृथ्वी से 17 अरब 96 करोड़ किलोमीटर से भी दूर जा चुका है। सौरमंडल को पीछे छोड़ गहन अंतरिक्ष में प्रवेश कर चुका ‘वॉयेजर-1’ मानव निर्मित ऐसा अकेला स्पेस प्रोब है जो धरती से सबसे दूर मौजूद है। 1990 में वॉयेजर-1 ने अपना प्राथमिक मिशन पूरा कर लिया था और सौरमंडल से बाहर जाने की तैयारी में था, ऐसे में डॉ. कार्ल सगान के अनुरोध पर नासा ने वॉयेजर-1 का कैमरा पृथ्वी की ओर मोड़ा और पृथ्वी की एक अनोखी तस्वीर ली। वॉयेजर-1 तब धरती से 6 अरब किलोमीटर दूर था और इस रिकार्ड दूरी से अंतरिक्ष के काले महासागर में पृथ्वी एक चमकीले नीले बिंदु की तरह नजर आ रही थी। 6 अरब किलोमीटर की दूरी से ली गई ये पृथ्वी की पहली और अंतिम तस्वीर है। डॉ. कार्ल सगान ने इस तस्वीर को देखा तो वो आध्यात्मिक-दार्शनिक विचारों से भर उठे और उन्होंने इस तस्वीर का नाम रखा ‘पेल ब्लू डॉट’ यानि गहरा नीला बिंदु। इस नाम का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने 1994 में प्रकाशित अपनी किताब का शीर्षक रखा – पेल ब्लू डॉट : ए विजन ऑफ द ह्युमन फ्युचर इन स्पेस। इस किताब में महान एस्ट्रोनॉमर डॉ. कार्ल सगान ने वॉयेजर-1 के कैमरे से ली गई पृथ्वी की इस तस्वीर पर अपने विचार गहराई से व्यक्त किए हैं, वो लिखते हैं –
अंतरिक्ष की इस गहनतम दूरी (6 अरब किलोमीटर) से पृथ्वी शायद कोई खास दिलचस्पी की चीज न लगे। लेकिन हमारे लिए, इसके मायने बिल्कुल अलग हैं। इस तस्वीर में नजर आ रहे इस नीले बिंदु को दोबारा देखिए। ये वहां है। ये हमारा घर है। ये हम हैं। हर वो शख्स जिससे हम मोहब्बत करते हैं, हर वो व्यक्ति जिसे हम जानते हैं, वो हर कोई जिसके बारे में आपने सुना है, वो हर इंसान जो कभी था, उन सबने इसी नीले बिंदु में अपनी उम्र गुजार दी। हमारी सारी खुशियां और तमाम दुख-मुसीबतें, विश्वास से भरे हजारों धर्म, मान्यताएं और आर्थिक नीतियां, हरेक शिकारी और शिकार, प्रत्येक हीरो और कायर, सभ्यताओं को जन्म देने वाला हरेक निर्माता और उन्हें नेस्त-नाबूद कर डालने वाला हरेक हमलावर, हर राजा और उनके गुलाम, प्रेम में डूबे सभी प्रेमी और प्रेमिकाएं, हरेक मां और हरेक पिता, उम्मीदों से भरा हरेक बच्चा, सभी अविष्कारक और खोजी, नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला प्रत्येक शिक्षक, भ्रष्टाचार में डूबा हरेक राजनेता, हरेक सुपरस्टार, सभी महान लीडर, हरेक साधु और पापी जिनसे मानव सभ्यता के इतिहास के पन्ने भरे हैं, वो सभी सूरज की किरण में तैर रहे धूल के एक कण जैसे नजर आ रहे इस नीले बिंदु में ही जीये और फना हो गए। इस अनंत ब्रह्मांड में पृथ्वी की हैसियत नगण्य है। अब उन सभी बर्बर हमलावरों और जनरल्स के बारे में सोंचिए, जिन्होंने इस बिंदु के सूक्ष्म से हिस्से पर कब्जे की हवस में इंसानियत को शर्मिंदा किया और खून की नदियां बहा डालीं। उस खौफनाक अत्याचार को याद कीजिए जो इस बिंदु के एक सिरे के लोगों ने दूसरे सिरे के लोगों पर किए (यहां डॉ. कार्ल सगान द्वितीय विश्व युद्ध की बात कर रहे हैं)। वो एक-दूसरे के प्रति किस तरह नासमझी से भरे हुए थे, वो एक-दूसरे को मार डालने के लिए कितने उतावले थे, एक-दूसरे के लिए उनकी नफरत कितनी गहरी थी। तमाम तड़क-भड़क और दिखावा, हमारा छिछला अहंकार, ये भ्रम कि ब्रह्मांड में हमें एक विशेष दर्जा हासिल है, इन सब बातों को इस तस्वीर में नजर आ रही नीले रंग की ये बिंदु चुनौती दे रही है। ब्रह्मांड के इस गहन अंधकार में हमारा ग्रह एक अकेले भटकते धूलकण के जैसा है। इस अनंत विस्तार में ऐसा कोई इशारा तक नहीं मिलता कि हमें खुद से ही बचाने के लिए कहीं से कोई मदद आएगी। अब तक पृथ्वी ही केवल ऐसी जगह है, जहां जिंदगी फल-फूल रही है। कम से कम निकट भविष्य में भी ऐसी कोई दूसरी जगह नहीं है, जहां हमारी मानव जाति रहने के लिए जा सके। हां, हम धरती से बाहर कुछ जगहों पर गए जरूर हैं, लेकिन अब तक हम कहीं बस नहीं सके हैं। अब आप इसे पसंद करें, या न करें, लेकिन इस वक्त तो पृथ्वी ही वो जगह है, जहां हम मौजूद हैं, जिंदगी आबाद है। ये कहा जाता है कि एस्ट्रोनॉमी या खगोल विज्ञान विनय प्रदान करने वाला और चरित्र निर्माण करने वाला अनुभव देता है। मानव अहंकार में निहित अज्ञानता को साबित करने के लिए संभवत: इस तस्वीर से बेहतर कोई दूसरा प्रदर्शऩ नहीं हो सकता।
मेरे विचार से, ये तस्वीर हमारी इस जिम्मेदारी को रेखांकित करती है कि हमें एक-दूसरे के प्रति कहीं अधिक नरमी और सहनशीलता के साथ पेश आना चाहिए, ताकि हम इस गहरे नीले बिंदु को, जो कि जिंदगी का एक अकेला घर है, इसे संरक्षित करने के साथ जीने के लायक बनाए रख सकें।