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बुधवार, 24 सितंबर 2014

रोटी जरूरी है या मंगल और चांद पर जाना?...

हमें पहले क्या करना चाहिए? रोटी जरूरी है या मंगल और चांद पर जाना? इस मुद्दे पर इसरो चीफ के राधाकृष्णन के विचार, मंगलयान के मंगल की कक्षा में सफल प्रवेश के अवसर पर वॉयेजर की खास प्रस्तुति-

'इसरो में ये सवाल हमलोग हर दिन खुद से पूछते हैं. हम इस बारे में सोचते हैं कि हम जो कर रहे हैं इससे जनता को, सरकार को फायदा होता है या नहीं. इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना नहीं है. 24 सेटेलाइट हैं अंतरिक्ष में हमारे. बड़ा कम्यूनिकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर बनाया है हमने. करीबन 200 ट्रांसपॉन्डर हैं जिनके जरिए मछुआरों की मदद हो रही है. उन्हें समुद्र में किस जगह पर ज्यादा मछली मिलेगी, इसकी जानकारी उपलब्ध कराते हैं हम.
 हम गलत अवधारणा में हैं कि इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना है. बल्कि हम जो काम करते हैं वो सीधे या फिर परोक्ष तौर पर देश की सरकार और जनता के हित में काम आता है. इसरो द्वारा भेजा गया रॉकेट और सेटेलाइट लोगों को रोटी देने का काम भी करता है. किसी किसान या फिर मछुआरे से पूछिए.
वैज्ञानिक समझ को बढ़ाने के साथ तकनीकी बेहतरी पर इसरो ने बहुत कुछ किया है. मिशन टू मून हो या मिशन टू मार्स, इसरो ने सिर्फ ये दो काम ही नहीं किए. हमने स्ट्रेटजिक मूवमेंट में भी अहम भूमिका निभाई है.
1960 से आज तक यही पूछा जाता है कि भारत जैसे गरीब देश को स्पेस में एयरक्राफ्ट भेजना चाहिए या नहीं? हर प्रोजेक्ट के साथ यही सवाल उठता है. ये सवाल उठते रहेंगे. पर मैं भी एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या भारत जैसे देश को स्पेस साइंस में इनवेस्ट नहीं करना चाहिए, जो सुपरपावर बनना चाहता है?
फसलों से बेहतर उपज, तूफान की जानकारी, इस तरह की अहम जानकारियां जुटाने में हमारे सेटेलाइट काम में आ रहे हैं. तूफान फेलिन की जानकारी इनसेट सेटेलाइट से मिली. करीब 400 से ज्यादा तस्वीरें हमें मिलीं जिसके जरिए हजारों जानें बचाई जा सकीं. हमारे पास रॉकेट होने चाहिए क्योंकि सेटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजना है. भूख मिटाना जरूरी है पर स्पेस साइंस को नजरअंदाज नहीं कर सकते. आखिरकार ये भी तो रोटी देने में मदद करता है.'
(इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में Rockets vs Rotis में इसरो प्रमुख डॉ.के राधाकृष्णन के व्याख्यान के अंश)

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

मंगल ग्रह पर जीवन की खोज


क्या बुध और शुक्र की तरह मंगल ग्रह भी बेजान है? या फिर धरती की तरह वहां भी जीवन का विकास हुआ और जिंदगी की धड़कन अब भी वहां गूंज रही है? ये सवाल विज्ञान की बड़ी गुत्थियों में से एक है। नासा का मार्स साइंस लैबोरेटरी मिशन इस गुत्थी को हल करने की दिशा में हमारी सबसे बड़ी पहल है। मार्स साइंस लैबोरेटरी मिशन जो क्यूरियोसिटी के नाम से भी लोकप्रिय है मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक लैंड करने के बाद मंगल की मिट्टी में जीवन की तलाश के अपने अभियान की शुरुआत कर दी है।
ऐसा नहीं है कि हरे रंग का कोई छोटा अजनबी मंगलवासी उत्सुकता में भरकर बस के आकार वाले हमारे रोबोट से हैलो कहने के लिए अपने किसी बिल से निकलकर सामने आ खड़ा होगा और ऐसा भी नहीं है कि क्यूरियोसिटी जब मंगल की मिट्टी के सैंपल लेगा तो उसमें केंचुए जैसे मंगल के जीव खोज लिए जाएंगे। तो फिर आखिर हम मंगल पर क्या खोज रहे हैं?  क्यूरियोसिटी का लक्ष्य क्या है? और किस चीज के मिलने की उम्मीद  में हम मंगल की मिट्टी खंगाल रहे हैं?
नासा के नए मिशन मार्स साइंस लैबोरेटरी या क्यूरियोसिटी के साथ हम मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिकों को खोज रहे हैं, जो उस लाल ग्रह पर हमारी पृथ्वी के जैसे जीवन या बैक्टीरिया जैसे उसके शुरुआती स्वरूप की मौजूदगी का सबसे बड़ा सबूत होगा। मंगल ग्रह पर जीवन के खोए सूत्रों की पहचान ही करीब एक टन की इस सबसे आधुनिक रोबोटिक लैबोरेटरी का लक्ष्य है। और हमें उम्मीद है कि मंगल की मिट्टी में हमें जीवन के कुछ ऐसे निशान मिल सकते हैं, जो शायद जीव विज्ञान के हमारे अब तक के ज्ञान से बाहर हों।
36 साल पहले मंगल ने पृथ्वी वासियों को बुरी तरह चौंकाया था। नासा का ऑरबिटर मिशन वाइकिंग-1 अपने बाद लांच किए जाने वाले लैंडर मिशऩ वाइकिंग-2 को लैंड कराने के लिए मंगल पर सही जगह की तलाश कर रहा था। तभी वो मंगल के साइडोनिया इलाके के ऊपर से गुजरा, वाइकिंग-1 ने वहां की एक ऐसी तस्वीर भेजी कि नासा वैज्ञानिकों के साथ सारी दुनिया चौंक उठी । मंगल की जमीन से एक विशाल इंसानी चेहरा आसमान की ओर देख रहा था। ये भावशून्य मानव चेहरा मंगल की जमीन पर दो मील के दायरे में फैला था। क्या मंगल ग्रह इस चेहरे के जरिए हम पृथ्वीवासियों को कोई संदेश दे रहा था?  मंगल पर मानव चेहरे की सनसनी ज्यादा वक्त तक कायम नहीं रह सकी, क्योंकि वैज्ञानिकों ने बाद में बताया कि ये मानव चेहरा मंगल का एक पठार है जो डूबते सूरज के साथ धूप-छांव के खेल की वजह से मानव चेहरे जैसा आभास दे रहा है। सनसनी भले ही खत्म हो गई ,लेकिन वाइकिंग-1 की ये तस्वीर, मंगल पर जीवन की तलाश का प्रतीक बन गई।

मंगल से आई उल्काएं

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 9 साल बाद का वक्त, अंग्रेज भारत पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे थे। उथल-पुथल से भरे राजनीतिक-सामाजिक हालात के बीच भारत के बिहार में गया जिले के करीब एक छोटे से कस्बे शेरघाटी में कुछ ऐसा हुआ कि वो उस वक्त के वैज्ञानिकों के बीच चर्चा का विषय बन गया। 25 अगस्त 1865 की एक शाम, शेरघाटी के आसमान पर गहरे बादल छाए थे और रुक-रुक कर बारिश का दौर जारी था, कि तभी तेज आवाज के साथ पूरा कस्बा कांप उठा, आवाज भी ऐसी मानो किसी ने आसमान चीर दिया हो। घबराए हुए लोग भागकर घर से बाहर आ गए और सैकड़ों निगाहें आसमान की ओर उठ गईं। लपटों से घिरा एक दहकता हुआ अग्निपिंड क्षितिज के एक ओर से दूसरी ओर बढ़ा चला जा रहा था। पुलिस की मदद लेकर कुछ हिम्मतवाले लोग सामने खेतों में उस जगह की ओर दौड़े जहां वो पिंड गिरा था। आसमान से एक बड़ी उल्का गिरी थी, जिसका वजन 5 किलो था, पुलिस ने उसे तुरंत कब्जे में लेकर कलेक्टर साहब को भिजवा दिया, जहां से वो उल्कापिंड लंदन पहुंचकर लंबे वक्त तक ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ाता रहा। वक्त बदला और विज्ञान की प्रगति के साथ वैज्ञानिकों की दिलचस्पी उस शेरघाटी उल्का में बढ़ी। आधुनिक युग में बकायदा उसकी रेडियोमीट्रिक डेटिंग वैज्ञानिक जांच की गई, तो पता चला कि इसका जन्म 4 अरब 10 करोड़ साल पहले मंगल ग्रह पर किसी ज्वालामुखी के लावे से हुआ था। मंगल ग्रह पर किसी विशाल उल्का के गिरने से उठी धूल और पथरीले मलबे के गुबार के साथ ये पत्थर भी मंगल ग्रह से छिटक कर संयोग से पृथ्वी, वो भी भारत के कस्बे शेरघाटी में आ गिरा था। पृथ्वी पर हमें मिली ये मंगल की सबसे पुरानी उल्का है। शेरघाटी उल्का की हाल की जांच से पता चला है कि इसमें कुछ ऐसे रासायनिक तत्व हैं जिनका संबंध किसी खास बैक्टीरिया से हो सकता है।
मंगल ग्रह से छिटके ऐसे पत्थरों के 34 नमूने अमेरिकन स्पेस एजेंसी नासा के पास सुरक्षित हैं। मंगल ग्रह से पत्थरों का छिटककर धरती पर आ गिरना कुदरत का दुर्लभ संयोग है और विज्ञान विशेषतौर पर मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए ये नमूने किसी बेशकीमती खजाने से कम नहीं। ऐसी ही एक उल्का दिसंबर 1984 को अंटार्कटिक में वैज्ञानिकों की एक टीम को मिली थी। जब इसकी जांच की गई तो पता लगा कि ये उल्का करीब दो करोड़ साल पहले मंगल ग्रह से आई थी और खोजे जाने से पहले, यानि 11,000 साल तक अंटार्कटिक का बर्फ में पड़ी रही थी। इस उल्का का नाम रखा गया ALH84001 , नासा की लैब में जब इसकी जांच की गई तो इसमें एक खास तत्व मैगनेटाइट मिला, धरती पर कुछ खास बैक्टीरिया ही इस खास तत्व को बनाते हैं। जब इस उल्का को काटा गया तो इसमें एक ही आकार के ऐसे सूक्ष्म क्रिस्टल्स की लड़ी सी सजी मिली जो सीधे-सीधे किसी बैक्टीरिया की ओर इशारा कर रही थी। तो क्या मंगल ग्रह पर जीवन बैक्टीरिया के रूप में मौजूद है? इस सवाल की सनसनी पूरे विज्ञान जगत में महसूस की गई। नवंबर 2009 को नासा वैज्ञानिकों ने बताया कि अंटार्कटिक में मिली उल्का ALH84001 के सूक्ष्म जांच के बाद हम कह सकते हैं कि मंगल ग्रह पर कभी जीवन मौजूद था।
 
मंगल पर खोई जिंदगी की कड़ियां

जीने के क्रम में हर जीव रोज कचरा निकालता है, निर्जीव चीजें कचरा नहीं निकालतीं। जीवन का हर स्वरूप यहां तक कि बैक्टीरिया भी कचरे के रूप में कुछ ऐसे खास रसायन पीछे छोड़ता है, जो जीवन की तलाश में सूत्र का काम करते हैं। मंगल पर जिंदगी के कचरे, जीवन के इन्हीं खोए सूत्रों की तलाश ही क्यूरियोसिटी का मिशन है। अब तक हम जीवन के उस स्वरूप से ही परिचित हैं, जिसे हमने अपने चारोंओर, इस पृथ्वी के जल, थल और नभ में विचरते देखा है। धरती के भीतर बैक्टीरिया के रूप से लेकर पेड़-पौधे और सकल जीव जगत तक जिंदगी का हर रूप प्रमुख तौर पर केवल 4 तत्वों - हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कार्बन से संयोग से ही बना है। पृथ्वी पर निर्जीव और सजीव के साथ ये संपूर्ण सृष्टि केवल दो यौगिकों के रूप में हमारे सामने है, पहली इनऑर्गेनिक यानि अकार्बनिक यौगिक और दूसरी ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक। इनऑर्गेनिक यानि अकार्बनिक यौगिक का मतलब ऐसी चीजों से है जो कार्बन से नहीं बनीं, यानि जो जलने पर कोयले में नहीं बदल जातीं। ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक का अर्थ ऐसी सभी चीजों से है जो कार्बन से बनीं हैं और जलने पर वापस कार्बन यानि कोयले में बदल जाती हैं। इस धरती पर बैक्टीरिया से लेकर पेड़-पौधे और मछली, पंछी, मानव तक जिंदगी का हर स्वरूप कार्बन से बना है। हम पृथ्वी पर जिंदगी के जिन स्वरूपों से परिचित हैं वो सभी ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक हैं।

मंगल पर जिंदगी की खोज

मंगल पर जिंदगी के इसी जाने-पहचाने ऑर्गेनिक स्वरूप की खोज की कहानी शुरू होती है 1976 से जब नासा के वाइकिंग-2 मिशन ने मंगल ग्रह पर लैंड कर उसकी मिट्टी के नमूने पहली बार जांचे थे। वाइकिंग-2 ने अपनी  रोबोटिक आर्म के सिरे पर बनी चम्मच जैसी संरचना से मंगल की मिट्टी का नमूना उठाया और उसे अपने टेस्ट चैंबर में मौजूद कार्बन-14 न्यूट्रिएंट्स के साथ मिलाया। नासा के कंट्रोल रूम में मौजूद वैज्ञानिकों की टीम करोड़ों किलोमीटर दूर मंगल ग्रह पर हो रहे इस प्रयोग को दम साधे देख रही थी। वैज्ञानिकों की इस टीम में गिल्बर्ट लेविन भी मौजूद थे, लेविन और उनकी टीम ने मंगल पर जीवन की खोज करने वाले इस प्रयोग के उपकरणों को बनाया था, जिसे वाइकिंग अब मंगल पर आजमा रहा था। सबको इंतजार था वाइकिंग के नतीजों का।
वाइकिंग ने मंगल की मिट्टी के नमूने के परीक्षण का नतीजा नासा कंट्रोल रूम को भेजना शुरू किया और अगले ही पल गिल्बर्ट लेविन और उनकी टीम खुशी में भरकर चीख उठी और तमाम वैज्ञानिक अपनी सीटों से उठकर तालियां बजाने लगे। वाइकिंग बता रहा था कि उसने मंगल की मिट्टी से फूटती मीथेन गैस खोजी है। मंगल पर जिंदगी की तलाश की ये पहली कोशिश थी जिसका नतीजा पॉजिटिव था। मंगल पर मीथेन गैस का मिलना सीधे-सीधे इस ओर इशारा था कि वहां इस गैस को बनाने वाले बैक्टीरिया मौजूद हैं। वाइकिंग पर लगे गिल्बर्ट लेविन के उपकरणों ने शानदार काम किया था। मंगल पर जिंदगी की खोज के लिए इस खास प्रयोग की रूपरेखा तय करने वाले और महान एस्ट्रोफिजिसिस्ट डॉ. कार्ल सगान ने मंगल ग्रह पर जिंदगी के रासायनिक हस्ताक्षर की पहली खोज के लिए फोन करके गिल्बर्ट लेविन और उनकी टीम को बधाई दी।
खुशी में झूम रहे लेविन ने शैम्पेन मंगवाई, लेकिन वो बोतल खोली नहीं जा सकी, अगले ही पल सबके चेहरों के भाव बदल गए और कंट्रोल रूम में ठंडी खामोशी छा गई। क्योंकि वाइकिंग अब दूसरे उपकरण से परीक्षण के नतीजे भेज रहा था, जिसे मंगल पर ऑर्गेनिक कणों यानि कार्बन या उसके यौगिकों की पहचान करने के लिए वाइकिंग पर लगाया गया था। सबको यकीन था कि मीथेन की खोज के बाद मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक जरूर मिल जाएंगे, जो मंगल पर जीवन की मौजूदगी का सबसे बड़ा सबूत साबित होंगे। लेकिन वाइकिंग के दूसरे उपकरण के परीक्षण नतीजे निगेटिव थे। वाइकिंग के उपकरण मंगल की मिट्टी के नमूने में कार्बनिक यौगिकों यानि ऑर्गेनिक कंपाउंड्स को नहीं खोज सके। कार्बन नहीं तो जिंदगी भी नहीं। उस वक्त के नासा प्रमुख ने बयान जारी कर कहा कि वाइकिंग ने मंगल की मिट्टी का परीक्षण किया और वहां हमें जिंदगी का कोई निशान नहीं मिला।
 तो क्या गिल्बर्ट लेविन के उपकरणों के नतीजे गलत थे? 36 साल बाद अब भी गिल्बर्ट लेविन ये मानने को तैयार नहीं हैं। वाइकिंग मिशन के उस परीक्षण ने उनकी जिंदगी ही बदल कर रख दी। वाइकिंग पर लगे अपने उपकरणों के नतीजों को सही साबित करना और हर मंच पर पूरी जोरदारी के साथ ये कहना कि मंगल ग्रह पर जिंदगी मौजूद है, उनकी जिंदगी का लक्ष्य बन गया है। गिल्बर्ट मंगल पर जीवन के जिस रूप के मौजूद होने की वकालत कर रहे हैं, वैज्ञानिकों ने उसका नामकरण भी उनके नाम पर करते हुएगिलेविनिया स्ट्राटा रख दिया है। गिलेविनिया स्ट्राटा मीथेन बनाने वाला मंगल ग्रह का एक ऐसा बैक्टीरिया है, जिसपर गिल्बर्ट लेविन को तो यकीन है, लेकिन नासा को अभी उसकी खोज करनी बाकी है। 
मंगल पर नासा का नया मिशन मार्स साइंस लैबोरेटरी या क्यूरियोसिटी के लैंड होते ही गिल्बर्ट एक बार फिर सक्रिय हो उठे हैं। वो हर मंच पर पूरे यकीन के साथ कह रहे हैं कि क्यूरियोसिटी उन्हीं नतीजों की एक बार फिर पुष्टि करेगा जो वाइकिंग मिशन के साथ गए उनके उपकरणों ने 36 साल पहले भेजे थे। मंगल पर जीवन मौजूद है इस पर यकीन करने वाले गिल्बर्ट अकेले नहीं हैं, लॉस एंजिल्स की यूनिवर्सिटी आफ साउदर्न कैलीफोर्निया के सेल बायोलॉजिस्ट जो मिलर ने वाइकिंग के उस पुराने डेटा का फिर से विश्लेषण किया है और उनका मानना है कि मंगल की मिट्टी से फूटती मीथेन वहांसरकाडियन साइकिल यानि दिन और रात के चक्र पर आधारित जीव की ओर इशारा कर रही है, जिसका केवल एक ही मतलब है कि मंगल जिंदा है।
गिल्बर्ट नासा से मांग कर रहे हैं कि अगर क्यूरियोसिटी मंगल पर मीथेन खोज निकालती है तो 36 साल पुराने उनके वाइकिंग प्रयोग के डेटा की दोबारा जांच की जानी चाहिए। गिल्बर्ट कहते हैं, मंगल पर अब तक गए नासा के किसी भी मिशऩ ने वाइकिंग के मेरे प्रयोग के नतीजों का खंडन नहीं किया है। मुझे पूरा यकीन है कि मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक खोज निकालने में क्यूरियोसिटी कायमाब रहेगा। तब नासा को 36 साल पुराने वाइकिंग के नतीजों का फिर से विश्लेषण करना ही होगा।  
वॉशिंगटन में कार्नेगी इंस्टीट्यूट फार साइंस में भूवैज्ञानिक रॉबर्ट हैजेन कहते हैं, गिल्बर्ट के दावे आधारहीन नहीं हैं, वाइकिंग मिशऩ पर उनके उपकरणों के नतीजे चौंकानेवाले हैं, जिन्हें अब तक ठीक-ठीक समझने की कोशिश भी नहीं की गई है। वाइकिंग मिशन से पहले और काफी हद तक अब भी हम भोजन को पचाने वाले कार्बनिक जीवन को ही असली जिंदगी समझकर खोज रहे हैं। जबकि हो सकता है कि जीवन का एक अकार्बनिक रूप भी मौजूद हो। 

सोमवार, 29 नवंबर 2010

‘स्पेक्ट्रम’ आखिर है क्या ?

17 वीं सदी में महान वैज्ञानिक इसाक न्यूटन ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसने साइंस की धारा ही बदल दी। उन्होंने अपनी प्रयोगशाला के सभी खिड़की दरवाजे बंद कर दिए। फिरभी प्रयोगशाला में पूरा अंधेरा नहीं हो सका, क्योंकि खिड़की की एक दरार से सूरज की किरण भीतर आ रही थी। न्यूटन ने मुस्कराते हुए शीशे का एक छोटा प्रिज्म उठाया और उसे सूरज की उस किरण के सामने ले गए। एक जादू सा हो गया और सूरज की रोशनी का रहस्य सामने आ गया। सामने रखे एक सफेद बोर्ड पर इंद्रधनुष खिल उठा, दरअसल शीशे के प्रिज्म ने सूरज की रोशनी में मौजूद सात उन रंगों को अलग कर दिया था। हमारी आंख जो कुछ भी देखती है वो इन सात रंगों की सीमा में ही सिमटा रहता है। न्यूटन ने सूरज की रोशनी में छिपे इन सात रंगों को स्पेक्ट्रम कहा, और फिजिक्स में एक नई शुरुआत हो गई।
हमारा सूरज और एक साधारण अणु ये दोनों ही स्पेक्ट्रम के प्राकृतिक स्रोत हैं। आज स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल हम हर रोज जाने-अनजाने करते रहते हैं, टीवी के रिमोट से लेकर लैपटॉप पर वॉयरलेस इंटरनेट, माइक्रोवेव ओवेन, खिली-खिली धूप और मोबाइल फोन तक सब स्पेक्ट्रम का ही कमाल है। न्यूटन ने हमें स्पेक्ट्रम के गुण के बारे में बताया लेकिन स्पेक्ट्रम की वजह को गहराई से समझा महान भारतीय वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन ने। रमन ने अगर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का राज नहीं समझा होता तो आज न तो रिमोट होता और न मोबाइल फोन। हर अणु परमाणुओं सो बनता है और हर परमाणु के केंद्र में एक नाभिक होता है, जिसमें प्रोटान और न्यूट्रॉन होते हैं और अलग-अलग कक्षाओं में परिक्रमा करते इलेक्ट्रान चारों ओर से नाभिक को घेरे रहते हैं। अब शुरू होता है असली खेल, जब परमाणु को गर्म किया जाता है तो नाभिक की परिक्रमा करते इलेक्ट्रान अपनी कक्षा से छलांग लगाकर और ऊपर वाली कक्षा में पहुंच जाते हैं। इसी तरह जब परमाणु को ठंडा किया जाता है तो नाभिक की परिक्रमा कर रहे इलेक्ट्रान निचली कक्षाओं में गिर जाते हैं। सबसे खास बात ये कि नाभिक के चारोंओर घूमता इलेक्ट्रान जब भी अपनी कक्षा से ऊपर छलांग लगाता है या नीचे गिरता है, उस वक्त वो खास स्पेक्ट्रम छोड़ता है। इसे कहते हैं इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम। रमन ने पता लगाया कि कुदरत में मौजूद सभी धातुओं, खनिजों, गैसों और तरल का स्पेक्ट्रम बिल्कुल अलग-अलग होता है। ये स्पेक्ट्रम बिल्कुल उंगलियों के निशान जैसा होता है यानि हर तत्व का स्पेक्ट्रम बिल्कुल अलग और अनोखा। इस खोज के लिए रमन को भौतिकी के नोबेल से सम्मानित किया गया और तत्वों से निकलने वाले स्पेक्ट्रम को रमन इफेक्ट कहा गया। आज रमन इफेक्ट से ही हम चंद्रमा और मंगल ग्रह मौजूद खनिजों का पता लगा रहे हैं, और खोजे जा रहे नए ग्रहों के बारे में यहीं बैठे-बैठे बता सकते हैं कि वहां पानी है या नहीं, या उसका वातवरण कैसा है।
इलेक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन की वजह जानने के बाद अब मनचाही स्पेक्ट्रम को हासिल करना आसान हो गया, और यहीं से स्पेक्ट्रम के कारोबारी इस्तेमाल की शुरुआत हुई। फ्रीक्वेंसी और वेवलेंथ हर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की खास पहचान होती है, और इसी के आधार पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन को रेडियो, माइक्रोवेव, इंफ्रारेड, विजिबिल, अल्ट्रावॉयलेट, एक्स-रे और गामा-रे की पहचान की गई। ये सारी स्पेक्ट्रम, जिन्हें हम रेडिएशन भी कह सकते हैं, इनमें से कुछ हमें कोई नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे बेहद काम की हैं, जैसे रेडियो जिससे हम टीवी के प्रोग्राम्स देखते हैं, माइक्रोवेव जिससे सेटेलाइट संचार और ओवन से लेकर मोबाइल फोन तक काम करते हैं और इंफ्रारेड जिसपर सभी रिमोट काम करते हैं। समुद्र के किनारे की धूप में 53 फीसदी इन्फ्रारेड, 44 फीसदी दिखाई देने वाली रोशनी और 3 फीसदी अल्ट्रावॉयलेट किरणें होती हैं। अल्ट्रावॉयलेट, एक्स-रे और गामा-रे स्पेक्ट्रम बेहद खतरनाक हैं और इनके संपर्क में कुछ देर रहने से ही हम बीमार पड़ सकते हैं।
मोबाइल, सेटेलाइट और टेलीविजन इन तीनों में माइक्रोवेव और रेडियो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जाता है। अब सवाल ये कि आखिर इसका कारोबारी इस्तेमाल कैसे होता है? दरअसल किसी स्पेक्ट्रम का कारोबारी इस्तेमाल इन बातों से तय होता है कि उसकी तरंग की लंबाई कितनी है, उसकी फ्रिक्वेंसी (वेवलेंथ या साइकल प्रति सेकंड) क्या है और वो कितनी ऊर्जा कितनी दूर तक साथ ले जा सकती है।
रेडियो वेव स्पेक्ट्रम से लंबी दूरी तय की जा सकती हैं और वह भी बिना किसी दिक्कत के। रेडियो वेव स्पेक्ट्रम  की तरंगें काफी लंबी होती हैं। इनकी वेवलेंथ 1 किलोमीटर से लेकर 10 सेंटीमीटर तक की होती है और फ्रिक्वेंसी भी 3 किलोहट्र्ज (3,000 साइकिल प्रति सेकंड) से लेकर 3 गीगाहट्र्ज (3 अरब साइकिल प्रति सेकेंड) तक के बीच होती है। रेडियो तरंगों को सबसे ज्यादा असर भाप और आयन से होता है। साथ ही, इन पर सोलर फ्लेयर और एक्सरे किरणों के विस्फोट का भी असर होता है। साथ ही, पहाड़ों की वजह से भी रेडियो तरंगों से संचार में काफी असर पड़ सकता है। छोटी फ्रिक्वेंसी मकानों और पेड़ों को भी पार कर सकती हैं। साथ ही, ये पहाड़ों के किनारे से भी निकल सकती हैं।
माइक्रोवेव स्पेक्ट्रम का सबसे फायदेमंद इस्तेमाल दूरसंचार और इंटरनेट में होता है। दूरसंचार और ब्रॉडबैंड के लिए 700-900 मेगाहट्र्ज की छोटी फ्रिक्वेंसी काफी फायदेमंद होती हैं। सेंटीमीटर और मिलीमीटर की रेंज वाली माइक्रोवेव्स की फ्रिक्वेंसी 300 गीगाहट्र्ज तक हो सकती है। इसके अलग-अलग प्रकार के इस्तेमाल को देखते हुए इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। खाना पकाने वाले माइक्रोवेव में सैकड़ों वॉट बिजली का इस्तेमाल आरएफ वेवलेंथ को पैदा करने में होता है। ये वेवलेंथ 32 सेमी (915 मेगाहट्र्ज) से लेकर 12 सेमी (2.45 मेगाहट्र्ज) तक के होते हैं। छोटी ऊर्जा स्रोतों वाले उपकरणों से पैदा होने वाले माइक्रोवेव का इस्तेमाल संचार के साधनों के रूप में होता है और ये काफी कम ऊर्जा पैदा करते हैं। इन्फ्रारेड वेव छोटी होती हैं और वे काफी गर्म होती हैं। लंबी दूरी वाले इन्फ्रारेड बैंड्स का इस्तेमाल रिमोट कंट्रोल के लिए होता है। साथ ही, इनका इस्तेमाल बहुत कम गर्मी पैदा करने वाले बल्बों में होता है।
 2जी और 3जी
किस स्पेक्ट्रम पर हम बात करेंगे और किस स्पेक्ट्रम पर सेटेलाइट डेटा भेजे जाएंगे, इस जैसे तमाम मुद्दों की बागडोर संभाल रखी है इंटरनेशनल कम्युनिकेशन यूनियन ने। संयु्क्त राष्ट्र की इस इकाई ने सभी सदस्य देशों को अलग-अलग स्पेक्ट्रम के बैंड्स आवंटित कर रखे हैं। इसमें कोई देश मनमानी या एक-दूसरे के कामकाज में बाधा नहीं पहुंचा सकता। इन नियमों के तहत 1980 में 1-जी यानि फर्स्ट जनरेशन वायरलेस टेक्नोलॉजी की शुरुआत हुई, पहले पहल जिसका इस्तेमाल कार फोन में किया गया। 2-जी यानी सेकेंड जनरेशन वायरलेस टेलीफोन टेक्नोलॉजी की शुरुआत 1990 में हुई। 1991 में पहली बार फिनलैंड में रेडियोलिंजा कंपनी की ओर से जीएसएम मोबाइल सर्विस में 2-जी टेक्नोलॉजी का कारोबारी इस्तेमाल शुरू हुआ। डाटा ट्रांसफरिंग, टेक्स विथ रेडियो सिग्नल्स आदि सुविधाओं से हुई शुरुआत में जल्दी ही सीडीएमए का प्रवेश भी हो गया। अब आ गई है बारी 3-जी यानि थर्ड जनरेशन मोबाइल टेक्नोलॉजी की। 3-जी में डाटा का हस्तांतरण तेजी से होता है और नेटवर्क भी अच्छा होता है। 2जी स्पेक्ट्रम की बात करें तो ये हमारी सरकार के पास इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन से आवंटित एक खास रेडियो वेव बैंड है। सिग्नल भेजने के लिए मोबाइल कंपनियों को फ्रिक्वेंसी रेंज की जरूरत थी। सरकार ने लाइसेंस फी लेकर स्पेक्ट्रम मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर्स को जारी किए।
खास बात ये कि 2-जी और 3-जी के स्पेक्ट्रम में कोई खास अंतर नहीं है। बस सरकार के नियमन और इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन ने सदस्य देशों के बीच बेहतर तारतम्यता के तहत इसके लिए अलग स्पेक्ट्रम घोषित किया गया है। दोनों नेटवर्क 800-900 और 1800-1900 मेगाहट्र्ज पर काम करते हैं और कर सकते हैं। कमाई में इजाफे को देखते हुए अनुमानों के मुताबिक 900 मेगाहट्र्ज के 3जी में 2.1 गीगाहट्र्ज से कम लागत लगती है। फिनलैंड, आइसलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, थाईलैंड, वेनुजुएला, डेनमार्क और स्वीडन में तो 900 मेगाहट्र्ज (2जी स्पेक्ट्रम) पर ही 3जी नेटवर्क मौजूद है। फ्रांस भी अब 2जी की जगह 3जी को बढ़ावा दे रहा है। इससे पता चलता है कि भारत में सरकारी और रक्षा इस्तेमालों की वजह से स्पेक्ट्रम की कितनी ज्यादा किल्लत है। हमें अपनी जरूरतों, लैंडलाइन फोनों की कम पहुंच और लागत को देखते हुए अपनी क्षमता के विस्तार के नए तरीकों की तलाश करनी होगी। दूसरे मुल्कों में कंपनियां इस स्पेक्ट्रम का अपनी इच्छा के मुताबिक इस्तेमाल करने के लिए मुक्त हैं, जबकि अपने मुल्क में इस बारे में कोई तस्वीर ही स्पष्ट नहीं है। हमारी नीतियों कम कीमत पर ज्यादा अच्छी कवरेज या क्षमता के बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकती हैं। इससे लोगों को कम कीमत पर अच्छी सेवा मिलेगी।