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रविवार, 22 सितंबर 2013

मेरी बीमारी ने मुझे उम्दा वैज्ञानिक बना दिया: प्रो.हॉकिंग


'ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ टाइम' के लेखक स्टीफ़न हॉकिंग एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार मौका है उनके जीवन संघर्षों पर बनी फिल्म 'हॉकिंग'का जो जल्दी ही दुनियाभर में रिलीज होने वाली है। प्रो.स्टीफन हॉकिंग एक इंटरव्यू में इस फिल्म और अपने जीवन के बारे में खुल कर बात की। प्रस्तुत है इस इंटरव्यू के खास अंश -

अपने जीवन पर बन रही इस फ़िल्म के बारे में पूछने पर हॉकिंग कहते हैं ''यह फ़िल्म विज्ञान पर केंद्रित है, और शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे लोगों को एक उम्मीद जगाती है। 21 वर्ष की उम्र में डॉक्टरों ने मुझे बता दिया था कि मुझे मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और मेरे पास जीने के लिए सिर्फ दो या तीन साल हैं।

इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है।कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इस बीमारी से लड़ने के बारे में मैने बहुत कुछ सीखा''। हॉकिंग का मानना है कि हमें वह सब करना चाहिए जो हम कर सकते हैं, लेकिन हमें उन चीजों के लिए पछताना नहीं चाहिए जो हमारे वश में नहीं है।

यह पूछने पर कि क्या अपनी शारीरिक अक्षमताओं की वजह से वह दुनिया के सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक बन पाए, हॉकिंग कहते हैं, ''मैं यह स्वीकार करता हूं मैं अपनी बीमारी के कारण ही सबसे उम्दा वैज्ञानिक बन पाया, मेरी अक्षमताओं की वजह से ही मुझे ब्रह्माण्ड पर किए गए मेरे शोध के बारे में सोचने का समय मिला। भौतिकी पर किए गए मेरे अध्ययन ने यह साबित कर दिखाया कि दुनिया में कोई भी विकलांग नहीं है।''

हॉकिंग को अपनी कौन सी उपलब्धि पर सबसे ज्यादा गर्व है? हॉकिंग जवाब देते हैं '' मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के लिए खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।''हॉकिंग के मुताबिक यह सब उनके परिवार और दोस्तों की मदद के बिना संभव नहीं था।

यह पूछने पर कि क्या वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं हॉकिंग कहते हैं, ''लगभग सभी मांसपेशियों से मेरा नियंत्रण खो चुका है और अब मैं अपने गाल की मांसपेशी के जरिए, अपने चश्मे पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत करता हूँ।''

मरने के अधिकार जैसे विवादास्पद मुद्दे पर हॉकिंग बीबीसी से कहते हैं, ''मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति जो किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित है और बहुत ज्यादा दर्द में है उसे अपने जीवन को खत्म करने का अधिकार होना चाहिए और उसकी मदद करने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह की मुकदमेबाजी से मुक्त होना चाहिए।''
स्टीफन हॉकिंग आज भी नियमित रूप से पढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय जाते हैं, और उनका दिमाग आज भी ठीक ढंग से काम करता है।

ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी को समझने में उन्होंने अहम योगदान दिया है। उनके पास 12 मानद डिग्रियाँ हैं और अमरीका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान उन्हें दिया गया है।

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

‘नेचुरल सेलेक्शन’ यानि प्राकृतिक चयनवाद मानव जाति के लिए सबसे बड़ा खतरा


प्रोफेसर क्रिश्चियन-डि-डुवे एक मशहूर जीवविज्ञानी और विजनरी लेखक हैं। कोशकीय संरचना में रिसर्च के लिए उन्हें 1974 में जीवविज्ञान के नोबेल से सम्मानित किया जा चुका है। प्रो. क्रिश्चियन बेल्जियम की कैथोलिक यूनिवर्सिटी आफ लाऊवेन और न्यूयार्क की रॉकेफेलर यूनिवर्सिटी में विजटिंग प्रोफेसर हैं। येल यूनिवर्सिटी प्रेस ने उनकी नई किताब प्रकाशित की है, जिसका शीर्षक है – जेनेटिक्स आफ ओरीजनल सिन।
 इस किताब में प्रो. क्रिश्चिन ने ये कहकर दुनिया का ध्यान खींचा है कि नेचुरल सेलेक्शन यानि प्राकृतिक चयनवाद अब मानव जाति के खिलाफ काम कर रहा है। वॉयेजर पेश करता है प्रोफेसर क्रिश्चियन-डि-डुवे से बातचीत के अंश -
सवाल-इस ग्रह पर मानव जाति सबसे सफल जीव प्रजाति है, लेकिन आपका कहना है कि आखिरकार हमें इस सफलता की कीमत चुकानी होगी। ऐसा क्यों ?
प्रो.क्रिश्चिन -हम मानवों ने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के जरिए धरती की सबसे सफल जीव प्रजाति का दर्जा हासिल किया है। लेकिन इससे ऊर्जा संकट, पर्यावरण में बदलाव, प्रदूषण और इस ग्रह पर जीवन को सहारा देने वाली स्थितियों के ह्वास जैसी समस्याएं पैदा हो गईं। अगर आप कुदरती संसाधनों का दोहन करते चले जाएंगे तो अपने बच्चों को देने के लिए आपके पास कुछ भी नहीं होगा। अगर हम इसी दिशा में आगे बढ़ते रहे तो अगर हम सामूहिक विनाश जैसी घटनाओं से बच भी गए, तो भी मानव जाति को भविष्य में निर्मम अग्निपरीक्षा का सामना करना होगा।
सवाल -आपका मानना है कि नेचुरल सेलेक्शन यानि प्राकृतिक चयनवाद अब हमारे यानि मानव जाति के खिलाफ काम कर रहा है, ये आखिर कैसे ?
प्रो.क्रिश्चिन -क्योंकि अब दूरदर्शिता नहीं रही। नेचुरल सेलेक्शन यानि प्राकृतिक चयनवाद हमारे जीन्स में छिपी कुछ खास विशिष्टताओं के जरिए काम करता है जैसे कि सामूहिक स्वार्थता (group selfishness)। हमारे आदिपूर्वज जिन हालातों में गुजर-बसर कर रहे थे, ये विशिष्टता तब पूरे समूह के लिए बड़े काम की थी, लेकिन यही विशिष्टता अब हमें सबसे ज्यादा नुकसान भी पहुंचा रही है। हमारे ही जीन्स में एक कोड ये भी दर्ज है कि भविष्य की भलाई के लिए हम वर्तमान को बलिदान करें हमारे जीन्स की ये दूसरी विशिष्टता हमारे प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित करने में योगदान भी कर सकती है। अब हमें ये समझदारी दिखानी होगी कि बेहतर भविष्य के लिए कुछ बेहद जरूरी चीजों के लिए हम तात्कालिक फायदे वाली अपनी कुछ चीजों का बलिदान करें। नेचुरल सेलेक्शन या प्राकृतिक चयन ऐसा नहीं करता, इसकी प्राथमिकता में केवल ये तय करना होता है कि आज क्या हो रहा है? और बेहतर आज के लिए अभी क्या जरूरी है? नेचुरल सेलेक्शन या प्राकृतिक चयन आपके बच्चों और पोतों-पड़पोतों के साथ क्या होगा, इसकी परवाह नहीं करता।
सवाल -आपने दूरदर्शिता के इस अभाव को ओरीजिनल सिन रहा है। आपने इस विशेषण का इस्तेमाल क्यों किया?
प्रो.क्रिश्चिन- ये बाइबिल का टर्म है। मेरा मानना है कि बाइबिल के एक खास खंड- जेनेसिस के लेखकों ने मानव प्रकृति में गहरे पैठी हुई स्वार्थपरता की पहचान कर ली थी। मैं कहता हूं कि ये चीज हमारे जीन्स में है। इसीलिए इसे बताने के लिए ही ओरीजिनल सिन के मिथक की रचना की गई होगी। लेकिन मैं प्राचीन ग्रंथों का व्याख्याकार नहीं हूं, यहां ओरीजिनल सिन से मेरा मतलब प्राकृतिक संसाधनों के लगातार दोहन से है, जिसके दुष्परिणाम हमें या हमारी संतानों को आगे भुगतने होंगे। 
सवाल- मानव जाति इस ओरीजिनल सिन से कैसे उबर सकती है ?
प्रो.क्रिश्चिन- हमें नेचुरल सेलेक्शन या प्राकृतिक चयन के विरुद्ध काम करना होगा और हमारे जीन्स में मौजूद कुछ विशिष्टताओं की खिलाफत सक्रियता से करनी होगी।
सवाल- आपने एक समाधान के तौर पर जनसंख्या नियंत्रण का सुझाव दिया है। लेकिन क्या ये धार्मिक रूप से विवादास्पद नहीं है?
प्रो.क्रिश्चिन- ये तो सामान्य सी बात है। अगर आप चाहते हैं कि ये ग्रह हर किसी के जीने के काबिल बना रहे तो आपको यहां रहने वालों की तादाद नियंत्रित करनी होगी। देखिए किसी भी झुंड में शिकार वही जानवर बनते हैं जो कमजोर, बीमार या बूढ़े होते हैं। लेकिन मैं नहीं मानता कि जनसंख्या नियंत्रित करने का ये तरीका नैतिक है। तो फिर सवाल ये कि हमें क्या करना चाहिए ? इसका जवाब है जन्म पर नियंत्रण। हमारे पास जन्म पर नियंत्रण के लिए नैतिक, धार्मिक, व्यावहारिक और वैज्ञानिक हर तरह के उपाय हैं। इसलिए मेरे विचार से जन्म को नियंत्रित करना ही वो सबसे कारगर उपाय है जिससे जनसंख्या सीमित रखी जा सकती है।
सवाल- आप महिलाओं को और भी ज्यादा अधिकार दिए जाने की वकालत करते हैं, ऐसा क्यों ?
प्रो.क्रिश्चिन- एक जीवविज्ञानी के तौर पर कहूं तो, मेरे विचार से महिलाएं पुरुषों के मुकाबले कम आक्रामक होती हैं और वो नई पीढ़ी को शिक्षित करने में कहीं ज्यादा व्यापक और महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाती हैं। ऐसा करके महिलाएं बच्चों को उनके जीन्स में मौजूद उस विरासत से उबारने का काम करती हैं, जो उन्हें अपने पूर्वजों, आदिपूर्वजों से मिली होती हैं।
सवाल- मानवजाति के भविष्य के बारे में क्या आप आशान्वित हैं ?
प्रो.क्रिश्चिन- मैं आशान्वित हूं लेकिन सतर्कता के साथ, बेहद सतर्कता के साथ। मैं आशान्वित होने की कोशिश कर रहा हूं, क्योंकि मैं नौजवानों और आने वाली पीढ़ी को एक उम्मीद का संदेश (message of hope) देना पसंद करूंगा। मैं उनसे ये कहना चाहूंगा कि इस मसले में अब तुम कुछ कर सकते हो। लेकिन वर्तमान में अभी ऐसे कोई संकेत भी नहीं मिल रहे कि ऐसा कुछ हो रहा है।

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

‘मानव जाति की सबसे बड़ी खोज के लिए सबका साथ आना जरूरी’


मिशन कैप्लर के वैज्ञानिक डॉ. ज्योफ मर्सी का इंटरव्यू
हमने अपने सौरमंडल से बाहर पहले नए ग्रह की खोज की 1992 में, और तब से नए ग्रहों की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है। इस लिस्ट में अबतक 500 नए ग्रह शामिल हो चुके हैं। नए ग्रहों की खोज में अब तक की सबसे महत्वपूर्ण घटना के तौर पर नासा ने स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर की करीब तीन साल तक की खोज के तमाम डेटा सार्वजनिक कर दिए हैं। नए ग्रहों की खोज मानवजाति की सबसे महान उपलब्धियों में से एक है और हम इन नए और अजनबी ग्रहों के अध्ययन के नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। इन एलियन ग्रहों की अदभुत दुनिया का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों में से एक हैं बर्कले की यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के एस्ट्रोनॉमर डॉ. ज्योफ मर्सी। डॉ. मर्सी पृथ्वी जैसे ग्रह की तलाश में जुटे मिशन कैप्लर के सह-निरीक्षक हैं। डॉ. मर्सी ऐसे चुनिंदा वैज्ञानिकों में से हैं जिनके नाम सबसे ज्यादा नए ग्रहों की खोज दर्ज है। उन्होंने पहले 100 नए ग्रहों में से 70 ग्रहों की खोज में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने ही सबसे पहले एक नया सौरमंडल खोज निकाला था। डॉ. मर्सी जनवरी में अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की विंटर मीटिंग में शामिल होने के लिए सिएटल आए थे, वहां उनका ये विशेष इंटरव्यू लिया गया। इस इंटरव्यू में डॉ. मर्सी से नए ग्रहों की खोज की लगातार तेज होती रफ्तार और धरती के अलावा कहीं और जीवन की संभावनाओं पर खास सवाल पूछे गए। पेश है वॉयेजर की खास पेशकश -
सवाल लग रहा है मानो नए ग्रहों की एकदम से बाढ़ सी आ गई है, आखिर इसकी वजह क्या है? क्या बेहतर उपकरण और बेहतर तकनीक ही इसकी वजह है?
डॉ. मर्सी देखिए मैं आपको एक दूसरा पहलू बताता हूं। हमारे बीच कुछ ऐसे एस्ट्रोनॉमर्स हैं, जो वाकई बेहद इनोवेटिव हैं और बहुत ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। वो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं कर रहे, बल्कि अपनी जरूरत के हिसाब से उसे इनोवेट कर रहे हैं, ताकि बेहतर वैज्ञानिक नतीजे सामने आ सकें। ये लोग रात-रात भर दुनियाभर से आई ऑब्जरवेशंस का करेक्शन किया करते हैं, ताकि पृथ्वी जैसे जीवन के योग्य ग्रह की तलाश मुमकिन हो सके। ये कह देना बेहद आसान है कि अरे ये तो नए कंप्यूटर या एडवांस ऑप्टिक्स का कमाल है। लेकिन यकीन मानिए अब महान खोजें सामने आ रही हैं। क्योंकि ये अदभुत और जुझारू लोग एक नया सपना देख रहे हैं और अपने सपने को अथक परिश्रम से नई खोजों में तब्दील कर रहे हैं।
सवाल अगर हम ये बातचीत 20 साल बाद कर रहे होते, तो आज की रफ्तार से क्या लगता है, उस वक्त तक हम कितने नए ग्रहों की खोज कर चुके होते?
डॉ. मर्सी ईमानदारी से कहूं तो कैप्लर इतना शानदार है कि इसके जैसा अब तक कोई नहीं। इसके नंबर्स शायद कभी खत्म नहीं होंगे। कैप्लर हजारों नए ग्रहों की खोज करने वाला है। यूरोप या अमेरिका में से कोई कैप्लर जैसी या इससे भी शक्तिशाली नए ग्रहों की खोज करने वाली स्पेस ऑब्जरवेटरी भी लांच कर सकता है। इसलिए आने वाले भविष्य में हम हजारों नए ग्रहों की खोज करने वाले हैं। मैं शर्त लगाकर कहता हूं कि 2020 तक हम 10,000 नए ग्रहों को खोज चुके होंगे और 2030 तक नए ग्रहों की तादाद बढ़कर 20,000 या 30,000 या फिर इससे भी ज्यादा हो चुकी होगी।
सवाल नए ग्रहों के बारे में वो कौन से सबसे बड़े रहस्य हैं, जिन्हें अभी समझना बाकी है?
डॉ. मर्सी हां एक बहुत बड़ा रहस्य है, जिसके बारे में कोई भी बात करना नहीं चाहता। ये एक युगों पुराना सवाल है, कि पृथ्वी जैसे ग्रह का वजूद क्या बहुत कॉमन यानि सामान्य सी बात है? हम जानते हैं, कि यकीनन पृथ्वी जैसे ग्रह और भी हैं। मेरा मतलब है, देखिए आसमान में कितने सारे सितारे हैं। लेकिन ये सवाल दो हिस्सों में है, पहला, पृथ्वी जैसे ग्रह से आपका मतलब क्या है? और दूसरा ये कि ऐसे ग्रह कितने कॉमन हैं? देखिए, हम सबको ये जानकर बहुत अच्छा लगेगा कि हमने एक और ऐसी दुनिया ढूंढ़ निकाली है, जहां हम रह सकते हैं, वो जिंदगी, जिससे हमारी जान-पहचान है, मुमकिन हो सकती है। जहां तक पृथ्वी जैसे गुणों का सवाल है, तो ये थोड़ा रहस्यमय है, लेकिन फिरभी हमें इसका कुछ आईडिया तो है। पृथ्वी जैसा ग्रह, यानि वहां पानी तरल स्वरूप में होना चाहिए, उस ग्रह का तापमान अरबों-लाखों सालों से स्थिर रहना चाहिए, ताकि डार्विन के विकासवाद को प्रोत्साहन मिल सके। अपने अक्ष पर ऐसे ग्रह के घूर्णन को व्यवस्थित करने के लिए एक चंद्रमा का होना भी जरूरी होगा। ऐसे ग्रह के सौरमंडल में बृहस्पति जैसे एक विशाल ग्रह की मौजूदगी बेहद जरूरी है, ताकि वो इस ग्रह और इसके आस-पास यहां-वहां बिखरा मलबा अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल की मदद से अपने पास खींच सके। इस नए ग्रह पर एक विशाल और स्थिर महासागर का होना भी जरूरी है, ताकि इसका खारा पानी इस ग्रह की बायोकैमिस्ट्री के लिए सॉल्वेंट का काम कर सके। वहां एक सघन वायुमंडल और मजबूत चुंबकीय क्षेत्र का होना भी जरूरी है। मैं समझता हूं कि किसी ग्रह पर मौजूद ये सारी चीजें ही उसे पृथ्वी जैसा बनाएंगी। लेकिन ऐसी नई पृथ्वियां कितनी कॉमन हैं, हम अभी ये नहीं जानते।
सवाल आपका शोध बताता है कि छोटे ग्रहों का वजूद एक सामान्य सी बात है। यानि आस-पास के सूरज जैसे हर सितारे के पास पृथ्वी जैसे आकार वाला ग्रह हो सकता है?
डॉ. मर्सी हां, लेकिन ज्यादातर लोग इस बारे में बात नहीं करना चाहते। क्योंकि बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून जैसे विशाल ग्रहों के मुकाबले पृथ्वी जैसे आकार वाले ग्रह इतने छोटे होते हैं कि ऑब्जरवेशन में इन्हें पहचानना बेहद मुश्किल है। ये बिल्कुल ऐसा है मानो 18-18 पहियों वाले विशाल और भारी-भरकम वाहनों से भरे हाईवे पर किसी बच्चे की एक छोटी सी ट्राईसाइकिल चल रही हो। हमारी पृथ्वी बिल्कुल ऐसी है, मानो 15 बड़ी बिलियर्ड्स की गेंदों के बीच किसी ने बिलियर्ड टेबल पर एक छोटा सा कंचा यानि मारबल रख दिया हो। अब आप जैसे ही इन विशाल गेंदों के बीच शॉट लेना शुरू करते हैं, तो ये छोटा कंचा या मारबल गोली टेबल पर कहां छिप जाती है पता ही नहीं चलता।
सवाल पृथ्वी जैसे ग्रह बन सकते हैं, ये तो एक बात है, लेकिन ऐसे ग्रह लंबे वक्त तक व्यवस्थित और स्थिर रह सकें ये कहना तो बिल्कुल एक अलग सवाल है
डॉ. मर्सी हां, और मेरे विचार से ऐसे ग्रह निश्चित तौर पर बने होंगे। ऐसे ग्रहों की रचना नहीं हुई, ये सोंचना तर्कसंगत नहीं है। अगर बृहस्पति जैसे विशाल ग्रह बन सकते हैं, तो फिर पृथ्वी जैसे छोटे ग्रहों की रचना क्यों नहीं हो सकती। शायद अंतरिक्ष के हाईवे पर हमारा सारा ध्यान इन 18 पहिए वाले विशाल और भारी-भरकम वाहनों पर ही फोकस रहता है, इसलिए हम आसपास से गुजरती छोटी ट्राईसाइकिल देख ही नहीं पाते। धरती जैसे आकार वाले ग्रह ये ट्राईसाइकिल ही हैं। इस हाईवे पर जब भारी-भरकम विशाल ग्रह इन छोटे ग्रहों के करीब से गुजरते होंगे तो भारी गुरुत्वाकर्षण बल का जबरदस्त धक्का इन छोटे ग्रहों को पूरे सिस्टम से ही बाहर कर देता होगा। इसलिए ये भी मुमकिन है कि पृथ्वी जैसे छोटे ग्रहों की रचना तो हुई, लेकिन विशाल ग्रहों के गुरुत्व धक्के से वो ब्रह्मांड के अंधेरे कोनों में ठेल दिए गए। जहां वो खुद के लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा होने का इंतजार कर रहे हों। ऐसा पूरी तरह मुमकिन है, हमारा ग्रह पृथ्वी और शायद हम पृथ्वीवासी बेहद दुर्लभ भी हो सकते हैं। 
बाई-द-वे सेटी (सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस) सिगनल्स कहां हैं? अब तक हम उन्हें नहीं खोज सके हैं, ये बिल्कुल वैसा ही है, मानो कमरे में विशाल हाथी मौजूद हो और हम उसे देख ही नहीं पा रहे हों। 40 साल से भी ज्यादा वक्त से फ्रेंक ड्रेक और कार्ल सगान सेटी सिगनल्स की तलाश करते रहे हैं और अब तक हमारे पास नतीजे के नाम पर कुछ भी नहीं है। इसलिए इससे एक इशारा मिलता है, स्पष्ट नहीं तो धुंधला सा ही सही, कि हमारी पृथ्वी जितना हम समझते हैं उससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। 
सवाल पूरे ब्रह्मांड की तुलना में हमारा सौरमंडल काफी युवा है। और ब्रह्मांड इतना विशाल है। इसलिए उन्नत सभ्यताओं के पास हमसे संपर्क करने की कोशिश करने के लिए काफी वक्त और मौके रहे होंगे। कुछ लोग सोंचते हैं कि परग्रहीय सभ्यताओं ने अब तक हमसे संपर्क नहीं किया, इसका मतलब ये भी है कि शायद हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं ?
डॉ. मर्सी आपने बात को घुमा दिया है, किसी बुद्धिमान परग्रहीय सभ्यता की तरफ से किसी इंटेलिजेंस रेडियो या टेलीविजन सिगनल का न आना बस एक इंडिकेशन यानि बस इशारा भर है, कोई प्रमाण नहीं। शायद जीवन के अनुकूल किसी ग्रह पर अरबों साल से डार्विन के विकासवाद का चक्र चल रहा हो- शायद ये दुर्लभ हो। शायद।
सवाल आपका आंकलन क्या है ? आपका मन इस बारे में क्या कहता है?
डॉ. मर्सी अगर मैं शर्त लगा रहा होता, तो जरूर अनुमान लगाता, लेकिन साइंस में हम ऐसा नहीं कर सकते। मैं कहूंगा कि बौद्धिक और टेक्नोलॉजिकली उन्नत सभ्यताएं हमारी मिल्की-वे गैलेक्सी में दुर्लभ हैं। इसके प्रमाण भी धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं। हम होमो-सेपियंस तब तक विकसित नहीं हो सके थे, जब तक कि पूर्वी अफ्रीका के सवाना के वातावरण में नाटकीय बदलाव नहीं शुरू हो गए। ये बदलाव इतने महत्वपूर्ण थे कि मानव विकासवाद का अध्ययन करने वाले पुराविशेषज्ञ अब भी हमें ये नहीं बता सकते कि ऑस्ट्रेलोपिथेसिन्स आखिर बड़े मस्तिष्क का विकास कैसे कर सके थे, जो इतने कुशल थे कि आज के पियानो कॉन्सर्ट तक में भाग ले सकते थे। ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सही-सही कहूं तो डार्विन के विकासवाद में नहीं है।
आखिर क्यों पूर्वी अफ्रीका के सवाना मैदानों की ऊंची- ऊंची झाड़ियों और घासों में रहने वाले आदिम मानव खुद को आज के पियानो कॉन्सर्ट में भाग लेने के लायक विकसित क्यों नहीं कर सके ? आखिर वो इवोल्यूशनरी ड्राइवर क्या था, जिसने हमें रॉकेट शिप्स का निर्माण करने वालों में तब्दील कर दिया ? सच्चाई ये है कि विकास के इस आयाम को छूने के लिए हमने आधुनिक मानव के बगैर चार अरब साल तक इंतजार किया है....चार अरब साल तक ? 
सवाल हां, हमें यहां तक पहुंचने में चार अरब साल का वक्त लगा
डॉ. मर्सी पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत से लेकर लाखों-करोड़ों साल तक बहुकोशकीय जीवन के उन्नत स्वरूपों का राज था। जरा अंदाजा लगाइए, इस दौरान मस्तिष्क का आकार कितना विकसित हुआ होगा ? ...मैं बताता हूं कुछ भी नहीं ! क्या आप पृथ्वी पर विचरने वाले सबसे महान प्राणी को जानते हैं ? वो डायनासोर थे हर बच्चा इसे जानता है। और क्यों ? ऐसा इसलिए, क्योंकि 10 करोड़ साल तक डायनासोर पृथ्वी पर राज करते रहे। उनमें विशाल डायनासोर भी थे और छोटे डायनासोर भी। हर पीढ़ी के शिशु डायनासोर को उस वक्त की दुनिया में मौजूद बाकी सभी डायनासोरों से होड़ करनी थी। 10 करोड़ साल बाद हर पीढ़ी का शिशु डायनासोर कुछ ज्यादा स्मार्ट होता गया और इस तरह जीवन आगे बढ़ता रहा। इसलिए निश्चित तौर पर डायनासोर के मस्तिष्क का आकार भी धीरे-धीरे बढ़ता गया। 
अब जरा डायनासोर विशेषज्ञों के रिकार्ड पर नजर डालें। डायनासोर विशेषज्ञों के मुताबिक डायनासोरों का मस्तिष्क मुर्गे के मस्तिष्क जितना था। इससे पता चलता है कि मस्तिष्क का आकार विकासवाद का मुख्य ड्राइवर नहीं है।  
सवाल आपने कहा कि हम नए ग्रहों के सुनहरे दौर में प्रवेश करने वाले हैं। क्या भविष्य इसी में छिपा है कि हम किसी अच्छे, अजनबी ग्रह पर सीधी-सीधी नजर डालें, जो जीवन के फलने-फूलने लायक बनने के लिए खुद को एडजेस्ट कर रहा हो ?
डॉ. मर्सी हमें दो बड़ी चीजें करनी चाहिए। पहली ये कि बतौर मानव जाति यानि इसका मतलब है कि यूरोपियन स्पेस एजेंसी, जापान, चीन, भारत और अमेरिका-कनाडा एक साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के तौर पर काम करें। और ये अंतरराष्ट्रीय एजेंसी एक इंटरफेरोमीट्रिक स्पेस टेलिस्कोप को बनाकर अंतरिक्ष भेजे, ताकि हम इससे पृथ्वी जैसे आकार वाले और पृथ्वी से मिलते-जुलते ग्रहों की तस्वीर ले सकें। हम ये करना जानते हैं। हां, ये सही है कि ये प्रोजेक्ट काफी महंगा होगा, लेकिन साइंस में हम महंगे प्रोजेक्ट्स पर काम करते रहते हैं और फिर ये प्रोजेक्ट मानव जाति की सबसे बड़ी खोज को भी तो अंजाम देगा। तब हम इस सवाल का जवाब जान सकेंगे कि पृथ्वी जैसे और शायद जीवन को सहारा देने वाले दूसरे ग्रह कितने हैं ? और दूसरी चीज जो हमें करनी चाहिए, वो ये कि हमें अपोलो प्रोजेक्ट की तरह फुल-फ्लेज्ड सेटी तलाश में पूरी गंभीरता से जुट जाना चाहिए। आखिर हम अपने संसाधनों को एकसाथ मिलाकर सेटी की तलाश क्यों नहीं शुरू कर देते ?
सवाल किसी एलियन इंटेलिजेंट लाइफ यानि अजनबी बौद्धिक परग्रहीय जीवन की खोज बहुत बड़ी बात होगी। इससे खुद के प्रति और इस ब्रह्मांड में हमारे स्थान के प्रति हम जिस तरह से सोंचते हैं वो पूरा नजरिया ही बदल जाएगा।
डॉ. मर्सी यकीनन। तो फिर आखिर हम सब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकसाथ मिलकर अपने संसाधनों को एकजुट करके एक विशाल रेडियो टेलिस्कोप फेसिलिटी और अगर कुछ पैसे बच जाते हैं तो एक इंफ्रारेड फेसिलिटी का निर्माण क्यों नहीं करते ? और सेटी सिगनल्स की तलाश का एक विशाल अभियान क्यों नहीं छेड़ देते ? हम जानते हैं कि हमें क्या खोजना है ? बार-बार खुद को रिपीट करता हुआ रेडियो सिगनल। वाकई ये मानव जाति की सबसे बड़ी खोज होगी। सेटी रेडियो सिगनल का मिलना और परग्रहीय बौद्धिक सभ्यता की खोज बिल्कुल चंद्रमा पर आर्मस्ट्रांग के पहले कदम जैसी होगी, ये वैसा ही होगा जैसे कि नई दुनिया में कोलंबस के कदम। ये सबसे शानदार, सबसे प्रेरक प्रयास होगा।
Courtesy - space.com

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

भारत से आन सान सू की का गहरा रिश्ता

भारत हमें बात कहने के मौके दे - सू की


साइंस की बुनियाद आजादी और लोकतांत्रिक अधिकारों में है। इसलिए हम 'वॉयेजर' पर प्रस्तुत कर रहे हैं म्यांमार में नागरिकों की आजादी और लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रही हमारे वक्त की महान नेता आन सान सू की पर विशेष सामग्री।
कम ही लोग जानते होंगे कि दिल्ली स्थित कांग्रेस हेडक्वॉर्टर से म्यांमार की लोकतांत्रिक नेता आन सान सू की का गहरा रिश्ता रहा है। दिल्ली के जिस बंगले में वो रहा करती थीं, आज वहां कांग्रेस का मुख्यालय है। यही नहीं जो कमरा आज राहुल गांधी का है, वही कमरा कभी म्यांमार की महान नेता आन सान सू की का हुआ करता था। सू की जब 15 साल की थीं, तब वो राजधानी दिल्ली के 24 अकबर रोड में रहती थीं जो कि उनकी मां दाव किन की को अलॉट किया गया था। उनकी मां भारत में म्यांमार की राजदूत थीं। लेखक-पत्रकार रशीद किदवई ने अपनी नई किताब '24 अकबर रोड' में इसका जिक्र है। 1911 से 1925 के बीच बने इस बंगले का नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दाव किन की के सम्मान में 'बर्मा हाउस' रखा था। सू की ने अपने बचपन में खुद के लिए जिस कमरे को चुना था, वो अब कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी का कमरा है। सू ने इस कमरे को इसलिए चुना था क्योंकि इसमें एक बड़ा पियानो रखा था और हर शाम को पियानो टीचर उन्हें इसे बजाना सिखाता था। दिल्ली के इस बंगले में सीखा पियानो बाद में अपने देश में लोकतंत्र के संघर्ष के दौरान उनके बड़े काम आया।
कई साल बाद, रंगून में एक झील के किनारे मौजूद एक खस्ताहाल घर से पियानों की धुनें वहां से गुजरने वालों का ध्यान खींचने लगीं...इन धुनों को सुनकर लोगों को पता चला कि बर्मा की फौजी हुकूमत ने उनकी नेता आन सान सू की को इस जगह नजरबंद किया है...निराशा और अकेलेपन के उस दौर में सू के लिए एकमात्र राहत पियानो ही था...और नजरबंदी में डिप्रेशन से बचने के लिए वो कई-कई घंटों तक पियानो बजाती रहती थीं।
दिल्ली के 24 अकबर रोड में ही सू की ने जापानी तरीके से फूलों को सजाना भी सीखा। यहां के बगीचे में वो संजय गांधी और राजीव गांधी के साथ खेलती थीं। संजय और राजीव उनके अच्छे दोस्त थे...जिनमें से एक का जन्म सू की से एक साल पहले और दूसरे का उनसे एक साल बाद हुआ था। वो अक्सर दोनों के साथ राष्ट्रपति भवन में देखी जातीं थीं, जहां राष्ट्रपति के अंगरक्षकों से वो घोड़े की सवारी करना सीखती थीं। सू की ने अपनी स्कूल की पढ़ाई दिल्ली के सेंट जोसफ गिरजाघर के पास मौजूद जीसस एंड मैरी कॉन्वेंट स्कूल से की थी। सू ने इसके बाद लेडी श्रीराम कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन की। ऑक्सफोर्ड शिक्षित सू की राजनीति में बहुत बाद में आईं। उनका ज्यादातर वक्त भारत और ब्रिटेन में बीता। म्यांमार के मुक्ति नेता जनरल आंग सान जिनकी हत्या 1947 में ही कर दी गई थी, की बेटी 1988 में अपनी मां की देखभाल के लिए यांगून लौटीं और फिर अपने देश की मिट्टी की होकर रह गईं।
म्यांमार में लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहीं आंग सान सू की को इस साल 13 नवंबर को नजरबंदी से रिहा कर दिया गया। परंपरागत जैकेट पहने सू जब अपने मकान के गेट पर आईं तो उनके चेहरे पर मुस्कान थी। उन्होंने अपने बालों में फूल लगा रखा था। उन्होंने अपनी बर्मी भाषा में घर के बाहर मौजूद अपने समर्थकों का धन्यवाद किया जिनकी संख्या धीरे-धीरे 5000 तक पहुंच गई थी। नोबल शांति पुरस्कार विजेता 65 वर्षीय सू ने इस बार करीब साढ़े सात साल की नजरबंदी काटी है। पहले भी कई बार उन्हें नजरबंद किया जा चुका है। उनकी रिहाई के वक्त वहां मौजूद उनकी एक प्रबल समर्थक नैंग विन ने कहा, 'मैं उन्हें अपनी मां मानती हूं, बहन मानती हूं, दादी मानती हूं क्योंकि वह हमारी आजादी के नायक जनरल आन सान की बेटी हैं। उनमें भी तो उन्हीं का खून है।' सैन्य शासन के विरोध का जोखिम उठाते हुए उनके समर्थकों ने उनकी तस्वीर वाली टी-शर्ट पहन रखी थी जिस पर लिखा था-'आंग सान सू की, हम तुम्हारे साथ हैं'। इस समय म्यांमार में करीब 2200 राजनीतिक कैदी हैं।
अपने देश म्यांमार में लोकतंत्र के लिए संघर्ष के दौरान उन्हें बहुत बड़ी व्यक्तिगत क्षति भी हुई। उनके ब्रिटिश विद्वान पति माइकल एरिस की 1999 में मौत हो गई। कैंसर से जुझ रहे एरिस को बर्मा की फौजी हुकूमत ने अपनी पत्नी से मिलने आने देने के लिए वीजा नहीं दिया। सू की ने पति से मिलने के लिए देश से बाहर जाने से इनकार कर दिया क्योंकि यह तय था कि यदि वह जाती हैं तो उन्हें वापस नहीं लौटने दिया जाता।
नजरबंदी से रिहाई के बाद आन सान सूकी अपनी मुहिम को मजबूत करने में जुटी हैं...और बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना में वो भारत और चीन से खास मदद चाहती हैं...'वॉयजर' पेश करता है, सू ची का खास इंटरव्यू जिसे लिया है डॉयचे वेले ने

आजकल आपकी दिनचर्या क्या रहती है?

मेरा दिन तो बहुत-बहुत व्यस्त रहता है। आज ही की बात करें तो सुबह मेरी दो तीन अपॉइंटमेंट्स थीं, फिर दोपहर में भी दो जगह जाना था और देखिए रात हो गई है लेकिन अब भी मेरा काम खत्म नहीं हुआ है।

कैसी अपॉइंटमेंट्स होती हैं?

मैं राजनयिकों से मिल रही हूं। राजनीतिक दलों से और बाकी लोगों से मिल रही हूं, फिर हमारी पार्टी नेशनल लीग ऑफ डेमोक्रैसी की बैठकें भी होती हैं। फोन पर भी लोगों से बात होती है, उन पत्रकारों से भी मिलना होता है जो बर्मा आने में कामयाब हो गए हैं।

नजरबंदी से रिहा होने के बाद आपने शहर में सबसे बड़ा बदलाव क्या पाया?

मुझे लगता है कि मोबाइल फोन की तादाद। जैसे ही मैं बाहर निकली मैंने देखा कि लोग मोबाइल फोन से तस्वीरें ले रहे थे। इसका मतलब है कम्यूनिकेशन में सुधार हुआ है।

और बर्मा का समाज? उसमें आपने कुछ बदलाव पाए?

महंगाई बहुत बढ़ गई है और लोग इस बात को लेकर बहुत परेशान हैं। हर आदमी बढ़ती कीमतों की बात करता है। नौजवानों के नजरिए में भी काफी सुधार हुआ है। वे राजनीति प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं और वे पहले से बहुत ज्यादा तेज और सक्रिय हैं।

जब आप रिहा हुईं तो बहुत सारे नौजवान आपसे मिलने आए। बर्मा के नौजवानों से आपकी क्या उम्मीदें हैं?

उन्हें समझना होगा कि देश में बदलाव उन्हीं को लाना है और उन्हें मुझ पर या एनएलडी पर निर्भर नहीं रहना है। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे, लेकिन मैं चाहती हूं कि उनके अंदर इतना आत्मविश्वास पैदा हो कि वे खुद यह सब कर सकें।

आप अपनी पार्टी एनएलडी का क्या भविष्य देखती हैं?

हमारे साथ लोगों का पूरा समर्थन है इसलिए हम राजनीतिक ताकत के रूप में खड़े रहेंगे। अधिकारी हमारी पार्टी का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की कोशिश कर रहे हैं और इसके खिलाफ मैं अदालत में भी लड़ रही हूं। लेकिन वह कानूनी मसला है। राजनीतिक सच्चाई यही है कि हमें खुद पर भरोसा है, लोग हमारे साथ हैं और यही हमें बर्मा की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बनाता है।

क्या आपने रिहा होने के बाद सरकार से संपर्क किया है?

नहीं, अभी तो नहीं, हालांकि अपने हर भाषण में मैं उन्हें संदेश तो दे ही रही हूं। हर इंटरव्यू में मैंने यह बात कही है कि मैं बातचीत चाहती हूं। मुझे लगता है कि हमें मतभेदों पर बात करनी चाहिए और एक समझौते पर पहुंचना चाहिए।

लेकिन आपने बातचीत को शुरू करने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया?

हम सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं जो ज्यादा दूर नहीं है।

बर्मा में कई नस्ली अल्पसंख्यक समुदाय हैं जिनके बहुसंख्यकों से संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। आप उन समुदायों तक कैसे पहुंचना चाहती हैं?

उनसे संपर्क की हमारी कोशिश सालों से चल रही है और मैं दावा कर सकती हूं कि हमें कामयाबी मिली है। 1990 में चुनाव लड़ने वाली पार्टियों से हमारे मजबूत संबंध हैं।

चीन के लिऊ शियाओबो को मिला शांति का नोबेल एक बड़ा विवाद बन गया है। आप खुद नोबेल जीत चुकी हैं. आप इस बारे में क्या कहेंगी?

नॉर्वे की नोबेल कमेटी की मैं इज्जत करती हूं और मुझे यकीन है कि लिऊ को पुरस्कार के लिए चुनने के पीछे अहम वजह रही होंगी। मैं तो लिऊ के बारे में ज्यादा नहीं जानती क्योंकि पिछले सात साल से मैं नजरबंद थी। जितना भी मैं जानती हूं बस रेडियो पर ही सुना है, लेकिन नोबेल कमेटी ने उन्हें चुना है तो उसके कारण होंगे।

यूरोप में लोग सोच रहे हैं कि बर्मा की मदद के लिए क्या करें। उन्हें क्या सलाह है?

पहले तो बड़ी मदद यही होगी कि सारे यूरोपीय देश एक सुर में बात करें। यूरोपीय संघ में ही अलग अलग आवाजें सुनाई देती हैं और मुझे लगता है कि इससे बर्मा का विपक्ष कमजोर होता है। अगर यूरोपीय देश मिलकर कुछ कदम उठाने के लिए मांग करें, मसलन राजनीतिक कैदियों की रिहाई, राजनीतिक प्रक्रिया में दूसरों को शामिल किया जाना और बातचीत वगैरह, तो बड़ी मदद होगी।

क्या किसी खास देश को आप ज्यादा सक्रिय देखना चाहेंगी?

आप जर्मनी से मुझसे बात कर रहे हैं तो मैं चाहूंगी कि जर्मनी ही ज्यादा सक्रिय हो।

बर्मा पर लगे प्रतिबंधों की बात करें, तो आपने कहा है कि इनके बारे में राय बनाने के लिए आपको वक्त चाहिए. आप क्या सोच रही हैं?

अब तक मुझे नहीं पता है कि अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों ने लोगों की जिंदगी पर कितना असर डाला है। लेकिन आवाजें उठ रही हैं जिन्हें सुना जाना चाहिए। इसलिए अभी हमें सच का पता लगाना है। अभी मुझे रिहा हुए एक महीना ही हुआ है और इस मुद्दे पर मैं ज्यादा नहीं जान पाई हूं। मैं आईएमएफ और एडीबी की ताजा रिपोर्ट पढ़ने का इंतजार कर रही हूं।

बर्मा में पश्चिम का कितना असर है? और इससे तुलना करें तो आप भारत और चीन की भूमिका को कैसे देखती हैं?

मुझे लगता है कि चीन और भारत और पश्चिम की भूमिकाएं अलग अलग हैं। मैं नहीं चाहती कि इनमें प्रभाव डालने के लिए किसी तरह का मुकाबला हो। ऐसा नहीं है कि अपना भाग्य हम खुद नहीं बना सकते। लेकिन भारत और चीन हमारे नजदीकी पड़ोसी हैं, तो उन्हें बाकी देशों के मुकाबले कुछ फायदे तो हैं।

यानी पश्चिम की तरफ से बर्मा के लिए जो किया जाता है वो ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है?

नहीं, बिल्कुल महत्वपूर्ण है। लेकिन यह निर्भर करता है कि पश्चिम की तरफ से क्या कदम उठाए जा रहे हैं। इसीलिए मैंने पहले कहा कि पश्चिमी देश अपनी कोशिशों में समन्वय लाएं, उससे हमें ज्यादा मदद मिलेगी।

भारत और चीन से आपकी क्या उम्मीदें हैं?

हम चाहेंगे कि वे हमें प्रक्रिया का हिस्सा बनाएं। मसलन हम चाहेंगे कि भारत और चीन सबसे पहले तो हमें अपनी बात कहने का मौका दें। दोनों के साथ हमारा संपर्क बहुत सीमित है। चीन के मुकाबले भारत सरकार से हमारा संपर्क ज्यादा है। असल में चीन की सरकार से तो कोई संपर्क है ही नहीं। हम चाहते हैं कि उनसे संपर्क हो और वे हमारी बात सुनें कि हम उन्हें पड़ोसी के तौर पर कैसे देखते हैं और उनसे दोस्ती करना चाहते हैं।

आने वाले हफ्ते में आपकी क्या योजनाएं हैं?

एक इंसान है जिससे दुनिया में मुझे सबसे ज्यादा डर लगता है। वो है मेरी अपॉइंटमेंट बुक रखने वाला। बस वही बताएगा कि क्या करना है।

इंटरव्यू: थॉमस बैर्थलाइन
साभार - http://www.dw-world.de/dw/article/0,,6345469,00.html

रविवार, 21 नवंबर 2010

प्रो. स्टीफन हॉकिंग से 10 सवाल

सवाल 01 - अगर ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, तो फिर दुनिया की हर संस्कृति में भगवान को सर्वशक्तिमान और सर्वोच्च सत्ता क्यों माना गया है? ईश्वर की अवधारणा सार्वभौमिक यानि यूनिवर्सल क्यों है?


प्रो. हॉकिंग - मैं ये दावा नहीं करता कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। ईश्वर या भगवान एक नाम है जिससे लोग अपने अस्तित्व को जोड़ते हैं और अपनी जिंदगी के लिए जिसके शुक्रगुजार होते हैं। लेकिन मेरी समझ से सौरमंडल के इस तीसरे ग्रह पर जिंदगी और अपनी मौजूदगी के लिए भौतिक विज्ञान के नियमों का आभार मानना चाहिए, न कि भगवान जैसी किसी सार्वजनिक सत्ता का जिसके साथ व्यक्तिगत रिश्ता जोड़कर हम खुद को भुलावे में रखते हैं।

सवाल 02 – क्या कभी ब्रह्मांड का भी अंत होगा? अगर हां, तो इस अंत के बाद क्या होगा?

प्रो. हॉकिंग - एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जरवेशंस बताते हैं कि हमारा ब्रह्मांड फैल रहा है और इसके फैलने की रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही है। ब्रह्मांड हमेशा ही फैलता रहेगा और इसके साथ-साथ ये और भी ज्यादा अंधकारपूर्ण और खाली जगहों को जन्म देता रहेगा। ब्रह्मांड का जन्म बिगबैंग की घटना से हुआ था, लेकिन इसका कोई अंत नहीं है। कोई ये भी पूछ सकता है कि बिगबैंग से पहले क्या था, लेकिन इसका जवाब भी ये होगा कि जैसे दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचकर दक्षिण दिशा लुप्त हो जाती है, उसी तरह बिगबैंग से पहले कुछ भी नहीं था। क्योंकि बिगबैंग एक शुरुआत है, इस शुरुआत से पहले कैसे कुछ हो सकता है।

सवाल 03 – क्या आपको लगता है कि मानव सभ्यता का वजूद इतने लंबे समय तक बरकरार रहेगा कि वो अंतरिक्ष में गहरे और गहरे छलांग लगा सके?


प्रो. हॉकिंग - मुझे लगता है कि मानव जाति के पास अपने अस्तित्व को तबतक बचाए रखने के बेहतर मौके हैं जब तक कि हम अपने सौरमंडल को कॉलोनाइज नहीं कर लेते। हालांकि इस पूरे सौरमंडल में हमारे लिए पृथ्वी जैसी माकूल कोई दूसरी जगह नहीं है, इसलिए अभी ये स्पष्ट नहीं है कि जब ये धरती ही जीवन के किसी भी स्वरूप के रहने के लायक नहीं रहेगी, ऐसे हालात में मानव जाति बचेगी या नहीं। मानव जाति के वजूद को ज्यादा से ज्यादा लंबे वक्त तक बरकरार रखने के लिए दूसरे सितारों की दुनिया तक हमारा पहुंचना जरूरी है। अभी इसमें काफी वक्त है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि तब तक हम पृथ्वी पर खुद को बचाए रखने में कामयाब रहेंगे।

सवाल 04 – अगर आप अल्बर्ट आइंस्टीन से बात कर सकते, तो उनसे क्या कहते?


प्रो. हॉकिंग - मैं उनसे कहता कि वो आखिर ब्लैक होल्स में यकीन क्यों नहीं करते। उनके रिलेटिविटी के सिद्धांत के फील्ड समीकरण बताते हैं कि एक विशाल सितारा या गैसों का सघन बादल खुद में ही नष्ट होकर एक ब्लैक होल को जन्म दे सकता है। आइंस्टीन खुद इस तथ्य को जानते थे, लेकिन फिरभी उन्होंने किसी तरह खुद को समझा लिया था कि किसी भी धमाके की तरह हर विस्फोट द्रवमान या वजन को बाहर फेंक देने के लिए ही होता है। यानि वो मानते थे कि सितारों की मौत होते ही एक धमाके के साथ उसका सारा पदार्थ बाहर छिटक जाता है। लेकिन अगर विस्फोट हो ही नहीं और सितारे की मौत होते ही उसका सारा द्रव्यमान बस उसके एक ही बिंदु में सिमटकर रह जाए तो?

सवाल 05 – ऐसी कौन सी वैज्ञानिक खोज या विकास है जिसे आप अपने जीवनकाल में ही साकार होते हुए देखना चाहते हैं?


प्रो. हॉकिंग - मैं चाहूंगा कि मेरे जीवनकास में नाभिकीय फ्यूजन ही ऊर्जा का व्यावहारिक जरिया बन जाए। इससे हमें ऊर्जा की अक्षय आपूर्ति होती रहेगी और वो भी ग्लोबल वॉर्मिंग या प्रदूषण के खतरों के बगैर।

सवाल 06 – मृत्यु के बाद हमारी चेतना का क्या होता है? आप क्या मानते हैं?


प्रो. हॉकिंग - मैं मानता हूं कि हमारा मस्तिष्क एक कंप्यूटर और चेतना उसके एक प्रोग्राम की तरह है। ये प्रोग्राम उस वक्त काम करना बंद कर देता है, जब उसका कंप्यूटर टर्न ऑफ हो जाता है। सिद्धांतत: हमारी चेतना की रचना न्यूरल नेटवर्क पर फिर से की जा सकती है। लेकिन ऐसा करना बेहद मुश्किल है, इसके लिए मृतक की सारी स्मृतियों की आवश्यकता पड़ेगी।

सवाल 07 – आप एक ब्रिलिएंट फिजिसिस्ट के तौर पर मशहूर हैं, आपकी ऐसी कौन सी आम रुचियां हैं, जो शायद लोगों को हैरान कर सकती हैं?


प्रो. हॉकिंग - मुझे हर तरह का संगीत पसंद है, पॉप, क्लासिकल और ऑपेरा, हर तरह का। मैं अपने बेटे टिम के साथ मिलकर फॉर्मूला वन रेसिंग का भी मजा लेता हूं

सवाल 08 – क्या आपको कभी ऐसा लगा कि आपकी शारीरिक अक्षमता की वजह से अपने शोध में आपको फायदा पहुंचा, या इससे आपके अध्ययन में रुकावट आई?


प्रो. हॉकिंग - हालांकि मैं खासा दुर्भाग्यशाली रहा कि मोटर-न्यूरॉन डिसीस जैसी बीमारी की चपेट में आ गया, इसके अलावा जीवन के दूसरे सभी मामलों में मैं खासा भाग्यशाली रहा। मैं खुद को काफी खुशनसीब समझता हूं कि मुझे थ्योरेटिकल फिजिक्स में काम करने का मौका मिला, और अपनी लोकप्रिय किताबों की मदद से मैं जैकपॉट को हिट करने में कामयाब रहा। ये काम के ऐसे कुछ ऐसे गिने-चुने क्षेत्र है, जहां शारीरिक अक्षमता से कोई फर्क नहीं पड़ता।

सवाल 09 – जिंदगी के सभी रहस्यों के जवाब लोग आपसे जानने की अपेक्षा रखते हैं, क्या इससे आपको एक बड़ी जिम्मेदारी का बोध नहीं होता?


प्रो. हॉकिंग - देखिए, जिंदगी की सभी समस्याओं का हल यकीनन मेरे पास नहीं है। फिजिक्स और गणित ये तो बता सकते हैं कि ब्रह्मांड का जन्म कैसे हुआ, लेकिन इनसे मानवीय व्यवहार के रहस्यों को नहीं समझा जा सकता। क्योंकि अभी बहुत से सवालों को सुलझाना बाकी है। लोगों को समझने के मामले में मैं अनाड़ी हूं। दूसरे लोगों की तरह मैं भी अब तक ये नहीं समझ पाया हूं कि लोग किसी चीज पर विश्वास कैसे कर लेते हैं, खासतौर पर महिलाएं।

सवाल 10 – क्या आपको लगता है कि कभी ऐसा वक्त भी आएगा, जब मानव जाति फिजिक्स के बारे में सबकुछ जान-समझ जाएगी?


प्रो. हॉकिंग - मुझे लगता है, कि ऐसा कभी नहीं होगा