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सोमवार, 16 अगस्त 2010

अंतरिक्ष का ओवन- शुक्र

अंतरिक्ष अन्वेषण की अब तक की कोशिशों के दौरान हमने सूर्य के करीब मौजूद सौरमंडल के पहले दो ग्रहों पर बहुत कम नजर डाली है। जबकि पृथ्वी के दूसरी ओर मौजूद मंगल, बृहस्पति और शनि के बारे में हमने व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन किए हैं। सौरमंडल का पहले ग्रह बुध और दूसरे ग्रह शुक्र के बारे में हमारी जानकारी बेहद कम है। शीत युद्ध के दौरान इन ग्रहों को कुछ मिशन्स भेजे गए थे, फिर लंबे समय तक यहां कोई साइंटिफिक मिशन नहीं भेजा गया। नासा अब हमारे पड़ोसी ग्रह शुक्र पर एक लैंडर मिशन ‘सेज’ भेजने की योजना पर काम कर रहा है। इस अवसर पर शुक्र ग्रह के बारे में पेश है वायेजर की खास प्रस्तुति -
हमारे सौरमंडल का दूसरा ग्रह, ऐसी अनोखी दुनिया है जिसके बारे में हम अब भी बहुत कम जानते हैं। शुक्र ग्रह के बारे में मशहूर है कि ये ऐसी जगह है, शैतान भी जहां कदम रखने से घबराता है। ऐसा क्यों ? इसे ऐसे समझिए मान लीजिए कि आपने ओवन को ऑन करके उसमें अपना आईपॉड रख दिया, कुछ ही देर में आईपॉड की जगह आपको पिघली एल्यूमीनियम और प्लास्टिक का एक खदबदाता सा ढेर नजर आएगा। ये ओवन शुक्र ग्रह की जमीन है और ये आईपॉड वहां भेजा गया एक स्पेसक्राफ्ट। अब मान लीजिए कि आपने एक ऐसी नई डिवाइस बना ली है जो ओवन में आईपॉड के पिघलने की प्रक्रिया को थोड़े वक्त के लिए टाल कर उसे लंबा खींच सकती है। शुक्र ग्रह पर किसी रोवर मिशन को भेजने के लिए भी बिल्कुल ऐसा ही करना होगा।
शुक्र ग्रह पर पहली लैंडिंग 40 साल पहले हुई थी, जब सोवियत प्रोब वेरेना-7 पहली बार शुक्र की पथरीली जमीन पर उतरा था। लैंडिग के 25 मिनट बाद ही वेरेना-7 की बैटरियां खत्म हो गईं, लेकिन तब तक ये प्रोब शुक्र की जमीन के बारे में काफी जानकारी भेज चुका था। शुक्र के बारे में अब भी बहुत से सवालों के जवाब हम नहीं जानते और जिन्हें तलाशने के लिए हमें एक बार फिर शुक्र ग्रह पर जाना होगा। शुक्र ग्रह पर कभी महासागर भी थे और शायद उसमें जिंदगी भी कुछ रूप भी पनप रहे होंगे। लेकिन इस ग्रह पर कुछ ऐसा हुआ कि सारा महासागर बहुत जल्दी ही भाप बनकर उड़ गया। यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मिशन वीनस एक्सप्रेस ने बताया है कि शुक्र ग्रह का सारा हाइड्रोजन तेजी से अंतरिक्ष में लीक होता जा रहा है। सूरज की किरणें जब पानी के अणुओं को तोड़ती हैं तो उसमें से हाइड्रोजन निकलता है।
राडार और इंफ्रारेड मैपिंग से हमें इस बात के काफी सबूत मिले हैं कि शुक्र की जमीन पर मौजूद ऊंचे-ऊंचे विशाल पठार कभी इस ग्रह के महाद्वीप थे। अगर इस ग्रह पर गए किसी लैंडर मिशन को यहां की जमीन पर ग्रेनाइट मिलता है तो इस तथ्य की पुष्टि हो जाएगी। क्योंकि ग्रेनाइट तभी बनता है जब बेहद शक्तिशाली दबाव पर लावा और समुद्र का पानी आपस में मिलते हैं। ये भी मुमकिन है कि जब समंदर सूखने लगा होगा तब समंदर के बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीवों ने यहां के वायुमंडल को अपना घर बना लिया होगा। क्योंकि शुक्र का वायुमंडल बेहद घना है, हालांकि इसमें मुख्य रूप से गैस के रूप में सल्फ्यूरिक एसिड ही है, लेकिन फिर भी पानी की भाप के बादल भी भारी तादाद में मौजूद हैं। शुक्र के वातावरण की पर्त बेहद मोटी है और सतह से करीब 60-70 किलोमीटर की ऊंचाई पर वातावरण की ऐसी पर्त मिलती है, जहां पानी की भाप के बेहद घने बादल मौजूद हैं और यहां का तापमान सतह से बेहद कम करीब 60 डिग्री सेंटीग्रेड तक है। शुक्र ग्रह में केवल यही ऐसी जगह है, जहां हम बसने की सोंच सकते हैं। ये बात अलग है कि इसके लिए हमें अपनी बस्तियां हवा में ही बनानी होंगी।
शुक्र ग्रह के ऐसे कई रहस्य हैं जिन्हें समझने के लिए नासा अब वहां अपना पहला लैंडर मिशन भेजने की तैयारी कर रहा है। शुक्र पर लैंड करने वाले नासा के इस पहले मिशन का नाम होगा सरफेस एंड एटमॉस्फियर जियोकेमिकल एक्सप्लोरर यानि ‘सेज।’ लैंडर मिशन सेज के साथ एक रोवर भी होगा, जो कुछ देर तक शुक्र की जमीन पर चहल-कदमी करके वैज्ञानिक प्रयोग करेगा और फिर इसके बाद 500 डिग्री सेंटीग्रेड के प्रचंड तापमान से दहकती शुक्र की उस नारंगी दुनिया में पिघलने लगेगा, बिल्कुल ओवन में रखे उस आईपॉड की तरह।

शुक्र का मानव मिशन, जो कभी लांच ही नहीं हुआ!

हमारा पड़ोसी ग्रह शुक्र, आकार और भौगोलिक रूप से पृथ्वी जैसा ही पथरीला ग्रह, लेकिन 3 करोड़ 80 लाख किलोमीटर के फासले ( शुक्र की पृथ्वी से न्यूनतम दूरी) ने एक ग्रह को जीवन का वरदान दे दिया, जबकि दूसरे को सूखा-बेजान और भट्ठी से भी गर्म बना डाला। साइंस फिक्शन में कई ऐसी कहानियां हैं जिनमें वीनस यानि शुक्र ग्रह पर हवा में तैरती मानव बस्तियों की कल्पना की गई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि शुक्र की सतह का तापमान 500 डिग्री सेंटीग्रेड है और सतह पर वायुदाब पृथ्वी से करीब 95 फीसदी ज्यादा है। यानि अगर आप 500 डिग्री के भीषण तापमान को झेल सकने वाले खास सूट को पहनकर शुक्र की धरती पर खड़े हों तो भी आप सुरक्षित नहीं होंगे, क्योंकि शुक्र का भयानक वायुमंडलीय दबाव ही आपकी जान ले लेने के लिए काफी होगा। लेकिन ऐसा शुक्र की सतह पर है, सतह से ऊपर नहीं। शुक्र की सतह से 50 किलोमीटर ऊपर कार्बन डाई ऑक्साइड की सघन हवा और सल्फ्यूरिक एसिड के बादलों के बीच तापमान और वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी की सतह जैसा ही है। इसलिए कल्पना की जा रही है कि शुक्र के बादलों में जमीन की भट्ठी से 50 किलोमीटर ऊपर हवा में तैरती मानव बस्तियां बसाई जा सकती हैं।
लेकिन शुक्र ग्रह के बादलों पर बसने के सपने देखने से पहले वहां जाना और उस अनोखी दुनिया को करीब से जानना जरूरी है। बेहद कम लोगों को ये बात मालूम है कि चंद्रमा पर गए अपोलो मिशन की कामयाबी से उत्साहित नासा के वैज्ञानिकों ने शुक्र ग्रह पर मानव मिशन भेजने की तैयारी कर ली थी। जो ऐन वक्त पर किसी गोपनीय वजह से रद्द करनी पड़ी थी।

1960 के बीच के महीनों में जब कि चंद्रमा पर उतरने की तैयारी चल ही रही थी, नासा ने एक अजीब सपना देखा। नासा वैज्ञानिकों ने योजना बनाई कि अपोलो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर एक मानव मिशन शुक्र ग्रह के सफर पर भेजा जाए। शुक्र पर पहली बार भेजे जाने वाले इस तीन सदस्यीय मानव मिशन की सारी रूपरेखा तैयार कर ली गई और तीन स्टेज वाला एक खास स्पेसक्राफ्ट भी तैयार कर लिया गया। नासा की योजना तीन सदस्यीय मानव मिशन को शुक्र ग्रह पर लैंड कराने की नहीं थी, बल्कि नासा वैज्ञानिक शुरुआत में मानव मिशन को बस शुक्र ग्रह के करीब से गुजारना चाहते थे। सारी तैयारी पूरी हो गई और तय हो गया कि शुक्र को जाने वाला पहला मानव मिशन सैटर्न फाइव रॉकेट के जरिए 31 अक्टूबर 1973 को लांच किया जाएगा, जो 3 मार्च 1974 को शुक्र के करीब से, यानि शुक्र की जमीन से लगभग 5000 किलोमीटर की ऊंचाई से गुजरेगा और फिर मिशन पूरा करके 1 दिसंबर 1974 को धरती पर वापस आ जाएगा। शुक्र तक जाने वाले करीब एक साल की अवधि वाले इस मानव मिशन की सारी तैयारियां बेहद गोपनीय ढंग से पूरी की गईं। लेकिन फिर न जाने ऐसा क्या घटा कि 31 अक्टूबर 1973 की मिशन वीनस की लांचिंग कभी नहीं हो सकी।

शुक्र तक पहले पहुंचने की होड़!

मेरे एक 'स्पेस शो' के दौरान एक बच्चे ने मुझसे पूछा कि दूसरे ग्रहों के लिए अंतरिक्ष अभियानों की शुरुआत कब हुई और वो ग्रह कौन सा था, जिसके लिए पहला स्पेस मिशन भेजा गया? मैंने उस छात्र को ये तो बता दिया कि हमने पहला प्लेनेटरी स्पेस मिशन वीनस यानि शुक्र ग्रह को भेजा था, लेकिन मिशन की डेट्स को लेकर मैं थोड़ा कन्फ्यूज था, इसलिए मैंने इस सवाल का पूरा जवाब देने के लिए उस छात्र की बात इसरो के एक प्लेनेटरी साइंटिस्ट से कराई और बच्चे को उसका जवाब मिल गया। लेकिन अब मेरे मन में वीनस यानि शुक्र ग्रह को लेकर कई सारे सवाल थे, जिनके जवाब मैंने तलाशने की कोशिश की है।
12 फरवरी 1961 वो तारीख थी जब, हमने पृथ्वी के अलावा किसी और ग्रह के लिए पहला स्पेस मिशन भेजा। ये मिशन था वेरेना-1 प्रोब जो धरती को पीछे छोड़ते हुए बढ़ा जा रहा था शुक्र ग्रह की ओर, और इस मिशन की कमांड और कट्रोल थी पूर्व सोवियत संघ के वैज्ञानिकों के हाथों। अकसर हमें सूरज डूबने के बाद पश्चिमी आसमान या सुबह सूरज निकलने से ठीक पहले पूरब दिशा में सबसे चमकीला नजर आने वाला ग्रह शुक्र, जो भोर या साझ के तारे के नाम से भी मशहूर है। पहले प्लेनेटरी मिशन के लिए इसी को चुना गया और इसकी बड़ी वजह ये थी कि शुक्र ग्रह को भौगोलिक रूप से पृथ्वी का जुड़वा कहा जाता है।
शुक्र को भेजा गया पहला मिशन सोवियत प्रोब वेरेना-1 डायरेक्ट इम्पैक्ट ट्राजेक्टरी यानि सीधे-सीधे शुक्र पर लैड करने के लिए भेजा गया था, लेकिन लांचिग के सात दिन बाद जब वेरेना-1 धरती से करीब बीस लाख किलोमीटर की दूरी पर था, इसका संपर्क कंट्रोल रूम से टूट गया और ये अंतरिक्ष में कहीं खो गया। सोवियत स्पेस एजेंसी और नासा दोनों ही अंतरिक्ष अभियानों में बराबरी की हो़ड़ में जुटे थे, नासा ने भी मैरिनर मिशन के साथ अपना शुक्र अभियान छेड़ दिया। लेकिन सोवियत वेरेना-1 की तरह शुक्र अभियान पर निकला नासा का मिशन मैरिनर-1 भी नाकामयाब रहा। लेकिन नासा का मैरिनर-2 मिशन सफल रहा और 14 दिसंबर 1962 को मैरिनर-2 शुक्र ग्रह की कक्षा में प्रवेश करने में सफल रहा। इसी के साथ मैरिनर-2 दुनिया का पहला इंटरप्लेनेटरी मिशन बन गया। मैरिनर-2 ने बताया कि शुक्र ग्रह के सल्फरडाई ऑक्साइड के बादल बेहद गर्म हैं और शुक्र की सतह का तापमान करीब 425 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो सकता है।
सोवियत संघ के इंटरप्लेनेटरी मिशन वेरेना के तहत शुक्र को भेजा गया प्रोब वेरेना-3,1 मार्च 1966 को शुक्र की सतह पर लैंड करने में कामयाब रहा। वेरेना-3 हमारी बनाई वो पहली चीज थी जो किसी दूसरे ग्रह के वायुमंडल में प्रवेश करने और उसकी सतह पर लैंड करने में कामयाब रही थी। हालांकि शुक्र पर लैंड करते ही वेरेना-3 का संचार सिस्टम खराब हो गया और एक इतिहास बनाने के बावजूद वेरेना-3 हमें शुक्र की दुनिया के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सका।

18 अक्टूबर 1967 को सोवियत प्रोब वेरेना-4 ने शुक्र के वायुमंडल में सफलतापूर्वक प्रवेश किया और शुक्र की धरती पर लैंड करने के दौरान हवा में ही इसने तमाम प्रयोग कर डाले और शुक्र के वायुमंडल के बारे में पहली बार हमें जानकारी दी। वेरेना-4 ने बताया कि शुक्र के वायुमंडल में 90 से 95 फीसदी तक कार्बन डाई ऑक्साइड मौजूद है और हमारे लिए जहरीली और अजनबी ये हवा धरती के मुकाबले कई गुना ज्यादा सघन है। अपने पैराशूट की मदद से वेरेना-4 शुक्र की सतह पर लैंड कर गया और शुक्र की धरती से हमें 93 मिनट तक नई-नई जानकारियां भेजता रहा। वेरेना-4 ने बताया कि 500 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान वाली शुक्र की सतह किसी भट्ठी से भी ज्यादा दहक रही है। लैंड करने के 93 मिनट बाद वेरेना-4 से संपर्क टूट गया और सूरज की प्रचंड गर्मी में ये प्रोब पूरी तरह पिघल गया। वेरेना-4 के पिघल जाने के बाद अगले ही दिन यानि 19 अक्टूबर 1967 को नासा का मिशन मैरिनर-5 शुक्र ग्रह के करीब से गुजरा। नासा ने मंगल अभियान पर गए अपने पहले स्पेसक्राफ्ट मैरिनर-4 के बैकअप के तौर पर मैरिनर-5 को बनाया था। लेकिन मैरिनर-4 की शानदार कामयाबि के बाद नासा ने इसके बैकअप मैरिनर-5 को शुक्र के सफर पर भेज दिया। मैरिनर-5 ने वीनस फ्लाईबाई से पता लगाया कि शुक्र ग्रह का वायुमंडल किन-किन गैसों से बना है, उसका दबाव कितना है और शुक्र की हवा का घनत्व कितना है।
सोवियत वेरेना मिशन और नासा का मैरिनर अभियान शुक्र ग्रह की टुकड़ों-टुकड़ों में तस्वीर पेश कर रहे थे। इन टुकड़ों को मिलाकर शुक्र की असली तस्वीर देखने-समझने के लिए वैज्ञानिक मजबूर हो गए और तब अंतरिक्ष के क्षेत्र का पहला अंतरराष्ट्रीय सहयोग सामने आया। सोवियत और अमेरिकी वैज्ञानिक एकसाथ मिलकर बैठे और वेरेना और मैरिनर मिशन की जानकारियां साझा की गईं।
मिशन वीनस के अपने शुरुआती मिशन्स से सबक लेते हुए सोवियत वैज्ञानिकों ने जनवरी 1969 को पांच दिन के अंतर से दो प्रोब वेरेना-5 और वेरेना-6 शुक्र ग्रह को रवाना कर दिए और ये दोनों एक दिन के अंतर से 16 मई और 17 मई को उसी साल शुक्र पहुंच गए। ये दोनों प्रोब शुक्र के बेहद घने वायुमंडल में दाखिल हुए और रास्ते में कई वैज्ञानिक प्रयोग करते और उनके डेटा धरती को भेजते हुए दोनों शुक्र की जमीन की ओर बढ़ चले लेकिन वायुमंडलीय दबाव इतना जबरदस्त था कि वेरेना-5 और 6 शुक्र की जमीन से करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर ही नष्ट हो गए।
सोवियत वैज्ञानिकों ने अगले चार साल के दौरान वेरेना कार्यक्रम के तहत शुक्र पर चार प्रोब्स और भेजे। वेरेना-11 और 12 ने शुक्र के गर्म और तूफानी बादलों में कौंधने वाली बिजली का पता लगाया। 1 मार्च 1982 को वेरेना-13 और 5 मार्च 1982 को वेरेना-14 शुक्र की धरती पर लैंड करने में कामयाब रहे। इन दोनों प्रोब्स ने रंगीन तस्वीरें भेजकर शुक्र की दुनिया की पहली झलक हमें दिखाई। यहां लगी शुक्र की धरती की ये तस्वीर भी वेरेना-13 की ली हुई है। वेरेना-13 ने अपने उपकरण एक्स-रे फ्लोरेसेंस स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से शुक्र की मिट्टी के नमूनों की जांच की। वेरेना-14 ने अपने ही कैमरे की पहले अलग हो चुकी कैप पर लैंडिंग की, इस वजह से वो शुक्र की मिट्टी को छू नहीं सका। शुक्र की धरातल की जो भी तस्वीर हम देखते हैं वो वेरेना-13 और 14 प्रोब्स की ही ली हुई है। कुछ मिनटों तक काम करते रहने के बाद शुक्र पर दिन के 500 डिग्री सेंटीग्रेड के भीषण तापमान में ये दोनों प्रोब पिघलने लगे और कुछ ही पलों में इनका संपर्क धरती से टूट गया।

आइए चलें, शुक्र की दहकती दुनिया में


पृथ्वी का जुड़वा ग्रह शुक्र, दोनों का आकार और वजन लगभग एक सा। सौरमंडल के किसी दूसरे ग्रह की अपेक्षा, शुक्र का परिक्रमा पथ पृथ्वी के परिक्रमा मार्ग के ज्यादा नजदीक से होकर गुजरता है। फिरभी, इतने करीब होकर भी ये जुड़वा ऐसे हैं, जिनकी प्रकृति बात एक-दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाती। पृथ्वी को पानी और ऑक्सीजन की जिंदगी का वरदान मिला है, जबकि शुक्र इससे बिल्कुल विपरीत है। सौरमंडल का दूसरा ग्रह शुक्र सूरज से इतने करीब है कि इस ग्रह का सारा पानी भाप बनकर उड़ चुका है। शुक्र पर पृथ्वी से दसियों गुना ज्यादा घने बादल हैं,लेकिन इनमें से ज्यादातर सल्फ्यूरिक एसिड यानि गंधक के तेजाब की भाप से बने हैं। शुक्र की दुनिया सूरज की सीधी किरणों से तो दहकती ही है, साथ ही यहां लगातार फूटते ज्वालामुखी और खौलते लावे का साम्राज्य है। सल्फ्यूरिक एसिड यानि गंधक के तेजाब की भाप इन्हीं ज्वालामुखियों के विस्फोट से निकलती है, जिससे शुक्र के बादल और भी घने होते चले जाते हैं। ये बादल इतने घने हैं कि शुक्र की कक्षा से भी देखने पर इस ग्रह की जमीन नजर नहीं आती। शुक्र का चुंबकीय क्षेत्र तो है, लेकिन ये पृथ्वी के जैसा शक्तिशाली कवच नहीं है, बल्कि ये इतना कमजोर है कि जैसे ही सौर विकिरण के तूफान सूरज से फूटकर इससे टकराते हैं, ये बिखर जाता है और खतरनाक सौर विकिरण इस ग्रह को और भी ज्यादा सुखा डालता है। कमजोर चुंबकीय क्षेत्र की वजह से सौर तूफान के थपेड़ों ने इस ग्रह से सूख चुके पानी के सारे हाइड्रोजन को इस ग्रह से बाहर फेंक दिया है। शुक्र की सतह का तापमान 500 डिग्री सेंटीग्रेड है, वायुमंडलीय दबाव धरती के मुकाबले करीब 95 गुना ज्यादा और यहां बहने वाली तूफानी हवाओं की रफ्तार है 360 किलोमीटर प्रति घंटा।
शुक्र ग्रह के बारे में ये तमाम जानकारियां जुटाई हैं 1990-91 के नासा के प्रोजेक्ट मैगेलेन और 2005 में शुक्र पर भेजे गए यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मिशन वीनस एक्सप्रेस ने। 16 वीं शताब्दी के पुर्तगाली दुस्साहसी जहाजी मैगेलन के नाम पर आधारिता नासा का ये वीनस मिशन 4 मई 1989 को लांच किया गया था, 10 अगस्त 1990 को स्पेसक्राफ्ट मैगेलेन शुक्र की कक्षा मे पहुंच गया था। प्रोजेक्ट मैगेलेन ने शुक्र के 98 फीसदी की मैपिंग कर इस ग्रह का पहला भौगोलिक नक्शा बनाया। मैगेलेन ने बताया कि शुक्र के वातावरण में सल्फर यानि गंधक भरी पड़ी है, इससे वहां ज्वालामुखियों की जारी सक्रियता का पता चलता है।
9 नवंबर 2005 को लांच हुआ यूरोपियन स्पेस एजेंसी का स्पेसक्राफ्ट वीनस एक्सप्रेस 11 अप्रैल 2006 को शुक्र की ध्रुवीय कक्षा में स्थापित हुआ था। शुक्र ग्रह की धरती और इस अनोखी दुनिया के तापमान की जांच के साथ इस ग्रह के बादलों, वायुमंडल के प्लाज्मा जैसे माहौल का गहराई से अध्ययन करना वीनस एक्सप्रेस का मकसद है। वीनस एक्सप्रेस अब भी शुक्र के अध्ययन में व्यस्त है। अक्टूबर 2006 और जून 2007 को सौरमंडल के पहले ग्रह बुध के अध्ययन के लिए भेजे गए नासा का स्पेसक्राफ्ट मैसेंजर शुक्र के करीब से दो बार गुजरा था। इस दौरान मैसेंजर ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं। यूरोपियन स्पेस एजेंसी की योजना 2013 में शुक्र की कक्षा में एक खास मिशन बेपीकोलंबो भेजने की है।
इसी साल 20 मई को जापान की स्पेस एजेंसी जाक्सा ने अपने वीनस मिशन की शुरुआत की है। जापान ने शुक्र ग्रह के लिए एक ऑरबिटर मिशन आकात्सुकी भेजा है। मिशन आकात्सुकी दिसंबर तक शुक्र ग्रह पहुंच जाएगा। आकात्सुकी का मकसद इस ग्रह के तूफानी वायुमंडल का अध्ययन करना है और ये पता लगाना है कि क्या इस ग्रह की धरती पर अब भी ज्वालामुखी सक्रिय हैं या नहीं। नासा शुक्र ग्रह पर एक रोवर भेजने की योजना पर काम कर रहा है, इस मिशन का नाम होगा वीनस-इन-सिटू-एक्सप्लोरर। इस रोवर को खास धातु से बनाया जाएगा ताकि ये शुक्र की प्रचंड गर्मी के बीच काम कर सके। मंगल पर मौजूद नासा के जुड़वा रोवर की तरह वीनस-इन-सिटू-एक्सप्लोरर भी शुक्र की मिट्टी के नमूनों की जांच करेगा और वहां के पत्थरों में छेद करके उनमें मौजूद खनिज पदार्थों की खोज करेगा।

बुधवार, 18 मार्च 2009

अंतरिक्ष में इंद्रधनुष


ये देखिए, अंतरिक्ष में इंद्रधनुष। ये इंद्रधनुष जैसा नजर जरूर आ रहा है, लेकिन असलियत में ये इंद्रधनुष है नहीं, बल्कि कुछ और है। ये है कुछ वक्त पहले तक आसमान में किसी जलते बल्ब सा दिखता रहा हमारा पड़ोसी ग्रह शुक्र है। अब इसकी चमक कुछ फीकी पड़ गई है, इसकी एक वजह तो ये कि शुक्र अब सूरज ढलने के बाद पश्चिम दिशा में क्षितिज के नजदीक चला गया है और दूसरी वजह ये कि जिस तरह हमारा चंद्रमा अमावस के बाद पतली फांक सा नजर आता है, उसी तरह शुक्र भी अब केवल 4 फीसदी ही नजर आ रहा है। शुक्र की ये इंद्रधनुषी तस्वीर एक खास टेलिस्कोप से ली गई है और इसमें शुक्र किसी कलाकार के ब्रश के एक इंद्रधनुषी रंगों के स्ट्रोक जैसा इसलिए नजर आ रहा है, क्योंकि हमारी पृथ्वी का वातावरण एक प्रिज्म की तरह काम कर रहा है। शुक्र को देखने का ये अब साल का अंतिम मौका है, क्योंकि इसके बाद शुक्र गर्मियों की शुरुआत का ऐलान करते सूरज की चमक के सामने फीका पड़ जाएगा।