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बुधवार, 30 नवंबर 2011

2012 - एक पुराना मजाक !


साल 2011 अब अपने आखिरी महीने में आगे खिसक रहा है, और इसी के साथ 2012 में दुनिया के अंत की बातें भी रोजाना की बतकही में बार-बार लौट रही हैं। लोग एक रोमांचक मजाक के तौर पर इसका जिक्र करते हैं, लेकिन अगर वे अंदर से यकीन न कर रहे होते तो बात उनकी जुबान पर नहीं आती। कितना यकीन? आप कहेंगे 20 पर्सेंट। हो सकता है कोई 80 पर्सेंट तक भी जा पहुंचे। लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि 100 पर्सेंट यकीन का हलफनामा कोई नहीं देगा।
कोई नहीं, क्योंकि हम हंड्रेड पर्सेंट यकीन करते ही नहीं। न 2012 पर, न भाग्य पर और न ही ईश्वर पर। इंसान की यही बेहद दिलचस्प खामी या खासियत है कि वह यकीन पर भी पूरा यकीन नहीं करता। वह यकीन पर भी शक करता है। वैज्ञानिक प्रक्रिया और वैज्ञानिक खोजों का आधार भी यही है। एक वैज्ञानिक अपने सिद्धांत पर खुद ही शक करता है और इसीलिए प्रयोगों और प्रेक्षणों के जरिए इसकी बार-बार पुष्टि करने के लिए वो दूसरे वैज्ञानिकों को आमंत्रित करता है। इस तरह जब हर बार अलग-अलग प्रयोगों से भी एक ही नतीजा निकलता है, तभी उसे वैज्ञानिक सिद्धांत या नई खोज का दर्जा दिया जाता है। अपने यकीन पर शक की इसी विशेषता से आदिम युग से निकलकर मानव अब विकास की नई सीढ़ियां चढ़ रहा है।
कोई एलियन धरती पर आए, इंसान के दिमाग में झांके तो उसे हैरानी होगी। शायद वह इसे सबसे बड़ा रहस्य मान बैठे। लॉजिक तो यही कहता है अगर आप ईश्वर पर यकीन करते हैं, मानते हैं कि उसी ने दुनिया बनाई और आपको इसमें एक रोल निभाने भेजा, तो फिर आपके जीवन में चिंता मिट जानी चाहिए। अगर यह सब माया है तो फिर इसे लेकर उलझने का सवाल पैदा नहीं होता। ईश्वर ने मुझे अपनी वजहों से बनाया है, वही मेरा नियंता है, तो मैं क्यों खुद को कर्ता समझूं और क्यों उन दुखों से गुजरूं जो मेरे आसपास पैदा होते रहते हैं। एक बार ईश्वर पर यकीन हो जाने के बाद इस नतीजे तक पहुंचने में क्या देर हो सकती है।
यही बात भाग्यवाद पर भी लागू होती है। अगर सब कुछ पहले से तय है और मैं महज एक मोहरा हूं तो मैं संसार को लेकर क्यों परेशान होता रहूं। जो हो रहा है, वह होना था और जी होगा, वह भी। यहां तक कि जो मैं करता हूं वह भी डिवाइन स्क्रिप्ट के मुताबिक है। भाग्यवाद के इस अंजाम तक पहुंचने में क्या दिक्कत हो सकती है।
लेकिन हम इंसान हैं। हम ईश्वर पर यकीन के बाद उससे आंख चुराने के रास्ते खोज लेते हैं। हम भाग्यवाद की दुहाई देने के अगले पल संसार को चैलेंज करने निकल पड़ते हैं। खुदा के दरबार में भी हम अपने कुर्ते के भीतर ईगो की मिसाइल छिपाए रखने की नाकाम कोशिश करते हैं। जैसे हम भगवान के केयरटेकर हों, हम यह भी खुद तय कर लेते हैं कि वह अंतर्यामी, त्रिकालदर्शी अक्सर अपने बंदों की तरफ नहीं देख रहा होता है और उसी समय मुसीबत टूट पड़ती है, लिहाजा उसका ध्यान खींचते रहना जरूरी है। और देखिए कि हमें उसके सामने धमक कर ऐलान करना पड़ जाता है, खुश तो तुम बहुत होगे आज...
इसलिए मैंने 2012 के खौफ में जी रहा कोई शख्स अब तक नहीं देखा, जिसने अपनी तिकड़मों और दंद-फंद को इन आखिरी दिनों में आराम दे दिया हो। कोई नहीं देखा, जिसने 2013 के लिए तैयारियां करनी और उन्हें लेकर परेशान होना मुल्तवी कर दिया हो। धर्म, परलोक, जादू और चमत्कारों की दुहाई देने वाले भी अपने सगों से विदाई लेते नहीं दिखते।
वे दिखेंगे भी नहीं। वरना तो दूध पीने वाले गणेश जी के इस देश में उस चमत्कार के बाद अधर्म के लिए जगह बचनी ही नहीं चाहिए थी। दूध पी लेने से ज्यादा कोई ईश्वर अपने होने की और क्या गारंटी दे सकता है। क्या हम चाहते हैं कि वह हमारे सामने साक्षात प्रकट हो, हमें झापड़ मारे और कहे मैं हूं, सुप्रीम कोर्ट में जाए और खुद के होने को साबित कर दे। क्या ईश्वर के साक्षात दर्शन कर लेने के बाद भी सांसारिकता बची रह सकती है?
बची रह सकती है। रहेगी ही। क्योंकि हम तो ऐसे ही हैं। हम अधूरे हैं। हमारा यकीन अधूरा है। इसलिए कि हमें अपने यकीन पर ही यकीन नहीं है। हम अधूरे धार्मिक, अधूरे भाग्यवादी हैं। विश्वास का यह अधूरा सफर बहुत सी उलझनों को जन्म देता है। यह एक अनिश्चित दिमाग का संकेत है, जो कई भ्रमों में अपनी एनर्जी को भटकाए रखता है, ऐसी स्थितियों के बीच झूलता है, जो किसी अंजाम तक नहीं पहुंचतीं, फैंटेसी में सिर छिपाता है, उसी में जीने लगता है और दुश्वारियों को जन्म देता है। मानसिक बीमारियों, जादू, टोने और प्रेत बाधा से परेशान करोड़ों लोगों पर नजर डालिए।
लेकिन कुछ और नुक्ते हैं। क्या धर्म भी एक परीकथा है जो इंसान ने खुद को राहत देने के लिए रची है और इस परीकथा के भीतर-बाहर होने का हक उसने अपने लिए रिजर्व रखा है। या फिर यह तो नहीं कि अधूरा यकीन इंसान की बुनियादी फितरत हो। यह फितरत उसे यकीन पर सवाल उठाने की, परंपरा तोड़ने की और नया गढ़ने की ताकत देती हो। यही फितरत उसकी आजादी हो, क्योंकि वही आजादी ईश्वर के हजार चेहरे गढ़ने, ईश्वर की बातों को नए-नए मतलब देने और उन मतलबों पर आपस में लड़ मरने का मजा देती है। महाभारत में ठीक ही कह दिया गया है- इंसान सबसे बड़ा है, उससे बड़ा कुछ नहीं। इसके अलावा कहा भी क्या जा सकता था?

साभार - संजय खाती

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

रॉकेट के साथ विकास का सफर


तमसो मां ज्योर्तिगमय...अंधेरे को दूर करने के लिए घर के कोने-कोने को रोशनी की जगमगाहट से सजा देने का पर्व है दीपावली। और दीपावली का असली मजा है आतिशबाजी में, धूम-धड़ाके और सितारों सी जगमगाती ढेर सारी आतिशबाजी में। अनार, फुलझड़ी, चकरी और न जाने क्या-क्या....एक से बढ़कर एक पटाखे दीपावली को रोशन करते हैं, लेकिन दीपावली का आकाश जगमगाता है तो बस रॉकेट से।
रॉकेट का इस्तेमाल पहली बार 1100 साल पहले किया गया था, तब से लेकर अब तक इसकी डिजाइन में कोई खास बदलाव नहीं आया है। रॉकेट बस एक मामूली आतिशबाजी ही नहीं, बल्कि सॉलिड फ्यूल जेट इंजन का पहला रूप है। इसी रॉकेट से 1100 साल के दौरान मानव सभ्यता के विकास को जेट रफ्तार मिली है। आतिशबाजी के इस रॉकेट से ही हमने आसमान छूने का सपना देखा और चांद की ओर कदम बढ़ाए।
रॉकेट को जेट रफ्तार देने वाले बारूद की खोज ईसा के 800 साल बाद चीन में हुई और नौंवी सदी में चीन में पहली बार रॉकेट का इस्तेमाल आतिशबाजी के लिए किया गया। लेकिन चीनी सेना के लिए हथियार बनाने वाले इंजीनियर जल्दी ही भांप गए कि समंदर की जंग के लिए रॉकेट एक कारगर हथियार है। चीन की नौसेना ने पहला मल्टीस्टेज जंगी रॉकेट बनाया। ड्रैगन की शक्ल वाला ये रॉकेट समंदर की सतह से एक मीटर ऊपर उड़ते हुए एक किलोमीटर के दायरे में दुश्मन के जहाज पर हमला करता था।
रॉकेट तकनीक को चीन से छीनकर यूरोप और भारत तक पहुंचाने का काम किया मंगोल हमलावर चंगेज खान ने। वक्त बदला, शहंशाह बदले, सल्तनतों की सरहदें भी बदलीं, लेकिन रॉकेट का आकार नहीं बदला। ज्यादातर इसका इस्तेमाल आतिशबाजी या फिर जंग में दुश्मन को डराने के लिए ही किया जाता था। दुनिया बदली, लेकिन आसमान में जगमगाते चंद्रमा की खूबसूरती नहीं बदली और नहीं बदली चांद को छूने की जूनून भरी चाहत। आग की लकीर छोड़ते रॉकेट के साथ क्या चंद्रमा के सफर पर जाया जा सकता है, इस ख्याल ने मानो खलबली सी मचा दी और चंद्रमा को छूने का युगों पुराना ख्वाब मुमकिन नजर आने लगा।
रॉकेट की मदद से चंद्रमा को छूने की कोशिश करने वाला पहला नाकाम अंतरिक्षयात्री था चीन का, जिसका नाम था- हू ....चीन की मिंग राजशाही के दौरान हू ने सैकड़ों रॉकेट से बंधे बांस के अंतरिक्षयान पर सवार होकर चांद के सफर पर जाने की पहली कोशिश की थी। लेकिन पलीते में आग लगाते ही एक जोरदार धमाका हुआ और इस जबरदस्त धमाके से बांस के अंतरिक्षयान के परखचे उड़ गए, वहां एक बड़ा गड्ढ़ा नजर आने लगा और अंतरिक्ष जाने की कोशिश कर रहे हू की मौत हो गई।
1638 में दो अंग्रेज बिशप्स ने एक किताब छपवाकर चंद्रमा पर जाने के तरीके सुझाए, लेकिन उस दौर में इसे जादू-टोना समझा गया और शैतान का काम करार देकर बिशप्स की निंदा की गई।
 टीपू सुल्तान (1750-1799)
रॉकेट को जंग के सबसे असरदार हथियार के तौर पर विकसित किया मैसूर के शहंशाह टीपू सुल्तान ने। टीपू सुल्तान ने पहली बार रॉकेट तकनीक के इस्तेमाल से लोहे की मिसाइल्स बनाईं जिनका नाम था तगरत।टीपू सुल्तान की मिसाइलों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए और उनके जीते-जी ईस्ट-इंडिया कंपनी मैसूर में कदम नहीं रख सकी। टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज टीपू की मिसाइलों को ब्रिटेन ले गए और इस तरह रॉकेट के नए स्वरूप आधुनिक मिसाइलों का विकास शुरू हुआ।
फिर आया दौर औद्योगिक क्रांति का, जब रफ्तार की जरूरत सबसे ज्यादा महसूस की गई। ऐसे में औद्योगिक क्रांति को रफ्तार दी इसी रॉकेट की जेट तकनीक ने। दीपावली का रॉकेट एक जेट इंजन का सबसे सरल रूप भी है। रॉकेट जब ऊपर जाता है तो उसके पीछे आग की एक तेज लपट...चिंगारियों का फौव्वारा सा छूटता नजर आता है, इसे जेट कहते हैं जिसकी ताकत रॉकेट को आसमान में उछाल देती है। बदलते दौर में जब ढेर सारी भाप को एक छोटे से छेद से गुजारा गया तो रॉकेट के जेट की जबरदस्त ताकत काबू में आ गई और हो गई शुरुआत औद्योगिक क्रांति की।
1903 में रूस में हाईस्कूल के गणित शिक्षक कोन्सटैन्टीन तिओलकोव्स्की ने अंतरिक्ष अभियानों की पहली आधुनिक रूपरेखा सामने रखी और रॉकेट की जबरदस्त जेट ताकत के इस्तेमाल से अंतरिक्ष के सफर पर जाने की बात कही, बस यहीं से एस्ट्रोनॉटिक्स की शुरुआत हो गई।
 16 मार्च 1926
आतिशबाजी के रॉकेट की उड़ान के रहस्य को लंबे वक्त से खामोशी के साथ समझने में जुटे अमेरिकी वैज्ञानिक प्रो. रॉबर्ट एच गॉडर्ड ने अपने बनाए लिक्विड फ्यूल रॉकेट का पहला परीक्षण किया। इस परीक्षण के साथ ही मॉडर्न रॉकेटरी की शुरुआत हुई और संपूर्ण मानव जाति के विकास की दिशा ही बदल गई।
क्या आप यकीन करेंगे कि चंद्रमा पर जाने लायक रॉकेट पहली बार एक फिल्म के लिए बनाया गया था। जी हां, बीसवीं सदी की शुरुआत में एक खामोश फिल्म द गर्ल इन द मून के लिए चंद्रमा पर जाने लायक रॉकेट का पहला मॉडल बनाया गया। आधुनिक रॉकेट के विकास में मूक फिल्म द गर्ल इन द मून के रॉकेट वाले सीन का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इस फिल्म में प्रदर्शित रॉकेट को प्रो. ओबेट ने पूरी वैज्ञानिक गणना करने के बाद बनाया था। खास बात ये कि प्रो. ओबेट के बनाए इस मॉडल रॉकेट और इसे बनाने के लिए की गई वैज्ञानिक गणना का इस्तेमाल बाद में वाकई रॉकेट टेक्नोलॉजी के विकास में किया गया।
अटलांटिक के दोनों तरफ अमेरिका और यूरोप में रॉकेट टेक्नोलॉजी को विकसित करने के काम जोरों पर था। अमेरिकन रॉकेट सोसाइटी के प्रो. गॉडर्ड पहले लिक्विड प्रोपेलेंट रॉकेट को बनाकर उड़ा चुके थे, जबकि यूरोप के जर्मनी में द सोसाइटी फॉर स्पेस ट्रैवल नौजवान वैज्ञानिक प्रतिभाओं को रॉकेट से जोड़ रही थी। तभी दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया और रॉकेट के विकास की दिशा जंग की ओर मोड़ दी गई। जर्मनी के वैज्ञानिक पहला बैलेस्टिक रॉकेट बनाने में कामयाब रहे और उन्होंने 1942 में पहले बैलिस्टिक रॉकेट वी-वन का परीक्षण किया।
इससे घबराए अमेरिका ने जर्मनी के नौजवान रॉकेट वैज्ञानिकों से अमेरिका आकर रिसर्च करने की पेशकश की। हिटलर के खतरनाक मंसूबों से घबराए जर्मनी के कई रॉकेट साइंटिस्ट अपनी रॉकेट डिजाइन लेकर अमेरिका आ गए। उस वक्त जंग के लिए ही रॉकेट विकसित किए गए, लेकिन रॉकेट की इस्तेमाल अंतरिक्ष के सफर के लिए करने की चाहत सबके दिलों में थी।
 4 अक्टूबर 1957
दुनिया के पहले सेटेलाइट स्पुतनिक के लांच के साथ ही रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष जा सकने की पुरानी चाहत भी पूरी हो गई। 60 के दशक में तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने जब देश के सामने चंद्रमा पर जाने का लक्ष्य रखा तो मानो उत्साह की एक बिजली सी कौंध गई। नासा वैज्ञानिकों ने तीन अंतरिक्षयात्रियों और उनके स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष भेजने के लिए एक ऐसे ताकतवर रॉकेट को बनाने का काम शुरू किया, जो अब तक बस एक सपना ही था। अपोलो मिशन को लांच करने वाले मल्टी स्टेज एडवांस रॉकेट सैटर्न के साथ अंतरिक्ष युग की शुरुआत करने वाले आधुनिक रॉकेट्स का एक नया दौर शुरू हो गया।
...और फिर वो दिन भी आ गया जब चंद्रमा पर जाने का वो पुराना सपना भी साकार हो गया जिसे आतिशबाजी के रॉकेट के साथ हमने युगों पहले देखा था।
रॉकेट ने भले ही कई रूप बदले हों, लेकिन नील आर्मस्ट्रांग को चांद पर ले जाने वाले रॉकेट और दीपावली के रॉकेट की बुनियाद एक ही है। ये रॉकेट का ही कमाल है कि हमने धरती से दूर अंतरिक्ष में स्टेशन बना लिया है और सौरमंडल के ज्यादातर ग्रहों की कक्षा तक जा पहुंचे हैं।
दीपावली के इसी रॉकेट का एक दूसरा रूप मिसाइलों के रूप में मौजूद है। एक से बढ़कर एक खतरनाक और अचूक मिसाइलें, जो एक बार छोड़े जाने के बाद अपनी दिशा और रास्ता खुद ही तय करती हैं। रॉकेट के साथ हमने ये साबित कर दिखाया है कि सपनों को हकीकत में बदलना पूरी तरह से मुमकिन है।

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

चेर्नोबिल-एक हादसा जिसे हमने भुला दिया


 25 वीं वर्षगांठ पर विशेष

 चेर्नोबिल महज एक न्यूक्लियर दुर्घटना नहीं, बल्कि मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी है
- टाइम मैगजीन 

मेरे दिल में उन सबके लिए गहरा सम्मान है जिन्होंने हादसे के बाद वहां जाकर रिएक्टर सील करने का काम किया...वो सभी जानते थे कि 90 फीसदी संभावना इस बात की है कि रेडिएशन उनकी जान ले लेगा...मुझे खेद है, मैं बोल नहीं पा रहा...और उनमें से ज्यादातर नहीं रहे
- व्लादिमीर नोवोच्शेनोव, नाभिकीय ऊर्जा सलाहकार, पूर्व सोवियत संघ 

26 अप्रैल 1986, आधी रात हो चली थी और साढ़े तीन लाख की आबादी वाला उत्तरी यूक्रेन का शहर प्रिप्यट गहरी नींद में था। लेकिन यहां से 3 किलोमीटर दूर मौजूद सोवियत की शान न्यूक्लियर पॉवर प्लांट चेर्नोबिल की यूनिट नंबर 4 के कंट्रोल रूम में भारी हलचल थी। उस रात रिएक्टर के इंजीनियर एक नए सेल्फ फ्यूलिंग सिस्टम का पहला परीक्षण करने जा रहे थे। ऊपर से आए आदेशों में साफ लिखा था कि ये परीक्षण 700 से 1000 मेगावाट पावर लिमिट के बीच किया जाए, लेकिन उस वक्त ड्यूटी पर मौजूद चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ ने उच्च अधिकारियों को खुश करने के लिए एकतरफा फैसला ले लिया। डिएटलॉफ ने इंजीनियरों को हुक्म दिया कि परीक्षण और भी कम पॉवर लिमिट यानि 200 मेगावॉट पर किया जाए। वहां मौजूद इंजीनियर चीफ इंजीनियर के इस आदेश पर भौचक्के रह गए। ड्यूटी पर मौजूद कुछ इंजीनियरों ने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन डिएटलॉफ जो एक नाभिकीय वैज्ञानिक भी था, वो भड़क उठा। उसके इस फैसले से ड्यूटी पर मौजूद इंजीनियर खुश नही थे, और कंट्रोल रूम में काम कर रहे उनमें से एक ने तो अपना करियर दांव पर लगाकर ये हुक्म मानने से इनकार कर दिया। इसपर डिएटलॉफ ने उसे काम से हटाकर उसकी जगह दूसरे इंजीनियर को तैनात कर प्रयोग शुरू करने का आदेश दिया।
परीक्षण से पहले चेर्नोबिल के रिएक्टर नंबर-4 को बंद किया गया। लेकिन इंजीनियर ये नहीं जानते थे कि रिएक्टर के कोर में पानी बहुत कम है। रात एक बजकर 23 मिनट पर इंजीनियरों ने रिएक्टर कोर को पानी से भरने से पहले ही परीक्षण शुरू कर दिया। कम पॉवर में रिएक्टर ऑन करते ही कोर में जो भी थोड़ा-बहुत पानी था वो तुरंत भाप में बदल गया। पानी के बिना चेर्नोबिल रिएक्टर कोर में मौजूद फ्यूल एसेंबली की 50-50 मीटर लंबी यूरेनियम की 1661 छड़ें दहकने लगीं। चारों तरफ अलार्म बज उठे और चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ समेत कंट्रोल रूम में मौजूद हर आदमी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। इंजीनयरों ने हड़बड़ी में कोर को पानी से भरने का काम शुरू कर दिया। पानी ने जैसे ही कोर में दहकती हुई यूरेनियम की छड़ों का स्पर्श किया, वो तुरंत भाप में बदल गया। चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर में प्रेशर कुकर जैसे हालात बन गए, जहां दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। दहकती हुई यूरेनियम की छड़ें पिघलने लगीं और रिएक्टर कोर में धमाके शुरू हो गए। रेडिएशन से सुलगती भाप का दबाव इस कदर तेज हो उठा कि यूरेनियम की हर छड़ के ऊपर लगे 350 किलो कंक्रीट से बने फ्यूल रॉड कैप उछलने लगे और देखते ही देखते एक जबरदस्त धमाके के साथ पूरा रिएक्टर कोर ही उड़ गया। इस धमाके की ताकत इतनी विनाशकारी थी कि रिएक्टर कोर के ऊपर लगा 1200 टन का सेफ्टी कैप उड़कर दूर जा गिरा। रिएक्टर की जगह एक खौफनाक स्याह गड्ढ़ा बन गया, जिससे रेडिएशन से भरी भाप तेज रफ्तार के साथ बाहर फूट रही थी।
 लेकिन असली आफत तो अब आने वाली थी। कुछ सेकेंड बाद इस भीषण धमाके से बने चेर्नोबिल रिएक्टर के उस स्याह गड्ढ़े से यूरेनियम और ग्रेफाइट जैसे दहकते हुए रेडियोएक्टिव अणुओं की एक बौछार सी फूट पड़ी। ये घातक बौछार वातावरण में एक हजार मीटर तक ऊपर उठती चली गई, जिससे रिएक्टर के ऊपर मौजूद बादल भी रेडिएशन के जहर से भर उठे। न्यूक्लियर ईंधन की इस खौफनाक बौछार ने करीब 700 टन रेडियोएक्टिव पदार्थों को वातावरण में यहां-वहां बिखेर दिया। चेर्नोबिल हादसे से वातावरण में फैल गया जहरीला रेडिएशन हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 100 गुना ज्यादा था। 
दुनिया को इस हादसे की पहली खबर दी समाचार एजेंसी नोवोस्टी के फोटो पत्रकार इगोर कॉस्टीन ने। कॉस्टीन वो पहले शख्स थे जो चेर्नोबिल हादसे के बाद सबसे पहले वहां हेलीकॉप्टर से पहुंचे। ये इगोर कॉस्टीन के कैमरे से ली गई हादसे के बाद चेर्नोबिल रिएक्टर की पहली तस्वीर है। चेर्नोबिल पावर प्लांट की जगह अब एक स्याह गहरा गड्ढ़ा नजर आ रहा था, जिससे लहराती हुई भाप ऊपर उठ रही थी। ये खौफनाक मंजर देखते ही कॉस्टीन समझ गए कि यहां कुछ बहुत बुरा घट चुका है। 
इगोर कॉस्टीन ने बाद में बताया कि उन्होंने रेडियो में एक लाइन की खबर सुनी थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर में कुछ गड़बड़ी आई है। उन्होंने तुरंत कैमरा संभाला और वहां जाकर हेलीकॉप्टर से सर्वे करने का फैसला किया। इगोर ने बताया, “ जल्दी ही हम चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर चार के ऊपर उड़ान भर रहे थे, हालात किस कदर संगीन थे, उस वक्त मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था। मैंने हेलीकॉप्टर की खिड़की खोल ली, जो एक बहुत बड़ी गलती थी। जब मैंने खिड़की खोली मुझे बाहर कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा। चेर्नोबिल रिएक्टर के अवशेष हमारे ठीक नीचे थे। वहां मौत का सन्नाटा छाया था। मैं इतने सदमे में था कि हेलीकॉप्टर की आवाज भी सुनाई नहीं दे रही थी। वहां कुछ नहीं था, बस एक स्याह खौफनाक गड्ढ़ा नजर आ रहा था।” 
27 अप्रैल 1986 की सुबह, प्रिप्यट शहर के बाशिंदे इस बात से बेखबर थे कि रात में कितनी बड़ी कयामत टूट चुकी है। लोग अपने-अपने काम में जुटे थे, बच्चे स्कूल जा रहे थे और आम शहरी जिनमें से ज्यादातर चेर्नोबिल रिएक्टर में काम करने वाले कर्मचारी ही थेस अपनी ड्यूटी पर जाने की तैयारी कर रहे थे। चेर्नोबिल हादसे के 30 घंटे बाद अधिकारियों ने चेर्नोबिल रिएक्टर से महज 3 किलोमीटर दूर मौजूद इस शहर की सुध ली। सुरक्षात्मक उपाय शुरू किए गए और थोड़ी ही देर में धड़धड़ाती हुई करीब एक हजार बसें वहां आ पहुंची। अधिकारियों ने लोगों को शहर तुरंत खाली करने का फरमान सुना दिया। लोगों को अपना सामान लेने के लिए महज दो घंटे का वक्त दिया गया। लोगों को केवल उतना ही सामान साथ ले जाने की इजाजत थी, जितना वो खुद उठा सकते थे। अधिकारियों के इस फरमान से शहर में बेचैनी फैल गई। कुछ ही देर में पूरा शहर बसों पर सवार हो गया। लोग अपनी जिंदगी की पूरी कमाई पीछे छोड़ अनजान मंजिल की ओर चल दिए, ये लोग फिर कभी दोबारा अपने घर वापस नहीं लौट सके। 
प्रिप्यट शहर खाली कराने के बाद पूर्व सोवियत संघ की सेना ने दुनिया का सबसे खतरनाक बचाव अभियान शुरू किया, जिसका मकसद था चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करना। सरकार ने अफगानिस्तान मोर्च से सबसे कुशल पायलट तलब किए और उन्हें चेर्नोबिल रिएक्टर के ऊपर हेलीकॉप्टर उड़ाने का आदेश दिया। सैनिकों के साथ ये पायलट हर उड़ान में बोरिक एसिड मिली 80 किलो बालू की बोरियां भी ले गए। कोशिश ये थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर को कई टन बालू और बोरिक एसिड से भर दिया जाए, जो रेडिएशन को सोख सके। पहले दिन 110 टन बालू रिएक्टर के गड्ढ़े में गिराई गई और अगले दिन 300 टन। चेर्नोबिल के खौफनाक खुले मुंह के ऊपर रेडिएशन की मात्रा जानलेवा स्तर से भी कई गुना ज्यादा थी। लेकिन काम में जुटे सभी सैनिक इस बात को नहीं जानते थे। कई पायलटों ने तो चेर्नोबिल के ऊपर एक दिन में 33 उड़ानें भरीं। इसका नतीजा ये हुआ कि काम में जुटे कई सैनिक और पायलट जहरीली हवा से मारे गए और हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने लगे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को स्टील की मोटी चादरों से ढंकने और सील करने का काम तूफानी रफ्तार से शुरू कर दिया गया। काम में जुटे सभी लोग इस बात को समझ चुके थे कि उनके यहां से जिंदा बच निकलने की संभावना बहुत कम है। लेकिन फिर भी दूसरों की जान बचाने के लिए इन जांबाजों ने अपनी हस्ती दांव पर लगा दी। बस एक मामूली सर्जिकल मास्क पहनकर लोग रेडिएशन का सामना करने के लिए आ डटे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करने का वीडियो शूट करने के लिए रूसी सेना का फोटोग्राफर शेवचेन्को चेर्नोबिल पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर तीन की छत पर चढ़ गया। वहां से उसने अपने कैमरे से शूट किया कि किस तरह लोग रेडिएशन से दहकती रेडियोएक्टिव ग्रेफाइट का हाथों से उठाकर ले जा रहे थे। काम पूरा हो जाने के बाद इस्तेमाल की गई हर चीज, दमकल गाड़ियां, क्रेन, हेलीकॉप्टर सब की सब वहीं की वहीं छोड़ दी गई। क्योंकि सबके सब जहरीले रेडिएशन से भर उठे थे। शेवचेन्को के कैमरे ने जो शूट किया वो शायद दुनिया का सबसे दुखद वीडियो है, क्योंकि चेर्नोबिल से लौटने के 10 दिन के भीतर ही इसे शूट करने वाले फोटोग्राफर शेवचेन्को और इसमें नजर आने वाले हर शख्स की मौत हो गई। इस वीडियो को जिस कैमरे से शूट किया गया था, उस कैमरे को भी शेवचेन्को के साथ कब्र में दफना दिया गया, क्योंकि वो भी रेडिएशन से भर उठा था।
पूर्व सोवियत संघ के सरकारी अखबार प्रावदा में कई दिन बाद इस हादसे की एक छोटी सी खबर छपी, वो भी पेज नंबर तीन के बॉटम में सिंगल कॉलम।
 चेर्नोबिल की बाहरी सीमा पर एक बोर्ड लगा है, जिसमें रूसी भाषा में यात्रियों के लिए सुरक्षित सफर की शुभकामनाएं लिखी हैं। लेकिन इससे आगे 30 किलोमीटर दायरे का पूरा इलाका और चेर्नोबिल के कामगारों का शहर प्रिप्यट वीरान पड़ा है। इस शहर में रेडिएशन की मात्रा इतनी ज्यादा है कि अगले 800 साल तक ये रहने के काबिल नहीं है। फिर भी इन नामुमकिन हालात में भी जिंदगी ने अपने लिए रास्ता बना लिया है।
साढ़े तीन लाख लोगों से ये शहर खाली करा लिए जाने के एक साल बाद करीब 400 बुजुर्गों का एक दल अपने शहर वापस लौट आया था। पुरानी यादों भरे अपने घर में जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने के लिए। 75 साल की ओल्गा गेवरिलेन्कोव भी उन्हीं में शामिल थीं। हैरानी की बात ये कि रेडिएशन से भरे इस शहर में ओल्गा मजे से रह रही हैं। प्रिप्यट शहर की जमीन का एक-एक कण घातक रेडिएशन से भरा होने के बावजूद ओल्गा इसी में अपने लिए सब्जियां उगाती हैं।
सर्दियों में जब बर्फबारी होती है तो प्रिप्यट शहर में रेडिएशन का स्तर काफी कम हो जाता है, क्योंकि बर्फ में ही ये खासियत होती है कि वो रेडिएशन को बेहतर तरीके से रोक सकती है। बर्फ से ढंके प्रिप्यट में अब कुछ टूरिस्ट भी आने लगे हैं। यहां आने वाले लोग दादी ओल्गा से जरूर मिलते हैं, और ओल्गा उन्हें गर्व से बताती हैं, “मैं घर के बाहर जमीन पर आलू और हर वो चीज पैदा कर लेती हूं, जो मुझे चाहिए। धरती जो मुझे देती है, मैं उसे खा लेती हूं। मैं नहीं डरती, मैं अब किसी चीज से नहीं डरती।” 
चेर्नोबिल हादसे की त्रासदी केवल इस शहर तक ही सीमित नहीं रही। रेडिएशन से भरे बादलों ने रेडियोएक्टिव कणों को दूर-दूर तक बिखेर दिया। यूक्रेन, बेलारूस, रूस और कीव रेडिएशन की चपेट में आ गए। चेर्नोबिल हादसे के निशान यूरोप के हर देश में देखे गए। लेकिन इस त्रासदी का सबसे अफसोसनाक पहलू ये रहा कि इतिहास की हर त्रासदी की तरह इसके शिकार भी सबसे ज्यादा बच्चे ही हुए। 

हादसे के वक्त चेर्नोबिल पावर प्लांट में करीब 3500 कर्मचारी मौजूद थे, उनमें से 56 कर्मचारी तुरंत मारे गए

3,50, 000 लोगों को हमेशा के लिए बेघर होना पड़ा

90 बच्चों समेत 4000 लोगों की मौत रेडिएशन से हुई

चेर्नोबिल हादसे में मारे गए लोगों की सही संख्या का अब तक पता नहीं चला

हादसे के बावजूद यूक्रेन सरकार ने चेर्नोबिल के दूसरे रिएक्टरों का इस्तेमाल जारी रखा

चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के सभी रिएक्टर साल 2000 से हमेशा के लिए बंद कर दिए गए 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

गैगेरिन का 108 मिनट का वो सफर, जिसने दुनिया बदल दी


12 अप्रैल 1961, कजाकस्तान का बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, अनजाने भय और आशंकाओं के बीच मानव अंतरिक्ष के गहन अज्ञात में पहला कदम रखने जा रहा था। ऐसे में अपने स्पेसक्राफ्ट वोस्तोक-1 में बैठने से पहले यूरी गैगेरिन ने दुनिया भर के लोगों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाया - 
“प्यारे दोस्तों, भले ही आप मुझे जानते हों, या न जानते हों, मेरे हमवतनों और दुनियाभर के लोगों, अगले कुछ मिनटों में एक शक्तिशाली रॉकेट मुझे ब्रह्मांड की सुदूर गहराइयों में ले जाएगा। अंतरिक्ष के सफर पर निकलने से पहले अब इन अंतिम पलों में मैं आपसे क्या कह सकता हूं। अपनी पूरी जिंदगी अब मुझे एक अकेले खूबसूरत क्षण जैसी लग रही है। मैंने जिंदगी में जो कुछ भी किया, जो भी जीया वो सब कुछ बस इस क्षण के लिए ही था।” 
विश्व नागरिकों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाने के बाद यूरी गैगेरिन वोस्तोक रॉकेट में सवार होकर विश्व के पहली मानव अंतरिक्ष अभियान पर निकल गए। अंतरिक्ष में पहला मानव मौजूद होने की खबर जब दुनिया को मिली तो सभी अवाक रह गए। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद ये सबसे बड़ी और सबसे गौरवशाली खबर थी, जो पूरी दुनिया में बिजली की तेजी से फैल गई। अमेरिका दंग रह गया, लेकिन राजनयिक-कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर जारी तमाम स्पर्धाओं को दरकिनार कर वाशिंगटन ने बधाई का संदेश मास्को भेजा। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान ने पूरी दुनिया को मानव होने का अर्थ सही मायनों में समझाया और सभी देशों को एकसाथ गर्व की सुखद अनुभूति से भर दिया।   
यूरी गैगेरिन भारत में 
अंतरिक्ष से वापस आने के करीब आठ महीने बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर यूरी गैगेरिन भारत भी आए। भारत में भी गैगेरिन के लिए भव्य स्वागत यात्रा निकाली गई। गैगेरिन की उपलब्धि ने भारत को भी आत्मविश्वास से भर दिया। डॉ. विक्रम साराभाई भी यूरी की अंतरिक्षयात्रा से बहुत प्रभावित हुए और इस नतीजे पर पहुंचे कि एक प्रभावशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान के 8 साल बाद इसरो की स्थापना के साथ भारत ने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू कर दिया। और इसके महज 6 साल बाद अपना पहला सेटेलाइट आर्यभट्ट अंतरिक्ष भेजकर दुनिया को चौंका दिया। यूरी गैगेरिन के सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने खास डाकटिकट भी जारी किए। यूरी ने जब पृथ्वी की पहली परिक्रमा की उस वक्त वो केवल 27 वर्ष के थे। 108 मिनट की उनकी अंतरिक्षयात्रा ने विश्व के युवाओं को इस कदर जोश से भर दिया कि इसके बाद दुनिया ही बदल गई।
स्पुतनिक और स्पेस एज
यूरी के अंतरिक्ष अभियान की पृष्ठभूमि तैयार हुई 4 अक्टूबर 1957 को जब पूर्व सोवियत संघ ने दुनिया का पहला सेटेलाइट स्पुतनिक पृथ्वी की कक्षा में भेजा। स्पुतनिक के साथ दुनिया में अंतरिक्ष युग की शुरुआत हुई, जिसे सोवियत वैज्ञानिकों ने आगे बढ़ाया 3 नवंबर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में जीवन का पहला रूप मादा कुत्ता ‘लाईका’ को भेजकर। अंतरिक्ष के माहौल में लाईका केवल 6 घंटे ही जीवित रह सकी, उसके चैंबर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाने की वजह से उसकी मौत हो गई। लाईका नहीं रही, लेकिन वो जिंदगी को अंतरिक्ष का रास्ता दिखा गई। अमेरिका एक बार फिर पिछड़ चुका था, लेकिन सोवियत जानता था कि अब अमेरिका दुनिया को चौंकाने वाला कोई बड़ा कारनामा जरूर करेगा। साम्यवादी सरकार हर कीमत पर अमेरिका को पछाड़ने पर आमादा थी। वक्त कम था और जल्दी ही कुछ बड़ा कर दिखाना था।
मिशन वोस्तोक और मिशन मरकरी
जनवरी 1959 को पूर्व सोवियत संघ ने इंसान को अंतरिक्ष भेजने के लक्ष्य के साथ एक अहम कार्यक्रम शुरू किया, जिसका नाम था वोस्तोक। इसके ठीक तीन महीने बाद अमेरिका ने भी अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने के लिए मिशन मरकरी का ऐलान कर दिया। अब पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका में इस बात की होड़ तेज हो गई कि पहले अंतरिक्षयात्री को अंतरिक्ष भेजने में बाजी कौन मारता है। 
अमेरिका की तरह पूर्व सोवियत संघ ने भी अंतरिक्षयात्रियों को चुनने के लिए वायुसेना के पायलट्स को ही लेने का फैसला लिया। पूर्व सोवियत संघ ने गुपचुप ढंग से सारी तैयारियां शुरू कर दीं और देशभर से वायुसेना से सबसे कुशल 2000 पायलट्स को बुला भेजा। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम वोस्तोक के चीफ सेर्गेई कोरोलेव ने इन 2000 में से 200 पायलट्स का चुनाव किया और कड़े इम्तहान के बाद इन 200 में से 20  कैडेट्स को चुना गया। लेकिन किसी को भी ये नहीं बताया गया कि उन्हें करना क्या है। 20 लोगों की इसी टीम में शामिल थे सोवियत एयरफोर्स के सीनियर लेफ्टिनेंट यूरी गैगेरिन।
महज 5 फुट 2 इंच के कद वाले यूरी साथियों के बीच अलग ही नजर आते थे। मजाकिया स्वभाव के साथ उनकी सबसे बड़ी पहचान थी चेहरे पर हर वक्त खिली रहने वाली एक ताजगी भरी मुस्कान। 20 में से यूरी गैगरिन समेत 6 फाइनल कैडेट्स का चुनाव किया गया और तब उन्हें बताया गया कि उन्हें कॉस्मोनट यानि अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जा रहा है। 18 जून 1960 को पहली बार इन सभी छह लोगों को वोस्तोक रॉकेट दिखाया गया। अब जाकर इन्हें पता चला कि छह में से किसी एक भाग्यशाली को दुनिया का पहला अंतरिक्षयात्री बनने का मौका मिलेगा।
यूरी गैगेरिन जिस वक्त अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण ले रहे थे, उस वक्त तक न तो अच्छे कंप्यूटर्स थे, और न ही वो टेक्नोलॉजी जो एक इंसान को अंतरिक्ष भेजकर सुरक्षित वापस ला सकती थी। उस वक्त तक तो हमें अंतरिक्ष में विकिरण के खतरों की भी सही जानकारी नहीं थी और अंतरिक्ष के खतरनाक माहौल में जिंदगी की हिफाजत करने वाले अच्छे स्पेससूट की तो बात छोड़िए, सुरक्षित हेलमेट तक नहीं थे। ऐसे में एक इंसान को अंतरिक्ष भेजना एक राजनीतिक जिद के सिवाय कुछ नहीं था। राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं इस कदर हावी थीं कि अंतरिक्षयात्री की सुरक्षा जैसे सवाल बेमानी थे।
यूरी का चुनाव
11 महीने का अंतरिक्षयात्री प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, अब आई बारी अंतरिक्ष के पहले सफर के लिए 6 में से एक कॉस्मोनट को चुनने की। चयनकर्ताओं के सामने दो अंतिम नाम थे यूरी गैगेरिन और घेरमान तितोव। तितोव एक शिक्षक के बेटे थे, जबकि यूरी के पिता एक किसान थे। साम्यवादी सरकार ने दुनिया के पहले अंतरिक्षयात्री के तौर पर तितोव के बजाय मेहनतकश किसान के बेटे यूरी का चुनाव किया। पहली अंतरिक्षयात्रा के लिए यूरी के चुनाव की एक वजह और भी थी। दरअसल वोस्तोक कैप्स्यूल के कॉकपिट में लंबे कद के अंतरिक्षयात्री के लिए जगह ही नहीं थी। जबकि मजह 5 फुट 2 इंच कद वाले यूरी इस छोटे से कॉकपिट के लिए बिल्कुल फिट थे।
यूरी लंबे वक्त से घर से बाहर थे। हाल ही में उनकी बेटी लेना का जन्म हुआ था। लेकिन यूरी परिवार को ये नहीं बता सकते थे कि वो कहां हैं और क्या कर रहे हैं। अंतरिक्षयात्रा पर निकलने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी वेलेंटीना गोर्याचेवा को खत लिखा-
“मेरी प्यारी, तुमसे और बच्चों से मिलने को मैं बेकरार हूं...मैं देश के प्रति अपना फर्ज निभा रहा हूं...मैं एक ऐसे सफर पर जाने वाला हूं, जिसका ख्वाब मैं बचपन से देखता रहा हूं...ये कुछ ऐसा है जिसपर हम हमेशा गर्व करेंगे...इसमें कुछ खतरे भी हैं...लेकिन कई बार लोग अपने कमरे में टहलते हुए भी फिसल जाते हैं और उनकी जान खतरे में आ जाती है...बड़ी बात वो मकसद है, जिसके लिए हम खुद को दांव पर लगा दें...मुझे यकीन है कि मैं इस सबसे बड़े इम्तहान से विजेता बनकर तुम्हारे और बच्चों के पास लौट आउंगा....नन्हीं लेना को मेरा प्यार देना....तुम्हारा...यूरी।”
 12 अप्रैल 1961, बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, कजाकस्तान। वो एतिहासिक दिन आ पहुंचा, यूरी ने दुनिया के नाम अपना संदेश रिकार्ड करवाया और ड्रेसिंग रूम में आ गए, जहां स्पेस सूट पहनने में साथियों ने  यूरी गैगेरिन की मदद की। स्पेस सूट पहन लेने के बाद यूरी को लांच पैड तक ले जाने के लिए एक खास बस में बिठाया गया। बस में यूरी के साथ बतौर बैकअप कॉस्मोनट घेरमान तितोव भी स्पेस सूट पहनकर पीछे की सीट पर बतौर बैकअप पायलट मौजूद थे। तभी एक साथी  इवानोव ने सौभाग्य के लिए एक चॉकलेट खिलाकर यूरी का मुंह मीठा कराया। बस कॉस्मोड्रॉम की ओर चल दी, और इसके साथ ही तितोव के दिल में एक तूफानी हलचल भी शुरु हो गई।
तितोव किसी भी मायने में यूरी से कम नहीं था, लेकिन इतिहास रचने का मौका यूरी को मिल रहा था। तितोव ने कई साल बाद एक इंटरव्यू में बताया कि जब तक यूरी बस से उतरकर रॉकेट की ओर नहीं चले गए, तब तक उन्हें यही लगता रहा कि शायद अगले ही पल कुछ ऐसा हो जाएगा, कि यूरी की जगह अंतरिक्ष जाने का मौका उन्हें मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बस कॉस्मोड्रॉम पहुंची, यूरी बस से उतरे और उन्होंने वहां मौजूद सैन्य अधिकारियों और मिशन वैज्ञानिकों को अपना परिचय देने की औपचारिकता निभाई। तितोव बस में ही बैठे रहे, उनके लिए अब कोई उम्मीद नहीं बची और यूरी एक नया इतिहास रचने के लिए रॉकेट की ओर बढ़ गए। तितोव ने निराशा में आंखें बंद कर लीं और एक झपकी लेने में खो गए।
कॉस्मोड्रॉम में आला सरकारी और फौजी अफसरों के साथ सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ सेर्गेई कोरोलेव भी मौजूद थे। खतरों से भरे इस सफर के लिए यूरी का चुनाव उन्होंने ही किया था। कोरोलेव भावुक हो उठे, क्योंकि वो ये बात बखूबी जानते थे कि इस सफर से यूरी के जिंदा वापस आने की संभावना 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। फिरभी यूरी से विदा लेते वक्त उन्होंने स्नेह के साथ कहा, “यूरी वापस लौट के आना।”
दोस्त ने निभाई दोस्ती
दुनिया की इस पहली अंतरिक्षयात्रा के दौरान वोस्तोक में यूरी के पूरे सफर का नियंत्रण ग्राउंड कंट्रोल के हाथों में था। यूरी को तब तक नियंत्रण हाथ में लेने की इजाजत नहीं थी, जब तक कि कोई आपात स्थिति सामने न आ जाए। आपात स्थिति में यूरी एक खास कोड के जरिए नियंत्रण हाथ में ले सकते थे, लेकिन ये खास कोड सेना के जनरल समेत बस दो-तीन लोगों को ही मालूम था और किसी इमरजेंसी से पहले यूरी को ये कोड न बताने की सख्त ताकीद की गई थी। कोरोलेव से गले मिलने के बाद यूरी रॉकेट पर ले जाने वाली लिफ्ट में सवार हो गए। वोस्तोक कैप्स्यूल में यूरी को बिठाने की जिम्मेदारी निभाई यूरी के एक दोस्त इंजीनियर ने। यूरी को बिठाने के दौरान उसने अपनी दोस्ती निभाई और अपनी जान जोखिम में डालकर यूरी के कान में चुपके से वो इमरजेंसी कोड बता दिया, जिसकी मदद से आपात स्थिति आने पर यूरी नियंत्रण अपने हाथों में ले सकते थे। इसपर यूरी मुस्कुराए और बोले, “मैं, जानता हूं, जनरल ने मुझे पहले ही कोड बता दिया है।”
रॉकेट लांच होने में अभी कुछ वक्त था। वोस्तोक कैप्स्यूल में बैठकर यूरी कंट्रोल रूम में मौजूद साथियों से माइक्रोफोन पर मजाक करने लगे। इसपर कोरोलेव ने यूरी को सावधान किया कि वो जो कुछ भी कह रहे हैं, वो सब रिकॉर्ड हो रहा है। ये जानकर यूरी झेंप गए और कंट्रोल रूम ठहाकों से गूंज उठा। अंतिम जांच पूरी होने पर, कोरोलेव ने इशारा किया और वोस्तोक के बूस्टर इंजन दहक उठे। रॉकेट लांच होते ही यूरी ने पूरे जोश में भरकर कहा...पियाकली...यानि... आओ चलें। तूफानी रफ्तार से रॉकेट आसमान की ओर बढ़ा चला जा रहा था। वोस्तोक कैप्स्यूल में मौजूद यूरी इन गौरवशाली क्षणों के आनंद में मातृभूमि को समर्पित एक गीत गुनगुना उठे -
the motherland knows...the motherland hears
when her son is flying up i the clouds....
(मातृभूमि जानती है...मातृभूमि सुनती है..
जब उसका बेटा...ऊपर बादलों में उड़ान भरता है) 
रॉकेट लांच के तीन मिनट बाद, वोस्तोक के बूस्टर रॉकेट्स गैरेरिन को 28164 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से धरती की सरहदों के पार लिए चले जा रहे थे। 
लांचिंग के 5 मिनट बाद, यूरी गैगरिन अंतरिक्ष से खूबसूरत नीली धरती को निहारने वाले पहले इंसान बन गए। 
वोस्तोक कैप्सूल के कॉकपिट की छोटी सी खिड़की के उसपार चमकीली नीली धरती नजर आ रही थी। धरती की इस खूबसूरती को देखने में यूरी खो गए। उन्होंने माइक्रोफोन से कंट्रोल रूम को बताया, “अब मैं धरती के रंगों को देख रहा हूं...ये खूबसूरत है...बेहद खूबसूरत।”
 अंतरिक्ष तक की उड़ान के 9 मिनट बाद रफ्तार की तेज सनसनाहट अचानक थम गई। गुरुत्वाकर्षण का असर खत्म हो गया। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा को पीछे छोड़कर यूरी पृथ्वी की अपनी कक्षा में पहुंच गए। उन्होंने कंट्रोल रूम को बताया, “सबकुछ ठीक है...शून्य गुरुत्वार्षण का अनुभव शानदार है...मुझे मजा आ रहा है।” 
धरती पर जारी राजनीति का खेल
मानव इतिहास की सबसे शानदार उपलब्धि हासिल हो गई। किसी इंसान को अंतरिक्ष भेजने का सपना साकार हो गया। अपनी कक्षा में मौजूद यूरी गैगेरिन अब धरती की अपनी पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे। इस ऐतिहासिक कामयाबी के ऐलान के लिए पूर्व सोवियत सरकार अब तैयार थी। पहले से ही तीन बिल्कुल अलग-अलग हालात के लिए लिफाफे तैयार किए गए थे। पहले लिफाफे में यूरी गैगेरिन के मिशन की शानदार कामयाबी का ऐलान था। दूसरे लिफाफे में,तकनीकी खामी के चलते रूस की सीमा से बाहर लैंड हो गए रूसी कॉस्मोनट की मदद करने की अपील थी। जबकि तीसरे लिफाफे में एक शोक संदेश था, जिसमें लिखा था कि मिशन के दौरान यूरी गैगरिन की मौत हो गई। जब वैज्ञानिक आंकड़ों से मिशन की कामयाबी की पुष्टि हो गई, तो क्रेमलिन के आदेश पर पहला लिफाफा खोला गया और लोगों को साम्यवादी सरकार की इस शानदार कामयाबी की खबर दी सरकारी एजेंसी तास ने। रेडियो एनाउंसर यूराई लैवितान ने बाद में बताया कि पूरे करियर के दौरान कोवल दो मौके ही ऐसे आए, जब बुलेटिन पढ़ने के बाद वो फफक-फफक कर रो पड़े थे। पहला मौका था जब उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की खबर पढ़ी थी और दूसरा मौका अब सामने था, जब लो अंतरिक्ष में यूरी गैगेरिन के मौजूद होने का समाचार लोगों को सुना रहे थे।
धरती से करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर एक छोटे से कैप्स्यूल में मौजूद मौजूद गैगेरिन पृथ्वी की पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे, लेकिन ग्राउंड कंट्रोल में मौजूद वैज्ञानिकों का तनाव हर पल बढ़ता जा रहा था। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ कोरोलोव ने कंट्रोल रूम से पूछा, “कंट्रोल, वो कैसा है।”
इसपर स्पीकर पर यूरी की आवाज गूंजी, “मैं सुरक्षित हूं।”
तभी कंट्रोल रूम में लगे टेलीविजन स्क्रीन से यूरी के वीडियो सिगनल टूटने लगे। कोरोलोव यूरी को कुछ बताना चाहते थे कि अचानक टीवी स्क्रीन से यूरी की तस्वीर गायब हो गई। किसी अनहोनी के अंदेशे से कंट्रोल रूम में मौजूद कोरलोव समेत सारे वैज्ञानिक कांप उठे।
दरअसल यूरी टेलीविजन रिसीवर की रेंज से बाहर चले गए थे।
लांच से 30 मिनट से भी कम वक्त के भीतर यूरी गैगेरिन प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरे और उन्होंने आधी धरती को नींद के आगोश में समेटे रात के गहरे साये को देखा। जल्दी ही गैगेरिन का कैप्स्यूल अमेरिका के ऊपर से गुजरा, जिसके नागरिक अंतरिक्ष में पहले इंसान यूरी गैगेरिन की शानदार फतह से बेखबर गहरी नींद में खोए थे।
यूरी की जान खतरे में
अंतरिक्ष में करीब एक घंटा गुजारने के बाद कंट्रोल रूम में रीइंट्री यानि धरती के वातावरण में वापसी की गणना शुरू कर दी गई। पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रहे गैगेरिन को अब बर्न-अप की मदद से वोस्तोक कैप्स्यूल की रफ्तार कम करनी थी। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो गैगरिन पृथ्वी की और ऊंची कक्षा में प्रवेश कर जाते, जहां से फिर वापस लौटने का और कोई रास्ता नहीं था। रॉकेट बर्न-अप के साथ यूरी के कैप्स्यूल की रफ्तार तो कम हो गई लेकिन एक बड़ा हादसा सामने आ गया। वोस्तोक के सर्विस मॉड्यूल को कैप्स्यूल से अलग होना था, लेकिन दोनों एक-दूसरे में फंस गए। कंट्रोल रूम में वैज्ञानिक कांप उठे। वोस्तोक सर्विस मॉड्यूल अगर कैप्स्यूल के साथ जुड़ा रहता तो अंतरिक्ष में गैगेरिन की मौत तय थी। यूरी कंट्रोल रूम का रेडियो संपर्क टूट गया। तेज गर्मी से दहकते और एक-दूसरे से टकराते वोस्तोक के दोनों हिस्से धरती के वातारण में प्रवेश कर गए। हालात अब हाथ से निकल गए। कोरलोव अब कंट्रोल रूम के दूसरे वैज्ञानिकों के साथ इंतजार के सिवा कुछ और नहीं कर सकते थे। 
साईबेरिया के सारातोव इलाके में किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। कि तभी अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। खेतों में काम कर रही एक लड़की घबराकर मां से लिपट गई। दोनों ने आसमान की ओर नजरें उठाईं। आसमान से दो चीजें पैराशूट के सहारे नीचे गिर रही थीं। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश के अंतिम क्षणों में भीषण तापमान से वोस्तोक के एक-दूसरे में फंसे दोनों दोनो अपने आप अलग हो गए और इसके कुछ पल बाद ही टुकड़ों को अलग कर दिया। इसके कुछ ही क्षण बाद धरती से करीब साढ़े छह किलोमीटर की ऊंचाई पर गैगेरिन ने कैप्स्यूल के बाहर पराशूट से छलांग लगा दी।
108 मिनट की इस ऐतिहासिक अंतरिक्षयात्रा के दौरान गैगेरिन ने 40234 किलोमीटर की दूरी तय की और इसके साथ ही वो अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले पहले इंसान बन गए। कंट्रोल रूम में गहरा सन्नाटा था। कोरोलोव ने फोन उठाया और फिर साथियों को यूरी की साईबेरिया में सुरक्षित लैंडिंग की खबर दी। इसके साथ ही कंट्रोल रूम खुशियों से झूम उठा।
अंतरिक्ष में पहला अंतरिक्षयात्री भेजने में पूर्व सोवियत संघ ने बाजी मार ली और अमेरिका स्पेस-रेस में मीलों पीछे छूट चुका था। तात्कालीन सोवियत राष्ट्रपति निकिता खुश्चेव ने गैगेरिन की अंतरिक्षयात्रा को साम्यवादी सिद्धांतों की सर्वोच्च विजय के तौर पर प्रचारित किया। गैगेरिन अब नेशनल हीरो थे।
गैगेरिन की वापसी के दो दिन बाद सोवियत सरकार ने इस शानदार उपलब्धि का सार्वजनिक जश्न मनाया। एयरफोर्स का एक विमान गैगेरिन को लेकर सीधे क्रेमलिन पहुंचा। जीत के गौरव से भरे छोटे कद के गैगेरिन सधे कदमों रेड कारपेट पर चल रहे थे कि तभी उनकी पत्नी ने उनके पैरों में कुछ महसूस किया।
यूरी रेड कारपेट पर चले आ रहे थे, लेकिन उनके जूते का एक फीता खुला हुआ था।
अपने नेशनल हीरो की अगवानी के लिए क्रेमलिन के लाल चौक पर सरकारी अधिकारियों के साथ गैगेरिन का परिवार भी मौजूद था। लेकिन सबसे खास बात ये कि लाखों की भीड़ के साथ यूरी से मिलने राष्ट्रपति खुश्चेव खुद आए थे।
गैगेरिन की मशहूर मुस्कान की चमक पूरी दुनिया में फैल गई। क्यूबा, जापान, मैक्सिको, कनाडा, लीबिया और भी कई देशों में यूरी गैगेरिन जहां भी गए, उन्हें देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी। गैगेरिन की उपलब्धि इतनी बड़ी थी, कि सोवियत प्रतिद्वंदी अमेरिका भी यूरी गैगेरिन की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। यूरी गैगेरिन अब किसी एक देश के हीरो नहीं रहे, बल्कि वो पूरी मानव जाति के नायक बन गए। गैगेरिन की 108 मिनट की अंतरिक्षयात्रा ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया। गैगेरिन की उपलब्धि ने वैज्ञानकों और युवाओँ को इस कदर जोश और आत्मविश्वास से भर दिया कि महज आठ साल बाद ही मानव ने चंद्रमा पर अपने कदमों के निशान बना दिए। इंसानियत के इस हीरो के सम्मान में नील आर्मस्ट्रांग यूरी गैगेरिन का एक मैडल अपने साथ ले गए थे, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए चंद्रमा पर रख दिया। दुनिया के इस पहले अंतरिक्षयात्री ने पृथ्वी की पहली परिक्रमा के दौरान जिन खतरों का सामना किया, दुनिया ने उनसे सबक लिया और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ अंतरिक्षयात्रियों की नई पीढ़ी तैयार हुई।

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

‘उम्मीद कभी खत्म नहीं हो सकती’


 ऐसे समाज में जहां ज्यादा घबराहट और उथल-पुथल होती है, ज्योतिषियों की जरूरत भी वहीं सबसे ज्यादा होती है – प्रो. यशपाल 
जमाना कभी किसी एक चीज का नहीं होता। विज्ञान बड़ा है, तो टेक्नोलॉजी और भी बड़ी, अब तो टेक्नोलॉजी के बगैर जिंदगी सोची भी नहीं जा सकती। लेकिन अब लोगों ने टेक्नोलॉजी को ही साइंस मान लिया है। साइंस ज्ञान है, उत्सुकता है, हमेशा कुछ नया तलाशने की बेचैनी है, जागरूकता है, जबकि टेक्नोलॉजी साइंस का प्रायोगिक रूप। बीते 200 साल में साइंस ने समाज पर असर तो डाला, लेकिन लोगों ने साइंस का मतलब नई-नई मशीनों और नई-नई सुविधाओं को ही समझा। इसलिए समाज भी यांत्रिक होता गया, जिसमें ज्ञान की गहराई, प्रकृति के नियमों को समझने और जागरूक होने की जरूरत खत्म होती चली गई। लोगों को हम साइंस का सही अर्थ नहीं समझा सके। शुरुआत में इंसान ने आसमान को देखा तो सैकड़ों-हजारों तारे छिटके नजर आए। फिर उसने देखा कि कुछ तारे हिलते हैं-चलते हैं, वो अपनी जगह पर नहीं रहते और कुछ वक्त बाद वो फिर से वापस आ जाते हैं। इस तरह ग्रहों की खोज हुई, ये विज्ञान का शुरुआती रूप था। ग्रह केवल खोजे ही नहीं गए बल्कि हमारे पूर्वजों ने सही-सही ये भी बता दिया कि कितने ग्रह हैं  और उनकी स्थिति क्या है ? लेकिन बाद में इसे ज्योतिष से जोड़ दिया गया।
विज्ञान और हम दो चीजें हैं। चीजों को समझने की हममें कितनी क्षमता है, इसका भी फर्क पड़ता है। मुझे तो हैरानी होती है कि हमने इतने सारे सवाल पूछे और कुछ के जवाब मिलने भी लगे। क्या कमाल की जिंदगी हमें मिली है, आंखें हैं जिनसे देख सकते हैं, दिमाग है जिससे सोच-समझ सकते हैं। हर वक्त कुछ नया जानने की उत्सुकता और प्रकृति के रहस्यों को समझने की शक्ति जो हमें मिली है, इससे बड़ी चीज और कुछ हो ही नहीं सकती। बच्चे भी उत्सुकता के चलते ही सीखते हैं, उत्सुकता न हो तो वो चलना भी न सीख पाएं, और अगर ये उत्लुकता ही मर जाए-खत्म कर दी जाए तो मानव जाति का इससे बड़ा नुकसान कोई दूसरा नहीं हो सकता। मुझे दुख होता है कि हम और हमारे स्कूल बच्चों को इस तरह से पढ़ाते हैं कि उनकी उत्सुकता को मारते जाते हैं। ये बहुत अफसोसनाक है। समझने की कोई सीमा नहीं, ये कहना कि हमने सबकुछ जान लिया है और हम जैसा कह रहे हैं वैसा ही करो, ये बिल्कुल नहीं होना चाहिए। नए सवालों की खोज बेहद जरूरी है, अगर खुदा या ईश्वर है तो फिर उसके दिमाग में क्या था ? खुदा या ईश्वर इस तरह से क्यों बना ? किसी दूसरी तरह से क्यों नहीं ? क्या कोई दूसरा भी है, जिसे हम देख नहीं पाते ?
हमारी जो समझने की सीमा है, वो बड़े कमाल की है। हम कितने लंबे हैं, शायद डेढ़ या दो मीटर, अब इसे दस-दस बार गुणा करते जाएं तो ब्रह्मांड तक जा पहुंचेंगे और अगर दस-दस बार के गुणन में हम पीछे जाएं तो अणु के स्तर तक जा पहुंचेंगे। ब्रह्मांड और अणु, हम इनके बीच में फंसे हैं। हम अभी जानते ही कितना हैं ? ऐसे में ये दावा कि हम भविष्यवाणी कर सकते हैं काफी हास्यास्पद है। भविष्य का हाल बताने वाले हम होते कौन हैं ? ये मान लेना कि चीजें वहीं तक सीमित हैं, जो हम समझ पाए हैं, ये तो ज्यादती है।
सत्य किताबों में पढ़ लेना और सत्य की खोज करना दो अलग-अलग चीजें हैं। अगर आप जनरल तरीके से डिस्क्राइब करें तो कुछ भी कह सकते हैं। प्राचीन ज्ञानियों में एक अनोखी ताकत थी, वो बेहद सीमित तथ्यों की मदद से अंदाजा लगा लेते थे। अंदाजा लगाना बड़े काम की चीज है। विज्ञान केवल उपकरणों का मापन और गणना भर नहीं है। परिकल्पना और अंदाजा लगाना भी विज्ञान है। अगर आपमें उत्सुकता न हो, कल्पना न हो तो आप प्रकृति के कई रहस्यों को समझने से महरूम रह जाते हैं। सत्य की तलाश में जितना आनंद है, इसमें जितनी कविता है, इसमें एक किस्म की जो गहरी लगन है, उतनी किसी और चीज में नहीं।
किसी से पूछा गया कि विज्ञान क्या है ? तो जवाब मिला - जो वैज्ञानिक करते हैं। क्यों ? कैसे ? क्या ? इन सवालों की खोज, और यही क्यों, कुछ और क्यों नहीं ? इसकी खोज ने मानव जाति को गुफाओं से निकालकर आज यहां तक पहुंचाया है। विज्ञान एक शिल्प है और वैज्ञानिक शिल्पकार।
विज्ञान एक प्रकृति का दर्शन यानि नेचुरल फिलॉसफी है। विज्ञान में कोई सिद्धांत जिसे गलत न साबित किया जा सके उसे सिद्धांत ही नहीं माना जाता। गैलीलियो एक बच्चे की तरह था, उस वक्त जो बातें बताई जा रहीं थीं, उन्होंने उसे नहीं माना। उसने कहा आओ करके देखें तो सही, क्या नतीजा निकलता है। इसी बच्चों जैसी उत्सुकता से ही गैलीलियो और न्यूटन बनते हैं।
मां अपने बच्चे को प्यार करती है, ये बड़ी सुंदर चीज है। किसी ने मां से कहा नहीं कि बच्चे को प्यार करो, लेकिन जिंदगी खुद को बचाना चाहती है, खुद को प्रसारित करना चाहती है। 50-60 हजार साल पहले कुछ ऐसा हुआ कि पूरी दुनिया में बस मुश्किल से हजार लोग बचे। ये हजार लोग इधर-उधर बिखर गए और दुनिया के अलग-अलग इलाकों में जाकर आबाद हुए। इससे अलग-अलग समाजों, भाषाओं और संस्कृतियों का विकास हुआ, सामाजिक नियम बने। फिर वो सभ्यताएं मिलीं, भले ही इसकी वजह जंग रही हो लेकिन उनमें संपर्क हुआ। इससे हमने कला, संस्कृति, संगीत और परंपराएं सींखीं। हमारे विकास की सबसे मजेदार बात ये कि हमने हंसना सीखा।
पहले हम खुद को ही सबकुछ समझते थे और नहीं समझ पाते थे कि ये अलग-अलग समाज क्यों हैं ? लेकिन अब हम समझ चुके हैं कि मानव जाति का विकास इसी तरह से होना था।  लेकिन फिरभी, आजकल एक तरह का तनाव है। दुनियाभर में फैली विभिन्नताओं और संस्कृतियों को बचाने और संरक्षित रखने के बजाए हम उन्हें अपना दुश्मन समझने लगे हैं। हम दूसरों के दुश्मन और हमलावर क्यों मानते हैं ? हम शिक्षा और ज्ञान की बात करते हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात ये होनी चाहिए कि हम दुनियाभर की सांस्कृतिक विभिन्नताओं का आनंद लें। सांस्कृतिक अलगाव जातिभेद, वर्गभेद, पंथभेद, रंगभेद और इस जैसी दूसरी चीजों को जन्म देता है जो मानव के खिलाफ जाती हैं। विज्ञान हमें बताता है कि हमारी विरासत क्या है ? हम कहां से आए हैं ? विज्ञान की इस देन को हम अब तक लोगों को समझा ही नहीं सके।
धर्म को लेकर अब काफी झगड़ा किया जा रहा है। धर्म से जुड़े सवालों पर मैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ये कहूंगा कि आप किन चीजों को धर्म कहते हैं ? क्या तमाम कर्मकांडों को ? तो फिर मैं बौद्ध और जैन धर्म का नाम लूंगा, जहां भगवान की अवधारणा ही नहीं है। सदाचार और नैतिकता के कुछ नियमों को मिलाकर धर्म की बुनियाद तैयार की गई, इनमें अध्यात्म भी शामिल था। प्राचीनकाल में धार्मिक दार्शनिकों ने बहुत गहरे-गहरे सवाल पूछे, इनमें से कुछ सवाल अब वैज्ञानिक भी पूछते हैं। इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश शुरू हुई और धर्म अपने रास्ते पर आगे बढ़ा। फंडामेंटल का मतलब है कि कुछ है और उसे बदला नहीं जा सकता, तो इससे मुश्किलें आती हैं। दुनिया बदल रही है, सब चीजें बदल रही हैं, जो चीज कभी न बदले, मेरे विचार से वो खतरे में है। कोशिश हो रही है कि चीजें बिल्कुल न बदलें, इससे बड़ी घबराहट और मुश्किलें आ रही हैं। धर्म वो भी है, जैसा कहा जाता है अहम् ब्रह्मास्मि, कि खुदा या ईश्वर को मैंने बनाया। इसे वैज्ञानिक ढंग से भी कहा जा सकता है कि खुदा या ईश्वर की जरूरत थी इसलिए बनाया। 
शुरुआत में बहुत सी चीजें समझ में नहीं आतीं थीं। ये समझ में नहीं आता था कि वो अमीर क्यों है और मैं गरीब क्यों ? तो फिर पिछले जन्म और कर्म का हिसाब सामने आया। विज्ञान ने कई सवालों के जवाब दिए, लेकिन जिनके जवाब नहीं मिले वो काम धर्म की चादर ओढ़कर पूरा हो गया। अब इसे लेकर झगड़े की जरूरत नहीं, बहुत से धार्मिक लोग बहुत उम्दा इंसान होते हैं। उनका खुद पर पूरा मियंत्रण रहता है वो बहुत नैतिक भी होते हैं। धर्म भी इंसान की विरासत है और विज्ञान भी हमारी विरासत है।
ये कहना कि किताब में लिखा है इसलिए यही सही है और कुछ दूसरा सत्य हो ही नहीं सकता ये गलत है। ये कहना कि यही मानो, यही सही है , ऐसा ही होना चाहिए, ये सही नहीं है। विज्ञान इस तरह से काम नहीं करता। ऐसे समाज में जहां ज्यादा घबराहट और उथल-पुथल होती है, ज्योतिषियों की जरूरत भी वहीं सबसे ज्यादा होती है।
उम्मीद कभी खत्म नहीं हो सकती। बहुत संभव था कि 65-70 में परमाणु युद्ध छिड़ जाता, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ। तो कुछ तो फर्क पड़ा है, शायद ऐसा कभी न हो। शायद और परमाणु परीक्षण भी न हों। एक से बढ़कर एक पागल बैठे हुए हैं, नाभिकीय हथियार इकट्ठा किए जा रहे हैं। कभी-कभी खुद पर हंसी भी आती है। हमारे देश में भी बातें होती हैं कि बम बनाने का हक खत्म हो जाएगा तो हम भी खत्म हो जाएंगे। तो मैं सोंचता हूं कि ये हक खत्म ही हो जाए, हमारा भी और साथ वाले का भी। ये कहना कि वो हमें तीन बार मार सकते हैं और हम केवल दो बार ही उन्हें मार सकते हैं, इसलिए हमें और बम बनाना चाहिए, ये बेवकूफाना है, ये पागलपन है।
जिंदगी को संभालने और उसे विकास के नए रास्तों पर आगे बढ़ाने का नाम ही विज्ञान है। समाज, रिश्तों और जीवन पद्धति के ज्ञान को विज्ञान में पिरो दीजिए, फिर देखिए दुनिया ही बदल जाएगी।
( प्रोफेसर यशपाल से हुई एक लंबी बातचीत पर आधारित)

प्रस्तुति : संदीप निगम