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रविवार, 20 अप्रैल 2014

मानव को ब्रह्मांड से उसके रिश्ते की याद दिलाती है ये ‘धूल’!

 गर्मी का मौसम दस्तक दे रहा है. इसी के साथ हम गर्मियों में उड़ने वाली धूल-धक्कड़ से भरी आंधियों को सोंच-सोंचकर अभी से परेशान हो रहे हैं. मशहूर कहावत है, ‘इंडिया यानि हीट एंड डस्ट.’ धूल से घबराएं नहीं, इसे मामूली और जी का जंजाल मत समझें. आइए एक मुठ्ठी धूल उठाइए. क्या आप जानते हैं, कि इसमें क्या है? ये धूल कैसे बनी है? कहां बनी है? और आप तक कैसे पहुंची?

भारतीय संस्कृति में मानव देह को मिट्टी माना गया है. कबीर जैसे कई दार्शनिक कवियों ने अंत में धूल में मिल जाने की बातें भी कहीं हैं. क्या हम वाकई धूल से आए हैं? और हमें वापस एक दिन इसी धूल में खोकर बिखर जाना है? ये सवाल दार्शनिक-आध्यात्मिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक भी है.

वैज्ञानिकों को पहली बार सुदूर अंतरिक्ष में एक सुपरनोवा के अवशेषों में धूल की मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं. सुपरनोवा में मौजूद धूल और आपके कदमों के नीचे की धूल में जैविक पदार्थों को छोड़ कोई और फर्क नहीं है.
इस सुपरनोवा के ऑब्जरेशन से एक पुराने सवाल का जवाब भी मिला है कि आखिर सितारों, ग्रहों और हम लोगों को बनाने के लिए जरूरी ‘रॉ मैटीरियल’ या कच्चा माल आखिर बनता कहां है?

एस्ट्रोनॉमी में ये सबसे लोकप्रिय और मजेदार तथ्य है, जिसे 1980 में कॉस्मस के लेखक कार्ल सगान से लेकर सभी प्रमुख एस्ट्रोनॉमर बार-बार दोहराते रहे हैं, कि हमारे शरीर, जिस हवा में हम सांस लेते हैं और हमारे पैरों के नीचे मौजूद जमीन में मौजूद ज्यादातर तत्वों (पानी यानि  H2O में मौजूद हाइड्रोजन को छोड़कर सबकुछ) का निर्माण सितारों की भट्ठी में हुआ है.  

पहले सितारे के जन्म लेने से पहले तक इस ब्रह्मांड में ज्यादा हाइड्रोजन ही था. कुछ मात्रा हीलियम और चुटकीभर लीथियम भी मौजूद था. ऑक्सीजन, कार्बन, नाइट्रोजन, सिलिकॉन और लोहा समेत सभी दूसरे तत्व उस थर्मोन्यूक्लियर रिएक्शन से बने हल्के परमाणुओं से अस्तित्व में आए जिससे सूरज और इसके अरबों भाइयों को ऊर्जा मिलती है. जैसे ही पहले सितारे की मौत हुई, ये सारे तत्व उस सितारे से फूटी स्ट्रीम के साथ चारों ओर बिखर गए.

ये सब पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे ये घटना बहुत पहले और अंतरिक्ष के किसी दूर-दराज के कोने में घटी होगी और इससे उन तत्वों का निर्माण हुआ होगा, जिन्होंने हमें बनाया. लेकिन चौंकाने वाला तथ्य ये है कि ये प्रक्रिया अब तक जारी है. उत्तरी चिली के हाई एटाकामा रेगिस्तान में मौजूद एटाकामा लार्ज मिलीमीटर –सब मिलीमीटर एरे टेलिस्कोप (अल्मा) के मल्टीपल एंटीना के इस्तेमाल से एस्ट्रोनॉमर्स ने ठंडी धूल के उस बादल को खोज निकाला है जिसका निर्माण एक सितारे की मौत से फूटे महासुपरनोवा से हुआ है. धूल का ये घना बादल हमारी आकाशगंगा मिल्की-वे से ठीक ऊपर मौजूद एक दूसरी आकाशगंगा के लार्ज मैगेलैनिक क्लाउड में मौजूद है.

इस कॉस्मिक विस्फोट के अवशेष को सबसे पहले 1987 में देखा गया था. आमतौर पर सितारों के मौत की घटना सुपरनोवा नंगी आंखों से नजर नहीं आती, इन्हें किसी ऑब्जरवेटरी के विशाल टेलिस्कोप्स से ही देखा जा सकता है. लेकिन एस्ट्रोनॉमी के इतिहास में 1604 की वो घटना बड़ी मशहूर है, जब सुदूर अंतरिक्ष में हुए एक सुपरनोवा धमाके को यहां धरती से नंगी आंखों से देखा गया था. इस घटना को बिना किसी उपकरण (तब तक टेलिस्कोप बना ही नहीं था) अपनी आंखों से देखने वाले शख्स थे  जोहान्स कैपलर, जिन्होंने 1604 में इस सुपरनोवा को नंगी आंखों से देखा था. ये सुपरनोवा इतना ताकतवर था कि इसकी रोशनी एक दशक तक धरती से नजर आती रही थी. लेकिन दुर्भाग्यवश, गैलीलियो अपना पहला टेलिस्कोप बनाते इससे पहले ही ये नजर आना बंद हो गया.

1987 में एस्ट्रोनॉ़मर्स ने हर उपलब्ध टेलिस्कोप का मुंह अंतरिक्ष में मरते हुए सितारों की ओर मोड़ दिया. इस अद्भुत प्रयोग से एस्ट्रोनॉमर्स सुपरनोवा की घटना को पहली बार देखने में कामयाब रहे. सुपरनोवा के इनीशियल फ्लैश के बाद जबरदस्त धमाके से फूटे शॉक वेव के साथ एक छल्ले की शक्ल में अंतरिक्ष में बिखरते उस मृत सितारे के तत्वों को पहली बार रिकार्ड किया गया. सुपरनोवा धमाके से फूटी ऊर्जा ने तेज रोशनी का एक छल्ला सा बना दिया.  

और अब चिली के टेलिस्कोप अल्मा से एस्ट्रोनॉमर्स ने सुपरनोवा के उस चमकीले छल्ले में ‘धूल’ खोज निकाली है. ये धूल उस मृत सितारे के अन्य तत्वों के साथ सघन होती जा रही है. घने होते जा रहे सुपरनोवा के इस बादल में कार्बन मोनो ऑक्साइड और सिलिकॉन ऑक्साइड जैसे तत्व हैं. आहिस्ता-आहिस्ता ये धूल गैस के इन बादलों में घुलमिल जाएगी. और किसी दिन, सघन होने की इस प्रक्रिया के चलते शायद कुछ लाख साल या फिर कुछ अरब साल बाद घूल और गैस का ये बादल घना होते-होते किसी नए सितारे या नए ग्रह या फिर किसी नए प्राणी को जन्म दे देंगे.

यूनिवर्सिटी कॉलेज आफ लंदन के एस्ट्रोनॉमर मिकाको मात्सुएरा बताते हैं, “ हरेक आकाशगंगा धूल-धक्कड़ से भरी पड़ी है. किसी आकाशगंगा के इवोल्यूशन में ये धूल ही सबसे अहम भूमिका निभाती है. आज हम जानते हैं कि इस धूल को धरती पर कई तरीकों से बनाया जा सकता है. लेकिन शुरुआती ब्रह्मांड में इस धूल को पैदा करने वाली बस एक ही चीज थी – सुपरनोवा. अब हमें इस सिद्धांत को साबित करने के लिए डाइरेक्ट एविडेंस भी मिल चुके हैं.”

धरती पर हर दिन 3 से लेकर 500 मीट्रिक टन तक धूल की अंतरिक्ष से बारिश होती रहती है. आसमान से हम पर बरसने वाली ये धूल वही है, जिसका निर्माण सुदूर सितारों की सुपरनोवा भट्ठी में होता है. आइए एक मुट्ठी धूल उठाएं. अब आप इसे मामूली नहीं समझ सकते, क्योंकि इसका निर्माण जाने कितने प्रकाशवर्ष दूर किसी सितारे की भट्ठी में हुआ है. आपकी एक मुट्ठी धूल में कई सूक्ष्म उल्का और धूमकेतु के कण भी मौजूद हैं. ये एक मुट्ठी धूल धरती पर मौजूद सबसे कीमती चीज से भी कई गुना कीमती है. ये धूल मानव को ब्रह्मांड से उसके रिश्ते की याद दिलाती है. ये धूल मामूली नहीं, बेशकीमती है. क्यों, है न !

संदीप निगम

... गुडबॉय गैबी!

मशहूर उपन्यासकार और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ का 87 साल की उम्र में मैक्सिको में निधन हो गया . मार्क़ेज की गिनती स्पैनिश भाषा के महान लेखकों में होती है. उनके कालजयी उपन्यास 'वन हन्ड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड' के जादुई यथार्थवाद ने लोगों को अपना मुरीद बना दिया था. स्वतंत्र लोकतांत्रिक मूल्यों और सबसे निचले तबके को इंसाफ दिलाने के संघर्ष के साथ मार्केज़ रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-बड़े विरोधाभासों के बीच आम आदमी की कहानी कहते थे. इन मूल्यों के बगैर किसी भी समाज में कला और रचनात्मक विज्ञान का विकास संभव नहीं. अपने पाठकों के लिए 'वॉयेजर' साभार पेश करता है बीबीसी हिंदी के संपादक निधीश त्यागी की लिखी एक श्रद्धांजलि.

'बहुत साल बाद, जब वे फ़ायरिंग स्क्वॉड के सामने खड़े थे, कर्नल ऑरेलिनो बुएंदिया को वह दोपहर याद आ रही थी, जब उनके पिता उन्हें बर्फ़ दिखलाने ले गए थे.'
'वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड' का ये पहला वाक्य है. एक वाक्य में सौ साल हैं, बारूद की आने वाली गंध है, जो मिट्टी और मृत्यु में मिलने वाली है और जन्म के कुछ सालों बाद का वह एक बच्चे का बर्फ़ को लेकर कौतुक, दोपहर में ठंड को महसूसने का रोमांच और पिता की उंगली पकड़ने का आश्वस्तिबोध है. एक कालपात्र में सब कुछ समेटे हुए. एक पल में सौ साल समेटने की क्रिया.

ढाई करोड़ प्रतियाँ बिकने वाला यह उपन्यास इसके आगे शुरू होता है. इस गतिशील क्रिया में. फैलता-सिकुड़ता-समेटता. देश और काल को, स्मृति और कल्पना को, तथ्य और उसकी उड़ान को. मार्केज़ के साथ वे वाक्य नहीं गए हैं. वे यहीं हैं. हमें उलट और पलट कर पढ़ते रहने के लिए. लेखक के चले जाने के बाद भी.

अवसान के समय सबसे पहले विशेषण हत्थे चढ़ते हैं. जैसे मार्केज़ के मरने पर नोबेल पुरस्कार, जादुई यथार्थवाद, उनकी बहुतेरी में से एक किताब वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड, कोलम्बिया, कैंसर, स्मृतिलोप... विशेषणों की फ़ेहरिस्त बढ़ती जाती है.

हर मृत्यु में हम अपना थोड़ा सा हिस्सा कम होते देखते हैं कुछ दिनों के लिए. पर गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ उर्फ़ गैबो एक ऐसा नाम है, जिसके लिए ये सारे विशेषण छोटे पड़ते रहेंगे. उन क्रियाशील वाक्यों के मुक़ाबले जो उन्हें लिख गए, उनके बाद भी पढ़ें जाने के लिए.

उनकी अपनी ज़िंदगी है और अपना सफ़र. आप अगली बार जब मार्केज़ का लिखा कुछ पढ़ेंगे तो क्या वे अपनी रंग-छवि-अर्थ छोड़कर आपके भीतर कुलबुलाना या साँस लेना बंद कर देंगे?

मृत्यु के बरक्स जीवन एक क्रिया की तरह है. जितना जीवन मार्केज़ के वाक्यों में हैं, जितनी ऑक्सीजन आत्मा के लिए, जितनी शिद्दत, जुम्बिश, बदमाशियां एक क्रिया की तरह हमें, हमारे पढ़ने और पढ़ने के ज़रिए हमारे होने को घटित करती है और मुमकिन भी. चाहे वह मृत्यु के बारे हो या प्रेम की या फिर जंग और तानाशाहों की.

वे हमारे बुनियादी सरोकारों को ज़मीन बनाकर आसमान नापते हैं उसे इतनी अति तक ले जाते हुए जहाँ सच या वास्तविकता भले ही धुँध में घुलने लगती है, पर सत्य या ट्रुथ अपने असल अवतार में सामने आता है. जो हर पाठक का अपना है और शायद अलग भी.

हर अच्छे कथ्य की तरह मार्केज़ के वाक्य आपको पलट कर पढ़ते हैं, आपकी अपनी सहजता, आपके अपने निरस्त्र मनुष्य में. एक क्रिया में साँस लेता हुआ, आगे बढ़ता हुआ. उन भाषाओं में भी जो मार्केज़ की नहीं थी अपने हस्ताक्षर कथ्य के साथ.

कितने ही हिंदुस्तानियों के लिए पाब्लो नेरूदा प्यार की कविताओं में देश और दुनिया के बाक़ी कवियों के मुक़ाबले ज़्यादा सगे, अपने और दिल के क़रीब लगते हैं. लेटिन अमेरिका से हमारी ज़िंदगी में आया दूसरा सबसे महत्वपूर्ण नाम गैबरियल गार्सिया मार्केज़ का है.

अपने नोबेल पुरस्कार समारोह क्लिक करें भाषण की शुरूआत वे एंतोनियो पिगाफेटा नाम के नाविक की किताब का ज़िक्र से करते हैं. पिगाफेटा दुनिया का समुद्र के रास्ते चक्कर लगाने वाले मैगेलन का सहयोगी था. जब वे दक्षिण अमेरिकी हिस्सों में आए तो जो सबसे पहला इंसान दिखलाई दिया, उसके सामने इन यूरोपीय नाविकों ने आईना कर दिया. पिगाफेटा के मुताबिक़ वह इंसान अपनी की शक्ल देखने से आतंकित हो अपने होश खो बैठा.

मार्केज़ का लिखा भी एक आईना है, जिसमें दुनिया ख़ुद को देखती है. अपनी असामान्यताओं के साथ, क्रूरताओं के साथ, किम्वंदतियों के साथ और आश्चर्य के साथ.

एक क्लिक करें इंटरव्यू में वे कहते हैं कि लोग भले ही उनके काम को जादुई यथार्थवाद के नाम पर फंतासियों की तरह देखते हैं, पर उन्होंने एक भी वाक्य ऐसा नहीं लिखा, जिसमें उनकी अपनी हक़ीकत का अंश न हो. कहीं बारिश महीनों से रुकने का नाम नहीं ले रही, कहीं गाँव का गाँव अपनी याददाश्त खो चुका है, कहीं अनिद्रा का शिकार.

इन असामान्य और छोटे सचों का विस्तार अपनी पेचीदगियाँ लेकर आता है, जो दूसरी असामान्यताओं को उधेड़ता है. मार्केज़ के लिखे ये छोटे-छोटे सच संसार के पार जाकर हमसे पहचान बढ़ाते हैं, हमें मुस्कुराने और चकित होने और मायूस होने पर मजबूर करते हैं.

उनका कहना भी था कि वे किसी साहित्य और आलोचक और अनजाने लोगों को ध्यान में रखकर नहीं लिखते. वे सिर्फ़ इसलिए लिखते हैं कि उनके दोस्त उनसे और ज़्यादा मुहब्बत करें. इसीलिए उनका जो लिखा है वह सिर पर रखे नहीं, दिल पर रखे बोझ की तरह है, जो एक इंसान दूसरे से क़िस्सागोई की सहजता से साझा कर हल्का हो जाना चाहता है. मनुष्य होने की तमाम कमज़ोरियों के साथ बेझिझक अंदाज से शब्दचित्र बनाते हुए.

पत्रकारिता और साहित्य के बीच के रिश्ते के बारे में वह क्लिक करें यहाँ बताते हैं कि साहित्य के लिए ज़मीनी सच से जुड़े रहना ज़रूरी है, जो पत्रकारिता मुमकिन करवाती है. लेटिन अमेरिकी पत्रकारिता में वे पुरानी घटनाओं को पुनर्संयोजित कर बहुत ही प्रभावी तरीक़े से पेश करने वाले सबसे माहिर लोगों में जाने जाते थे. लेटिन अमेरिका में इसे रेफ्रितो (फिर से छौंकी हुई) स्टाइल की पत्रकारिता कहते हैं.

जहाज़ दुर्घटना में बच गये नाविक की ऋंखलाबद्ध कहानी न सिर्फ़ इसकी एक बड़ी मिसाल है, बल्कि बाद में किताब 'द स्टोरी ऑफ़ ए शिपरैक्ड सेलर' भी बनकर आई. वेलकोस नाम का ये नाविक दस दिन तक समुद्र में डूबता-उतराता रहा था, जिसका मार्केज़ ने लगातार पाँच दिन छह-छह घंटे इंटरव्यू किया और उसी के शब्दों में आपबीती की तरह रिपोर्ट लिखी.

वे ये भी कहते हैं कि जहाँ एक ग़लत तथ्य पत्रकारिता की विश्वसनीयता दाँव पर लगा देता है, वहीं एक अकेला सच साहित्य को खड़े होने की ज़मीन देता है. मार्केज़ के मुताबिक़ अगर आप लोगों से ये कहें कि हाथी आसमान में उड़ रहे थे, तो कोई आपपर भरोसा नहीं करेगा. पर अगर आप ये कहें कि आसमान में चार सौ पच्चीस हाथी उड़ रहे हैं, तो लोग शायद आपकी बात मान लें.

यह मिसाल देने वाले न तो लेखक आसानी से मिलेंगे और न ही पत्रकार. पर मार्केज़ गप मारने से ज़्यादा ज़ोर उस विस्तार पर दे रहे हैं, जो उनके रिपोर्ताज में भी दिखता है. 'न्यूज़ ऑफ़ ए किडनैपिंग' एक अपहरण की घटना के ज़रिए एक देश, समय, राजनीति, सत्ता, ड्रग लॉर्ड पाब्लो एस्कोबार पर लिखी गई किताब है, उस सच के जो दिहाड़ी पत्रकारिता के टुकड़ा-टुकड़ा सच में अक्सर ठीक से दर्ज नहीं होता.

'लव इन द टाइम ऑफ कोलेरा' उनकी दूसरी सबसे लोकप्रिय किताब है. शायद प्यार पर लिखा गया दुनिया का सबसे सुंदर उपन्यास भी. मार्केज़ के वाक्य अगर भारत और लेटिन अमेरिका से दूर दुनिया की दूसरी जगहों पर अपना जादू दिखलाते रहते हैं, तो यही उनका हासिल है. उनके लिखे वाक्य अपनी ज़मीन और अपने वक़्त से बाहर जाकर किसी और समय किसी और जगह के लोगों को पढ़ सकते हैं, लिख सकते हैं और बहुत बार बदल भी सकते हैं.

इसके प्रकाशन के समय दिए गए क्लिक करें इंटरव्यू में वे बताते हैं कि कैसे देर रात तक फिदेल कास्त्रो के साथ मछली मारने के बाद उन्होंने ड्रैकुला किताब कास्त्रो के तोहफ़े के बतौर दी. सुबह नाश्ते की मेज पर कास्त्रो की आंखें सूजी हुई थीं. मार्केज़ के आते ही कास्त्रो ने ड्रैकुला के लिए भद्दी सी गाली निकाली.

कास्त्रो के साथ उनकी दोस्ती के बारे में उनका कहना था, जिस दिन मैं उसे क्यूबा पर कैसे राज करूं बताने लगूंगा, वह मुझे बताने लगेगा कि ढंग का उपन्यास कैसे लिखा जाता है. कास्त्रो से दोस्ती का एक नतीजा मार्केज़ ने ये भी भोगा कि अमरीका ने लम्बे समय तक उनके आने में अड़ंगा लगा कर रखा.

मार्केज़ की किताबें सबसे ज़्यादा अमरीका में छपीं और सबसे ज़्यादा पढ़ी गईं. और इस इंटरव्यू में वे बताते हैं कि कैसे अमरीकी काउंसलेट के दफ़्तरों के बाबू उनकी किताबों के फैन निकलते हैं, उनके ऑटोग्राफ़ चाहते हैं और फिर वीसा का आवेदन ख़ारिज कर देते हैं. बक़ौल उनके 'मुझे न्यूयॉर्क जाकर किताबें और सीडी ही खरीदनी होती हैं, कोई भाषण नहीं देने होते.'
एक सहज व्यक्ति ही अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मार्थाज विनयार्ड्स में एक लम्बी साहित्यिक मुलाक़ात के दौरान आधी रात के बाद यह कह सकता है, 'अगर फिदेल और तुम आमने-सामने बैठकर बात कर सको, तो सारी दिक़्क़तें ही दूर हो जाएंगी.' उन्होंने बिल क्लिंटन से अपने क्लिक करें इस लेख में मोनिका लेविंस्की वाले मामले में सहानुभूति भी जताई.

इसके पहले क्लिंटन ने अपने चुनाव अभियान में मार्केज़ का मुरीद होने की बात कही और क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति कास्त्रो का तो ऐतिहासिक बयान है-'अगर दुबारा जन्म लेना पड़ा तो मैं गैबो की ज़िदगी जीना चाहूंगा.'

मार्केज़ के मरने से उनके लिखे का जादू और अतियथार्थ दोनों न कम होंगे और न गायब. वे क्रियाशील रहेंगे. लिखे जाने की क्रिया के बाद. पढ़े जाने की क्रिया में. और उन वाक्यों को पढ़ना हर किसी का व्यक्तिगत होगा.

मार्केज़ का लिखा वैसी ही कोई क्रिया है उन विशेषणों से बाहर और उनके आरपार, दुनिया जिन शब्दों की बैसाखी लेकर उनके जाने का स्यापा करने और गड्डमड्ड श्रद्धांजलि देने की कोशिश कर रही है. जिसकी बहुत जरूरत नहीं है.

शायद उनकी ही कोई किताब फिर से उठा कर पढ़ने की ज़रूरत है. ये वाक्य कैसे लिखा. क्या सोचा होगा. उन वाक्यों की गतिशील क्रिया का हिस्सा बनते हुए. उन्हीं के शब्दों में सच के लिए 'लोग सरकारों से ज़्यादा यक़ीन लेखकों पर करते हैं'.
साभार : बीबीसी हिंदी

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

आज होली है, यारो!

 होली के अवसर पर दिल्ली के वरिष्ठ एस्ट्रोनॉमर और मेरे शिक्षक बलदेव राज दावर जी ने एक अद्भुत कविता रची है. ये कविता मानव और प्रकृति के संबंधों की कहानी है, ये कविता बंदर से मानव और मानव के महामानव बन जाने तक की विकासवाद की अदभुत झांकी भी है. होली के मौके पर सभी पाठक गणों को शुभकामनाओं के साथ वॉयेजर की छोटी सी भेंट - 

आज होली है, यारो!
आओ, अपने सारे कपड़े उतारो
और खड़े हो जाओ
एक विशाल और सपाट दर्पण के सामने;
और निहारो सिर से पैर तक
अपने नंगे और निहत्थे रूप को।
और ईर्षा करो बंदर से
जिसे अपनी शर्म ढकने के लिए चड्डी की जरूरत नहीं।
ईर्षा करो हिरन से
जिसके पास तन ढकने के लिए रेशमी रोमावली है - 
अंग-अंग पर मखमली शालाएं है।

और किस-किस से ईर्षा करोगे, यारो?
न तुम हाथी जैसे विशाल हो, न शेर जैसे शूरवीर
न लोमड़ी-से होशियार, न मोर-से मनोहर।
हंस की उड़ान, मधुमक्खी की सामाजिकता,
भौंरे की भावुकता और चींटी की साक्षरता
प्रकृति ने बेचारे मनुष्य को नहीं दी।

ढक लो, ढ़क लो, अपने भौंडे शरीर को।
छुपा के रखो अपनी कमज़ोरियां, लाचारियाँ।
तुम्हारी शक्ति केवल औज़ारों की शक्ति है।
केवल औजारों की बदौलत ही
आज तुम पैदल नहीं, निहत्थे नहीं, नंगे नहीं। 
तुम्हारे पास अस्त्र हैं, शस्त्र हैं, अद्भुत टेक्नोलॉजी है। 

तुम्हारे पैरों में पहिये हैं, आँखों पर ऐनक है,
गोदी में कंप्यूटर है, कानों पर मोबाइल है,
ज़ुबान पर माइक और उँगलियों में रिमोट। 
इशारों ही इशारों में, इस कठपुतली दुनिया को,
मन चाहे नाच नचा रहे हो।

तुम्हारे बनाये हुए हज़ारों नकली चाँद
पृथ्वी के आकाश में विचर रहे हैं।
तुम्हारे भेजे हुए छह पहियों वाले रोबोट
पड़ोसी ग्रहों पर चल-फिर रहे हैं।
अंतरिक्ष में ठहराई हुई तुम्हारी दूरबीनें
ब्रह्माण्ड के कोने-कोने की खोज-बीन कर रही हैं।

प्रकाश की गति से चलने वाले यंत्रों पर तुम सवार हो
पलक झपकने में तुम यहाँ भी हो, वहाँ भी हो,
मानो,एक साथ सब जगह विद्यमान हो।
पिछली दो-तीन सदियों में,
यह दुनिया नयी एक दुनिया हो गई है।
और तुम इस दुनिया के खुदा हो। 
तुम्हें सलाम।
शत-शत प्रणाम तुम्हारे औज़ारों को। 

- बलदेव राज दवार, होली,2014