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रविवार, 9 मार्च 2014

राधाकृष्णन: रॉकेट के जरिए रोटी देता है इसरो


हमें पहले क्या करना चाहिए? रोटी जरूरी है या चांद पर जाना? इस मुद्दे पर इसरो चीफ के राधाकृष्णन ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में अपने विचार रखे. राधाकृष्णन ने कहा, 'हम गलत अवधारणा में हैं कि इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना है. बल्कि हम जो काम करते हैं वो सीधे या फिर परोक्ष तौर पर देश की सरकार और जनता के हित में काम आता है. इसरो द्वारा भेजा गया रॉकेट और सेटेलाइट लोगों को रोटी देने का काम भी करता है. किसी किसान या फिर मछुआरे से पूछिए.'

Rockets vs Rotis सत्र में बोलते हुए इसरो के चीफ के राधाकृष्णन ने कहा, 'वैज्ञानिक समझ को बढ़ाने के साथ तकनीकी बेहतरी पर इसरो ने बहुत कुछ किया है. मिशन टू मून हो या मिशन टू मार्स, इसरो ने सिर्फ ये दो काम ही नहीं किए. हमने स्ट्रेटजिक मूवमेंट में भी अहम भूमिका निभाई है.' उन्होंने आगे कहा, '1960 से आज तक यही पूछा जाता है कि भारत जैसे गरीब देश को स्पेस में एयरक्राफ्ट भेजना चाहिए या नहीं? हर प्रोजेक्ट के साथ यही सवाल उठता है. ये सवाल उठते रहेंगे. पर मैं भी एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या भारत जैसे देश को स्पेस साइंस में इनवेस्ट नहीं करना चाहिए, जो सुपरपावर बनना चाहता है?'

राधाकृष्णन ने कहा, 'इसरो में ये सवाल हमलोग हर दिन खुद से पूछते हैं. हम इस बारे में सोचते हैं कि हम जो कर रहे हैं इससे जनता को, सरकार को फायदा होता है या नहीं. इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना नहीं है. 24 सेटेलाइट हैं अंतरिक्ष में हमारे. बड़ा कम्यूनिकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर बनाया है हमने. करीबन 200 ट्रांसपॉन्डर हैं जिनके जरिए मछुआरों की मदद हो रही है. उन्हें समुद्र में किस जगह पर ज्यादा मछली मिलेगी, इसकी जानकारी उपलब्ध कराते हैं हम.

फसलों से बेहतर उपज, तूफान की जानकारी, इस तरह की अहम जानकारियां जुटाने में हमारे सेटेलाइट काम में आ रहे हैं. तूफान फेलिन की जानकारी इनसेट सेटेलाइट से मिली. करीब 400 से ज्यादा तस्वीरें हमें मिलीं जिसके जरिए हजारों जानें बचाई जा सकीं. हमारे पास रॉकेट होने चाहिए क्योंकि सेटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजना है. भूख मिटाना जरूरी है पर स्पेस साइंस को नजरअंदाज नहीं कर सकते. आखिरकार ये भी तो रोटी देने में मदद करता है.'

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

अंतरिक्ष में ‘जुगनू’


तीन साल पहले इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डी.वी.ए. राघवमूर्ति कॉलेज के कुछ स्टूडेंट्स को बता रहे थे कि अंतरिक्ष की खोज कितनी रोमांचक है और हमें साइंस क्यों पढ़नी चाहिए । स्मॉल सेटेलाइट्स प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. राघवमूर्ति का ये व्याख्यान छात्रों को इतना प्रेरक लगा कि सत्र खत्म होने पर छात्रों की एक टीम ने उनसे मुलाकात की और पूछा कि हम एक छोटा सेटेलाइट बनाना चाहते हैं, इस काम में हम इसरो की मदद कैसे ले सकते हैं? "स्टुडसैट" की कहानी बस यहीं से शुरू होती है।  डॉ. राघवमूर्ति के निर्देशन में छात्रों के सेटेलाइट यानि "स्टुडसैट" को बनाने का प्रोजेक्ट शुरू हुआ और इसमें बैंगलुरु और हैदराबाद के इंजीनियरिंग छात्र भी शामिल होते गए।  बैंगलोर इंजीनियरिंग कालेज की एक छात्रा श्वेता प्रसाद को स्टुडसैट प्रोजेक्ट से इस कदर लगाव हो गया कि इस टीम के साथ काम करने के लिए उन्होंने एक बढ़िया सैलरी वाले एक शानदार जॉब का ऑफर ही ठुकरा दिया। छात्रों का समर्पण कामयाब रहा और उन्होंने वाकई "स्टुडसैट" को साकार कर दिखाया।  पिछले दिनों कार्टोसेट-2 बी के साथ  "स्टुडसैट" को अंतरिक्ष भेजकर इसरो ने भारतीय अंतरिक्ष अभियान में छात्रों को शामिल करने की एक अनोखी शुरुआत कर दी।
 इसरो की इस नई पहल को भारत और फ्रांस के संयुक्त सेटेलाइट मिशन मेघा-ट्रॉपिक्स ने एक नई दिशा दी है। "स्टुडसैट" प्रोजेक्ट की अगली कड़ी के तौर पर मेघा-ट्रॉपिक्स मिशन के साथ छात्रों के बनाए दो नन्हे सेटेलाइट्स भी अंतरिक्ष भेजे गए हैं। इनमें से एक है आईआईटी कानपुर के छात्रों का बनाया सेटेलाइट "जुगनू" और  चैन्नई के नज़दीक एक यूनिवर्सिटी एसआरएम के छात्रों का बनाया सेटेलाइट "एसआरएमसेट । "
चेन्नई के छात्रों का "एसआरएमसेट " साढ़े 10 किलो वजनी है जबकि आईआईटी कानपुर के इस अनोखे "जुगनू" का वजन केवल 3 किलो है।  इसरो ने एक बार फिर देश के युवाओं को एक नई उम्मीद से भर दिया है। आईआईटी कानपुर के छात्रों की टीम ढाई साल से अपने सेटेलाइट  "जुगनू" के प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। मेघा-ट्रॉपिक्स मिशन के साथ अंतरिक्ष भेजे गए,रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट "जुगनू" और "एसआरएमसेट " अपनी-अपनी कक्षाओं में सफलता से स्थापित हो गए है।
 "जुगनू" के टीम लीडर आईाईटी कानपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के  प्रो. नलिनाक्ष व्यास और उनके छात्रों की पूरी टीम  "जुगनू" की कामयाबी के जश्न में डूबी है और इस अनोखी उपलब्धि की ये पार्टी अभी लंबे वक्त तक जारी रहेगी। छात्रों की टीम के साथ प्रो. व्यास  "जुगनू" की लांचिंग को देखने के लिए श्रीहरिकोटा में मौजूद थे। उन्होंने लांचिंग के बाद एक प्रतिक्रिया में कहा कि जुगनू के सफल प्रक्षेपण के साथ ही हमारा वर्षो पुराना सपना साकार हो गया है। उन्होंने बताया कि जुगनू की मानीटरिंग सेंटर और ग्राउंड स्टेशन का काम उनके लौटते ही आईआईटी कानपुर से शुरू हो जाएगा ।
प्रो. व्यास ने बताया कि अंतरिक्ष में जगमगा रहे भारत के इस  "जुगनू" से आने वाले पहले सिगनल्स को रिसीव होते देखना मेरे अब तक के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि  हमारा "जुगनू" स्वस्थ है और इसरो को इसके सिग्नल लगातार मिल रहे हैं। 800 किलोमीटर की ऊंचाई की कक्षा में होने की वजह से अभी इससे तस्वीरें नहीं मिल पा रही हैं। लेकिन कुछ दिनों बाद जैसे ही इसकी कक्षा में सुधार होगा , तस्वीरें मिलने लगेंगी।  "जुगनू" अपने मूविंग एंगल के समय 10 मिनट के लिए कानपुर समेत आईआईटी के ऊपर से भी गुजर रहा है।
 "जुगनू" ने छात्रों और शिक्षकों के बीच के खो चुके रिश्ते को पुनर्जीवित किया है, ये प्रोजेक्ट बिल्कुल बी आसान नहीं था और इसरो के वैज्ञानिकों को संतुष्ट करना और उन्हें  "जुगनू" को लांच करने के लिए मनाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। साल की शुरुआत में आईआईटी कानपुर के छात्रों ने इसरो वैज्ञानिकों के साथ निर्णायक वीडियो कॉन्फ्रेंसिग की जो 5 घंटे तक चली। इस विडियो कॉन्फ्रेंसिंग में इसरो के स्मॉल सेटेलाइट निदेशक डी. राघवमूर्ति के साथ कंट्रोल एक्सपर्ट, पार्सल एक्सपर्ट, कम्यूनिकेशन एक्सपर्ट, रिसर्च एक्सपर्ट, सेंसर एक्सपर्ट सहित सेटेलाइट तकनीक के दूसरे क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी मौजूद थे। दूसरी तरफ ,संस्थान के निदेशक प्रो. संजय गोविंद धोड़े, विभागाध्यक्ष व प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर प्रो. नलिनाक्ष व्यास, टीम इंचार्ज शांतनु अग्रवाल सहित 35 छात्रों हर सवाल का जवाब दे रहे थे। छात्रों ने इसरो विशेषज्ञों के सामने  "जुगनू" के प्रोटोटाइप का प्रत्येक कोण से प्रदर्शन किया।
सबकी मेहनत सफल रही और हर तरह से संतुष्ट हो जाने पर इसरो वैज्ञानिकों ने छात्रों के  "जुगनू" को अपना लिया और इसे लांच करने के लिए तैयार हो गए।  "जुगनू" इन्फ्रारेड इमेजिंग के माध्यम से आईआईटी में ही फोटो व सूचनाएं भेजेगा। जहां इसका नियंत्रण केंद्र होगा, यहीं परिणामों का अध्ययन भी किया जाएगा।  "जुगनू" अब हर दिन धरती के 14 से 15 चक्कर लगा रहा है और रोज 10 से 15 मिनट तक कानपुर परिक्षेत्र के ऊपर ही रहता है । जुगनू की मदद से कानपुर और आसपास इलाकों में खेती की स्थिति, गंगा नदी के बहाव की दिशा, मिट्टी की उर्वरा शक्ति, पर्यावरण तथा मिट्टी के कटाव की जानकारी के साथ अन्य तमाम महत्वपूर्ण सूचनाएं प्राप्त की जा सकेंगी। 
स्टुडसैट की कामयाबी ने देश में साइंस स्टूडेंट्स के बीच एक्सपेरीमेंट और इनोवेशन का एक नया दौर शुरू कर दिया है। आईआईटी कानपुर के स्टूडेंट्स अपने तीन किलो के सेटेलाइट 'जुगनू' के बाद अब दूसरे सेटेलाइट की डिजाइन पर काम कर रहे हैं। आईआईटी मुंबई के स्टूडेंट्स 'प्रधान' नाम के अपने सेटेलाइट को बनाने में जुटे हैं। अन्ना यूनिवर्सिटी के 40 किलो के सेटेलाइट 'अनुसैट' की कामयाबी के बाद चेन्नई की एसआरएम यूनिवर्सिटी और सत्यभामा यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स भी 10 किलो से कम दो सेटेलाइट्स को विकसित करने में जुटे हैं।

गुरुवार, 15 जुलाई 2010

भारतीय मानव मिशन का रोडमैप और शुरुआती प्लान तैयार


इसरो ने अंतरिक्ष में मानव भेजने के अपने पहले मिशन का रोडमैप और एक शुरुआती प्लान तैयार कर लिया है। इस प्लान के मुताबिक 2013 में पृथ्वी की कक्षा में एक पीएसएलवी लांच वेहेकिल की मदद से एक मानव विहीन 'क्रू-मोड्यूल' स्थापित किया जाएगा। इसरो की योजना है कि दो भारतीयों को पहली अंतरिक्षयात्रा पर भेजा जाए इस दिशा में 'क्रू-मोड्यूल' को कक्षा में स्थापित करना एक महत्वपूर्ण चरण साबित होगा।

इसरो की योजना है कि दो अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजा जाए और वो अपने 'क्रू-मोड्यूल' में रहते हुए एक हफ्ते तक पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा करते रहें। इस सिलसिले में श्रीहरिकोटा स्पेसपोर्ट में एक नया और तीसरा लांच पैड बनाने के लिए इसरो ने 1000 करोड़ की लागत का एक प्रोजेक्ट केंद्र सरकार को मंजूरी के लिए भेजा है। इस तीसरे लांच पैड का इस्तेमाल केवल मानव मिशन के लिए ही किया जाएगा। इसरो से मिली जानकारी के मुताबिक अंतरिक्षयात्रियों के मॉड्यूल की डिजाइन का काम पूरा हो चुका है। इसमें लाइफ सपोर्ट सिस्टम्स, थर्मल प्रूफिंग यानि तापरोधिता और कोई आपात स्थिति की सूरत में अंतरिक्षयात्रियों के लिए एक 'स्केप सिस्टम' को भी शामिल किया गया है। इतना ही नहीं भारतीय अंतरिक्षयात्री कार्यक्रम कुछ ऐसे असरदार ढंग से तैयार किया जा रहा है कि लांच पैड पर ही कोई गड़बड़ी सामने आने पर अंतिम वक्त में भी पूरी लांचिंग को ही रद्द किया जा सके। अंतरिक्षयात्रियों को ले जाने के लिए खास रॉकेट्स भी डिजाइन किए जा रहे हैं, जिनका नाम होगा- ह्यूमन रेटेड वेहेकिल्स।

अंतरिक्षयात्री लैंडिंग यानि घर वापसी कैसे करेंगे इसके लिए दो तरफा तैयारी की जा रही है। सबसे पहले एक सुरक्षित री-इंट्री तकनीक विकसित की जा रही है और दूसरा ये कि जमीन पर लैंडिंग के लिए खास डिजाइन और निर्माण पर भी काम जारी है। ये सारी तैयारियां भारतीय अंतरिक्षयात्री कार्यक्रम के पहले चरण की हैं। दूसरे चरण में अंतरिक्षयात्रियों के लिए खास स्पेसक्राफ्ट विकसित किया जाएगा और तीसरे, यानि अंतिम चरण में अंतरिक्षयात्रियों का चुनाव कर उन्हें अंतरिक्षयात्रा का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

कहानी स्टुडसैट की

तीन साल पहले इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डी.वी.ए. राघवमूर्ति कॉलेज के कुछ स्टूडेंट्स को बता रहे थे कि अंतरिक्ष की खोज कितनी रोमांचक है और हमें साइंस क्यों पढ़नी चाहिए। स्मॉल सेटेलाइट्स प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. राघवमूर्ति का ये व्याख्यान छात्रों को इतना प्रेरक लगा कि सत्र से खत्म होने पर छात्रों की एक टीम ने उनसे मुलाकात की और पूछा कि हम एक छोटा सेटेलाइट बनाना चाहते हैं, इस काम में हम इसरो की मदद कैसे ले सकते हैं? स्टुडसैट की कहानी बस यहीं से शुरू होती है। हाल ही में देश के बेहद महत्वपूर्ण सेटेलाइट कार्टोसेट-2 बी के साथ भेजे गए चार सेटेलाइट्स में बैंगलोर और हैदराबाद के छात्रों का बनाया ये नन्हा सेटेलाइट 'स्टुडसैट' भी शामिल था। स्टुडसैट के बारे में ताजा अपडेट ये है कि बैंगलोर के सेटेलाइट सेंटर के निदेशक टी.के. एलेक्स ने खबर दी है कि ग्राउंड स्टेशन को स्टुडसैट के सिगनल्स रिसीव होने लगे हैं।

इस छोटे से सेटेलाइट्स को बैंगलोर के चार और हैदराबाद के तीन इंजीनियरिंग कॉलेजेज के 35 स्टूडेंट्स ने मिलकर बनाया है। स्टुडेंट्स ने नासा के साथ मिलकर स्टुडसैट में एक इमैजिंग कैमरा और कई आधुनिक उपकरण लगाए हैं। स्टूडेंट साइंटिस्ट्स की टीम से जुड़ी बैंगलोर इंजीनियरिंग कालेज की एक छात्रा श्वेता प्रसाद को स्टुडसैट प्रोजेक्ट से इस कदर लगाव हो गया कि इस टीम के साथ काम करने के लिए उन्होंने एक बढ़िया सैलरी वाले एक शानदार जॉब का ऑफर ही ठुकरा दिया।

स्टुडसैट की कामयाबी ने देश में साइंस स्टूडेंट्स के बीच एक्सपेरीमेंट और इनोवेशन का एक नया दौर शुरू कर दिया है। आईआईटी कानपुर के स्टूडेंट्स अपने तीन किलो के सेटेलाइट 'जुगनू' के बाद अब दूसरे सेटेलाइट की डिजाइन पर काम कर रहे हैं। आईआईटी मुंबई के स्टूडेंट्स 'प्रधान' नाम के अपने सेटेलाइट को बनाने में जुटे हैं। अन्ना यूनिवर्सिटी के 40 किलो के सेटेलाइट 'अनुसैट' की कामयाबी के बाद चेन्नई की एसआरएम यूनिवर्सिटी और सत्यभामा यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स भी 10 किलो से कम दो सेटेलाइट्स को विकसित करने में जुटे हैं।

स्टुडसैट काम कैसे करेगा

सेटेलाइट स्टुडसैट के साथ एक कैमरा लगा हुआ है जो 637 किलोमीटर की ऊंचाई से 90 मीटर के रेजोल्यूशन की तस्वीरें हैम कोड में ले सकता है। इस कैमरे से पृथ्वी की तस्वीरें ली जा सकती हैं, जिससे स्टूडेंट्स खुद ही मौसम का आंकलन कर सकते हैं। अपने स्टुडसैट से डेटा रिसीव करने के लिए स्टूडेंट्स ने बैंगलोर में एक ग्राउंड कंट्रोल भी बनाया है। ये अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

सोमवार, 5 जुलाई 2010

देश की तीसरी आंख - कार्टोसेट-2 बी


इसरो 12 जुलाई की सुबह 9 बजकर 23 मिनट पर 'देश की तीसरी आंख' यानि हाई रेजोल्यूशन रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट कार्टोसेट-2 बी को श्रीहरिकोटा से लांच करने जा रहा है। कार्टोसेट हमारे देश का एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है और इस सीरीज के दो सेटेलाइट पहले से काम कर रहे हैं। कार्टोसेट-2 बी की लांचिंग के साथ ही तीन सेटेलाइट्स के जरिए अंतरिक्ष से निगरानी का नेटवर्क पूरा हो जाएगा।
कार्टोसेट प्रोजेक्ट को मुख्यतौर पर भारत के किसी भी शहर, किसी भी मोहल्ले या सड़क को अंतरिक्ष से देखने के लिए डिजाइन किया गया है। कार्टोसेट -2 बी कहीं ज्यादा संवेदनशील है। कार्टोसेट के जरिए हम देश में कहीं भी स्थिर खड़ी या फिर चल रही 80 सेंटीमीटर के आकार वाली किसी भी चीज की बिल्कुल साफ तस्वीर अंतरिक्ष से देख सकते हैं और उसे फॉलो कर सकते हैं। यानि अगर कोई नेता कहीं जाता है तो कार्टोसेट-2बी की लांचिंग के बाद अब उसकी कार की निगरानी अंतरिक्ष से ही की जा सकेगी। ऐसा ही हम किसी आतंकवादी या अपराधी के लिए भी कर सकेंगे। हमारा कद भी 80 सेंटीमीटर से बड़ा होता है, इसलिए कार्टोसेट-2बी के जरिए अंतरिक्ष से ही किसी भी खास आदमी की हरकतों पर नजर रखना अब संभव होगा।
कार्टोसेट - 2 बी सुरक्षा एजेंसियों के लिए खास तौर पर मददगार साबित होगा और इसकी मदद से सीमाओं की निगरानी और घुसपैठ की रोकथाम अब कहीं ज्यादा असरदार तरीके से की जा सकेगी। फिलहाल इसरो ने अपनी रिलीज में कहा है कि कार्टोसेट-2 बी की मदद से इंफ्रास्ट्रक्चर यानि आधारभूत ढांचे के विकास और शहरीकरण की योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी।
690 किलो वजनी कार्टोसेट -2बी को लांच वेहेकिल पीएसएलवी के जरिए अंतरिक्ष भेजा जाएगा। इसके साथ ही 117 किलो वजनी अल्जीरिया के एक सेटेलाइट 'अल्सेट' और कनाडा और स्विटजरलैंड के दो नैनो सेटेलाइट्स एनएलएस 6.1 और एनएलएस 6.2 को भी अंतरिक्ष भेजा जा रहा है। लेकिन पीएसएलवी के इन हाई टेक्नोलॉजी सेटेलाइट्स के साथ बेंगलौर और हैदराबाद इंजीनियरिंग कालेज के छात्रों का बनाया एक नैनो सेटेलाइट 'स्टुडसेट' को भी लांच किया जा रहा है। यानि रॉकेट पीएसएलवी की एक लांचिंग के साथ ही पांच सेटेलाइट्स को एकसाथ अंतरिक्ष भेजा जा रहा है। इसरो के लिए मल्टिपल लांचिंग कोई नई बात नहीं इससे पहले 2008 में सिंगल लांच के साथ 10 सेटेलाइट्स को अंतरिक्ष भेजकर इसरो वर्ल्ड रिकार्ड बना चुका है।

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

क्रायोजनिक टेक्नोलॉजी वाला छठा देश – भारत

नेट पर मैं कुछ रिपोर्ट्स देख रहा था, जीएसएलवी-डी3 का भारतीय अभियान धराशाई, अंतरिक्ष में बादशाहत की भारतीय उम्मीदों को झटका, स्वेदशी क्रायोजनिक इंजन की हवा निकली और भी न जाने क्या-क्या, बातें हैं, बातों का क्या।
मैं केवल इतना कहना चाहूंगा, कि न तो स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन की हवा निकली है और न ही जीएसएलवी-डी3 का भारतीय अभियान ही धराशाई हुआ है। क्रायोजनिक इंजन और इसकी टेक्नोलॉजी पर टिप्पणी नहीं की जा सकती, वो फेल नहीं माना जा सकता, क्योंकि बृहस्पतिवार की लांचिंग के दौरान क्रायोजनिक इंजन तो चालू ही नहीं हो सका और रहा सवाल जीएसएलवी-डी3 के भारतीय अभियान का तो हम बहुत जल्दी दुनिया को इस नाकामी की धूल झाड़कर दिखा देंगे। इसरो प्रमुख राधाकृष्णन ने 2010 बीतने से पहले ही देश से क्रायोजनिक इंजन वाले एक और अभियान की कामयाब लांचिंग की वादा कर लिया है, और हम इसे पूरा करके दिखा देंगे।
मैं बृहस्पतिवार की जीएसएलवी-डी3 लांचिंग के विवरणों पर नहीं जाऊंगा, क्योंकि अब ये बात सबको मालूम है। लांचिंग के 505 सेकेंड बाद जीएसएलवी-डी3 में तीसरे स्टेज पर लगा क्रायोजनिक इंजन बर्न ही नहीं हो पाया। इसके साथ लगे दो छोटे बर्नियर इंजन ऑन ही नहीं हो पाए। इन दो छोटे बर्नियर इंजन्स को ही ऑन होकर तीसरे स्टेज पर लगे क्रायोजनिक इंजन को बर्न करना था। धरती से 60 किलोमीटर से कुछ ऊंचाई पर जाने के बाद ही बर्न प्रक्रिया बंद हो गई और जीएसएलवी-डी3 दीपावली के किसी दग चुके रॉकेट की तरह नीचे गिरकर समंदर में समा गया।
मैं इस असफलता को कम करके नहीं आंक रहा, 330 करोड़ रुपये के मिशन पर पानी फिरना देश के लिए कोई आसान बात नहीं, लेकिन खास बात ये कि हमने गुणवत्ता से समझौता किए बगैर इस मिशन की लागत पर शुरुआत से ही अंकुश रखा। यही वजह है कि जीएसएलवी-डी3 की लांचिंग का फेल होना एक खेद की बात तो है, लेकिन निराशाजनक नहीं। इस मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों के लिए ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी पक्षी की देखभाल के बीच उसका बच्चा अपनी पहली उड़ान भरता है। हां, पहली उड़ान नाकाम रही इसका अर्थ केवल यही है कि अब हम पहले से ज्यादा अनुभवी हो गए।
श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेसपोर्ट पर 15 अप्रैल की सुबह जब जीएसएलवी-डी3 लांच की तैयारियां जारी थीं, तभी मेरे एक इंजीनियर साथी ने मजाक किया, जीएसएलवी एक बार फिर लांच पैड पर है। इसपर किसी वैज्ञानिक ने कहा कि क्या हुआ, तो उस इंजीनियर ने फिर मजाक किया, इसबार जीएसएलवी के साथ इनसेट 4 सी नहीं जीसैट-4 है। इस पर एक गहरी खामोशी छा गई, क्योंकि वो इंजीनियर मजाक में ही सही लेकिन जुलाई 2006 में हुए इनसेट-4 सी हादसे की ओर इशारा कर रहा था, उस वक्त लांच वेहेकिल जीएसएलवी-एफ02 था। शाम होते-होते ये मजाक एक दुखद हकीकत में बदल गया।
स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन हमने किस तरह बनाया इसकी कहानी बताते हुए मिशन डायरेक्टर जी. रवींद्रनाथ के चेहरे पर मुस्कुराहट भले ही कम हुई है, लेकिन उनकी आंखों की चमक बरकरार है। 19 साल तक हम उस टेक्नोलॉजी को विकसित करने में जुटे रहे जो दुनिया की सबसे गोपनीय और सबसे संवेदनशील टेक्नोलॉजी में से है। टनों वजनी संचार सेटेलाइट्स को 38 से 40 हजार किलोमीटर तक की ऊंची कक्षाओं यानि जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑरबिट में स्थापित करने के लिए हमें ऐसा लांच वेहेकिल चाहिए था जिसके तीसरे स्टेज में क्रायोजनिक इंजन फिट हो। क्रायोजनिक इंजन का अपना सामरिक महत्व भी है, इसलिए इसकी टेक्नोलॉजी कड़ी निगरानी में रहती है, और इसीलिए किसी ने हमसे सहयोग नहीं किया। तब हमने 1991 में अपना क्रायोजनिक इंजन बनाने का काम शुरू किया। ये वो वक्त था जब अमेरिका ने रूस पर दबाव डालकर उसे अपना क्रायोजनिक इंजन हमें देने से रोक दिया था।
क्रायोजनिक टेक्नोलॉजी में शून्य से 183 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे के तापमान पर तरल ऑक्सीजन और शून्य से 253 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे के तापमान पर तरल हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन खास बात ये कि इतने कम तापमानपर धातुएं भंगुर हो जाती हैं, इसरो में वैज्ञानिकों ने एक खास मिश्रधातु बनाई जो इतने कम तापमान को आसानी से झेल सकती थी। इतना ही नहीं हमने अपनी प्रयोगशालाओं में इस मिश्रधातु से बनने वाले क्रायोजनिक इंजन के लिए खास वेल्डिंग टेक्नोलॉजी और एक नए लुब्रीकेंट्स की भी इजाद की। इसलिए जब 19 साल की मेहनत के बाद हमने प्रयोगशाला में इसका सफल परीक्षण कर लिया तो दुनियाभर की आंखें फटी रह गईं। जीएसएलवी-डी3 का परीक्षण दुनिया के लिए कितना महत्वपूर्ण था, इस लांच को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की गहमा-गहमी से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
भले ही जीएसएलवी-डी3 की उड़ान पूरी नहीं हुई, लेकिन क्रायोजनिक इंजन की टेक्नोलॉजी हमारे हाथ में है और अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और चीन के बाद हम इस टेक्नोलॉजी वाले छठे देश बन चुके हैं।

डॉ. बी.आर.गुरुप्रसाद
वैज्ञानिक, इसरो

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

छात्रों का सेटेलाइट-अनुसेट, अब कक्षा में


भारतीय छात्रों के लिए 20 अप्रैल की तारीख एक यादगार दिन बन चुका है। इस दिन इसरो ने अपने सेटेलाइट लांच वेहेकिल से एक ऐसे सेटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जिसकी डिजाइन तैयार करने से लेकर निर्माण तक के पूरे काम में एक भी साइंटिस्ट शामिल नहीं था। इस सेटेलाइट का नाम है अनुसेट और इसे बनाया है अन्ना यूनिवर्सिटी के छात्रों ने। इस तरह अनुसेट देश के छात्रों का बनाया पहला सेटेलाइट है जो अब अंतरिक्ष में मौजूद है। अनुसेट का वजन है 38 किलो और इसे बनाने के पीछे अन्ना यूनिवर्सिटी का का मुख्य मकसद सेटेलाइट और स्पेस टेक्नोलॉजी के बारे में छात्रों की जानकारी और अनुभव को बढ़ाना है। छात्रों के इस सेटेलाइट में स्टोर ऐंड फॉरवर्ड पेलोड के अलावा माइक्रो इलेक्ट्रो मिकैनिकल सिस्टम्स (एमईएमएस), एमईएमएस जाइरोस्कोप, एक एमईएमएस मैग्नेटोमीटर और एक सैटलाइट पजिशनिंग सिस्टम होगा। अनुसेट का जीवनकाल एक साल का है। खास बात ये कि अनुसेट के ग्राउंड स्टेशन को तैयार करने का काम भी देश के छात्रों ने ही किया है। अनुसेट के ग्राउंड स्टेशन को तैयार करने का काम छात्रों ने पुणे यूनिवर्सिटी के फिजिक्स डिपार्टमेंट की हेड एस.ए.गांगल के नेतृत्व में किया है। अनुसेट एक साल तक अपनी कक्षा में परिक्रमा करता रहेगा और इस दौरान छात्र अपने इसे सेटेलाइट की मदद से संचार संबंधी कई प्रयोग करेंगे।