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शनिवार, 14 मई 2011

हम ‘रेडिएशन’ की दुनिया में रह रहे हैं!


धरती पर अपने अस्तित्व की शुरुआत से ही मानव जाति रेडिएशन को सह रही है। प्रकृति में यूरियम और थोरियम जैसे कुछ खास तत्व ऐसे हैं जिनसे घातक ऊर्जा की अदृश्य किरणें फूटती रहती हैं। ऐसे तत्वों को रेडियोएक्टिव कहते हैं और इनसे फूटने वाली ऊर्जा की किरणों को रेडिएशन। रेडिएशन केवल एटॉमिक पावर स्टेशंस या फिर केवल संशोधित रेडियोएक्टिव पदार्थों से ही नहीं फूटता, बल्कि ये प्राकृतिक रूप से भी फूटता रहता है। पृथ्वी के जन्म के समय से ही यूरेनियम और थोरियम जैसी रेडियोएक्टिव धातुओं के अणु धरती की ऊपरी पर्त में मौजूद हैं। इन धातुओं के क्षरण से एक रेडियोएक्टिव, रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैसें पैदा होती हैं, जिसका नाम है रेडॉन और थोरॉन । ये रेडियोएक्टिव गैसें धरती की ऊपरी पर्त से लगातार उत्सर्जित होती रहती हैं और वातावरण के संपर्क में आते ही इसका क्षरण रेडियोएक्टिव परमाणुओं यानि आइसोटोप्स में हो जाता है, जिसकी हाफ लाइफ 3 से 4 दिन की होती है। इस तरह रेडॉन गैस धूल कणों और संपर्क में आने वाली हवा तक को रेडिएशन से भर देती है। प्राकृतिक रेडिएशन का दूसरा सबसे बड़ा जरिया है कॉस्मिक किरणें, जो गहन अंतरिक्ष से गुजरती हुई हमारी पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी पर्त से टकराती हैं और रेडियोएक्टिव परमाणुओं को जन्म देती हैं। लेकिन टेक्नोलॉजी के विकास ने मानव जनित रेडिएशन को जन्म दे दिया हैं, जैसे कि एक्स-रे, कंप्यूटर मॉनिटर, टेलीविजन, परमाणु ऊर्जा संयंत्र के हादसे, परमाणु हथियारों का परीक्षण, रेडियोएक्टिव परमाणु कचरे की कब्रगाह और दूसरे औद्योगिक, चिकित्सीय, कृषि क्षेत्रों में रेडियोआइसोटोप्स का इस्तेमाल।
इनके अलावा सेल फोन्स और इनके टॉवर्स, कॉर्डलेस फोन्स, सेटेलाइट डिजिटल टीवी, राडार, वायरलेस इंटरनेट और स्कूलों-दफ्तरों में वायरलेस लैन्स के बढ़ते इस्तेमाल से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन, खासतौर पर माइक्रोवेव्स रेडिएशन हमारी सेहत के लिए खतरा बनकर सामने आया है। 
एक्स-रे रेडिएशन 
रेडिएशन का सबसे जाना-पहचाना जरिया है एक्स-रे। एक्स-रे कुछ और नहीं बल्कि सूरज की रोशनी की तरह ऊर्जा की किरणें हैं जो तरंग के रूप में होती हैं। सूरज की रोशनी और एक्स-रे में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। सूरज की रोशनी में इतनी ऊर्जा नहीं होती कि वो हमारे शरीर से आर-पार गुजर सके, जबकि एक्स-रे ऊर्जा यानि रेडिएशन से इस कदर भरी होती है कि आसानी से हमारे शरीर के आर-पार गुजर जाती है। लेकिन ये काफी नुकसानदेह भी होती है, क्योंकि अगर इनकी ऊर्जा को कम न किया जाए तो एक्स-रे का एक प्रहार भी जानलेवा साबित हो सकता है। इस खतरे की वजह से दुनियाभर के चिकित्सा क्षेत्र में अब एक्स-रे का इस्तेमाल बंद करने पर जोर दिया जा रहा है।
आपके आस-पास के अस्पतालों में लगी मशीन से एक्स-रे करवाने पर आपका शरीर 0.2 मिलीसीवर्ट से लेकर  0.1 मिलीसीवर्ट तक रेडिएशन की मार झेलता है। रेडिएशन की ये मात्रा इतनी है जितना कि आप एक महीने में प्राकृतिक रेडिएशन को झेलते हैं। सबसे खतरनाक डेंटल एक्स-रे है। डेंटिस्ट क्लीनिक में जाकर एक बार डेंटल एक्स-रे करवाने पर आपके चेहरे को 2 से 3 मिलीसीवर्ट तक के रेडिएशन की गहरी मार झेलनी पड़ती है। हमारा शरीर जितने प्राकृतिक रेडिएशन को एक साल में बर्दाश्त करता है, उतना रेडिएशन डेंटल एक्स-रे मशीन एक बार में ही हमें दे देती है। एक अध्ययन के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा एक्स-रे भारत में किया जाता है। इससे आप स्थिति की गंभीरता का अंदाजा खुद ही लगा सकते हैं। 
एक्स-रे मशीन के रेडिएशन से बचने का रास्ता भी काफी आसान है, अपना एक्स-रे करवाते वक्त देख लें कि मशीन जिस कमरे में लगी है, वो छोटा या संकरा सा न हो। साथ ही ये भी देखें कि एक्स-रे मशीन पुरानी न हो। याद रखें, एक्स-रे कोई मजाक नहीं है, इसलिए एक्स-रे तभी कराएं जब कोई दूसरा रास्ता न हो। क्योंकि बार-बार का एक्स-रे कैंसर को भी जन्म दे सकता है। 
मेट्रो के मुसाफिर सावधान रहें 
एक्स-रे मशीन के रेडिएशन से हमारा सामना हर रोज राजधानी दिल्ली के तमाम मेट्रो स्टेशंस पर होता है। मेटल डिटेक्टर से चेकिंग कराने के बाद आप अपना सामान चेकिंग के लिए जिस मशीन में डालते हैं वो एक्स-रे मशीन ही होती है। सामान चेक करने वाली ये एक्स-रे मशीन रेलवे स्टेशंस और हवाई अड्डों पर भी लगी हुई हैं। हालांकि इन मशीनों का एक्स-रे रेडिएशन अस्पताल की मशीनों के मुकाबले काफी कम होता है, फिरभी ये एक्स-रे इतनी नुकसानदेह जरूर होती है कि वो बैग में रखे आपके खाने, फल और पानी को रेडिएशन से भर दे। इसलिए एक्स-रे मशीन में चेकिंग के लिए अपने सामान को डालने से पहले खाने-पीने का सारा सामान बाहर निकालना न भूलें। अगर आपने खाने-पीने का सामान नहीं निकाला है तो चेकिंग मशीन से गुजरने के बाद उसका इस्तेमाल न करें।
अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों पर फुलबॉडी एक्स-रे स्कैनर मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। रेडिएशन के मामले में ये मशीनें सुरक्षित नहीं हैं। अमेरिका की ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने 38 एयरपोर्ट्स में लगी 247 फुलबॉडी एक्स-रे स्कैनर मशीनों का परीक्षण किया तो पता चला कि इन मशीनों से तय मानक से 10 गुना ज्यादा रेडिएशन उत्सर्जित हो रहा है।
 कंप्यूटर, लैपटॉप और टेलीविजन से रेडिएशन
 अगर आप पिक्चर ट्यूब वाले पुराने मॉडल के टेलीविजन और टेलीविजन जैसे भारी-भरकम कंप्यूटर मॉनिटर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो इनसे निकलने वाले इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन से अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का इंतजाम तुरंत करें। पुरानी एक्स-रे मशीनों और इन टीवी सेट्स और टेलीविजन जैसे कंप्यूटर मॉनिटर्स में एक समानता है, इन सबमें इलेक्ट्रॉन गन कैथोड-रे-ट्यूब का इस्तेमाल किया जाता है। टेलीविजन और कंप्यूटर मॉनिटर की पिक्चर ट्यूब में इसी कैथोड-रे-ट्यूब का प्रयोग किया जाता है, जिससे रेडिएशन भी निकलता है। पुराने टीवी और कंप्यूटर मॉनिटर्स में सामने से उतना रेडिएशन नहीं निकलता जितना इनके पीछे और अगल-बगल से। हालांकि इनसे निकलने वाला रेडिएशन काफी कम मात्रा का होता है, लेकिन अगर आप कई घंटे तक इनका इस्तेमाल करते रहें तो ये रेडिएशन सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट के मुताबिक असुरक्षित दूरी से पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन को एक घंटे तक देखने वाला दर्शक 0.5 मिली रॉंटजन तक रेडिएशन सहता है। इसलिए पहली सलाह तो ये कि पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन के रेडिएशन से बचने के लिए कम से कम 3 फुट की दूरी से टीवी देखना चाहिए। दूसरी सलाह ये कि संभव हो तो पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन को बदलकर एलसीडी टीवी ले आइए।
कंप्यूटर से रेडिएशन का असली खतरा उसके टेलीविजन जैसे मॉनीटर से है। अगर आप पुराने मॉनिटर का इस्तेमाल कर रहे हों तो उसे अपने से कम से कम 3 फुट की दूरी पर रखें। अब नए टीएफटी मॉनिटर्स आ गए हैं, ये अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। टीएफटी के एलसीडी मॉनिटर्स भी रेडिएशन उत्सर्जित करते हैं, लेकिन इनकी मात्रा बेहद कम होती है और इसका असर बस एक फुट यानि 30 सेंटीमीटर के दायरे तक ही रहता है, इसलिए आपके कंप्यूटर में यदि टीएफटी मॉनिटर लगा हो तो उसे खुद से कम से कम एक फुट दूर रखिए।
अब बात करते हैं लैपटॉप की, रेडिएशन के मामले में लैपटॉप भी सुरक्षित नहीं है। अगर आप इसे अपनी गोद में रखकर और स्क्रीन के बेहद करीब से इसका इस्तेमाल करते हैं, तो ये बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। क्योंकि आपका लैपटॉप एक फुट के दायरे में 1 मिलीगौस तक का रेडिएशन छोड़ता है, लेकिन जब आप चैटिंग करने या वीडियो कॉल करने के लिए इसकी स्क्रीन के बेहद करीब होते हैं, तब आपका शरीर लैपटॉप से 20 मिलीगौस तक का रेडिएशन झेल रहा होता है। लैपटॉप को गोद पर रखकर इस्तेमाल करने की सलाह बिल्कुल नहीं दी जाती, क्योंकि इस स्थिति में लैपटॉप से फूटने वाले रेडिएशन का सीधा असर आपके जननांगों पर होता है। फुट
 वायरलेस इंटरनेट और सीपीयू
 घर और दफ्तर में वायरलेस इंटरनेट का इस्तेमाल एक आम बात है...लेकिन इसके लिए जिस वाई-फाई या वायरलेस सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, उससे भी रेडिएशन फूटता है। कंप्यूटर्स को लगातार पावर सप्लाई करने के लिए जिस यूपीएस का इस्तेमाल हर घर और दफ्तर में होता है, उससे भी घातक रेडिएशन फूटता पाया गया है। छोटा सा सीपीयू रेडिएशन छोड़ने के मामले में टेलीविजन, कंप्यूटर मॉनिटर्स और लैपटॉप सबको पीछे छोड़ देता है। एक सामान्य सीपीयू से एक फुट के दायरे में 20 मिलीगौस तक घातक रेडिएशन निकल सकता है, जबकि एक मीटर दूर जाने पर सीपीयू के रेडिएशन की मात्रा घटकर 1 मिलीगौस तक रह जाती है। इसलिए सलाह ये दी जाती है कि कंप्यूटर की अपनी सीट से सीपीयू को कम से कम डेढ़ मीटर दूर रखें। इंटरनेट का इस्तेमाल सीधे केबल से करें, वायरलेस इंटरनेट का इस्तेमाल कम से कम करें। कंप्यूटर तभी ऑन करें जब जरूरत हो, कंप्यूटर के साथ मॉनिटर को बिना किसी काम के घंटों ऑन रखना सेहत के लिए सुरक्षित नहीं है। मूड अगर कंप्यूटर पर गाने सुनने का है तो मॉनीटर ऑफ करके गाने सुनिए।
इतना ही नहीं प्रिटर, फोटोकॉपियर और फैक्स मशीन से भी हल्का रेडिएशन निकलता है, इसलिए इन मशीनों से कम से कम 3 फुट की दूरी बना कर काम करें।
 मोबाइल रेडिएशन
 केंद्र सरकार की अंतर-मंत्रिपरिषद समिति ने देश में सेलफोन और उनके टॉवर से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्निक रेडिएशन की वजह से मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों का अध्ययन किया है। समिति ने इस बात की सिफारिश की है कि रेडिएशन संबंधी मौजूदा मानकों में तुरंत बदलाव किया जाना बेहद जरूरी है। समिति की रिपोर्ट के अनुसार सेल फोन मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हैं, क्योंकि ये आरएफ यानि रेडियो फ्रीक्वेंसी का रेडिएशन उत्सर्जित करते हैं।
सेल फोन और इनके टॉवर्स का इस्तेमाल सुरक्षित बनाने के लिए समिति ने कई सिफारिशें की हैं, इनमें से मुख्य सिफारिशें हैं कि घनी आबादी वाले इलाकों में सेलफोन टॉवर्स पर सख्त पाबंदी लगाई जाए, इन सेलफोन टॉवर्स से रेडियो फ्रीक्वेंसी के जिस स्तर के प्रसारण की अनुमति दी गई है, उस स्तर को कम से कम दसवें हिस्से तक घटाया जाए, स्पेसेफिक एब्जॉर्पशन रेट यानि एसएआर के जिस स्तर को मंजूरी दी गई है उसे और कम किया जाए और साथ ही एक मॉनीटरिंग नेटवर्क की स्थापना की जाए जो ये समय-समय पर जांच करके ये सुनिश्चित करे कि तमाम प्रावधानों का पालन किया जा रहा है। यहां ये जानना जरूरी है कि स्पेसेफिक एब्जॉर्पशन रेट यानि एसएआर मोबाइल फोन और इनके टॉवर्स से निकलने वाले माइक्रोवेव रेडिएशन को मापने की इकाई है और इससे हम ये पता लगाते हैं कि मोबाइल फोन का कितना रेडिएशन हमारे लिए नुकसानदेह नहीं है।
वर्तमान में देश में काम कर रही मोबाइल कंपनियां इंटरनेशनल कमीशन ऑन नॉन-आयनाइजिंग प्रोटेक्शन यानि आईसीएनआईआरपी के उत्सर्जन मानकों का पालन कर रही हैं, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी मंजूरी दे रखी है। लेकिन अंतर-मंत्रिपरिषद समिति ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि सेल फोन और इनके टॉवर्स से निकले वाले माइक्रोवेव रेडिएशन के संबंध में आईसीएनआईआरपी के उत्सर्जन मानक भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित नहीं हैं। यूरोप के मुकाबले भारत की जलवायु गर्म और उष्णकटिबंधीय है इसके अलावा यूरोप के लोगों की शारीरिक बनावट की अपेक्षा औसत भारतीय कम लंबाई वाला और दुबला-पतला होता है। ऐसे में मोबाइल टॉवर और सेल फोन से यूरोपियन मानक वाली रेडियो माइक्रोवेव रेडिएशन का देश में प्रसारण भारतीयों की सेहत के लिए एक बड़ा जोखिम है।
बहरहाल मंत्रिपरिषदीय समिति की इन सिफारिशों पर अमल होना बाकी है। वर्तमान में देश में मोबाइल टॉवर्स को लगाने पर कोई रोक-टोक नहीं है। नियंत्रण के नाम पर बस कुछ प्रदूषण संबंधी मानक हैं, मोबाइल ऑपरेटर्स कंपनियों को जिनका पालन करना होता है। सरकार की चिंता इस बात को लेकर ज्यादा है कि मोबाइल टॉवर को चलाने के लिए कंपनियां जो साथ में जनरेटर लगाती हैं, उससे धुआं कितना निकलता है। लेकिन इन टॉवर्स से कितने उच्च स्तर का कितना घातक माइक्रोवेव रेडिएशन निकल रहा है इसे लेकर कोई खास परेशानी नहीं है। कोई प्रभावी नियम और निगरानी व्यवस्था न होने से ही देश के हर छोटे-बड़े शहर के रिहायिशी इलाकों में मोबाइल टॉवर्स का जाल फैला नजर आता है। जानकारी के अभाव में भोले मकान मालिकों के लिए तो छत पर लगा मोबाइल टॉवर शान की बात भी है और आसान कमाई का जरिया भी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर चिंता भी जताई है कि हाल के कुछ वर्षों में सेलफोन और इनके टॉवर से उत्सर्जित होने वाले माइक्रोवेव रेडिएशन के स्तर में भारी बढ़ोतरी हुई है, ये गंभीर चिंता का विषय है। अपनी रिपोर्ट में समिति ने उन सभी लोगों को, जिन्होंने पेसमेकर जैसे मेडिकल इम्प्लांट्स लगवा रखे हैं, सुझाव दिया है कि उन्हें हर वक्त सेल फोन से कम से कम 30 सेंटीमीटर यानि एक फुट की दूरी बनाए रखनी चाहिए। 
हाल ही में दिल्ली में लगे मोबाइल टॉवर्स और सेल फोन से होने वाले माइक्रोवेव रेडिएशन का व्यापक सर्वे किया गया। सर्वे में पता चला कि 2006 में राजधानी में केवल 1800 मोबाइल टॉवर्स थे, जिनकी तादाद अब बढ़कर 6000 तक हो चुकी है। केवल मोबाइल टॉवर्स के बढ़ जाने भर से दिल्ली की हवा में मौजूद इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन के स्तर में हजार गुना तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। दिल्ली के लिए इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन का सुरक्षित स्तर एक वर्ग मीटर क्षेत्र के लिए 600 मिलीवॉट का माना गया है। लेकिन जब सर्वे में शामिल वैज्ञानिकों ने इस सुरक्षित मानक वाले माइक्रोवेव रेडिएशन वाले इलाके की खोज में दिल्ली का दौरा किया तो पता चला कि ये सुरक्षित मानक वाला माइक्रोवेव रेडिएशन केवल दिल्ली के एक बटा पांचवें हिस्से में ही है। और आपको ये जानकर ज्यादा हैरानी नहीं होगी कि मोबाइल टॉवर और सेल फोन से निकलने वाले माइक्रोवेव रेडिएशन के सुरक्षित स्तर वाला ये इलाका दिल्ली का वीवीआईपी क्षेत्र है।
बैकग्राउंड रेडिएशन
एक्स-रे, टेलीविजन, कंप्यूटर मॉनिटर, ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और मोबाइल समेत सभी वायरलेस मशीनों से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन के बारे में हमने जानकारी ली। अब हम बात करते हैं उस प्राकृतिक रेडिएशन की जो हमारे चारों ओर मौजूद है। हम सभी रेडिएशन युक्त माहौल में रहते और काम करते हैं, लेकिन इससे घबराने की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि हमारे आसपास मौजूद प्राकृतिक रेडिएशन का स्तर इतना कम रहता है, कि हमें नुकसान नहीं पहुंचा सकता। 
भारतीय परमाणु ऊर्जा विभाग ने देश में प्राकृतिक रेडिएशन जिसे बैकग्राउंड रेडिएशन भी कहते हैं, की स्थित जानने के लिए देशव्यापी अध्ययन के बाद रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, प्राकृतिक रेडिएशन के मुख्य स्रोत हैं- कॉस्मिक किरणें, धरती की ऊपरी पर्त और इमारत निर्माण सामग्री में मौजूद यूरेनियम-थोरियम जैसे रेडियोएक्टिव परमाणुओं की मौजूदगी, खान-पान के साथ इनका हमारे शरीर में जाना और रेडॉन-थोरॉन जैसी रेडियोएक्टिव गैसों का हमारी सांस के साथ फेफड़ों में प्रवेश। कुछ प्राकृतिक रेडिएशन ऐसे हैं जिनका स्तर पूरी दुनिया में एकसमान रहता है, जबकि कुछ प्राकृतिक रेडिएशन ऐसे हैं, जिनका स्तर अलग-अलग भौगोलिक स्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। दरअसल, वातावरण के संपर्क में आकर यूरेनियम रेडॉन गैस और थोरियम थोरॉन गैस बनाते हैं, ये दोनों गैसें रंगहीन, गंधहीन और रेडियोएक्टिव होती हैं। अगर किसी जगह धरती की पर्त में यूरेनियम और थोरियम की मौजूदगी ज्यादा है, तो वहां रेडॉन और थोरॉन गैस का जमाव भी ज्यादा होगा, इसका सीधा मतलब ये है कि उस जगह प्राकृतिक रेडिएशन का स्तर सामान्य से अधिक होगा।
प्राकृतिक रेडिएशन का एक और स्त्रोत कॉस्मिक किरणें हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में लगातार उच्च ऊर्जा वाली कॉस्मिक किरणों की बौछार अंतरिक्ष से होती रहती है। हालांकि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र ज्यादातर कॉस्मिक किरणों को रोक देता है, लेकिन फिरभी कॉस्मिक किरणों में मौजूद उच्च रेडिएशन से भरे कुछ  रेडियोएक्टिव कण आर-पार भी निकल जाते हैं। भारतीय परमाणु ऊर्जा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में कॉस्मिक किरणों के सामान्य रेडिएशन का सालाना स्तर 0.26 से 2 माइक्रोसीवर्ट के बीच है। खास बात ये कि ऊंचाई वाले इलाकों जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में कॉस्मिक किरणों के रेडिएशन का स्तर मैदानी इलाकों की अपेक्षा ज्यादा पाया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार कश्मीर के गुलमर्ग में रहने वाले लोगों को कास्मिक किरणों से करीब 830 मिलीसीवर्ट तक का रेडिएशन हर साल झेलना पड़ता है। ये सामान्य से कहीं ज्यादा है। देश भर में प्राकृतिक रेडिएशन का स्तर जानने के लिए किए गए सर्वे के मुताबिक भारत में प्राकृतिक गामा-किरणों का कुल रेडिएशन औसतन 0.734 मिलीसीवर्ट सालाना पाया गया है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार देशभर में रेडॉन और थोरॉन जैसी रेडियोएक्टिव गैसों की वजह से होने वाले औसत रेडिएशन का स्तर 1.235 माइक्रोसीवर्ट सालाना है।
रेडॉन और थोरॉन जैसी रेडियोएक्टिव गैसों से होने वाला रेडिएशन खतरनाक स्तर तक भी बढ़ सकता है, क्योंकि ये गैसें जमीन से लगातार निकलती रहती हैं। खुले मैदान में तो हवा इन गैसों के रेडियोएक्टिव परमाणुओं को एक जगह जमने नहीं देती, लेकिन बंद कमरे या फिर तहखानों में इनका जमाव होता रहता है और इसी के साथ रेडिएशन का स्तर भी बढ़ता रहता है। एक अध्ययन के अनुसार रेडॉन गैस हर पत्थर से निकलती है, इसलिए संगमरमर की फर्श से लेकर किचन में लगे ग्रेनाइट तक सब रेडिएशन से भरी रेडॉन गैस को उत्सर्जित करते रहते हैं।
अब सवाल ये कि प्राकृतिक रेडिएशन से बचाव का तरीका क्या है? कॉस्मिक किरणों से होने वाले रेडिएशन से बचाव के लिए शरीर के अंगों को ज्यादा से ज्यादा ढंके रहें और ऊंचाई वाले इलाकों जैसे पहाड़ी इलाकों में ज्यादा वक्त न बिताएं। धरती से फूटने वाली रेडियोएक्टिव गैसों रेडॉन और थोरॉन से बचाव आसान है, लंबे वक्त से बंद पड़े घर या तहखाने में जाने से पहले वहां की खिड़कियां, रोशनदान और दरवाजे खोल दें,ताकि अंदर इकट्ठा हो चुकी गैस बाहर निकल जाए। अगर आप लंबी छु़ट्टियों पर जा रहे हैं तो इसका इंतजाम करके जाएं कि आपके घर में हवा का आवागमन बना रहे। अमेरिका में लकड़ी को प्राकृतिक रेडिएशन के बचाव का सबसे अच्छा तरीका माना जाता है, इसीलिए वहां ज्यादातर घर लकड़ी से बनाए जाते हैं। हमें इससे सीख ले सकते हैं, अपने घरों में पत्थर की फर्श के बजाए लकड़ी की फ्लोरिंग करवा कर रेडॉन गैस से बचाव कर सकते हैं।
आईआईटी कानपुर ने सामान्य गोबर को रेडिएशन विरोधी पाया है, इसलिए ग्रामीण इलाकों में फर्श और दीवारों पर गोबर का लेप करना प्राकृतिक रेडिएशन की रोकथाम का बेहतरीन उपाय है।
गढ़वाल, झारखंड और केरल के कुछ इलाके ऐसे हैं जहां प्राकृतिक रेडिएशन का स्तर सालभर सामान्य से बहुत ज्यादा रहता है। देश में प्राकृतिक रेडिएशन का सबसे ऊंचा स्तर केरल के छेवरा में पाया गया है, जबकि लक्ष्यद्वीप के मिनिकोए में इसका स्तर सबसे कम पाया गया है। दुनियाभर में प्राकृतिक रेडिएशन का सालाना स्तर 2.455 मिलीसीवर्ट मापा गया है, जबकि भारत में इसका स्तर अपेक्षाकृत कम 2.299 मिलीसीवर्ट है। दुनियाभर में अब प्राकृतिक रेडिएशन को लेकर चिंता बढ़ी है, क्योंकि इसका बढ़ता स्तर कई बीमारियों की वजह बनता जा रहा है। 

सोमवार, 29 नवंबर 2010

‘स्पेक्ट्रम’ आखिर है क्या ?

17 वीं सदी में महान वैज्ञानिक इसाक न्यूटन ने एक ऐसा प्रयोग किया जिसने साइंस की धारा ही बदल दी। उन्होंने अपनी प्रयोगशाला के सभी खिड़की दरवाजे बंद कर दिए। फिरभी प्रयोगशाला में पूरा अंधेरा नहीं हो सका, क्योंकि खिड़की की एक दरार से सूरज की किरण भीतर आ रही थी। न्यूटन ने मुस्कराते हुए शीशे का एक छोटा प्रिज्म उठाया और उसे सूरज की उस किरण के सामने ले गए। एक जादू सा हो गया और सूरज की रोशनी का रहस्य सामने आ गया। सामने रखे एक सफेद बोर्ड पर इंद्रधनुष खिल उठा, दरअसल शीशे के प्रिज्म ने सूरज की रोशनी में मौजूद सात उन रंगों को अलग कर दिया था। हमारी आंख जो कुछ भी देखती है वो इन सात रंगों की सीमा में ही सिमटा रहता है। न्यूटन ने सूरज की रोशनी में छिपे इन सात रंगों को स्पेक्ट्रम कहा, और फिजिक्स में एक नई शुरुआत हो गई।
हमारा सूरज और एक साधारण अणु ये दोनों ही स्पेक्ट्रम के प्राकृतिक स्रोत हैं। आज स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल हम हर रोज जाने-अनजाने करते रहते हैं, टीवी के रिमोट से लेकर लैपटॉप पर वॉयरलेस इंटरनेट, माइक्रोवेव ओवेन, खिली-खिली धूप और मोबाइल फोन तक सब स्पेक्ट्रम का ही कमाल है। न्यूटन ने हमें स्पेक्ट्रम के गुण के बारे में बताया लेकिन स्पेक्ट्रम की वजह को गहराई से समझा महान भारतीय वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन ने। रमन ने अगर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का राज नहीं समझा होता तो आज न तो रिमोट होता और न मोबाइल फोन। हर अणु परमाणुओं सो बनता है और हर परमाणु के केंद्र में एक नाभिक होता है, जिसमें प्रोटान और न्यूट्रॉन होते हैं और अलग-अलग कक्षाओं में परिक्रमा करते इलेक्ट्रान चारों ओर से नाभिक को घेरे रहते हैं। अब शुरू होता है असली खेल, जब परमाणु को गर्म किया जाता है तो नाभिक की परिक्रमा करते इलेक्ट्रान अपनी कक्षा से छलांग लगाकर और ऊपर वाली कक्षा में पहुंच जाते हैं। इसी तरह जब परमाणु को ठंडा किया जाता है तो नाभिक की परिक्रमा कर रहे इलेक्ट्रान निचली कक्षाओं में गिर जाते हैं। सबसे खास बात ये कि नाभिक के चारोंओर घूमता इलेक्ट्रान जब भी अपनी कक्षा से ऊपर छलांग लगाता है या नीचे गिरता है, उस वक्त वो खास स्पेक्ट्रम छोड़ता है। इसे कहते हैं इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम। रमन ने पता लगाया कि कुदरत में मौजूद सभी धातुओं, खनिजों, गैसों और तरल का स्पेक्ट्रम बिल्कुल अलग-अलग होता है। ये स्पेक्ट्रम बिल्कुल उंगलियों के निशान जैसा होता है यानि हर तत्व का स्पेक्ट्रम बिल्कुल अलग और अनोखा। इस खोज के लिए रमन को भौतिकी के नोबेल से सम्मानित किया गया और तत्वों से निकलने वाले स्पेक्ट्रम को रमन इफेक्ट कहा गया। आज रमन इफेक्ट से ही हम चंद्रमा और मंगल ग्रह मौजूद खनिजों का पता लगा रहे हैं, और खोजे जा रहे नए ग्रहों के बारे में यहीं बैठे-बैठे बता सकते हैं कि वहां पानी है या नहीं, या उसका वातवरण कैसा है।
इलेक्ट्रोमैगनेटिक रेडिएशन की वजह जानने के बाद अब मनचाही स्पेक्ट्रम को हासिल करना आसान हो गया, और यहीं से स्पेक्ट्रम के कारोबारी इस्तेमाल की शुरुआत हुई। फ्रीक्वेंसी और वेवलेंथ हर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की खास पहचान होती है, और इसी के आधार पर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन को रेडियो, माइक्रोवेव, इंफ्रारेड, विजिबिल, अल्ट्रावॉयलेट, एक्स-रे और गामा-रे की पहचान की गई। ये सारी स्पेक्ट्रम, जिन्हें हम रेडिएशन भी कह सकते हैं, इनमें से कुछ हमें कोई नुकसान नहीं पहुंचाती और हमारे बेहद काम की हैं, जैसे रेडियो जिससे हम टीवी के प्रोग्राम्स देखते हैं, माइक्रोवेव जिससे सेटेलाइट संचार और ओवन से लेकर मोबाइल फोन तक काम करते हैं और इंफ्रारेड जिसपर सभी रिमोट काम करते हैं। समुद्र के किनारे की धूप में 53 फीसदी इन्फ्रारेड, 44 फीसदी दिखाई देने वाली रोशनी और 3 फीसदी अल्ट्रावॉयलेट किरणें होती हैं। अल्ट्रावॉयलेट, एक्स-रे और गामा-रे स्पेक्ट्रम बेहद खतरनाक हैं और इनके संपर्क में कुछ देर रहने से ही हम बीमार पड़ सकते हैं।
मोबाइल, सेटेलाइट और टेलीविजन इन तीनों में माइक्रोवेव और रेडियो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जाता है। अब सवाल ये कि आखिर इसका कारोबारी इस्तेमाल कैसे होता है? दरअसल किसी स्पेक्ट्रम का कारोबारी इस्तेमाल इन बातों से तय होता है कि उसकी तरंग की लंबाई कितनी है, उसकी फ्रिक्वेंसी (वेवलेंथ या साइकल प्रति सेकंड) क्या है और वो कितनी ऊर्जा कितनी दूर तक साथ ले जा सकती है।
रेडियो वेव स्पेक्ट्रम से लंबी दूरी तय की जा सकती हैं और वह भी बिना किसी दिक्कत के। रेडियो वेव स्पेक्ट्रम  की तरंगें काफी लंबी होती हैं। इनकी वेवलेंथ 1 किलोमीटर से लेकर 10 सेंटीमीटर तक की होती है और फ्रिक्वेंसी भी 3 किलोहट्र्ज (3,000 साइकिल प्रति सेकंड) से लेकर 3 गीगाहट्र्ज (3 अरब साइकिल प्रति सेकेंड) तक के बीच होती है। रेडियो तरंगों को सबसे ज्यादा असर भाप और आयन से होता है। साथ ही, इन पर सोलर फ्लेयर और एक्सरे किरणों के विस्फोट का भी असर होता है। साथ ही, पहाड़ों की वजह से भी रेडियो तरंगों से संचार में काफी असर पड़ सकता है। छोटी फ्रिक्वेंसी मकानों और पेड़ों को भी पार कर सकती हैं। साथ ही, ये पहाड़ों के किनारे से भी निकल सकती हैं।
माइक्रोवेव स्पेक्ट्रम का सबसे फायदेमंद इस्तेमाल दूरसंचार और इंटरनेट में होता है। दूरसंचार और ब्रॉडबैंड के लिए 700-900 मेगाहट्र्ज की छोटी फ्रिक्वेंसी काफी फायदेमंद होती हैं। सेंटीमीटर और मिलीमीटर की रेंज वाली माइक्रोवेव्स की फ्रिक्वेंसी 300 गीगाहट्र्ज तक हो सकती है। इसके अलग-अलग प्रकार के इस्तेमाल को देखते हुए इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। खाना पकाने वाले माइक्रोवेव में सैकड़ों वॉट बिजली का इस्तेमाल आरएफ वेवलेंथ को पैदा करने में होता है। ये वेवलेंथ 32 सेमी (915 मेगाहट्र्ज) से लेकर 12 सेमी (2.45 मेगाहट्र्ज) तक के होते हैं। छोटी ऊर्जा स्रोतों वाले उपकरणों से पैदा होने वाले माइक्रोवेव का इस्तेमाल संचार के साधनों के रूप में होता है और ये काफी कम ऊर्जा पैदा करते हैं। इन्फ्रारेड वेव छोटी होती हैं और वे काफी गर्म होती हैं। लंबी दूरी वाले इन्फ्रारेड बैंड्स का इस्तेमाल रिमोट कंट्रोल के लिए होता है। साथ ही, इनका इस्तेमाल बहुत कम गर्मी पैदा करने वाले बल्बों में होता है।
 2जी और 3जी
किस स्पेक्ट्रम पर हम बात करेंगे और किस स्पेक्ट्रम पर सेटेलाइट डेटा भेजे जाएंगे, इस जैसे तमाम मुद्दों की बागडोर संभाल रखी है इंटरनेशनल कम्युनिकेशन यूनियन ने। संयु्क्त राष्ट्र की इस इकाई ने सभी सदस्य देशों को अलग-अलग स्पेक्ट्रम के बैंड्स आवंटित कर रखे हैं। इसमें कोई देश मनमानी या एक-दूसरे के कामकाज में बाधा नहीं पहुंचा सकता। इन नियमों के तहत 1980 में 1-जी यानि फर्स्ट जनरेशन वायरलेस टेक्नोलॉजी की शुरुआत हुई, पहले पहल जिसका इस्तेमाल कार फोन में किया गया। 2-जी यानी सेकेंड जनरेशन वायरलेस टेलीफोन टेक्नोलॉजी की शुरुआत 1990 में हुई। 1991 में पहली बार फिनलैंड में रेडियोलिंजा कंपनी की ओर से जीएसएम मोबाइल सर्विस में 2-जी टेक्नोलॉजी का कारोबारी इस्तेमाल शुरू हुआ। डाटा ट्रांसफरिंग, टेक्स विथ रेडियो सिग्नल्स आदि सुविधाओं से हुई शुरुआत में जल्दी ही सीडीएमए का प्रवेश भी हो गया। अब आ गई है बारी 3-जी यानि थर्ड जनरेशन मोबाइल टेक्नोलॉजी की। 3-जी में डाटा का हस्तांतरण तेजी से होता है और नेटवर्क भी अच्छा होता है। 2जी स्पेक्ट्रम की बात करें तो ये हमारी सरकार के पास इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन से आवंटित एक खास रेडियो वेव बैंड है। सिग्नल भेजने के लिए मोबाइल कंपनियों को फ्रिक्वेंसी रेंज की जरूरत थी। सरकार ने लाइसेंस फी लेकर स्पेक्ट्रम मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर्स को जारी किए।
खास बात ये कि 2-जी और 3-जी के स्पेक्ट्रम में कोई खास अंतर नहीं है। बस सरकार के नियमन और इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशंस यूनियन ने सदस्य देशों के बीच बेहतर तारतम्यता के तहत इसके लिए अलग स्पेक्ट्रम घोषित किया गया है। दोनों नेटवर्क 800-900 और 1800-1900 मेगाहट्र्ज पर काम करते हैं और कर सकते हैं। कमाई में इजाफे को देखते हुए अनुमानों के मुताबिक 900 मेगाहट्र्ज के 3जी में 2.1 गीगाहट्र्ज से कम लागत लगती है। फिनलैंड, आइसलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, थाईलैंड, वेनुजुएला, डेनमार्क और स्वीडन में तो 900 मेगाहट्र्ज (2जी स्पेक्ट्रम) पर ही 3जी नेटवर्क मौजूद है। फ्रांस भी अब 2जी की जगह 3जी को बढ़ावा दे रहा है। इससे पता चलता है कि भारत में सरकारी और रक्षा इस्तेमालों की वजह से स्पेक्ट्रम की कितनी ज्यादा किल्लत है। हमें अपनी जरूरतों, लैंडलाइन फोनों की कम पहुंच और लागत को देखते हुए अपनी क्षमता के विस्तार के नए तरीकों की तलाश करनी होगी। दूसरे मुल्कों में कंपनियां इस स्पेक्ट्रम का अपनी इच्छा के मुताबिक इस्तेमाल करने के लिए मुक्त हैं, जबकि अपने मुल्क में इस बारे में कोई तस्वीर ही स्पष्ट नहीं है। हमारी नीतियों कम कीमत पर ज्यादा अच्छी कवरेज या क्षमता के बारे में स्थिति को स्पष्ट कर सकती हैं। इससे लोगों को कम कीमत पर अच्छी सेवा मिलेगी। 

रविवार, 14 जून 2009

"सोनिक ब्लैक होल" की शानदार खोज

सेर्न के लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में प्रोटॉन्स की टक्कर से ब्लैक होल के बनने की आशंका, फिल्म एंजेल्स एंड डिमॉन्स ने पर्दे पर सही साबित कर दिया है। ये बात अलग है कि एलएचसी में पहला प्रयोग फेल हो जाने के बाद दोबारा प्रयोग शुरू करने में अभी काफी वक्त है। लेकिन इस बीच वैज्ञानिकों को प्रयोगशाला में ब्लैक होल उत्पन्न करने में कामयाबी मिल गई है। ये बात अलग है कि ये ब्लैक होल असली ब्लैक होल जैसा खतरनाक नहीं है...और हमारी धरती सुरक्षित है।
स्टीफन हॉकिंग का सिद्धांत बताता है कि ब्लैक होल से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की एक तेज जेटधारा सी निकलती है। ब्लैक होल से फूटने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की इस तेज जेटधारा को उन्हीं के नाम पर हॉकिंग रेडिएशन का नाम दिया गया। हॉकिंग के इस सिद्धांत के 35 साल हो गए, लेकिन अब तक किसी ने ब्लैक होल से फूटनेवाली इस रेडिएशन को डिटेक्ट नहीं किया। लेकिन अब इस्राइल के वैज्ञानिकों की एक टीम एक ऐसे तरीके को खोजने में जुटी हैस जिससे प्रयोगशाला में ही एक आर्टीफीशियल ब्लैकहोल उत्पन्न कर उससे ह़किंग रेडिएशन को पैदा किया जा सके।
फिजिक्स की वेबसाइट arxiv.org की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों साइंटिस्टों की ये टीम पदार्थ की एक खास स्थिति, जिसे बोस-आईंस्टीन कंडेन्सेट ( बीईसी) कहते हैं, उसमें सोनिक वेव्स यानि तीव्र ध्वनि तरंगे भेजकर प्रयोगशाला में ही एक आर्टीफीशियल ब्लैक होल बनाने की कोशिशों में जुटी है। बोस-आईंस्टीन कंडेन्सेट या बीईसी पदार्थ की वो गैसीय स्थिति है जो एब्सोल्यूट जीरो के करीब हिमांक तापमान पर पाई जाती है। इस्राइली वैज्ञानिकों की टीम ने खास तौर पर चुनी गई ध्वनि तरंगों के इस्तेमाल से बोस-आईंस्टीन कंडेन्सेट में एक ऐसा क्षेत्र पैदा करने में सफलता हासिल की है, जिससे प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता। ये एक महान खोज है, क्योंकि दुनिया में पहली बार "सोनिक ब्लैक होल" को बनाने में कामयाबी मिली है। दुनिया का पहला "सोनिक ब्लैक होल" प्रयोगशाला में बनाने में वैज्ञानिकों को 30 साल लग गए। यहां तक तो सफलता मिल गई, लेकिन असली ब्लैक होल से फूटती हॉकिंग रेडिएशन ती तीव्र जेटधारा को आंखों के सामने घटित होता देखना अभी बाकी है। इस्राइली टीम को उम्मीद है कि "सोनिक ब्लैक होल" से भी हॉकिंग रेडिएशन की जेटधारा ठीक उसी तरह फूट निकलेगी जैसे कि असली ब्लैक होल में होता है। "सोनिक ब्लैक होल" की कामयाबी से वैज्ञानिकों की टीम बेहद उत्साहित है और इस ऐतिहासिक उपलब्धि को हासिल करने के लिए प्रयोग में जुटी है।