12 अप्रैल 1961, कजाकस्तान का बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, अनजाने भय और आशंकाओं के बीच मानव अंतरिक्ष के गहन अज्ञात में पहला कदम रखने जा रहा था। ऐसे में अपने स्पेसक्राफ्ट वोस्तोक-1 में बैठने से पहले यूरी गैगेरिन ने दुनिया भर के लोगों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाया -
“प्यारे दोस्तों, भले ही आप मुझे जानते हों, या न जानते हों, मेरे हमवतनों और दुनियाभर के लोगों, अगले कुछ मिनटों में एक शक्तिशाली रॉकेट मुझे ब्रह्मांड की सुदूर गहराइयों में ले जाएगा। अंतरिक्ष के सफर पर निकलने से पहले अब इन अंतिम पलों में मैं आपसे क्या कह सकता हूं। अपनी पूरी जिंदगी अब मुझे एक अकेले खूबसूरत क्षण जैसी लग रही है। मैंने जिंदगी में जो कुछ भी किया, जो भी जीया वो सब कुछ बस इस क्षण के लिए ही था।”
विश्व नागरिकों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाने के बाद यूरी गैगेरिन वोस्तोक रॉकेट में सवार होकर विश्व के पहली मानव अंतरिक्ष अभियान पर निकल गए। अंतरिक्ष में पहला मानव मौजूद होने की खबर जब दुनिया को मिली तो सभी अवाक रह गए। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद ये सबसे बड़ी और सबसे गौरवशाली खबर थी, जो पूरी दुनिया में बिजली की तेजी से फैल गई। अमेरिका दंग रह गया, लेकिन राजनयिक-कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर जारी तमाम स्पर्धाओं को दरकिनार कर वाशिंगटन ने बधाई का संदेश मास्को भेजा। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान ने पूरी दुनिया को मानव होने का अर्थ सही मायनों में समझाया और सभी देशों को एकसाथ गर्व की सुखद अनुभूति से भर दिया।
यूरी गैगेरिन भारत में
अंतरिक्ष से वापस आने के करीब आठ महीने बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर यूरी गैगेरिन भारत भी आए। भारत में भी गैगेरिन के लिए भव्य स्वागत यात्रा निकाली गई। गैगेरिन की उपलब्धि ने भारत को भी आत्मविश्वास से भर दिया। डॉ. विक्रम साराभाई भी यूरी की अंतरिक्षयात्रा से बहुत प्रभावित हुए और इस नतीजे पर पहुंचे कि एक प्रभावशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान के 8 साल बाद इसरो की स्थापना के साथ भारत ने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू कर दिया। और इसके महज 6 साल बाद अपना पहला सेटेलाइट आर्यभट्ट अंतरिक्ष भेजकर दुनिया को चौंका दिया। यूरी गैगेरिन के सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने खास डाकटिकट भी जारी किए। यूरी ने जब पृथ्वी की पहली परिक्रमा की उस वक्त वो केवल 27 वर्ष के थे। 108 मिनट की उनकी अंतरिक्षयात्रा ने विश्व के युवाओं को इस कदर जोश से भर दिया कि इसके बाद दुनिया ही बदल गई।
स्पुतनिक और स्पेस एज
यूरी के अंतरिक्ष अभियान की पृष्ठभूमि तैयार हुई 4 अक्टूबर 1957 को जब पूर्व सोवियत संघ ने दुनिया का पहला सेटेलाइट स्पुतनिक पृथ्वी की कक्षा में भेजा। स्पुतनिक के साथ दुनिया में अंतरिक्ष युग की शुरुआत हुई, जिसे सोवियत वैज्ञानिकों ने आगे बढ़ाया 3 नवंबर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में जीवन का पहला रूप मादा कुत्ता ‘लाईका’ को भेजकर। अंतरिक्ष के माहौल में लाईका केवल 6 घंटे ही जीवित रह सकी, उसके चैंबर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाने की वजह से उसकी मौत हो गई। लाईका नहीं रही, लेकिन वो जिंदगी को अंतरिक्ष का रास्ता दिखा गई। अमेरिका एक बार फिर पिछड़ चुका था, लेकिन सोवियत जानता था कि अब अमेरिका दुनिया को चौंकाने वाला कोई बड़ा कारनामा जरूर करेगा। साम्यवादी सरकार हर कीमत पर अमेरिका को पछाड़ने पर आमादा थी। वक्त कम था और जल्दी ही कुछ बड़ा कर दिखाना था।
मिशन वोस्तोक और मिशन मरकरी
जनवरी 1959 को पूर्व सोवियत संघ ने इंसान को अंतरिक्ष भेजने के लक्ष्य के साथ एक अहम कार्यक्रम शुरू किया, जिसका नाम था वोस्तोक। इसके ठीक तीन महीने बाद अमेरिका ने भी अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने के लिए मिशन मरकरी का ऐलान कर दिया। अब पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका में इस बात की होड़ तेज हो गई कि पहले अंतरिक्षयात्री को अंतरिक्ष भेजने में बाजी कौन मारता है।
अमेरिका की तरह पूर्व सोवियत संघ ने भी अंतरिक्षयात्रियों को चुनने के लिए वायुसेना के पायलट्स को ही लेने का फैसला लिया। पूर्व सोवियत संघ ने गुपचुप ढंग से सारी तैयारियां शुरू कर दीं और देशभर से वायुसेना से सबसे कुशल 2000 पायलट्स को बुला भेजा। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम वोस्तोक के चीफ सेर्गेई कोरोलेव ने इन 2000 में से 200 पायलट्स का चुनाव किया और कड़े इम्तहान के बाद इन 200 में से 20 कैडेट्स को चुना गया। लेकिन किसी को भी ये नहीं बताया गया कि उन्हें करना क्या है। 20 लोगों की इसी टीम में शामिल थे सोवियत एयरफोर्स के सीनियर लेफ्टिनेंट यूरी गैगेरिन।
महज 5 फुट 2 इंच के कद वाले यूरी साथियों के बीच अलग ही नजर आते थे। मजाकिया स्वभाव के साथ उनकी सबसे बड़ी पहचान थी चेहरे पर हर वक्त खिली रहने वाली एक ताजगी भरी मुस्कान। 20 में से यूरी गैगरिन समेत 6 फाइनल कैडेट्स का चुनाव किया गया और तब उन्हें बताया गया कि उन्हें कॉस्मोनट यानि अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जा रहा है। 18 जून 1960 को पहली बार इन सभी छह लोगों को वोस्तोक रॉकेट दिखाया गया। अब जाकर इन्हें पता चला कि छह में से किसी एक भाग्यशाली को दुनिया का पहला अंतरिक्षयात्री बनने का मौका मिलेगा।
यूरी गैगेरिन जिस वक्त अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण ले रहे थे, उस वक्त तक न तो अच्छे कंप्यूटर्स थे, और न ही वो टेक्नोलॉजी जो एक इंसान को अंतरिक्ष भेजकर सुरक्षित वापस ला सकती थी। उस वक्त तक तो हमें अंतरिक्ष में विकिरण के खतरों की भी सही जानकारी नहीं थी और अंतरिक्ष के खतरनाक माहौल में जिंदगी की हिफाजत करने वाले अच्छे स्पेससूट की तो बात छोड़िए, सुरक्षित हेलमेट तक नहीं थे। ऐसे में एक इंसान को अंतरिक्ष भेजना एक राजनीतिक जिद के सिवाय कुछ नहीं था। राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं इस कदर हावी थीं कि अंतरिक्षयात्री की सुरक्षा जैसे सवाल बेमानी थे।
यूरी का चुनाव
11 महीने का अंतरिक्षयात्री प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, अब आई बारी अंतरिक्ष के पहले सफर के लिए 6 में से एक कॉस्मोनट को चुनने की। चयनकर्ताओं के सामने दो अंतिम नाम थे यूरी गैगेरिन और घेरमान तितोव। तितोव एक शिक्षक के बेटे थे, जबकि यूरी के पिता एक किसान थे। साम्यवादी सरकार ने दुनिया के पहले अंतरिक्षयात्री के तौर पर तितोव के बजाय मेहनतकश किसान के बेटे यूरी का चुनाव किया। पहली अंतरिक्षयात्रा के लिए यूरी के चुनाव की एक वजह और भी थी। दरअसल वोस्तोक कैप्स्यूल के कॉकपिट में लंबे कद के अंतरिक्षयात्री के लिए जगह ही नहीं थी। जबकि मजह 5 फुट 2 इंच कद वाले यूरी इस छोटे से कॉकपिट के लिए बिल्कुल फिट थे।
यूरी लंबे वक्त से घर से बाहर थे। हाल ही में उनकी बेटी लेना का जन्म हुआ था। लेकिन यूरी परिवार को ये नहीं बता सकते थे कि वो कहां हैं और क्या कर रहे हैं। अंतरिक्षयात्रा पर निकलने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी वेलेंटीना गोर्याचेवा को खत लिखा-
“मेरी प्यारी, तुमसे और बच्चों से मिलने को मैं बेकरार हूं...मैं देश के प्रति अपना फर्ज निभा रहा हूं...मैं एक ऐसे सफर पर जाने वाला हूं, जिसका ख्वाब मैं बचपन से देखता रहा हूं...ये कुछ ऐसा है जिसपर हम हमेशा गर्व करेंगे...इसमें कुछ खतरे भी हैं...लेकिन कई बार लोग अपने कमरे में टहलते हुए भी फिसल जाते हैं और उनकी जान खतरे में आ जाती है...बड़ी बात वो मकसद है, जिसके लिए हम खुद को दांव पर लगा दें...मुझे यकीन है कि मैं इस सबसे बड़े इम्तहान से विजेता बनकर तुम्हारे और बच्चों के पास लौट आउंगा....नन्हीं लेना को मेरा प्यार देना....तुम्हारा...यूरी।”
12 अप्रैल 1961, बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, कजाकस्तान। वो एतिहासिक दिन आ पहुंचा, यूरी ने दुनिया के नाम अपना संदेश रिकार्ड करवाया और ड्रेसिंग रूम में आ गए, जहां स्पेस सूट पहनने में साथियों ने यूरी गैगेरिन की मदद की। स्पेस सूट पहन लेने के बाद यूरी को लांच पैड तक ले जाने के लिए एक खास बस में बिठाया गया। बस में यूरी के साथ बतौर बैकअप कॉस्मोनट घेरमान तितोव भी स्पेस सूट पहनकर पीछे की सीट पर बतौर बैकअप पायलट मौजूद थे। तभी एक साथी इवानोव ने सौभाग्य के लिए एक चॉकलेट खिलाकर यूरी का मुंह मीठा कराया। बस कॉस्मोड्रॉम की ओर चल दी, और इसके साथ ही तितोव के दिल में एक तूफानी हलचल भी शुरु हो गई।

तितोव किसी भी मायने में यूरी से कम नहीं था, लेकिन इतिहास रचने का मौका यूरी को मिल रहा था। तितोव ने कई साल बाद एक इंटरव्यू में बताया कि जब तक यूरी बस से उतरकर रॉकेट की ओर नहीं चले गए, तब तक उन्हें यही लगता रहा कि शायद अगले ही पल कुछ ऐसा हो जाएगा, कि यूरी की जगह अंतरिक्ष जाने का मौका उन्हें मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बस कॉस्मोड्रॉम पहुंची, यूरी बस से उतरे और उन्होंने वहां मौजूद सैन्य अधिकारियों और मिशन वैज्ञानिकों को अपना परिचय देने की औपचारिकता निभाई। तितोव बस में ही बैठे रहे, उनके लिए अब कोई उम्मीद नहीं बची और यूरी एक नया इतिहास रचने के लिए रॉकेट की ओर बढ़ गए। तितोव ने निराशा में आंखें बंद कर लीं और एक झपकी लेने में खो गए।
कॉस्मोड्रॉम में आला सरकारी और फौजी अफसरों के साथ सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ सेर्गेई कोरोलेव भी मौजूद थे। खतरों से भरे इस सफर के लिए यूरी का चुनाव उन्होंने ही किया था। कोरोलेव भावुक हो उठे, क्योंकि वो ये बात बखूबी जानते थे कि इस सफर से यूरी के जिंदा वापस आने की संभावना 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। फिरभी यूरी से विदा लेते वक्त उन्होंने स्नेह के साथ कहा, “यूरी वापस लौट के आना।”
दोस्त ने निभाई दोस्ती
दुनिया की इस पहली अंतरिक्षयात्रा के दौरान वोस्तोक में यूरी के पूरे सफर का नियंत्रण ग्राउंड कंट्रोल के हाथों में था। यूरी को तब तक नियंत्रण हाथ में लेने की इजाजत नहीं थी, जब तक कि कोई आपात स्थिति सामने न आ जाए। आपात स्थिति में यूरी एक खास कोड के जरिए नियंत्रण हाथ में ले सकते थे, लेकिन ये खास कोड सेना के जनरल समेत बस दो-तीन लोगों को ही मालूम था और किसी इमरजेंसी से पहले यूरी को ये कोड न बताने की सख्त ताकीद की गई थी। कोरोलेव से गले मिलने के बाद यूरी रॉकेट पर ले जाने वाली लिफ्ट में सवार हो गए। वोस्तोक कैप्स्यूल में यूरी को बिठाने की जिम्मेदारी निभाई यूरी के एक दोस्त इंजीनियर ने। यूरी को बिठाने के दौरान उसने अपनी दोस्ती निभाई और अपनी जान जोखिम में डालकर यूरी के कान में चुपके से वो इमरजेंसी कोड बता दिया, जिसकी मदद से आपात स्थिति आने पर यूरी नियंत्रण अपने हाथों में ले सकते थे। इसपर यूरी मुस्कुराए और बोले, “मैं, जानता हूं, जनरल ने मुझे पहले ही कोड बता दिया है।”
रॉकेट लांच होने में अभी कुछ वक्त था। वोस्तोक कैप्स्यूल में बैठकर यूरी कंट्रोल रूम में मौजूद साथियों से माइक्रोफोन पर मजाक करने लगे। इसपर कोरोलेव ने यूरी को सावधान किया कि वो जो कुछ भी कह रहे हैं, वो सब रिकॉर्ड हो रहा है। ये जानकर यूरी झेंप गए और कंट्रोल रूम ठहाकों से गूंज उठा। अंतिम जांच पूरी होने पर, कोरोलेव ने इशारा किया और वोस्तोक के बूस्टर इंजन दहक उठे। रॉकेट लांच होते ही यूरी ने पूरे जोश में भरकर कहा...पियाकली...यानि... आओ चलें। तूफानी रफ्तार से रॉकेट आसमान की ओर बढ़ा चला जा रहा था। वोस्तोक कैप्स्यूल में मौजूद यूरी इन गौरवशाली क्षणों के आनंद में मातृभूमि को समर्पित एक गीत गुनगुना उठे -
the motherland knows...the motherland hears
when her son is flying up i the clouds....
(मातृभूमि जानती है...मातृभूमि सुनती है..
जब उसका बेटा...ऊपर बादलों में उड़ान भरता है)
रॉकेट लांच के तीन मिनट बाद, वोस्तोक के बूस्टर रॉकेट्स गैरेरिन को 28164 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से धरती की सरहदों के पार लिए चले जा रहे थे।
लांचिंग के 5 मिनट बाद, यूरी गैगरिन अंतरिक्ष से खूबसूरत नीली धरती को निहारने वाले पहले इंसान बन गए।
वोस्तोक कैप्सूल के कॉकपिट की छोटी सी खिड़की के उसपार चमकीली नीली धरती नजर आ रही थी। धरती की इस खूबसूरती को देखने में यूरी खो गए। उन्होंने माइक्रोफोन से कंट्रोल रूम को बताया, “अब मैं धरती के रंगों को देख रहा हूं...ये खूबसूरत है...बेहद खूबसूरत।”
अंतरिक्ष तक की उड़ान के 9 मिनट बाद रफ्तार की तेज सनसनाहट अचानक थम गई। गुरुत्वाकर्षण का असर खत्म हो गया। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा को पीछे छोड़कर यूरी पृथ्वी की अपनी कक्षा में पहुंच गए। उन्होंने कंट्रोल रूम को बताया, “सबकुछ ठीक है...शून्य गुरुत्वार्षण का अनुभव शानदार है...मुझे मजा आ रहा है।”
धरती पर जारी राजनीति का खेल

मानव इतिहास की सबसे शानदार उपलब्धि हासिल हो गई। किसी इंसान को अंतरिक्ष भेजने का सपना साकार हो गया। अपनी कक्षा में मौजूद यूरी गैगेरिन अब धरती की अपनी पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे। इस ऐतिहासिक कामयाबी के ऐलान के लिए पूर्व सोवियत सरकार अब तैयार थी। पहले से ही तीन बिल्कुल अलग-अलग हालात के लिए लिफाफे तैयार किए गए थे। पहले लिफाफे में यूरी गैगेरिन के मिशन की शानदार कामयाबी का ऐलान था। दूसरे लिफाफे में,तकनीकी खामी के चलते रूस की सीमा से बाहर लैंड हो गए रूसी कॉस्मोनट की मदद करने की अपील थी। जबकि तीसरे लिफाफे में एक शोक संदेश था, जिसमें लिखा था कि मिशन के दौरान यूरी गैगरिन की मौत हो गई। जब वैज्ञानिक आंकड़ों से मिशन की कामयाबी की पुष्टि हो गई, तो क्रेमलिन के आदेश पर पहला लिफाफा खोला गया और लोगों को साम्यवादी सरकार की इस शानदार कामयाबी की खबर दी सरकारी एजेंसी तास ने। रेडियो एनाउंसर यूराई लैवितान ने बाद में बताया कि पूरे करियर के दौरान कोवल दो मौके ही ऐसे आए, जब बुलेटिन पढ़ने के बाद वो फफक-फफक कर रो पड़े थे। पहला मौका था जब उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की खबर पढ़ी थी और दूसरा मौका अब सामने था, जब लो अंतरिक्ष में यूरी गैगेरिन के मौजूद होने का समाचार लोगों को सुना रहे थे।
धरती से करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर एक छोटे से कैप्स्यूल में मौजूद मौजूद गैगेरिन पृथ्वी की पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे, लेकिन ग्राउंड कंट्रोल में मौजूद वैज्ञानिकों का तनाव हर पल बढ़ता जा रहा था। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ कोरोलोव ने कंट्रोल रूम से पूछा, “कंट्रोल, वो कैसा है।”
इसपर स्पीकर पर यूरी की आवाज गूंजी, “मैं सुरक्षित हूं।”
तभी कंट्रोल रूम में लगे टेलीविजन स्क्रीन से यूरी के वीडियो सिगनल टूटने लगे। कोरोलोव यूरी को कुछ बताना चाहते थे कि अचानक टीवी स्क्रीन से यूरी की तस्वीर गायब हो गई। किसी अनहोनी के अंदेशे से कंट्रोल रूम में मौजूद कोरलोव समेत सारे वैज्ञानिक कांप उठे।
दरअसल यूरी टेलीविजन रिसीवर की रेंज से बाहर चले गए थे।
लांच से 30 मिनट से भी कम वक्त के भीतर यूरी गैगेरिन प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरे और उन्होंने आधी धरती को नींद के आगोश में समेटे रात के गहरे साये को देखा। जल्दी ही गैगेरिन का कैप्स्यूल अमेरिका के ऊपर से गुजरा, जिसके नागरिक अंतरिक्ष में पहले इंसान यूरी गैगेरिन की शानदार फतह से बेखबर गहरी नींद में खोए थे।
यूरी की जान खतरे में
अंतरिक्ष में करीब एक घंटा गुजारने के बाद कंट्रोल रूम में रीइंट्री यानि धरती के वातावरण में वापसी की गणना शुरू कर दी गई। पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रहे गैगेरिन को अब बर्न-अप की मदद से वोस्तोक कैप्स्यूल की रफ्तार कम करनी थी। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो गैगरिन पृथ्वी की और ऊंची कक्षा में प्रवेश कर जाते, जहां से फिर वापस लौटने का और कोई रास्ता नहीं था। रॉकेट बर्न-अप के साथ यूरी के कैप्स्यूल की रफ्तार तो कम हो गई लेकिन एक बड़ा हादसा सामने आ गया। वोस्तोक के सर्विस मॉड्यूल को कैप्स्यूल से अलग होना था, लेकिन दोनों एक-दूसरे में फंस गए। कंट्रोल रूम में वैज्ञानिक कांप उठे। वोस्तोक सर्विस मॉड्यूल अगर कैप्स्यूल के साथ जुड़ा रहता तो अंतरिक्ष में गैगेरिन की मौत तय थी। यूरी कंट्रोल रूम का रेडियो संपर्क टूट गया। तेज गर्मी से दहकते और एक-दूसरे से टकराते वोस्तोक के दोनों हिस्से धरती के वातारण में प्रवेश कर गए। हालात अब हाथ से निकल गए। कोरलोव अब कंट्रोल रूम के दूसरे वैज्ञानिकों के साथ इंतजार के सिवा कुछ और नहीं कर सकते थे।

साईबेरिया के सारातोव इलाके में किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। कि तभी अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। खेतों में काम कर रही एक लड़की घबराकर मां से लिपट गई। दोनों ने आसमान की ओर नजरें उठाईं। आसमान से दो चीजें पैराशूट के सहारे नीचे गिर रही थीं। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश के अंतिम क्षणों में भीषण तापमान से वोस्तोक के एक-दूसरे में फंसे दोनों दोनो अपने आप अलग हो गए और इसके कुछ पल बाद ही टुकड़ों को अलग कर दिया। इसके कुछ ही क्षण बाद धरती से करीब साढ़े छह किलोमीटर की ऊंचाई पर गैगेरिन ने कैप्स्यूल के बाहर पराशूट से छलांग लगा दी।
108 मिनट की इस ऐतिहासिक अंतरिक्षयात्रा के दौरान गैगेरिन ने 40234 किलोमीटर की दूरी तय की और इसके साथ ही वो अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले पहले इंसान बन गए। कंट्रोल रूम में गहरा सन्नाटा था। कोरोलोव ने फोन उठाया और फिर साथियों को यूरी की साईबेरिया में सुरक्षित लैंडिंग की खबर दी। इसके साथ ही कंट्रोल रूम खुशियों से झूम उठा।
अंतरिक्ष में पहला अंतरिक्षयात्री भेजने में पूर्व सोवियत संघ ने बाजी मार ली और अमेरिका स्पेस-रेस में मीलों पीछे छूट चुका था। तात्कालीन सोवियत राष्ट्रपति निकिता खुश्चेव ने गैगेरिन की अंतरिक्षयात्रा को साम्यवादी सिद्धांतों की सर्वोच्च विजय के तौर पर प्रचारित किया। गैगेरिन अब नेशनल हीरो थे।
गैगेरिन की वापसी के दो दिन बाद सोवियत सरकार ने इस शानदार उपलब्धि का सार्वजनिक जश्न मनाया। एयरफोर्स का एक विमान गैगेरिन को लेकर सीधे क्रेमलिन पहुंचा। जीत के गौरव से भरे छोटे कद के गैगेरिन सधे कदमों रेड कारपेट पर चल रहे थे कि तभी उनकी पत्नी ने उनके पैरों में कुछ महसूस किया।
यूरी रेड कारपेट पर चले आ रहे थे, लेकिन उनके जूते का एक फीता खुला हुआ था।
अपने नेशनल हीरो की अगवानी के लिए क्रेमलिन के लाल चौक पर सरकारी अधिकारियों के साथ गैगेरिन का परिवार भी मौजूद था। लेकिन सबसे खास बात ये कि लाखों की भीड़ के साथ यूरी से मिलने राष्ट्रपति खुश्चेव खुद आए थे।
गैगेरिन की मशहूर मुस्कान की चमक पूरी दुनिया में फैल गई। क्यूबा, जापान, मैक्सिको, कनाडा, लीबिया और भी कई देशों में यूरी गैगेरिन जहां भी गए, उन्हें देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी। गैगेरिन की उपलब्धि इतनी बड़ी थी, कि सोवियत प्रतिद्वंदी अमेरिका भी यूरी गैगेरिन की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। यूरी गैगेरिन अब किसी एक देश के हीरो नहीं रहे, बल्कि वो पूरी मानव जाति के नायक बन गए। गैगेरिन की 108 मिनट की अंतरिक्षयात्रा ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया। गैगेरिन की उपलब्धि ने वैज्ञानकों और युवाओँ को इस कदर जोश और आत्मविश्वास से भर दिया कि महज आठ साल बाद ही मानव ने चंद्रमा पर अपने कदमों के निशान बना दिए। इंसानियत के इस हीरो के सम्मान में नील आर्मस्ट्रांग यूरी गैगेरिन का एक मैडल अपने साथ ले गए थे, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए चंद्रमा पर रख दिया। दुनिया के इस पहले अंतरिक्षयात्री ने पृथ्वी की पहली परिक्रमा के दौरान जिन खतरों का सामना किया, दुनिया ने उनसे सबक लिया और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ अंतरिक्षयात्रियों की नई पीढ़ी तैयार हुई।