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रविवार, 24 जुलाई 2011

धरती से दूर मिला पानी का अथाह भंडार


अगर आपको लगता है कि पृथ्वी के विशाल महासागर इस ब्रह्मांड के विशालतम 'जल भंडार' हैं तो आप गलत हैं। खगोल विज्ञानियों ने ब्रह्मांड के सबसे विशाल जल भंडार का पता लगाया है, जो भाप के बादलों के रूप में है और इन बादलों में मौजूद पानी का भंडार पृथ्वी पर मौजूद जल से 140 अरब गुना ज्यादा है और इसका घनत्व हमारे सूर्य से एक लाख गुना ज्यादा है।
पानी का ये अथाह भंडार मिला है आकाश गंगा के सबसे चमकीले और सबसे सक्रिय केंद्र, क्वासर में...और इसकी खोज की है कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के वैज्ञानिकों ने। क्वासर आकाशगंगा के केंद्र में पाए जाने वाले सबसे चमकीले पिंड होते हैं।
वैज्ञानिकों ने एक विशेष क्वासर APM 08279+5255 के अध्ययन से यहां मौजूद पानी के इस विशालतम भंडार का पता लगाया है। ये क्वासर हमारे सूरज जैसे एक हजार खरब सूरज के बराबर ऊर्जा पैदा करता है। क्वासर की पृथ्वी से दूरी 12 अरब प्रकाश वर्ष है यानी इससे फूट रही रोशनी 12 अरब साल बाद अब पृथ्वी पर पहुंची है। जल भंडार खोजने वाले दल के प्रमुख मैट ब्रैडफोर्ड ने कहा कि इस क्वासर के चारों ओर का वातावरण काफी अदभुत है। ये एक प्रयोगशाला जैसा है जहां ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को मिलाकर पानी को बनाने का काम जारी है...लेकिन गर्मी इतनी ज्यादा है कि यहां बनने वाला पानी भाप के बादलों के रूप में इकट्ठा हो रहा है। क्वासर में मौजूद भारी मात्रा में पानी साबित करता है कि पानी केवल हमारी धरती में ही नहीं बल्कि पूरे ब्रह्मांड में मौजूद है। ब्रैडफोर्ड ने कहा कि इस शोध के नतीजों को 'एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स' के अगले अंक में छापा जाएगा। ब्रैडफोर्ड ने कहा कि आकाशगंगा में जलवाष्प मौजूद हैं, लेकिन इनकी मात्रा क्वासार से चार हजार गुना कम है। आकाशगंगा में जल ज्यादातर बर्फ के रूप में है।

शनिवार, 23 जुलाई 2011

मानव अंतरिक्ष अभियान, नई मंजिलों की तलाश में


नासा के स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद मानव अंतरिक्ष अभियान अब नई मंजिलों की तलाश में है । दिसंबर 1972 का अपोलो-17 वो आखिरी मिशन था जो  अंतरिक्षयात्रियों को अंतिम बार चंद्रमा पर ले गया था । इसके बाद अपोलो-18, 19 और 20 मिशन रद्द कर दिए गए क्योंकि स्काईलैब को अंतरिक्ष भेजना था। अपोलो मिशन के बाद स्काईलैब के साथ पृथ्वी की कक्षा में मानव का दखल शुरू हुआ । लेकिन पृथ्वी की कक्षा में मानव की स्थाई मौजूदगी के युगों पुराने सपने को साकार कर दिखाया स्पेस शटल  अभियानों ने । स्पेस शटल यानि अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष ले जाने वाला ऐसा अनोखा स्पेस ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम (एसटीएस) स्पेसक्राफ्ट जिसे रॉकेट की तरह लांच किया जाता था और जो एयरक्राफ्ट की तरह लैंड करता था । अंतरिक्ष के सफर के लिए ऐसा शानदार और बार-बार इस्तेमाल किए जा सकने वाला वाहन अब तक दुनिया में कोई दूसरा नहीं है।

21 जुलाई 2011 को भारतीय समय के अनुसार दोपहर 3 बजकर 21 मिनट पर अंतिम स्पेस शटल अटलांटिस की फाइनल लैंडिंग के साथ ही मानव अंतरिक्ष अभियानों का एक गौरवशाली अध्याय पूरा हो गया। स्पेस शटल ने मानव जाति को धरती से बाहर अंतरिक्ष में एक नए घर की सौगात दी है और वो है इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन । मानव सभ्यता के पूरे इतिहास में ये सबसे बड़ी युगांतरकारी घटना है। 15 अलग-अलग देशों और दुनिया की 5 बड़ी स्पेस एजेंसियों की भागीदारी से स्पेस स्टेशन का सपना साकार हुआ है और इसी के साथ हमने सबके साथ मिल-जुलकर रहने और अंतरिक्ष में  मानवता के विकास के लिए काम करने की नई तमीज सीखी है, आने वाले वक्त में यही बात मानव जाति का भविष्य तय करेगी और ये सब कुछ संभव हो सका है पिछले 30 साल के दौरान हुए नासा के स्पेस शटल की एक के बाद एक उड़ानों से । एक भारतीय होने के नाते ये बात मुझे विचलित करती है कि मौका मिलने के बावजूद हम इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के सदस्य देशों में शामिल नहीं हो सके। माधवन नायर जब इसरो के प्रमुख थे तब स्पेस स्टेशन के अभियान में भारत के भी शामिल होने की बात चल रही थी। सब कुछ ठीक था और भारत को स्पेस स्टेशन में भागीदारी करने वाले 16 वें और अकेले एशियाई देश होने का गौरव मिलने ही वाला था कि तभी अज्ञात कारणों से हम ये सम्मान नहीं पा सके।
स्पेस शटल के साथ इस पूरे मिशन से जुड़ी कई परंपराएं भी अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गईं। स्पेस शटल मिशन पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों को स्पेससूट पहनाने से लेकर शटल के कॉकपिट में उन्हें सीट पर बिठाने और उनकी बेल्ट कसने तक का सारा काम वो साथी अंतरिक्षयात्री करते थे, जिन्हें या तो अगले मिशन में लांच होना होता था, या फिर जिनका चयन बैकअप क्रू के तौर पर किया गया होता था । स्पेस शटल मिशन के सातों अंतरिक्षयात्री जब स्पेससूट पहनकर स्पेस शटल की ओर चलते थे, तो कमांडर सबसे आगे चलता था और वो रास्ते में पड़ने वाली अंतिम चौखट को जरूर छूता था । सौभाग्य की कामना वाली ये परंपरा कैसे शुरू हुई ये बताना मुश्किल है, लेकिन कमांडर के बाद पीछे आ रहे सभी अंतरिक्षयात्री भी अपने हाथ ऊपर उठाकर उस अंतिम चौखट को जरूर छूते थे । अंतरिक्षयात्रियों को स्पेस शटल तक ले जाने के लिए हर बार जो खास बस आती थी उसका रंग हमेशा रजत यानि सिल्वर होता था ।  स्पेस शटल मिशन को सफलता से संचालित कतरने और अंतरिक्षयात्रियों को सुरक्षित वापस ले आने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती थी फ्लाइट डायरेक्टर  की जो अपनी टीम के साथ नासा के ह्युस्टन कंट्रोल रूम से मिशन की कमान संभालते थे । परंपरा ये थी कि स्पेस शटल की लांचिग से ठीक पहले फ्लाइट डायरेक्टर मिशन के बैच वाली एक खास जैकेट पहनते थे, और ये जैकेट तभी उतारी जाती थी जब अंतरिक्षयात्री सकुशल वापस आ जाते थे । इसके अलावा स्पेस शटल भी तब तक लांच नहीं किया जाता था, जब तक कि ह्युस्टन कंट्रोल रूम से फ्लाइट डायरेक्टर शटल कमांडर से हल्का-फुल्का मजाक कर के उन्हें सुरक्षित सफर की शुभकामनाएं नहीं दे देता था। इन सबके अलावा सबसे शानदार परंपरा थी पृथ्वी की कक्षा में मौजूद अंतरिक्षयात्रियों के लिए रोज सुबह बजाई जाने वाली वेक-अप कॉल । स्पेस शटल मिशन के दौरान ह्युस्टन मिशन कंट्रोल रूम रोज सुबह वेक-अप कॉल  यानि अंतरिक्षयात्रियों की पसंद के खास गीत स्पेस शटल में बजाता था । वेक-अप कॉल के साथ ही स्पेस शटल में एक नए दिन की शुरुआत होती थी । अंतरिक्षयात्रियों के लिए बजाए जाने वाले ये वेक-अप कॉल्स सार्वभौम मानव संस्कृति , कला और विज्ञान के अनूठे संगम का सबसे अदभुत उदाहरण हैं।  जब कल्पना चावला अंतरिक्ष में थीं तब कंट्रोल रूम ने उनकी पसंद के वेक-अप कॉल्स में रविशंकर का संगीत और आबिदा परवीन की गजल बजाई थी। ये परंपराएं अब हमेशा याद आएंगी।
नासा के बेड़े में 6 स्पेस शटल थे, जिनमें से एक इंटरप्राइज केवल परीक्षण के लिए बनाया गया था, और पांच दूसरे स्पेस शटल  कोलंबिया, चैलेंजर, डिस्कवरी, अटलांटिस और एंडेवर का इस्तेमाल अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने के लिए किया गया ।  12 जुलाई 1981 को कोलंबिया की टेस्ट फ्लाइट के साथ स्पेस शटलों की उड़ानें शुरू हुई थीं । 1981 में जॉन यंग और रॉबर्ट क्रिपेन शटल कोलंबिया पर सवार हो कर अंतरिक्ष में गए थे । 2 दिन छह घंटे के मिशन में पृथ्वी के 36 चक्कर लगाए गए । तब से अब तक स्पेस शटल 80 करोड़ किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं और इनमें सवार हो कर 350 लोग अंतरिक्ष की सैर कर चुके हैं ।  लेकिन स्पेस शटल उड़ानों को दो बड़ी दुर्घटनाओं के लिए भी याद रखा जाएगा। पहली स्पेस शटल दुर्घटना  28 जनवरी 1986 को हुई,  जिसमें कई स्कूली बच्चे अपनी टीचर क्रिस्टी मैकऑलिफ और छह दूसरे अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में जाते देखने के लिए कैनेडी स्पेस सेंटर में जमा हुए थे । चैलेंजर शटल उड़ान भरने के 73 सेकेंड बाद ही हादसे का शिकार हो गया और सारे यात्री मारे गए । इसके करीब दो दशक बाद 1 फरवरी 2003 को दूसरी बड़ी स्पेस शटल दुर्घटना सामने आई जब स्पेस शटल कोलंबिया पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते हुए हादसे का शिकार हो गया । इसी हादसे में भारत में जन्मी नासा की महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला भी मारी गईं।
इन हादसों ने शटल उड़ानों पर फिर से विचार करने के लिए वैज्ञानिकों को मजबूर किया और तब तय किया गया कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का निर्माण पूरा होते ही नासा अपने बेड़े के तीनों स्पेस शटल्स को रिटायर कर देगा। स्पेस स्टेशन का निर्माण पूरा हो चुका है और अटलांटिस की फाइनल लैंडिंग के साथ नासा ने अपने स्पेस शटल्स भी रिटायर कर दिए हैं।
नासा के स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद अब निजी कंपनियां ऐसे स्पेसक्राफ्ट्स को बनाने में जुटी हैं जो पृथ्वी के आस पास के ग्रहों और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक का सफर तय कर सकेंगे। जब तक ये स्पेसक्राफ्ट  तैयार नहीं हो जाते अमेरिकी वैज्ञानिकों को अपने मानव मिशन के लिए रूस के सोयूज अंतरिक्ष यान पर निर्भर रहना होगा ।
स्पेस शटल के युग की समाप्ति के बाद नासा करोड़ों डॉलर की बचत करने में कामयाब हो जाएगा, लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू भी है। फ्लोरिडा स्थित नासा के स्पेस सेंटर में काम करने वाले हजारों कामगार, इंजीनियर, वैज्ञानिक और अंतरिक्षयात्री बेरोजगार हो जाएंगे। नासा का कहना है कि आगे जब भी कभी अंतरिक्ष यात्रा की जरूरत पड़ेगी, तब इसमें रूसी, यूरोपियन और जापानी रॉकेट के साथ-साथ निजी कंपनियों की मदद ली जाएगी। जाहिर है अब भविष्य में नासा  अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों के विस्तार के लिए इन्हीं देशों की  यानों पर निर्भर हो जाएगा। पिछले कुछ वर्षो से नासा ने धीरे-धीरे स्पेस शटल कार्यक्रमों में लगे 17 हजार कर्मचारियों में कमी करता रहा है। अब इसमें मात्र सात हजार कर्मचारी हैं, लेकिन नासा के स्पेस युग की समाप्ति के बाद ये सात हजार लोग भी बेरोजगार हो जाएंगे। मंदी से जूझ रहे अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है।

भारत का स्पेस शटल कार्यक्रम

चंद्रयान के बाद से ही इसरो मानव अंतरिक्ष अभियान की तैयारियों में जुटा है। नासा के स्पेस शटल की तर्ज पर इसरो भी ऐसे स्पेसक्राफ्ट को विकसित कर रहा है, जिसे अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने और उन्हें सुरक्षित वापस लाने के लिए बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। नासा स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद अब अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ी निजी कंपनियां अपनी तकनीकी महारत के लिए बेसब्री से नया बाजार तलाश रही हैं। ऐसे में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में इन कंपनियों को खासी संभावनाएं नजर आ रही हैं। इसलिए अमेरिकी कंपनियां मानव अंतरिक्ष मिशन और भारतीय स्पेस शटल विकसित करने की योजनाओं पर काम कर रहे इसरो को लुभाने में लगी है।
इस कड़ी में बीते दिनों बोइंग डिफेंस, स्पेस एंड सिक्यूरिटी ने इसरो को लांच एस्केप सिस्टम देने की पेशकश की है जिसके सहारे आपात स्थितियों में अंतरिक्ष यान का चालक दल सुरक्षित वापस लौट सकता है। भारत के साथ तकनीकी सहयोग की संभावनाएं तलाशने के लिए कुछ दिन पहले बोइंग के अधिकारियों ने इसरो अध्यक्ष के.राधाकृष्णन से मुलाकात की है। इसरो पांच साल के भीतर अंतरिक्ष में मानव अभियान भेजने की तैयारी कर रहा है। इसरो कार्यक्रम के मुताबिक करीब 300 किमी ऊपर धरती के निचले परिक्रमा पथ में दो या तीन चालक दल वाला अभियान 2015-16 के बीच भेजा जाना है। 

बुधवार, 25 मई 2011

लोग प्रलय, बर्बादी और नरसंहार की बातों में मजा क्यों लेते हैं?


अकसर ये कहा जाता है कि कल की चिंता छोड़ो आज में जियो, ये फलसफा इतना बुरा भी नहीं, साहिर लुधियानवी ने भी खूब कहा है कि आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू, जो भी है बस यही इक पल है...दुनिया में सनसनी थी कि 21 मई को कुछ बुरा घटने वाला है, लोगों से बातचीत के दौरान भी मुझसे कई सवाल पूछे गए कि 21 मी को क्या प्रलय आने वाली है? खास बात ये कि पूछने वालों ने ये सवाल गंभीर मुखमुद्रा के साथ नहीं, बल्कि मुस्कराते हुए पूछा था। दरअसल वो डरे हुए नहीं थे, बल्कि इस सवाल और इस संबंध में होने वाली बातचीत में छिपे रोमांच की कल्पना उनका मनोरंजन कर रही थी। तो क्या लोग प्रलय, धरती का खात्मा, बर्बादी और नरसंहार जैसी चीजों में मजा लेते हैं? 
अमेरिकी क्रिश्चियन रेडियो ब्राडकॉस्टर हैरॉल्ड कैंपिंग ने मई के मध्य में दावा किया कि 21 मई ही वो दिन है जिसे बाईबिल में जजमेंट डे यानि फैसले का दिन कहा गया है। उन्होंने दावा किया कि 21 मई को ईसा मसीह स्वर्ग से धरती आएंगे और प्रलय के साथ लोगों को उनके पापों का दंड देंगे। कैंपिंग का दावा था कि उन्होंने बाईबिल में दर्ज घटनाओं की तारीखों की गहन छानबीन के बाद पता लगाया है कि 21 मई 2011 ही जजमेंट डे है, जब प्रलय के साथ दुष्टों का दमन होगा और ईसाई धरती से ऊपर उठकर आसमान में ईसा मसीह से मुलाकात करेंगे।   
भारत में इस खबर पर शुरुआत में कोई सुगबुगाहट नहीं हुई, लेकिन जैसे-जैसे 21 मई करीब आने लगी लोग इसपर बातें करने लगे। देश के कई शहरों में ईसाइयों ने बकायदा बोर्ड लगाकर इसका प्रचार किया। ये शायद पहली बार हुआ जब दुनिया के खात्मे का बकायदा विज्ञापन किया गया। 19 मई से समाचार चैनल भी इस मुद्दे पर कूद पड़े, और 20 मई की शाम को आज तक भी लोगों को डराने लगा कि कल दुनिया खत्म होने वाली है। 21 मई की सुबह से दोपहर तक ये खबर कई समाचार चैनलों की हेडलाइन में भी थी, लेकिन दोपहर बीतते-बीतते खबर उतर गई। रात 12 बजे के बाद तारीख भी बदल गई और सबकुछ पहले की तरह सही-सलामत रहा। न तो ईसा मसीह आसमान से धरती पर उतरे और न ही किसी ईसाई के आसमान तक उठ जाने की खबर आई।
अगर आप नास्तिक हैं तो कैंपिंग के दावे शुरू से ही आपको एक मजाक लगेंगे, लेकिन अगर आप आस्थावान हैं और ईसाई हैं, तो परेशान होना लाजिमी है। वॉशिंगटन के थिंक-टैंक और स्वतंत्र सर्वे एजेंसी प्यू रिसर्च सेंटर ने कैंपिंग के दावे के बाद अमेरिका में एक सर्वे किया, जिससे पता चला कि अमेरिका में 41 फीसदी लोग यकीन करते हैं कि 2050 से पहले ईसा मसीह धरती पर जरूर लौटेंगे। न्यूयार्क की एक न्यूज वेब साइट के मुताबिक अमेरिकी क्रिश्चियन रेडियो ब्राडकॉस्टर हैरॉल्ड कैंपिंग की 21 मई को प्रलय की भविष्यवाणी के बाद उनके कई समर्थकों ने अपनी तमाम जमीन-जायदाद बेच डाली और नौकरी-कारोबार सब छोड़-छाड़ कर फैसले के दिन यानि 21 मई का स्वागत करने के लिए प्रार्थनाओं में डूब गए।  
आखिर लोग प्रलय यानि दुनिया के खात्मे को लेकर इतने उत्साहित क्यों हैं? ऐसी भविष्यवाणियों में लोगों की गहरी दिलचस्पी का राज क्या है, जिनमें मानव जाति के खात्मे की बातें बढ़ा-चढ़ा कर की जाती हैं? आलोचकों का कहना है कि स्वार्थी तत्व पैसे कमाने के लिए और लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए ऐसी भविष्यवाणियां करते हैं। यकीनन 21 मई को प्रलय की भविष्यवाणी करके बुजुर्ग हैरॉल्ड कैंपिंग और उनके रेडियो स्टेशन को वाकई फायदा हुआ है और वो मशहूर हो गए हैं। लेकिन कनाडा, मॉन्ट्रियल में मौजूद कॉनकॉर्डिया यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर आफ रिलिजन लॉरेन्जो डिटोमासो कहते हैं,'ये लोग अपनी आस्था से छले जाते हैं, वरना ये चीज काम नहीं करती।'
दूसरा सिद्धांत ये है कि प्रलय और दुनिया के खात्मे की भविष्यवाणी हमारी उस तीव्र उत्कंठा की पूर्ति करती है जो अज्ञात को जानने-समझने से संसंधित है। प्रो.डिटोमासो के मुताबिक हमारे आसपास की दुनिया को समझाने का एक ये भी तरीका है जो हममें एक उम्मीद, एक आशा भी पैदा करता है। वो कहते हैं,'अपनी सीमाओं के भीतर प्रलय की अवधारणा काफी तार्किक है। समय, स्पेस और मानव अस्तित्व के संबंध को समझाने का ये एक पौराणिक तरीका है। ये कोई साइंस नहीं है और न ही ये कोई सार्वभौम नियम है जो एक खास अंतराल में खुद को बार-बार दोहराए। लेकिन फिर भी ये कई चीजों की व्याख्या करता है।'
प्रो.डिटोमासो ये भी बताते हैं कि प्रलय की अवधारणा में दिलचस्पी लेने वाले लोगों में दुनिया को जानने-समझने की इच्छा दूसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है। ऐसे लोगों में जिंदगी को समझने की जिज्ञासा कहीं ज्यादा होती है। अपनी बात के समर्थन में प्रो. डिटोमासो इसाक न्यूटन का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने जिंदगी का ज्यादा हिस्सा बाईबिल में लिखी बातों और भविष्यवाणियों को समझने में बिताया। अमेरिकी क्रिश्चियन रेडियो ब्राडकॉस्टर हैरॉल्ड कैंपिंग ने इससे पहले 1994 में दुनिया के खात्मे और जजमेंट डे की भविष्यवाणी की थी, जो गलत साबित हुई। इसपर कैंपिंग ने तब कहा था कि उनसे कुछ गणितीय भूलें हो गई हैं। इसबार 21 मई के शांति से गुजर जाने के बाद कैंपिंग हैरान हैं कि आखिर दुनिया बच कैसे गई?, मानव जाति का विनाश क्यों नहीं हुआ? और ईसा मसीह स्वर्ग से धरती पर क्यों नहीं आए? अब उन्होंने पापियों के नाश और जजमेंट-डे की नई तारीख बताई है 21 अक्टूबर 2011 और उनका कहना है कि इस बार तो प्रलय आ के रहेगी।
आपको जानकर हैरानी होगी कि हैरॉल्ड कैंपिंग के अनुयायी और उनकी भविष्यवाणी पर यकीन रखने वाले उनसे नाराज नहीं हैं, बल्कि 21 मई को प्रलय न आने पर चैन की सांस के साथ कैंपिंग की भविष्यवाणियों पर उनकी आस्था और भी गहरा गई है। ये अपनेआप में वाकई आश्चर्यजनक है, लेकिन मनोवैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इस तरह की भविष्यवाणियों के गलत साबित हो जाने के बाद लोगों का यकीन अपने भविष्यवक्ता या गुरु पर और भी मजबूत हो जाता है। मानव मनोविज्ञान की ये आधारभूत गड़बड़ी है जिसे कॉग्निटिव डिसोनेंस कहते हैं।
बहरहाल हैरॉल्ड कैंपिंग के अनुयायी अब 21 अक्टूबर को आने वाली प्रलय की तैयारियों में जुट गए हैं। हमें और आपको इसकी परवाह करने की जरूरत नहीं। हमारे लिए तो साहिर पहले ही कह गए हैं - आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू, जो भी है बस यही इक पल है।
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शनिवार, 14 मई 2011

हम ‘रेडिएशन’ की दुनिया में रह रहे हैं!


धरती पर अपने अस्तित्व की शुरुआत से ही मानव जाति रेडिएशन को सह रही है। प्रकृति में यूरियम और थोरियम जैसे कुछ खास तत्व ऐसे हैं जिनसे घातक ऊर्जा की अदृश्य किरणें फूटती रहती हैं। ऐसे तत्वों को रेडियोएक्टिव कहते हैं और इनसे फूटने वाली ऊर्जा की किरणों को रेडिएशन। रेडिएशन केवल एटॉमिक पावर स्टेशंस या फिर केवल संशोधित रेडियोएक्टिव पदार्थों से ही नहीं फूटता, बल्कि ये प्राकृतिक रूप से भी फूटता रहता है। पृथ्वी के जन्म के समय से ही यूरेनियम और थोरियम जैसी रेडियोएक्टिव धातुओं के अणु धरती की ऊपरी पर्त में मौजूद हैं। इन धातुओं के क्षरण से एक रेडियोएक्टिव, रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैसें पैदा होती हैं, जिसका नाम है रेडॉन और थोरॉन । ये रेडियोएक्टिव गैसें धरती की ऊपरी पर्त से लगातार उत्सर्जित होती रहती हैं और वातावरण के संपर्क में आते ही इसका क्षरण रेडियोएक्टिव परमाणुओं यानि आइसोटोप्स में हो जाता है, जिसकी हाफ लाइफ 3 से 4 दिन की होती है। इस तरह रेडॉन गैस धूल कणों और संपर्क में आने वाली हवा तक को रेडिएशन से भर देती है। प्राकृतिक रेडिएशन का दूसरा सबसे बड़ा जरिया है कॉस्मिक किरणें, जो गहन अंतरिक्ष से गुजरती हुई हमारी पृथ्वी के वायुमंडल की ऊपरी पर्त से टकराती हैं और रेडियोएक्टिव परमाणुओं को जन्म देती हैं। लेकिन टेक्नोलॉजी के विकास ने मानव जनित रेडिएशन को जन्म दे दिया हैं, जैसे कि एक्स-रे, कंप्यूटर मॉनिटर, टेलीविजन, परमाणु ऊर्जा संयंत्र के हादसे, परमाणु हथियारों का परीक्षण, रेडियोएक्टिव परमाणु कचरे की कब्रगाह और दूसरे औद्योगिक, चिकित्सीय, कृषि क्षेत्रों में रेडियोआइसोटोप्स का इस्तेमाल।
इनके अलावा सेल फोन्स और इनके टॉवर्स, कॉर्डलेस फोन्स, सेटेलाइट डिजिटल टीवी, राडार, वायरलेस इंटरनेट और स्कूलों-दफ्तरों में वायरलेस लैन्स के बढ़ते इस्तेमाल से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन, खासतौर पर माइक्रोवेव्स रेडिएशन हमारी सेहत के लिए खतरा बनकर सामने आया है। 
एक्स-रे रेडिएशन 
रेडिएशन का सबसे जाना-पहचाना जरिया है एक्स-रे। एक्स-रे कुछ और नहीं बल्कि सूरज की रोशनी की तरह ऊर्जा की किरणें हैं जो तरंग के रूप में होती हैं। सूरज की रोशनी और एक्स-रे में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है। सूरज की रोशनी में इतनी ऊर्जा नहीं होती कि वो हमारे शरीर से आर-पार गुजर सके, जबकि एक्स-रे ऊर्जा यानि रेडिएशन से इस कदर भरी होती है कि आसानी से हमारे शरीर के आर-पार गुजर जाती है। लेकिन ये काफी नुकसानदेह भी होती है, क्योंकि अगर इनकी ऊर्जा को कम न किया जाए तो एक्स-रे का एक प्रहार भी जानलेवा साबित हो सकता है। इस खतरे की वजह से दुनियाभर के चिकित्सा क्षेत्र में अब एक्स-रे का इस्तेमाल बंद करने पर जोर दिया जा रहा है।
आपके आस-पास के अस्पतालों में लगी मशीन से एक्स-रे करवाने पर आपका शरीर 0.2 मिलीसीवर्ट से लेकर  0.1 मिलीसीवर्ट तक रेडिएशन की मार झेलता है। रेडिएशन की ये मात्रा इतनी है जितना कि आप एक महीने में प्राकृतिक रेडिएशन को झेलते हैं। सबसे खतरनाक डेंटल एक्स-रे है। डेंटिस्ट क्लीनिक में जाकर एक बार डेंटल एक्स-रे करवाने पर आपके चेहरे को 2 से 3 मिलीसीवर्ट तक के रेडिएशन की गहरी मार झेलनी पड़ती है। हमारा शरीर जितने प्राकृतिक रेडिएशन को एक साल में बर्दाश्त करता है, उतना रेडिएशन डेंटल एक्स-रे मशीन एक बार में ही हमें दे देती है। एक अध्ययन के अनुसार दुनिया में सबसे ज्यादा एक्स-रे भारत में किया जाता है। इससे आप स्थिति की गंभीरता का अंदाजा खुद ही लगा सकते हैं। 
एक्स-रे मशीन के रेडिएशन से बचने का रास्ता भी काफी आसान है, अपना एक्स-रे करवाते वक्त देख लें कि मशीन जिस कमरे में लगी है, वो छोटा या संकरा सा न हो। साथ ही ये भी देखें कि एक्स-रे मशीन पुरानी न हो। याद रखें, एक्स-रे कोई मजाक नहीं है, इसलिए एक्स-रे तभी कराएं जब कोई दूसरा रास्ता न हो। क्योंकि बार-बार का एक्स-रे कैंसर को भी जन्म दे सकता है। 
मेट्रो के मुसाफिर सावधान रहें 
एक्स-रे मशीन के रेडिएशन से हमारा सामना हर रोज राजधानी दिल्ली के तमाम मेट्रो स्टेशंस पर होता है। मेटल डिटेक्टर से चेकिंग कराने के बाद आप अपना सामान चेकिंग के लिए जिस मशीन में डालते हैं वो एक्स-रे मशीन ही होती है। सामान चेक करने वाली ये एक्स-रे मशीन रेलवे स्टेशंस और हवाई अड्डों पर भी लगी हुई हैं। हालांकि इन मशीनों का एक्स-रे रेडिएशन अस्पताल की मशीनों के मुकाबले काफी कम होता है, फिरभी ये एक्स-रे इतनी नुकसानदेह जरूर होती है कि वो बैग में रखे आपके खाने, फल और पानी को रेडिएशन से भर दे। इसलिए एक्स-रे मशीन में चेकिंग के लिए अपने सामान को डालने से पहले खाने-पीने का सारा सामान बाहर निकालना न भूलें। अगर आपने खाने-पीने का सामान नहीं निकाला है तो चेकिंग मशीन से गुजरने के बाद उसका इस्तेमाल न करें।
अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डों पर फुलबॉडी एक्स-रे स्कैनर मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। रेडिएशन के मामले में ये मशीनें सुरक्षित नहीं हैं। अमेरिका की ट्रांसपोर्टेशन सिक्योरिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने 38 एयरपोर्ट्स में लगी 247 फुलबॉडी एक्स-रे स्कैनर मशीनों का परीक्षण किया तो पता चला कि इन मशीनों से तय मानक से 10 गुना ज्यादा रेडिएशन उत्सर्जित हो रहा है।
 कंप्यूटर, लैपटॉप और टेलीविजन से रेडिएशन
 अगर आप पिक्चर ट्यूब वाले पुराने मॉडल के टेलीविजन और टेलीविजन जैसे भारी-भरकम कंप्यूटर मॉनिटर्स का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो इनसे निकलने वाले इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन से अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा का इंतजाम तुरंत करें। पुरानी एक्स-रे मशीनों और इन टीवी सेट्स और टेलीविजन जैसे कंप्यूटर मॉनिटर्स में एक समानता है, इन सबमें इलेक्ट्रॉन गन कैथोड-रे-ट्यूब का इस्तेमाल किया जाता है। टेलीविजन और कंप्यूटर मॉनिटर की पिक्चर ट्यूब में इसी कैथोड-रे-ट्यूब का प्रयोग किया जाता है, जिससे रेडिएशन भी निकलता है। पुराने टीवी और कंप्यूटर मॉनिटर्स में सामने से उतना रेडिएशन नहीं निकलता जितना इनके पीछे और अगल-बगल से। हालांकि इनसे निकलने वाला रेडिएशन काफी कम मात्रा का होता है, लेकिन अगर आप कई घंटे तक इनका इस्तेमाल करते रहें तो ये रेडिएशन सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है। अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट के मुताबिक असुरक्षित दूरी से पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन को एक घंटे तक देखने वाला दर्शक 0.5 मिली रॉंटजन तक रेडिएशन सहता है। इसलिए पहली सलाह तो ये कि पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन के रेडिएशन से बचने के लिए कम से कम 3 फुट की दूरी से टीवी देखना चाहिए। दूसरी सलाह ये कि संभव हो तो पिक्चर ट्यूब वाले टेलीविजन को बदलकर एलसीडी टीवी ले आइए।
कंप्यूटर से रेडिएशन का असली खतरा उसके टेलीविजन जैसे मॉनीटर से है। अगर आप पुराने मॉनिटर का इस्तेमाल कर रहे हों तो उसे अपने से कम से कम 3 फुट की दूरी पर रखें। अब नए टीएफटी मॉनिटर्स आ गए हैं, ये अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं। टीएफटी के एलसीडी मॉनिटर्स भी रेडिएशन उत्सर्जित करते हैं, लेकिन इनकी मात्रा बेहद कम होती है और इसका असर बस एक फुट यानि 30 सेंटीमीटर के दायरे तक ही रहता है, इसलिए आपके कंप्यूटर में यदि टीएफटी मॉनिटर लगा हो तो उसे खुद से कम से कम एक फुट दूर रखिए।
अब बात करते हैं लैपटॉप की, रेडिएशन के मामले में लैपटॉप भी सुरक्षित नहीं है। अगर आप इसे अपनी गोद में रखकर और स्क्रीन के बेहद करीब से इसका इस्तेमाल करते हैं, तो ये बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है। क्योंकि आपका लैपटॉप एक फुट के दायरे में 1 मिलीगौस तक का रेडिएशन छोड़ता है, लेकिन जब आप चैटिंग करने या वीडियो कॉल करने के लिए इसकी स्क्रीन के बेहद करीब होते हैं, तब आपका शरीर लैपटॉप से 20 मिलीगौस तक का रेडिएशन झेल रहा होता है। लैपटॉप को गोद पर रखकर इस्तेमाल करने की सलाह बिल्कुल नहीं दी जाती, क्योंकि इस स्थिति में लैपटॉप से फूटने वाले रेडिएशन का सीधा असर आपके जननांगों पर होता है। फुट
 वायरलेस इंटरनेट और सीपीयू
 घर और दफ्तर में वायरलेस इंटरनेट का इस्तेमाल एक आम बात है...लेकिन इसके लिए जिस वाई-फाई या वायरलेस सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, उससे भी रेडिएशन फूटता है। कंप्यूटर्स को लगातार पावर सप्लाई करने के लिए जिस यूपीएस का इस्तेमाल हर घर और दफ्तर में होता है, उससे भी घातक रेडिएशन फूटता पाया गया है। छोटा सा सीपीयू रेडिएशन छोड़ने के मामले में टेलीविजन, कंप्यूटर मॉनिटर्स और लैपटॉप सबको पीछे छोड़ देता है। एक सामान्य सीपीयू से एक फुट के दायरे में 20 मिलीगौस तक घातक रेडिएशन निकल सकता है, जबकि एक मीटर दूर जाने पर सीपीयू के रेडिएशन की मात्रा घटकर 1 मिलीगौस तक रह जाती है। इसलिए सलाह ये दी जाती है कि कंप्यूटर की अपनी सीट से सीपीयू को कम से कम डेढ़ मीटर दूर रखें। इंटरनेट का इस्तेमाल सीधे केबल से करें, वायरलेस इंटरनेट का इस्तेमाल कम से कम करें। कंप्यूटर तभी ऑन करें जब जरूरत हो, कंप्यूटर के साथ मॉनिटर को बिना किसी काम के घंटों ऑन रखना सेहत के लिए सुरक्षित नहीं है। मूड अगर कंप्यूटर पर गाने सुनने का है तो मॉनीटर ऑफ करके गाने सुनिए।
इतना ही नहीं प्रिटर, फोटोकॉपियर और फैक्स मशीन से भी हल्का रेडिएशन निकलता है, इसलिए इन मशीनों से कम से कम 3 फुट की दूरी बना कर काम करें।
 मोबाइल रेडिएशन
 केंद्र सरकार की अंतर-मंत्रिपरिषद समिति ने देश में सेलफोन और उनके टॉवर से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्निक रेडिएशन की वजह से मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले विपरीत प्रभावों का अध्ययन किया है। समिति ने इस बात की सिफारिश की है कि रेडिएशन संबंधी मौजूदा मानकों में तुरंत बदलाव किया जाना बेहद जरूरी है। समिति की रिपोर्ट के अनुसार सेल फोन मानव स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हैं, क्योंकि ये आरएफ यानि रेडियो फ्रीक्वेंसी का रेडिएशन उत्सर्जित करते हैं।
सेल फोन और इनके टॉवर्स का इस्तेमाल सुरक्षित बनाने के लिए समिति ने कई सिफारिशें की हैं, इनमें से मुख्य सिफारिशें हैं कि घनी आबादी वाले इलाकों में सेलफोन टॉवर्स पर सख्त पाबंदी लगाई जाए, इन सेलफोन टॉवर्स से रेडियो फ्रीक्वेंसी के जिस स्तर के प्रसारण की अनुमति दी गई है, उस स्तर को कम से कम दसवें हिस्से तक घटाया जाए, स्पेसेफिक एब्जॉर्पशन रेट यानि एसएआर के जिस स्तर को मंजूरी दी गई है उसे और कम किया जाए और साथ ही एक मॉनीटरिंग नेटवर्क की स्थापना की जाए जो ये समय-समय पर जांच करके ये सुनिश्चित करे कि तमाम प्रावधानों का पालन किया जा रहा है। यहां ये जानना जरूरी है कि स्पेसेफिक एब्जॉर्पशन रेट यानि एसएआर मोबाइल फोन और इनके टॉवर्स से निकलने वाले माइक्रोवेव रेडिएशन को मापने की इकाई है और इससे हम ये पता लगाते हैं कि मोबाइल फोन का कितना रेडिएशन हमारे लिए नुकसानदेह नहीं है।
वर्तमान में देश में काम कर रही मोबाइल कंपनियां इंटरनेशनल कमीशन ऑन नॉन-आयनाइजिंग प्रोटेक्शन यानि आईसीएनआईआरपी के उत्सर्जन मानकों का पालन कर रही हैं, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी मंजूरी दे रखी है। लेकिन अंतर-मंत्रिपरिषद समिति ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि सेल फोन और इनके टॉवर्स से निकले वाले माइक्रोवेव रेडिएशन के संबंध में आईसीएनआईआरपी के उत्सर्जन मानक भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित नहीं हैं। यूरोप के मुकाबले भारत की जलवायु गर्म और उष्णकटिबंधीय है इसके अलावा यूरोप के लोगों की शारीरिक बनावट की अपेक्षा औसत भारतीय कम लंबाई वाला और दुबला-पतला होता है। ऐसे में मोबाइल टॉवर और सेल फोन से यूरोपियन मानक वाली रेडियो माइक्रोवेव रेडिएशन का देश में प्रसारण भारतीयों की सेहत के लिए एक बड़ा जोखिम है।
बहरहाल मंत्रिपरिषदीय समिति की इन सिफारिशों पर अमल होना बाकी है। वर्तमान में देश में मोबाइल टॉवर्स को लगाने पर कोई रोक-टोक नहीं है। नियंत्रण के नाम पर बस कुछ प्रदूषण संबंधी मानक हैं, मोबाइल ऑपरेटर्स कंपनियों को जिनका पालन करना होता है। सरकार की चिंता इस बात को लेकर ज्यादा है कि मोबाइल टॉवर को चलाने के लिए कंपनियां जो साथ में जनरेटर लगाती हैं, उससे धुआं कितना निकलता है। लेकिन इन टॉवर्स से कितने उच्च स्तर का कितना घातक माइक्रोवेव रेडिएशन निकल रहा है इसे लेकर कोई खास परेशानी नहीं है। कोई प्रभावी नियम और निगरानी व्यवस्था न होने से ही देश के हर छोटे-बड़े शहर के रिहायिशी इलाकों में मोबाइल टॉवर्स का जाल फैला नजर आता है। जानकारी के अभाव में भोले मकान मालिकों के लिए तो छत पर लगा मोबाइल टॉवर शान की बात भी है और आसान कमाई का जरिया भी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात पर चिंता भी जताई है कि हाल के कुछ वर्षों में सेलफोन और इनके टॉवर से उत्सर्जित होने वाले माइक्रोवेव रेडिएशन के स्तर में भारी बढ़ोतरी हुई है, ये गंभीर चिंता का विषय है। अपनी रिपोर्ट में समिति ने उन सभी लोगों को, जिन्होंने पेसमेकर जैसे मेडिकल इम्प्लांट्स लगवा रखे हैं, सुझाव दिया है कि उन्हें हर वक्त सेल फोन से कम से कम 30 सेंटीमीटर यानि एक फुट की दूरी बनाए रखनी चाहिए। 
हाल ही में दिल्ली में लगे मोबाइल टॉवर्स और सेल फोन से होने वाले माइक्रोवेव रेडिएशन का व्यापक सर्वे किया गया। सर्वे में पता चला कि 2006 में राजधानी में केवल 1800 मोबाइल टॉवर्स थे, जिनकी तादाद अब बढ़कर 6000 तक हो चुकी है। केवल मोबाइल टॉवर्स के बढ़ जाने भर से दिल्ली की हवा में मौजूद इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन के स्तर में हजार गुना तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। दिल्ली के लिए इलेक्ट्रो मैग्नेटिक रेडिएशन का सुरक्षित स्तर एक वर्ग मीटर क्षेत्र के लिए 600 मिलीवॉट का माना गया है। लेकिन जब सर्वे में शामिल वैज्ञानिकों ने इस सुरक्षित मानक वाले माइक्रोवेव रेडिएशन वाले इलाके की खोज में दिल्ली का दौरा किया तो पता चला कि ये सुरक्षित मानक वाला माइक्रोवेव रेडिएशन केवल दिल्ली के एक बटा पांचवें हिस्से में ही है। और आपको ये जानकर ज्यादा हैरानी नहीं होगी कि मोबाइल टॉवर और सेल फोन से निकलने वाले माइक्रोवेव रेडिएशन के सुरक्षित स्तर वाला ये इलाका दिल्ली का वीवीआईपी क्षेत्र है।
बैकग्राउंड रेडिएशन
एक्स-रे, टेलीविजन, कंप्यूटर मॉनिटर, ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और मोबाइल समेत सभी वायरलेस मशीनों से निकलने वाले इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन के बारे में हमने जानकारी ली। अब हम बात करते हैं उस प्राकृतिक रेडिएशन की जो हमारे चारों ओर मौजूद है। हम सभी रेडिएशन युक्त माहौल में रहते और काम करते हैं, लेकिन इससे घबराने की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि हमारे आसपास मौजूद प्राकृतिक रेडिएशन का स्तर इतना कम रहता है, कि हमें नुकसान नहीं पहुंचा सकता। 
भारतीय परमाणु ऊर्जा विभाग ने देश में प्राकृतिक रेडिएशन जिसे बैकग्राउंड रेडिएशन भी कहते हैं, की स्थित जानने के लिए देशव्यापी अध्ययन के बाद रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, प्राकृतिक रेडिएशन के मुख्य स्रोत हैं- कॉस्मिक किरणें, धरती की ऊपरी पर्त और इमारत निर्माण सामग्री में मौजूद यूरेनियम-थोरियम जैसे रेडियोएक्टिव परमाणुओं की मौजूदगी, खान-पान के साथ इनका हमारे शरीर में जाना और रेडॉन-थोरॉन जैसी रेडियोएक्टिव गैसों का हमारी सांस के साथ फेफड़ों में प्रवेश। कुछ प्राकृतिक रेडिएशन ऐसे हैं जिनका स्तर पूरी दुनिया में एकसमान रहता है, जबकि कुछ प्राकृतिक रेडिएशन ऐसे हैं, जिनका स्तर अलग-अलग भौगोलिक स्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। दरअसल, वातावरण के संपर्क में आकर यूरेनियम रेडॉन गैस और थोरियम थोरॉन गैस बनाते हैं, ये दोनों गैसें रंगहीन, गंधहीन और रेडियोएक्टिव होती हैं। अगर किसी जगह धरती की पर्त में यूरेनियम और थोरियम की मौजूदगी ज्यादा है, तो वहां रेडॉन और थोरॉन गैस का जमाव भी ज्यादा होगा, इसका सीधा मतलब ये है कि उस जगह प्राकृतिक रेडिएशन का स्तर सामान्य से अधिक होगा।
प्राकृतिक रेडिएशन का एक और स्त्रोत कॉस्मिक किरणें हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में लगातार उच्च ऊर्जा वाली कॉस्मिक किरणों की बौछार अंतरिक्ष से होती रहती है। हालांकि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र ज्यादातर कॉस्मिक किरणों को रोक देता है, लेकिन फिरभी कॉस्मिक किरणों में मौजूद उच्च रेडिएशन से भरे कुछ  रेडियोएक्टिव कण आर-पार भी निकल जाते हैं। भारतीय परमाणु ऊर्जा विभाग की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में कॉस्मिक किरणों के सामान्य रेडिएशन का सालाना स्तर 0.26 से 2 माइक्रोसीवर्ट के बीच है। खास बात ये कि ऊंचाई वाले इलाकों जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में कॉस्मिक किरणों के रेडिएशन का स्तर मैदानी इलाकों की अपेक्षा ज्यादा पाया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार कश्मीर के गुलमर्ग में रहने वाले लोगों को कास्मिक किरणों से करीब 830 मिलीसीवर्ट तक का रेडिएशन हर साल झेलना पड़ता है। ये सामान्य से कहीं ज्यादा है। देश भर में प्राकृतिक रेडिएशन का स्तर जानने के लिए किए गए सर्वे के मुताबिक भारत में प्राकृतिक गामा-किरणों का कुल रेडिएशन औसतन 0.734 मिलीसीवर्ट सालाना पाया गया है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार देशभर में रेडॉन और थोरॉन जैसी रेडियोएक्टिव गैसों की वजह से होने वाले औसत रेडिएशन का स्तर 1.235 माइक्रोसीवर्ट सालाना है।
रेडॉन और थोरॉन जैसी रेडियोएक्टिव गैसों से होने वाला रेडिएशन खतरनाक स्तर तक भी बढ़ सकता है, क्योंकि ये गैसें जमीन से लगातार निकलती रहती हैं। खुले मैदान में तो हवा इन गैसों के रेडियोएक्टिव परमाणुओं को एक जगह जमने नहीं देती, लेकिन बंद कमरे या फिर तहखानों में इनका जमाव होता रहता है और इसी के साथ रेडिएशन का स्तर भी बढ़ता रहता है। एक अध्ययन के अनुसार रेडॉन गैस हर पत्थर से निकलती है, इसलिए संगमरमर की फर्श से लेकर किचन में लगे ग्रेनाइट तक सब रेडिएशन से भरी रेडॉन गैस को उत्सर्जित करते रहते हैं।
अब सवाल ये कि प्राकृतिक रेडिएशन से बचाव का तरीका क्या है? कॉस्मिक किरणों से होने वाले रेडिएशन से बचाव के लिए शरीर के अंगों को ज्यादा से ज्यादा ढंके रहें और ऊंचाई वाले इलाकों जैसे पहाड़ी इलाकों में ज्यादा वक्त न बिताएं। धरती से फूटने वाली रेडियोएक्टिव गैसों रेडॉन और थोरॉन से बचाव आसान है, लंबे वक्त से बंद पड़े घर या तहखाने में जाने से पहले वहां की खिड़कियां, रोशनदान और दरवाजे खोल दें,ताकि अंदर इकट्ठा हो चुकी गैस बाहर निकल जाए। अगर आप लंबी छु़ट्टियों पर जा रहे हैं तो इसका इंतजाम करके जाएं कि आपके घर में हवा का आवागमन बना रहे। अमेरिका में लकड़ी को प्राकृतिक रेडिएशन के बचाव का सबसे अच्छा तरीका माना जाता है, इसीलिए वहां ज्यादातर घर लकड़ी से बनाए जाते हैं। हमें इससे सीख ले सकते हैं, अपने घरों में पत्थर की फर्श के बजाए लकड़ी की फ्लोरिंग करवा कर रेडॉन गैस से बचाव कर सकते हैं।
आईआईटी कानपुर ने सामान्य गोबर को रेडिएशन विरोधी पाया है, इसलिए ग्रामीण इलाकों में फर्श और दीवारों पर गोबर का लेप करना प्राकृतिक रेडिएशन की रोकथाम का बेहतरीन उपाय है।
गढ़वाल, झारखंड और केरल के कुछ इलाके ऐसे हैं जहां प्राकृतिक रेडिएशन का स्तर सालभर सामान्य से बहुत ज्यादा रहता है। देश में प्राकृतिक रेडिएशन का सबसे ऊंचा स्तर केरल के छेवरा में पाया गया है, जबकि लक्ष्यद्वीप के मिनिकोए में इसका स्तर सबसे कम पाया गया है। दुनियाभर में प्राकृतिक रेडिएशन का सालाना स्तर 2.455 मिलीसीवर्ट मापा गया है, जबकि भारत में इसका स्तर अपेक्षाकृत कम 2.299 मिलीसीवर्ट है। दुनियाभर में अब प्राकृतिक रेडिएशन को लेकर चिंता बढ़ी है, क्योंकि इसका बढ़ता स्तर कई बीमारियों की वजह बनता जा रहा है। 

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

चेर्नोबिल-एक हादसा जिसे हमने भुला दिया


 25 वीं वर्षगांठ पर विशेष

 चेर्नोबिल महज एक न्यूक्लियर दुर्घटना नहीं, बल्कि मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी है
- टाइम मैगजीन 

मेरे दिल में उन सबके लिए गहरा सम्मान है जिन्होंने हादसे के बाद वहां जाकर रिएक्टर सील करने का काम किया...वो सभी जानते थे कि 90 फीसदी संभावना इस बात की है कि रेडिएशन उनकी जान ले लेगा...मुझे खेद है, मैं बोल नहीं पा रहा...और उनमें से ज्यादातर नहीं रहे
- व्लादिमीर नोवोच्शेनोव, नाभिकीय ऊर्जा सलाहकार, पूर्व सोवियत संघ 

26 अप्रैल 1986, आधी रात हो चली थी और साढ़े तीन लाख की आबादी वाला उत्तरी यूक्रेन का शहर प्रिप्यट गहरी नींद में था। लेकिन यहां से 3 किलोमीटर दूर मौजूद सोवियत की शान न्यूक्लियर पॉवर प्लांट चेर्नोबिल की यूनिट नंबर 4 के कंट्रोल रूम में भारी हलचल थी। उस रात रिएक्टर के इंजीनियर एक नए सेल्फ फ्यूलिंग सिस्टम का पहला परीक्षण करने जा रहे थे। ऊपर से आए आदेशों में साफ लिखा था कि ये परीक्षण 700 से 1000 मेगावाट पावर लिमिट के बीच किया जाए, लेकिन उस वक्त ड्यूटी पर मौजूद चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ ने उच्च अधिकारियों को खुश करने के लिए एकतरफा फैसला ले लिया। डिएटलॉफ ने इंजीनियरों को हुक्म दिया कि परीक्षण और भी कम पॉवर लिमिट यानि 200 मेगावॉट पर किया जाए। वहां मौजूद इंजीनियर चीफ इंजीनियर के इस आदेश पर भौचक्के रह गए। ड्यूटी पर मौजूद कुछ इंजीनियरों ने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन डिएटलॉफ जो एक नाभिकीय वैज्ञानिक भी था, वो भड़क उठा। उसके इस फैसले से ड्यूटी पर मौजूद इंजीनियर खुश नही थे, और कंट्रोल रूम में काम कर रहे उनमें से एक ने तो अपना करियर दांव पर लगाकर ये हुक्म मानने से इनकार कर दिया। इसपर डिएटलॉफ ने उसे काम से हटाकर उसकी जगह दूसरे इंजीनियर को तैनात कर प्रयोग शुरू करने का आदेश दिया।
परीक्षण से पहले चेर्नोबिल के रिएक्टर नंबर-4 को बंद किया गया। लेकिन इंजीनियर ये नहीं जानते थे कि रिएक्टर के कोर में पानी बहुत कम है। रात एक बजकर 23 मिनट पर इंजीनियरों ने रिएक्टर कोर को पानी से भरने से पहले ही परीक्षण शुरू कर दिया। कम पॉवर में रिएक्टर ऑन करते ही कोर में जो भी थोड़ा-बहुत पानी था वो तुरंत भाप में बदल गया। पानी के बिना चेर्नोबिल रिएक्टर कोर में मौजूद फ्यूल एसेंबली की 50-50 मीटर लंबी यूरेनियम की 1661 छड़ें दहकने लगीं। चारों तरफ अलार्म बज उठे और चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ समेत कंट्रोल रूम में मौजूद हर आदमी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। इंजीनयरों ने हड़बड़ी में कोर को पानी से भरने का काम शुरू कर दिया। पानी ने जैसे ही कोर में दहकती हुई यूरेनियम की छड़ों का स्पर्श किया, वो तुरंत भाप में बदल गया। चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर में प्रेशर कुकर जैसे हालात बन गए, जहां दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। दहकती हुई यूरेनियम की छड़ें पिघलने लगीं और रिएक्टर कोर में धमाके शुरू हो गए। रेडिएशन से सुलगती भाप का दबाव इस कदर तेज हो उठा कि यूरेनियम की हर छड़ के ऊपर लगे 350 किलो कंक्रीट से बने फ्यूल रॉड कैप उछलने लगे और देखते ही देखते एक जबरदस्त धमाके के साथ पूरा रिएक्टर कोर ही उड़ गया। इस धमाके की ताकत इतनी विनाशकारी थी कि रिएक्टर कोर के ऊपर लगा 1200 टन का सेफ्टी कैप उड़कर दूर जा गिरा। रिएक्टर की जगह एक खौफनाक स्याह गड्ढ़ा बन गया, जिससे रेडिएशन से भरी भाप तेज रफ्तार के साथ बाहर फूट रही थी।
 लेकिन असली आफत तो अब आने वाली थी। कुछ सेकेंड बाद इस भीषण धमाके से बने चेर्नोबिल रिएक्टर के उस स्याह गड्ढ़े से यूरेनियम और ग्रेफाइट जैसे दहकते हुए रेडियोएक्टिव अणुओं की एक बौछार सी फूट पड़ी। ये घातक बौछार वातावरण में एक हजार मीटर तक ऊपर उठती चली गई, जिससे रिएक्टर के ऊपर मौजूद बादल भी रेडिएशन के जहर से भर उठे। न्यूक्लियर ईंधन की इस खौफनाक बौछार ने करीब 700 टन रेडियोएक्टिव पदार्थों को वातावरण में यहां-वहां बिखेर दिया। चेर्नोबिल हादसे से वातावरण में फैल गया जहरीला रेडिएशन हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 100 गुना ज्यादा था। 
दुनिया को इस हादसे की पहली खबर दी समाचार एजेंसी नोवोस्टी के फोटो पत्रकार इगोर कॉस्टीन ने। कॉस्टीन वो पहले शख्स थे जो चेर्नोबिल हादसे के बाद सबसे पहले वहां हेलीकॉप्टर से पहुंचे। ये इगोर कॉस्टीन के कैमरे से ली गई हादसे के बाद चेर्नोबिल रिएक्टर की पहली तस्वीर है। चेर्नोबिल पावर प्लांट की जगह अब एक स्याह गहरा गड्ढ़ा नजर आ रहा था, जिससे लहराती हुई भाप ऊपर उठ रही थी। ये खौफनाक मंजर देखते ही कॉस्टीन समझ गए कि यहां कुछ बहुत बुरा घट चुका है। 
इगोर कॉस्टीन ने बाद में बताया कि उन्होंने रेडियो में एक लाइन की खबर सुनी थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर में कुछ गड़बड़ी आई है। उन्होंने तुरंत कैमरा संभाला और वहां जाकर हेलीकॉप्टर से सर्वे करने का फैसला किया। इगोर ने बताया, “ जल्दी ही हम चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर चार के ऊपर उड़ान भर रहे थे, हालात किस कदर संगीन थे, उस वक्त मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था। मैंने हेलीकॉप्टर की खिड़की खोल ली, जो एक बहुत बड़ी गलती थी। जब मैंने खिड़की खोली मुझे बाहर कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा। चेर्नोबिल रिएक्टर के अवशेष हमारे ठीक नीचे थे। वहां मौत का सन्नाटा छाया था। मैं इतने सदमे में था कि हेलीकॉप्टर की आवाज भी सुनाई नहीं दे रही थी। वहां कुछ नहीं था, बस एक स्याह खौफनाक गड्ढ़ा नजर आ रहा था।” 
27 अप्रैल 1986 की सुबह, प्रिप्यट शहर के बाशिंदे इस बात से बेखबर थे कि रात में कितनी बड़ी कयामत टूट चुकी है। लोग अपने-अपने काम में जुटे थे, बच्चे स्कूल जा रहे थे और आम शहरी जिनमें से ज्यादातर चेर्नोबिल रिएक्टर में काम करने वाले कर्मचारी ही थेस अपनी ड्यूटी पर जाने की तैयारी कर रहे थे। चेर्नोबिल हादसे के 30 घंटे बाद अधिकारियों ने चेर्नोबिल रिएक्टर से महज 3 किलोमीटर दूर मौजूद इस शहर की सुध ली। सुरक्षात्मक उपाय शुरू किए गए और थोड़ी ही देर में धड़धड़ाती हुई करीब एक हजार बसें वहां आ पहुंची। अधिकारियों ने लोगों को शहर तुरंत खाली करने का फरमान सुना दिया। लोगों को अपना सामान लेने के लिए महज दो घंटे का वक्त दिया गया। लोगों को केवल उतना ही सामान साथ ले जाने की इजाजत थी, जितना वो खुद उठा सकते थे। अधिकारियों के इस फरमान से शहर में बेचैनी फैल गई। कुछ ही देर में पूरा शहर बसों पर सवार हो गया। लोग अपनी जिंदगी की पूरी कमाई पीछे छोड़ अनजान मंजिल की ओर चल दिए, ये लोग फिर कभी दोबारा अपने घर वापस नहीं लौट सके। 
प्रिप्यट शहर खाली कराने के बाद पूर्व सोवियत संघ की सेना ने दुनिया का सबसे खतरनाक बचाव अभियान शुरू किया, जिसका मकसद था चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करना। सरकार ने अफगानिस्तान मोर्च से सबसे कुशल पायलट तलब किए और उन्हें चेर्नोबिल रिएक्टर के ऊपर हेलीकॉप्टर उड़ाने का आदेश दिया। सैनिकों के साथ ये पायलट हर उड़ान में बोरिक एसिड मिली 80 किलो बालू की बोरियां भी ले गए। कोशिश ये थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर को कई टन बालू और बोरिक एसिड से भर दिया जाए, जो रेडिएशन को सोख सके। पहले दिन 110 टन बालू रिएक्टर के गड्ढ़े में गिराई गई और अगले दिन 300 टन। चेर्नोबिल के खौफनाक खुले मुंह के ऊपर रेडिएशन की मात्रा जानलेवा स्तर से भी कई गुना ज्यादा थी। लेकिन काम में जुटे सभी सैनिक इस बात को नहीं जानते थे। कई पायलटों ने तो चेर्नोबिल के ऊपर एक दिन में 33 उड़ानें भरीं। इसका नतीजा ये हुआ कि काम में जुटे कई सैनिक और पायलट जहरीली हवा से मारे गए और हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने लगे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को स्टील की मोटी चादरों से ढंकने और सील करने का काम तूफानी रफ्तार से शुरू कर दिया गया। काम में जुटे सभी लोग इस बात को समझ चुके थे कि उनके यहां से जिंदा बच निकलने की संभावना बहुत कम है। लेकिन फिर भी दूसरों की जान बचाने के लिए इन जांबाजों ने अपनी हस्ती दांव पर लगा दी। बस एक मामूली सर्जिकल मास्क पहनकर लोग रेडिएशन का सामना करने के लिए आ डटे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करने का वीडियो शूट करने के लिए रूसी सेना का फोटोग्राफर शेवचेन्को चेर्नोबिल पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर तीन की छत पर चढ़ गया। वहां से उसने अपने कैमरे से शूट किया कि किस तरह लोग रेडिएशन से दहकती रेडियोएक्टिव ग्रेफाइट का हाथों से उठाकर ले जा रहे थे। काम पूरा हो जाने के बाद इस्तेमाल की गई हर चीज, दमकल गाड़ियां, क्रेन, हेलीकॉप्टर सब की सब वहीं की वहीं छोड़ दी गई। क्योंकि सबके सब जहरीले रेडिएशन से भर उठे थे। शेवचेन्को के कैमरे ने जो शूट किया वो शायद दुनिया का सबसे दुखद वीडियो है, क्योंकि चेर्नोबिल से लौटने के 10 दिन के भीतर ही इसे शूट करने वाले फोटोग्राफर शेवचेन्को और इसमें नजर आने वाले हर शख्स की मौत हो गई। इस वीडियो को जिस कैमरे से शूट किया गया था, उस कैमरे को भी शेवचेन्को के साथ कब्र में दफना दिया गया, क्योंकि वो भी रेडिएशन से भर उठा था।
पूर्व सोवियत संघ के सरकारी अखबार प्रावदा में कई दिन बाद इस हादसे की एक छोटी सी खबर छपी, वो भी पेज नंबर तीन के बॉटम में सिंगल कॉलम।
 चेर्नोबिल की बाहरी सीमा पर एक बोर्ड लगा है, जिसमें रूसी भाषा में यात्रियों के लिए सुरक्षित सफर की शुभकामनाएं लिखी हैं। लेकिन इससे आगे 30 किलोमीटर दायरे का पूरा इलाका और चेर्नोबिल के कामगारों का शहर प्रिप्यट वीरान पड़ा है। इस शहर में रेडिएशन की मात्रा इतनी ज्यादा है कि अगले 800 साल तक ये रहने के काबिल नहीं है। फिर भी इन नामुमकिन हालात में भी जिंदगी ने अपने लिए रास्ता बना लिया है।
साढ़े तीन लाख लोगों से ये शहर खाली करा लिए जाने के एक साल बाद करीब 400 बुजुर्गों का एक दल अपने शहर वापस लौट आया था। पुरानी यादों भरे अपने घर में जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने के लिए। 75 साल की ओल्गा गेवरिलेन्कोव भी उन्हीं में शामिल थीं। हैरानी की बात ये कि रेडिएशन से भरे इस शहर में ओल्गा मजे से रह रही हैं। प्रिप्यट शहर की जमीन का एक-एक कण घातक रेडिएशन से भरा होने के बावजूद ओल्गा इसी में अपने लिए सब्जियां उगाती हैं।
सर्दियों में जब बर्फबारी होती है तो प्रिप्यट शहर में रेडिएशन का स्तर काफी कम हो जाता है, क्योंकि बर्फ में ही ये खासियत होती है कि वो रेडिएशन को बेहतर तरीके से रोक सकती है। बर्फ से ढंके प्रिप्यट में अब कुछ टूरिस्ट भी आने लगे हैं। यहां आने वाले लोग दादी ओल्गा से जरूर मिलते हैं, और ओल्गा उन्हें गर्व से बताती हैं, “मैं घर के बाहर जमीन पर आलू और हर वो चीज पैदा कर लेती हूं, जो मुझे चाहिए। धरती जो मुझे देती है, मैं उसे खा लेती हूं। मैं नहीं डरती, मैं अब किसी चीज से नहीं डरती।” 
चेर्नोबिल हादसे की त्रासदी केवल इस शहर तक ही सीमित नहीं रही। रेडिएशन से भरे बादलों ने रेडियोएक्टिव कणों को दूर-दूर तक बिखेर दिया। यूक्रेन, बेलारूस, रूस और कीव रेडिएशन की चपेट में आ गए। चेर्नोबिल हादसे के निशान यूरोप के हर देश में देखे गए। लेकिन इस त्रासदी का सबसे अफसोसनाक पहलू ये रहा कि इतिहास की हर त्रासदी की तरह इसके शिकार भी सबसे ज्यादा बच्चे ही हुए। 

हादसे के वक्त चेर्नोबिल पावर प्लांट में करीब 3500 कर्मचारी मौजूद थे, उनमें से 56 कर्मचारी तुरंत मारे गए

3,50, 000 लोगों को हमेशा के लिए बेघर होना पड़ा

90 बच्चों समेत 4000 लोगों की मौत रेडिएशन से हुई

चेर्नोबिल हादसे में मारे गए लोगों की सही संख्या का अब तक पता नहीं चला

हादसे के बावजूद यूक्रेन सरकार ने चेर्नोबिल के दूसरे रिएक्टरों का इस्तेमाल जारी रखा

चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के सभी रिएक्टर साल 2000 से हमेशा के लिए बंद कर दिए गए 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

गैगेरिन का 108 मिनट का वो सफर, जिसने दुनिया बदल दी


12 अप्रैल 1961, कजाकस्तान का बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, अनजाने भय और आशंकाओं के बीच मानव अंतरिक्ष के गहन अज्ञात में पहला कदम रखने जा रहा था। ऐसे में अपने स्पेसक्राफ्ट वोस्तोक-1 में बैठने से पहले यूरी गैगेरिन ने दुनिया भर के लोगों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाया - 
प्यारे दोस्तों, भले ही आप मुझे जानते हों, या न जानते हों, मेरे हमवतनों और दुनियाभर के लोगों, अगले कुछ मिनटों में एक शक्तिशाली रॉकेट मुझे ब्रह्मांड की सुदूर गहराइयों में ले जाएगा। अंतरिक्ष के सफर पर निकलने से पहले अब इन अंतिम पलों में मैं आपसे क्या कह सकता हूं। अपनी पूरी जिंदगी अब मुझे एक अकेले खूबसूरत क्षण जैसी लग रही है। मैंने जिंदगी में जो कुछ भी किया, जो भी जीया वो सब कुछ बस इस क्षण के लिए ही था। 
विश्व नागरिकों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाने के बाद यूरी गैगेरिन वोस्तोक रॉकेट में सवार होकर विश्व के पहली मानव अंतरिक्ष अभियान पर निकल गए। अंतरिक्ष में पहला मानव मौजूद होने की खबर जब दुनिया को मिली तो सभी अवाक रह गए। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद ये सबसे बड़ी और सबसे गौरवशाली खबर थी, जो पूरी दुनिया में बिजली की तेजी से फैल गई। अमेरिका दंग रह गया, लेकिन राजनयिक-कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर जारी तमाम स्पर्धाओं को दरकिनार कर वाशिंगटन ने बधाई का संदेश मास्को भेजा। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान ने पूरी दुनिया को मानव होने का अर्थ सही मायनों में समझाया और सभी देशों को एकसाथ गर्व की सुखद अनुभूति से भर दिया।   
यूरी गैगेरिन भारत में 
अंतरिक्ष से वापस आने के करीब आठ महीने बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर यूरी गैगेरिन भारत भी आए। भारत में भी गैगेरिन के लिए भव्य स्वागत यात्रा निकाली गई। गैगेरिन की उपलब्धि ने भारत को भी आत्मविश्वास से भर दिया। डॉ. विक्रम साराभाई भी यूरी की अंतरिक्षयात्रा से बहुत प्रभावित हुए और इस नतीजे पर पहुंचे कि एक प्रभावशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान के 8 साल बाद इसरो की स्थापना के साथ भारत ने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू कर दिया। और इसके महज 6 साल बाद अपना पहला सेटेलाइट आर्यभट्ट अंतरिक्ष भेजकर दुनिया को चौंका दिया। यूरी गैगेरिन के सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने खास डाकटिकट भी जारी किए। यूरी ने जब पृथ्वी की पहली परिक्रमा की उस वक्त वो केवल 27 वर्ष के थे। 108 मिनट की उनकी अंतरिक्षयात्रा ने विश्व के युवाओं को इस कदर जोश से भर दिया कि इसके बाद दुनिया ही बदल गई।
स्पुतनिक और स्पेस एज
यूरी के अंतरिक्ष अभियान की पृष्ठभूमि तैयार हुई 4 अक्टूबर 1957 को जब पूर्व सोवियत संघ ने दुनिया का पहला सेटेलाइट स्पुतनिक पृथ्वी की कक्षा में भेजा। स्पुतनिक के साथ दुनिया में अंतरिक्ष युग की शुरुआत हुई, जिसे सोवियत वैज्ञानिकों ने आगे बढ़ाया 3 नवंबर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में जीवन का पहला रूप मादा कुत्तालाईकाको भेजकर। अंतरिक्ष के माहौल में लाईका केवल 6 घंटे ही जीवित रह सकी, उसके चैंबर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाने की वजह से उसकी मौत हो गई। लाईका नहीं रही, लेकिन वो जिंदगी को अंतरिक्ष का रास्ता दिखा गई। अमेरिका एक बार फिर पिछड़ चुका था, लेकिन सोवियत जानता था कि अब अमेरिका दुनिया को चौंकाने वाला कोई बड़ा कारनामा जरूर करेगा। साम्यवादी सरकार हर कीमत पर अमेरिका को पछाड़ने पर आमादा थी। वक्त कम था और जल्दी ही कुछ बड़ा कर दिखाना था।
मिशन वोस्तोक और मिशन मरकरी
जनवरी 1959 को पूर्व सोवियत संघ ने इंसान को अंतरिक्ष भेजने के लक्ष्य के साथ एक अहम कार्यक्रम शुरू किया, जिसका नाम था वोस्तोक। इसके ठीक तीन महीने बाद अमेरिका ने भी अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने के लिए मिशन मरकरी का ऐलान कर दिया। अब पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका में इस बात की होड़ तेज हो गई कि पहले अंतरिक्षयात्री को अंतरिक्ष भेजने में बाजी कौन मारता है। 
अमेरिका की तरह पूर्व सोवियत संघ ने भी अंतरिक्षयात्रियों को चुनने के लिए वायुसेना के पायलट्स को ही लेने का फैसला लिया। पूर्व सोवियत संघ ने गुपचुप ढंग से सारी तैयारियां शुरू कर दीं और देशभर से वायुसेना से सबसे कुशल 2000 पायलट्स को बुला भेजा। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम वोस्तोक के चीफ सेर्गेई कोरोलेव ने इन 2000 में से 200 पायलट्स का चुनाव किया और कड़े इम्तहान के बाद इन 200 में से 20  कैडेट्स को चुना गया। लेकिन किसी को भी ये नहीं बताया गया कि उन्हें करना क्या है। 20 लोगों की इसी टीम में शामिल थे सोवियत एयरफोर्स के सीनियर लेफ्टिनेंट यूरी गैगेरिन।
महज 5 फुट 2 इंच के कद वाले यूरी साथियों के बीच अलग ही नजर आते थे। मजाकिया स्वभाव के साथ उनकी सबसे बड़ी पहचान थी चेहरे पर हर वक्त खिली रहने वाली एक ताजगी भरी मुस्कान। 20 में से यूरी गैगरिन समेत 6 फाइनल कैडेट्स का चुनाव किया गया और तब उन्हें बताया गया कि उन्हें कॉस्मोनट यानि अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जा रहा है। 18 जून 1960 को पहली बार इन सभी छह लोगों को वोस्तोक रॉकेट दिखाया गया। अब जाकर इन्हें पता चला कि छह में से किसी एक भाग्यशाली को दुनिया का पहला अंतरिक्षयात्री बनने का मौका मिलेगा।
यूरी गैगेरिन जिस वक्त अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण ले रहे थे, उस वक्त तक न तो अच्छे कंप्यूटर्स थे, और न ही वो टेक्नोलॉजी जो एक इंसान को अंतरिक्ष भेजकर सुरक्षित वापस ला सकती थी। उस वक्त तक तो हमें अंतरिक्ष में विकिरण के खतरों की भी सही जानकारी नहीं थी और अंतरिक्ष के खतरनाक माहौल में जिंदगी की हिफाजत करने वाले अच्छे स्पेससूट की तो बात छोड़िए, सुरक्षित हेलमेट तक नहीं थे। ऐसे में एक इंसान को अंतरिक्ष भेजना एक राजनीतिक जिद के सिवाय कुछ नहीं था। राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं इस कदर हावी थीं कि अंतरिक्षयात्री की सुरक्षा जैसे सवाल बेमानी थे।
यूरी का चुनाव
11 महीने का अंतरिक्षयात्री प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, अब आई बारी अंतरिक्ष के पहले सफर के लिए 6 में से एक कॉस्मोनट को चुनने की। चयनकर्ताओं के सामने दो अंतिम नाम थे यूरी गैगेरिन और घेरमान तितोव। तितोव एक शिक्षक के बेटे थे, जबकि यूरी के पिता एक किसान थे। साम्यवादी सरकार ने दुनिया के पहले अंतरिक्षयात्री के तौर पर तितोव के बजाय मेहनतकश किसान के बेटे यूरी का चुनाव किया। पहली अंतरिक्षयात्रा के लिए यूरी के चुनाव की एक वजह और भी थी। दरअसल वोस्तोक कैप्स्यूल के कॉकपिट में लंबे कद के अंतरिक्षयात्री के लिए जगह ही नहीं थी। जबकि मजह 5 फुट 2 इंच कद वाले यूरी इस छोटे से कॉकपिट के लिए बिल्कुल फिट थे।
यूरी लंबे वक्त से घर से बाहर थे। हाल ही में उनकी बेटी लेना का जन्म हुआ था। लेकिन यूरी परिवार को ये नहीं बता सकते थे कि वो कहां हैं और क्या कर रहे हैं। अंतरिक्षयात्रा पर निकलने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी वेलेंटीना गोर्याचेवा को खत लिखा-
मेरी प्यारी, तुमसे और बच्चों से मिलने को मैं बेकरार हूं...मैं देश के प्रति अपना फर्ज निभा रहा हूं...मैं एक ऐसे सफर पर जाने वाला हूं, जिसका ख्वाब मैं बचपन से देखता रहा हूं...ये कुछ ऐसा है जिसपर हम हमेशा गर्व करेंगे...इसमें कुछ खतरे भी हैं...लेकिन कई बार लोग अपने कमरे में टहलते हुए भी फिसल जाते हैं और उनकी जान खतरे में आ जाती है...बड़ी बात वो मकसद है, जिसके लिए हम खुद को दांव पर लगा दें...मुझे यकीन है कि मैं इस सबसे बड़े इम्तहान से विजेता बनकर तुम्हारे और बच्चों के पास लौट आउंगा....नन्हीं लेना को मेरा प्यार देना....तुम्हारा...यूरी।
 12 अप्रैल 1961, बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, कजाकस्तान। वो एतिहासिक दिन आ पहुंचा, यूरी ने दुनिया के नाम अपना संदेश रिकार्ड करवाया और ड्रेसिंग रूम में आ गए, जहां स्पेस सूट पहनने में साथियों ने  यूरी गैगेरिन की मदद की। स्पेस सूट पहन लेने के बाद यूरी को लांच पैड तक ले जाने के लिए एक खास बस में बिठाया गया। बस में यूरी के साथ बतौर बैकअप कॉस्मोनट घेरमान तितोव भी स्पेस सूट पहनकर पीछे की सीट पर बतौर बैकअप पायलट मौजूद थे। तभी एक साथी  इवानोव ने सौभाग्य के लिए एक चॉकलेट खिलाकर यूरी का मुंह मीठा कराया। बस कॉस्मोड्रॉम की ओर चल दी, और इसके साथ ही तितोव के दिल में एक तूफानी हलचल भी शुरु हो गई।
तितोव किसी भी मायने में यूरी से कम नहीं था, लेकिन इतिहास रचने का मौका यूरी को मिल रहा था। तितोव ने कई साल बाद एक इंटरव्यू में बताया कि जब तक यूरी बस से उतरकर रॉकेट की ओर नहीं चले गए, तब तक उन्हें यही लगता रहा कि शायद अगले ही पल कुछ ऐसा हो जाएगा, कि यूरी की जगह अंतरिक्ष जाने का मौका उन्हें मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बस कॉस्मोड्रॉम पहुंची, यूरी बस से उतरे और उन्होंने वहां मौजूद सैन्य अधिकारियों और मिशन वैज्ञानिकों को अपना परिचय देने की औपचारिकता निभाई। तितोव बस में ही बैठे रहे, उनके लिए अब कोई उम्मीद नहीं बची और यूरी एक नया इतिहास रचने के लिए रॉकेट की ओर बढ़ गए। तितोव ने निराशा में आंखें बंद कर लीं और एक झपकी लेने में खो गए।
कॉस्मोड्रॉम में आला सरकारी और फौजी अफसरों के साथ सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ सेर्गेई कोरोलेव भी मौजूद थे। खतरों से भरे इस सफर के लिए यूरी का चुनाव उन्होंने ही किया था। कोरोलेव भावुक हो उठे, क्योंकि वो ये बात बखूबी जानते थे कि इस सफर से यूरी के जिंदा वापस आने की संभावना 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। फिरभी यूरी से विदा लेते वक्त उन्होंने स्नेह के साथ कहा, यूरी वापस लौट के आना।
दोस्त ने निभाई दोस्ती
दुनिया की इस पहली अंतरिक्षयात्रा के दौरान वोस्तोक में यूरी के पूरे सफर का नियंत्रण ग्राउंड कंट्रोल के हाथों में था। यूरी को तब तक नियंत्रण हाथ में लेने की इजाजत नहीं थी, जब तक कि कोई आपात स्थिति सामने न आ जाए। आपात स्थिति में यूरी एक खास कोड के जरिए नियंत्रण हाथ में ले सकते थे, लेकिन ये खास कोड सेना के जनरल समेत बस दो-तीन लोगों को ही मालूम था और किसी इमरजेंसी से पहले यूरी को ये कोड न बताने की सख्त ताकीद की गई थी। कोरोलेव से गले मिलने के बाद यूरी रॉकेट पर ले जाने वाली लिफ्ट में सवार हो गए। वोस्तोक कैप्स्यूल में यूरी को बिठाने की जिम्मेदारी निभाई यूरी के एक दोस्त इंजीनियर ने। यूरी को बिठाने के दौरान उसने अपनी दोस्ती निभाई और अपनी जान जोखिम में डालकर यूरी के कान में चुपके से वो इमरजेंसी कोड बता दिया, जिसकी मदद से आपात स्थिति आने पर यूरी नियंत्रण अपने हाथों में ले सकते थे। इसपर यूरी मुस्कुराए और बोले,मैं, जानता हूं, जनरल ने मुझे पहले ही कोड बता दिया है।
रॉकेट लांच होने में अभी कुछ वक्त था। वोस्तोक कैप्स्यूल में बैठकर यूरी कंट्रोल रूम में मौजूद साथियों से माइक्रोफोन पर मजाक करने लगे। इसपर कोरोलेव ने यूरी को सावधान किया कि वो जो कुछ भी कह रहे हैं, वो सब रिकॉर्ड हो रहा है। ये जानकर यूरी झेंप गए और कंट्रोल रूम ठहाकों से गूंज उठा। अंतिम जांच पूरी होने पर, कोरोलेव ने इशारा किया और वोस्तोक के बूस्टर इंजन दहक उठे। रॉकेट लांच होते ही यूरी ने पूरे जोश में भरकर कहा...पियाकली...यानि... आओ चलें। तूफानी रफ्तार से रॉकेट आसमान की ओर बढ़ा चला जा रहा था। वोस्तोक कैप्स्यूल में मौजूद यूरी इन गौरवशाली क्षणों के आनंद में मातृभूमि को समर्पित एक गीत गुनगुना उठे -
the motherland knows...the motherland hears
when her son is flying up i the clouds....
(मातृभूमि जानती है...मातृभूमि सुनती है..
जब उसका बेटा...ऊपर बादलों में उड़ान भरता है) 
रॉकेट लांच के तीन मिनट बाद, वोस्तोक के बूस्टर रॉकेट्स गैरेरिन को 28164 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से धरती की सरहदों के पार लिए चले जा रहे थे। 
लांचिंग के 5 मिनट बाद, यूरी गैगरिन अंतरिक्ष से खूबसूरत नीली धरती को निहारने वाले पहले इंसान बन गए। 
वोस्तोक कैप्सूल के कॉकपिट की छोटी सी खिड़की के उसपार चमकीली नीली धरती नजर आ रही थी। धरती की इस खूबसूरती को देखने में यूरी खो गए। उन्होंने माइक्रोफोन से कंट्रोल रूम को बताया, अब मैं धरती के रंगों को देख रहा हूं...ये खूबसूरत है...बेहद खूबसूरत।
 अंतरिक्ष तक की उड़ान के 9 मिनट बाद रफ्तार की तेज सनसनाहट अचानक थम गई। गुरुत्वाकर्षण का असर खत्म हो गया। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा को पीछे छोड़कर यूरी पृथ्वी की अपनी कक्षा में पहुंच गए। उन्होंने कंट्रोल रूम को बताया, सबकुछ ठीक है...शून्य गुरुत्वार्षण का अनुभव शानदार है...मुझे मजा आ रहा है। 
धरती पर जारी राजनीति का खेल
मानव इतिहास की सबसे शानदार उपलब्धि हासिल हो गई। किसी इंसान को अंतरिक्ष भेजने का सपना साकार हो गया। अपनी कक्षा में मौजूद यूरी गैगेरिन अब धरती की अपनी पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे। इस ऐतिहासिक कामयाबी के ऐलान के लिए पूर्व सोवियत सरकार अब तैयार थीपहले से ही तीन बिल्कुल अलग-अलग हालात के लिए लिफाफे तैयार किए गए थेपहले लिफाफे में यूरी गैगेरिन के मिशन की शानदार कामयाबी का ऐलान थादूसरे लिफाफे में,तकनीकी खामी के चलते रूस की सीमा से बाहर लैंड हो गए रूसी कॉस्मोनट की मदद करने की अपील थीजबकि तीसरे लिफाफे में एक शोक संदेश था, जिसमें लिखा था कि मिशन के दौरान यूरी गैगरिन की मौत हो गईजब वैज्ञानिक आंकड़ों से मिशन की कामयाबी की पुष्टि हो गई, तो क्रेमलिन के आदेश पर पहला लिफाफा खोला गया और लोगों को साम्यवादी सरकार की इस शानदार कामयाबी की खबर दी सरकारी एजेंसी तास ने। रेडियो एनाउंसर यूराई लैवितान ने बाद में बताया कि पूरे करियर के दौरान कोवल दो मौके ही ऐसे आए, जब बुलेटिन पढ़ने के बाद वो फफक-फफक कर रो पड़े थे। पहला मौका था जब उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की खबर पढ़ी थी और दूसरा मौका अब सामने था, जब लो अंतरिक्ष में यूरी गैगेरिन के मौजूद होने का समाचार लोगों को सुना रहे थे।
धरती से करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर एक छोटे से कैप्स्यूल में मौजूद मौजूद गैगेरिन पृथ्वी की पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे, लेकिन ग्राउंड कंट्रोल में मौजूद वैज्ञानिकों का तनाव हर पल बढ़ता जा रहा था। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ कोरोलोव ने कंट्रोल रूम से पूछा, कंट्रोल, वो कैसा है।
इसपर स्पीकर पर यूरी की आवाज गूंजी,मैं सुरक्षित हूं।
तभी कंट्रोल रूम में लगे टेलीविजन स्क्रीन से यूरी के वीडियो सिगनल टूटने लगे। कोरोलोव यूरी को कुछ बताना चाहते थे कि अचानक टीवी स्क्रीन से यूरी की तस्वीर गायब हो गई। किसी अनहोनी के अंदेशे से कंट्रोल रूम में मौजूद कोरलोव समेत सारे वैज्ञानिक कांप उठे।
दरअसल यूरी टेलीविजन रिसीवर की रेंज से बाहर चले गए थे।
लांच से 30 मिनट से भी कम वक्त के भीतर यूरी गैगेरिन प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरे और उन्होंने आधी धरती को नींद के आगोश में समेटे रात के गहरे साये को देखा। जल्दी ही गैगेरिन का कैप्स्यूल अमेरिका के ऊपर से गुजरा, जिसके नागरिक अंतरिक्ष में पहले इंसान यूरी गैगेरिन की शानदार फतह से बेखबर गहरी नींद में खोए थे।
यूरी की जान खतरे में
अंतरिक्ष में करीब एक घंटा गुजारने के बाद कंट्रोल रूम में रीइंट्री यानि धरती के वातावरण में वापसी की गणना शुरू कर दी गई। पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रहे गैगेरिन को अब बर्न-अप की मदद से वोस्तोक कैप्स्यूल की रफ्तार कम करनी थी। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो गैगरिन पृथ्वी की और ऊंची कक्षा में प्रवेश कर जाते, जहां से फिर वापस लौटने का और कोई रास्ता नहीं था। रॉकेट बर्न-अप के साथ यूरी के कैप्स्यूल की रफ्तार तो कम हो गई लेकिन एक बड़ा हादसा सामने आ गया। वोस्तोक के सर्विस मॉड्यूल को कैप्स्यूल से अलग होना था, लेकिन दोनों एक-दूसरे में फंस गए। कंट्रोल रूम में वैज्ञानिक कांप उठे। वोस्तोक सर्विस मॉड्यूल अगर कैप्स्यूल के साथ जुड़ा रहता तो अंतरिक्ष में गैगेरिन की मौत तय थी। यूरी कंट्रोल रूम का रेडियो संपर्क टूट गया। तेज गर्मी से दहकते और एक-दूसरे से टकराते वोस्तोक के दोनों हिस्से धरती के वातारण में प्रवेश कर गए। हालात अब हाथ से निकल गए। कोरलोव अब कंट्रोल रूम के दूसरे वैज्ञानिकों के साथ इंतजार के सिवा कुछ और नहीं कर सकते थे। 
साईबेरिया के सारातोव इलाके में किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। कि तभी अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। खेतों में काम कर रही एक लड़की घबराकर मां से लिपट गई। दोनों ने आसमान की ओर नजरें उठाईं। आसमान से दो चीजें पैराशूट के सहारे नीचे गिर रही थीं। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश के अंतिम क्षणों में भीषण तापमान से वोस्तोक के एक-दूसरे में फंसे दोनों दोनो अपने आप अलग हो गए और इसके कुछ पल बाद ही टुकड़ों को अलग कर दिया। इसके कुछ ही क्षण बाद धरती से करीब साढ़े छह किलोमीटर की ऊंचाई पर गैगेरिन ने कैप्स्यूल के बाहर पराशूट से छलांग लगा दी।
108 मिनट की इस ऐतिहासिक अंतरिक्षयात्रा के दौरान गैगेरिन ने 40234 किलोमीटर की दूरी तय की और इसके साथ ही वो अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले पहले इंसान बन गए। कंट्रोल रूम में गहरा सन्नाटा था। कोरोलोव ने फोन उठाया और फिर साथियों को यूरी की साईबेरिया में सुरक्षित लैंडिंग की खबर दी। इसके साथ ही कंट्रोल रूम खुशियों से झूम उठा।
अंतरिक्ष में पहला अंतरिक्षयात्री भेजने में पूर्व सोवियत संघ ने बाजी मार ली और अमेरिका स्पेस-रेस में मीलों पीछे छूट चुका था। तात्कालीन सोवियत राष्ट्रपति निकिता खुश्चेव ने गैगेरिन की अंतरिक्षयात्रा को साम्यवादी सिद्धांतों की सर्वोच्च विजय के तौर पर प्रचारित किया। गैगेरिन अब नेशनल हीरो थे।
गैगेरिन की वापसी के दो दिन बाद सोवियत सरकार ने इस शानदार उपलब्धि का सार्वजनिक जश्न मनाया। एयरफोर्स का एक विमान गैगेरिन को लेकर सीधे क्रेमलिन पहुंचा। जीत के गौरव से भरे छोटे कद के गैगेरिन सधे कदमों रेड कारपेट पर चल रहे थे कि तभी उनकी पत्नी ने उनके पैरों में कुछ महसूस किया।
यूरी रेड कारपेट पर चले आ रहे थे, लेकिन उनके जूते का एक फीता खुला हुआ था।
अपने नेशनल हीरो की अगवानी के लिए क्रेमलिन के लाल चौक पर सरकारी अधिकारियों के साथ गैगेरिन का परिवार भी मौजूद था। लेकिन सबसे खास बात ये कि लाखों की भीड़ के साथ यूरी से मिलने राष्ट्रपति खुश्चेव खुद आए थे।
गैगेरिन की मशहूर मुस्कान की चमक पूरी दुनिया में फैल गई। क्यूबा, जापान, मैक्सिको, कनाडा, लीबिया और भी कई देशों में यूरी गैगेरिन जहां भी गए, उन्हें देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी। गैगेरिन की उपलब्धि इतनी बड़ी थी, कि सोवियत प्रतिद्वंदी अमेरिका भी यूरी गैगेरिन की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। यूरी गैगेरिन अब किसी एक देश के हीरो नहीं रहे, बल्कि वो पूरी मानव जाति के नायक बन गए। गैगेरिन की 108 मिनट की अंतरिक्षयात्रा ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया। गैगेरिन की उपलब्धि ने वैज्ञानकों और युवाओँ को इस कदर जोश और आत्मविश्वास से भर दिया कि महज आठ साल बाद ही मानव ने चंद्रमा पर अपने कदमों के निशान बना दिए। इंसानियत के इस हीरो के सम्मान में नील आर्मस्ट्रांग यूरी गैगेरिन का एक मैडल अपने साथ ले गए थे, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए चंद्रमा पर रख दिया। दुनिया के इस पहले अंतरिक्षयात्री ने पृथ्वी की पहली परिक्रमा के दौरान जिन खतरों का सामना किया, दुनिया ने उनसे सबक लिया और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ अंतरिक्षयात्रियों की नई पीढ़ी तैयार हुई।