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रविवार, 25 सितंबर 2011

सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्


 सेर्न और ग्रान सैसो का ओपेरा एक्सपेरीमेंट
'टाइम-स्पेस और प्रकाश की गति के ताने-बाने में हल्का सा स्पंदन
न्यूट्रिनो ने प्रकाश की गति सीमा तोड़ी

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
कार्य-कारण सिद्धांत की ये सनातन भारतीय अभिव्यक्ति है। फल यानि कारण या 'इफेक्ट' का निर्धारण कर्म यानि कार्य या 'कॉज' के अनुसार ही होता है, इसमें दखल नहीं दिया जा सकता। सापेक्षता के सिद्धांत में आइंस्टीन बताते हैं कि हमारे आसपास और इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटता है, उसके लिए प्रकृति का मूलभूत कार्य-कारण सिद्धांत यानि कॉज एंड इफेक्ट ही जिम्मेदार है। सापेक्षतावाद के साथ आइंस्टीन ने एक ऐसे नियम की खोज की जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड, हमारे आस-पास के इस संपूर्ण दृश्य जगत और खुद हमारी जिंदगी की आधारशिला है। वो सार्वभौम नियम ये है कि परमाणु के भीतर मौजूद ऊर्जा कणों से लेकर ब्रह्मांड के विशालतम पिंड तक प्रकाश की गति सीमा का उल्लंघन नहीं कर सकते। सापेक्षतावाद में आइंस्टीन ने बताया और अब इसकी पुष्टि भी हुई है कि ये संपूर्ण सृष्टि खुद को कुछ इस तरह से संतुलित रखती है कि कोई भी चीज प्रकाश की गति की सीमा को पार न कर सके।
आइंस्टीन बताते हैं कि 'टाइम-स्पेस एंड लाइट' यानि समय-काल और प्रकाश की गति वो तीन आधारस्तंभ हैं जिनपर संपूर्ण ब्रह्मांड और ये सृष्टि टिकी है और संचालित हो रही है। सापेक्षतावाद में 'टाइम-स्पेस एंड लाइट' यानि समय-काल और प्रकाश की गति के अंतर संबंधों की व्याख्या करते हुए आइंस्टीन ने ब्रह्मांड और सृष्टि के उदभव रहस्यों को समझाया है। भारतीय दर्शन में वर्णित सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् की अवधारणा इसके काफी करीब है। सत्यम् यानि समय या 'TIME', शिवम् यानि काल या 'SPACE' और सुंदरम् यानि प्रकाश या 'LIGHT' । ये भी अदभुत साम्य है कि भारतीय दर्शन में समय को अंतिम सत्य, काल यानि मृत्यु और फिर जन्म या पुनर्निर्माण को शिव और मोक्ष या ज्ञान को प्रकाश कहा गया है।
सापेक्षतावाद के अनुसार किसी चीज का वेग बढ़ाने से उसका द्रव्यमान भी बढ़ता है और उसी अनुपात में बढ़ा हुआ गुरुत्वाकर्षण बल उस चीज के आसपास, चारों ओर के स्पेस पर असर डालता है और उसे मोड़ देता है। अगर आप प्रकाश के वेग से चलना चाहें तो आपका द्रव्यमान अनंत हो जाएगा, जिसे प्रकाश का वेग देने के लिए अनंत ऊर्जा की जरूरत होगी। ये संभव नहीं है, इसलिए ब्रह्मांड की कोई भी चीज एक तो प्रकाश के वेग की बराबरी नहीं कर सकती, और अगर कर भी लिया तो किसी भी सूरत में वो ब्रह्मांड में वेग की इस उच्चतम सीमा- प्रकाश के वेग का उल्लंघन नहीं कर सकती। क्योंकि ऐसा करते ही वो चीज भूतकाल में चली जाएगी। क्योंकि प्रकाश का वेग हासिल कर लेने पर समय जीरो हो जाता है और प्रकाश की रफ्तार से आगे निकलने पर समय ऋणात्मक यानि भूतकाल में चला जाता है। यही है 'टाइम ट्रैवेल' यानि वेग को नियंत्रित कर समय में भविष्य और भूतकाल की यात्रा करने का रहस्य। आइंस्टीन ने सापेक्षतावाद में इसे गणितीय रूप से साबित किया है, लेकिन साथ ही ये भी बताया है कि प्रकाश की गति से आगे निकलकर भूतकाल की यात्रा करना असंभव है। क्योंकि ब्रह्मांड के जन्म के बाद से इसे संचालित करने वाले तीनों मुख्य नियंत्रकों समय-काल और प्रकाश की गति ने इस संपूर्ण सृष्टि का डिजाइन कुछ इस तरह से रचा है कि ये हमेशा आगे की ओर बढ़ता है...भविष्य की ओर। आइंस्टीन के सापेक्षतावाद में मौजूद कार्य-कारण या कॉज एंड इफेक्ट सिद्धांत भी यही है। संपूर्ण सृष्टि कुछ इस तरह से काम कर रही है कि प्रकाश के अलावा कोई भी दूसरी चीज गति की इस अंतिम सीमा को हासिल न कर सके।
'टाइम-स्पेस एंड लाइट' यानि समय-काल और प्रकाश की गति के ताने-बाने में एक हल्का सा स्पंदन हुआ है। ओपेरा नाम के हाई-इनर्जी पार्टिकिल फिजिक्स के एक प्रयोग से कुछ ऐसे नतीजे आए हैं कि संपूर्ण वैज्ञानिक जगत भौचक्का है। ऊर्जा कण न्यूट्रिनो ने ब्रह्मांड के नियम का उल्लंघन करते हुए प्रकाश से भी तेज रफ्तार प्रदर्शित की है। इस प्रयोग से जुड़े भौतिकविज्ञानी आश्चर्यचकित हैं कि ऐसा कैसे हुआ? क्या सापेक्षतावाद के सिद्धांतों को गढने में आइंस्टीन से कोई भूल हो गई? अगर ये सही है तो फिर इसके नतीजे बड़े व्यापक होंगे और फिजिक्स के सारे नियम-सारे सिद्धांत फिर से लिखने पड़ेंगे।
सूरज के केंद्र में एक खास ऊर्जा कण जन्म लेते हैं, जिनका नाम है न्यूट्रिनो। सौर विकिरण के तूफान के साथ अरबों-खरबों की तादाद में न्यूट्रिनो कण पूरे सौरमंडल में बिखर जाते हैं। न्यूट्रिनो में ना के बराबर द्रव्यमान होता है और इनमें कोई इलेक्टि्रिक चार्ज नहीं होता। न्यूट्रिनो की सबसे बड़ी खासियत ये है कि कोई भी चीज उन्हें रोक नहीं पाती और किसी भी तरह का कोई नुकसान पहुंचाए बगैर, वो सामने आने वाली हर चीज के आर-पार निकल जाते हैं। हमारे आसपास की हर चीज के हरेक एक वर्ग सेंटीमीटर के दायरे से सूरज से जन्म लेने वाले 60 अरब न्यूट्रिनो कणों की बौछार हर सेकेंड गुजर रही है। न्यूट्रिनो उच्च ऊर्जायुक्त कण हैं और इनकी मौजूदगी परमाणु के भीतर भी महसूस की गई है। न्यूट्रिनो इतने सूक्ष्म हैं कि किसी भी सूक्ष्मदर्शी से इन्हें देखा नहीं जा सकता, हां कुछ बेहद संवेदनशील सेंसर्स की मदद से इनकी मौजूदगी का अनुभव जरूर किया जा सकता है। 
लेकिन न्यूट्रिनो के ये कण केवल सूरज से ही नहीं पैदा होते, इन्हें जेनेवा में जमीन से 100 मीटर नीचे मौजूद दुनिया की सबसे बड़ी भौतिकी प्रयोगशाला सेर्न में बनाया भी जाता है। सेर्न की एक खास एक्सीलरेटर मशीन सुपर प्रोटॉन सिंक्रोटॉन यानि एसपीएस से हर दिन अरबों-खरबों न्यूट्रिनोज की ऊर्जा-किरण पैदा की जाती है। हर दिन न्यूट्रिनोज की ये ऊर्जा-किरण सेर्न से 732 किलोमीटर दूर इटली के बीचोंबीच जमीन के नीचे मौजूद एक दूसरी प्रयोगशाला ग्रान सैसो पार्टिकिल एक्सीलेरेटर की ओपेरा डिटेक्टर मशीन की ओर छोड़ी जाती है। न्यूट्रिनोज की ये किरण मात्र ढाई मिलीसेकेंड में जेनेवा से इटली के बीच की 732 किलोमीटर की दूरी तय कर लेती है। ओपेरा एक्सपेरीमेंट के नाम से सेर्न और इटली के ग्रान सैसो पार्टिकिल एक्सीलरेटर के बीच ये प्रयोग तीन साल से हर दिन दोहराया जा रहा है।
सेर्न की एसपीएस मशीन से न्यूट्रिनोज की बौछार करीब प्रकाश की गति यानि 2,99,792.458 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से छोड़ी जाती है। लेकिन ओपेरा एक्सपेरीमेंट में काम कर रहे वैज्ञानिक तीन साल से एक खास चीज नोटिस कर रहे हैं, जिससे उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं है। जेनेवा से छूटकर इटली के ग्रैन सैसो के डिटेक्टर में पहुंचने वाले न्यूट्रिनोज आइंस्टीन के नियम का पालन नहीं कर रहे हैं। ये न्यूट्रिनोज प्रकाश से भी तेज गति से आकर टकरा रहे हैं। सापेक्षता सिद्धांत के 106 साल के दौरान प्रकाश से तेज गति कभी नहीं देखी गई। फिजिक्स के नियमों के अनुसार ये असंभव है।
ओपेरा एक्सपेरीमेंट के वैज्ञानिकों को पहले लगा कि शायद प्रयोग में कुछ गड़बड़ी है। जेनेवा के सेर्न से लेकर इटली के ग्रान सैसो एक्सिलेरेटर तक हर चीज, हर प्रक्रिया कई-कई बार जांची परखी गई, लेकिन हर बार सेर्न से आने वाले न्यूट्रिनोज की रफ्तार प्रकाश की गति के मुकाबले एक सेकेंड के 60 अरबवें हिस्से जितनी ज्यादा तेज रेकार्ड की गई। प्रकाश की सनातन गति सीमा के उल्लंघन की घोषणा करने से पहले ओपेरा एक्सपेरीमेंट के वैज्ञानिक तीन साल तक अपने प्रयोग की खामियां तलाशते रहे। लेकिन उन्हें प्रयोग में एक भी कमी, एक भी गड़बड़ी नहीं मिली। वैज्ञानिकों ने अब दुनिया के दूसरे वैज्ञानिकों से ये प्रयोग दोहराने की अपील की है। अगर दूसरी प्रयोगशालाओं के नतीजों से भी प्रकाश की गति सीमा के टूटने की बात सामने आ गई, तो ये साइंस की अब तक की सबसे बड़ी खोज और चंद्रमा पर पैर रखने से भी बड़ी उपलब्धि साबित होगी।
सेर्न और ग्रान सैसो के ओपेरा प्रयोग के नतीजों ने वर्तमान और भूतकाल के बीच की सीमारेखा धुंधला दी है। भले ही गणितीय रूप से ही सही, लेकिन समय के पीछे जा सकने और भूतकाल में सूचना भेज सकने की संभावनाएं जगा दी हैं। प्रकाश के वेग का उल्लंघन कर रहे न्यूट्रिनोज ने कार्य-कारण यानि कॉज एंड इफेक्ट के मूलभूत सिद्धांत को ही पलट कर ब्रह्मांड के आधारभूत नियमों के बारे में मानवजाति की अब तक की सारी समझ को ही तहस-नहस कर डाला है।
इटली के ग्रान सैसो में ओपेरा प्रयोग के समन्वयक एंटोनियो रेडिटाटो बताते हैं,प्रयोग के नतीजों से हम भौचक्के हैं, लेकिन इन नतीजों को हम तब तक नई खोज का नाम नहीं दे सकते, जब तक कि दूसरे वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं में इन नतीजों की पुष्टि नहीं कर देते। अगर आप किसी बुनियादी चीज के बारे में बात कर रहे हैं तो आपको बहुत सावधान रहना चाहिए।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पार्टिकिल थ्योरी के विभागाध्यक्ष डॉ. सुबीर सरकार ने प्रतिक्रिया में कहा है, अगर ये नतीजे दूसरी जगह भी साबित हो गए, तो ये मानव इतिहास में अब तक की सबसे विलक्षण घटना होगी। ये कुछ ऐसा है, जिसके बारे में कभी किसी ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। प्रकाश की गति वो आधारशिला है जिसपर स्पेस और टाइम के बारे में हमारी सारी समझ टिकी है। सही मायनों में जो ये बताता है कि कॉज के बाद ही इफेक्ट आता है। यानि कोई भी कार्य बिना किसी कारण के नहीं हो सकता। कभी ऐसा नहीं हो सकता कि इफेक्ट पहले आ जाए और उसका कॉज बाद में, पूरे ब्रह्मांड का जन्म ही इसी बुनियाद पर हुआ है। अगर कार्य-कारण सिद्धांत भंग होता है तो फिर हम नहीं समझ पाएंगे कि ब्रह्मांड का जन्म कैसे हुआ। ये काफी अराजक स्थिति होगी। 
भौतिकशास्त्री डॉ. एलेन कॉस्टेलेकी और उनकी टीम ने 1985 में प्रस्तुत एक सिद्धांत में बताया था कि निर्वात में मौजूद एक अज्ञात क्षेत्र से संपर्क कर न्यूट्रिनो प्रकाश की गति सीमा को तोड़ सकते हैं। इंडियाना यूनिवर्सिटी में प्रकाश की गति से भी तेज जाने की संभावना तलाशने के एक रिसर्च में शामिल डॉ. कॉस्टेलेकी कहते हैं, हालांकि भौतिकशास्त्री अब दूसरी जगहों पर पुष्टि होने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन ऐसे नतीजों का आना ही अपनेआप में काफी रोमांचक है। इस प्रयोग की पृष्ठभूमि में ये भी कहा जा सकता है कि हम ब्रह्मांड में जिस सबसे तेज रफ्तार की बात अब तक करते आए थे मुमकिन है कि वो रफ्तार प्रकाश के बजाय न्यूट्रिनोज की हो। हम सबसे तेज रफ्तार का मालिक अब तक प्रकाश को समझते रहे, और अब असलियत सामने आई है कि असली चीज तो न्यूट्रिनो है।
डॉर्टमंड यूनिवर्सिटी के फिजिसिस्ट हेनरिक पाएस एक अनोखा मॉडल पेश करते हैं, जिससे ग्रान सैसो के नतीजों को समझने में मदद मिलती है। हेनरिक कहते हैं कि मुमकिन है कि सेर्न से छूटने वाले न्यूट्रिनोज स्पेस और टाइम में एक अतिरिक्त डायमेंश के जरिए एक शॉर्टकट बनाकर इटली के ग्रान सैसो पहुंच रहे हों। इससे ग्रान सैसो के ओपेरा डिटेक्टर में काम करने वाले वैज्ञानिकों को यही महसूस होगा कि न्यूट्रिनो प्रकाश की गति से तेज सफर कर रहे हैं।
सेर्न और इटली के ग्रान सैसो के प्रयोग को जापान के टीटूके और अमेरिका में शिकागो के नजदीक फर्मीलैब में माइनॉस एक्सपेरीमेंट के जरिए दोहराया जा रहा है। और इस न्यूट्रिनोज के प्रकाश की गति से तेज चलने या ना चलने के बारे में पहला समाचार अब यहीं से मिलेगा। इस सिलसिले में खास बात ये है कि 2007 में माइनॉस एक्सपेरीमेंट के वैज्ञानिकों ने न्यूट्रिनोज के प्रकाश की गति से भी तेज चलने का दावा किया था, लेकिन दूसरी प्रयोगशालाओं में इसकी पुष्टि नहीं हो सकी थी। 

रविवार, 18 सितंबर 2011

गिर रहा है 6.5 टन का सेटेलाइट


आपको शायद जानकर हैरानी हो कि मानव निर्मित 2200 टन कबाड़ पृथ्वी की कक्षा में मौजूद है। पृथ्वी की कक्षा में सेटेलाइट भेजने वाले देशों की संख्या बढ़ती जा रही है। नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर की 1997 की सेटेलाइट सिचुएशन रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी की कक्षा में करीब 25000 सेटेलाइट्स मौजूद हैं। चिंता की बात ये कि इनमें से 16000 से ज्यादा सेटेलाइट्स बहुत पहले काम करना बंद कर चुके हैं और अब ये दूसरे सेटेलाइट्स के लिए खतरा बन गए हैं।
ये डेटा 14 साल पुराना है और एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक पृथ्वी की कक्षा में मौजूद सेटेलाइट्स की संख्या करीब 35000 तक हो चुकी है। हाल ही में यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने 20 साल तक काम कर चुके अपने सेटेलाइट ईआरएस-2 को रिटायर कर दिया। इसी बीच एक दूसरी खबर नासा से आई कि 20 साल पहले अंतरिक्ष भेजा गया उसका एक भारी-भरकम सेटेलाइट अब बेकाबू होकर धरती पर गिर रहा है। इस सेटेलाइट का नाम है अपर एटमॉस्फियर रिसर्च सेटेलाइट यानि यूएआरएस और इसे 20 साल पहले 1991 में अंतरिक्ष भेजा गया था। इस गिरते हुए सेटेलाइट पर लगातार नजर रख रहे नासा के वैज्ञानिकों ने जानकारी दी है कि साढ़े छह टन वजनी ये बेकाबू सेटेलाइट 23 सितंबर को धरती के वातावरण में प्रवेश कर सकता है। लेकिन, सबसे बड़ा खतरा ये कि वैज्ञानिक नहीं जानते कि ये अनियंत्रित सेटेलाइट, जमीन पर गिरेगा या फिर समुद्र में।
सेटेलाइट यूएआरएस दूसरे सामान्य सेटेलाइट के मुकाबले काफी भारी-भरकम है। इसकी लंबाई 10 मीटर और वजन करीब 6.5 टन है। पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में मौजूद ओजोन लेयर का अध्ययन करना इस सेटेलाइट का मकसद था और इसकी मदद से 20 साल तक हम ओजोन लेयर के बारे में गहराई से अध्ययन करने में कामयाब भी रहे। लेकिन, 20 साल तक धरती के ऊपरी वायुमंडल का अध्ययन करने के बाद अब इसका ईंधन खत्म हो गया है और इसे निर्देशित करने वाले कंप्यूटर्स फेल हो चुके हैं। धरती से इस सेटेलाइट का संपर्क टूट चुका है और अब साढ़े छह टन का ये सेटेलाइट हर दिन धरती की ओर गिरता चला जा रहा है।
नासा के ऑरबिटल डेबरीज प्रोग्राम के चीफ साइंटिस्ट निक जॉनसन के मुताबिक कोई भी ये ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि ये सेटेलाइट धरती पर कहां गिरेगा। वैज्ञानिकों ने इस सेटेलाइट का मलबा किसी बस्ती पर गिरने की आशंका 3,200 में 1 जताई है। लेकिन वैज्ञानिकों ने ये भी कहा है कि इससे घबराने की जरूरत नहीं है। क्योंकि अंतरिक्ष अभियान के 54 साल के इतिहास के दौरान सेटेलाइट के गिरते मलबे से कभी किसी को चोट नहीं लगी है।
ताजा जानकारी के मुताबिक ये भारी-भरकम सेटेलाइट यूएआरएस इस वक्त ऐसी कक्षा में है जो छह महाद्वीपों और तीन महासागरों के ऊपर से गुजरती है। नासा के वैज्ञानिक इस गिरते हुए सेटेलाइट की लगातार निगरानी कर रहे हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वायुमंडल में रीइंट्री के दौरान इस सेटेलाइट का ज्यादातर हिस्सा जल जाएगा, लेकिन फिर भी आशंका है कि इससे कुछ बड़े टुकड़े छिटक सकते हैं।
 इस सेटेलाइट में 150 किलो से ज्यादा वजन वाले 26 भारी-भरकम कलपुर्जे ऐसे हैं जो वातावरण में प्रवेश के दौरान सेटेलाइट से छिटक कर धरती तक पहुंच सकते हैं। ताजा अनुमान के मुताबिक इस सेटेलाइट के टुकड़े उत्तरी कनाडा से लेकर दक्षिणी अमेरिका तक 800 किलोमीटर के दायरे में बिखर सकते हैं। ये सेटेलाइट इतना विशाल है कि इसके वायुमंडल में प्रवेश करते ही लोगों को दिन की रोशनी में भी एक फॉयरबाल का नजारा दिख सकता है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी जारी की है कि इस सेटेलाइट से छिटके टुकड़े अगर किसी को मिलें तो उन्हें छूने के बजाय स्थानीय प्रशासन को इसकी खबर दें।  

बुधवार, 31 अगस्त 2011

इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन मुसीबत में


अंतरिक्ष में लगभग चार सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर पृथ्वी की अग्रिम चौकी की तरह काम कर रहे इंटरनैशनल स्पेस स्टेशन के अस्तित्व पर अचानक गंभीर खतरा मंडराने लगा है। मौजूदा सदी के करीब ग्यारह वर्षों में लगातार इस पर कुछ न कुछ अंतरिक्ष यात्री मौजूद रहे हैं, लेकिन आने वाले दिनों में यह सिलसिला शायद कायम न रह पाए। स्पेस स्टेशन और धरती के बीच नियमित आवाजाही की व्यवस्था नासा की जिस शटल सेवा पर टिकी थी, उसे अमेरिकी सरकार के एक फैसले के तहत समाप्त किया जा चुका है। शटल की अनुपस्थिति में इंटरनैशनल स्पेस स्टेशन धरती से संपर्क के लिए पूरी तरह से रूस के सोयुज यानों पर निर्भर करता है। लेकिन रूसी अंतरिक्ष कार्यक्रम में इधर मात्र एक हफ्ते में हुई दो दुर्घटनाओं ने इस भरोसे को छिन्न-भिन्न कर दिया। सोयुज के प्रक्षेपण के लिए रूस जिन नए रॉकेटों का इस्तेमाल करने जा रहा था, उन्होंने पिछले 18 अगस्त और 24 अगस्त को दगा दे दिया और दो बहुत महंगे व महत्वपूर्ण प्रक्षेपणों को धूल में मिला दिया। ऐसे में रूस ने इन रॉकेटों की गड़बड़ियों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हुए बगैर कोई और प्रक्षेपण न करने की घोषणा कर दी है।
स्पेस स्टेशन पर फिलहाल कुल छह अंतरिक्ष यात्री मौजूद हैं और अगले दो महीनों के लिए उनके पास रसद-पानी भी है। वहां से धरती पर उनकी वापसी में भी कोई बड़ी समस्या नहीं है, क्योंकि इमर्जेंसी के लिए स्पेस स्टेशन पर दो सोयुज यान हमेशा तैयार रखे जाते हैं। असल मुश्किल यह है कि स्टेशन को बिल्कुल खाली रखने पर इसे एक-दो महीने से ज्यादा समय तक बचाए रखना संभव नहीं हो पाएगा।
शीतयुद्ध के बाद की एकीकृत दुनिया के प्रतीक के रूप में सोलह देशों के संयुक्त प्रयास से करीब डेढ़ दशक में तैयार हुआ इंटरनैशनल स्पेस स्टेशन किसी फुटबॉल फील्ड जितना लंबा-चौड़ा और कुतुब मीनार से भी ज्यादा ऊंचा है। किसी भरी हुई मालगाड़ी जितने वजन वाला यह विराट ढांचा जमीन से सैकड़ों किलोमीटर दूर बिल्कुल अधर में 18 हजार मील प्रति घंटे की रफ्तार से घूम रहा है। इस स्पेस स्टेशन में लगातार चलने वाले शोधकार्यों ने विज्ञान की लगभग सभी शाखाओं को समृद्ध किया है।
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टिप्पणियों के लिए धन्यवाद,  मौका मिलने के बावजूद भारत इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का निर्माण और संचालन करने वाले 16 सदस्य देशों के ग्रुप में शामिल नहीं हो सका । माधवन नायर जब इसरो के प्रमुख थे तब स्पेस स्टेशन के अभियान में भारत के भी शामिल होने की बात चल रही थी। सब कुछ ठीक था और भारत को स्पेस स्टेशन में भागीदारी करने वाले 16 वें और अकेले एशियाई देश होने का गौरव मिलने ही वाला था कि तभी अज्ञात कारणों से हम ये सम्मान नहीं पा सके - संपादक

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

सप्तऋषि का ‘8वां सितारा’


सुपरनोवा नजर आने की दुर्लभ घटना
हम जल्दी ही एक अदभुत खगोलीय घटना के साक्षी बनने जा रहे हैं। दूर अंतरिक्ष में सुपरनोवा धमाके के साथ एक सितारे की मौत हुई है और इस जबरदस्त धमाके से निकली ऊर्जा की चमक अब हम तक पहुंच रही है। हमारे जाने-पहचाने सप्तऋषि तारामंडल में जल्दी ही आठवें ऋषि यानि एक और चमकीले सितारे के दर्शन होने जा रहे हैं। ये चमकीला सितारा यानि सप्तऋषि का आठवां ऋषि यही सुपरनोवा होगा।
किसी सुपरनोवा के नजर आने की घटना बेहद दुर्लभ है और 24 साल यानि एस्ट्रोनॉमर्स की पूरी एक पीढ़ी के बाद अब ये मौका आया है जब हम सुपरनोवा धमाके को धरती से देख सकेंगे। ये सुपरनोवा हमारी पृथ्वी से 2 करोड़ 10 लाख प्रकाशवर्ष दूर है, लेकिन अगर इस दूरी को मानक सीमा मानते हुए एक काल्पनिक गोल दायरा खींचें तो बीते 40 साल में सुपरनोवा जैसी घटना इस दायरे में नहीं हुई थी। इस दायरे में सुपरनोवा की घटना पहली बार हुई है। हमारी आकाशगंगा मिल्की-वे में 1604 के बाद से अब तक कोई सुपरनोवा विस्फोट नहीं हुआ है। हमारी आकाशगंगा में 1604 में हुए सुपरनोवा विस्फोट के बारे में रिकार्डों में दर्ज है आसमान में चमकते एक सितारे के रूप में इसकी तेज चमक दिन में भी दिखाई देती रही थी।
अंतरिक्ष में सबसे चमकीला और सबसे शक्तिशाली ऊर्जा का विस्फोट है सुपरनोवा। सुपरनोवा घटना की मदद से ही वैज्ञानिक ब्रह्मांड के लगातार फैलाव का अध्ययन करते हैं। कैलीफोर्निया में माउंट पालोमर ऑब्जरवेटरी के स्वनियंत्रित स्काई सर्वे पालोमर ट्रांसिएंट फैक्ट्री (PTF) पर काम करने वाले एस्ट्रोनॉमर्स 2 करोड़ 10 लाख प्रकाशवर्ष दूर पिनव्हील गैलेक्सी (M101) का सर्वे कर रहे थे, कि तभी उन्होंने यहां सुपरनोवा की इस दुर्लभ घटना को अपनी आंखों से घटते हुए देखा और इसे रिकार्ड कर लिया। सुपरनोवा को इससे पहले कभी उसके ऐन घटते वक्त रिकार्ड नहीं किया गया था।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एस्ट्रोनॉमी प्रोफेसर और पालोमर ट्रांसिएंट फैक्ट्री के कोलेब्रेटर मार्क सुलिवान कहते हैं, सुपरनोवा जैसी घटना को इतने करीब घटते देखकर हम बेहद रोमांचित हैं। सबसे अनोखी बात ये है कि सुपरनोवा विस्फोट हमने आंखों के सामने घटते देखा है।
आने वाले दिनों में हवाई की मौना केया जैसी ग्राउंड और हब्बल जैसी स्पेस ऑब्जरवेटरीज इस सुपरनोवा का गहराई से अध्ययन करेंगी। कैलीफोर्निया बर्कले की लॉरेंस बर्कले नेशनल लैबोरेटरी के पीटर नुगेंट कहते हैं,अब तक देखा गया IA श्रेणी का ये सबसे शानदार सुपरनोवा है, जो अब भी विस्फोट और फैलाव की प्रक्रिया में है। यही वजह है कि ये सुपरनोवा हर घंटे बदल रहा है और इसके ऑब्जरवेशन और अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों में होड़ सी लग गई है।
आमतौर पर सुपरनोवा यानी जबरदस्त धमाके के साथ सितारे की मौत की घटना तब घटती है जब सितारे का केंद्र या कोर कोलैप्स कर जाती है। लेकिन सितारों में IA श्रेणी का सुपरनोवा विस्फोट तब होता है, जब व्हाइट ड्वार्फ सितारे में सैद्धांतिक सीमा से कई गुना ज्यादा द्रव्यमान इस कदर इकट्ठा हो जाता है जिसे सितारा संभाल नहीं पाता और थर्मोन्यूक्लियर डेटोनेशन की प्रक्रिया शुरू होकर सुपरनोवा के जबरदस्त धमाके को जन्म दे देती है। साइंस के लिए ये घटनाएं बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि इनकी मदद से वैज्ञानिक दो आकाशगंगाओं के बीच की दूरी की गणना करते हैं और पुराने डेटा से तुलना करके ये पता लगाते हैं कि क्या आकाशगंगाओं के बीच की दूरी उतनी ही है, या फिर इसमें कोई बदलाव आया है। आकाशगंगाओं के बीच की दूरी में आया बदलाव ये बताता है कि ब्रह्मांड के फैलने की रफ्तार क्या है। 
दूर-दराज की आकाशगंगाओं में हुए IA श्रेणी के सुपरनोवा धमाके के अध्ययन से 1998 में एक चौंकाने वाली बात सामने आई। वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि बह्मांड के फैलने की रफ्तार लगातार बढ़ रही है, और इसकी वजह है डार्क इनर्जी की मौजूदगी है। इसके बाद के अध्ययनों से हमें पता चला कि हमारे ब्रह्मांड का मौजूदा आकार डार्क इनर्जी ने ही गढ़ा है।  
सुपरनोवा धमाके के साथ फूटने वाली चमक के स्पेक्टोग्राफी अध्ययन से उस सितारे में मौजूद धातुओं की जानकारी भी मिलती है। सीधा सा नियम ये है कि जिस सितारे में जितना ज्यादा धातुएं मौजूद होंगीं उसके सुपरनोवा में उतनी ही तेज चमक होगी।  
प्रोफेसर मार्क सुलिवान बताते हैं कि सितंबर के पहले हफ्ते तक इस सुपरनोवा की चमक इतनी ज्यादा बढ़ जाएगी कि ये 9 से 10 विजुअल मैग्नीट्यूट वाले सितारे जैसा नजर आने लगेगा। आसमान में इस अनोखे सुपरनोवा को देखने के लिए उर्सा मेजर या बिग डिपर कांस्टलेशन को खोजिए। हम भारतीय इसे सप्तऋषि तारामंडल के नाम से जानते हैं। इस तारामंडल की पूंछ या हैंडल के करीब मौजूद 7 वें सितारे से थोड़ा ऊपर की ओर देखिए, यहीं मौजूद है पिनहोल गैलेक्सी (M101) और अगर आप शहर की जगमगाहट से दूर हैं तो शायद यहीं आपको एक सितारा जगमगाता नजर आ जाएगा, जो असल में कोई सितारा नहीं, बल्कि IA श्रेणी का सुपरनोवा है। अगर आपके पास शक्तिशाली दूरबीन या फिर कोई साधारण टेलिस्कोप है तो सुपरनोवा का ये नजारा और भी खूबसूरत नजर आएगा। 

रविवार, 21 अगस्त 2011

ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य - एंटीमैटर



एंटीमैटर के घेरे में धरती


एंटीमैटर के बारे में पूरी जानकारी


खुद को आईने में देखिए, वहां ठीक आपके सामने कौन है ? आप कहेंगे मेरा प्रतिबिम्ब...कभी सोंचा है कि वहां आईने में जो हू-ब-हू आपके जैसी, लेकिन विपरीत तस्वीर दिख रही है, अगर वो हकीकत बन, आइने से निकल कर सामने आ खड़ी हो, तो उसे क्या कहेंगे ? इस सवाल का जवाब फिजिक्स में मौजूद है, उसे आपका प्रति-व्यक्तित्व (Anti You) कहेंगे। इतना ही नहीं फिजिसिस्टों ने इससे भी कई कदम आगे की अवधारणाएं सामने रखी हैं, कि हमारी दुनिया की तरह कहीं बहुत दूर इसकी एक ‘मिरर इमेज’ यानि बिल्कुल हमारी जैसी एक और दुनिया होगी। प्रति-सितारों (Anti Stars), प्रति-घरों (Anti-Houses) और प्रति-जीवन (Anti-Life, यहां इसका आशय मृत्यु नहीं है) से भरा-पूरा एक प्रति-विश्व या एंटी वर्ल्ड भी होगा। हमारी दुनिया, ये संपूर्ण ब्रह्मांड पदार्थ यानि मैटर से बना है, जबकि वो दूसरी दुनिया इस पदार्थ की विपरीत अवस्था यानि प्रति-पदार्थ या एंटीमैटर से बनी होगी।
अब एंटीमैटर से जुड़ी एक ताजा खबर, यूरोपियन सेटेलाइट पामेला ने हमारी धरती के चारों ओर पहली बार एंटीमैटर की बेल्ट खोजी है। ये खोज इतनी अनोखी है कि साइंस की दुनिया में इसे अब तक हुई सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक समझा जा रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टिकिल कोलाइडर प्रयोगशाला सर्न और फर्मीलैब में वैज्ञानिक एंटीमैटर पैदाकर उसे समझने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन धरती के करीब ही एंटीमैटर की खोज ने एक नई हलचल पैदा कर दी है। एंटीमैटर की खोज से घबराने की जरूरत नहीं, इससे हमारी धरती को कोई खतरा नहीं है, क्योंकि धरती के चारों ओर मौजूद इस बेल्ट में एंटीमैटर की मात्रा काफी कम है।
 ये दुनिया, ये ब्रह्मांड दो विपरीत शक्तियों का एक अनोखा संयोग भर है। प्रकाश-अंधकार, निर्माण-विध्वंस-पुनर्निमाण, दिन-रात, अच्छाई-बुराई, शिव-शक्ति, ऋणावेश-धनावेश, इनर्जी-डार्क इनर्जी और मैटर-एंटीमैटर।
आइए, अब समझते हैं कि एंटीमैटर आखिर है क्या ? पदार्थ के तीन स्वरूप हैं, ठोस, द्रव और गैस और हमारे चारों ओर मौजूद सभी चीजें और हम खुद पदार्थ के इन्हीं तीनों स्वरूपों से रचे हैं। सैकड़ों ईंटों से बनी किसी दीवार और अनगिनत बूंदों से बने महासागर की तरह पदार्थ के ये तीनों स्वरूप भी छोटी-छोटी ईंटों से बने हैं। लेकिन पदार्थ की ये ईंटें इतनी सूक्ष्म हैं कि इन्हें हम सामान्य आंखों से नहीं देख सकते। ये सूक्ष्म ईंटें अणु हैं, जिनकी संरचना परमाणुओं से हुई है और परमाणुओं के भीतर एक और दुनिया है, जहां केंद्र में प्रोटान और न्यूट्रान का नाभिक है, जैसे हमारे सौरमंडल का केंद्र सूरज और ग्रहों की तरह इसकी रिक्रमा करते हुए इलेक्ट्रान्स। परमाणु की सूक्ष्मतम दुनिया और सौरमंडल के विस्तार वाली प्रकृति की इस अनोखी व्यवस्था में एक अदभुत आध्यात्मिक और दार्शनिक समानता है। परमाणु के भीतर झांकने में हमें बस एक दशक पहले ही सफलता मिली है और पता चला है कि परमाणु के भीतर केवल प्रोटान, न्यूट्रान और इलेक्ट्रान ही नहीं, बल्कि 16 या शायद इससे भी ज्यादा अलग-अलग गुण-धर्म वाले ऊर्जा कण मौजूद हैं।
परमाणु के भीतर की ये अनोखी दुनिया लंबे वक्त तक रहस्यों में लिपटी रही, वैज्ञानिक प्रोटान, न्यूट्रान और इलेक्ट्रान के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। तब ब्रिटिश भौतिकशास्त्री पॉल एड्रियन मॉरिस डाइरेक ने परमाणु के भीतर प्रोटान, न्यूट्रान और इलेक्ट्रान की बात सामने रखी और खासतौर पर इलेक्ट्रान के व्यवहार और उसके गुणधर्म का पता लगाया। लेकिन पॉल डाइरेक जो कह रहे थे, वो कुछ अधूरा सा था, ये कमी तभी पूरी हो सकती थी अगर वहां इलेक्ट्रान से मिलता-जुलता, बिल्कुल किसी मिरर इमेज यानि प्रतिबिम्ब की तरह, लेकिन विपरीत आवेश वाला कोई जुड़वां ऊर्जा कण भी मौजूद हो। पॉल डाइरेक ने इसे ‘एंटीइलेक्ट्रान’ या ‘पॉजिट्रॉन’ कहा। इलेक्ट्रॉन ऋणात्मक आवेश वाला ऊर्जा कण है, जबकि इसका प्रतिबिम्ब पॉजिट्रॉन धनावेशित ऊर्जा कण। पॉजिट्रॉन की तरह प्रोटान के एंटीप्रोटान और न्यूट्रान के एंटीन्यूट्रान होने की बात भी सामने आई। पॉजिट्रॉन, एंटीप्रोटान और एंटीन्यूट्रान की अवधारणा इतनी अनोखी थी कि पॉल डाइरेक खुद हतप्रभ रह गए कि आखिर ऐसा अनोखा विचार उन्हें सूझा कैसे? क्योंकि प्रोटान, न्यूट्रान और इलेक्ट्रान के संयोग से पदार्थ बनता है। इसका मतलब ये हुआ कि एंटीप्रोटान, एंटीन्यूट्रान और पॉजिट्रॉन के संयोग से जो चीज बनती है वो पदार्थ की मिरर इमेज या प्रतिबिम्ब यानि एंटीमैटर या प्रतिपदार्थ है।
पॉल डाइरेक ने इसे रोटी बनाने वाले गुंधे आटे की मदद से समझाया। एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने बेलन की मदद से गुंधे आटे की एकसमान पर्त मेज पर फैला दी और एक सांचे की मदद से सितारे के आकार का एक टुकड़ा काटा और उसे हाथ में लेकर सबको दिखाया। पॉल ने कहा, “ ये देखिए मेरे हाथ में एक सितारा है, लेकिन जरा मेज पर आटे की ओर तो देखिए, वहां बिल्कुल मेरे हाथ में मौजूद सितारे से मिलता-जुलता एक सितारा और है। इन दोनों सितारों में फर्क बस इतना है कि मेरे हाथ में एक ठोस सितारा है, जबकि मेज के आटे पर सितारे के आकार का छेद, यानि इस असली सितारे का बिल्कुल विपरीत या फिर एक निगेटिव इमेज (Anti Star)। आप मेज के इस आटे से चाहे जो भी आकार काट कर अलग करें, वहां छेद के रूप में उसकी एक निगेटिक इमेज अपने आप बन जाएगी। मेरे हाथ का ये ठोस सितारा पदार्थ यानि मैटर है, जबकि मेज के आटे पर मौजूद सितारे के आकार का छेद एंटीमैटर।” पाल डाइरेक मानते थे कि इस ब्रह्मांड में मौजूद संपूर्ण पदार्थ के परमाणुओं ने अपने पीछे एक निगेटिव मिरर इमेज यानि एंटीपार्टिकिल बनाते हुए ही जन्म लिया होगा, बिल्कुल आटे के सितारे और मेज के आटे पर मौजूद सितारे के आकार के छेद की तरह।
ऊर्जा ही वो गुंधा हुआ आटा है जिसने इस ब्रह्मांड में मौजूद संपूर्ण पदार्थ को जन्म दिया। हां, इस आटे को काट कर ब्रह्मांड रचने लायक पदार्थ बनाने के लिए कुदरत ने तीन अलग-अलग सांचों प्रोटान, न्यूट्रान और इलेक्ट्रान का इस्तेमाल किया। सबसे अनोखी बात ये कि जब ऊर्जा के आटे से प्रोटान, न्यूट्रान और इलेक्ट्रान सांचे से काटकर बनाए गए, तब हर बार उनके पीछे आटे में छेद के रूप में एक निगेटिव मिरर इमेज यानि एंटीपार्टिकिल भी बनते चले गए। यानि ऊर्जा ने पार्टिकिल और एंटीपार्टिकिल दोनों को एकसाथ जन्म दिया।
 भौतिकशास्त्रियों का मानना है कि पॉल डाइरेक का आइडिया काफी शानदार है और इससे एंटीमैटर की गुत्थी को समझने में काफी मदद मिलती है। लेकिन दुनियाभर के वैज्ञानिक स्कूली बच्चों की तरह होते हैं, वो किसी भी बात को तब तक नहीं मानते जब तक कि उसे साबित नहीं कर लिया जाता। इसलिए जब पॉल डाइरेक ने एंटीपार्टिकिल की मौजूदगी की बात कही, तो भौतिकशास्त्रियों ने उनसे सबूत मांगे। इस तरह दुनियाभर में भौतिकशास्त्री पार्टिकिल कोलाइडर लैबोरेटरी में एंटीमैटर के प्रमाण तलाशने में जुट गए। इस सिलसिले में पहली सफलता तब मिली जब पहला इलेक्ट्रान-पॉजीट्रॉन पेयर बना लिया गया। इसके बाद प्रोटॉन-एंटीप्रोटॉन और न्यूट्रॉन-एंटीन्यूट्रॉन बनाया गया। इससे सबूत मिल गया कि पॉल डाइरेक जो कह रहे थे वो बिल्कुल सच है। प्रकृति में एंटीमैटर मौजूद है और उसका सबूत भी खोज लिया गया। पॉल डाइरेक को बाद में फिजिक्स के नोबेल से भी सम्मानित किया गया।
करीब 100 साल से भी ज्यादा वक्त पहले अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बहुत महत्वपूर्ण खोज की। आइंस्टीन ने 1905 में एक मशहूर समीकरण E=mc2 देकर बताया था कि द्रव्यमान ऊर्जा का ही एक परिवर्तनशील स्वरूप है। उन्होंने बताया कि मैटर यानि पदार्थ कुछ और नहीं बल्कि ऊर्जा का ही बेहद सघन रूप है। ऊर्जा और पदार्थ एक ही चीज के दो रूप हैं, यानि आप पदार्थ से ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं और ऊर्जा से पदार्थ। लेकिन असली सवाल ये कि ऊर्जा को पदार्थ और पदार्थ को ऊर्जा में तब्दील करने का तरीका क्या है ?
कोई भी बड़ी उल्का हमारे सौरमंडल में 30 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से प्रवेश करती है। इस रफ्तार से जब उल्का पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करती है तो उसकी गतिज ऊर्जा तापमान में बदलने लगती है और उसका तापमान 100000 डिग्री सेंटीग्रेड तक या फिर इससे भी ज्यादा बढ़ जाता है। इस बेहद ऊंचे तापमान पर उल्का का ज्यादातर पदार्थ पिघलने लगता है। यानि तेज गति पदार्थ को ऊर्जा में तब्दील करने लगती है।
हमारे पास अभी ऐसी टेक्नोलॉजी नहीं है कि हम प्रकाश की रफ्तार यानि 300,000 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से चलने वाला स्पेसक्राफ्ट बना सकें। लेकिन ऐसा नामुमकिन नहीं है। जेनेवा में मौजूद पार्टिकिल कोलाइडर लैब सेर्न में वैज्ञानिक ऐसा हर रोज कर रहे हैं। भूमिगत प्रयोगशाला सेर्न के लॉर्ज हैड्रॉन कोलाइडर में विपरीत दिशाओं से हाइड्रोजन परमाणु के नाभिकों यानि प्रोटॉन्स की दो बीम्स छोड़कर उनकी रफ्तार प्रकाश की गति तक बढ़ाई जाती है। पिछले साल हुए इस अनोखे प्रयोग में करीब प्रकाश की गति से विपरीत दिशाओं में घूम रही प्रोटॉन बीम्स की जब आपस में टक्कर करवाई गई तो करीब प्रकाश की रफ्तार से हुई प्रोटॉन बीम्स की इस टक्कर से 10,000,000,000,000 डिग्री सेंटीग्रेड से भी भीषण तापमान पैदा हो गया। वैज्ञानिक पहली बार प्रयोगशाला के नियंत्रित माहौल में सृष्टि के जन्म की घटना बिगबैंग को उत्पन्न करने में सफल रहे। इस जबरदस्त टक्कर से बिगबैंग यानि सृष्टि को रचने वाले ऊर्जा के महाविस्फोट ने जन्म लिया और इस जबरदस्त ऊर्जा से मैटर और एंटीमैटर के शुरुआती कण लॉर्ज हैड्रान कोलाइडर मशीन में अगले ही पल पैदा हो गए।
नोबेल फिजिसिस्ट डॉ. मिशियो काकू बताते हैं कि ब्रह्मांड की शुरुआत यानि ऊर्जा के महाविस्फोट बिगबैंग से पदार्थ और एंटीमैटर दोनों ही समान मात्रा में उत्पन्न हुए, लेकिन आपस में संपर्क करते ही एक जबरदस्त विस्फोट के साथ पदार्थ का बहुत बड़ा हिस्सा एंटीमैटर निगल गया और जो पदार्थ बच गया उसने इस पूरे ब्रह्मांड और हमारी रचना की। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये कि कुदरत ने ब्रह्मांड और हमारी रचना करने के लिए पदार्थ को ही क्यों चुना ? एंटीमैटर का चुनाव क्यों नहीं किया गया ? इससे भी बड़ी गुत्थी ये कि क्या हमारे सौरमंडल और आकाशगंगाओं की तरह एंटीमैटर से बने सौरमंडल और आकाशगंगाएं भी हैं ? क्या सामान्य पदार्थ से रचे गए जीवन की तरह कहीं कोई एंटीमैटर से बना जीवन भी मौजूद है ?
जेनेवा की भूमिगत प्रयोगशाला सेर्न में प्रयोग की हर साइकिल (एक मिनट में एक बार) के दौरान वैज्ञानिक 5 करोड़ एंटीप्रोटॉन बनाते हैं, इससे हम कुछ सौ एंटी हाइड्रोजन परमाणु बना सकते हैं। पार्टिकिल एक्सीलेरेटर के खास कॉन्फिगुरेशन की मदद से इनकी मात्रा 10 गुना तक भी बढ़ाई जा सकती है। पढ़ने में शायद ये काफी ज्यादा लगे लेकिन एक साल में सेर्न की लैब में वैज्ञानिक एक ग्राम के अरबवें हिस्से तक का ही एंटीमैटर बना पाते हैं। बनने के बाद एंटीमैटर को ज्यादा समय तक संभाले रखना बेहद कठिन है, क्योंकि एंटीमैटर जैसे ही सामान्य पदार्थ के साथ संपर्क में आता है वो एक स्पार्क के साथ उसे निगल जाता है, इसे एन्हीलेशन कहते हैं। हाल ही में सेर्न में एंटीमैटर को सबसे ज्यादा देर तक बरकरार रखने का रिकार्ड बनाया गया। खास मैगनेटिक कंटेनर की मदद से वैज्ञानिकों ने एंटीमैटर को 10 मिनट तक रोके रखने में कामयाबी हासिल की है।
सिक्के बनाने वाली फैक्टरी में सिक्के वाला सांचा धातु की चादर में बार-बार पंच करके उससे सिक्के काटता है। हर बार पंचिंग के बाद एक सिक्का और धातु की चादर में सिक्के के बराबर एक छेद बन जाता है। जो हाथ में आया वो क्वाइन यानि सिक्का और धातु की चादर में जो सिक्के के बराबर का छेद बन गया वो एंटीक्वाइन यानि प्रतिसिक्का (सिक्के की विपरीत,निगेटिव मिरर इमेज)। कभी ऐसा नहीं हो सकता कि धातु की चादर पर सिक्के के बराबर छेद बनाए बगैर ही सिक्के काट लिए जाएं। इसी तरह ऐसा भी कभी नहीं देखा गया कि केवल पदार्थ या मैटर की ही रचना हो, प्रति-पदार्थ या एंटीमैटर की नहीं। न तो केवल पदार्थ रचा जा सकता है और न ही कभी केवल एंटीमैटर, ये दोनों चीजें हमेशा जोड़े में ही उत्पन्न होती हैं।
ऊर्जा प्रकृति की जमा-पूंजी है जो दो अलग-अलग करेंसी में मिलती है और जिसकी एक्सचेंज दर अपरिमित, यानि प्रकाश की रफ्तार के वर्ग के बराबर है। आइंस्टीन के इस पदार्थ-ऊर्जा समीकरण के मुताबिक एक किलोग्राम पदार्थ को 25,000,000,000 किलोवॉट ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है।
एंटीमैटर की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि ये खुद को पूरा का पूरा यानि सौ फीसदी ऊर्जा में परिवर्तित कर सकता है। जबकि प्रकृति ने सामान्य पदार्थ को ऐसा करने की इजाजत नहीं दी है। मैटर यानि सामान्य पदार्थ केवल अपने एक फीसदी हिस्से को ही ऊर्जा में बदल सकता है। आइंस्टीन के समीकरण के मुताबिक अगर एक किलोग्राम शक्कर या एक लीटर पानी या फिर एक किलो वजन वाली किसी भी चीज को अगर आप पूरी तरह ऊर्जा में तब्दील कर सकें तो इससे इतनी ऊर्जा हासिल हो जाएगी कि आप अपनी कार को एक लाख साल तक बिना रुके लगातार चला सकते हैं। इस हिसाब से महज एक ग्राम पदार्थ से इतनी ऊर्जा मिल सकती है कि एक मध्यम आकार के शहर की एक दिन की ऊर्जा जरूरत पूरी की जा सकती है।
बाह्य अंतरिक्ष से आने वाली कॉस्मिक किरणें ही वो पहले हाई इनर्जी पार्टिकिल्स थे जिनका पहली बार अध्ययन किया गया था। सेर्न और फर्मीलैब जैसी पार्टिकिल कोलाइडर्स लैब्स के बनने से पहले परमाणु के भीतर की अनोखी दुनिया की झलक हमें सबसे पहले कॉस्मिक किरणों के अध्ययन से ही मिली थी। आप कहीं भी हों, कुछ कॉस्मिक किरणें हर दिन-हर सेकेंड हमारे शरीर से आर-पार आती-जाती रहती हैं। कुछ कॉस्मिक किरणों के स्रोत मरते हुए सितारों के भीषण धमाके यानि सुपरनोवा होते हैं, लेकिन ये बताना मुश्किल है कि सारी कॉस्मिक किरणों के स्रोत्र क्या हैं? क्योंकि पृथ्वी पर हर पल- हर दिशा से कॉस्मिक किरणों की लगातार बौछार होती रहती है। अंतरिक्ष से पृथ्वी पर बरसने वाली कॉस्मिक किरणें सबसे पहले वायुमंडल की ऊपरी पर्त से टकराती हैं। कॉस्मिक किरणों के परमाणु प्रकाश की गति से वायुमंडल के परमाणुओं से जा टकराते हैं और इससे भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है, जो आइंस्टीन के समीकरण के अनुसार तुरंत ही मैटर और एंटीमैटर के नए कणों में तब्दील हो जाती है। कॉस्मिक किरणों की हमारे वायुमंडल से टक्कर प्रकृति में एंटीमैटर पैदा होने का सबसे बड़ा जरिया है। 1932 में कार्ल एंडरसन ने कॉस्मिक किरणों का अध्ययन कर पहले एंटीपार्टिकिल एंटीइलेक्ट्रान या पॉजीट्रॉन का पता लगाया था।
मैटर यानि सामान्य पदार्थ और एंटीमैटर का आपस में संपर्क और उनका विलुप्त होकर ऊर्जा में तब्दील हो जाना यानि एन्हीलेशन प्रक्रिया, इस संपूर्ण ब्रह्मांड में ऊर्जा का सबसे जबरदस्त स्रोत है। ये देखा गया है जब इलेक्ट्रान और एंटीइलेक्ट्रान यानि पॉजिट्रॉन आपस में संपर्क कर एक दूसरे को खत्म करते हैं, तब एन्हीलेशन की इस प्रक्रिया से गामा किरणों के रूप में ऊर्जा का विस्फोट सामने आता है।
यूरोपियन स्पेस एजेंसी के सेटेलाइट इंटिगरल यानि इंटरनेशनल गामा-रे एस्ट्रोफिजिक्स लैबोरेटरी ने चार साल तक लगातार ऑब्जरवेशन से पता लगाया है कि हमारी आकाशगंगा के पश्चिमी हिस्से से गामा-रे पॉजिट्रॉन (एंटीइलेक्ट्रान) का चमकीला बादल उमड़ रहा है। संयोग से एंटीपार्टिकिल का ये बादल आकाशगंगा के ऐसे हिस्से में मौजूद है, जहां बहुत सारे बाइनरी स्टार सिस्टम यानि जुड़वां सितारे मौजूद हैं और माना जाता है कि वहां एक बहुत बड़ा ब्लैक होल भी है। नासा के वैज्ञानिक जोर देकर कहते हैं कि ये घूमते हुए बाइनरी स्टार सिस्टम हमारी आकाशगंगा में मौजूद आधे एंटीमैटर या शायद संपूर्ण एंटीमैटर को ठीक उसी तरह जन्म दे रहे हैं, जैसे दही को मथकर मक्खन निकाला जाता है। कोई नहीं जानता कि ब्लैक होल्स और न्यूट्रॉन स्टार्स एंटीमैटर को कि तरह से जन्म दे रहे हैं ? ये भी बहुत बड़ी गुत्थी है कि आखिर ब्लैक होल के भीषण गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के क्षेत्र से एंटीमैटर बाहर निकलने में कामयाब कैसे हुए ? यूरोपियन स्पेस एजेंसी का सेटेलाइट इंटिगरल और नासा की फर्मी गामा-रे स्पेस ऑब्जरवेटरी (ग्लास्ट) इन सवालों के जवाब तलाशने में जुटी है।
एंटीमैटर, यानि पदार्थ का प्रतिबिम्ब और सौ फीसदी खुद को ऊर्जा में बदल सकने की इसकी ताकत ये सबकुछ इतना अनोखा था कि एंटीमैटर की खोज करने वाले पॉल डाइरेक और अन्य वैज्ञानिक भी इसे लेकर भयभीत हो उठे थे। साइंस फिक्शन ने इस परिकल्पना में नए पंख लगा दिए।
अगर आपने अमेरिकी लेखक डैन ब्राउन का उपन्यास 'एंजेल्स एंड डिमॉन्स' पढ़ा है, जिसपर निर्देशक रॉन हॉवर्ड ने इसी नाम से फिल्म भी बनाई है, तो वो पूरी कहानी एंटीमैटर-बम पर ही आधारित है, जिससे वैटिकन को उड़ाने की साजिश रची जाती है। नोबेल फिजिसिस्ट डॉ. मिशियो काकू बताते हैं कि एंटीमैटर-बम की ताकत एटमबम से 100 गुना ज्यादा होगी। क्योंकि एटमबम परमाणु की ताकत के महज एक फीसदी हिस्से का इस्तेमाल करते हैं। जबकि एंटीमैटर-बम परमाणु से उसकी 100 फीसदी ताकत निचोड़ लेता है। महज आधा ग्राम एंटीमैटर में एक टन डाइनामाइट की जबरदस्त ताकत छिपी होती है और महज आधा किलो एंटीमैटर से पूरे भारत देश की तीन दिन की ऊर्जा जरूरत पूरी की जा सकती है। एंटीमैटर बेशकीमती भी है, डॉ. मिशियो काकू के मुताबिक महज 29 ग्राम एंटीमैटर की कीमत है 44 हजार अरब रुपये। एंटीमैटर का इस्तेमाल अब हर दिन मेडिसिन के क्षेत्र में ब्रेन स्कैन के लिए किया जा रहा है। ये भविष्य का ईंधन भी है, मशहूर टीवी सीरियल स्टार ट्रैक का स्पेसक्राफ्ट स्टारशिप इंटरप्राइज एंटीमैटर इंजन से चलता था। अब वैज्ञानिक असलियत में इस संभावना पर काम कर रहे हैं कि क्या यूरेनियम की तरह ही एंटीमैटर का इस्तेमाल भी ईंधन की तरह किया जा सकता है ?
दूसरे ग्रहों और सूरज की तरह हमारी पृथ्वी मैटर यानि पदार्थ से बनी है और पदार्थ को चट कर जाने वाला एंटीमैटर  इसके चारों ओर मौजूद है। लेकिन इससे हमारी धरती और यहां मौजूद पदार्थ से रचे जीवन को कोई खतरा नहीं है। क्योंकि एंटीमैटर धरती को तभी नुकसान पहुंचा सकता है, जब उसकी मात्रा धरती के पदार्थ के बराबर हो। अच्छी बात ये कि धरती के चारों ओर मौजूद एंटीमैटर काफी कम मात्रा में है, यानि हम बगैर किसी खतरे के ऊर्जा हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।    
धरती के चारों ओर मौजूद एंटीमैटर की बेल्ट की खोज बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि इससे एक नए भविष्य की झलक दिखाई देती है, जब हम अपनी ऊर्जा की जरूरतों को धरती की इस बेल्ट में मौजूद एंटीमैटर से पूरा कर पाएंगे। इतना ही नहीं, शायद कुछ पीढ़ियों बाद हम स्टार ट्रैक के स्पेसक्राफ्ट स्टारशिप इंटरप्राइज के जैसा एक स्पेसक्राफ्ट बना सकेंगे। जिसके ताकतवर इंजन्स में पृथ्वी के चारों ओर बिखरे एंटीमैटर का इस्तेमाल किया जाएगा। इस अनोखे एंटीमैटर स्टारशिप की मदद से हम प्रकाश या उससे भी तेज रफ्तार से सितारों के सफर पर जा सकेंगे।

-संदीप निगम

रविवार, 24 जुलाई 2011

धरती से दूर मिला पानी का अथाह भंडार


अगर आपको लगता है कि पृथ्वी के विशाल महासागर इस ब्रह्मांड के विशालतम 'जल भंडार' हैं तो आप गलत हैं। खगोल विज्ञानियों ने ब्रह्मांड के सबसे विशाल जल भंडार का पता लगाया है, जो भाप के बादलों के रूप में है और इन बादलों में मौजूद पानी का भंडार पृथ्वी पर मौजूद जल से 140 अरब गुना ज्यादा है और इसका घनत्व हमारे सूर्य से एक लाख गुना ज्यादा है।
पानी का ये अथाह भंडार मिला है आकाश गंगा के सबसे चमकीले और सबसे सक्रिय केंद्र, क्वासर में...और इसकी खोज की है कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के वैज्ञानिकों ने। क्वासर आकाशगंगा के केंद्र में पाए जाने वाले सबसे चमकीले पिंड होते हैं।
वैज्ञानिकों ने एक विशेष क्वासर APM 08279+5255 के अध्ययन से यहां मौजूद पानी के इस विशालतम भंडार का पता लगाया है। ये क्वासर हमारे सूरज जैसे एक हजार खरब सूरज के बराबर ऊर्जा पैदा करता है। क्वासर की पृथ्वी से दूरी 12 अरब प्रकाश वर्ष है यानी इससे फूट रही रोशनी 12 अरब साल बाद अब पृथ्वी पर पहुंची है। जल भंडार खोजने वाले दल के प्रमुख मैट ब्रैडफोर्ड ने कहा कि इस क्वासर के चारों ओर का वातावरण काफी अदभुत है। ये एक प्रयोगशाला जैसा है जहां ऑक्सीजन और हाइड्रोजन को मिलाकर पानी को बनाने का काम जारी है...लेकिन गर्मी इतनी ज्यादा है कि यहां बनने वाला पानी भाप के बादलों के रूप में इकट्ठा हो रहा है। क्वासर में मौजूद भारी मात्रा में पानी साबित करता है कि पानी केवल हमारी धरती में ही नहीं बल्कि पूरे ब्रह्मांड में मौजूद है। ब्रैडफोर्ड ने कहा कि इस शोध के नतीजों को 'एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स' के अगले अंक में छापा जाएगा। ब्रैडफोर्ड ने कहा कि आकाशगंगा में जलवाष्प मौजूद हैं, लेकिन इनकी मात्रा क्वासार से चार हजार गुना कम है। आकाशगंगा में जल ज्यादातर बर्फ के रूप में है।

शनिवार, 23 जुलाई 2011

मानव अंतरिक्ष अभियान, नई मंजिलों की तलाश में


नासा के स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद मानव अंतरिक्ष अभियान अब नई मंजिलों की तलाश में है । दिसंबर 1972 का अपोलो-17 वो आखिरी मिशन था जो  अंतरिक्षयात्रियों को अंतिम बार चंद्रमा पर ले गया था । इसके बाद अपोलो-18, 19 और 20 मिशन रद्द कर दिए गए क्योंकि स्काईलैब को अंतरिक्ष भेजना था। अपोलो मिशन के बाद स्काईलैब के साथ पृथ्वी की कक्षा में मानव का दखल शुरू हुआ । लेकिन पृथ्वी की कक्षा में मानव की स्थाई मौजूदगी के युगों पुराने सपने को साकार कर दिखाया स्पेस शटल  अभियानों ने । स्पेस शटल यानि अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष ले जाने वाला ऐसा अनोखा स्पेस ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम (एसटीएस) स्पेसक्राफ्ट जिसे रॉकेट की तरह लांच किया जाता था और जो एयरक्राफ्ट की तरह लैंड करता था । अंतरिक्ष के सफर के लिए ऐसा शानदार और बार-बार इस्तेमाल किए जा सकने वाला वाहन अब तक दुनिया में कोई दूसरा नहीं है।

21 जुलाई 2011 को भारतीय समय के अनुसार दोपहर 3 बजकर 21 मिनट पर अंतिम स्पेस शटल अटलांटिस की फाइनल लैंडिंग के साथ ही मानव अंतरिक्ष अभियानों का एक गौरवशाली अध्याय पूरा हो गया। स्पेस शटल ने मानव जाति को धरती से बाहर अंतरिक्ष में एक नए घर की सौगात दी है और वो है इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन । मानव सभ्यता के पूरे इतिहास में ये सबसे बड़ी युगांतरकारी घटना है। 15 अलग-अलग देशों और दुनिया की 5 बड़ी स्पेस एजेंसियों की भागीदारी से स्पेस स्टेशन का सपना साकार हुआ है और इसी के साथ हमने सबके साथ मिल-जुलकर रहने और अंतरिक्ष में  मानवता के विकास के लिए काम करने की नई तमीज सीखी है, आने वाले वक्त में यही बात मानव जाति का भविष्य तय करेगी और ये सब कुछ संभव हो सका है पिछले 30 साल के दौरान हुए नासा के स्पेस शटल की एक के बाद एक उड़ानों से । एक भारतीय होने के नाते ये बात मुझे विचलित करती है कि मौका मिलने के बावजूद हम इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के सदस्य देशों में शामिल नहीं हो सके। माधवन नायर जब इसरो के प्रमुख थे तब स्पेस स्टेशन के अभियान में भारत के भी शामिल होने की बात चल रही थी। सब कुछ ठीक था और भारत को स्पेस स्टेशन में भागीदारी करने वाले 16 वें और अकेले एशियाई देश होने का गौरव मिलने ही वाला था कि तभी अज्ञात कारणों से हम ये सम्मान नहीं पा सके।
स्पेस शटल के साथ इस पूरे मिशन से जुड़ी कई परंपराएं भी अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गईं। स्पेस शटल मिशन पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों को स्पेससूट पहनाने से लेकर शटल के कॉकपिट में उन्हें सीट पर बिठाने और उनकी बेल्ट कसने तक का सारा काम वो साथी अंतरिक्षयात्री करते थे, जिन्हें या तो अगले मिशन में लांच होना होता था, या फिर जिनका चयन बैकअप क्रू के तौर पर किया गया होता था । स्पेस शटल मिशन के सातों अंतरिक्षयात्री जब स्पेससूट पहनकर स्पेस शटल की ओर चलते थे, तो कमांडर सबसे आगे चलता था और वो रास्ते में पड़ने वाली अंतिम चौखट को जरूर छूता था । सौभाग्य की कामना वाली ये परंपरा कैसे शुरू हुई ये बताना मुश्किल है, लेकिन कमांडर के बाद पीछे आ रहे सभी अंतरिक्षयात्री भी अपने हाथ ऊपर उठाकर उस अंतिम चौखट को जरूर छूते थे । अंतरिक्षयात्रियों को स्पेस शटल तक ले जाने के लिए हर बार जो खास बस आती थी उसका रंग हमेशा रजत यानि सिल्वर होता था ।  स्पेस शटल मिशन को सफलता से संचालित कतरने और अंतरिक्षयात्रियों को सुरक्षित वापस ले आने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती थी फ्लाइट डायरेक्टर  की जो अपनी टीम के साथ नासा के ह्युस्टन कंट्रोल रूम से मिशन की कमान संभालते थे । परंपरा ये थी कि स्पेस शटल की लांचिग से ठीक पहले फ्लाइट डायरेक्टर मिशन के बैच वाली एक खास जैकेट पहनते थे, और ये जैकेट तभी उतारी जाती थी जब अंतरिक्षयात्री सकुशल वापस आ जाते थे । इसके अलावा स्पेस शटल भी तब तक लांच नहीं किया जाता था, जब तक कि ह्युस्टन कंट्रोल रूम से फ्लाइट डायरेक्टर शटल कमांडर से हल्का-फुल्का मजाक कर के उन्हें सुरक्षित सफर की शुभकामनाएं नहीं दे देता था। इन सबके अलावा सबसे शानदार परंपरा थी पृथ्वी की कक्षा में मौजूद अंतरिक्षयात्रियों के लिए रोज सुबह बजाई जाने वाली वेक-अप कॉल । स्पेस शटल मिशन के दौरान ह्युस्टन मिशन कंट्रोल रूम रोज सुबह वेक-अप कॉल  यानि अंतरिक्षयात्रियों की पसंद के खास गीत स्पेस शटल में बजाता था । वेक-अप कॉल के साथ ही स्पेस शटल में एक नए दिन की शुरुआत होती थी । अंतरिक्षयात्रियों के लिए बजाए जाने वाले ये वेक-अप कॉल्स सार्वभौम मानव संस्कृति , कला और विज्ञान के अनूठे संगम का सबसे अदभुत उदाहरण हैं।  जब कल्पना चावला अंतरिक्ष में थीं तब कंट्रोल रूम ने उनकी पसंद के वेक-अप कॉल्स में रविशंकर का संगीत और आबिदा परवीन की गजल बजाई थी। ये परंपराएं अब हमेशा याद आएंगी।
नासा के बेड़े में 6 स्पेस शटल थे, जिनमें से एक इंटरप्राइज केवल परीक्षण के लिए बनाया गया था, और पांच दूसरे स्पेस शटल  कोलंबिया, चैलेंजर, डिस्कवरी, अटलांटिस और एंडेवर का इस्तेमाल अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने के लिए किया गया ।  12 जुलाई 1981 को कोलंबिया की टेस्ट फ्लाइट के साथ स्पेस शटलों की उड़ानें शुरू हुई थीं । 1981 में जॉन यंग और रॉबर्ट क्रिपेन शटल कोलंबिया पर सवार हो कर अंतरिक्ष में गए थे । 2 दिन छह घंटे के मिशन में पृथ्वी के 36 चक्कर लगाए गए । तब से अब तक स्पेस शटल 80 करोड़ किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं और इनमें सवार हो कर 350 लोग अंतरिक्ष की सैर कर चुके हैं ।  लेकिन स्पेस शटल उड़ानों को दो बड़ी दुर्घटनाओं के लिए भी याद रखा जाएगा। पहली स्पेस शटल दुर्घटना  28 जनवरी 1986 को हुई,  जिसमें कई स्कूली बच्चे अपनी टीचर क्रिस्टी मैकऑलिफ और छह दूसरे अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में जाते देखने के लिए कैनेडी स्पेस सेंटर में जमा हुए थे । चैलेंजर शटल उड़ान भरने के 73 सेकेंड बाद ही हादसे का शिकार हो गया और सारे यात्री मारे गए । इसके करीब दो दशक बाद 1 फरवरी 2003 को दूसरी बड़ी स्पेस शटल दुर्घटना सामने आई जब स्पेस शटल कोलंबिया पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते हुए हादसे का शिकार हो गया । इसी हादसे में भारत में जन्मी नासा की महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला भी मारी गईं।
इन हादसों ने शटल उड़ानों पर फिर से विचार करने के लिए वैज्ञानिकों को मजबूर किया और तब तय किया गया कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का निर्माण पूरा होते ही नासा अपने बेड़े के तीनों स्पेस शटल्स को रिटायर कर देगा। स्पेस स्टेशन का निर्माण पूरा हो चुका है और अटलांटिस की फाइनल लैंडिंग के साथ नासा ने अपने स्पेस शटल्स भी रिटायर कर दिए हैं।
नासा के स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद अब निजी कंपनियां ऐसे स्पेसक्राफ्ट्स को बनाने में जुटी हैं जो पृथ्वी के आस पास के ग्रहों और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक का सफर तय कर सकेंगे। जब तक ये स्पेसक्राफ्ट  तैयार नहीं हो जाते अमेरिकी वैज्ञानिकों को अपने मानव मिशन के लिए रूस के सोयूज अंतरिक्ष यान पर निर्भर रहना होगा ।
स्पेस शटल के युग की समाप्ति के बाद नासा करोड़ों डॉलर की बचत करने में कामयाब हो जाएगा, लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू भी है। फ्लोरिडा स्थित नासा के स्पेस सेंटर में काम करने वाले हजारों कामगार, इंजीनियर, वैज्ञानिक और अंतरिक्षयात्री बेरोजगार हो जाएंगे। नासा का कहना है कि आगे जब भी कभी अंतरिक्ष यात्रा की जरूरत पड़ेगी, तब इसमें रूसी, यूरोपियन और जापानी रॉकेट के साथ-साथ निजी कंपनियों की मदद ली जाएगी। जाहिर है अब भविष्य में नासा  अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों के विस्तार के लिए इन्हीं देशों की  यानों पर निर्भर हो जाएगा। पिछले कुछ वर्षो से नासा ने धीरे-धीरे स्पेस शटल कार्यक्रमों में लगे 17 हजार कर्मचारियों में कमी करता रहा है। अब इसमें मात्र सात हजार कर्मचारी हैं, लेकिन नासा के स्पेस युग की समाप्ति के बाद ये सात हजार लोग भी बेरोजगार हो जाएंगे। मंदी से जूझ रहे अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है।

भारत का स्पेस शटल कार्यक्रम

चंद्रयान के बाद से ही इसरो मानव अंतरिक्ष अभियान की तैयारियों में जुटा है। नासा के स्पेस शटल की तर्ज पर इसरो भी ऐसे स्पेसक्राफ्ट को विकसित कर रहा है, जिसे अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने और उन्हें सुरक्षित वापस लाने के लिए बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। नासा स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद अब अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ी निजी कंपनियां अपनी तकनीकी महारत के लिए बेसब्री से नया बाजार तलाश रही हैं। ऐसे में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में इन कंपनियों को खासी संभावनाएं नजर आ रही हैं। इसलिए अमेरिकी कंपनियां मानव अंतरिक्ष मिशन और भारतीय स्पेस शटल विकसित करने की योजनाओं पर काम कर रहे इसरो को लुभाने में लगी है।
इस कड़ी में बीते दिनों बोइंग डिफेंस, स्पेस एंड सिक्यूरिटी ने इसरो को लांच एस्केप सिस्टम देने की पेशकश की है जिसके सहारे आपात स्थितियों में अंतरिक्ष यान का चालक दल सुरक्षित वापस लौट सकता है। भारत के साथ तकनीकी सहयोग की संभावनाएं तलाशने के लिए कुछ दिन पहले बोइंग के अधिकारियों ने इसरो अध्यक्ष के.राधाकृष्णन से मुलाकात की है। इसरो पांच साल के भीतर अंतरिक्ष में मानव अभियान भेजने की तैयारी कर रहा है। इसरो कार्यक्रम के मुताबिक करीब 300 किमी ऊपर धरती के निचले परिक्रमा पथ में दो या तीन चालक दल वाला अभियान 2015-16 के बीच भेजा जाना है।