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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

चेर्नोबिल-एक हादसा जिसे हमने भुला दिया


 25 वीं वर्षगांठ पर विशेष

 चेर्नोबिल महज एक न्यूक्लियर दुर्घटना नहीं, बल्कि मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी है
- टाइम मैगजीन 

मेरे दिल में उन सबके लिए गहरा सम्मान है जिन्होंने हादसे के बाद वहां जाकर रिएक्टर सील करने का काम किया...वो सभी जानते थे कि 90 फीसदी संभावना इस बात की है कि रेडिएशन उनकी जान ले लेगा...मुझे खेद है, मैं बोल नहीं पा रहा...और उनमें से ज्यादातर नहीं रहे
- व्लादिमीर नोवोच्शेनोव, नाभिकीय ऊर्जा सलाहकार, पूर्व सोवियत संघ 

26 अप्रैल 1986, आधी रात हो चली थी और साढ़े तीन लाख की आबादी वाला उत्तरी यूक्रेन का शहर प्रिप्यट गहरी नींद में था। लेकिन यहां से 3 किलोमीटर दूर मौजूद सोवियत की शान न्यूक्लियर पॉवर प्लांट चेर्नोबिल की यूनिट नंबर 4 के कंट्रोल रूम में भारी हलचल थी। उस रात रिएक्टर के इंजीनियर एक नए सेल्फ फ्यूलिंग सिस्टम का पहला परीक्षण करने जा रहे थे। ऊपर से आए आदेशों में साफ लिखा था कि ये परीक्षण 700 से 1000 मेगावाट पावर लिमिट के बीच किया जाए, लेकिन उस वक्त ड्यूटी पर मौजूद चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ ने उच्च अधिकारियों को खुश करने के लिए एकतरफा फैसला ले लिया। डिएटलॉफ ने इंजीनियरों को हुक्म दिया कि परीक्षण और भी कम पॉवर लिमिट यानि 200 मेगावॉट पर किया जाए। वहां मौजूद इंजीनियर चीफ इंजीनियर के इस आदेश पर भौचक्के रह गए। ड्यूटी पर मौजूद कुछ इंजीनियरों ने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन डिएटलॉफ जो एक नाभिकीय वैज्ञानिक भी था, वो भड़क उठा। उसके इस फैसले से ड्यूटी पर मौजूद इंजीनियर खुश नही थे, और कंट्रोल रूम में काम कर रहे उनमें से एक ने तो अपना करियर दांव पर लगाकर ये हुक्म मानने से इनकार कर दिया। इसपर डिएटलॉफ ने उसे काम से हटाकर उसकी जगह दूसरे इंजीनियर को तैनात कर प्रयोग शुरू करने का आदेश दिया।
परीक्षण से पहले चेर्नोबिल के रिएक्टर नंबर-4 को बंद किया गया। लेकिन इंजीनियर ये नहीं जानते थे कि रिएक्टर के कोर में पानी बहुत कम है। रात एक बजकर 23 मिनट पर इंजीनियरों ने रिएक्टर कोर को पानी से भरने से पहले ही परीक्षण शुरू कर दिया। कम पॉवर में रिएक्टर ऑन करते ही कोर में जो भी थोड़ा-बहुत पानी था वो तुरंत भाप में बदल गया। पानी के बिना चेर्नोबिल रिएक्टर कोर में मौजूद फ्यूल एसेंबली की 50-50 मीटर लंबी यूरेनियम की 1661 छड़ें दहकने लगीं। चारों तरफ अलार्म बज उठे और चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ समेत कंट्रोल रूम में मौजूद हर आदमी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। इंजीनयरों ने हड़बड़ी में कोर को पानी से भरने का काम शुरू कर दिया। पानी ने जैसे ही कोर में दहकती हुई यूरेनियम की छड़ों का स्पर्श किया, वो तुरंत भाप में बदल गया। चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर में प्रेशर कुकर जैसे हालात बन गए, जहां दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। दहकती हुई यूरेनियम की छड़ें पिघलने लगीं और रिएक्टर कोर में धमाके शुरू हो गए। रेडिएशन से सुलगती भाप का दबाव इस कदर तेज हो उठा कि यूरेनियम की हर छड़ के ऊपर लगे 350 किलो कंक्रीट से बने फ्यूल रॉड कैप उछलने लगे और देखते ही देखते एक जबरदस्त धमाके के साथ पूरा रिएक्टर कोर ही उड़ गया। इस धमाके की ताकत इतनी विनाशकारी थी कि रिएक्टर कोर के ऊपर लगा 1200 टन का सेफ्टी कैप उड़कर दूर जा गिरा। रिएक्टर की जगह एक खौफनाक स्याह गड्ढ़ा बन गया, जिससे रेडिएशन से भरी भाप तेज रफ्तार के साथ बाहर फूट रही थी।
 लेकिन असली आफत तो अब आने वाली थी। कुछ सेकेंड बाद इस भीषण धमाके से बने चेर्नोबिल रिएक्टर के उस स्याह गड्ढ़े से यूरेनियम और ग्रेफाइट जैसे दहकते हुए रेडियोएक्टिव अणुओं की एक बौछार सी फूट पड़ी। ये घातक बौछार वातावरण में एक हजार मीटर तक ऊपर उठती चली गई, जिससे रिएक्टर के ऊपर मौजूद बादल भी रेडिएशन के जहर से भर उठे। न्यूक्लियर ईंधन की इस खौफनाक बौछार ने करीब 700 टन रेडियोएक्टिव पदार्थों को वातावरण में यहां-वहां बिखेर दिया। चेर्नोबिल हादसे से वातावरण में फैल गया जहरीला रेडिएशन हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 100 गुना ज्यादा था। 
दुनिया को इस हादसे की पहली खबर दी समाचार एजेंसी नोवोस्टी के फोटो पत्रकार इगोर कॉस्टीन ने। कॉस्टीन वो पहले शख्स थे जो चेर्नोबिल हादसे के बाद सबसे पहले वहां हेलीकॉप्टर से पहुंचे। ये इगोर कॉस्टीन के कैमरे से ली गई हादसे के बाद चेर्नोबिल रिएक्टर की पहली तस्वीर है। चेर्नोबिल पावर प्लांट की जगह अब एक स्याह गहरा गड्ढ़ा नजर आ रहा था, जिससे लहराती हुई भाप ऊपर उठ रही थी। ये खौफनाक मंजर देखते ही कॉस्टीन समझ गए कि यहां कुछ बहुत बुरा घट चुका है। 
इगोर कॉस्टीन ने बाद में बताया कि उन्होंने रेडियो में एक लाइन की खबर सुनी थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर में कुछ गड़बड़ी आई है। उन्होंने तुरंत कैमरा संभाला और वहां जाकर हेलीकॉप्टर से सर्वे करने का फैसला किया। इगोर ने बताया, “ जल्दी ही हम चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर चार के ऊपर उड़ान भर रहे थे, हालात किस कदर संगीन थे, उस वक्त मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था। मैंने हेलीकॉप्टर की खिड़की खोल ली, जो एक बहुत बड़ी गलती थी। जब मैंने खिड़की खोली मुझे बाहर कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा। चेर्नोबिल रिएक्टर के अवशेष हमारे ठीक नीचे थे। वहां मौत का सन्नाटा छाया था। मैं इतने सदमे में था कि हेलीकॉप्टर की आवाज भी सुनाई नहीं दे रही थी। वहां कुछ नहीं था, बस एक स्याह खौफनाक गड्ढ़ा नजर आ रहा था।” 
27 अप्रैल 1986 की सुबह, प्रिप्यट शहर के बाशिंदे इस बात से बेखबर थे कि रात में कितनी बड़ी कयामत टूट चुकी है। लोग अपने-अपने काम में जुटे थे, बच्चे स्कूल जा रहे थे और आम शहरी जिनमें से ज्यादातर चेर्नोबिल रिएक्टर में काम करने वाले कर्मचारी ही थेस अपनी ड्यूटी पर जाने की तैयारी कर रहे थे। चेर्नोबिल हादसे के 30 घंटे बाद अधिकारियों ने चेर्नोबिल रिएक्टर से महज 3 किलोमीटर दूर मौजूद इस शहर की सुध ली। सुरक्षात्मक उपाय शुरू किए गए और थोड़ी ही देर में धड़धड़ाती हुई करीब एक हजार बसें वहां आ पहुंची। अधिकारियों ने लोगों को शहर तुरंत खाली करने का फरमान सुना दिया। लोगों को अपना सामान लेने के लिए महज दो घंटे का वक्त दिया गया। लोगों को केवल उतना ही सामान साथ ले जाने की इजाजत थी, जितना वो खुद उठा सकते थे। अधिकारियों के इस फरमान से शहर में बेचैनी फैल गई। कुछ ही देर में पूरा शहर बसों पर सवार हो गया। लोग अपनी जिंदगी की पूरी कमाई पीछे छोड़ अनजान मंजिल की ओर चल दिए, ये लोग फिर कभी दोबारा अपने घर वापस नहीं लौट सके। 
प्रिप्यट शहर खाली कराने के बाद पूर्व सोवियत संघ की सेना ने दुनिया का सबसे खतरनाक बचाव अभियान शुरू किया, जिसका मकसद था चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करना। सरकार ने अफगानिस्तान मोर्च से सबसे कुशल पायलट तलब किए और उन्हें चेर्नोबिल रिएक्टर के ऊपर हेलीकॉप्टर उड़ाने का आदेश दिया। सैनिकों के साथ ये पायलट हर उड़ान में बोरिक एसिड मिली 80 किलो बालू की बोरियां भी ले गए। कोशिश ये थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर को कई टन बालू और बोरिक एसिड से भर दिया जाए, जो रेडिएशन को सोख सके। पहले दिन 110 टन बालू रिएक्टर के गड्ढ़े में गिराई गई और अगले दिन 300 टन। चेर्नोबिल के खौफनाक खुले मुंह के ऊपर रेडिएशन की मात्रा जानलेवा स्तर से भी कई गुना ज्यादा थी। लेकिन काम में जुटे सभी सैनिक इस बात को नहीं जानते थे। कई पायलटों ने तो चेर्नोबिल के ऊपर एक दिन में 33 उड़ानें भरीं। इसका नतीजा ये हुआ कि काम में जुटे कई सैनिक और पायलट जहरीली हवा से मारे गए और हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने लगे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को स्टील की मोटी चादरों से ढंकने और सील करने का काम तूफानी रफ्तार से शुरू कर दिया गया। काम में जुटे सभी लोग इस बात को समझ चुके थे कि उनके यहां से जिंदा बच निकलने की संभावना बहुत कम है। लेकिन फिर भी दूसरों की जान बचाने के लिए इन जांबाजों ने अपनी हस्ती दांव पर लगा दी। बस एक मामूली सर्जिकल मास्क पहनकर लोग रेडिएशन का सामना करने के लिए आ डटे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करने का वीडियो शूट करने के लिए रूसी सेना का फोटोग्राफर शेवचेन्को चेर्नोबिल पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर तीन की छत पर चढ़ गया। वहां से उसने अपने कैमरे से शूट किया कि किस तरह लोग रेडिएशन से दहकती रेडियोएक्टिव ग्रेफाइट का हाथों से उठाकर ले जा रहे थे। काम पूरा हो जाने के बाद इस्तेमाल की गई हर चीज, दमकल गाड़ियां, क्रेन, हेलीकॉप्टर सब की सब वहीं की वहीं छोड़ दी गई। क्योंकि सबके सब जहरीले रेडिएशन से भर उठे थे। शेवचेन्को के कैमरे ने जो शूट किया वो शायद दुनिया का सबसे दुखद वीडियो है, क्योंकि चेर्नोबिल से लौटने के 10 दिन के भीतर ही इसे शूट करने वाले फोटोग्राफर शेवचेन्को और इसमें नजर आने वाले हर शख्स की मौत हो गई। इस वीडियो को जिस कैमरे से शूट किया गया था, उस कैमरे को भी शेवचेन्को के साथ कब्र में दफना दिया गया, क्योंकि वो भी रेडिएशन से भर उठा था।
पूर्व सोवियत संघ के सरकारी अखबार प्रावदा में कई दिन बाद इस हादसे की एक छोटी सी खबर छपी, वो भी पेज नंबर तीन के बॉटम में सिंगल कॉलम।
 चेर्नोबिल की बाहरी सीमा पर एक बोर्ड लगा है, जिसमें रूसी भाषा में यात्रियों के लिए सुरक्षित सफर की शुभकामनाएं लिखी हैं। लेकिन इससे आगे 30 किलोमीटर दायरे का पूरा इलाका और चेर्नोबिल के कामगारों का शहर प्रिप्यट वीरान पड़ा है। इस शहर में रेडिएशन की मात्रा इतनी ज्यादा है कि अगले 800 साल तक ये रहने के काबिल नहीं है। फिर भी इन नामुमकिन हालात में भी जिंदगी ने अपने लिए रास्ता बना लिया है।
साढ़े तीन लाख लोगों से ये शहर खाली करा लिए जाने के एक साल बाद करीब 400 बुजुर्गों का एक दल अपने शहर वापस लौट आया था। पुरानी यादों भरे अपने घर में जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने के लिए। 75 साल की ओल्गा गेवरिलेन्कोव भी उन्हीं में शामिल थीं। हैरानी की बात ये कि रेडिएशन से भरे इस शहर में ओल्गा मजे से रह रही हैं। प्रिप्यट शहर की जमीन का एक-एक कण घातक रेडिएशन से भरा होने के बावजूद ओल्गा इसी में अपने लिए सब्जियां उगाती हैं।
सर्दियों में जब बर्फबारी होती है तो प्रिप्यट शहर में रेडिएशन का स्तर काफी कम हो जाता है, क्योंकि बर्फ में ही ये खासियत होती है कि वो रेडिएशन को बेहतर तरीके से रोक सकती है। बर्फ से ढंके प्रिप्यट में अब कुछ टूरिस्ट भी आने लगे हैं। यहां आने वाले लोग दादी ओल्गा से जरूर मिलते हैं, और ओल्गा उन्हें गर्व से बताती हैं, “मैं घर के बाहर जमीन पर आलू और हर वो चीज पैदा कर लेती हूं, जो मुझे चाहिए। धरती जो मुझे देती है, मैं उसे खा लेती हूं। मैं नहीं डरती, मैं अब किसी चीज से नहीं डरती।” 
चेर्नोबिल हादसे की त्रासदी केवल इस शहर तक ही सीमित नहीं रही। रेडिएशन से भरे बादलों ने रेडियोएक्टिव कणों को दूर-दूर तक बिखेर दिया। यूक्रेन, बेलारूस, रूस और कीव रेडिएशन की चपेट में आ गए। चेर्नोबिल हादसे के निशान यूरोप के हर देश में देखे गए। लेकिन इस त्रासदी का सबसे अफसोसनाक पहलू ये रहा कि इतिहास की हर त्रासदी की तरह इसके शिकार भी सबसे ज्यादा बच्चे ही हुए। 

हादसे के वक्त चेर्नोबिल पावर प्लांट में करीब 3500 कर्मचारी मौजूद थे, उनमें से 56 कर्मचारी तुरंत मारे गए

3,50, 000 लोगों को हमेशा के लिए बेघर होना पड़ा

90 बच्चों समेत 4000 लोगों की मौत रेडिएशन से हुई

चेर्नोबिल हादसे में मारे गए लोगों की सही संख्या का अब तक पता नहीं चला

हादसे के बावजूद यूक्रेन सरकार ने चेर्नोबिल के दूसरे रिएक्टरों का इस्तेमाल जारी रखा

चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के सभी रिएक्टर साल 2000 से हमेशा के लिए बंद कर दिए गए 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

गैगेरिन का 108 मिनट का वो सफर, जिसने दुनिया बदल दी


12 अप्रैल 1961, कजाकस्तान का बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, अनजाने भय और आशंकाओं के बीच मानव अंतरिक्ष के गहन अज्ञात में पहला कदम रखने जा रहा था। ऐसे में अपने स्पेसक्राफ्ट वोस्तोक-1 में बैठने से पहले यूरी गैगेरिन ने दुनिया भर के लोगों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाया - 
प्यारे दोस्तों, भले ही आप मुझे जानते हों, या न जानते हों, मेरे हमवतनों और दुनियाभर के लोगों, अगले कुछ मिनटों में एक शक्तिशाली रॉकेट मुझे ब्रह्मांड की सुदूर गहराइयों में ले जाएगा। अंतरिक्ष के सफर पर निकलने से पहले अब इन अंतिम पलों में मैं आपसे क्या कह सकता हूं। अपनी पूरी जिंदगी अब मुझे एक अकेले खूबसूरत क्षण जैसी लग रही है। मैंने जिंदगी में जो कुछ भी किया, जो भी जीया वो सब कुछ बस इस क्षण के लिए ही था। 
विश्व नागरिकों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाने के बाद यूरी गैगेरिन वोस्तोक रॉकेट में सवार होकर विश्व के पहली मानव अंतरिक्ष अभियान पर निकल गए। अंतरिक्ष में पहला मानव मौजूद होने की खबर जब दुनिया को मिली तो सभी अवाक रह गए। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद ये सबसे बड़ी और सबसे गौरवशाली खबर थी, जो पूरी दुनिया में बिजली की तेजी से फैल गई। अमेरिका दंग रह गया, लेकिन राजनयिक-कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर जारी तमाम स्पर्धाओं को दरकिनार कर वाशिंगटन ने बधाई का संदेश मास्को भेजा। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान ने पूरी दुनिया को मानव होने का अर्थ सही मायनों में समझाया और सभी देशों को एकसाथ गर्व की सुखद अनुभूति से भर दिया।   
यूरी गैगेरिन भारत में 
अंतरिक्ष से वापस आने के करीब आठ महीने बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर यूरी गैगेरिन भारत भी आए। भारत में भी गैगेरिन के लिए भव्य स्वागत यात्रा निकाली गई। गैगेरिन की उपलब्धि ने भारत को भी आत्मविश्वास से भर दिया। डॉ. विक्रम साराभाई भी यूरी की अंतरिक्षयात्रा से बहुत प्रभावित हुए और इस नतीजे पर पहुंचे कि एक प्रभावशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान के 8 साल बाद इसरो की स्थापना के साथ भारत ने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू कर दिया। और इसके महज 6 साल बाद अपना पहला सेटेलाइट आर्यभट्ट अंतरिक्ष भेजकर दुनिया को चौंका दिया। यूरी गैगेरिन के सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने खास डाकटिकट भी जारी किए। यूरी ने जब पृथ्वी की पहली परिक्रमा की उस वक्त वो केवल 27 वर्ष के थे। 108 मिनट की उनकी अंतरिक्षयात्रा ने विश्व के युवाओं को इस कदर जोश से भर दिया कि इसके बाद दुनिया ही बदल गई।
स्पुतनिक और स्पेस एज
यूरी के अंतरिक्ष अभियान की पृष्ठभूमि तैयार हुई 4 अक्टूबर 1957 को जब पूर्व सोवियत संघ ने दुनिया का पहला सेटेलाइट स्पुतनिक पृथ्वी की कक्षा में भेजा। स्पुतनिक के साथ दुनिया में अंतरिक्ष युग की शुरुआत हुई, जिसे सोवियत वैज्ञानिकों ने आगे बढ़ाया 3 नवंबर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में जीवन का पहला रूप मादा कुत्तालाईकाको भेजकर। अंतरिक्ष के माहौल में लाईका केवल 6 घंटे ही जीवित रह सकी, उसके चैंबर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाने की वजह से उसकी मौत हो गई। लाईका नहीं रही, लेकिन वो जिंदगी को अंतरिक्ष का रास्ता दिखा गई। अमेरिका एक बार फिर पिछड़ चुका था, लेकिन सोवियत जानता था कि अब अमेरिका दुनिया को चौंकाने वाला कोई बड़ा कारनामा जरूर करेगा। साम्यवादी सरकार हर कीमत पर अमेरिका को पछाड़ने पर आमादा थी। वक्त कम था और जल्दी ही कुछ बड़ा कर दिखाना था।
मिशन वोस्तोक और मिशन मरकरी
जनवरी 1959 को पूर्व सोवियत संघ ने इंसान को अंतरिक्ष भेजने के लक्ष्य के साथ एक अहम कार्यक्रम शुरू किया, जिसका नाम था वोस्तोक। इसके ठीक तीन महीने बाद अमेरिका ने भी अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने के लिए मिशन मरकरी का ऐलान कर दिया। अब पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका में इस बात की होड़ तेज हो गई कि पहले अंतरिक्षयात्री को अंतरिक्ष भेजने में बाजी कौन मारता है। 
अमेरिका की तरह पूर्व सोवियत संघ ने भी अंतरिक्षयात्रियों को चुनने के लिए वायुसेना के पायलट्स को ही लेने का फैसला लिया। पूर्व सोवियत संघ ने गुपचुप ढंग से सारी तैयारियां शुरू कर दीं और देशभर से वायुसेना से सबसे कुशल 2000 पायलट्स को बुला भेजा। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम वोस्तोक के चीफ सेर्गेई कोरोलेव ने इन 2000 में से 200 पायलट्स का चुनाव किया और कड़े इम्तहान के बाद इन 200 में से 20  कैडेट्स को चुना गया। लेकिन किसी को भी ये नहीं बताया गया कि उन्हें करना क्या है। 20 लोगों की इसी टीम में शामिल थे सोवियत एयरफोर्स के सीनियर लेफ्टिनेंट यूरी गैगेरिन।
महज 5 फुट 2 इंच के कद वाले यूरी साथियों के बीच अलग ही नजर आते थे। मजाकिया स्वभाव के साथ उनकी सबसे बड़ी पहचान थी चेहरे पर हर वक्त खिली रहने वाली एक ताजगी भरी मुस्कान। 20 में से यूरी गैगरिन समेत 6 फाइनल कैडेट्स का चुनाव किया गया और तब उन्हें बताया गया कि उन्हें कॉस्मोनट यानि अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जा रहा है। 18 जून 1960 को पहली बार इन सभी छह लोगों को वोस्तोक रॉकेट दिखाया गया। अब जाकर इन्हें पता चला कि छह में से किसी एक भाग्यशाली को दुनिया का पहला अंतरिक्षयात्री बनने का मौका मिलेगा।
यूरी गैगेरिन जिस वक्त अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण ले रहे थे, उस वक्त तक न तो अच्छे कंप्यूटर्स थे, और न ही वो टेक्नोलॉजी जो एक इंसान को अंतरिक्ष भेजकर सुरक्षित वापस ला सकती थी। उस वक्त तक तो हमें अंतरिक्ष में विकिरण के खतरों की भी सही जानकारी नहीं थी और अंतरिक्ष के खतरनाक माहौल में जिंदगी की हिफाजत करने वाले अच्छे स्पेससूट की तो बात छोड़िए, सुरक्षित हेलमेट तक नहीं थे। ऐसे में एक इंसान को अंतरिक्ष भेजना एक राजनीतिक जिद के सिवाय कुछ नहीं था। राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं इस कदर हावी थीं कि अंतरिक्षयात्री की सुरक्षा जैसे सवाल बेमानी थे।
यूरी का चुनाव
11 महीने का अंतरिक्षयात्री प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, अब आई बारी अंतरिक्ष के पहले सफर के लिए 6 में से एक कॉस्मोनट को चुनने की। चयनकर्ताओं के सामने दो अंतिम नाम थे यूरी गैगेरिन और घेरमान तितोव। तितोव एक शिक्षक के बेटे थे, जबकि यूरी के पिता एक किसान थे। साम्यवादी सरकार ने दुनिया के पहले अंतरिक्षयात्री के तौर पर तितोव के बजाय मेहनतकश किसान के बेटे यूरी का चुनाव किया। पहली अंतरिक्षयात्रा के लिए यूरी के चुनाव की एक वजह और भी थी। दरअसल वोस्तोक कैप्स्यूल के कॉकपिट में लंबे कद के अंतरिक्षयात्री के लिए जगह ही नहीं थी। जबकि मजह 5 फुट 2 इंच कद वाले यूरी इस छोटे से कॉकपिट के लिए बिल्कुल फिट थे।
यूरी लंबे वक्त से घर से बाहर थे। हाल ही में उनकी बेटी लेना का जन्म हुआ था। लेकिन यूरी परिवार को ये नहीं बता सकते थे कि वो कहां हैं और क्या कर रहे हैं। अंतरिक्षयात्रा पर निकलने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी वेलेंटीना गोर्याचेवा को खत लिखा-
मेरी प्यारी, तुमसे और बच्चों से मिलने को मैं बेकरार हूं...मैं देश के प्रति अपना फर्ज निभा रहा हूं...मैं एक ऐसे सफर पर जाने वाला हूं, जिसका ख्वाब मैं बचपन से देखता रहा हूं...ये कुछ ऐसा है जिसपर हम हमेशा गर्व करेंगे...इसमें कुछ खतरे भी हैं...लेकिन कई बार लोग अपने कमरे में टहलते हुए भी फिसल जाते हैं और उनकी जान खतरे में आ जाती है...बड़ी बात वो मकसद है, जिसके लिए हम खुद को दांव पर लगा दें...मुझे यकीन है कि मैं इस सबसे बड़े इम्तहान से विजेता बनकर तुम्हारे और बच्चों के पास लौट आउंगा....नन्हीं लेना को मेरा प्यार देना....तुम्हारा...यूरी।
 12 अप्रैल 1961, बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, कजाकस्तान। वो एतिहासिक दिन आ पहुंचा, यूरी ने दुनिया के नाम अपना संदेश रिकार्ड करवाया और ड्रेसिंग रूम में आ गए, जहां स्पेस सूट पहनने में साथियों ने  यूरी गैगेरिन की मदद की। स्पेस सूट पहन लेने के बाद यूरी को लांच पैड तक ले जाने के लिए एक खास बस में बिठाया गया। बस में यूरी के साथ बतौर बैकअप कॉस्मोनट घेरमान तितोव भी स्पेस सूट पहनकर पीछे की सीट पर बतौर बैकअप पायलट मौजूद थे। तभी एक साथी  इवानोव ने सौभाग्य के लिए एक चॉकलेट खिलाकर यूरी का मुंह मीठा कराया। बस कॉस्मोड्रॉम की ओर चल दी, और इसके साथ ही तितोव के दिल में एक तूफानी हलचल भी शुरु हो गई।
तितोव किसी भी मायने में यूरी से कम नहीं था, लेकिन इतिहास रचने का मौका यूरी को मिल रहा था। तितोव ने कई साल बाद एक इंटरव्यू में बताया कि जब तक यूरी बस से उतरकर रॉकेट की ओर नहीं चले गए, तब तक उन्हें यही लगता रहा कि शायद अगले ही पल कुछ ऐसा हो जाएगा, कि यूरी की जगह अंतरिक्ष जाने का मौका उन्हें मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बस कॉस्मोड्रॉम पहुंची, यूरी बस से उतरे और उन्होंने वहां मौजूद सैन्य अधिकारियों और मिशन वैज्ञानिकों को अपना परिचय देने की औपचारिकता निभाई। तितोव बस में ही बैठे रहे, उनके लिए अब कोई उम्मीद नहीं बची और यूरी एक नया इतिहास रचने के लिए रॉकेट की ओर बढ़ गए। तितोव ने निराशा में आंखें बंद कर लीं और एक झपकी लेने में खो गए।
कॉस्मोड्रॉम में आला सरकारी और फौजी अफसरों के साथ सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ सेर्गेई कोरोलेव भी मौजूद थे। खतरों से भरे इस सफर के लिए यूरी का चुनाव उन्होंने ही किया था। कोरोलेव भावुक हो उठे, क्योंकि वो ये बात बखूबी जानते थे कि इस सफर से यूरी के जिंदा वापस आने की संभावना 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। फिरभी यूरी से विदा लेते वक्त उन्होंने स्नेह के साथ कहा, यूरी वापस लौट के आना।
दोस्त ने निभाई दोस्ती
दुनिया की इस पहली अंतरिक्षयात्रा के दौरान वोस्तोक में यूरी के पूरे सफर का नियंत्रण ग्राउंड कंट्रोल के हाथों में था। यूरी को तब तक नियंत्रण हाथ में लेने की इजाजत नहीं थी, जब तक कि कोई आपात स्थिति सामने न आ जाए। आपात स्थिति में यूरी एक खास कोड के जरिए नियंत्रण हाथ में ले सकते थे, लेकिन ये खास कोड सेना के जनरल समेत बस दो-तीन लोगों को ही मालूम था और किसी इमरजेंसी से पहले यूरी को ये कोड न बताने की सख्त ताकीद की गई थी। कोरोलेव से गले मिलने के बाद यूरी रॉकेट पर ले जाने वाली लिफ्ट में सवार हो गए। वोस्तोक कैप्स्यूल में यूरी को बिठाने की जिम्मेदारी निभाई यूरी के एक दोस्त इंजीनियर ने। यूरी को बिठाने के दौरान उसने अपनी दोस्ती निभाई और अपनी जान जोखिम में डालकर यूरी के कान में चुपके से वो इमरजेंसी कोड बता दिया, जिसकी मदद से आपात स्थिति आने पर यूरी नियंत्रण अपने हाथों में ले सकते थे। इसपर यूरी मुस्कुराए और बोले,मैं, जानता हूं, जनरल ने मुझे पहले ही कोड बता दिया है।
रॉकेट लांच होने में अभी कुछ वक्त था। वोस्तोक कैप्स्यूल में बैठकर यूरी कंट्रोल रूम में मौजूद साथियों से माइक्रोफोन पर मजाक करने लगे। इसपर कोरोलेव ने यूरी को सावधान किया कि वो जो कुछ भी कह रहे हैं, वो सब रिकॉर्ड हो रहा है। ये जानकर यूरी झेंप गए और कंट्रोल रूम ठहाकों से गूंज उठा। अंतिम जांच पूरी होने पर, कोरोलेव ने इशारा किया और वोस्तोक के बूस्टर इंजन दहक उठे। रॉकेट लांच होते ही यूरी ने पूरे जोश में भरकर कहा...पियाकली...यानि... आओ चलें। तूफानी रफ्तार से रॉकेट आसमान की ओर बढ़ा चला जा रहा था। वोस्तोक कैप्स्यूल में मौजूद यूरी इन गौरवशाली क्षणों के आनंद में मातृभूमि को समर्पित एक गीत गुनगुना उठे -
the motherland knows...the motherland hears
when her son is flying up i the clouds....
(मातृभूमि जानती है...मातृभूमि सुनती है..
जब उसका बेटा...ऊपर बादलों में उड़ान भरता है) 
रॉकेट लांच के तीन मिनट बाद, वोस्तोक के बूस्टर रॉकेट्स गैरेरिन को 28164 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से धरती की सरहदों के पार लिए चले जा रहे थे। 
लांचिंग के 5 मिनट बाद, यूरी गैगरिन अंतरिक्ष से खूबसूरत नीली धरती को निहारने वाले पहले इंसान बन गए। 
वोस्तोक कैप्सूल के कॉकपिट की छोटी सी खिड़की के उसपार चमकीली नीली धरती नजर आ रही थी। धरती की इस खूबसूरती को देखने में यूरी खो गए। उन्होंने माइक्रोफोन से कंट्रोल रूम को बताया, अब मैं धरती के रंगों को देख रहा हूं...ये खूबसूरत है...बेहद खूबसूरत।
 अंतरिक्ष तक की उड़ान के 9 मिनट बाद रफ्तार की तेज सनसनाहट अचानक थम गई। गुरुत्वाकर्षण का असर खत्म हो गया। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा को पीछे छोड़कर यूरी पृथ्वी की अपनी कक्षा में पहुंच गए। उन्होंने कंट्रोल रूम को बताया, सबकुछ ठीक है...शून्य गुरुत्वार्षण का अनुभव शानदार है...मुझे मजा आ रहा है। 
धरती पर जारी राजनीति का खेल
मानव इतिहास की सबसे शानदार उपलब्धि हासिल हो गई। किसी इंसान को अंतरिक्ष भेजने का सपना साकार हो गया। अपनी कक्षा में मौजूद यूरी गैगेरिन अब धरती की अपनी पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे। इस ऐतिहासिक कामयाबी के ऐलान के लिए पूर्व सोवियत सरकार अब तैयार थीपहले से ही तीन बिल्कुल अलग-अलग हालात के लिए लिफाफे तैयार किए गए थेपहले लिफाफे में यूरी गैगेरिन के मिशन की शानदार कामयाबी का ऐलान थादूसरे लिफाफे में,तकनीकी खामी के चलते रूस की सीमा से बाहर लैंड हो गए रूसी कॉस्मोनट की मदद करने की अपील थीजबकि तीसरे लिफाफे में एक शोक संदेश था, जिसमें लिखा था कि मिशन के दौरान यूरी गैगरिन की मौत हो गईजब वैज्ञानिक आंकड़ों से मिशन की कामयाबी की पुष्टि हो गई, तो क्रेमलिन के आदेश पर पहला लिफाफा खोला गया और लोगों को साम्यवादी सरकार की इस शानदार कामयाबी की खबर दी सरकारी एजेंसी तास ने। रेडियो एनाउंसर यूराई लैवितान ने बाद में बताया कि पूरे करियर के दौरान कोवल दो मौके ही ऐसे आए, जब बुलेटिन पढ़ने के बाद वो फफक-फफक कर रो पड़े थे। पहला मौका था जब उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की खबर पढ़ी थी और दूसरा मौका अब सामने था, जब लो अंतरिक्ष में यूरी गैगेरिन के मौजूद होने का समाचार लोगों को सुना रहे थे।
धरती से करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर एक छोटे से कैप्स्यूल में मौजूद मौजूद गैगेरिन पृथ्वी की पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे, लेकिन ग्राउंड कंट्रोल में मौजूद वैज्ञानिकों का तनाव हर पल बढ़ता जा रहा था। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ कोरोलोव ने कंट्रोल रूम से पूछा, कंट्रोल, वो कैसा है।
इसपर स्पीकर पर यूरी की आवाज गूंजी,मैं सुरक्षित हूं।
तभी कंट्रोल रूम में लगे टेलीविजन स्क्रीन से यूरी के वीडियो सिगनल टूटने लगे। कोरोलोव यूरी को कुछ बताना चाहते थे कि अचानक टीवी स्क्रीन से यूरी की तस्वीर गायब हो गई। किसी अनहोनी के अंदेशे से कंट्रोल रूम में मौजूद कोरलोव समेत सारे वैज्ञानिक कांप उठे।
दरअसल यूरी टेलीविजन रिसीवर की रेंज से बाहर चले गए थे।
लांच से 30 मिनट से भी कम वक्त के भीतर यूरी गैगेरिन प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरे और उन्होंने आधी धरती को नींद के आगोश में समेटे रात के गहरे साये को देखा। जल्दी ही गैगेरिन का कैप्स्यूल अमेरिका के ऊपर से गुजरा, जिसके नागरिक अंतरिक्ष में पहले इंसान यूरी गैगेरिन की शानदार फतह से बेखबर गहरी नींद में खोए थे।
यूरी की जान खतरे में
अंतरिक्ष में करीब एक घंटा गुजारने के बाद कंट्रोल रूम में रीइंट्री यानि धरती के वातावरण में वापसी की गणना शुरू कर दी गई। पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रहे गैगेरिन को अब बर्न-अप की मदद से वोस्तोक कैप्स्यूल की रफ्तार कम करनी थी। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो गैगरिन पृथ्वी की और ऊंची कक्षा में प्रवेश कर जाते, जहां से फिर वापस लौटने का और कोई रास्ता नहीं था। रॉकेट बर्न-अप के साथ यूरी के कैप्स्यूल की रफ्तार तो कम हो गई लेकिन एक बड़ा हादसा सामने आ गया। वोस्तोक के सर्विस मॉड्यूल को कैप्स्यूल से अलग होना था, लेकिन दोनों एक-दूसरे में फंस गए। कंट्रोल रूम में वैज्ञानिक कांप उठे। वोस्तोक सर्विस मॉड्यूल अगर कैप्स्यूल के साथ जुड़ा रहता तो अंतरिक्ष में गैगेरिन की मौत तय थी। यूरी कंट्रोल रूम का रेडियो संपर्क टूट गया। तेज गर्मी से दहकते और एक-दूसरे से टकराते वोस्तोक के दोनों हिस्से धरती के वातारण में प्रवेश कर गए। हालात अब हाथ से निकल गए। कोरलोव अब कंट्रोल रूम के दूसरे वैज्ञानिकों के साथ इंतजार के सिवा कुछ और नहीं कर सकते थे। 
साईबेरिया के सारातोव इलाके में किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। कि तभी अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। खेतों में काम कर रही एक लड़की घबराकर मां से लिपट गई। दोनों ने आसमान की ओर नजरें उठाईं। आसमान से दो चीजें पैराशूट के सहारे नीचे गिर रही थीं। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश के अंतिम क्षणों में भीषण तापमान से वोस्तोक के एक-दूसरे में फंसे दोनों दोनो अपने आप अलग हो गए और इसके कुछ पल बाद ही टुकड़ों को अलग कर दिया। इसके कुछ ही क्षण बाद धरती से करीब साढ़े छह किलोमीटर की ऊंचाई पर गैगेरिन ने कैप्स्यूल के बाहर पराशूट से छलांग लगा दी।
108 मिनट की इस ऐतिहासिक अंतरिक्षयात्रा के दौरान गैगेरिन ने 40234 किलोमीटर की दूरी तय की और इसके साथ ही वो अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले पहले इंसान बन गए। कंट्रोल रूम में गहरा सन्नाटा था। कोरोलोव ने फोन उठाया और फिर साथियों को यूरी की साईबेरिया में सुरक्षित लैंडिंग की खबर दी। इसके साथ ही कंट्रोल रूम खुशियों से झूम उठा।
अंतरिक्ष में पहला अंतरिक्षयात्री भेजने में पूर्व सोवियत संघ ने बाजी मार ली और अमेरिका स्पेस-रेस में मीलों पीछे छूट चुका था। तात्कालीन सोवियत राष्ट्रपति निकिता खुश्चेव ने गैगेरिन की अंतरिक्षयात्रा को साम्यवादी सिद्धांतों की सर्वोच्च विजय के तौर पर प्रचारित किया। गैगेरिन अब नेशनल हीरो थे।
गैगेरिन की वापसी के दो दिन बाद सोवियत सरकार ने इस शानदार उपलब्धि का सार्वजनिक जश्न मनाया। एयरफोर्स का एक विमान गैगेरिन को लेकर सीधे क्रेमलिन पहुंचा। जीत के गौरव से भरे छोटे कद के गैगेरिन सधे कदमों रेड कारपेट पर चल रहे थे कि तभी उनकी पत्नी ने उनके पैरों में कुछ महसूस किया।
यूरी रेड कारपेट पर चले आ रहे थे, लेकिन उनके जूते का एक फीता खुला हुआ था।
अपने नेशनल हीरो की अगवानी के लिए क्रेमलिन के लाल चौक पर सरकारी अधिकारियों के साथ गैगेरिन का परिवार भी मौजूद था। लेकिन सबसे खास बात ये कि लाखों की भीड़ के साथ यूरी से मिलने राष्ट्रपति खुश्चेव खुद आए थे।
गैगेरिन की मशहूर मुस्कान की चमक पूरी दुनिया में फैल गई। क्यूबा, जापान, मैक्सिको, कनाडा, लीबिया और भी कई देशों में यूरी गैगेरिन जहां भी गए, उन्हें देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी। गैगेरिन की उपलब्धि इतनी बड़ी थी, कि सोवियत प्रतिद्वंदी अमेरिका भी यूरी गैगेरिन की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। यूरी गैगेरिन अब किसी एक देश के हीरो नहीं रहे, बल्कि वो पूरी मानव जाति के नायक बन गए। गैगेरिन की 108 मिनट की अंतरिक्षयात्रा ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया। गैगेरिन की उपलब्धि ने वैज्ञानकों और युवाओँ को इस कदर जोश और आत्मविश्वास से भर दिया कि महज आठ साल बाद ही मानव ने चंद्रमा पर अपने कदमों के निशान बना दिए। इंसानियत के इस हीरो के सम्मान में नील आर्मस्ट्रांग यूरी गैगेरिन का एक मैडल अपने साथ ले गए थे, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए चंद्रमा पर रख दिया। दुनिया के इस पहले अंतरिक्षयात्री ने पृथ्वी की पहली परिक्रमा के दौरान जिन खतरों का सामना किया, दुनिया ने उनसे सबक लिया और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ अंतरिक्षयात्रियों की नई पीढ़ी तैयार हुई।

शुक्रवार, 25 मार्च 2011

‘उम्मीद कभी खत्म नहीं हो सकती’


 ऐसे समाज में जहां ज्यादा घबराहट और उथल-पुथल होती है, ज्योतिषियों की जरूरत भी वहीं सबसे ज्यादा होती है प्रो. यशपाल 
जमाना कभी किसी एक चीज का नहीं होता। विज्ञान बड़ा है, तो टेक्नोलॉजी और भी बड़ी, अब तो टेक्नोलॉजी के बगैर जिंदगी सोची भी नहीं जा सकती। लेकिन अब लोगों ने टेक्नोलॉजी को ही साइंस मान लिया है। साइंस ज्ञान है, उत्सुकता है, हमेशा कुछ नया तलाशने की बेचैनी है, जागरूकता है, जबकि टेक्नोलॉजी साइंस का प्रायोगिक रूप। बीते 200 साल में साइंस ने समाज पर असर तो डाला, लेकिन लोगों ने साइंस का मतलब नई-नई मशीनों और नई-नई सुविधाओं को ही समझा। इसलिए समाज भी यांत्रिक होता गया, जिसमें ज्ञान की गहराई, प्रकृति के नियमों को समझने और जागरूक होने की जरूरत खत्म होती चली गई। लोगों को हम साइंस का सही अर्थ नहीं समझा सके। शुरुआत में इंसान ने आसमान को देखा तो सैकड़ों-हजारों तारे छिटके नजर आए। फिर उसने देखा कि कुछ तारे हिलते हैं-चलते हैं, वो अपनी जगह पर नहीं रहते और कुछ वक्त बाद वो फिर से वापस आ जाते हैं। इस तरह ग्रहों की खोज हुई, ये विज्ञान का शुरुआती रूप था। ग्रह केवल खोजे ही नहीं गए बल्कि हमारे पूर्वजों ने सही-सही ये भी बता दिया कि कितने ग्रह हैं  और उनकी स्थिति क्या है ? लेकिन बाद में इसे ज्योतिष से जोड़ दिया गया।
विज्ञान और हम दो चीजें हैं। चीजों को समझने की हममें कितनी क्षमता है, इसका भी फर्क पड़ता है। मुझे तो हैरानी होती है कि हमने इतने सारे सवाल पूछे और कुछ के जवाब मिलने भी लगे। क्या कमाल की जिंदगी हमें मिली है, आंखें हैं जिनसे देख सकते हैं, दिमाग है जिससे सोच-समझ सकते हैं। हर वक्त कुछ नया जानने की उत्सुकता और प्रकृति के रहस्यों को समझने की शक्ति जो हमें मिली है, इससे बड़ी चीज और कुछ हो ही नहीं सकती। बच्चे भी उत्सुकता के चलते ही सीखते हैं, उत्सुकता न हो तो वो चलना भी न सीख पाएं, और अगर ये उत्लुकता ही मर जाए-खत्म कर दी जाए तो मानव जाति का इससे बड़ा नुकसान कोई दूसरा नहीं हो सकता। मुझे दुख होता है कि हम और हमारे स्कूल बच्चों को इस तरह से पढ़ाते हैं कि उनकी उत्सुकता को मारते जाते हैं। ये बहुत अफसोसनाक है। समझने की कोई सीमा नहीं, ये कहना कि हमने सबकुछ जान लिया है और हम जैसा कह रहे हैं वैसा ही करो, ये बिल्कुल नहीं होना चाहिए। नए सवालों की खोज बेहद जरूरी है, अगर खुदा या ईश्वर है तो फिर उसके दिमाग में क्या था ? खुदा या ईश्वर इस तरह से क्यों बना ? किसी दूसरी तरह से क्यों नहीं ? क्या कोई दूसरा भी है, जिसे हम देख नहीं पाते ?
हमारी जो समझने की सीमा है, वो बड़े कमाल की है। हम कितने लंबे हैं, शायद डेढ़ या दो मीटर, अब इसे दस-दस बार गुणा करते जाएं तो ब्रह्मांड तक जा पहुंचेंगे और अगर दस-दस बार के गुणन में हम पीछे जाएं तो अणु के स्तर तक जा पहुंचेंगे। ब्रह्मांड और अणु, हम इनके बीच में फंसे हैं। हम अभी जानते ही कितना हैं ? ऐसे में ये दावा कि हम भविष्यवाणी कर सकते हैं काफी हास्यास्पद है। भविष्य का हाल बताने वाले हम होते कौन हैं ? ये मान लेना कि चीजें वहीं तक सीमित हैं, जो हम समझ पाए हैं, ये तो ज्यादती है।
सत्य किताबों में पढ़ लेना और सत्य की खोज करना दो अलग-अलग चीजें हैं। अगर आप जनरल तरीके से डिस्क्राइब करें तो कुछ भी कह सकते हैं। प्राचीन ज्ञानियों में एक अनोखी ताकत थी, वो बेहद सीमित तथ्यों की मदद से अंदाजा लगा लेते थे। अंदाजा लगाना बड़े काम की चीज है। विज्ञान केवल उपकरणों का मापन और गणना भर नहीं है। परिकल्पना और अंदाजा लगाना भी विज्ञान है। अगर आपमें उत्सुकता न हो, कल्पना न हो तो आप प्रकृति के कई रहस्यों को समझने से महरूम रह जाते हैं। सत्य की तलाश में जितना आनंद है, इसमें जितनी कविता है, इसमें एक किस्म की जो गहरी लगन है, उतनी किसी और चीज में नहीं।
किसी से पूछा गया कि विज्ञान क्या है ? तो जवाब मिला - जो वैज्ञानिक करते हैं। क्यों ? कैसे ? क्या ? इन सवालों की खोज, और यही क्यों, कुछ और क्यों नहीं ? इसकी खोज ने मानव जाति को गुफाओं से निकालकर आज यहां तक पहुंचाया है। विज्ञान एक शिल्प है और वैज्ञानिक शिल्पकार।
विज्ञान एक प्रकृति का दर्शन यानि नेचुरल फिलॉसफी है। विज्ञान में कोई सिद्धांत जिसे गलत न साबित किया जा सके उसे सिद्धांत ही नहीं माना जाता। गैलीलियो एक बच्चे की तरह था, उस वक्त जो बातें बताई जा रहीं थीं, उन्होंने उसे नहीं माना। उसने कहा आओ करके देखें तो सही, क्या नतीजा निकलता है। इसी बच्चों जैसी उत्सुकता से ही गैलीलियो और न्यूटन बनते हैं।
मां अपने बच्चे को प्यार करती है, ये बड़ी सुंदर चीज है। किसी ने मां से कहा नहीं कि बच्चे को प्यार करो, लेकिन जिंदगी खुद को बचाना चाहती है, खुद को प्रसारित करना चाहती है। 50-60 हजार साल पहले कुछ ऐसा हुआ कि पूरी दुनिया में बस मुश्किल से हजार लोग बचे। ये हजार लोग इधर-उधर बिखर गए और दुनिया के अलग-अलग इलाकों में जाकर आबाद हुए। इससे अलग-अलग समाजों, भाषाओं और संस्कृतियों का विकास हुआ, सामाजिक नियम बने। फिर वो सभ्यताएं मिलीं, भले ही इसकी वजह जंग रही हो लेकिन उनमें संपर्क हुआ। इससे हमने कला, संस्कृति, संगीत और परंपराएं सींखीं। हमारे विकास की सबसे मजेदार बात ये कि हमने हंसना सीखा।
पहले हम खुद को ही सबकुछ समझते थे और नहीं समझ पाते थे कि ये अलग-अलग समाज क्यों हैं ? लेकिन अब हम समझ चुके हैं कि मानव जाति का विकास इसी तरह से होना था।  लेकिन फिरभी, आजकल एक तरह का तनाव है। दुनियाभर में फैली विभिन्नताओं और संस्कृतियों को बचाने और संरक्षित रखने के बजाए हम उन्हें अपना दुश्मन समझने लगे हैं। हम दूसरों के दुश्मन और हमलावर क्यों मानते हैं ? हम शिक्षा और ज्ञान की बात करते हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात ये होनी चाहिए कि हम दुनियाभर की सांस्कृतिक विभिन्नताओं का आनंद लें। सांस्कृतिक अलगाव जातिभेद, वर्गभेद, पंथभेद, रंगभेद और इस जैसी दूसरी चीजों को जन्म देता है जो मानव के खिलाफ जाती हैं। विज्ञान हमें बताता है कि हमारी विरासत क्या है ? हम कहां से आए हैं ? विज्ञान की इस देन को हम अब तक लोगों को समझा ही नहीं सके।
धर्म को लेकर अब काफी झगड़ा किया जा रहा है। धर्म से जुड़े सवालों पर मैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ये कहूंगा कि आप किन चीजों को धर्म कहते हैं ? क्या तमाम कर्मकांडों को ? तो फिर मैं बौद्ध और जैन धर्म का नाम लूंगा, जहां भगवान की अवधारणा ही नहीं है। सदाचार और नैतिकता के कुछ नियमों को मिलाकर धर्म की बुनियाद तैयार की गई, इनमें अध्यात्म भी शामिल था। प्राचीनकाल में धार्मिक दार्शनिकों ने बहुत गहरे-गहरे सवाल पूछे, इनमें से कुछ सवाल अब वैज्ञानिक भी पूछते हैं। इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश शुरू हुई और धर्म अपने रास्ते पर आगे बढ़ा। फंडामेंटल का मतलब है कि कुछ है और उसे बदला नहीं जा सकता, तो इससे मुश्किलें आती हैं। दुनिया बदल रही है, सब चीजें बदल रही हैं, जो चीज कभी न बदले, मेरे विचार से वो खतरे में है। कोशिश हो रही है कि चीजें बिल्कुल न बदलें, इससे बड़ी घबराहट और मुश्किलें आ रही हैं। धर्म वो भी है, जैसा कहा जाता है अहम् ब्रह्मास्मि, कि खुदा या ईश्वर को मैंने बनाया। इसे वैज्ञानिक ढंग से भी कहा जा सकता है कि खुदा या ईश्वर की जरूरत थी इसलिए बनाया। 
शुरुआत में बहुत सी चीजें समझ में नहीं आतीं थीं। ये समझ में नहीं आता था कि वो अमीर क्यों है और मैं गरीब क्यों ? तो फिर पिछले जन्म और कर्म का हिसाब सामने आया। विज्ञान ने कई सवालों के जवाब दिए, लेकिन जिनके जवाब नहीं मिले वो काम धर्म की चादर ओढ़कर पूरा हो गया। अब इसे लेकर झगड़े की जरूरत नहीं, बहुत से धार्मिक लोग बहुत उम्दा इंसान होते हैं। उनका खुद पर पूरा मियंत्रण रहता है वो बहुत नैतिक भी होते हैं। धर्म भी इंसान की विरासत है और विज्ञान भी हमारी विरासत है।
ये कहना कि किताब में लिखा है इसलिए यही सही है और कुछ दूसरा सत्य हो ही नहीं सकता ये गलत है। ये कहना कि यही मानो, यही सही है , ऐसा ही होना चाहिए, ये सही नहीं है। विज्ञान इस तरह से काम नहीं करता। ऐसे समाज में जहां ज्यादा घबराहट और उथल-पुथल होती है, ज्योतिषियों की जरूरत भी वहीं सबसे ज्यादा होती है।
उम्मीद कभी खत्म नहीं हो सकती। बहुत संभव था कि 65-70 में परमाणु युद्ध छिड़ जाता, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ। तो कुछ तो फर्क पड़ा है, शायद ऐसा कभी न हो। शायद और परमाणु परीक्षण भी न हों। एक से बढ़कर एक पागल बैठे हुए हैं, नाभिकीय हथियार इकट्ठा किए जा रहे हैं। कभी-कभी खुद पर हंसी भी आती है। हमारे देश में भी बातें होती हैं कि बम बनाने का हक खत्म हो जाएगा तो हम भी खत्म हो जाएंगे। तो मैं सोंचता हूं कि ये हक खत्म ही हो जाए, हमारा भी और साथ वाले का भी। ये कहना कि वो हमें तीन बार मार सकते हैं और हम केवल दो बार ही उन्हें मार सकते हैं, इसलिए हमें और बम बनाना चाहिए, ये बेवकूफाना है, ये पागलपन है।
जिंदगी को संभालने और उसे विकास के नए रास्तों पर आगे बढ़ाने का नाम ही विज्ञान है। समाज, रिश्तों और जीवन पद्धति के ज्ञान को विज्ञान में पिरो दीजिए, फिर देखिए दुनिया ही बदल जाएगी।
( प्रोफेसर यशपाल से हुई एक लंबी बातचीत पर आधारित)

प्रस्तुति : संदीप निगम

बुधवार, 16 मार्च 2011

न्यूक्लियर इमरजेंसी और जापान के रिएक्टर हादसे


जबरदस्त भूकंप और सुनामी के कहर के बाद जापान अब रेडिएशन की खतरनाक मुसीबत का सामना कर रहा है। जिसकी शुरुआत हुई 12 मार्च को जब फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट का रिएक्टर नंबर-1 जोरदार धमाके के साथ फट गया...धमाका इतना जोरदार था कि रिएक्टर इमारत की छत ही उड़ गई। इसके बाद रिएक्टर नंबर-3 और रिएक्टर नंबर-2 भी धमाके से उड़ गए और इन सभी रिएक्टर्स से भाप के साथ धूल का एक बड़ा गुबार फूटता देखा गया। जापान में 55 रिएक्टर्स काम कर रहे हैं, जो इस देश की कुल ऊर्जा जरूरत के 15 फीसदी हिस्से की आपूर्ति करते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये कि जापान ने अपने रिएक्टर्स की डिजाइन में इस बात का पूरा ख्याल रखा था कि ये भूकंप के बड़े झटके भी झेल सकें। लेकिन इसके बावजूद  हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराए जाने के 66 साल बाद अब जापान एक बार फिर रेडिएशन के भारी खतरे का सामना कर रहा है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है है फ्रांस और अमेरिका ने फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लांट से 50 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले अपने नागिरकों को तुरंत वहां से हट जाने को कहा है। जापान से आनेवाली हवाएं रूस और चीन के तटीय इलाकों में रेडिएशन की दहशत फैला रही हैं। इन सभी देशों के साथ भारत ने भी जापान से अपने देश के लोगों को हटाने का काम शुरू कर दिया है। जापान में हालात इतने गंभीर हैं कि सम्राट आकिहितो ने नेशनल टेलीविजन पर आकर मुसीबत की इस घड़ी में संवेदना जताई है। जापान के लिए ये एक दुर्लभ और स्थिति की गंभीरता को जाहिर करने वाला क्षण था। क्योंकि जापान में सम्राट देश को तभी संबोधित करते हैं जब हालात बहुत ज्यादा संवेदनशील हो चुके होते हैं। उदाहरण के तौर पर सम्राट हीरोहितो ने 15 अगस्त 1945 को रेडियो पर देश को संबोधित करके मित्र राष्ट्रों की सेना के सामने जापान के बिना शर्त समर्पण की घोषणा की थी। इससे छह दिन पहले अमेरिका हिरोशिमा-नागासाकी पर एटम बम गिरा चुका था।
आइए जानते हैं कि टेक्नोलॉजी के मामले में दुनिया के सबसे विकसित देश जापान में हलात हाथ से कैसे निकल गए ? आइए जानते हैं कि आखिर इन रिएक्टर्स में धमाके क्यों हुए? गड़बड़ी की शुरुआत कैसे हुई ?
जापान के फुकुशिमा न्यूक्लियर पावर प्लॉंट कैंपस में छह रिएक्टर्स काम कर रहे हैं और सभी बॉयलिंग वॉटर टेक्नोलॉजी पर आधारित हैं। ये बात अलग है कि सभी रिएक्टर्स की फ्यूल एसेंबली में अलग-अलग रेडियोएक्टिव पदार्थों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे रिएक्टर नंबर एक की फ्यूल एसेंबली में यूरेनियम की छड़ें इस्तेमाल हो रही थीं, जबकि रिएक्टर नंबर तीन में प्लूटोनियम ऑक्साइड और यूरेनियम ऑक्साइड की छड़ें। रिएक्टर नंबर एक की अंदरूनी डिजाइन के उदाहरण के साथ मैं इनकी कार्यप्रणाली के साथ इनमें आई गड़बड़ी को समझाने की कोशिश करूंगा।     
रिएक्टर में सबसे संवेदनशील जगह वो होती है जहां रेडियोएक्टिव पदार्थ में चेन रिएक्शन करवाया जाता है और ये सबसे अहम काम होता है रिएक्टर के कोर में।  
 फुकुशिमा रिएक्टर नंबर एक का कोर स्टील की 8 इंच मोटी चादर से बना एक कंटेनर जैसा है, जो पानी से लबालब भरा रहता है। यूरेनियम की 12 फुट लंबी और आधे इंच मोटी छड़ों के बंडल्स यानि फ्यूल एसेंबली पूरी तरह इसमें डुबोई रखी जाती है। चेन रिएक्शन के दौरान यूरेनियम की छड़ें गर्मी पैदा करती हैं और पानी भाप में बदलता है। भाप को दूसरे पाइप्स से निकालकर टरबाइन चलाई जाती है जिससे जनरेटर बिजली बनाता है।

मेल्टडाउन 
लेकिन रिएक्टर कोर में यूरेनियम की फ्यूल एसेंबली में चेन रिएक्शन के दौरान पानी अहम भूमिका निभाता है और ये यूरेनियम की छड़ों का तापमान 270 डिग्री सेंटीग्रेड से आगे बढ़ने नहीं देता। अगर ये कूलिंग फेल हो जाए तो यूरेनियम छड़ों का तापमान 1200 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ सकता है। ये तापमान इतना ज्यादा है कि यूरेनियम की छड़ों को पिघला सकता है, इसीको मेल्टडाउन कहते हैं। ये बेहद खतरनाक स्थिति है। क्योंकि पिघलने के साथ यूरेनियम का वाष्पीकरण भी होने लगता है और इस रेडियोएक्टिव पदार्थ के घातक अणु हवा में घुलने लगते हैं।
इस खतरनाक स्थिति से बचने के लिए दुनिया के सभी न्यूक्लियर रिएक्टर्स में तीन स्तरों वाली सुरक्षा अपनाई जाती है। जापान के रिएक्टर्स में भी सुरक्षा के यही तरीके अपनाए गए थे।

सुरक्षा का पहला स्तर – कंट्रोल रॉड्स 
जिस वक्त भूकंप आया फुकुशिमा पावर प्लांट के रिएक्टर काम कर रहे थे। भूकंप के जबरदस्त झटकों  से रिएक्टर नंबर -1  को गंभीर नुकसान पहुंचा और रिएक्टर कोर में मेल्टडाउन का स्थिति को बचाने के लिए पहले स्तर की सुरक्षा के तौर पर कंट्रोल रॉड्स का इस्तेमाल किया गया। आइए जानते हैं कि कंट्रोल रॉड्स किसे कहते हैं। रिएक्टर को जरूरत से ज्यादा गर्म होने से रोकने के लिए ऐसे खास पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है जो यूरेनियम में चेन रिएक्शन आगे बढ़ाने वाले न्यूट्रॉन्स को सोख लेते हैं जैसे बोरॉन। इन पदार्थों की छड़ें बनाई जाती हैं, जिसे कंट्रोल रॉड्स कहते हैं। चेन रिएक्शन बंद करने और यूरेनियम छड़ों को ठंडा करने के लिए इन कंट्रोल रॉड्स को यूरेनियम छड़ों के बीच फ्यूल एसेंबली के भीतर कुछ इस तरह डाल दिया जाता है। कंट्रोल रॉड्स के डालने पर चेन रिएक्शन की रफ्तार धीमी होने लगती है और रिएक्टर बंद होने लगता है।

सुरक्षा का दूसरा स्तर – कूलेंट 
कंट्रोल रॉड्स के इस्तेमाल से रिएक्टर नंबर-1 बंद तो हो गया लेकिन यूरेनियम की छड़ें अब भी बहुत ज्यादा गर्म थीं। ठंडा करने के लिए इन्हें पानी में डुबाए रखना जरूरी था, लेकिन भूकंप की वजह से ऐसा नहीं हो सका। रिएक्टर नंबर-1 की सुरक्षा का दूसरा स्तर भी फेल हो गया। आपात स्थिति सामने आ गई। इंजीनियरों ने डीजल मोटर चला कर दहकती हुई यूरेनियम रॉड्स पर कूलेंट का स्प्रे करना शुरू कर दिया। लेकिन ये आपातकालीन कोशिश भी एक घंटे से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई। अचानक बिना किसी चेतावनी के डीजल मोटर ने काम करना बंद कर दिया और दहकती यूरेनियम की छड़ों पर किया जा रहा कूलेंट का स्प्रे भी बंद हो गया। रिएक्टर नंबर-1 को बचाने की आपात कालीन व्यवस्था भी फेल हो गई। 
सुनामी से हालात बदतर - रिएक्टर नंबर-1 गंभीर आपात स्थिति से जूझ रहा था कि तभी सुनामी की 10 मीटर ऊंची जबरदस्त लहरें जापान के तटों से आ टकराईं। सुनामी की जोरदार टक्कर से फुकुशिमा रिएक्टर नंबर-1 में रही-सही कसर भी पूरी कर दी।

सुरक्षा का तीसरा स्तर – भाप को पानी में बदलकर कोर में भेजना 
सुरक्षा के दोनों स्तरों की धज्जियां उड़ चुकी थीं। रिएक्टर नंबर-1 में मौजूद लोगों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं। फुकुशिमा रिएक्टर नंबर एक आपात स्थिति का सामना कर रहा था और रिएक्टर में यूरेनियम की छड़ों को पिघलने यानि मेल्ट डाउन की गंभीर स्थिति टालने के लिए वैज्ञानिक और इंजीनियर जी-तोड़ कोशिशों में जुट गए। अब सुरक्षा के तीसरे स्तर को आजमाया गया। इसके तहत पाइपों में दौड़ रही भाप को ठंडा कर वापस रिएक्टर कोर में भेजने का काम शुरू किया गया। इससे यूरियम की छड़ें कुछ ठंडी तो हुईं, लेकिन कोर के भीतर भाप बनने की प्रक्रिया भी तेज हो गई और पानी का स्तर और नीचे गिर गया। कोर के भीतर तापमान एकबार फिर बढ़ने लगा। सुरक्षा के तीनों उपाय एक के बाद एक बेकार हो गए। जापान इनर्जी कमीशन के प्रो. आकिडो ओमोटो फुकुशिमा रिएक्टर की डिजाइन बनाने के काम में शामिल रहे हैं। उन्होंने बताया, रिएक्टर नंबर-1 के कोर से पानी किसी तरह लीक कर गया। मेरे विचार से हमने सुनामी जैसी आपदा से सुरक्षा के सभी संभव उपाय किए थे...लेकिन जो कुछ हुआ वो अचानक और असंभावित सा था।

बचाव का अंतिम रास्ता – बोरॉन और समुद्र का पानी 
जब सुरक्षा के सारे उपाय फेल हो गए तब वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने रिएक्टर नंबर-1 को फटने से रोकने के लिए बोरॉन मिला समुद्र का पानी रिएक्टर कोर में पंप करना शुरू कर दिया। इंजीनियर बखूबी जानते थे कि समंदर का पानी रिएक्टर को हमेशा के लिए बर्बाद कर देगा और इसे दोबारा कभी इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। लेकिन रिएक्टर कोर को फटने और रेडिएशन को वातावरण में लीक होने से रेकने के लिए अब और कोई रास्ता नहीं बचा था। इस बीच वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम ने रिएक्टर कोर से फ्यूल एसेंबली कंटेनर को निकालने की कोशिश भी की। लेकिन तभी भीतर दबाव इस कदर बढ़ गया कि जोरदार धमाका हो गया। फुकुशिमा के रिएक्टर नंबर तीन और अब नंबर दो में भी इन्हीं हालात में जोरदार धमाके हुए हैं।
एक बार फिर ...कुदरत ने बचाव के लिए की जी रही सर्वोच्च इंसानी कोशिशों पर पानी फेर दिया।

मंगलवार, 15 मार्च 2011

जानिए, कैसे बनती है न्यूक्लियर रिएक्टर में बिजली


11 मार्च को 9 की तीव्रता वाले भूकंप और फिर सुनामी की तबाही झेलने के बाद जापान अब न्यूक्लियर इमरजेंसी का सामना कर रहा है। 11 मार्च से 15 मार्च यानि केवल चार दिनों में जापान के तीन रिएक्टर्स भारी धमाके के साथ फट चुके हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिरोशिमा पर एटम बम गिराए जाने के 66 साल बाद जापान के लोग एक बार फिर रेडिएशन के खतरे से सहमे नजर आ रहे हैं। इस मौके पर वॉयेजर जापान की आपबीती और नाभिकीय पावर प्लांट टेक्नोलॉजी पर जानकारियों की एक श्रृंखला पेश कर रहा है। इस सिलसिले में आप टोक्यो से डॉ. राबर्ट गेलर के अनुभव पहले ही पढ़ चुके हैं, अब पेश है न्यूक्लियर रिएक्टर से जुड़ी एक आधारभूत जानकारी -  
न्यूक्लियर रिएक्टर
न्यूक्लियर रिएक्टर वो मशीन है जिसमें नियंत्रित चेन रिएक्शन करवाकर गर्मी पैदा की जाती है। जिसका इस्तेमाल बिजली को बनाने में किया जाता है। मौजूदा वक्त में दुनियाभर में सेकेंड जेनेरेशन के न्यूक्लियर रिएक्टर्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। जापान में 11 मार्च को 9 की तीव्रता वाले जबरदस्त भूकंप और सुनामी के बाद दुर्घटना का शिकार हुए फुकुशिमा पावर हाउस के रिएक्टर्स भी सेकेंड जेनेरेशन के ही हैं। परंपरागत पावर हाउस में फॉसिल फ्यूल यानि कोयले, तेल या फिर गैस का इस्तेमाल पानी को खौलाने और भाप बनाने में किया जाता है, जबकि न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम जैसे रेडियोएक्टिव पदार्थ के अणुओं को तोड़कर एक नियंत्रित चेन रिएक्शन शुरू करवाया जाता है, जिससे बहुत ज्यादा गर्मी पैदा होती है। ये चेन रिएक्शन रिएक्टर के भीतर करवाया जाता है, जहां सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। आइए समझते हैं कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स काम कैसे करते हैं। 
कैसे काम करते हैं रिएक्टर 
रिएक्टर में सबसे पहले संशोधित यूरेनियम की 12 फुट लंबी और आधे इंच मोटी छड़ों के बंडल बनाए जाते हैं, जिसे फ्यूल एसेंबली कहते हैं। इस फ्यूल एसेंबली को पानी से भरे 8 इंच मोटी स्टील की चादर से बने कंटेनर में डुबा दिया जाता है। इसी को रिएक्टर का कोर कहते हैं। इस वक्त हम नाभिकीय ऊर्जा से बिजली बनाने के लिए मुख्य रूप से दो रिएक्टर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं - बॉयलिंग वाटर रिएक्टर और प्रेशराइज्ड वॉटर रिएक्टर।
बॉयलिंग वाटर रिएक्टर
सबसे पहले देखते हैं कि बॉयलिंग वाटर रिएक्टर में बिजली कैसे बनती है। बॉयलिंग वाटर रिएक्टर में चेन रिएक्शन यानि अणुओं के टूटने से पैदा हुई गर्मी से पानी को खौलाया जाता है। जिससे पैदा हुई भाप से टरबाइन चलती है और जेनेरेटर में बिजली बनती है। लेकिन वो भाप बेकार नहीं जाती, उसे ठंडाकर फिर से पानी में बदलकर वापस रिएक्टर के कोर में भेज दिया जाता है।
प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर
 अब जायजा लेते हैं प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर का। जापान के फुकुशिमा न्यूक्लियर रिएक्टर्स भी प्रेशराइज्ड वाटर टेक्नोलॉजी पर ही आधारित हैं। इसमें बिजली बनाने का तरीका थोड़ा सा अलग है। इसमें सबसे पहले रिएक्टर के कोर में मौजूद प्रेशराइज्ड टैंक में चेन रिएक्शन से गर्मी पैदा की जाती है। लेकिन पानी को खौलने नहीं दिया जाता, भले ही पानी का तापमान कितना भी ऊंचा क्यों न चला जाए। इस दहकते हुए पानी को हजारों छोटी पाइप्स से गुजारा जाता है, जहां पानी को भाप में बदल जाने की इजाजत मिलती है। नतीजे में हमें बेहद दबावयुक्त भाप की तेज धारा मिलती है। इस प्रेशराइज्ड भाप की ताकत से टरबाइन चलती है और जनेरेटर बिजली बनाने लगता है। टरबाइन से निकलने वाली भाप एक कंडेसर में ठंडी की जाती है, जिससे पानी बनता है, जिसे फिर से रिएक्टर कोर में फिर से गर्माकर भाप बनाई जाती है और ये प्रकिया चलती रहती है। 
रिएक्टर पर नियंत्रण 
रिएक्टर को जरूरत से ज्यादा गर्म होने से रोकने के लिए चांदी, इंडियम, कैडमियम, बोरॉन, कोबॉल्ट और ऐसे ही कई दूसरे पदार्थों की कंट्रोल रॉड्स बनाई जाती हैं, जो फ्यूल एसेंबली बंडल के यूरेनियम रॉड्स में चेन रिएक्शन को आगे बढ़ाने वाले न्यूट्रॉन्स को सोख लेते हैं। इसके साथ ही कंट्रोल रॉड्स रिएक्टर से छिटकने वाले दूसरे रेडियोएक्टिव अणुओं को भी खुद में समेट लेते हैं। इन कंट्रोल रॉड्स को यूरेनियम की छड़ों के साथ फ्यूल बंडल्स में डाला जाता है। जब ऑपरेटर रिएक्टर में ज्यादा गर्मी पैदा करना चाहता है, तो वो इन कूलेंट रॉड्स को बाहर खींच लेता है और जब रिएक्टर को ठंडा करने की जरूरत होती है, तब इन कंट्रोल रॉड्स को फिर से भीतर डाल दिया जाता है। इन कंट्रोल रॉड्स की मदद से रिएक्टर को बंद भी किया जाता है। 
कूलेंट और मॉडरेटर 
बिजली बनाने के दौरान रिएक्टर को थोड़े-थोड़े वक्त पर ठंडा करना जरूरी होता है। इसके लिए खास कूलेंड और मॉडरेटर्स का इस्तेमाल किया जाता है। आमतौर पर हैवी वाटर का इस्तेमाल कूलेंट के तौर पर किया जाता है जबकि सामान्य पानी और खास पिघले नमक का इस्तेमाल मॉडरेटर के तौर पर किया जाता है। ये कूलेंट और मॉडरेटर रिएक्टर कोर को चारो ओर से घेरे छोटी-छोटी पाइप्स में दौड़ते रहते हैं। जापान में आए भूकंप से फुकुशिमा रिएक्टर के कूलेंट पाइप टूट गए थे,जिससे रिएक्टर का कोर ठंडा नहीं हो सका। 
न्यूक्लियर इमरजेंसी 
हादसे की स्थिति में सारा ध्यान इस बात पर होता है कि रिएक्टर कोर को जल्दी से जल्दी ठंडा किया जाए और भीतर पैदा हो रहे दबाव और गर्मी को रिएक्टर से बाहर निकाला जाए। लेकिन इस दौरान ध्यान ये रखा जाता है कि कोई भी रेडियोएक्टिव अणु कोर से बाहर न छिटकने पाए और रेडिएशन वातावरण में लीक न होने पाए। 
न्यूक्लियर रिएक्टर बिजली बनाने का सबसे सुरक्षित और असरदार साधन हैं। इंटरनेशनल एटॉमिक इनर्जी एजेंसी के मुताबिक दुनियाभर में 439 रिएक्टर काम कर रहे हैं और आने वाले वक्त में इनकी तादाद और भी बढ़ेगी। लेकिन जापान में हो रहे रिएक्टर हादसों ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को रिएक्टर की डिजाइन्स में कुछ और सुधार करने की जरूरत का एहसास दिला दिया है। 

रविवार, 13 मार्च 2011

जापान का भूकंप, जैसा मैंने देखा-टोक्यो के जियोफिजिसिस्ट की डायरी


11 मार्च, शुक्रवार को दोपहरबाद करीब 3 बजे (जापान के समय के अनुसार) जिस वक्त भूकंप आया, मैं अपने ऑफिस में था। मेरा ऑफिस टोक्यो यूनिवर्सिटी के साइंस स्कूल की बिल्डिंग की 7 वीं मंजिल पर है। उस वक्त मैं अपने लैपटॉप पर कुछ टाइप करने में व्यस्त था। टोक्यो में मध्यम दर्जे के भूकंप का आना एक सामान्य सी बात है, इसलिए मैंने भूकंप के झटकों पर ध्यान नहीं दिया और टाइपिंग करता रहा।
भूवैज्ञानिक होने के नाते मैं तुरंत भांप गया कि भूकंप के झटकों की ताकत असामान्य है और इनकी अवधि भी ज्यादा है। खास बात ये थी कि तीखे झटके पूरी तरह से गायब थे, इसलिए पहले-पहल ये अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया कि ये भूकंप किस तरह का है। तीखे और बेहद खतरनाक झटकों के न आने की वजह ये थी कि भूकंप की लहरें जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं, धरती उन्हें आहिस्ता से खुद में सोखती जाती है। लेकिन तीखे झटकों के न आने के बावजूद मैं समझ गया कि ये एक बड़ा भूकंप है, जिसका केंद्र शायद काफी दूरी पर है। फिरभी मैं बहुत ज्यादा परेशान नहीं हुआ। मेरी कुर्सी के पीछे मौजूद कैबिनेट से किताबें और दूसरी चीजें मेरे ऊपर गिरने लगीं, इसलिए खुद को बचाने के लिए मैं अपनी मेज के नीचे छिप गया।
कुछ मिनटों के बाद जब भूकंप के झटके थमे, मैं मेज के नीचे से निकला, अपना लैपटॉप वापस खोला और फिर टाइपिंग करने में जुट गया। इस बीच मेरे कुछ छात्र मेरा हालचाल लेने आ गए, मैंने बड़ी लापरवाही और एक शिक्षक की तरह थोड़ी तल्खी के साथ उन्हें वापस अपने काम में जुट जाने का हुक्म सुना दिया। लेकिन कुछ देर बाद जब भूकंप के झटके फिर से शुरू हो गए तो हमारे सुरक्षा अधिकारी ने फैसला लिया कि हमें अब स्कूल की इमारत खाली कर देना चाहिए। फिर मैंने ऐसा ही किया और दूसरे सहयोगियों के साथ हम सब सीढ़ियों से उतरकर स्कूल की इमारत से बाहर आ गए। झटके अब भी रुक-रुक कर आ रहे थे, लेकिन ये काफी हल्के थे। आधे घंटे तक बाहर खड़े रहने के बाद हम सबने फैसला लिया कि बहुत हुआ अब हमें वापस अपने-अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एलीवेटर्स बंद कर दिए गए थे, इसलिए हम सब सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर अपने-अपने ऑफिस में गए और अपना-अपना काम खत्म करने के बाद वापस घर को चल दिए।
नागरिकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रेलगाड़ियां बंद कर दी गईं थीं। हालांकि मेरे पास सबवे से जाने का विकल्प था, लेकिन साफ मौसम को देखते हुए पैदल ही टहलते हुए मैं घर की ओर चल दिया। 55 मिनट बाद मै घर पहुंच गया, जब मैं घर पहुंचा तो देखा कि वहां भूकंप से कोई नुकसान नहीं हुआ था। लेकिन भूकंप डिटेक्टर यंत्र ने गैस की लाइन अपनेआप काट दी थी। मैंने मुस्कराते हुए लापरवाही के साथ गैस मीटर का बटन दबाया और पाइप में गैस की आपूर्ति फिर से शुरू हो गई।    
भूकंप को आए 8 घंटे बीत चुके थे। फोन नेटवर्क शानदार तरीके से काम कर रहा था। अब मैंने अपनी पत्नी, उसकी मां और बहन की खोज-खबर ली, जोकि उत्तरी जापान में एक हॉट स्प्रिंग रिसॉर्ट में छुट्टियां मना रहे थे। मैंने ये जानकर चैन की सांस ली कि वहां वो सब सुरक्षित थे। टोक्यो के दूसरे कई लोगों की अपेक्षा मैं भाग्यशाली रहा, क्योंकि ज्यादातर लोग सारी रात अपने दफ्तरों में ही फंसे रहे। हालांकि वहीं भी उन्हें कोई खतरा नहीं था, लेकिन बेकार की परेशानी तो थी ही। अब जबकि भूकंप के 32 घंटे बाद मैं अपनी डायरी लिख रहा हूं, टोक्यो में हालात आहिस्ता-आहिस्ता सामान्य होने लगे हैं।
दुर्भाग्य से भूकंप से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में हालात बहुत बदतर थे। टीवी पर सारी खबरें भूकंप और उससे हुए जान-माल के नुकसान पर ही केंद्रिंत थीं। भूकंप और उसके बाद आई सुनामी से तबाह हो गई बस्तियों के खौफनाक दृश्य बार-बार रिपीट किए जा रहे थे। हजारों लोगों ने इस हादसे में अपना सबकुछ खो दिया और वो दयनीय स्थिति में अस्थाई टेंटों में शरणार्थियों की तरह रहने को मजबूर थे। बाहर कड़ाके की ठंड थी और बिजली न आने की वजह से हालात गंभीर थे। हालांकि बाहर उन सभी के पास खाना, पानी और कंबल जैसी चीजें थीं, लेकिन बाहर की खुली सर्दी मं सभी ठिठुर रहे थे।
तभी खबर आई कि फुकुशिमा के न्यूक्लियर पावर प्लांट को गंभीर नुकसान पहुंचा है और वहां से रेडिएशन का रिसाव हो रहा है। हमें खबर मिली कि रिएक्टर के आसपास के 20 किलोमीटर दायरे के इलाके में लोगों के घर खाली कराए जा रहे हैं। लेकिन ये खतरा कितना बड़ा है, ये नहीं पता चल पा रहा था, क्योंकि जो खबरें आ रही थीं, उनमें कुछ भी साफ नहीं था।
संक्षेप में कहूं तो भूकंप की इस बड़ी आपदा का सामना करने के लिए जापान की सरकार ने जो भी कदम उठाए हैं, वो काफी कारगर रहे हैं। लेकिन जापान में आए 9.1 तीव्रता वाले भूकंप और इसके बाद आई सुनामी से जो तबाही और बर्बादी हुई उसे नहीं रोका जा सका। अब सारा ध्यान बचाव-राहत और पुर्ननिर्माण के कामों पर ही है। लेकिन जापान में आए इस भूकंप के बड़े ही दूरगामी परिणाम होंगे और ये भूकंप पब्लिक पॉलिसी बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। अंत में इतना ही, कि ऐसे वक्त में जब कि हम भविष्य में आने वाले भूकंपों और उनका सामना करने के तौर-तरीकों पर सारा ध्यान लगाए बैठे थे, तभी ये भयानक अनहोनी घट गई। जैसा कि कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोल़ाजी के प्रोफेसर हिरो कानामोरी कहते हैं, हमें हमेशा अनअपेक्षित का सामना करने को तैयार रहना चाहिए।

- डॉ. रॉबर्ट गेलर, जियोफिजिसिस्ट, यूनिवर्सिटी आफ टोक्यो, जापान

मंगलवार, 8 मार्च 2011

कैसी है अंतरिक्ष की गंध?

कभी सोचा है कि अंतरिक्ष की गंध कैसी होगी? हां, ये बात अलग है कि हम अंतरिक्ष में इसे सूंघ नहीं सकते, क्योंकि इसके लिए हवा जरूरी है।
लेकिन फिरभी ये सच है कि अंतरिक्ष की एक अपनी खास महक है। आखिर ये महक कैसी होगी? क्या ये महक बिल्कुल नई और अनजानी होगी, या फिर बिल्कुल जानी पहचानी सी? या फिर ऐसी कि समझना ही मुश्किल हो !
इसका जवाब अंतरिक्षयात्री देते हैं। स्पेसवॉक करने वाले अंतरिक्षयात्री बताते हैं कि 'अंतरिक्ष की महक अनजानी सी नहीं है, ये कई जानी-पहचानी गंध का एक मिलाजुला रूप है। अंतरिक्ष की खुश्बू - आपके कार या मोटरसाइकिल के इंजन से निकलने वाली गंध, दहकती धातु से उठने वाली गंध, डीजल के धुएं और कबाब जैसी किसी चीज के भुनने की महक इन सबका एक मिला-जुला सा रूप है। यकीनन आपके मन में कई सवाल उठ रहे होंगे, कि स्पेसवॉक के दौरान अंतरिक्षयात्रियों ने आखिर अंतरिक्ष को सूंघा कैसे होगा? क्योंकि स्पेसवॉक के दौरान हेलमेट तो वो उतार नहीं सकते, और एक सेकेंड के लिए अगर मान भी लिया जाए कि शायद खुले अंतरिक्ष में कभी कोई दुर्घटना घट गई होगी जिससे अंतरिक्ष की महक का एक झोंका अंतरिक्षयात्रियों तक आ गया होगा, तो ये भी मुमकिन नहीं है क्योंकि सूंघने के लिए हवा जरूरी है, और अंतरिक्ष में हवा कहां?
अंतरिक्ष की अपनी एक गंध है, ये बिल्कुल सच है। लेकिन ये भी सच है कि अंतरिक्ष की इस गंध को बगैर किसी मिलावट के उसके शुद्ध स्वरूप में सूंघना हम मानवों के लिए मुमकिन नहीं। क्योंकि अंतरिक्ष एक निर्वात-एक शून्य है, जहां कोई गैसीय वायुमंडल या हवा नहीं है, और अगर कभी कोई अंतरिक्षयात्री स्पेसवॉक के दौरान अंतरिक्ष को सूंघने की कोशिश भी करेगा तो उसे एक दर्दनाक मौत का सामना करना पड़ेगा। फिर आखिर अंतरिक्ष की गंध सूंघी कैसे गई?
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से अंतरिक्षयात्री जब भी स्पेसवॉक के लिए खुले अंतरिक्ष में जाते हैं, उनके स्पेससूट में कुछ ऐसे खास रासायनिक यौगिक के कण चिपक जाते हैं, जो अंतरिक्ष के कोने-कोने में तैरते रहते हैं। और स्पेसवॉक की समाप्ति पर स्पेससूट पर चिपके ये खास रासायनिक यौगिक कण अंतरिक्षयात्रियों के साथ स्पेस स्टेशन के भीतर आ जाते हैं।
स्पेसवॉक खत्म करके स्पेस स्टेशन के सुरक्षित माहौल में जब भी अंतरिक्षयात्री अपना हेलमेट उतारते हैं, उन्हें सबसे पहले यही जलती की गंध महसूस होती है, जिसकी वजह उनके स्पेससूट पर चिपके यही अंतरिक्ष के रासायनिक यौगिक होते हैं।
अंतरिक्ष की ये गंध इतनी महत्वपूर्ण है कि तीन साल पहले नासा ने मशहूर सुगंध निर्माता कंपनी ओमेगा इनग्रैडिएंट्स के स्टीवन पीयर्स से संपर्क कर उन्हें अंतरिक्ष जैसी गंध बनाने को कहा था। ताकि प्रशिक्षण के दौरान भावी अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष के माहौल का एहसास उसकी गंध के साथ कराया जा सके। ऐसे ही एक दूसरे ऑर्डर पर ओमेगा इनग्रैडिएंट्स नासा के लिए चंद्रमा की गंध तैयार कर चुकी है, जो बारूद से मिलती-जुलती है।
अंतरिक्ष की एक गंध तो है, लेकिन इस गंध का स्रोत क्या है? अंतरिक्ष की ये गंध आखिर फूटती कहां से है? अंतरिक्ष की गंध की तरह इसके स्रोत का जवाब भी उतना ही सीधा-साधा है। अंतरिक्ष की गंध फूटती है मरते हुए सितारों से। नासा के एम्स रिसर्च सेंटर की एस्ट्रोफिजिक्स एंड एस्ट्रोकैमिस्ट्री लैब के संस्थापक और निदेशक डॉ. लुइस अलामैंडोला बताते हैं कि कई धातुओं, गैसों और रासायनिक तत्वों को खुद में समेटे सितारों की मौत जब सुपरनोवा धमाके के साथ होती है तो पॉलीसाइक्लिक एरोमिक हाइड्रोकार्बन्स के कण अंतरिक्ष में दूर-दूर तक बिखर जाते हैं। कार या मोटरसाइकिल के इंजन, दहकती धातु, डीजल के धुएं और किसी चीज के भुनने की इन सभी गंध के मिलेजुले रूप वाली अंतरिक्ष की ये खास गंध पॉलीसाइक्लिक एरोमिक हाइड्रोकार्बन्स के इन्हीं कणों में छिपी होती है। पॉलीसाइक्लिक एरोमिक हाइड्रोकार्बन्स के कण हमारी आकाशगंगा के कोने-कोने में मौजूद हैं। ये खास रासायनिक कण धूमकेतुओं, उल्काओं और स्पेस डस्ट में भी मौजूद पाए गए हैं। धरती पर जीवन की शुरुआत के लिए आधार तैयार करने में भी इन रासायनिक कणों की अहम भूमिका की पहचान हुई है। इतना ही नहीं, धरती पर मिलने वाले कोएले, कच्चे तेल और यहां तक कि हमारे खाने में भी अंतरिक्ष के ये रासायनिक कण खोजे गए हैं।
डॉ. अलामैंडोला बताते हैं कि हमारा सौरमंडल खासतौर पर काफी ‘कसैला’ है, क्योंकि ये कार्बन से भरपूर है और यहां ऑक्सीजन काफी कम है। अगर आप अपनी कार या बाइक के इंजन में जाने वाली हवा को रोक दें तो एक मिसफायर के साथ तेज गंध के साथ काला धुंआ यानि कार्बन निकलता है, ये गंध सौरमंडल की गंध से मिलती-जुलती है।
ऑक्सीजन की बहुतायत वाले सितारों की गंध कोएले के जलने जैसी होती है। लेकिन अगर एक बार आप हमारी आकाशगंगा के बाहर चले जाते हैं तो अंतरिक्ष की गंध भी बदल जाएगी। ब्रह्मांड के अंधेरे कोनों में मौजूद धूलकणों में अलग-अलग गंध मौजूद हो सकती है, जो हमें जलती हुई शक्कर और सड़े अंडों जैसी भी लग सकती है।