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रविवार, 11 जुलाई 2010

उल्काओं की दुनिया में मिशन रोसेटा

आप जो तस्वीर देख रहे हैं, ये तस्वीर है हमसे करीब 29 करोड़ किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में आवारा घूम रही एक विशाल उल्का 'ल्यूटेशिया' की। उल्का 'ल्यूटेशिया' का आकार 100 किलोमीटर से भी बड़ा है और उल्का ल्यूटेशिया का ये तस्वीर ली है इसके करीब जा पहुंचे यूरोपियन स्पेस एजेंसी के स्पेसक्राफ्ट रोसेटा ने। 2010 ऐसे ऐतिहासिक साल के तौर पर याद किया जाएगा, जब पहली बार हम खुद उल्काओं तक चलकर गए, उन्हें छूकर देखा और वहां की धूल-मिट्टी के नमूने भी साथ लेकर आए। हाल ही में हमें धरती पर वापस लौटे जापान के हयाबुसा मिशन के कैप्सूल से हमें उल्का इटोकावा की धूल हासिल हुई है। ये उल्का इटोकावा हमसे करीब 30 करोड़ किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में आवारा घूम रही है। उल्काओं के अध्ययन में साल की दूसरी सबसे अहम घटना के तौर पर यूरोपियन स्पेस एजेंसी का खास मिशन रोसेटा अब 'ल्यूटेशिया' नाम की एक विशाल उल्का के करीब जा पहुंचा है।
1852 में खोजी गई 100 किलोमीटर से भी विशाल उल्का 'ल्यूटेशिया' धरती से देखने पर अंधेरे आसमान में रोशनी के एक छोटे से बिंदु के रूप में नजर आती है। इस विशाल उल्का की इतनी साफ और इतने करीब से तस्वीर पहली बार ली गई है और इस तस्वीर को लेते वक्त स्पेसक्राफ्ट रोसेटा इस उल्का से करीब 3100 किलोमीटर दूर था। मंगल और बृहस्पति के बीच मौजूद उल्काओं की बेल्ट ही 'ल्यूटेशिया' का घर है। 2004 में धरती से रवाना हुआ मिशन रोसेटा अब उल्का 'ल्यूटेशिया' के घर जा पहुंचा है और 52,142 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलते हुए रविवार रात करीब पौने दस बजे ये स्पेसक्राफ्ट इस विशाल उल्का के सबसे करीब से गुजर रहा है। मिशन रोसेटा करीब दो घंटे तक उल्का 'ल्यूटेशिया' के चक्कर लगाएगा और उसकी तस्वीरें और दूसरे वैज्ञानिक अध्ययन कर तमाम डेटा धरती को भेज देगा। मिशन रोसेटा के लिए उल्का 'ल्यूटेशिया' बस एक पड़ाव भर है, इसकी असली मंजिल 'कॉमेट 67पी/ कुर्व्यूमोव-गेरासिमेंको' नाम का एक धूमकेतु है। मिशन रोसेटा अपनी मंजिल इस धूमकेतु पर 2014 को पहुंचेगा। यहां पहुंचकर रोसेटा एक लैंडर को इस धूमकेतु पर उतारेगा और इस धूमकेतु से धूल और बर्फ के सैंपल लेकर उसे हमारे पास वापस भेज देगा।
उल्काओं और धूमकेतु दरअसल टाइम कैप्सूल्स हैं, यानि यहां उस वक्त का वो सारा पदार्थ मौजूद है, जब हमारे सौरमंडल का निर्माण हो रहा था। ग्रहों और चंद्रमाओं के बनने के दौरान जो कुछ बचा रह गया वो पदार्थ उल्का और धूमकेतु की शक्ल में सौरमंडल में आवारा घूम रहा है। इसीलिए उल्काओं और धूमकेतुओं का मिशन हकीकत में खुद को जानने और अपनी दुनिया को समझने का मिशन है।

स्पेन की 'ला-रोजा' अंतरिक्ष में

जीरो ग्रैविटी पर फुटबाल मैच न सही, टीम की जर्सी तो जा ही सकती है। अंतरिक्ष के जीरो ग्रैविटी माहौल में मौजूद ये ऑफीशियल जर्सी है स्पेन की फुटबाल टीम की और फीफा वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले से ठीक पहले इसे अंतरिक्ष में भेजा है बार्सीलोना के फुटबाल दीवानों ने। बार्सीलोना फुटबाल टीम की इस जर्सी को स्पैनिश में 'ला-रोजा' कहते हैं, जिसका अर्थ होता है - सुर्ख लाल।
14वें यूरोपियन बैलून फेस्टिवल के दौरान स्पैनिश टीम के फैन्स को अपनी टीम की जर्सी 'ला-रोजा' को बैलून की मदद में अंतरिक्ष भेजने का अनोखा आइडिया सूझा। बस फिर क्या था, फाइनल मैच में जीत की कामना के साथ स्पैनिश टीम की जर्सी को एक बैलून में बांधकर उड़ा दिया गया। इस बैलून में ट्रैकिंग डिवाइस के साथ कैमरे भी लगे थे। ये तस्वीर बैलून में लगे कैमरे ने तब खींची जब बैलून धरती से 33 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंच चुका था। करीब चार घंटे की उड़ान के बाद बैलून को वापस उतार लिया गया। स्पैनिश टीम की जर्सी को अंतरिक्ष की ऊंचाई तक पहुंचाकर स्पेन की फुटबाल टीम के समर्थकों ने फिर जमकर जश्न भी मनाया।

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

रोजवेल यूएफओ राज(?) के 63 साल


स्टूडेंट्स के साथ एक इंटरैक्शन के दौरान एक छात्र ने मुझसे रोजवेल यूएफओ वाली मशहूर घटना का जिक्र किया। वो जानना चाहता था कि यूएफओ की घटनाओं में कितनी हकीकत है और कितना फ़साना? ये ऐसा सवाल है जिसका सही-सही जवाब किसी के पास नहीं है। मैंने उसे प्रोजेक्ट ब्लूबुक से लेकर पिछले साल तक अपने देश के टीवी न्यूज चैनल्स में नजर आ रहे यूएफओ की भीड़ के तमाम सारे किस्से सुना डाले, लेकिन अंत में मैंने उसे यही बताया कि इस सवाल का सही जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन इस स्टूडेंट ने मुझे याद दिला दिया कि ये मशहूर घटना 63 साल पुरानी हो गई है। जब इस खबर के साथ दुनियाभर तेज सनसनी दौड़ गई थी कि अमेरिका के न्यू मैक्सिको के रोजवेल कस्बे के बाहर एक उड़नतश्तरी दुर्घटनाग्रस्त हो गई है। खबर के विवरण चौंका देने वाले थे, कि हादसे का शिकार बनी यूएफओ से एलियन्स भी बरामद किए गए हैं और अमेरिकी वायुसेना इस पूरे वाक्ये पर पर्दा डालने में जुटी है। ये खबर इतनी सनसनीखेज थी कि यूएफओलॉजिस्ट अब तक इसकी मिसालें देते हैं।
लेकिन रोजवेल घटना के राज जानने के बजाय मेरी दिलचस्पी ये जानने में ज्यादा है कि अगर वाकई रोजवेल के रेगिस्तान में कोई यूएफओ गिरी थी, तो आखिर वो आई कहां से होगी? यूएफओलॉजिस्ट इस सवाल का जवाब भी देते हैं, उनके मुताबिक रोजवेल की यूएफओ हमसे करीब 39 प्रकाश वर्ष दूर दक्षिणी आसमान में मौजूद डबल स्टार सिस्टम 'जेटा रेटिकुली' की परिक्रमा कर रहे किसी ग्रह से आई थी।

हमारा सूरज और सौरमंडल सिंगल स्टार सिस्टम है, यानि एक सूरज की परिक्रमा करते कई ग्रह। जबकि 'जेटा रेटिकुली' सिस्टम दो सितारों से बना है, जो एक-दूसरे से करीब 800 अरब मील दूर हैं। 'जेटा रेटिकुली' डबल स्टार सिस्टम को यूएफओ के किस्से से जोड़ने का काम 1970 में किया था अमेरिका के ओहायो की एक स्कूल टीचर ने। मारजोरी फिश नाम की इस स्कूल टीचर का दावा था कि उसने 1961 के एक यूएफओ एबडक्शन केस के विवरणों से एक स्टार मैप बनाया है, जो ये बताता है कि एलियन्स कहां से आए थे। 1961 का ये एलियन एबडक्शन केस यानि एलियन्स के हाथों अगवा हो जाने का मामला, सबसे पहले पत्रकार जॉन फुलर की पुस्तक 'इंसीडेंट ऐट एक्सेटर : द इंट्रप्टेड जर्नी' के जरिए दुनिया के सामने आया। किस्सा कुछ यूं है कि दावा किया गया था कि न्यू इंग्लैंड की एक दंपत्ति को एलियन्स उठा ले गए थे और यूएफओ में उनका मेडिकल परीक्षण भी किया गया था।


जांचकर्ताओं ने जब हकीकत जानने के लिए एलियन एबडक्शन का दावा कर रही महिला बेट्टी हिल को सम्मोहित किया, तो सम्मोहन के दौरान उसने स्टारमैप का एक स्केच बनाया....उसका दावा था कि उसने सितारों का ये रास्ता एलियन स्पेसशिप के भीतर से देखा था। ये 1970 का शुरुआती दौर था, तब कंप्यूटर टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस नहीं थी, इसलिए इस किस्से में दिलचस्पी लेने वाली ओहायो की स्कूल टीचर मारजोरी फिश ने लोहे का सामान्य तार और मोतियों के इस्तेमाल से उस स्टार मैप का मॉडल बनाया। फिर उसे लेकर घर के पिछवाड़े से सितारों भरे आसमान में एलियन्स के घर का ठिकाना तलाशने में जुट गई। संयोग से उसका मॉडल दक्षिणी आसमान में मौजूद स्टार सिस्टम 'जेटा रेटिकुली' से मेल खा गया। बस फिर क्या था, यूएफओ और एलियन्स के किस्सों में दिलचस्पी रखने वालों को एक नई कहानी मिल गई और रोजवेल यूएफओ के किस्से को भी इसीसे जोड़ दिया गया। ये बात अलग है कि हमसे 39 प्रकाश वर्ष दूर इस स्टार सिस्टम में जीवन के निशान की बात तो छोड़िए, किसी ग्रह की मौजूदगी के भी प्रमाण अब तक नहीं मिले हैं।

एलियन्स को लेकर बेकार ही परेशान हैं हॉकिंग


स्टीफन हॉकिंग एलियन्स को लेकर काफी परेशान हैं। इस मशहूर भौतिकशास्त्री ने हाल ही में सुझाव दिया था कि हमें एलियन्स से संपर्क की कोई कोशिश नहीं करनी चाहिए। मिसाल के तौर पर हॉकिंग ने याद दिलाया था कि जब अमेरिका पर यूरोपियन्स के कदम पड़े तो उस जमीन के असली मालिक रेड इंडियन्स का क्या हाल हुआ था। हॉकिंग ये मानकर चल रहे हैं कि धरती पर आने वाले परग्रहीय सभ्यता के प्राणी टेक्नोलॉजी में हमसे बहुत आगे होंगे और उनसे हमारी पहली मुलाकात संपूर्ण मानव सभ्यता के लिए एक बुरी खबर साबित होगी।
हॉकिंग इसके जरिए मेरे रोजमर्रा के काम के एक संभावित नतीजे का अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे हैं। मैं दुनियाभर में फैले तमाम सहयोगियों के साथ एक छोटे से मिशन में जुटा हूं, जिसे दुनिया- सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्टि्रियल इंटेलिजेंस यानि 'सेटी' के नाम से जानती है।
अगर किसी दिन हमें अपने मिशन में कामयाबी मिल गई, यानि हमें एलियन्स के सिगनल्स मिल गए, तो जरा सोचिए, क्या होगा? क्या ऐसे में हमें एलियन्स के सिगनल्स का जवाब देना चाहिए? क्योंकि हमारा ब्रॉडकास्ट दूर सितारों पर रहने वाले उन एलियन्स के सामने धरती का पूरा पता जाहिर कर देगा। हॉकिंग के शब्दों में ऐसे में हमारे सिगनल्स पकड़ते ही एलियन्स की हमलावर सेना धरती की ओर कूच कर देगी।
एलियन सभ्यता से कोई रेडियो सिगनल या मैसेज मिलने पर हमें क्या करना चाहिए? सेटी प्रोजेक्ट में काम करने वाले वैज्ञानिकों की एक टीम, इंटरनेशनल एकेडमी आफ एस्ट्रोनॉटिक्स में तीन साल से इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश कर रही है।
सच्चाई तो ये है कि अनजान सभ्यताओं की तलाश में अपनी ओर से रेडियो सिगनल्स को भेजना बंद कर देना कोई समझदारी नहीं होगी। बल्कि मैं तो ये कहूंगा कि अपने सिगनल्स को रोक देने के लिए अब बहुत देर हो चुकी है। पिछले 60 साल से हम अपने टीवी, रेडियो और राडार सिगनल्स के जरिए, सितारों भरे आसमान में अपनी मौजूदगी का खुल्लम-खुल्ला प्रचार कर रहे हैं। अक्टूबर 1951 में पहली बार ब्राडकास्ट हुआ मशहूर टेलीविजन कार्यक्रम 'आई लव लूसी' भी अब तक 6000 से ज्यादा स्टार सिस्टम्स को पार कर चुका होगा और हर दिन एक नए सौरमंडल को पार करता चला जा रहा है। हमारे टीवी प्रेग्राम के रेडियो सिगनल के रेडिएशन को पकड़ना कोई मुश्किल काम नहीं है। हालांकि दूरी के साथ ये सिगनल कमजोर पड़ते जाएंगे, लेकिन सबसे नजदीक की एलियन सभ्यता भी अगर 1000 प्रकाश वर्ष के दायरे में है तो वो इस सिगनल को पकड़ लेगें, बशर्ते उनकी एंटीना टेक्नोलॉजी हमसे एक या दो सदी आगे की हो।
अगर एलियन सभ्यताएं हमारे स्तर तक भी विकसित हुईं तो वो भले ही हमारे टेलीविजन और राडार सिगन्स को न पकड़ पाएं, लेकिन सेटी प्रोजेक्ट के तहत हम जो रेडियो सिगनल जानबूझकर भेजते हैं, इन्हें वो आसानी से पकड़ सकती हैं। ऐसे में अपने जैसी सभ्यताओं से भला क्या डरना?
असली बात ये कि अगर कोई एलियन सभ्यता वाकई खतरनाक है, तो हम उन्हें सिगनल भेजें या न भेजें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ऐसी सभ्यता अपने सूरज का इस्तेमाल एक ग्रेविटेशनल लेंस की तरह करके हमारे शहरों की सड़कों पर जलने वाले नाइट स्ट्रीट लैम्प्स तक की रोशनी भी आसानी से देख सकती हैं। ऐसे में हॉकिंग की चेतावनी का क्या मतलब है?
- सेथ शॉस्टैक
(लेखक सेटी इस्टीट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक और इंटरनेशनल एकेडमी आफ एस्ट्रोनॉटिक्स के चेयरमैन हैं)

सोमवार, 5 जुलाई 2010

धरती के गुरुत्वाकर्षण में एक बड़ा छेद

नासा के गुरुत्वाकर्षण मिशन गोस ( GOCE) ने पता लगाया है कि गुरुत्वाकर्षण बल का वितरण पूरी धरती पर एकसमान नहीं है। गोस ने गुरुत्वाकर्षण बल के वितरण के आधार पर धरती का एक खास नक्शा तैयार किया है। इसके मुताबिक गुरुत्वाकर्षण की सबसे बड़ी हलचल का केंद्र भारतीय महाद्वीप ही है। भारत में जैसे-जैसे आप दक्षिण की ओर जाते हैं, धरती के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव में कमी आने लगती है। लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि आप हवा में तैरने लगेंगे। दक्षिण भारत में गुरुत्वाकर्षण बल में कमी आपको अपने वजन में गिरावट के रूप में महसूस होगी।
मिशन गोस ने श्रीलंका से आगे, हमारे हिंद महासागर में एक ऐसी जगह खोजी है, जहां से अगर आप गुजरेंगे तो आपका वजन अचानक काफी कम हो जाएगा। ऐसा इसलिए, क्योंकि हिंद महासागर के बीचोबीच, ये वो जगह है, जहां धरती के गुरुत्वाकर्षण में एक बड़ा छेद मौजूद है। ये खबर अपने आप में बिल्कुल नई और अनोखी है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण के बारे में हमेशा से ये माना जाता था कि पूरी धरती का गुरुत्वाकर्षण लगभग एक सा ही है।
नासा के गुरुत्वाकर्षण मिशन गोस से मिले डाटा से धरती के गुरुत्वाकर्षण में छेद की खोज की है कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने। वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती के गुरुत्वाकर्षण में छेद की वजह ये है कि धरती की ऊपरी पर्त की दो प्लेटें, हिंदमहासागर के बीचोबीच से एक-दूसरे को नीचे धकेलते हुए धरती के कोर में समाती जा रही हैं। वैज्ञानिक गुरुत्वाकर्षण में छेद के असर का पता लगाने में जुटे हैं।

देश की तीसरी आंख - कार्टोसेट-2 बी


इसरो 12 जुलाई की सुबह 9 बजकर 23 मिनट पर 'देश की तीसरी आंख' यानि हाई रेजोल्यूशन रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट कार्टोसेट-2 बी को श्रीहरिकोटा से लांच करने जा रहा है। कार्टोसेट हमारे देश का एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है और इस सीरीज के दो सेटेलाइट पहले से काम कर रहे हैं। कार्टोसेट-2 बी की लांचिंग के साथ ही तीन सेटेलाइट्स के जरिए अंतरिक्ष से निगरानी का नेटवर्क पूरा हो जाएगा।
कार्टोसेट प्रोजेक्ट को मुख्यतौर पर भारत के किसी भी शहर, किसी भी मोहल्ले या सड़क को अंतरिक्ष से देखने के लिए डिजाइन किया गया है। कार्टोसेट -2 बी कहीं ज्यादा संवेदनशील है। कार्टोसेट के जरिए हम देश में कहीं भी स्थिर खड़ी या फिर चल रही 80 सेंटीमीटर के आकार वाली किसी भी चीज की बिल्कुल साफ तस्वीर अंतरिक्ष से देख सकते हैं और उसे फॉलो कर सकते हैं। यानि अगर कोई नेता कहीं जाता है तो कार्टोसेट-2बी की लांचिंग के बाद अब उसकी कार की निगरानी अंतरिक्ष से ही की जा सकेगी। ऐसा ही हम किसी आतंकवादी या अपराधी के लिए भी कर सकेंगे। हमारा कद भी 80 सेंटीमीटर से बड़ा होता है, इसलिए कार्टोसेट-2बी के जरिए अंतरिक्ष से ही किसी भी खास आदमी की हरकतों पर नजर रखना अब संभव होगा।
कार्टोसेट - 2 बी सुरक्षा एजेंसियों के लिए खास तौर पर मददगार साबित होगा और इसकी मदद से सीमाओं की निगरानी और घुसपैठ की रोकथाम अब कहीं ज्यादा असरदार तरीके से की जा सकेगी। फिलहाल इसरो ने अपनी रिलीज में कहा है कि कार्टोसेट-2 बी की मदद से इंफ्रास्ट्रक्चर यानि आधारभूत ढांचे के विकास और शहरीकरण की योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी।
690 किलो वजनी कार्टोसेट -2बी को लांच वेहेकिल पीएसएलवी के जरिए अंतरिक्ष भेजा जाएगा। इसके साथ ही 117 किलो वजनी अल्जीरिया के एक सेटेलाइट 'अल्सेट' और कनाडा और स्विटजरलैंड के दो नैनो सेटेलाइट्स एनएलएस 6.1 और एनएलएस 6.2 को भी अंतरिक्ष भेजा जा रहा है। लेकिन पीएसएलवी के इन हाई टेक्नोलॉजी सेटेलाइट्स के साथ बेंगलौर और हैदराबाद इंजीनियरिंग कालेज के छात्रों का बनाया एक नैनो सेटेलाइट 'स्टुडसेट' को भी लांच किया जा रहा है। यानि रॉकेट पीएसएलवी की एक लांचिंग के साथ ही पांच सेटेलाइट्स को एकसाथ अंतरिक्ष भेजा जा रहा है। इसरो के लिए मल्टिपल लांचिंग कोई नई बात नहीं इससे पहले 2008 में सिंगल लांच के साथ 10 सेटेलाइट्स को अंतरिक्ष भेजकर इसरो वर्ल्ड रिकार्ड बना चुका है।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

धरती और वातावरण की गर्मी पर पेड़-पौधों की प्रतिक्रिया

अब तक माना जाता रहा है कि पेड़-पौधे धरती का तापमान कम रखने में मददगार हो सकते हैं, लेकिन बैंगलोर आईआईटी के प्रोफेसर गोविंदसामी बाला के मुताबिक अगर वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता हो गई तो पेड़-पौधे धरती की सतह को सीधे गर्म कर देंगे। बैंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) के प्रोफेसर गोविंदसामी बाला ने गरम होते वायुमंडल पर पेड़-पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन किया है। उन्होंने बताया कि हाल ही में किए गए एक इंटरनेशनल मॉडल के अध्ययन में इस अवधारणा पर जोर दिया गया है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता सीधे तौर पर पेड़-पौधों पर असर डालेगी। ऐसी स्थिति में ये पेड़-पौधे वायुमंडल की कार्बन डाई डाइऑक्साइड से बढ़ने वाले तापमान की तुलना में ज्यादा गर्मी पैदा करेंगे।
प्रो. बाला इस अध्ययन रिपोर्ट के को-राइटर हैं। वातावरण की गर्मी बढ़ने पर पेड़-पौधों की प्रतिक्रिया का अध्ययन उन्होंने स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के कार्नेगी इंस्टीट्यूशन फॉर साइंस के लॉंग काओ और केन कैल्डेरिया के साथ संयुक्त रूप से किया है। उन्होंने बताया कि कार्बन डाइऑक्साइड ग्रीनहाउस गैस है और धरती के तापमान में वृद्धि करती है। वायुमंडल में इसकी अधिकता से पौधे इसका शोषण भी कम करते हैं और नतीजतन उनसे ठंडी वाष्प भी कम ही निकलती है।
प्रो. बाला ने कहा आने वाले समय में वैश्विक जलवायु परिवर्तन का पूर्वानुमान लगाने के लिए प्रयासरत वैज्ञानिकों के लिए यह अध्ययन महत्वपूर्ण है। यह अध्ययन उनके जलवायु संबंधी मॉडलों में पादप जैवविज्ञान के महत्व को रेखांकित करता है।
प्रो. बाला ने बताया जब गर्मी बढ़ जाती है तब हमारे शरीर से अधिक पसीना निकलता है। हमारी त्वचा के छिद्रों द्वारा पानी का अधिक वाष्पीकरण होता है, जिससे हमारे शरीर का तापमान नहीं बढ़ पाता। इसी तरह जब पौधे सूर्य के फोटॉन का इस्तेमाल कर प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से अपने लिए भोजन तैयार करते हैं तो पत्तियों की सतह पर पाए जाने वाले छिद्रों (स्टोमेटा) से पानी का वाष्पीकरण होता है और पौधों का तापमान सामान्य बना रहता है। लेकिन वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता हो जाने पर स्टोमेटा ज्यादा नहीं खुलते और वाष्पीकरण कम होता है। इसके फलस्वरूप पौधे में वाष्पोत्सर्जन की दर कम हो जाती है और पौधों का तापमान बढ़ने लगता है, जिससे धरती की सतह का तापमान भी बढ़ सकता है।
स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. केन कैल्डेरिया के मुताबिक धरती की जलवायु व्यवस्था पर पेड़-पौधों का जटिल और विविधतापूर्ण असर पड़ता है। पौधे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर धरती को ठंडा रखने में मदद करते हैं, लेकिन उनके कुछ दूसरे प्रभाव भी होते हैं, मिसाल के तौर पर पौधे वाष्पोत्सर्जन कर वायुमंडल और धरती के तापमान को भी प्रभावित करते हैं। इन सभी कारकों पर ध्यान दिए बिना जलवायु के बारे में पूर्वानुमान लगाना लगभग असंभव है। इस अंतरराष्ट्रीय अध्ययन की रिपोर्ट ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द यूएस नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ के तीन से सात मई के ऑनलाइन संस्करण में प्रकाशित हुए हैं।
धरती और वातावरण की गर्मी पर पेड़-पौधों की प्रतिक्रिया के मद्देनजर ये अध्ययन रिपोर्ट महत्वपूर्ण है, और मैं इसपर टिप्पणी करने से खुद को नहीं रोक पा रहा हूं। अंतरराष्ट्रीय साइंस बिरादरी में वैज्ञानिकों का एक तबका कुछ ऐसे अध्ययन में जुटा है जिनके विषय काफी सनसनीखेज हैं। इन अध्ययन रिपोर्टों को मीडिया अपने-अपने ढंग से पेश करता है। ये काफी हैरान करने वाला है कि आप पेड़-पौधों का तापमान बढ़ने को धरती के गरम होने से जोड़ रहे हैं, और ऐसा करते वक्त आप दुनियाभर में चल रहे करोड़ों एयरकंडीशनिंग यूनिट्स, रेफ्रीजरेटर्स, और गाड़ियों के हुजूम का जिक्र भी नहीं करते। ये सारी चीजें वातावरण में सबसे ज्यादा गर्मी छोड़ रही हैं। सहारा के तपते रेगिस्तान में भी रातें सर्द होती हैं, वहां कोई पेड़-पौधे नहीं हैं। सहारा मरुस्थल में भी आप अगर तपती रेत को ऊपर से हटाएं तो भीतर ठंडी रेत मिलती है। सहारा की रेत को गरमाने और उसके नीचे मौजूद रेत को ठंडा रखने में कम से कम पेड़-पौधों की कोई भूमिका नहीं है। इससे ये साबित होता है कि कम से कम धरती को गरम करने में पेड़-पौधों की कोई भूमिका नहीं है। सूरज की गरमी में धरती के गरमाने और रात होते ही धरती का ठंडा हो जाना एक प्रक्रिया है, जिसमें धरती को चारों ओर से घेरे महासागर, धरती के तापमान का अंतरिक्ष में परावर्तन और रात अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। पेड़-पौधे वैसे ही इस धरती पर अपने वजूद को बचाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं, ऐसे में प्रो. बाला और दूसरे वैज्ञानिकों की इस जैसी दूसरी रिपोर्टें उन्हें धरती के विलेन के तौर पर पेश कर रही हैं। ऐसी रिपोर्टें सरकारों को पेड़-पौधों का विनाश करने का एक नया हथियार दे देंगी। धरती और वायुमंडल को असली खतरा ऐसी रिपोर्टों से ही है, किसी और चीज से नहीं।