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रविवार, 20 अप्रैल 2014

... गुडबॉय गैबी!

मशहूर उपन्यासकार और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ का 87 साल की उम्र में मैक्सिको में निधन हो गया . मार्क़ेज की गिनती स्पैनिश भाषा के महान लेखकों में होती है. उनके कालजयी उपन्यास 'वन हन्ड्रेड ईयर्स ऑफ़ सॉलीट्यूड' के जादुई यथार्थवाद ने लोगों को अपना मुरीद बना दिया था. स्वतंत्र लोकतांत्रिक मूल्यों और सबसे निचले तबके को इंसाफ दिलाने के संघर्ष के साथ मार्केज़ रोजमर्रा की जिंदगी के छोटे-बड़े विरोधाभासों के बीच आम आदमी की कहानी कहते थे. इन मूल्यों के बगैर किसी भी समाज में कला और रचनात्मक विज्ञान का विकास संभव नहीं. अपने पाठकों के लिए 'वॉयेजर' साभार पेश करता है बीबीसी हिंदी के संपादक निधीश त्यागी की लिखी एक श्रद्धांजलि.

'बहुत साल बाद, जब वे फ़ायरिंग स्क्वॉड के सामने खड़े थे, कर्नल ऑरेलिनो बुएंदिया को वह दोपहर याद आ रही थी, जब उनके पिता उन्हें बर्फ़ दिखलाने ले गए थे.'
'वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड' का ये पहला वाक्य है. एक वाक्य में सौ साल हैं, बारूद की आने वाली गंध है, जो मिट्टी और मृत्यु में मिलने वाली है और जन्म के कुछ सालों बाद का वह एक बच्चे का बर्फ़ को लेकर कौतुक, दोपहर में ठंड को महसूसने का रोमांच और पिता की उंगली पकड़ने का आश्वस्तिबोध है. एक कालपात्र में सब कुछ समेटे हुए. एक पल में सौ साल समेटने की क्रिया.

ढाई करोड़ प्रतियाँ बिकने वाला यह उपन्यास इसके आगे शुरू होता है. इस गतिशील क्रिया में. फैलता-सिकुड़ता-समेटता. देश और काल को, स्मृति और कल्पना को, तथ्य और उसकी उड़ान को. मार्केज़ के साथ वे वाक्य नहीं गए हैं. वे यहीं हैं. हमें उलट और पलट कर पढ़ते रहने के लिए. लेखक के चले जाने के बाद भी.

अवसान के समय सबसे पहले विशेषण हत्थे चढ़ते हैं. जैसे मार्केज़ के मरने पर नोबेल पुरस्कार, जादुई यथार्थवाद, उनकी बहुतेरी में से एक किताब वन हंड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड, कोलम्बिया, कैंसर, स्मृतिलोप... विशेषणों की फ़ेहरिस्त बढ़ती जाती है.

हर मृत्यु में हम अपना थोड़ा सा हिस्सा कम होते देखते हैं कुछ दिनों के लिए. पर गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ उर्फ़ गैबो एक ऐसा नाम है, जिसके लिए ये सारे विशेषण छोटे पड़ते रहेंगे. उन क्रियाशील वाक्यों के मुक़ाबले जो उन्हें लिख गए, उनके बाद भी पढ़ें जाने के लिए.

उनकी अपनी ज़िंदगी है और अपना सफ़र. आप अगली बार जब मार्केज़ का लिखा कुछ पढ़ेंगे तो क्या वे अपनी रंग-छवि-अर्थ छोड़कर आपके भीतर कुलबुलाना या साँस लेना बंद कर देंगे?

मृत्यु के बरक्स जीवन एक क्रिया की तरह है. जितना जीवन मार्केज़ के वाक्यों में हैं, जितनी ऑक्सीजन आत्मा के लिए, जितनी शिद्दत, जुम्बिश, बदमाशियां एक क्रिया की तरह हमें, हमारे पढ़ने और पढ़ने के ज़रिए हमारे होने को घटित करती है और मुमकिन भी. चाहे वह मृत्यु के बारे हो या प्रेम की या फिर जंग और तानाशाहों की.

वे हमारे बुनियादी सरोकारों को ज़मीन बनाकर आसमान नापते हैं उसे इतनी अति तक ले जाते हुए जहाँ सच या वास्तविकता भले ही धुँध में घुलने लगती है, पर सत्य या ट्रुथ अपने असल अवतार में सामने आता है. जो हर पाठक का अपना है और शायद अलग भी.

हर अच्छे कथ्य की तरह मार्केज़ के वाक्य आपको पलट कर पढ़ते हैं, आपकी अपनी सहजता, आपके अपने निरस्त्र मनुष्य में. एक क्रिया में साँस लेता हुआ, आगे बढ़ता हुआ. उन भाषाओं में भी जो मार्केज़ की नहीं थी अपने हस्ताक्षर कथ्य के साथ.

कितने ही हिंदुस्तानियों के लिए पाब्लो नेरूदा प्यार की कविताओं में देश और दुनिया के बाक़ी कवियों के मुक़ाबले ज़्यादा सगे, अपने और दिल के क़रीब लगते हैं. लेटिन अमेरिका से हमारी ज़िंदगी में आया दूसरा सबसे महत्वपूर्ण नाम गैबरियल गार्सिया मार्केज़ का है.

अपने नोबेल पुरस्कार समारोह क्लिक करें भाषण की शुरूआत वे एंतोनियो पिगाफेटा नाम के नाविक की किताब का ज़िक्र से करते हैं. पिगाफेटा दुनिया का समुद्र के रास्ते चक्कर लगाने वाले मैगेलन का सहयोगी था. जब वे दक्षिण अमेरिकी हिस्सों में आए तो जो सबसे पहला इंसान दिखलाई दिया, उसके सामने इन यूरोपीय नाविकों ने आईना कर दिया. पिगाफेटा के मुताबिक़ वह इंसान अपनी की शक्ल देखने से आतंकित हो अपने होश खो बैठा.

मार्केज़ का लिखा भी एक आईना है, जिसमें दुनिया ख़ुद को देखती है. अपनी असामान्यताओं के साथ, क्रूरताओं के साथ, किम्वंदतियों के साथ और आश्चर्य के साथ.

एक क्लिक करें इंटरव्यू में वे कहते हैं कि लोग भले ही उनके काम को जादुई यथार्थवाद के नाम पर फंतासियों की तरह देखते हैं, पर उन्होंने एक भी वाक्य ऐसा नहीं लिखा, जिसमें उनकी अपनी हक़ीकत का अंश न हो. कहीं बारिश महीनों से रुकने का नाम नहीं ले रही, कहीं गाँव का गाँव अपनी याददाश्त खो चुका है, कहीं अनिद्रा का शिकार.

इन असामान्य और छोटे सचों का विस्तार अपनी पेचीदगियाँ लेकर आता है, जो दूसरी असामान्यताओं को उधेड़ता है. मार्केज़ के लिखे ये छोटे-छोटे सच संसार के पार जाकर हमसे पहचान बढ़ाते हैं, हमें मुस्कुराने और चकित होने और मायूस होने पर मजबूर करते हैं.

उनका कहना भी था कि वे किसी साहित्य और आलोचक और अनजाने लोगों को ध्यान में रखकर नहीं लिखते. वे सिर्फ़ इसलिए लिखते हैं कि उनके दोस्त उनसे और ज़्यादा मुहब्बत करें. इसीलिए उनका जो लिखा है वह सिर पर रखे नहीं, दिल पर रखे बोझ की तरह है, जो एक इंसान दूसरे से क़िस्सागोई की सहजता से साझा कर हल्का हो जाना चाहता है. मनुष्य होने की तमाम कमज़ोरियों के साथ बेझिझक अंदाज से शब्दचित्र बनाते हुए.

पत्रकारिता और साहित्य के बीच के रिश्ते के बारे में वह क्लिक करें यहाँ बताते हैं कि साहित्य के लिए ज़मीनी सच से जुड़े रहना ज़रूरी है, जो पत्रकारिता मुमकिन करवाती है. लेटिन अमेरिकी पत्रकारिता में वे पुरानी घटनाओं को पुनर्संयोजित कर बहुत ही प्रभावी तरीक़े से पेश करने वाले सबसे माहिर लोगों में जाने जाते थे. लेटिन अमेरिका में इसे रेफ्रितो (फिर से छौंकी हुई) स्टाइल की पत्रकारिता कहते हैं.

जहाज़ दुर्घटना में बच गये नाविक की ऋंखलाबद्ध कहानी न सिर्फ़ इसकी एक बड़ी मिसाल है, बल्कि बाद में किताब 'द स्टोरी ऑफ़ ए शिपरैक्ड सेलर' भी बनकर आई. वेलकोस नाम का ये नाविक दस दिन तक समुद्र में डूबता-उतराता रहा था, जिसका मार्केज़ ने लगातार पाँच दिन छह-छह घंटे इंटरव्यू किया और उसी के शब्दों में आपबीती की तरह रिपोर्ट लिखी.

वे ये भी कहते हैं कि जहाँ एक ग़लत तथ्य पत्रकारिता की विश्वसनीयता दाँव पर लगा देता है, वहीं एक अकेला सच साहित्य को खड़े होने की ज़मीन देता है. मार्केज़ के मुताबिक़ अगर आप लोगों से ये कहें कि हाथी आसमान में उड़ रहे थे, तो कोई आपपर भरोसा नहीं करेगा. पर अगर आप ये कहें कि आसमान में चार सौ पच्चीस हाथी उड़ रहे हैं, तो लोग शायद आपकी बात मान लें.

यह मिसाल देने वाले न तो लेखक आसानी से मिलेंगे और न ही पत्रकार. पर मार्केज़ गप मारने से ज़्यादा ज़ोर उस विस्तार पर दे रहे हैं, जो उनके रिपोर्ताज में भी दिखता है. 'न्यूज़ ऑफ़ ए किडनैपिंग' एक अपहरण की घटना के ज़रिए एक देश, समय, राजनीति, सत्ता, ड्रग लॉर्ड पाब्लो एस्कोबार पर लिखी गई किताब है, उस सच के जो दिहाड़ी पत्रकारिता के टुकड़ा-टुकड़ा सच में अक्सर ठीक से दर्ज नहीं होता.

'लव इन द टाइम ऑफ कोलेरा' उनकी दूसरी सबसे लोकप्रिय किताब है. शायद प्यार पर लिखा गया दुनिया का सबसे सुंदर उपन्यास भी. मार्केज़ के वाक्य अगर भारत और लेटिन अमेरिका से दूर दुनिया की दूसरी जगहों पर अपना जादू दिखलाते रहते हैं, तो यही उनका हासिल है. उनके लिखे वाक्य अपनी ज़मीन और अपने वक़्त से बाहर जाकर किसी और समय किसी और जगह के लोगों को पढ़ सकते हैं, लिख सकते हैं और बहुत बार बदल भी सकते हैं.

इसके प्रकाशन के समय दिए गए क्लिक करें इंटरव्यू में वे बताते हैं कि कैसे देर रात तक फिदेल कास्त्रो के साथ मछली मारने के बाद उन्होंने ड्रैकुला किताब कास्त्रो के तोहफ़े के बतौर दी. सुबह नाश्ते की मेज पर कास्त्रो की आंखें सूजी हुई थीं. मार्केज़ के आते ही कास्त्रो ने ड्रैकुला के लिए भद्दी सी गाली निकाली.

कास्त्रो के साथ उनकी दोस्ती के बारे में उनका कहना था, जिस दिन मैं उसे क्यूबा पर कैसे राज करूं बताने लगूंगा, वह मुझे बताने लगेगा कि ढंग का उपन्यास कैसे लिखा जाता है. कास्त्रो से दोस्ती का एक नतीजा मार्केज़ ने ये भी भोगा कि अमरीका ने लम्बे समय तक उनके आने में अड़ंगा लगा कर रखा.

मार्केज़ की किताबें सबसे ज़्यादा अमरीका में छपीं और सबसे ज़्यादा पढ़ी गईं. और इस इंटरव्यू में वे बताते हैं कि कैसे अमरीकी काउंसलेट के दफ़्तरों के बाबू उनकी किताबों के फैन निकलते हैं, उनके ऑटोग्राफ़ चाहते हैं और फिर वीसा का आवेदन ख़ारिज कर देते हैं. बक़ौल उनके 'मुझे न्यूयॉर्क जाकर किताबें और सीडी ही खरीदनी होती हैं, कोई भाषण नहीं देने होते.'
एक सहज व्यक्ति ही अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मार्थाज विनयार्ड्स में एक लम्बी साहित्यिक मुलाक़ात के दौरान आधी रात के बाद यह कह सकता है, 'अगर फिदेल और तुम आमने-सामने बैठकर बात कर सको, तो सारी दिक़्क़तें ही दूर हो जाएंगी.' उन्होंने बिल क्लिंटन से अपने क्लिक करें इस लेख में मोनिका लेविंस्की वाले मामले में सहानुभूति भी जताई.

इसके पहले क्लिंटन ने अपने चुनाव अभियान में मार्केज़ का मुरीद होने की बात कही और क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति कास्त्रो का तो ऐतिहासिक बयान है-'अगर दुबारा जन्म लेना पड़ा तो मैं गैबो की ज़िदगी जीना चाहूंगा.'

मार्केज़ के मरने से उनके लिखे का जादू और अतियथार्थ दोनों न कम होंगे और न गायब. वे क्रियाशील रहेंगे. लिखे जाने की क्रिया के बाद. पढ़े जाने की क्रिया में. और उन वाक्यों को पढ़ना हर किसी का व्यक्तिगत होगा.

मार्केज़ का लिखा वैसी ही कोई क्रिया है उन विशेषणों से बाहर और उनके आरपार, दुनिया जिन शब्दों की बैसाखी लेकर उनके जाने का स्यापा करने और गड्डमड्ड श्रद्धांजलि देने की कोशिश कर रही है. जिसकी बहुत जरूरत नहीं है.

शायद उनकी ही कोई किताब फिर से उठा कर पढ़ने की ज़रूरत है. ये वाक्य कैसे लिखा. क्या सोचा होगा. उन वाक्यों की गतिशील क्रिया का हिस्सा बनते हुए. उन्हीं के शब्दों में सच के लिए 'लोग सरकारों से ज़्यादा यक़ीन लेखकों पर करते हैं'.
साभार : बीबीसी हिंदी

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

आज होली है, यारो!

 होली के अवसर पर दिल्ली के वरिष्ठ एस्ट्रोनॉमर और मेरे शिक्षक बलदेव राज दावर जी ने एक अद्भुत कविता रची है. ये कविता मानव और प्रकृति के संबंधों की कहानी है, ये कविता बंदर से मानव और मानव के महामानव बन जाने तक की विकासवाद की अदभुत झांकी भी है. होली के मौके पर सभी पाठक गणों को शुभकामनाओं के साथ वॉयेजर की छोटी सी भेंट - 

आज होली है, यारो!
आओ, अपने सारे कपड़े उतारो
और खड़े हो जाओ
एक विशाल और सपाट दर्पण के सामने;
और निहारो सिर से पैर तक
अपने नंगे और निहत्थे रूप को।
और ईर्षा करो बंदर से
जिसे अपनी शर्म ढकने के लिए चड्डी की जरूरत नहीं।
ईर्षा करो हिरन से
जिसके पास तन ढकने के लिए रेशमी रोमावली है - 
अंग-अंग पर मखमली शालाएं है।

और किस-किस से ईर्षा करोगे, यारो?
न तुम हाथी जैसे विशाल हो, न शेर जैसे शूरवीर
न लोमड़ी-से होशियार, न मोर-से मनोहर।
हंस की उड़ान, मधुमक्खी की सामाजिकता,
भौंरे की भावुकता और चींटी की साक्षरता
प्रकृति ने बेचारे मनुष्य को नहीं दी।

ढक लो, ढ़क लो, अपने भौंडे शरीर को।
छुपा के रखो अपनी कमज़ोरियां, लाचारियाँ।
तुम्हारी शक्ति केवल औज़ारों की शक्ति है।
केवल औजारों की बदौलत ही
आज तुम पैदल नहीं, निहत्थे नहीं, नंगे नहीं। 
तुम्हारे पास अस्त्र हैं, शस्त्र हैं, अद्भुत टेक्नोलॉजी है। 

तुम्हारे पैरों में पहिये हैं, आँखों पर ऐनक है,
गोदी में कंप्यूटर है, कानों पर मोबाइल है,
ज़ुबान पर माइक और उँगलियों में रिमोट। 
इशारों ही इशारों में, इस कठपुतली दुनिया को,
मन चाहे नाच नचा रहे हो।

तुम्हारे बनाये हुए हज़ारों नकली चाँद
पृथ्वी के आकाश में विचर रहे हैं।
तुम्हारे भेजे हुए छह पहियों वाले रोबोट
पड़ोसी ग्रहों पर चल-फिर रहे हैं।
अंतरिक्ष में ठहराई हुई तुम्हारी दूरबीनें
ब्रह्माण्ड के कोने-कोने की खोज-बीन कर रही हैं।

प्रकाश की गति से चलने वाले यंत्रों पर तुम सवार हो
पलक झपकने में तुम यहाँ भी हो, वहाँ भी हो,
मानो,एक साथ सब जगह विद्यमान हो।
पिछली दो-तीन सदियों में,
यह दुनिया नयी एक दुनिया हो गई है।
और तुम इस दुनिया के खुदा हो। 
तुम्हें सलाम।
शत-शत प्रणाम तुम्हारे औज़ारों को। 

- बलदेव राज दवार, होली,2014

रविवार, 9 मार्च 2014

राधाकृष्णन: रॉकेट के जरिए रोटी देता है इसरो


हमें पहले क्या करना चाहिए? रोटी जरूरी है या चांद पर जाना? इस मुद्दे पर इसरो चीफ के राधाकृष्णन ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में अपने विचार रखे. राधाकृष्णन ने कहा, 'हम गलत अवधारणा में हैं कि इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना है. बल्कि हम जो काम करते हैं वो सीधे या फिर परोक्ष तौर पर देश की सरकार और जनता के हित में काम आता है. इसरो द्वारा भेजा गया रॉकेट और सेटेलाइट लोगों को रोटी देने का काम भी करता है. किसी किसान या फिर मछुआरे से पूछिए.'

Rockets vs Rotis सत्र में बोलते हुए इसरो के चीफ के राधाकृष्णन ने कहा, 'वैज्ञानिक समझ को बढ़ाने के साथ तकनीकी बेहतरी पर इसरो ने बहुत कुछ किया है. मिशन टू मून हो या मिशन टू मार्स, इसरो ने सिर्फ ये दो काम ही नहीं किए. हमने स्ट्रेटजिक मूवमेंट में भी अहम भूमिका निभाई है.' उन्होंने आगे कहा, '1960 से आज तक यही पूछा जाता है कि भारत जैसे गरीब देश को स्पेस में एयरक्राफ्ट भेजना चाहिए या नहीं? हर प्रोजेक्ट के साथ यही सवाल उठता है. ये सवाल उठते रहेंगे. पर मैं भी एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या भारत जैसे देश को स्पेस साइंस में इनवेस्ट नहीं करना चाहिए, जो सुपरपावर बनना चाहता है?'

राधाकृष्णन ने कहा, 'इसरो में ये सवाल हमलोग हर दिन खुद से पूछते हैं. हम इस बारे में सोचते हैं कि हम जो कर रहे हैं इससे जनता को, सरकार को फायदा होता है या नहीं. इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना नहीं है. 24 सेटेलाइट हैं अंतरिक्ष में हमारे. बड़ा कम्यूनिकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर बनाया है हमने. करीबन 200 ट्रांसपॉन्डर हैं जिनके जरिए मछुआरों की मदद हो रही है. उन्हें समुद्र में किस जगह पर ज्यादा मछली मिलेगी, इसकी जानकारी उपलब्ध कराते हैं हम.

फसलों से बेहतर उपज, तूफान की जानकारी, इस तरह की अहम जानकारियां जुटाने में हमारे सेटेलाइट काम में आ रहे हैं. तूफान फेलिन की जानकारी इनसेट सेटेलाइट से मिली. करीब 400 से ज्यादा तस्वीरें हमें मिलीं जिसके जरिए हजारों जानें बचाई जा सकीं. हमारे पास रॉकेट होने चाहिए क्योंकि सेटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजना है. भूख मिटाना जरूरी है पर स्पेस साइंस को नजरअंदाज नहीं कर सकते. आखिरकार ये भी तो रोटी देने में मदद करता है.'

सोमवार, 25 नवंबर 2013

हमें साइंस पर इसलिए खर्च करना चाहिए



भारत का ‘मार्स ऑरबिटर मिशन’ के साथ ही एक पुराना सवाल फिर सामने है कि क्या भारत जैसे विकासशील देश में, जहां भारी तादाद में लोग अब भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं, वहां 450 करोड़ रुपये मंगल अभियान पर खर्च करना जायज है? ये एक सार्वकालिक सवाल है और केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी वैज्ञानिक समुदाय को इन सवालों का सामना करना पड़ता है। इस बार मंगलयान के साथ ये सवाल कुछ ज्यादा ही जोरदारी के साथ उठाया गया। एक न्यूज चैनल ने तो बकायदा ये भी दिखाया कि 450 करोड़ रुपये में सरकार लोगों के लिए क्या-क्या काम कर सकती थी।
बात केवल मंगलयान की नहीं है। भारत के कुछ और साइंस प्रोजेक्ट्स आने वाले वक्त में पूरे होने हैं, जिनकी लागत करोड़ों में है, मिसाल के तौर पर तमिलनाडु के पास बन रही देश की पहली अंडरग्राउंड न्यट्रिनो लैब, जिसकी लागत 150 करोड़ रुपये से ज्यादा है, उत्तराखंड के देवस्थल में एशिया के सबसे बड़े 13.5 मीटर के टेलिस्कोप की ऑब्जरवेटरी को बनाने का काम जारी है जिसकी लागत करीब 120 करोड़ रुपये है, चंद्रयान-2 जिसकी लागत 426 करोड़ रुपये है और इसके अलावा भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक में स्थायी स्टेशंस चला रहा है, जिसकी सालाना लागत भी कई सौ करोड़ है। सवाल फिर वही कि क्या भारत को साइंस पर भारी खर्च करना चाहिए?
 देश में बीएमडब्लू जैसी करोड़ों की कीमत वाली विदेशी गाड़ियों के बढ़ते महंगे शौक की बात न भी करें तो मंगलयान और साइंस के दूसरे प्रोजेक्ट्स पर हो रहे खर्च पर हाय-तौबा मचाने वाले लोग ये भूल जाते हैं भारत साइंस पर जितना खर्च करता है, उससे कई गुना ज्यादा पैसा इस देश में लोग सिगरेट और शराब पर उड़ा रहे हैं। भारत में सिगरेट का सालाना बाजार 720 अरब रुपये का है। आईटीसी जैसे सिगरेट के बड़े ब्रांड इसे और विस्तार देने के लिए जल्दी ही 25000 करोड़ रुपये और खर्च करने जा रहे हैं। शराब की बात करें तो देश में इस नशे का फुटकर बाजार 2100 अरब रुपये का है। इस नशीले एश्वर्य में झूमते विजय माल्या जैसे लोग फार्मूला-वन और कैसीनो जैसी चीजों को देश में ला रहे हैं और नई पीढ़ी के ‘रोल मॉडल’ बन रहे हैं। लोग सिगरेट और शराब पर एक साल में 2800 अरब रुपये से ज्यादा उड़ा रहे हैं। ये रकम इस बार के केंद्रीय बजट में दर्शाये गए देश के कुल वास्तविक खर्च से भी ज्यादा है।
जब भी हम साइंस पर खर्च करते हैं, अंतरिक्ष पर खर्च करते हैं या किसी नई खोज के लिए खर्च करते हैं, तो हमेशा ये निवेश बोनस के साथ कई-कई रास्तों से वापस हमारे पास लौटता है। ‘चंद्रयान’ देश के अंतरिक्ष अनुसंधान का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ था। चंद्रयान की लागत 354 करोड़ रुपये थी, लेकिन जब चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी खोज निकाला तो इससे देश को जो विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा अर्जित हुई वो नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी को दशकों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके भी नहीं मिल सकी थी।
साइंस अनुसंधान पर होने वाला खर्च मानवता के लिए जीवन बीमा के जैसा निवेश है, जो हमेशा मानवता के भविष्य को बेहतर और सुरक्षित बनाने के लिए किया जाता है। यही वजह है कि 100 साल से ज्यादा वक्त और बीत जाने के बावजूद कैंसर पर रिसर्च अब भी जारी है। एड्स पर विजय पाने की जंग भी पिछले 30 साल से लगातार जारी है। इन लड़ाइयों पर अब तक अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं, वैज्ञानिकों की कई पीढ़ियों ने बगैर किसी ठोस नतीजे के अपनी पूरी जिंदगी इन रोगों पर विजय पाने की कोशिश में खपा दी है। लेकिन समय, पैसे और प्रतिभा के इस लंबे और लगातार निवेश के बदौलत ही अब हमें इन रोगों की लड़ाईयों की अंधी सुरंगों के दूसरे सिरे पर उम्मीद की रोशनी नजर आ रही है। एचआईवी पर काबू पा लिया गया है और कैंसर के खिलाफ भी निर्णायक टीका बस आने को है।
 भारत में जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक अनुसंधान पर होने वाले सकल खर्च को व्यवस्थित और जवाबदेह बनाया जाए। मैंने जब सीएसआईआर के महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी से पूछा कि पिछले 5 साल के दौरान आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही? तो काफी याद करने के बाद उन्होंने ‘ई-रिक्शा’ का नाम लिया। अब अगर देशभर में दर्जनों प्रयोगशालाओं और सरकारी वैज्ञानिकों की भारी-भरकम फौज वाला संगठन सीएसआईआर करोड़ों के बजट को खर्च कर 5 साल में देश के लिए बस ‘ई-रिक्शा’ ही बना सका है। तो इससे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर जो चल रहा है, उसका खुलासा होता है और ये वाकई गहरी चिंता का विषय है। देश में वैज्ञानिकों को रिसर्च प्रोजेक्ट्स के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये आवंटित करा दिए जाते हैं। इसके बाद ऐसी कोई एजेंसी नहीं है जो वैज्ञानिकों से उनके प्रोजेक्ट्स के बारे में जवाब-तलब करे और पैसों की निगरानी करे। 15 से 20 साल तक वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स चलते रहते हैं और साथ में कई सहायक परियोजनाएं भी शुरू हो जाती हैं, विदेश यात्राएं चलती रहती हैं और पैसा बर्बाद होता रहता है। अंत में कोई भी ठोस वैज्ञानिक खोज सामने नहीं आती। जरूरत इस बात की है कि देश में वैज्ञानिक प्रोजेक्ट के लिए एक नियामक एजेंसी बने, जिसमें शीर्ष वैज्ञानिक शामिल हों और जो ये तय करे कि प्रोजेक्ट्स तय समय सीमा में ही पूरे हों, शोध कर रहे वैज्ञानिकों जवाबदेही तय हो, एक तय समयसीमा में शोध पूरे हों और उन प्रोजेक्ट्स के नतीजों का फायदा केवल उस वैज्ञानिक या उसके परिवार को नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों को मिले।
संदीप निगम

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

रॉकेट पर भारत की उड़ान की गोल्डन जुबली

21 नवंबर को भारत अपने पहले राकेट के प्रक्षेपण की स्वर्ण जयंती क्षणों में प्रवेश कर गया। यहां समीप के तटीय थुम्बा गांव में देश के अंतरिक्ष अभियान ने निर्णायक कदम उठाया था जिसकी परिणति आज चंद्रयान और मंगल अभियान के रूप में हमारे सामने हैं ।

उस वक्त नारियल के पेड़ों के झुरमुट के बीच थुम्बा में बस एक ही लांच पैड हुआ करता था। इस रॉकेट की लांचिंग के लिए वैज्ञानिकों ने लांच पैड के करीब मौजूद एक कैथोलिक चर्च सेंट मैरी मैगेडलेन को मुख्यालय के तौर पर इस्तेमाल किया था। बिशप के घर को रॉकेट तैयार करने वाली वर्कशॉप में तब्दील कर दिया गया था।

मवेशियों को बांधने वाली छायादार जगह को लैबोरेटरी बना दिया गया था, जहां अब्दुल कलाम आजाद जैसे नौजवान वैज्ञानिकों ने काम किया। ऐसी लैब और वर्कशॉप में तैयार देश के पहले रॉकेट के अलग-अलग हिस्सों को साइकिल पर लादकर लांच पैड तक पहुंचाया गया था।

इस उनींदे से गांव के आधुनिक भारत का प्रतीक बन जाने का सपना किसी ने नहीं देखा था लेकिन 21 नवंबर 1963 को यहीं से भारत ने अपना पहला अमेरिका निर्मित राकेट प्रक्षेपित किया और यह गांव रातोंरात सुखिर्यों में आ गया।

दूसरा रॉकेट, जिसे कुछ वक्त बाद लांच किया गया, वो आकार में कुछ बड़ा और वजनी था और इसे लांच पैड तक पहुंचाने के लिए बैलगाड़ी की मदद ली गई थी।  पहले रॉकेट लांच के बाद अगले 12 साल के भीतर भारत ने 350 से ज्यादा साउंडिंग रॉकेट्स बनाए और लांच किए।

बाद में इसे थुम्बा इक्वाटोरियल राकेट लांच स्टेशन (टीईआरएलएस) का नाम दिया गया लेकिन कुछ समय बाद इसे विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) कहा जाने लगा। इसरो के इस प्रमुख सेंटर का नामकरण भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर किया गया।

वो साराभाई ही थे जिन्होंने युवा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम को एकत्र कर मिशन की खातिर प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजा था। उनके द्वारा भर्ती किए गए शुरूआती वैज्ञानिकों में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी थे।

केंद्र सरकार ने अंतरिक्ष कार्यक्रम में पहला कदम अगस्त 1961 में उठाया था और परमाणु उर्जा विभाग को अंतरिक्ष शोध तथा बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की जिम्मेदारी सौंपी थी।

1962 में साराभाई की अध्यक्षता में अंतरिक्ष शोध पर एक राष्ट्रीय समिति गठित की गयी जिसने मिशन को आगे बढ़ाया और अगले वर्ष 21 नवंबर को देश ने पहले अमेरिका निर्मित नाइके अपाचे राकेट को थुम्बा से प्रक्षेपित किया।

रविवार, 17 नवंबर 2013

डॉ. भाभा को भारत रत्न से सम्मानित करें: डॉ. राव


देश ने दो दिग्गजों सचिन तेंदुलकर और डॉ.सीएनआर राव को उनके अलग-अलग क्षेत्रों क्रिकेट और साइंस में अतुलनीय योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया है. ये बात अलग है कि सचिन के जश्न में डॉ. राव की खबर दब सी गई है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सचिन और उम्र में उससे दोगुने बड़े डॉ. राव दोनों ही 'मास्टर ब्लास्टर' हैं. सचिन को जहां लोग क्रिकेट का भगवान कहते हैं, वहीं डॉ. राव सॉलिड स्टेट साइंस में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने आप में एक इंस्टीट्यूशन, एक प्राधिकरण के रूप में मशहूर हैं.

 डॉ. सीएनआर राव क्रिकेट के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ये भी सच है कि वो निजी जीवन में क्रिकेट को बहुत ज्यादा पसंद भी नहीं करते हैं. एक यूनिवर्सिटी में अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने कहा भी था कि क्रिकेट ने इस देश में साइंस को पीछे धकेल दिया है. उन्होंने कहा था कि आप सचिन को भारत रत्न देना चाहते हैं तो जरूर दीजिए, लेकिन जरा इस देश के लिए डॉ. भाभा के योगदान को भी याद कर लीजिए, जिन्हें अब तक भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया है. दिसंबर 2011 में डॉ. राव ने बकायदा केंद्र सरकार से मांग की थी कि डॉ. होमी जहांगीर भाभा को उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया जाए.

ये भी अनोखा संयोग है कि डॉ. भाभा से पहले खुद डॉ. सीएनआर राव को ही भारत रत्न से सम्मानित कर दिया गया और वो भी खुद क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर के साथ. देश ने विज्ञान और क्रिकेट दोनों को एकसाथ सम्मानित किया है. डॉ. सीएनआर राव भारत रत्न से सम्मानित होने वाले देश के तीसरे वैज्ञानिक हैं. उनसे पहले अब तक केवल तीन वैज्ञानिकों डॉ. सीवी रमन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को ही भारत रत्न से सम्मानित किया गया है.

देश के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा, देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रणेता डॉ. विक्रम साराभाई, सतीश धवन, बीरबल साहनी, जगदीश चंद्र बोस, शांति स्वरूप भटनागर, महान गणितज्ञ रामानुजन, सुब्रमणियम चंद्रशेखर, हरित क्रांति के जनक महान बायोटेक्नोलॉजिस्ट एमएस स्वामीनाथन, आनिल काकोदकर और भी कई महान वैज्ञानिक ऐसे हैं देश के विकास को इस स्तर तक ले आने में जिनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, उन्हें भारत रत्न नहीं मिला. भारत रत्न तो छोड़िए इनमें से कुछ वैज्ञानिकों को तो पद्मश्री तक नहीं दिया गया है. सरकारें अपने वैज्ञानिकों को भूल गईं और अब इनकी कहानियां स्कूलों की किताबों से दूर होते-होते नई पीढ़ी की चेतना से भी लुप्त हो चली हैं.

इसी साल 24 जनवरी को चीन ने भारत और चीन के बीच वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करने के लिए  डॉ. सीएनआर राव को अपने देश के शीर्ष विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया था. भारत रत्न से सम्मानित किए जाने वाले देश के प्रमुख रसायन वैज्ञानिक डॉ.सीएनआर राव को सॉलिड स्टेट एवं और स्ट्रक्चरल कैमिस्ट्री के क्षेत्र में दुनियाभर में एक अथॉरिटी होने का सम्मान प्राप्त है. वो पदार्थ की ठोस अवस्था और संरचनात्मक रसायन शास्त्र के प्रति पूरी तरह से समर्पित वैज्ञानिक हैं.पदार्थ के गुणों और उनकी आणविक संरचना के बीच आधारभूत समझ को विकसित करने में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.50 साल से भी ज्यादा वक्त से वो अलग-अलग रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. दुनिया के अलग-अलग जर्नल्स में उनके करीब 1400 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. उन्होंने करीब 50 पुस्तकों का लेखन अथवा संपादन किया है.

डॉ. राव ने देश की वैज्ञानिक नीतियों को बनाने में भी अग्रणी भूमिका निभाई है. इस समय डॉ. राव प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं. वह सन 1985 में प्रथम बार और सन 2005 में दूसरी बार इस समिति के अध्यक्ष नियुक्त हुए हैं. राव कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हुए. सन 1964 में उन्हें 'इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेस' का सदस्य नामित किया गया. सन 1967 में 'फैराडे सोसायटी ऑफ इंग्लैंड' ने राव को मार्लो मेडल प्रदान किया गया. डॉ. राव ने 1951 में मैसूर यूनिवर्सिटी से अपनी बैचलर डिग्री ली और दो साल बाद बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री ली. डॉ.राव ने पर्डयू यूनिवर्सिटी से 1958 में पीएच.डी. की. दुनियाभर की दर्जनों यूनिवर्सिटीज ने डॉ. राव को मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया है.

डॉ. राव काफी बेबाक भी हैं, मंगलयान लांचिंग से ऐन पहले जब पूर्व इसरो अध्यक्ष माधवन नायर ने मंगलयान को आधा-अधूरा मिशन बताते हुए इसे महज प्रचार का हथकंडा बताया तो डॉ. राव ने उन्हें जमकर लताड़ लगाई. मंगलयान लांच से पहले अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा कि इसरो ने मिशन में जल्दबाजी कर दी, उन्हें अभी होमवर्क पर और वक्त देना चाहिए था. लेकिन अब जबकि मिशन तैयार है, हमें वैज्ञानिकों के हौसले और कुछ नया कर दिखाने के जज्बे की सराहना करनी चाहिए.

 डॉ. राव को भारत रत्न सही दिशा में एक बेहतर शुरुआत है, जिससे एक उम्मीद सी बंधती है कि देश अब शायद डॉ. भाभा और डॉ. साराभाई जैसे अपने विज्ञान नायकों को भी देर से ही सही, लेकिन शीर्ष सम्मान से सम्मानित करेगा.

शिक्षा और विज्ञान में निवेश पर टिका है भारत का भविष्य: सीएनआर राव


देश ने विज्ञान की अहमियत को समझा है, डॉ. सीएनआर राव को भारत रत्न दिए जाने से ऐसा प्रतीत होता है. डॉ. राव भारत रत्न से सम्मानित किए जाने वाले देश के तीसरे वैज्ञानिक हैं. देश ने उनसे पहले केवल दो वैज्ञानिकों डॉ. सीवी रमन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को ही भारत रत्न के लायक समझा. 'वॉयेजर' इस शीर्ष सम्मान से विभूषित होने पर डॉ. सीएनआर राव को बधाई देता है. भारत रत्न अलंकरण से सम्मानित होने के बाद डॉ. राव ने बंगलुरू में छात्रों और वैज्ञानिकों को संबोधित किया, 'वॉयेजर' के पाठकों के लिए पेश है डॉ. सीएनआर राव के व्याख्यान का अनुवाद खुद उन्हीं के शब्दों में-

'दोस्तों, भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह शिक्षा एवं विज्ञान में कितना निवेश करता है . अफसोस की बात है कि विज्ञान को जितना समर्थन मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल रहा. मैं आपको बता दूं कि दुनिया में जिन देशों ने वाकई प्रगति की है, वे ऐसे देश हैं जिन्होंने खुद को वैज्ञानिक तौर पर उन्नत बनाया है . जिन्होंने खुद को वैज्ञानिक तौर पर उन्नत नहीं बनाया, उस देश को कोई नहीं जानता.

हमें शिक्षा और विज्ञान में ज्यादा निवेश करना चाहिए ताकि भारत का भविष्य सुरक्षित रहे . देश के सेंसेक्स और कारोबार का अच्छा प्रदर्शन ही काफी नहीं है . यह तो 5-10 साल के लिए है . लंबे समय के लिए क्या होगा और यदि इस मामले में बेहतर करना है तो विज्ञान में आधुनिक बनना पड़ेगा.

‘मूर्ख’ नेताओं ने विज्ञान को पीछे धकेल दिया है. वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए और अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है. सरकार की तरफ से वैज्ञानिक समुदाय को पैसा दिये जाने के लिए हमने बहुत कोशिशें की हैं. लेकिन इन मूर्ख (ईडियट) नेताओं को वैज्ञानिक अनुसंधान की अहमियत समझ में ही नहीं आती. बेहद सीमित संसाधनों के बावजूद हम वैज्ञानिकों ने कुछ तो किया ही है. हमारा निवेश बहुत कम है, देर से मिलता है. हमें जितने पैसे मिल रहे हैं वो कुछ भी नहीं हैं.

चीन की तरक्की और भारत के पिछड़ जाने के लिए हमें खुद को ही जिम्मेदार ठहराना होगा. हम भारतीय कठिन परिश्रम नहीं करते. हम चीन वालों की तरह नहीं हैं. हम बहुत आरामपसंद हैं और उतने राष्ट्रवादी नहीं हैं. अगर हमें थोड़ा ज्यादा धन मिल जाता है तो विदेश जाने को तैयार हो जाते हैं.

विज्ञान आगे बढ़ने का रास्ता है. मुझे इस बात की खुशी है कि हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस बात पर यकीन किया. बदकिस्मती से उनके बाद विज्ञान को सरकारों से वो समर्थन नहीं मिला जितना होना चाहिए. थोड़ा-बहुत समर्थन है पर उतना नहीं है जितना होना चाहिए. इसमें और सुधार की गुंजाइश है.

बुनियादी शिक्षा के लिए, साधारण शिक्षा पर हमें अपनी जीडीपी का कम से कम 6 फीसदी निवेश करना चाहिए . सरकार को यह करना पड़ेगा क्योंकि अन्य लोग इसमें ज्यादा कुछ कर नहीं रहे, निजी क्षेत्र थोड़ा-बहुत कर रहे हैं . हम सिर्फ 2 फीसदी निवेश कर रहे हैं.  भारत का भविष्य इस पर निर्भर करता है कि शिक्षा और विज्ञान में किस तरह निवेश किया जाता है . हमें विज्ञान में अपने निवेश को 1 फीसदी से बढ़ाकर 2 फीसदी करना होगा . मैं उम्मीद करता हूं कि ये चीजें होंगी .

आज की टेक्नोलॉजी पुरानी जैसी नहीं रही . आज की टेक्नोलॉजी आधुनिक विज्ञान के आधार पर बहुत तेजी से विकसित होती है . आज के विज्ञान और कल की टेक्नोलॉजी के बीच का समय बहुत कम रह गया है . मेरा मानना है कि भारत को अभी यह सीखना है कि टेक्नोलॉजी और मौलिक रिसर्च में विज्ञान के नवीनतम नतीजों का इस्तेमाल किस तरह किया जाए . मौलिक रिसर्च में भारत की रैंकिंग काफी खराब है. मौलिक रिसर्च के मामले में हम 140 देशों में 66वीं पायदान पर हैं . हमें 66वीं पायदान से शीर्ष 10 में आना है .

भारत में मौलिक रिसर्च , टेक्नोलॉजीमें निवेश ज्यादा सफल नहीं रहा है और यही वजह रही है कि भारत चीन और दक्षिण कोरिया से प्रतिस्पर्धा करने में कामयाब नहीं हो पाया है . चीन और दक्षिण कोरिया ने मौलिक रिसर्च और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत निवेश किए हैं . हमारे प्रधानमंत्री ने वादा तो किया है पर अब तक ऐसा हुआ नहीं है. वैज्ञानिक शोध पत्र प्रकाशित करने के मामले में भारत की स्थिति बदकिस्मती से बहुत खराब है .

अगले साल के शुरू में चीन पहले नंबर पर जाने को तैयार है . अब तक अमेरिका नंबर एक पर था जो दुनिया भर में हो रहे शोध कार्यों में 16.5 फीसदी पेश करता है . चीन करीब 12 फीसदी पेश कर रहा है जो 16.5 से 17 फीसदी होने को है . भारत महज 2.5 से 3 फीसदी पेश कर रहा है. मैं शोध पत्रों की संख्या के प्रति नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता को लेकर चिंतित हूं.

हमें ये समझना होगा कि सूचना-तकनीक का विज्ञान से कुछ लेना..देना नहीं है. अफसोस की बात है विज्ञान का मिजाज नहीं है.  आईटी कुछ लोगों के लिए पैसा बनाने का जरिया है और वहां काम करने वालों में नाखुश लोगों की तादाद ज्यादा है. क्योंकि मैं रोज अखबार में देखता हूं कि किसी ने आत्महत्या कर ली, किसी की हत्या कर दी गई, कुछ लोग नाखुश हैं कि जिंदगी खतरनाक है . मुझे देखिए मैं 80 वर्ष की उम्र में खुश हूं. मुझे कोई शिकायत नहीं है . मेरा मानना है कि खुशी कुछ अलग है.. आप जो कर रहे हैं उसका आनंद उठाईए.