
भारत ने 2025 तक मंगल तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया है। और इसे साकार कर दिखाने के काम में जुटे हैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के वैज्ञानिक। मंगल तक जाने वाले इस स्पेसक्राफ्ट की डिजाइन के काम में जुटे थ्योरी गुप के प्रोफेसर सी. शिवराम ने बताया कि हमारे पास लंबी दूरी तक स्पेसक्राफ्ट भेजने की शुरुआती तकनीक मौजूद है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर काम किया जाना है कि ये स्पेसक्राफ्ट किस तरह का हो क्योंकि इसे मंगल तक जाने में आठ महीनों का लंबा सफर तय करना पडे़गा। शिवराम दो ऐसे मॉडल्स पर काम कर रहे हैं जिनमें ऊर्जा और समय दोनों की बचत होगी। मार्स स्पेसक्राफ्ट का पहला मॉडल है सोलर सेल मॉडल, इसमें स्पेसक्राफ्ट के साथ नाव के पाल जैसी संरचनाएं लगी होंगी। सूरज की किरणों में मौजूद फोटॉन्स जब इनसे टकराएंगे तो इस टक्कर के मिलने वाले बल से ये स्पेसक्राफ्ट आगे बढ़ेगा। लेकिन इसके लिए बहुत अच्छे किस्म के सोलर स्टोरेज डिवाइस की जरूरत है। लेकिन इस पर अभी काफी काम की जरूरत है क्योंकि फिलहाल सोलर स्टोरेज और डिस्ट्रिब्यूशन बहुत महंगा है। इसी वजह से सोलर तकनीक में जोर फिलहाल इसकी लागत घटाने पर है। शिवराम का दूसरा मॉडल आयन इंजन पर आधारित है। वो बताते हैं, आयन दरअसल उच्च संवेग वाले चार्ज्ड पार्टिकल होते हैं। इनकी मदद से तेज और लंबी फ्लाइट मुमकिन हो है। फिलहाल, इन दोनों इंजनों पर रॉकिट डायनॉमिक्स के तहत इसरो के सहयोग से काम हो रहा है।
tav mangal par mangal hoga
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