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बुधवार, 5 दिसंबर 2012

मेरी ख्वाहिश है कि मौत मंगल ग्रह पर हो – इलॉन मस्क


इलॉन मस्क स्पेस एक्सप्लोरेशन कंपनी स्पेस-एक्स के सीईओ और इंटरनेट पर भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराने वाले पे-पॉल के फाउंडर हैं। वॉयेजर ने हाल ही में उनसे बातचीत की, इस बातचीत में इलॉन ने बताया कि उनकी ख्वाहिश है कि उनकी मौत मंगल ग्रह पर हो। इलॉन मस्क केवल खुद को ही नहीं बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को परिवार सहित 2025 तक मंगल ग्रह पर ले जाना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने मात्र 25 करोड़ रुपये की फीस तय की है। इलॉन मस्क ने अपने करियर में कई ऐसी चीजें कर के दिखाई हैं, जिन्हें पहले नामुमकिन समझा जाता था। वो इंटरनेट पर भुगतान की सबसे बड़ी व्यवस्था पे-पॉल के सह-संस्थापक हैं। इसके अलावा वो स्टाइलिश और स्पोर्टी इलेक्ट्रिक कार बनाने वाली कंपनी टेस्ला मोटर्स के संस्थापक भी हैं। और पहली निजी स्पेस एक्सप्लोरेशन कंपनी स्पेस-एक्स की लांचिंग और उसे कामयाब कर दिखाने के साथ ही उन्होंने सबसे अविश्वसनीय उपलब्धि भी हासिल कर ली। वॉयेजर अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत करता है इलॉन मस्क से बातचीत के मुख्य अंश -
लोगों को मंगल ग्रह पर ले जाने के लिए आप इतने उत्साहित क्यों हैं ?
क्योंकि हमारे ग्रह पृथ्वी के 4 अरब साल के इतिहास में ऐसा करना पहली बार मुमकिन हुआ है। ये अवसर शायद लंबे वक्त के लिए रहेगा, और मैं ऐसी उम्मीद भी करता हूं, लेकिन शायद ऐसा न भी हो। मानव सभ्यता के सामने जो खतरे हैं, हमें उनसे फायदा उठाना चाहिए। जरूरी नहीं है कि पूरी मानव जाति का कभी विनाश ही हो जाए। मैं जिस चीज का सपना देख रहा हूं, टेक्नोलॉजी के महासागर में वो बस एक बूंद के समान है।
मंगल पर जाने की जरूरत ही क्या है? जब मार्स एक्सप्लोरेशन रोवर्स और क्यूरियोसिटी जैसी टेलीप्रजेंट रोबोटिक्स की शानदार मशीनें हमें मंगल पर मौजूद होने का अनुभव करवा रही हैं?

शायद हम थोड़े रोमांटिक हो रहे हैं, लेकिन मैं मानता हूं कि मंगल पर व्यक्तिगत रूप से मौजूद होने से इस ग्रह के बारे में हमारी समझ में बहुत बड़ा बदलाव आएगा। रोबोटिक्स से हमें शानदार मदद मिल रही है और हम काफी कुछ सीख भी रहे हैं, लेकिन मंगल पर मानव की मौजूदगी का विकल्प रोबोट कभी नहीं हो सकते। मंगल पर एक स्थायी बेस के होने से और पृथ्वी और मंगल के बीच लोगों की लगातार आवाजाही से टेक्नोलॉजी के विकास को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा और इससे हम दूसरे स्टार सिस्टम्स तक सफर करने में सक्षम हो सकेंगे।
जैसेकि हमसे 4 प्रकाश वर्ष दूर मौजूद स्टार सिस्टम अल्फा सेंचुरी के एक्सोप्लेनेट पर?
मेरे विचार से आप वहां जाने का तरीका खोज सकते हैं। एक न्यूक्लियर थर्मल रॉकेट की मदद से आप प्रकाश की गति के दसवें हिस्से तक की रफ्तार आसानी से हासिल कर सकते हैं। इस रफ्तार से अल्फा सेंचुरी तक जाने में हमें 40 साल लग जाएंगे, जो कि एक लंबा वक्त है। अगर आप वाकई अल्फा सेंचुरी जैसी दुनिया में जाना चाहते हैं तो आपको अपना सफर किशोरावस्था में शुरू करना होगा। 
हम इसे कैसे बदल सकते हैं?
रैप ड्राइव के बारे में कुछ रोचक तथ्य मैंने जाने हैं। आप प्रकाश की गति से तेज नहीं जा सकते, लेकिन आप स्पेस को मनमाफिक तरीके से मोड़ सकते हैं और इस तरह प्रकाश की गति से कई गुना तेज रफ्तार के साथ प्रभावशाली तरीके से सफर कर सकते हैं। ये बेहद हैरतअंगेज और उत्साह से भर देने वाला है। लोग ऐसे जबरदस्त तरीके इस्तेमाल में ला सकते हैं, ताकि ऊर्जा कम से कम खर्च हो।
क्या आपकी स्पेस एक्सप्लोरेशन कंपनी स्पेस-एक्स रैप ड्राइव जैसी चीजों का इस्तेमाल कर सकती है?
निश्चित तौर पर, हम चाहेंगे कि रैप ड्राइव की तकनीक हमारे साथ हो।
आपने स्पेस एक्सप्लोरेशन को इनोवेशन और नई तकनीक से लैस कर दिया है। आप एक पायनियर हैं, पूरी दुनिया की निगाहें आप पर और आपके स्पेस-एक्स पर टिकीं हैं। क्या इतनी ऊंची उम्मीदों के केंद्र में होने से आपको नर्वसनेस होती है?
नहीं, मुझे इससे और आगे बढ़ने, कुछ और नया-इनोवेटिव करने की ऊर्जा मिलती है। मैं उत्साह से भर जाता हूं। शुरुआत में हमने भी कई गलतियां की हैं। अपनी चौथी उड़ान में ही हम पहला ऑरबिट पूरा कर सके। अपनी दूसरी और तीसरी उड़ान में हम अंतरिक्ष के मुहाने तक जा पहुंचे थे, लेकिन और आगे जाने के लिए जरूरी रफ्तार ही हासिल नहीं कर सके। अगर हमारी चौथी उड़ान सफल नहीं होती तो हमें स्पेस-एक्स का ख्याल छोड़ना पड़ता।
आपका स्पेस एक्स ड्रैगन कैप्स्यूल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक आने-जाने वाला एक मालवाही स्पेसशिप ही है। आप अंतरिक्षयात्रियों को ले जाना कब शुरू करेंगे?
हमें उम्मीद है कि तीन साल के भीतर हम अंतरिक्षयात्रियों के साथ पहली उड़ान भरेंगे।
क्या अंतरिक्षयात्रियों के साथ पहली उड़ान में आप भी शामिल होंगे?
वास्तव में ये नासा पर है, जो कि हमारे कस्टमर हैं। मैं कुछ खतरनाक सी किस्म की चीजें करने का आदी हूं, जैसे कि बेहद कम ऊंचाई पर फाइटर जेट को उड़ाना। मेरी कंपनी और बच्चे भी हैं, और मैं उन्हें बढ़ता हुआ देखना चाहता हूं, इसलिए फिलहाल मैंने अपने खतरनाक शौकों पर लगाम लगा रखी है। मैं अंतरिक्ष जाना चाहता हूं , लेकिन सबसे पहले नहीं। पहली उड़ान ऑटोमैटिक पायलट की मदद से होगी, यानि स्पेसशिप पर कोई मानव नहीं होगा।

बुधवार, 26 सितंबर 2012

गहन ब्रह्मांड में ‘वॉयेजर’


रात के आसमान में किसी सबसे छोटे और सबसे धुंधले सितारे को देखने की कोशिश कीजिए, वॉयेजर-1 के कैमरे से हमारा सूरज बिल्कुल वैसा ही नजर आता है। वॉयेजर-1 का सफर किसी खास सितारे की ओर नहीं है, लेकिन फिरभी करीब 40,000 साल बाद ये 1.6 प्रकाशवर्ष दूर मौजूद सितारे AC + 793888 (ये उस सितारे का वैज्ञानिक कोड है) के करीब से गुजरेगा। इस सितारे की खास बात ये है कि ये 4,30,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हमारे सौरमंडल की ओर बढ़ा चला आ रहा है। वॉयेजर-1 की रफ्तार अब 61400 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच चुकी है और इस रफ्तार से ये 74,438 साल में सूरज से सबसे करीब के सितारे प्रॉक्सिमा सेंटौरी को भी पार कर जाएगा। सैद्धांतिक रूप से प्रकाश की गति यानि 300,000 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार हासिल करने में वॉयेजर-1 को अभी 17522 साल और लगेंगे। डीप स्पेस नेटवर्क में बैठे वैज्ञानिकों और वॉयेजर-1 के बीच संपर्क बनाए रखने का काम रेडियो सिगनल्स करते हैं जो प्रकाश की गति से चलते हैं। सौरमंडल को पीछे छोड़ गहन अंतरिक्ष में प्रवेश कर चुका वॉयेजर-1 मानव निर्मित ऐसा अकेला स्पेस प्रोब है जो धरती से सबसे दूर यानि पृथ्वी से 17 अरब 96 करोड़ किलोमीटर से भी दूर जा चुका है।

मिशन का मकसद

70 के दशक के अंत में एक अदभुत खगोलीय घटना घटी। बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून ऐसी विशेष स्थिति में आ रहे थे कि किसी एक स्पेसक्राफ्ट की मदद से एक के बाद एक इन चारों ग्रहों के करीब से होकर गुजरा जा सकता था। इस तरह किसी ग्रह के करीब से गुजर जाने को विज्ञान की भाषा में फ्लाई-बाई कहते हैं। सौरमंडल के ग्रहों की ये स्थिति हर 177 साल बाद बनती है। नासा की जेट प्रोपल्शन लैब के एयरोस्पेस इंजीनियर गैरी फ्लैंड्रो ने ग्रहों की बन रही इस खास स्थिति का अध्ययन कर एक अनोखी बात खोज निकाली। गैरी ने गणित की मदद से समझाया कि अगर कोई स्पेसक्राफ्ट एक खास कोण से बृहस्पति के करीब से गुजरता है तो इस ग्रह का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव उसे एक ऐसी जबरदस्त अतिरिक्त उछाल दे देगा, जिससे वो स्पेसक्राफ्ट बिना ईंधन खर्च किए सीधे शनि तक जा पहुंचेगा। ब्रहस्पति की तरह शनि के गुरुत्वाकर्षण से मिली अतिरिक्त उछाल से उसे आगे के ग्रह यूरेनस और नेपच्यून और उससे भी आगे जाना मुमकिन है। ये बिल्कुल नया विचार था, बेहद कम ईंधन खर्च करके केवल गुरुत्वाकर्षण की उछाल का इस्तेमाल करके अंतरिक्ष में दूर-दराज का सफर मुमकिन था। फौरन नासा ने एक ग्रांड टूर की योजना बनाई जिसके तहत बृहस्पति, शनि और उससे आगे नेप्च्यून, प्लूटो तक अलग-अलग जुड़वा स्पेसक्राफ्ट भेजे जाने थे। लेकिन इस ग्रांड टूर योजना का बड़ा हिस्सा रद्द हो गया, क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस ने इतना फंड देने से इनकार कर दिया। केवल इतनी मंजूरी मिल पाई कि बस दो स्पेस प्रोब भेजे जाएं। इस तरह नासा ने वॉयेजर मिशन पर काम शुरू किया, जिसके तहत दो प्रोब वॉयेजर-1 और वॉयेजर-2 बृहस्पति और शनि को भेजे जाने थे।

जुड़वां मिशन

1977 में इन जुड़वा स्पेस प्रोब्स में वॉयेजर-2 को पहले लांच किया गया। ग्रहों की अनोखी स्थिति को ध्यान में रखते हुए वॉयेजर-2 का प्रक्षेपण ऐसे खास कोण पर किया गया ताकि ये बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून तक पहुंच सके। वॉयेजर-1 की लांचिंग इसके जुड़वा प्रोब के कुछ दिन बाद हुई, लेकिन इसका प्रक्षेपण पथ छोटा और तेज रखा गया, ताकि ये बृहस्पति और शनि पर वॉयेजर-2 से पहले पहुंच सके। वॉयेजर-1 को उच्च प्राथमिकता दी गई, क्योंकि इसे शनि के एक खास चंद्रमा टाइटन के भी बेहद करीब से गुजरकर उसके वायुमंडल का अध्ययन भी करना था। 19 दिसंबर 1977 को वॉयेजर-2 को पीछे छोड़ते हुए वॉयेजर-1 उससे आगे निकल गया। 14 जून 2012 को नासा ने बताया कि वॉयेजर-1 अब सौरमंडल के अंतिम छोर से भी आगे निकलकर गहन अंतरिक्ष में लगातार आगे बढ़ता चला जा रहा है। वॉयेजर-1 और इसका जुड़वां स्पेसक्राफ्ट वॉयेजर-2 दोनों दो अलग-अलग दिशाओं में एक-दूसरे से दूर चले जा रहे हैं और वॉयेजर-1 की रफ्तार वॉयेजर-2 की तुलना में 10 प्रतिशत ज्यादा है। दोनों की बीच की दूरी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पृथ्वी के कानडीप स्पेस नेटवर्क को वॉयेजर-1 से डेटा लेने के बाद वॉयेजर-2 को सुनने में 16.5 घंटे का समय लग जाता है।     
722 किलो वजनी स्पेसक्राफ्ट वॉयेजर-1 हेलियोस्फियर यानि सूर्यकिरणों की पहुंच की सीमा वाले अंतरिक्ष के इलाके को पीछे छोड़कर हेलियोशीथ यानि गहन ब्रह्मांड में प्रवेश कर चुका है। वॉयेजर-1 जल्दी ही इंटरस्टेलर स्पेस यानि अंतरिक्ष में दो सितारों के बीच के इलाके में प्रवेश करने वाला है और इसी के साथ वॉयेजर-1 हमारे सौरमंडल से भी आगे निकल जाने वाला पहला मानव निर्मित स्पेसक्राफ्ट बन जाएगा।  

मानवता का दूत - वॉयेजर


वॉयेजर जब लांच किया गया वो जमाना ग्रामोफोन और उनके एलपी रेकार्ड्स का था। वॉयेजर को बृहस्पति और शनि की दुनिया में झांकते हुए और भी आगे का सफर तय करना था, ऐसे में स्पेस मिशन्स के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने और वॉयेजर मिशन को मानवता का अग्रदूत बना देने के लिए महान एस्ट्रोफिजिसिस्ट डॉ. कार्ल सगान ने दोनों वॉयेजर स्पेसक्राफ्ट्स में सोने से बना एक खास एलपी रेकार्ड रखवाया। इस रेकार्ड का मकसद ये था कि अगर वॉयेजर स्पेसक्राफ्ट कभी किसी अनजान सभ्यता या फिर भविष्य के मानवों के संपर्क में आता है तो उन्हें पृथ्वी पर मौजूद जीवन के हजारों स्वरूपों और सांस्कृतिक विविधता का परिचय मिल सके।
दोनों वॉयेजर प्रोब्स के साथ भेजे जाने वाले इस सोने के रेकार्ड में क्या-क्या चीजें संग्रहीत की जाएं इसका चयन नासा की एक समिति ने किया खुद डॉ. कार्ल सगान जिसके अध्यक्ष थे। डॉ. सगान और उनके सहयोगियों ने दुनिया की करीब हर सभ्यता का परिचय देती हुई 116 तस्वीरें जमा कीं, इनमें ब्लैक एंड व्हाइट और रंगीन दोनों ही शामिल हैं। इनमें से कुछ तस्वीरें वैज्ञानिक महत्व की हैं, इनमें गणित और भौतिकी के फॉर्मूले, सौरमंडल और मानव डीएनए, गर्भ में बच्चे को सहेजे एक मां और एक पुरुष के रेखाचित्र, बच्चे को दूध पिलाती मां, खाते-पीते हुए लोग और इतना ही नहीं कोलकाता में लगा एक ट्रैफिक जाम, ताजमहल और चीन की दीवार की तस्वीरें भी इस रेकार्ड के लिए चुनी गईं। सागर की उफनती लहरों, बहती हुई हवा, कड़कती हुई बिजली, पक्षियों का चहचहाना, व्हेल का खास गीत, धड़धड़ाती गुजरती रेलगाड़ी जैसी कई आवाजें रेकार्ड की गईं। दुनियाभर की 55 भाषाओं में परग्रहीय सभ्यता के लोगों के नाम शुभकामना संदेश भी रेकार्ड किए गए। इसमें हिंदी समेत गुजराती, राजस्थानी, उर्दू, तमिल और कन्नड़ जैसी भारतीय भाषाएं भी शामिल हैं। विश्व के सार्वकालिक महानतम संगीतकारों और गायकों की संगीत रचनाएं भी शामिल की गईं। हमारे लिए गर्व की बात ये है कि वॉयेजर के इस गोल्डेन रेकार्ड में विश्व के महान संगीतकारों बीथोवन, गुआन पिंघु, मोजार्ट, स्ट्राविंस्की, नेत्रहीन विली जॉनसन और चक बेरी जैसे श्रेष्ठ संगीतकारों के साथ महान भारतीय गायिका केसरबाई केरकर का शास्त्रीय गायन भी शामिल किया गया। इसके अलावा इस रेकार्ड में तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर और संयुक्तराष्ट्र महासचिव कर्ट वाल्धीम का संदेश भी शामिल किया गया। अंतरिक्ष के विस्तार के सामने वॉयेजर स्पेसक्राफ्ट्स का आकार काफी छोटा है, इसलिए इस बात की संभावना काफी कम है कि वॉयेजर की मुलाकात किसी परग्रहीय बौद्धिक सभ्यता से कभी होगी, और अगर ये मुलाकात हो भी जाए तो उस अनजान सभ्यता के लोग इस गोल्डेन रेकार्ड को प्ले करके पृथ्वी के जीवन और सांस्कृतिक विविधता की झलक पा सकेगा। डॉ. कार्ल सगान ने इसके बारे में लिखा है, किसी अनजान सभ्यता से वॉयेजर की मुलाकात हो और वो लोग हमारे गोल्डेन रेकार्ड को प्ले करके सुनें, ऐसा केवल तभी मुमकिन है, जब इस अनंत अंतरिक्ष में भ्रमण करने वाली परग्रहीय बौद्धिक सभ्यताओं का अस्तित्व वाकई में हो। मानवता के इस संदेश को वॉयेजर की बोतल में बंद कर अंतरिक्ष के महासमुद्र में प्रवाहित करने का काम भी इस ग्रह के जीवन के बारे में एक नई उम्मीद जगाता है। इसलिए सबसे अच्छा ये है कि वॉयेजर के इस रेकार्ड को किसी परग्रहीय बौद्धिक सभ्यता से संपर्क की कोशिश समझने के बजाय इसे एक टाइम कैप्स्यूल या फिर मानव सभ्यता का एक प्रतीकात्मक वक्तव्य समझा जाए।

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

'पेल ब्लू डॉट....'


नासा ने खबर दी है कि 35 साल पहले अंतरिक्ष के सफर पर निकला स्पेसक्राफ्ट ‘वॉयेजर-1’ अब पृथ्वी से 17 अरब 96 करोड़ किलोमीटर से भी दूर जा चुका है। सौरमंडल को पीछे छोड़ गहन अंतरिक्ष में प्रवेश कर चुका ‘वॉयेजर-1’ मानव निर्मित ऐसा अकेला स्पेस प्रोब है जो धरती से सबसे दूर मौजूद है। 1990 में वॉयेजर-1 ने अपना प्राथमिक मिशन पूरा कर लिया था और सौरमंडल से बाहर जाने की तैयारी में था, ऐसे में डॉ. कार्ल सगान के अनुरोध पर नासा ने वॉयेजर-1 का कैमरा पृथ्वी की ओर मोड़ा और पृथ्वी की एक अनोखी तस्वीर ली। वॉयेजर-1 तब धरती से 6 अरब किलोमीटर दूर था और इस रिकार्ड दूरी से अंतरिक्ष के काले महासागर में पृथ्वी एक चमकीले नीले बिंदु की तरह नजर आ रही थी। 6 अरब किलोमीटर की दूरी से ली गई ये पृथ्वी की पहली और अंतिम तस्वीर है। डॉ. कार्ल सगान ने इस तस्वीर को देखा तो वो आध्यात्मिक-दार्शनिक विचारों से भर उठे और उन्होंने इस तस्वीर का नाम रखा ‘पेल ब्लू डॉट’ यानि गहरा नीला बिंदु। इस नाम का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने 1994 में प्रकाशित अपनी किताब का शीर्षक रखा – पेल ब्लू डॉट : ए विजन ऑफ द ह्युमन फ्युचर इन स्पेस। इस किताब में महान एस्ट्रोनॉमर डॉ. कार्ल सगान ने वॉयेजर-1 के कैमरे से ली गई पृथ्वी की इस तस्वीर पर अपने विचार गहराई से व्यक्त किए हैं, वो लिखते हैं –
अंतरिक्ष की इस गहनतम दूरी (6 अरब किलोमीटर) से पृथ्वी शायद कोई खास दिलचस्पी की चीज न लगे। लेकिन हमारे लिए, इसके मायने बिल्कुल अलग हैं। इस तस्वीर में नजर आ रहे इस नीले बिंदु को दोबारा देखिए। ये वहां है। ये हमारा घर है। ये हम हैं। हर वो शख्स जिससे हम मोहब्बत करते हैं, हर वो व्यक्ति जिसे हम जानते हैं, वो हर कोई जिसके बारे में आपने सुना है, वो हर इंसान जो कभी था, उन सबने इसी नीले बिंदु में अपनी उम्र गुजार दी। हमारी सारी खुशियां और तमाम दुख-मुसीबतें, विश्वास से भरे हजारों धर्म, मान्यताएं और आर्थिक नीतियां, हरेक शिकारी और शिकार, प्रत्येक हीरो और कायर, सभ्यताओं को जन्म देने वाला हरेक निर्माता और उन्हें नेस्त-नाबूद कर डालने वाला हरेक हमलावर, हर राजा और उनके गुलाम, प्रेम में डूबे सभी प्रेमी और प्रेमिकाएं, हरेक मां और हरेक पिता, उम्मीदों से भरा हरेक बच्चा, सभी अविष्कारक और खोजी, नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला प्रत्येक शिक्षक, भ्रष्टाचार में डूबा हरेक राजनेता, हरेक सुपरस्टार, सभी महान लीडर, हरेक साधु और पापी जिनसे मानव सभ्यता के इतिहास के पन्ने भरे हैं, वो सभी सूरज की किरण में तैर रहे धूल के एक कण जैसे नजर आ रहे इस नीले बिंदु में ही जीये और फना हो गए। इस अनंत ब्रह्मांड में पृथ्वी की हैसियत नगण्य है। अब उन सभी बर्बर हमलावरों और जनरल्स के बारे में सोंचिए, जिन्होंने इस बिंदु के सूक्ष्म से हिस्से पर कब्जे की हवस में इंसानियत को शर्मिंदा किया और खून की नदियां बहा डालीं। उस खौफनाक अत्याचार को याद कीजिए जो इस बिंदु के एक सिरे के लोगों ने दूसरे सिरे के लोगों पर किए (यहां डॉ. कार्ल सगान द्वितीय विश्व युद्ध की बात कर रहे हैं)। वो एक-दूसरे के प्रति किस तरह नासमझी से भरे हुए थे, वो एक-दूसरे को मार डालने के लिए कितने उतावले थे, एक-दूसरे के लिए उनकी नफरत कितनी गहरी थी। तमाम तड़क-भड़क और दिखावा, हमारा छिछला अहंकार, ये भ्रम कि ब्रह्मांड में हमें एक विशेष दर्जा हासिल है, इन सब बातों को इस तस्वीर में नजर आ रही नीले रंग की ये बिंदु चुनौती दे रही है। ब्रह्मांड के इस गहन अंधकार में हमारा ग्रह एक अकेले भटकते धूलकण के जैसा है। इस अनंत विस्तार में ऐसा कोई इशारा तक नहीं मिलता कि हमें खुद से ही बचाने के लिए कहीं से कोई मदद आएगी। अब तक पृथ्वी ही केवल ऐसी जगह है, जहां जिंदगी फल-फूल रही है। कम से कम निकट भविष्य में भी ऐसी कोई दूसरी जगह नहीं है, जहां हमारी मानव जाति रहने के लिए जा सके। हां, हम धरती से बाहर कुछ जगहों पर गए जरूर हैं, लेकिन अब तक हम कहीं बस नहीं सके हैं। अब आप इसे पसंद करें, या न करें, लेकिन इस वक्त तो पृथ्वी ही वो जगह है, जहां हम मौजूद हैं, जिंदगी आबाद है। ये कहा जाता है कि एस्ट्रोनॉमी या खगोल विज्ञान विनय प्रदान करने वाला और चरित्र निर्माण करने वाला अनुभव देता है। मानव अहंकार में निहित अज्ञानता को साबित करने के लिए संभवत: इस तस्वीर से बेहतर कोई दूसरा प्रदर्शऩ नहीं हो सकता।
मेरे विचार से, ये तस्वीर हमारी इस जिम्मेदारी को रेखांकित करती है कि हमें एक-दूसरे के प्रति कहीं अधिक नरमी और सहनशीलता के साथ पेश आना चाहिए, ताकि हम इस गहरे नीले बिंदु को, जो कि जिंदगी का एक अकेला घर है, इसे संरक्षित करने के साथ जीने के लायक बनाए रख सकें।

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

मंगल ग्रह पर जीवन की खोज


क्या बुध और शुक्र की तरह मंगल ग्रह भी बेजान है? या फिर धरती की तरह वहां भी जीवन का विकास हुआ और जिंदगी की धड़कन अब भी वहां गूंज रही है? ये सवाल विज्ञान की बड़ी गुत्थियों में से एक है। नासा का मार्स साइंस लैबोरेटरी मिशन इस गुत्थी को हल करने की दिशा में हमारी सबसे बड़ी पहल है। मार्स साइंस लैबोरेटरी मिशन जो क्यूरियोसिटी के नाम से भी लोकप्रिय है मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक लैंड करने के बाद मंगल की मिट्टी में जीवन की तलाश के अपने अभियान की शुरुआत कर दी है।
ऐसा नहीं है कि हरे रंग का कोई छोटा अजनबी मंगलवासी उत्सुकता में भरकर बस के आकार वाले हमारे रोबोट से हैलो कहने के लिए अपने किसी बिल से निकलकर सामने आ खड़ा होगा और ऐसा भी नहीं है कि क्यूरियोसिटी जब मंगल की मिट्टी के सैंपल लेगा तो उसमें केंचुए जैसे मंगल के जीव खोज लिए जाएंगे। तो फिर आखिर हम मंगल पर क्या खोज रहे हैं?  क्यूरियोसिटी का लक्ष्य क्या है? और किस चीज के मिलने की उम्मीद  में हम मंगल की मिट्टी खंगाल रहे हैं?
नासा के नए मिशन मार्स साइंस लैबोरेटरी या क्यूरियोसिटी के साथ हम मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिकों को खोज रहे हैं, जो उस लाल ग्रह पर हमारी पृथ्वी के जैसे जीवन या बैक्टीरिया जैसे उसके शुरुआती स्वरूप की मौजूदगी का सबसे बड़ा सबूत होगा। मंगल ग्रह पर जीवन के खोए सूत्रों की पहचान ही करीब एक टन की इस सबसे आधुनिक रोबोटिक लैबोरेटरी का लक्ष्य है। और हमें उम्मीद है कि मंगल की मिट्टी में हमें जीवन के कुछ ऐसे निशान मिल सकते हैं, जो शायद जीव विज्ञान के हमारे अब तक के ज्ञान से बाहर हों।
36 साल पहले मंगल ने पृथ्वी वासियों को बुरी तरह चौंकाया था। नासा का ऑरबिटर मिशन वाइकिंग-1 अपने बाद लांच किए जाने वाले लैंडर मिशऩ वाइकिंग-2 को लैंड कराने के लिए मंगल पर सही जगह की तलाश कर रहा था। तभी वो मंगल के साइडोनिया इलाके के ऊपर से गुजरा, वाइकिंग-1 ने वहां की एक ऐसी तस्वीर भेजी कि नासा वैज्ञानिकों के साथ सारी दुनिया चौंक उठी । मंगल की जमीन से एक विशाल इंसानी चेहरा आसमान की ओर देख रहा था। ये भावशून्य मानव चेहरा मंगल की जमीन पर दो मील के दायरे में फैला था। क्या मंगल ग्रह इस चेहरे के जरिए हम पृथ्वीवासियों को कोई संदेश दे रहा था?  मंगल पर मानव चेहरे की सनसनी ज्यादा वक्त तक कायम नहीं रह सकी, क्योंकि वैज्ञानिकों ने बाद में बताया कि ये मानव चेहरा मंगल का एक पठार है जो डूबते सूरज के साथ धूप-छांव के खेल की वजह से मानव चेहरे जैसा आभास दे रहा है। सनसनी भले ही खत्म हो गई ,लेकिन वाइकिंग-1 की ये तस्वीर, मंगल पर जीवन की तलाश का प्रतीक बन गई।

मंगल से आई उल्काएं

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 9 साल बाद का वक्त, अंग्रेज भारत पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे थे। उथल-पुथल से भरे राजनीतिक-सामाजिक हालात के बीच भारत के बिहार में गया जिले के करीब एक छोटे से कस्बे शेरघाटी में कुछ ऐसा हुआ कि वो उस वक्त के वैज्ञानिकों के बीच चर्चा का विषय बन गया। 25 अगस्त 1865 की एक शाम, शेरघाटी के आसमान पर गहरे बादल छाए थे और रुक-रुक कर बारिश का दौर जारी था, कि तभी तेज आवाज के साथ पूरा कस्बा कांप उठा, आवाज भी ऐसी मानो किसी ने आसमान चीर दिया हो। घबराए हुए लोग भागकर घर से बाहर आ गए और सैकड़ों निगाहें आसमान की ओर उठ गईं। लपटों से घिरा एक दहकता हुआ अग्निपिंड क्षितिज के एक ओर से दूसरी ओर बढ़ा चला जा रहा था। पुलिस की मदद लेकर कुछ हिम्मतवाले लोग सामने खेतों में उस जगह की ओर दौड़े जहां वो पिंड गिरा था। आसमान से एक बड़ी उल्का गिरी थी, जिसका वजन 5 किलो था, पुलिस ने उसे तुरंत कब्जे में लेकर कलेक्टर साहब को भिजवा दिया, जहां से वो उल्कापिंड लंदन पहुंचकर लंबे वक्त तक ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ाता रहा। वक्त बदला और विज्ञान की प्रगति के साथ वैज्ञानिकों की दिलचस्पी उस शेरघाटी उल्का में बढ़ी। आधुनिक युग में बकायदा उसकी रेडियोमीट्रिक डेटिंग वैज्ञानिक जांच की गई, तो पता चला कि इसका जन्म 4 अरब 10 करोड़ साल पहले मंगल ग्रह पर किसी ज्वालामुखी के लावे से हुआ था। मंगल ग्रह पर किसी विशाल उल्का के गिरने से उठी धूल और पथरीले मलबे के गुबार के साथ ये पत्थर भी मंगल ग्रह से छिटक कर संयोग से पृथ्वी, वो भी भारत के कस्बे शेरघाटी में आ गिरा था। पृथ्वी पर हमें मिली ये मंगल की सबसे पुरानी उल्का है। शेरघाटी उल्का की हाल की जांच से पता चला है कि इसमें कुछ ऐसे रासायनिक तत्व हैं जिनका संबंध किसी खास बैक्टीरिया से हो सकता है।
मंगल ग्रह से छिटके ऐसे पत्थरों के 34 नमूने अमेरिकन स्पेस एजेंसी नासा के पास सुरक्षित हैं। मंगल ग्रह से पत्थरों का छिटककर धरती पर आ गिरना कुदरत का दुर्लभ संयोग है और विज्ञान विशेषतौर पर मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए ये नमूने किसी बेशकीमती खजाने से कम नहीं। ऐसी ही एक उल्का दिसंबर 1984 को अंटार्कटिक में वैज्ञानिकों की एक टीम को मिली थी। जब इसकी जांच की गई तो पता लगा कि ये उल्का करीब दो करोड़ साल पहले मंगल ग्रह से आई थी और खोजे जाने से पहले, यानि 11,000 साल तक अंटार्कटिक का बर्फ में पड़ी रही थी। इस उल्का का नाम रखा गया ALH84001 , नासा की लैब में जब इसकी जांच की गई तो इसमें एक खास तत्व मैगनेटाइट मिला, धरती पर कुछ खास बैक्टीरिया ही इस खास तत्व को बनाते हैं। जब इस उल्का को काटा गया तो इसमें एक ही आकार के ऐसे सूक्ष्म क्रिस्टल्स की लड़ी सी सजी मिली जो सीधे-सीधे किसी बैक्टीरिया की ओर इशारा कर रही थी। तो क्या मंगल ग्रह पर जीवन बैक्टीरिया के रूप में मौजूद है? इस सवाल की सनसनी पूरे विज्ञान जगत में महसूस की गई। नवंबर 2009 को नासा वैज्ञानिकों ने बताया कि अंटार्कटिक में मिली उल्का ALH84001 के सूक्ष्म जांच के बाद हम कह सकते हैं कि मंगल ग्रह पर कभी जीवन मौजूद था।
 
मंगल पर खोई जिंदगी की कड़ियां

जीने के क्रम में हर जीव रोज कचरा निकालता है, निर्जीव चीजें कचरा नहीं निकालतीं। जीवन का हर स्वरूप यहां तक कि बैक्टीरिया भी कचरे के रूप में कुछ ऐसे खास रसायन पीछे छोड़ता है, जो जीवन की तलाश में सूत्र का काम करते हैं। मंगल पर जिंदगी के कचरे, जीवन के इन्हीं खोए सूत्रों की तलाश ही क्यूरियोसिटी का मिशन है। अब तक हम जीवन के उस स्वरूप से ही परिचित हैं, जिसे हमने अपने चारोंओर, इस पृथ्वी के जल, थल और नभ में विचरते देखा है। धरती के भीतर बैक्टीरिया के रूप से लेकर पेड़-पौधे और सकल जीव जगत तक जिंदगी का हर रूप प्रमुख तौर पर केवल 4 तत्वों - हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कार्बन से संयोग से ही बना है। पृथ्वी पर निर्जीव और सजीव के साथ ये संपूर्ण सृष्टि केवल दो यौगिकों के रूप में हमारे सामने है, पहली इनऑर्गेनिक यानि अकार्बनिक यौगिक और दूसरी ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक। इनऑर्गेनिक यानि अकार्बनिक यौगिक का मतलब ऐसी चीजों से है जो कार्बन से नहीं बनीं, यानि जो जलने पर कोयले में नहीं बदल जातीं। ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक का अर्थ ऐसी सभी चीजों से है जो कार्बन से बनीं हैं और जलने पर वापस कार्बन यानि कोयले में बदल जाती हैं। इस धरती पर बैक्टीरिया से लेकर पेड़-पौधे और मछली, पंछी, मानव तक जिंदगी का हर स्वरूप कार्बन से बना है। हम पृथ्वी पर जिंदगी के जिन स्वरूपों से परिचित हैं वो सभी ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक हैं।

मंगल पर जिंदगी की खोज

मंगल पर जिंदगी के इसी जाने-पहचाने ऑर्गेनिक स्वरूप की खोज की कहानी शुरू होती है 1976 से जब नासा के वाइकिंग-2 मिशन ने मंगल ग्रह पर लैंड कर उसकी मिट्टी के नमूने पहली बार जांचे थे। वाइकिंग-2 ने अपनी  रोबोटिक आर्म के सिरे पर बनी चम्मच जैसी संरचना से मंगल की मिट्टी का नमूना उठाया और उसे अपने टेस्ट चैंबर में मौजूद कार्बन-14 न्यूट्रिएंट्स के साथ मिलाया। नासा के कंट्रोल रूम में मौजूद वैज्ञानिकों की टीम करोड़ों किलोमीटर दूर मंगल ग्रह पर हो रहे इस प्रयोग को दम साधे देख रही थी। वैज्ञानिकों की इस टीम में गिल्बर्ट लेविन भी मौजूद थे, लेविन और उनकी टीम ने मंगल पर जीवन की खोज करने वाले इस प्रयोग के उपकरणों को बनाया था, जिसे वाइकिंग अब मंगल पर आजमा रहा था। सबको इंतजार था वाइकिंग के नतीजों का।
वाइकिंग ने मंगल की मिट्टी के नमूने के परीक्षण का नतीजा नासा कंट्रोल रूम को भेजना शुरू किया और अगले ही पल गिल्बर्ट लेविन और उनकी टीम खुशी में भरकर चीख उठी और तमाम वैज्ञानिक अपनी सीटों से उठकर तालियां बजाने लगे। वाइकिंग बता रहा था कि उसने मंगल की मिट्टी से फूटती मीथेन गैस खोजी है। मंगल पर जिंदगी की तलाश की ये पहली कोशिश थी जिसका नतीजा पॉजिटिव था। मंगल पर मीथेन गैस का मिलना सीधे-सीधे इस ओर इशारा था कि वहां इस गैस को बनाने वाले बैक्टीरिया मौजूद हैं। वाइकिंग पर लगे गिल्बर्ट लेविन के उपकरणों ने शानदार काम किया था। मंगल पर जिंदगी की खोज के लिए इस खास प्रयोग की रूपरेखा तय करने वाले और महान एस्ट्रोफिजिसिस्ट डॉ. कार्ल सगान ने मंगल ग्रह पर जिंदगी के रासायनिक हस्ताक्षर की पहली खोज के लिए फोन करके गिल्बर्ट लेविन और उनकी टीम को बधाई दी।
खुशी में झूम रहे लेविन ने शैम्पेन मंगवाई, लेकिन वो बोतल खोली नहीं जा सकी, अगले ही पल सबके चेहरों के भाव बदल गए और कंट्रोल रूम में ठंडी खामोशी छा गई। क्योंकि वाइकिंग अब दूसरे उपकरण से परीक्षण के नतीजे भेज रहा था, जिसे मंगल पर ऑर्गेनिक कणों यानि कार्बन या उसके यौगिकों की पहचान करने के लिए वाइकिंग पर लगाया गया था। सबको यकीन था कि मीथेन की खोज के बाद मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक जरूर मिल जाएंगे, जो मंगल पर जीवन की मौजूदगी का सबसे बड़ा सबूत साबित होंगे। लेकिन वाइकिंग के दूसरे उपकरण के परीक्षण नतीजे निगेटिव थे। वाइकिंग के उपकरण मंगल की मिट्टी के नमूने में कार्बनिक यौगिकों यानि ऑर्गेनिक कंपाउंड्स को नहीं खोज सके। कार्बन नहीं तो जिंदगी भी नहीं। उस वक्त के नासा प्रमुख ने बयान जारी कर कहा कि वाइकिंग ने मंगल की मिट्टी का परीक्षण किया और वहां हमें जिंदगी का कोई निशान नहीं मिला।
 तो क्या गिल्बर्ट लेविन के उपकरणों के नतीजे गलत थे? 36 साल बाद अब भी गिल्बर्ट लेविन ये मानने को तैयार नहीं हैं। वाइकिंग मिशन के उस परीक्षण ने उनकी जिंदगी ही बदल कर रख दी। वाइकिंग पर लगे अपने उपकरणों के नतीजों को सही साबित करना और हर मंच पर पूरी जोरदारी के साथ ये कहना कि मंगल ग्रह पर जिंदगी मौजूद है, उनकी जिंदगी का लक्ष्य बन गया है। गिल्बर्ट मंगल पर जीवन के जिस रूप के मौजूद होने की वकालत कर रहे हैं, वैज्ञानिकों ने उसका नामकरण भी उनके नाम पर करते हुएगिलेविनिया स्ट्राटा रख दिया है। गिलेविनिया स्ट्राटा मीथेन बनाने वाला मंगल ग्रह का एक ऐसा बैक्टीरिया है, जिसपर गिल्बर्ट लेविन को तो यकीन है, लेकिन नासा को अभी उसकी खोज करनी बाकी है। 
मंगल पर नासा का नया मिशन मार्स साइंस लैबोरेटरी या क्यूरियोसिटी के लैंड होते ही गिल्बर्ट एक बार फिर सक्रिय हो उठे हैं। वो हर मंच पर पूरे यकीन के साथ कह रहे हैं कि क्यूरियोसिटी उन्हीं नतीजों की एक बार फिर पुष्टि करेगा जो वाइकिंग मिशन के साथ गए उनके उपकरणों ने 36 साल पहले भेजे थे। मंगल पर जीवन मौजूद है इस पर यकीन करने वाले गिल्बर्ट अकेले नहीं हैं, लॉस एंजिल्स की यूनिवर्सिटी आफ साउदर्न कैलीफोर्निया के सेल बायोलॉजिस्ट जो मिलर ने वाइकिंग के उस पुराने डेटा का फिर से विश्लेषण किया है और उनका मानना है कि मंगल की मिट्टी से फूटती मीथेन वहांसरकाडियन साइकिल यानि दिन और रात के चक्र पर आधारित जीव की ओर इशारा कर रही है, जिसका केवल एक ही मतलब है कि मंगल जिंदा है।
गिल्बर्ट नासा से मांग कर रहे हैं कि अगर क्यूरियोसिटी मंगल पर मीथेन खोज निकालती है तो 36 साल पुराने उनके वाइकिंग प्रयोग के डेटा की दोबारा जांच की जानी चाहिए। गिल्बर्ट कहते हैं, मंगल पर अब तक गए नासा के किसी भी मिशऩ ने वाइकिंग के मेरे प्रयोग के नतीजों का खंडन नहीं किया है। मुझे पूरा यकीन है कि मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक खोज निकालने में क्यूरियोसिटी कायमाब रहेगा। तब नासा को 36 साल पुराने वाइकिंग के नतीजों का फिर से विश्लेषण करना ही होगा।  
वॉशिंगटन में कार्नेगी इंस्टीट्यूट फार साइंस में भूवैज्ञानिक रॉबर्ट हैजेन कहते हैं, गिल्बर्ट के दावे आधारहीन नहीं हैं, वाइकिंग मिशऩ पर उनके उपकरणों के नतीजे चौंकानेवाले हैं, जिन्हें अब तक ठीक-ठीक समझने की कोशिश भी नहीं की गई है। वाइकिंग मिशन से पहले और काफी हद तक अब भी हम भोजन को पचाने वाले कार्बनिक जीवन को ही असली जिंदगी समझकर खोज रहे हैं। जबकि हो सकता है कि जीवन का एक अकार्बनिक रूप भी मौजूद हो। 

सोमवार, 27 अगस्त 2012

अलविदा कमांडर, फिर मिलेंगे, किसी और डायमेंशन में...


नील आर्मस्ट्रांग संपूर्ण मानवता के महानतम नायकों में से हैं। उनके निधन पर श्रद्धांजलि स्वरूप वॉयेजरनील आर्मस्ट्रांग का ये साक्षात्कार पुन: प्रकाशित कर रहा है, जिसे मिशन अपोलो-11 की 40 वीं वर्षगांठ के मौके पर लिया गया था। प्रस्तुत है चंद्रमा के सफर की तैयारियों और वहां की उजली जमीन पर लैंड करने के अनोखे अनुभव खुद कमांडर नील आर्मस्ट्रांग की जबानी -
मुझे याद है, जब मैं छोटा बच्चा था तो लकड़ी के एयरक्राफ्ट बनाया करता था। हवा में उड़ते और कलाबाजियां खाते प्लेन्स की वो तस्वीर मेरे दिमाग में अब भी ताजा है, जिन्हें मैंने बचपन में अपने पिता के साथ एयरशो में देखा था। हम सभी वाकई बड़े खुशनसीब हैं, कि कुदरत ने हमारे लिए वक्त का ऐसा दौर चुना जब इतिहास मानव जाति की तकदीर का फैसला कर रहा था। मैं उन सब लोगों का शुक्रिया अदा करता हूं, जिनकी मेहनत और लगन की वजह से अपोलो-11 कार्यक्रम मुमकिन हो सका और हम सब इतिहास के उस गौरवशाली पन्ने पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके।
मिशन अपोलो-11 नासा के अंतरिक्ष अभियानों के इतिहास का सबसे ज्यादा प्रचारित अभियान था। इसे लेकर लोगों की अपेक्षाएं बुलंदी पर थीं। अकसर लोग मुझसे पूछते हैं कि अभियान की तैयारी के दौरान मीडिया हाइप और लोगों की अपेक्षाओं को लेकर क्या मैं किसी तरह के मानसिक दबाव से गुजर रहा था? इसका जवाब मैं आज देता हूं, हमारे अभियान को लेकर बाहर की तमाम हलचल से मैंने पीठ मोड़ ली थी। मेरा पूरा ध्यान उन तीन से चार लाख लोगों की मिलीजुली मेहनत पर था, जो इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए दिन-रात काम में जुटे थे।
मेरा पूरा ध्यान इस मिशन की कामयाबी पर फोकस था, जिसके लिए इतने सारे लोग काम कर रहे थे। बाहर के तमाशे से मैंने खुद को दूर रखा, मेरे दिमाग में केवल यही बात थी कि प्रोजेक्ट अपोलो-11 के लिए काम कर रहा हर व्यक्ति, हर एसेंबलर कुछ न कुछ बनाने में जुटा था, लोग परीक्षण पर परीक्षण कर रहे थे और लैंडर का हर नट-बोल्ट कई-कई बार परखा जा रहा था। इस मिशन से जुड़े लाखों पुरुष और महिलाएं अपने काम को लेकर इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि ये बाते आम थीं कि अगर कुछ गड़बड़ होई तो ये कम से कम हमारे काम की वजह से नहीं होगी। क्योंकि इन सैकड़ों-हजारों लोगों ने अपना काम जितना वो कर सकते थे, उससे बेहतर किया था और जब सारे लोग कुछ बेहतर काम करते हैं तो नतीजा अपने आप शानदार हो जाता है। इसीलिए मिशन अपोलो-11 कामयाब रहा था
जब मैं जॉनसन स्पेस सेंटर के मैन्ड स्पेसक्राफ्ट सेंटर में अपने मिशन का प्रशिक्षण ले रहा था, तो वहां का माहौल ऐसा था कि आप ये नहीं पूछ सकते थे कि बॉस छुट्टी कब होगी? पूरे जुनून के साथ जुटे लोग तब तक काम में जुटे रहते थे, जबतक कि वो पूरा नहीं हो जाता था। कोई अपनी कलाई घड़ी पर नजर नहीं डालता था कि वक्त क्या हुआ है? पाली खत्म होने की बेल बजती जरूर थी, लेकिन घर कोई भी नहीं जाता था। लोगों ने अपनी लगन से प्रोजेक्ट अपोलो-11 को दूसरे सरकारी कामकाजों से बिल्कुल जुदा बना दिया था। हर कोई इस प्रोजेक्ट में पूरी दिलचस्पी, लगन और उत्साह के साथ जुटा हुआ था। सबके दिलोदिमाग में बस यही बात थी कि हमें कामयाब होकर दिखाना है। ऐसे माहौल में मेरा पूरा ध्यान पूरी तरह से अपने मिशन पर टिका था। एडविन बज एल्ड्रिन और माइकल कोलिंस मेरे लिए अजनबी नहीं थे, जेमिनी और अपोलो के शुरुआती मिशन्स के दौरान हम पहले भी साथ काम कर चुके थे। हमारी टीम नासा के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से लगातार नई-नई समस्याओं पर इंप्रोवाइज किया करते थे, कि अगर ये हो गया तो हम क्या करेंगे? अगर वो हो गया तो हमारा प्लान बी क्या होगा? जितनी मुसीबतों के बारे में हम सोच सकते थे, उन्हें सामने रख कर लंबी बहसें किया करते थे।
20 जुलाई 1969 को हमारा लैंडर ईगल चांद पर लैंड कर गया और अगले दिन 21 जुलाई को मैंने चंद्रमा पर पहले कदम रखे। लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैंने पहले से सोचकर रखा था कि चंद्रमा पर उतरने के बाद मैं ये लाइनें बोलूंगा। मैं आज बताता हूं, मैंने पहले से कुछ भी सोचकर नहीं रखा था और न ही कोई तैयारी की थी, हां लैंडर की नौ कदमों वाली सीढ़ी से उतरते वक्त जरूर मेरे दिल में तेज हलचल चल रही थी और इसी बीच मुझे ...जाइंट स्टेप ऑफ मैनकाइंड, वाली लाइनें सूझ गईं। पूरी दुनिया के लिए ये बेहद खास मौका था। मेरे बाद बज एल्ड्रिन उतरे, लोग मुझसे ये भी पूछते हैं कि अपोलो-11 की ज्यादातर फोटोग्राफ्स में बज एल्ड्रिन ही नजर आते हैं, मैं क्यों नहीं? ऐसा इसलिए, क्योंकि चंद्रमा पर हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं था और मैं ज्यादा से ज्यादा फोटोग्राफ्स लेने में जुटा था।
मिशन की तैयारी के दौरान विचार-विमर्श का एक लंबा दौर इस बात को लेकर भी चला कि चंद्रमा पर पहुंचकर हम क्या-क्या करेंगे। तमाम लोगों ने अपने-अपने सुझाव दिए। कुछ का कहना था कि हमें वहां यूनाईटेड नेशंस का झंडा लगाना चाहिए। तो वहीं कुछ लोग चाह रहे थे कि चंद्रमा पर कई देशों के छोटे-छोटे झंडे वहां लगाए जाएं। आखिर में ये फैसला लिया गया और मुझे लगता है कि कांग्रेस ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई कि अपोलो-11 कोई यूनाईटेड नेशंस का मिशन नहीं था और हम कोई वहां किसी मालिकाना हक का दावा करने नहीं जा रहे थे, लेकिन हम चाहते थे कि लोगों को पता चले कि हम यहां हैं, इसलिए हमने तय किया कि अपना राष्ट्रीय ध्वज ही वहां लगाएंगे। अमेरिका के झंडे को वहां लगाना मेरा काम था, चंद्रमा पर इसे लगाया जाना चाहिए या नहीं, इन बातों पर मेरा ध्यान बिल्कुल भी नहीं था। मुझे गर्व है कि अपने देश का झंडा चंद्रमा पर पहली बार मैंने लगाया।
चंद्रमा ने हमें कई तरह से हैरानी में डाल दिया। वहां की कई चीजों से मैं गहरे ताज्जुब में पड़ गया। सबसे ज्यादा हैरानी मुझे वहां के क्षितिज को देखकर हुई, धरती के मुकाबले चंद्रमा का क्षितिज हमारे बेहद करीब था। हमारे कदमों के साथ उड़ती चंद्रमा की धूल, जिसतरह उठकर वापस गिर रही थी, मैं उसे भी देखकर हैरान था। धरती पर आप धूल पर पैर पटकें तो वो उड़कर गुबार की शक्ल में छा जाएगी, लेकिन चंद्रमा पर ऐसा नहीं हो रहा था। हमारे पैर पटकने से धूल उठ रही थी लेकिन कोई गुबार सा नहीं बन रहा था। धरती पर धूल का गुबार वायुमंडल की वजह से बनता है, चंद्रमा पर वायुमंडल न होने से धूल हमारे पैरों के आसपास ही छिटक रही थी। चंद्रमा पर धूल तेजी से जमीन पर वापस गिरकर एक नई पर्त बना देती थी। ऐसा लगता था मानो इस धूल को एक हफ्ते पहले उडा़या गया था। ये वाकई हैरतंगेज था, मैंने ऐसा पहले कभी कुछ देखा-सुना नहीं था।
पब्लिक एड्रेस के दौरान लोग सवाल पूछते हैं कि क्या चीन की दीवार और मोंटाना के फोर्ट रेक डैम जैसी इंसानों की बनाई चीजें हमें चंद्रमा से नजर आ रही थीं या नहीं? ये सब अफवाह है और कुछ नहीं, चंद्रमा के क्षितिज से ऊपर हमें नीली पृथ्वी नजर आ रही थी। हमें महाद्वीप और ग्रीनलैंड दिख रहे थे। पृथ्वी लाइब्रेरी में रखे किसी ग्लोब के जैसी लग रही थी। हमें अंटार्कटिक नहीं दिखा, क्योंकि वो हिस्सा बादलों से ढंका था। पृथ्वी के घूमने के साथ हमें अफ्रीका साफ नजर आ रहा था। सूरज की किरणें किसी चीज से परावर्तित हो रहीं थीं, शायद चाड झील से हमने भारत और एशिया भी देखा। लेकिन हमें चंद्रमा से इंसान की बनाई चीन की दीवार या कोई दूसरी चीज नजर नहीं आई। हां, कई लोग ऐसी बातें करते हैं, लेकिन मैं अब तक किसी ऐसे अंतरिक्षयात्री से नहीं मिला जिसे अंतरिक्ष से मानव निर्मित दीवार या इमारतें दिखाई दी हों। यहां तक कि मैंने बाद में स्पेस शटल के साथ जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों से भी पूछा, लेकिन चीन की दीवार या कोई दूसरी चीज किसी को अंतरिक्ष से अब तक नजर नहीं आई है।
अंत में मैं अपनी पुरानी इच्छा व्यक्त करना चाहूंगा, मैं मंगल पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों के मिशन में शामिल होना चाहता हूं। मैं मंगल जाना चाहता हूं। मुझे लगता है, अब हम मंगल के सफर पर जा सकते हैं। हम मंगल को नजरअंदाज नहीं कर सकते, आज नहीं तो कल हमें मंगल पर जाना ही होगा।
- नील आर्मस्ट्रांग
कमांडर, मिशन अपोलो-11
( कमांडर नील आर्मस्ट्रांग के शब्दों में मिशन अपोलो-11 की यादें)