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बुधवार, 24 सितंबर 2014

रोटी जरूरी है या मंगल और चांद पर जाना?...

हमें पहले क्या करना चाहिए? रोटी जरूरी है या मंगल और चांद पर जाना? इस मुद्दे पर इसरो चीफ के राधाकृष्णन के विचार, मंगलयान के मंगल की कक्षा में सफल प्रवेश के अवसर पर वॉयेजर की खास प्रस्तुति-

'इसरो में ये सवाल हमलोग हर दिन खुद से पूछते हैं. हम इस बारे में सोचते हैं कि हम जो कर रहे हैं इससे जनता को, सरकार को फायदा होता है या नहीं. इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना नहीं है. 24 सेटेलाइट हैं अंतरिक्ष में हमारे. बड़ा कम्यूनिकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर बनाया है हमने. करीबन 200 ट्रांसपॉन्डर हैं जिनके जरिए मछुआरों की मदद हो रही है. उन्हें समुद्र में किस जगह पर ज्यादा मछली मिलेगी, इसकी जानकारी उपलब्ध कराते हैं हम.
 हम गलत अवधारणा में हैं कि इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना है. बल्कि हम जो काम करते हैं वो सीधे या फिर परोक्ष तौर पर देश की सरकार और जनता के हित में काम आता है. इसरो द्वारा भेजा गया रॉकेट और सेटेलाइट लोगों को रोटी देने का काम भी करता है. किसी किसान या फिर मछुआरे से पूछिए.
वैज्ञानिक समझ को बढ़ाने के साथ तकनीकी बेहतरी पर इसरो ने बहुत कुछ किया है. मिशन टू मून हो या मिशन टू मार्स, इसरो ने सिर्फ ये दो काम ही नहीं किए. हमने स्ट्रेटजिक मूवमेंट में भी अहम भूमिका निभाई है.
1960 से आज तक यही पूछा जाता है कि भारत जैसे गरीब देश को स्पेस में एयरक्राफ्ट भेजना चाहिए या नहीं? हर प्रोजेक्ट के साथ यही सवाल उठता है. ये सवाल उठते रहेंगे. पर मैं भी एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या भारत जैसे देश को स्पेस साइंस में इनवेस्ट नहीं करना चाहिए, जो सुपरपावर बनना चाहता है?
फसलों से बेहतर उपज, तूफान की जानकारी, इस तरह की अहम जानकारियां जुटाने में हमारे सेटेलाइट काम में आ रहे हैं. तूफान फेलिन की जानकारी इनसेट सेटेलाइट से मिली. करीब 400 से ज्यादा तस्वीरें हमें मिलीं जिसके जरिए हजारों जानें बचाई जा सकीं. हमारे पास रॉकेट होने चाहिए क्योंकि सेटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजना है. भूख मिटाना जरूरी है पर स्पेस साइंस को नजरअंदाज नहीं कर सकते. आखिरकार ये भी तो रोटी देने में मदद करता है.'
(इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में Rockets vs Rotis में इसरो प्रमुख डॉ.के राधाकृष्णन के व्याख्यान के अंश)

रविवार, 9 मार्च 2014

राधाकृष्णन: रॉकेट के जरिए रोटी देता है इसरो


हमें पहले क्या करना चाहिए? रोटी जरूरी है या चांद पर जाना? इस मुद्दे पर इसरो चीफ के राधाकृष्णन ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में अपने विचार रखे. राधाकृष्णन ने कहा, 'हम गलत अवधारणा में हैं कि इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना है. बल्कि हम जो काम करते हैं वो सीधे या फिर परोक्ष तौर पर देश की सरकार और जनता के हित में काम आता है. इसरो द्वारा भेजा गया रॉकेट और सेटेलाइट लोगों को रोटी देने का काम भी करता है. किसी किसान या फिर मछुआरे से पूछिए.'

Rockets vs Rotis सत्र में बोलते हुए इसरो के चीफ के राधाकृष्णन ने कहा, 'वैज्ञानिक समझ को बढ़ाने के साथ तकनीकी बेहतरी पर इसरो ने बहुत कुछ किया है. मिशन टू मून हो या मिशन टू मार्स, इसरो ने सिर्फ ये दो काम ही नहीं किए. हमने स्ट्रेटजिक मूवमेंट में भी अहम भूमिका निभाई है.' उन्होंने आगे कहा, '1960 से आज तक यही पूछा जाता है कि भारत जैसे गरीब देश को स्पेस में एयरक्राफ्ट भेजना चाहिए या नहीं? हर प्रोजेक्ट के साथ यही सवाल उठता है. ये सवाल उठते रहेंगे. पर मैं भी एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या भारत जैसे देश को स्पेस साइंस में इनवेस्ट नहीं करना चाहिए, जो सुपरपावर बनना चाहता है?'

राधाकृष्णन ने कहा, 'इसरो में ये सवाल हमलोग हर दिन खुद से पूछते हैं. हम इस बारे में सोचते हैं कि हम जो कर रहे हैं इससे जनता को, सरकार को फायदा होता है या नहीं. इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना नहीं है. 24 सेटेलाइट हैं अंतरिक्ष में हमारे. बड़ा कम्यूनिकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर बनाया है हमने. करीबन 200 ट्रांसपॉन्डर हैं जिनके जरिए मछुआरों की मदद हो रही है. उन्हें समुद्र में किस जगह पर ज्यादा मछली मिलेगी, इसकी जानकारी उपलब्ध कराते हैं हम.

फसलों से बेहतर उपज, तूफान की जानकारी, इस तरह की अहम जानकारियां जुटाने में हमारे सेटेलाइट काम में आ रहे हैं. तूफान फेलिन की जानकारी इनसेट सेटेलाइट से मिली. करीब 400 से ज्यादा तस्वीरें हमें मिलीं जिसके जरिए हजारों जानें बचाई जा सकीं. हमारे पास रॉकेट होने चाहिए क्योंकि सेटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजना है. भूख मिटाना जरूरी है पर स्पेस साइंस को नजरअंदाज नहीं कर सकते. आखिरकार ये भी तो रोटी देने में मदद करता है.'

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

रॉकेट पर भारत की उड़ान की गोल्डन जुबली

21 नवंबर को भारत अपने पहले राकेट के प्रक्षेपण की स्वर्ण जयंती क्षणों में प्रवेश कर गया। यहां समीप के तटीय थुम्बा गांव में देश के अंतरिक्ष अभियान ने निर्णायक कदम उठाया था जिसकी परिणति आज चंद्रयान और मंगल अभियान के रूप में हमारे सामने हैं ।

उस वक्त नारियल के पेड़ों के झुरमुट के बीच थुम्बा में बस एक ही लांच पैड हुआ करता था। इस रॉकेट की लांचिंग के लिए वैज्ञानिकों ने लांच पैड के करीब मौजूद एक कैथोलिक चर्च सेंट मैरी मैगेडलेन को मुख्यालय के तौर पर इस्तेमाल किया था। बिशप के घर को रॉकेट तैयार करने वाली वर्कशॉप में तब्दील कर दिया गया था।

मवेशियों को बांधने वाली छायादार जगह को लैबोरेटरी बना दिया गया था, जहां अब्दुल कलाम आजाद जैसे नौजवान वैज्ञानिकों ने काम किया। ऐसी लैब और वर्कशॉप में तैयार देश के पहले रॉकेट के अलग-अलग हिस्सों को साइकिल पर लादकर लांच पैड तक पहुंचाया गया था।

इस उनींदे से गांव के आधुनिक भारत का प्रतीक बन जाने का सपना किसी ने नहीं देखा था लेकिन 21 नवंबर 1963 को यहीं से भारत ने अपना पहला अमेरिका निर्मित राकेट प्रक्षेपित किया और यह गांव रातोंरात सुखिर्यों में आ गया।

दूसरा रॉकेट, जिसे कुछ वक्त बाद लांच किया गया, वो आकार में कुछ बड़ा और वजनी था और इसे लांच पैड तक पहुंचाने के लिए बैलगाड़ी की मदद ली गई थी।  पहले रॉकेट लांच के बाद अगले 12 साल के भीतर भारत ने 350 से ज्यादा साउंडिंग रॉकेट्स बनाए और लांच किए।

बाद में इसे थुम्बा इक्वाटोरियल राकेट लांच स्टेशन (टीईआरएलएस) का नाम दिया गया लेकिन कुछ समय बाद इसे विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) कहा जाने लगा। इसरो के इस प्रमुख सेंटर का नामकरण भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर किया गया।

वो साराभाई ही थे जिन्होंने युवा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम को एकत्र कर मिशन की खातिर प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजा था। उनके द्वारा भर्ती किए गए शुरूआती वैज्ञानिकों में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी थे।

केंद्र सरकार ने अंतरिक्ष कार्यक्रम में पहला कदम अगस्त 1961 में उठाया था और परमाणु उर्जा विभाग को अंतरिक्ष शोध तथा बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की जिम्मेदारी सौंपी थी।

1962 में साराभाई की अध्यक्षता में अंतरिक्ष शोध पर एक राष्ट्रीय समिति गठित की गयी जिसने मिशन को आगे बढ़ाया और अगले वर्ष 21 नवंबर को देश ने पहले अमेरिका निर्मित नाइके अपाचे राकेट को थुम्बा से प्रक्षेपित किया।