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सोमवार, 25 नवंबर 2013

हमें साइंस पर इसलिए खर्च करना चाहिए



भारत का मार्स ऑरबिटर मिशन के साथ ही एक पुराना सवाल फिर सामने है कि क्या भारत जैसे विकासशील देश में, जहां भारी तादाद में लोग अब भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं, वहां 450 करोड़ रुपये मंगल अभियान पर खर्च करना जायज है? ये एक सार्वकालिक सवाल है और केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी वैज्ञानिक समुदाय को इन सवालों का सामना करना पड़ता है। इस बार मंगलयान के साथ ये सवाल कुछ ज्यादा ही जोरदारी के साथ उठाया गया। एक न्यूज चैनल ने तो बकायदा ये भी दिखाया कि 450 करोड़ रुपये में सरकार लोगों के लिए क्या-क्या काम कर सकती थी।
बात केवल मंगलयान की नहीं है। भारत के कुछ और साइंस प्रोजेक्ट्स आने वाले वक्त में पूरे होने हैं, जिनकी लागत करोड़ों में है, मिसाल के तौर पर तमिलनाडु के पास बन रही देश की पहली अंडरग्राउंड न्यट्रिनो लैब, जिसकी लागत 150 करोड़ रुपये से ज्यादा है, उत्तराखंड के देवस्थल में एशिया के सबसे बड़े 13.5 मीटर के टेलिस्कोप की ऑब्जरवेटरी को बनाने का काम जारी है जिसकी लागत करीब 120 करोड़ रुपये है, चंद्रयान-2 जिसकी लागत 426 करोड़ रुपये है और इसके अलावा भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक में स्थायी स्टेशंस चला रहा है, जिसकी सालाना लागत भी कई सौ करोड़ है। सवाल फिर वही कि क्या भारत को साइंस पर भारी खर्च करना चाहिए?
 देश में बीएमडब्लू जैसी करोड़ों की कीमत वाली विदेशी गाड़ियों के बढ़ते महंगे शौक की बात न भी करें तो मंगलयान और साइंस के दूसरे प्रोजेक्ट्स पर हो रहे खर्च पर हाय-तौबा मचाने वाले लोग ये भूल जाते हैं भारत साइंस पर जितना खर्च करता है, उससे कई गुना ज्यादा पैसा इस देश में लोग सिगरेट और शराब पर उड़ा रहे हैं। भारत में सिगरेट का सालाना बाजार 720 अरब रुपये का है। आईटीसी जैसे सिगरेट के बड़े ब्रांड इसे और विस्तार देने के लिए जल्दी ही 25000 करोड़ रुपये और खर्च करने जा रहे हैं। शराब की बात करें तो देश में इस नशे का फुटकर बाजार 2100 अरब रुपये का है। इस नशीले एश्वर्य में झूमते विजय माल्या जैसे लोग फार्मूला-वन और कैसीनो जैसी चीजों को देश में ला रहे हैं और नई पीढ़ी के रोल मॉडल बन रहे हैं। लोग सिगरेट और शराब पर एक साल में 2800 अरब रुपये से ज्यादा उड़ा रहे हैं। ये रकम इस बार के केंद्रीय बजट में दर्शाये गए देश के कुल वास्तविक खर्च से भी ज्यादा है।
जब भी हम साइंस पर खर्च करते हैं, अंतरिक्ष पर खर्च करते हैं या किसी नई खोज के लिए खर्च करते हैं, तो हमेशा ये निवेश बोनस के साथ कई-कई रास्तों से वापस हमारे पास लौटता है। चंद्रयान देश के अंतरिक्ष अनुसंधान का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ था। चंद्रयान की लागत 354 करोड़ रुपये थी, लेकिन जब चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी खोज निकाला तो इससे देश को जो विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा अर्जित हुई वो नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी को दशकों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके भी नहीं मिल सकी थी।
साइंस अनुसंधान पर होने वाला खर्च मानवता के लिए जीवन बीमा के जैसा निवेश है, जो हमेशा मानवता के भविष्य को बेहतर और सुरक्षित बनाने के लिए किया जाता है। यही वजह है कि 100 साल से ज्यादा वक्त और बीत जाने के बावजूद कैंसर पर रिसर्च अब भी जारी है। एड्स पर विजय पाने की जंग भी पिछले 30 साल से लगातार जारी है। इन लड़ाइयों पर अब तक अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं, वैज्ञानिकों की कई पीढ़ियों ने बगैर किसी ठोस नतीजे के अपनी पूरी जिंदगी इन रोगों पर विजय पाने की कोशिश में खपा दी है। लेकिन समय, पैसे और प्रतिभा के इस लंबे और लगातार निवेश के बदौलत ही अब हमें इन रोगों की लड़ाईयों की अंधी सुरंगों के दूसरे सिरे पर उम्मीद की रोशनी नजर आ रही है। एचआईवी पर काबू पा लिया गया है और कैंसर के खिलाफ भी निर्णायक टीका बस आने को है।
 भारत में जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक अनुसंधान पर होने वाले सकल खर्च को व्यवस्थित और जवाबदेह बनाया जाए। मैंने जब सीएसआईआर के महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी से पूछा कि पिछले 5 साल के दौरान आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही? तो काफी याद करने के बाद उन्होंने ई-रिक्शा का नाम लिया। अब अगर देशभर में दर्जनों प्रयोगशालाओं और सरकारी वैज्ञानिकों की भारी-भरकम फौज वाला संगठन सीएसआईआर करोड़ों के बजट को खर्च कर 5 साल में देश के लिए बस ई-रिक्शा ही बना सका है। तो इससे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर जो चल रहा है, उसका खुलासा होता है और ये वाकई गहरी चिंता का विषय है। देश में वैज्ञानिकों को रिसर्च प्रोजेक्ट्स के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये आवंटित करा दिए जाते हैं। इसके बाद ऐसी कोई एजेंसी नहीं है जो वैज्ञानिकों से उनके प्रोजेक्ट्स के बारे में जवाब-तलब करे और पैसों की निगरानी करे। 15 से 20 साल तक वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स चलते रहते हैं और साथ में कई सहायक परियोजनाएं भी शुरू हो जाती हैं, विदेश यात्राएं चलती रहती हैं और पैसा बर्बाद होता रहता है। अंत में कोई भी ठोस वैज्ञानिक खोज सामने नहीं आती। जरूरत इस बात की है कि देश में वैज्ञानिक प्रोजेक्ट के लिए एक नियामक एजेंसी बने, जिसमें शीर्ष वैज्ञानिक शामिल हों और जो ये तय करे कि प्रोजेक्ट्स तय समय सीमा में ही पूरे हों, शोध कर रहे वैज्ञानिकों जवाबदेही तय हो, एक तय समयसीमा में शोध पूरे हों और उन प्रोजेक्ट्स के नतीजों का फायदा केवल उस वैज्ञानिक या उसके परिवार को नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों को मिले।
संदीप निगम

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

रॉकेट पर भारत की उड़ान की गोल्डन जुबली

21 नवंबर को भारत अपने पहले राकेट के प्रक्षेपण की स्वर्ण जयंती क्षणों में प्रवेश कर गया। यहां समीप के तटीय थुम्बा गांव में देश के अंतरिक्ष अभियान ने निर्णायक कदम उठाया था जिसकी परिणति आज चंद्रयान और मंगल अभियान के रूप में हमारे सामने हैं ।

उस वक्त नारियल के पेड़ों के झुरमुट के बीच थुम्बा में बस एक ही लांच पैड हुआ करता था। इस रॉकेट की लांचिंग के लिए वैज्ञानिकों ने लांच पैड के करीब मौजूद एक कैथोलिक चर्च सेंट मैरी मैगेडलेन को मुख्यालय के तौर पर इस्तेमाल किया था। बिशप के घर को रॉकेट तैयार करने वाली वर्कशॉप में तब्दील कर दिया गया था।

मवेशियों को बांधने वाली छायादार जगह को लैबोरेटरी बना दिया गया था, जहां अब्दुल कलाम आजाद जैसे नौजवान वैज्ञानिकों ने काम किया। ऐसी लैब और वर्कशॉप में तैयार देश के पहले रॉकेट के अलग-अलग हिस्सों को साइकिल पर लादकर लांच पैड तक पहुंचाया गया था।

इस उनींदे से गांव के आधुनिक भारत का प्रतीक बन जाने का सपना किसी ने नहीं देखा था लेकिन 21 नवंबर 1963 को यहीं से भारत ने अपना पहला अमेरिका निर्मित राकेट प्रक्षेपित किया और यह गांव रातोंरात सुखिर्यों में आ गया।

दूसरा रॉकेट, जिसे कुछ वक्त बाद लांच किया गया, वो आकार में कुछ बड़ा और वजनी था और इसे लांच पैड तक पहुंचाने के लिए बैलगाड़ी की मदद ली गई थी।  पहले रॉकेट लांच के बाद अगले 12 साल के भीतर भारत ने 350 से ज्यादा साउंडिंग रॉकेट्स बनाए और लांच किए।

बाद में इसे थुम्बा इक्वाटोरियल राकेट लांच स्टेशन (टीईआरएलएस) का नाम दिया गया लेकिन कुछ समय बाद इसे विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) कहा जाने लगा। इसरो के इस प्रमुख सेंटर का नामकरण भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर किया गया।

वो साराभाई ही थे जिन्होंने युवा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम को एकत्र कर मिशन की खातिर प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजा था। उनके द्वारा भर्ती किए गए शुरूआती वैज्ञानिकों में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी थे।

केंद्र सरकार ने अंतरिक्ष कार्यक्रम में पहला कदम अगस्त 1961 में उठाया था और परमाणु उर्जा विभाग को अंतरिक्ष शोध तथा बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की जिम्मेदारी सौंपी थी।

1962 में साराभाई की अध्यक्षता में अंतरिक्ष शोध पर एक राष्ट्रीय समिति गठित की गयी जिसने मिशन को आगे बढ़ाया और अगले वर्ष 21 नवंबर को देश ने पहले अमेरिका निर्मित नाइके अपाचे राकेट को थुम्बा से प्रक्षेपित किया।

रविवार, 17 नवंबर 2013

डॉ. भाभा को भारत रत्न से सम्मानित करें: डॉ. राव


देश ने दो दिग्गजों सचिन तेंदुलकर और डॉ.सीएनआर राव को उनके अलग-अलग क्षेत्रों क्रिकेट और साइंस में अतुलनीय योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया है. ये बात अलग है कि सचिन के जश्न में डॉ. राव की खबर दब सी गई है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सचिन और उम्र में उससे दोगुने बड़े डॉ. राव दोनों ही 'मास्टर ब्लास्टर' हैं. सचिन को जहां लोग क्रिकेट का भगवान कहते हैं, वहीं डॉ. राव सॉलिड स्टेट साइंस में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने आप में एक इंस्टीट्यूशन, एक प्राधिकरण के रूप में मशहूर हैं.

 डॉ. सीएनआर राव क्रिकेट के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ये भी सच है कि वो निजी जीवन में क्रिकेट को बहुत ज्यादा पसंद भी नहीं करते हैं. एक यूनिवर्सिटी में अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने कहा भी था कि क्रिकेट ने इस देश में साइंस को पीछे धकेल दिया है. उन्होंने कहा था कि आप सचिन को भारत रत्न देना चाहते हैं तो जरूर दीजिए, लेकिन जरा इस देश के लिए डॉ. भाभा के योगदान को भी याद कर लीजिए, जिन्हें अब तक भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया है. दिसंबर 2011 में डॉ. राव ने बकायदा केंद्र सरकार से मांग की थी कि डॉ. होमी जहांगीर भाभा को उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया जाए.

ये भी अनोखा संयोग है कि डॉ. भाभा से पहले खुद डॉ. सीएनआर राव को ही भारत रत्न से सम्मानित कर दिया गया और वो भी खुद क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर के साथ. देश ने विज्ञान और क्रिकेट दोनों को एकसाथ सम्मानित किया है. डॉ. सीएनआर राव भारत रत्न से सम्मानित होने वाले देश के तीसरे वैज्ञानिक हैं. उनसे पहले अब तक केवल तीन वैज्ञानिकों डॉ. सीवी रमन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को ही भारत रत्न से सम्मानित किया गया है.

देश के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा, देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रणेता डॉ. विक्रम साराभाई, सतीश धवन, बीरबल साहनी, जगदीश चंद्र बोस, शांति स्वरूप भटनागर, महान गणितज्ञ रामानुजन, सुब्रमणियम चंद्रशेखर, हरित क्रांति के जनक महान बायोटेक्नोलॉजिस्ट एमएस स्वामीनाथन, आनिल काकोदकर और भी कई महान वैज्ञानिक ऐसे हैं देश के विकास को इस स्तर तक ले आने में जिनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, उन्हें भारत रत्न नहीं मिला. भारत रत्न तो छोड़िए इनमें से कुछ वैज्ञानिकों को तो पद्मश्री तक नहीं दिया गया है. सरकारें अपने वैज्ञानिकों को भूल गईं और अब इनकी कहानियां स्कूलों की किताबों से दूर होते-होते नई पीढ़ी की चेतना से भी लुप्त हो चली हैं.

इसी साल 24 जनवरी को चीन ने भारत और चीन के बीच वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करने के लिए  डॉ. सीएनआर राव को अपने देश के शीर्ष विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया था. भारत रत्न से सम्मानित किए जाने वाले देश के प्रमुख रसायन वैज्ञानिक डॉ.सीएनआर राव को सॉलिड स्टेट एवं और स्ट्रक्चरल कैमिस्ट्री के क्षेत्र में दुनियाभर में एक अथॉरिटी होने का सम्मान प्राप्त है. वो पदार्थ की ठोस अवस्था और संरचनात्मक रसायन शास्त्र के प्रति पूरी तरह से समर्पित वैज्ञानिक हैं.पदार्थ के गुणों और उनकी आणविक संरचना के बीच आधारभूत समझ को विकसित करने में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.50 साल से भी ज्यादा वक्त से वो अलग-अलग रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. दुनिया के अलग-अलग जर्नल्स में उनके करीब 1400 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. उन्होंने करीब 50 पुस्तकों का लेखन अथवा संपादन किया है.

डॉ. राव ने देश की वैज्ञानिक नीतियों को बनाने में भी अग्रणी भूमिका निभाई है. इस समय डॉ. राव प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं. वह सन 1985 में प्रथम बार और सन 2005 में दूसरी बार इस समिति के अध्यक्ष नियुक्त हुए हैं. राव कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हुए. सन 1964 में उन्हें 'इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेस' का सदस्य नामित किया गया. सन 1967 में 'फैराडे सोसायटी ऑफ इंग्लैंड' ने राव को मार्लो मेडल प्रदान किया गया. डॉ. राव ने 1951 में मैसूर यूनिवर्सिटी से अपनी बैचलर डिग्री ली और दो साल बाद बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री ली. डॉ.राव ने पर्डयू यूनिवर्सिटी से 1958 में पीएच.डी. की. दुनियाभर की दर्जनों यूनिवर्सिटीज ने डॉ. राव को मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया है.

डॉ. राव काफी बेबाक भी हैं, मंगलयान लांचिंग से ऐन पहले जब पूर्व इसरो अध्यक्ष माधवन नायर ने मंगलयान को आधा-अधूरा मिशन बताते हुए इसे महज प्रचार का हथकंडा बताया तो डॉ. राव ने उन्हें जमकर लताड़ लगाई. मंगलयान लांच से पहले अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा कि इसरो ने मिशन में जल्दबाजी कर दी, उन्हें अभी होमवर्क पर और वक्त देना चाहिए था. लेकिन अब जबकि मिशन तैयार है, हमें वैज्ञानिकों के हौसले और कुछ नया कर दिखाने के जज्बे की सराहना करनी चाहिए.

 डॉ. राव को भारत रत्न सही दिशा में एक बेहतर शुरुआत है, जिससे एक उम्मीद सी बंधती है कि देश अब शायद डॉ. भाभा और डॉ. साराभाई जैसे अपने विज्ञान नायकों को भी देर से ही सही, लेकिन शीर्ष सम्मान से सम्मानित करेगा.

शिक्षा और विज्ञान में निवेश पर टिका है भारत का भविष्य: सीएनआर राव


देश ने विज्ञान की अहमियत को समझा है, डॉ. सीएनआर राव को भारत रत्न दिए जाने से ऐसा प्रतीत होता है. डॉ. राव भारत रत्न से सम्मानित किए जाने वाले देश के तीसरे वैज्ञानिक हैं. देश ने उनसे पहले केवल दो वैज्ञानिकों डॉ. सीवी रमन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को ही भारत रत्न के लायक समझा. 'वॉयेजर' इस शीर्ष सम्मान से विभूषित होने पर डॉ. सीएनआर राव को बधाई देता है. भारत रत्न अलंकरण से सम्मानित होने के बाद डॉ. राव ने बंगलुरू में छात्रों और वैज्ञानिकों को संबोधित किया, 'वॉयेजर' के पाठकों के लिए पेश है डॉ. सीएनआर राव के व्याख्यान का अनुवाद खुद उन्हीं के शब्दों में-

'दोस्तों, भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह शिक्षा एवं विज्ञान में कितना निवेश करता है . अफसोस की बात है कि विज्ञान को जितना समर्थन मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल रहा. मैं आपको बता दूं कि दुनिया में जिन देशों ने वाकई प्रगति की है, वे ऐसे देश हैं जिन्होंने खुद को वैज्ञानिक तौर पर उन्नत बनाया है . जिन्होंने खुद को वैज्ञानिक तौर पर उन्नत नहीं बनाया, उस देश को कोई नहीं जानता.

हमें शिक्षा और विज्ञान में ज्यादा निवेश करना चाहिए ताकि भारत का भविष्य सुरक्षित रहे . देश के सेंसेक्स और कारोबार का अच्छा प्रदर्शन ही काफी नहीं है . यह तो 5-10 साल के लिए है . लंबे समय के लिए क्या होगा और यदि इस मामले में बेहतर करना है तो विज्ञान में आधुनिक बनना पड़ेगा.

‘मूर्ख’ नेताओं ने विज्ञान को पीछे धकेल दिया है. वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए और अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है. सरकार की तरफ से वैज्ञानिक समुदाय को पैसा दिये जाने के लिए हमने बहुत कोशिशें की हैं. लेकिन इन मूर्ख (ईडियट) नेताओं को वैज्ञानिक अनुसंधान की अहमियत समझ में ही नहीं आती. बेहद सीमित संसाधनों के बावजूद हम वैज्ञानिकों ने कुछ तो किया ही है. हमारा निवेश बहुत कम है, देर से मिलता है. हमें जितने पैसे मिल रहे हैं वो कुछ भी नहीं हैं.

चीन की तरक्की और भारत के पिछड़ जाने के लिए हमें खुद को ही जिम्मेदार ठहराना होगा. हम भारतीय कठिन परिश्रम नहीं करते. हम चीन वालों की तरह नहीं हैं. हम बहुत आरामपसंद हैं और उतने राष्ट्रवादी नहीं हैं. अगर हमें थोड़ा ज्यादा धन मिल जाता है तो विदेश जाने को तैयार हो जाते हैं.

विज्ञान आगे बढ़ने का रास्ता है. मुझे इस बात की खुशी है कि हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस बात पर यकीन किया. बदकिस्मती से उनके बाद विज्ञान को सरकारों से वो समर्थन नहीं मिला जितना होना चाहिए. थोड़ा-बहुत समर्थन है पर उतना नहीं है जितना होना चाहिए. इसमें और सुधार की गुंजाइश है.

बुनियादी शिक्षा के लिए, साधारण शिक्षा पर हमें अपनी जीडीपी का कम से कम 6 फीसदी निवेश करना चाहिए . सरकार को यह करना पड़ेगा क्योंकि अन्य लोग इसमें ज्यादा कुछ कर नहीं रहे, निजी क्षेत्र थोड़ा-बहुत कर रहे हैं . हम सिर्फ 2 फीसदी निवेश कर रहे हैं.  भारत का भविष्य इस पर निर्भर करता है कि शिक्षा और विज्ञान में किस तरह निवेश किया जाता है . हमें विज्ञान में अपने निवेश को 1 फीसदी से बढ़ाकर 2 फीसदी करना होगा . मैं उम्मीद करता हूं कि ये चीजें होंगी .

आज की टेक्नोलॉजी पुरानी जैसी नहीं रही . आज की टेक्नोलॉजी आधुनिक विज्ञान के आधार पर बहुत तेजी से विकसित होती है . आज के विज्ञान और कल की टेक्नोलॉजी के बीच का समय बहुत कम रह गया है . मेरा मानना है कि भारत को अभी यह सीखना है कि टेक्नोलॉजी और मौलिक रिसर्च में विज्ञान के नवीनतम नतीजों का इस्तेमाल किस तरह किया जाए . मौलिक रिसर्च में भारत की रैंकिंग काफी खराब है. मौलिक रिसर्च के मामले में हम 140 देशों में 66वीं पायदान पर हैं . हमें 66वीं पायदान से शीर्ष 10 में आना है .

भारत में मौलिक रिसर्च , टेक्नोलॉजीमें निवेश ज्यादा सफल नहीं रहा है और यही वजह रही है कि भारत चीन और दक्षिण कोरिया से प्रतिस्पर्धा करने में कामयाब नहीं हो पाया है . चीन और दक्षिण कोरिया ने मौलिक रिसर्च और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत निवेश किए हैं . हमारे प्रधानमंत्री ने वादा तो किया है पर अब तक ऐसा हुआ नहीं है. वैज्ञानिक शोध पत्र प्रकाशित करने के मामले में भारत की स्थिति बदकिस्मती से बहुत खराब है .

अगले साल के शुरू में चीन पहले नंबर पर जाने को तैयार है . अब तक अमेरिका नंबर एक पर था जो दुनिया भर में हो रहे शोध कार्यों में 16.5 फीसदी पेश करता है . चीन करीब 12 फीसदी पेश कर रहा है जो 16.5 से 17 फीसदी होने को है . भारत महज 2.5 से 3 फीसदी पेश कर रहा है. मैं शोध पत्रों की संख्या के प्रति नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता को लेकर चिंतित हूं.

हमें ये समझना होगा कि सूचना-तकनीक का विज्ञान से कुछ लेना..देना नहीं है. अफसोस की बात है विज्ञान का मिजाज नहीं है.  आईटी कुछ लोगों के लिए पैसा बनाने का जरिया है और वहां काम करने वालों में नाखुश लोगों की तादाद ज्यादा है. क्योंकि मैं रोज अखबार में देखता हूं कि किसी ने आत्महत्या कर ली, किसी की हत्या कर दी गई, कुछ लोग नाखुश हैं कि जिंदगी खतरनाक है . मुझे देखिए मैं 80 वर्ष की उम्र में खुश हूं. मुझे कोई शिकायत नहीं है . मेरा मानना है कि खुशी कुछ अलग है.. आप जो कर रहे हैं उसका आनंद उठाईए.

बुधवार, 25 सितंबर 2013

300 साल पुरानी गुत्थी सुलझी, पता चला कि पृथ्वी के इनर कोर के घूमने की दिशा क्या है?


वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने पृथ्वी का कोर किस दिशा में घूमता है? इस 300 साल पुराने सवाल का जवाब ढूंढ़ निकाला है। वैज्ञानिकों के बनाए नए मॉडल से पता चला है कि ठोस लोहे की बनी पृथ्वी की इनर कोर पूरब की ओर से ‘सुपर रोटेट’ कर रही है। ‘सुपर रोटेट’ का मतलब ये कि इनर कोर की घूमने की रफ्तार पृथ्वी की गति से ज्यादा है। इस मॉडल से ये भी पता चला है कि मुख्यतौर पर पिघले लोहे से बना आउटर कोर अपेक्षाकृत धीमी गति से इनर कोर के विपरीत यानि पश्चिम की ओर से घूम रहा है।
1692 में एडमंड हैले ने पृथ्वी के जियोमैग्नेटिक फील्ड में पश्चिम दिशा को केंद्रित एक ड्रिफ्टिंग मोशन दिखाया था। तब से लेकर अब पहली बार वैज्ञानिक इनर कोर और आउटर कोर के घूमने के तरीकों को लेकर कुछ बता सके हैं। लीड्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि पृथ्वी का जियोमैग्नेटिक फील्ड ही हमारे ग्रह के कोर की इन विरोधी गतियों की वजह है।
लीड्स यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ अर्थ एंड एनवायरमेंट के डॉ। फिलिप लिवरमोर ने बताया कि भूकंप मापने वाले सीस्मोमीटर्स ने ही पहले पहल पृथ्वी की सतह के सापेक्ष ठोस इनर कोर के पूरब की ओर केंद्रित ‘सुपर रोटेशन’ को पहचाना था। न्यूटन के गति के तीसरे नियम की कसौटी पर इसे बराबर और विपरीत क्रिया के तौर पर आसानी से समझाया जा सकता है। इनर कोर पर मैग्नेटिक फील्ड पूरब की ओर केंद्रित नजर आती है, इस वजह से इनर कोर की रफ्तार पृथ्वी की गति से तेज रहती है। लेकिन पूरब की ओर घूमने के क्रम में ठोस इनर कोर अपने चारों ओर मौजूद पिघले आउटर कोर को विपरीत दिशा की ओर ठेलती रहती है, इससे आउटर कोर विपरीत दिशा यानि पश्चिम की ओर केंद्रित होकर घूमता रहता है।
हमारे ठोस इनर कोर का आकार हमारे चंद्रमा जितना है। लेकिन पृथ्वी के केंद्र में मौजूद ये लोहे का ठोस चंद्रमा चारों तरफ से पिघले लोहे के एलॉय से बने आउटर कोर से घिरा है। हालांकि पृथ्वी का इनर कोर हमारे पैरों से 5200 किलोमीटर नीचे है, फिर भी इसकी मौजूदगी प्रभाव पृथ्वी की सतह के लिए विशेषतौर पर महत्वपूर्ण है।  
जैसे-जैसे इनर कोर का आकार बढ़ता है, तो ठोस होने की इस प्रक्रिया में हीट रिलीज होती है, जिससे ऊउटर कोर में बिजली पैदा होती है। इस बिजली से ही हमारा मैग्नेटिक फील्ड जन्म लेता है।
पृथ्वी की सतह पर मौजूद जीवन के लिए ये मैग्नेटिक फील्ड सौर विकिरण से सुरक्षा के लिए एक कवच का काम करता है। इसके बगैर पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। 

रविवार, 22 सितंबर 2013

मेरी बीमारी ने मुझे उम्दा वैज्ञानिक बना दिया: प्रो.हॉकिंग


'ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ टाइम' के लेखक स्टीफ़न हॉकिंग एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार मौका है उनके जीवन संघर्षों पर बनी फिल्म 'हॉकिंग'का जो जल्दी ही दुनियाभर में रिलीज होने वाली है। प्रो.स्टीफन हॉकिंग एक इंटरव्यू में इस फिल्म और अपने जीवन के बारे में खुल कर बात की। प्रस्तुत है इस इंटरव्यू के खास अंश -

अपने जीवन पर बन रही इस फ़िल्म के बारे में पूछने पर हॉकिंग कहते हैं ''यह फ़िल्म विज्ञान पर केंद्रित है, और शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे लोगों को एक उम्मीद जगाती है। 21 वर्ष की उम्र में डॉक्टरों ने मुझे बता दिया था कि मुझे मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और मेरे पास जीने के लिए सिर्फ दो या तीन साल हैं।

इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है।कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इस बीमारी से लड़ने के बारे में मैने बहुत कुछ सीखा''। हॉकिंग का मानना है कि हमें वह सब करना चाहिए जो हम कर सकते हैं, लेकिन हमें उन चीजों के लिए पछताना नहीं चाहिए जो हमारे वश में नहीं है।

यह पूछने पर कि क्या अपनी शारीरिक अक्षमताओं की वजह से वह दुनिया के सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक बन पाए, हॉकिंग कहते हैं, ''मैं यह स्वीकार करता हूं मैं अपनी बीमारी के कारण ही सबसे उम्दा वैज्ञानिक बन पाया, मेरी अक्षमताओं की वजह से ही मुझे ब्रह्माण्ड पर किए गए मेरे शोध के बारे में सोचने का समय मिला। भौतिकी पर किए गए मेरे अध्ययन ने यह साबित कर दिखाया कि दुनिया में कोई भी विकलांग नहीं है।''

हॉकिंग को अपनी कौन सी उपलब्धि पर सबसे ज्यादा गर्व है? हॉकिंग जवाब देते हैं '' मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के लिए खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।''हॉकिंग के मुताबिक यह सब उनके परिवार और दोस्तों की मदद के बिना संभव नहीं था।

यह पूछने पर कि क्या वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं हॉकिंग कहते हैं, ''लगभग सभी मांसपेशियों से मेरा नियंत्रण खो चुका है और अब मैं अपने गाल की मांसपेशी के जरिए, अपने चश्मे पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत करता हूँ।''

मरने के अधिकार जैसे विवादास्पद मुद्दे पर हॉकिंग बीबीसी से कहते हैं, ''मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति जो किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित है और बहुत ज्यादा दर्द में है उसे अपने जीवन को खत्म करने का अधिकार होना चाहिए और उसकी मदद करने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह की मुकदमेबाजी से मुक्त होना चाहिए।''
स्टीफन हॉकिंग आज भी नियमित रूप से पढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय जाते हैं, और उनका दिमाग आज भी ठीक ढंग से काम करता है।

ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी को समझने में उन्होंने अहम योगदान दिया है। उनके पास 12 मानद डिग्रियाँ हैं और अमरीका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान उन्हें दिया गया है।

चंद्रमा पर एटमी धमाका करना चाहता था नासा

अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने मून मिशन के शुरुआती दिनों में चंद्रमा पर न्यूक्लियर बम से एटमी धमाका करने की योजना बनाई थी।

 यह बात भले ही बड़ी अजीब सी लगे, लेकिन है यह एक सच। हालांकि इस अत्यंत गोपनीय मिशन को सेना द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद वापस ले लिया गया था। सेना का मानना था कि यदि यह मिशन फेल हो गया तो पृथ्वीवासियों के लिए इसके परिणाम बेहद खराब होंगे।

एक अंग्रेजी अखबार ने दावा किया है कि स्पेस मिशन को भेजने की होड़ में वर्ष 1950 में अमेरिका ने चांद पर न्यूक्लियर बम का धमाका करने की योजना तैयार की थी। हालांकि इस योजना को कभी लागू नहीं किया जा सका।

अखबार के मुताबिक इस योजना को अत्यंत गोपनीय मिशन के तहत तैयार किया गया था। इस मिशन का नाम स्टडी ऑफ ल्यूनार रिसर्च फ्लाइट था। जिसका कोड नेम प्रोजेक्ट ए119 था। योजना के मुताबिक चांद पर धमाका कर वहां के धूल, मिट्टी समेत यहां मौजूद गैसों का परिक्षण किया जाना था। यह जिम्मा एक युवा खगोलविद को सौंपा गया था। इस योजना को बेहद गोपनीय तरीके से ही अंजाम भी देना था।

अखबार में छपी खबर के मुताबिक इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए अमेरिका को एक मिसाइल जमीन से चांद की ओर भेजनी थी। यह मिसाइल 238000 मील का सफर कर चांद तक जाती और धमाका करती। इसके लिए वैज्ञानिकों ने एटम बम को चुना था क्योंकि हाइड्रोजन बम काफी भारी होने के चलते चांद पर भेजना काफी मुश्किल था। 

लेकिन वैज्ञानिकों के इस मिशन को अमेरिकी सेना ने पूरी तरह से खारिज कर दिया। सेना का कहना था था कि यदि यह मिशन सफल नहीं हुआ तो इसका असर पृथ्वी पर पड़ेगा। सेना ने इसके गंभीर परिणाम होने की आशंका भी जताई थी, जिसके बाद इस योजना से पांव पीछे खींच लिए गए।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

धरती पर सबसे विशाल ज्वालामुखी की खोज


हमारी धरती पर सबसे विशाल ज्वालामुखी की खोज की गई है। ये ज्वालामुखी इतना विशाल है कि इसे पूरे सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा ज्वालामुखी कहा जा रहा है। पृथ्वी का ये सबसे विशाल ज्वालामुखी धरती पर नहीं, बल्कि प्रशांत महासागर के तल पर मौजूद है। ये ज्वालामुखी भौगेलिक आकार में ब्रिटिश या मैक्सिको देशों के जितनी विशाल है। जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जापान के पूर्वी तट से करीब 1609 किलोमीटर दूर मौजूद इस सबसे बड़े ज्वालामुखी का नाम 'टैमू मैसिफ' रखा गया है।
प्रशांत महासागर के भीतर 'शैट्सकाई राइज' नाम की विशाल पर्वतमाला है, जिसका निर्माण 13 से 14।5 करोड़ साल पहले हुआ था। ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' इसी पर्वतमाला का एक बड़ा हिस्सा है। विशालतम ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' प्रशांत महासागर के तल में करीब 310798 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला है।
अब तक 5179 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हवाई के सक्रिय ज्वालामुखी 'मौना लोआ' को पृथ्वी का सबसे विशाल ज्वालामुखी समझा जाता था, लेकिन  अगर आकार के मामले में इसकी तुलना 'टैमू मैसिफ' से की जाए, तो इसके सामने 'मौना लोआ' महज 2 फीसदी ही है। हमारे सौरमंडल का सबसे विशाल ज्वालामुखी 'ओलिंपस मॉन्स' है, जो कि मंगल ग्रह पर है। लेकिन 'ओलिंपस मॉन्स' भी पृथ्वी के इस नए ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' से केवल 25 प्रतिशत ही बड़ा है।
अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि 'टैमू मैसिफ' एक ज्वालामुखी है या फिर ये कई सारे ज्वालामुखियों का समूह है। ह्युस्टन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट आफ अर्थ एंड एटमॉस्फियरिक साइंसेज के प्रोफेसर विलियम सागर के मुताबिक 'टैमू मैसिफ' को बनाने वाले बासाल्ट की भारी-भरकम मात्रा को देखने से पता चलता है कि ये केंद्र में मौजूद एक ही रास्ते से बाहर आए हैं। इसलिए निश्चित तौर पर 'टैमू मैसिफ' एक ही और दुनिया का विशालतम ज्वालामुखी है।
2009 में 'शैट्सकाई राइज' पर्वतमाला के अध्ययन के लिए गए एक्सपीडीशन-324 के ओशन ड्रिलिंग प्रोग्राम के सदस्यों ने पता लगाया है कि ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' की भौगोलिक रचना कुछ इस प्रकार है कि इसका लावा धरती पर मौजूद किसी दूसरे ज्वालामुखी की तुलना में बहुत ज्यादा दूर तक जाता है। विशेष अध्ययन दलों ने 2010 और 2012 में भी इस ज्वालामुखी के बारे में आंकड़े जुटाए हैं। 'टैमू मैसिफ' की कोर से लेकर कई इलाकों से सैंपल इकट्ठे किए गए हैं।
वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' का शीर्ष या टॉप समुद्र की ऊपरी सतह से करीब 6500 फुट नीचे है। पृथ्वी के इस विशालतम ज्वालामुखी का अधिकतर बेस पानी के भीतर ही है और ये करीब 6 किलोमीटर गहरा है।

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

'आई हैव ए ड्रीम'

रंग, जाति और धर्म की घुटनभरी दीवारों के उस पार स्वतंत्र, बराबरी के अधिकार वाले लोकतांत्रिक माहौल में ही विज्ञान और कला का विकास संभव है। मानव मुक्ति का इतिहास जोर-जुल्म और जातीय नफरत के स्याह पन्नों से रंगा है। आदमी का आदमी पर अत्याचार, इससे घृणित कुछ भी नहीं। हर दिन उगते सूरज की किरणें उन नायकों के अमर आह्वानों की गूंज चारों दिशाओं में फैला देती है, जिन्होंने युगों की गुलामी और अमानवीय अत्याचारों के आगे हार मान चुकी मानवता को एक नए संघर्ष के लिए उठ खड़े होने की ऊर्जा दी और मुक्ति का रास्ता दिखाया। मानवता के ऐसे ही नायकों में से एक थे मार्टिन लूथर किंग जूनियर। किंग की प्रिय उक्ति थी- 'हम वह नहीं हैं, जो हमें होना चाहिए और हम वह नहीं हैं, जो होने वाले हैं, लेकिन खुदा का शुक्र है कि हम वह भी नहीं हैं, जो हम थे'
साल 1963 गोरे और काले में बंटी नई दुनिया अमेरिका में आजादी और ऐशो-आराम के तमाम साधन केवल गोरों के लिए ही रिजर्व थे घोर नफरत और दमन झेल रहे अश्वेतों की परवाह किसी को भी नहीं थी। ऐसे में एक सार्वजनिक बस में सफर कर रही एक महिला ने अपनी सीट से उठने से इनकार कर दिया। वो बस की आगे वाली सीट को छोड़कर पीछे वाली सीट पर केवल इसलिए बैठने को तैयार नहीं थी, क्योंकि वो अश्वेत या नीग्रो थी। इस  एक इनकार को महान नेता मार्टिन लूथर किंग ने देखते-ही-देखते हजारों-लाखों अश्वेतों के इनकार में तब्दील कर दिया। और 28 अप्रैल 1963 को अमेरिका के लिंकन स्क्वायर पर 250000 अश्वेतों के साथ मुट्ठी तानकर किंग ने पूरी जोरदारी के साथ कहा - 'आई हैव ए ड्रीम'
किंग का ये व्याख्यान मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे प्रेरणादायी और जादुई संबोधनों में से एक है। अब से 50 साल पहले दोपहर करीब 2 बजे जब किंग लिंकन स्मारक की सीढ़ियों पर जनता को संबोधित करने के लिए पहुंचे तो व्हाइट हाउस के ओवल ऑफ़िस में राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी भी टेलीविज़न के सामने बैठे उनके भाषण का इंतज़ार कर रहे थे। किंग जब भाषण देने के लिए आए तो उन्होंने वहां मौजूद भीड़ को देखा। चारों तरफ़ बस लोग ही लोग थे।
किंग ने पहले से तैयार किया गया भाषण देना शुरू किया लेकिन उनके भाषण के प्रति जनता में कोई ख़ास उत्साह नहीं दिख रहा था। तभी वहां मौजूद महालिया जैक्सन ने किंग से कहा, "मार्टिन उन्हें सपने के बारे में बताओ..."
महालिया चाहती थीं कि किंग अपने चिर -परिचित खुले अंदाज़ में भाषण दें।
किंग ने अपने भाषण के तैयार किए नोट्स किनारे रख दिए और जोश में भरकर बोले, 'आई हैव ए ड्रीम'
भाषण के बाद किंग और उनके साथी लिंकन स्मारक से राष्ट्रपति केनेडी से मिलने सीधे व्हाइट हाउस गए। व्हाइट हाउस में किंग और उनके साथियों का स्वागत करते हुए केनेडी ने कहा, 'आई हैव ए ड्रीम'
इन महान प्रेरणादायी एतिहासिक भाषण की गोल्डन जुबली के अवसर पर ‘वॉयेजर’ अपने पाठकों के लिए इस एतिहासिक भाषण की एक-एक लाइन का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर इस महान नेता को श्रद्धांजलि अर्पित करता है –
“मैं खुश  हूं कि मैं आज ऐसे मौके पर आपके साथ शामिल हूं जो इस देश के इतिहास में स्वतंत्रता के लिए किए गए सबसे बड़े प्रदर्शन के रूप में जाना जाएगा।
100 साल पहले , एक महान अमेरिकी , जिनकी प्रतीकात्मक छाया  में हम सभी खड़े हैं , ने एक मुक्ति उद्घोषणा (Emancipation Proclamation) पर हस्ताक्षर किए थे। इस महत्त्वपूर्ण निर्णय ने अन्याय सह रहे लाखों गुलाम नीग्रोज़ के मन में उम्मीद की एक किरण जगा दी। ये ख़ुशी उनके लिए लम्बे समय तक अन्धकार कि कैद में रहने के बाद दिन के उजाले में जाने के समान था ।
परन्तु आज 100 वर्षों बाद भी , नीग्रोज़ स्वतंत्र नहीं हैं।100 साल बाद भी , एक नीग्रो की ज़िन्दगी अलगाव की हथकड़ी और भेद-भाव की जंजीरों से जकड़ी हुई हैं। 100 साल बाद भी नीग्रो समृद्धि के विशाल महासागर के बीच गरीबी के एक द्वीप पर रहता है। 100 साल बाद भी नीग्रो, अमेरिकी समाज के कोनों में सड़ रहा है और अपने देश में ही खुद को निर्वासित पाता है। इसीलिए आज हम सभी यहां इस शर्मनाक इस्थिति को दर्शाने के लिए इकठ्ठा हैं।
एक मायने में हम अपने देश की राजधानी में एक चेक कैश करने आए हैं। जब हमारे गणतंत्र के आर्किटेक्ट संविधान और स्वतंत्रता की घोषणा बड़े ही भव्य शब्दों में लिख रहे थे , तब दरअसल वे एक वचनपत्र पर हस्ताक्षर कर रहे थे जिसका हर एक अमेरिकी वारिस होने वाला था।ये पत्र एक वचन था की सभी व्यक्ति , हां सभी व्यक्ति चाहे काले हों या गोरे, सभी को जीवन, स्वाधीनता और अपनी प्रसन्नता के लिए अग्रसर रहने का अधिकार होगा।
आज ये स्पष्ट है कि अमेरिका अपने अश्वेत नागरिकों से ये वचन निभाने में चूक चुका है।इस पवित्र दायित्व का सम्मान करने के बजाय, अमेरिका ने नीग्रो लोगों को एक अनुपयुक्त चेक दिया है, एक ऐसा चेक जिसपर “अपर्याप्त कोष” लिखकर वापस कर दिया गया है। लेकिन हम ये मानने से करने इंकार करते हैं कि न्याय का बैंक दीवालिया हो चुका है। हम ये मानने से इनकार करते हैं कि इस देश में अवसर की महान तिजोरी में ‘अपर्याप्त कोष’ है। इसलिए हम इस चेक को कैश कराने आए हैं-एक ऐसा चेक जो मांगे जाने पर हमें धनोपार्जन कि आजादी और न्याय कि सुरक्षा देगा।
हम इस पवित्र स्थान पर इसलिए भी आए हैं कि हम अमेरिका को याद दिला सकें कि इसे तत्काल करने की सख्त आवश्यकता है।अब और शांत रहने या फिर खुद को दिलासा देने का वक़्त नहीं है।अब लोकतंत्र के दिए वचन को निभाने का वक़्त है। अब वक़्त है अंधेरी और निर्जन घटी से निकलकर नस्लीय  न्याय (racial justice) के प्रकाशित मार्ग पर चलने का। अब वक़्त है अपने देश को नस्लीय अन्याय के दलदल से निकल कर भाई-चारे की ठोस चट्टान खड़ा करने का। अब वक़्त है नस्लीय न्याय को प्रभु की सभी संतानों के लिए वास्तविक बनाने का।
इस बात की तत्काल अनदेखी करना राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध होगा। नीग्रोज के वैध असंतोष की गर्मी तब तक ख़तम नहीं होगी जब तक स्वतंत्रता और समानता की बहार नहीं आ जाती। 1963 एक अंत नहीं बल्कि एक शुरुआत है। जो ये आशा रखते हैं कि नीग्रो अपना क्रोध दिखाने के बाद फिर शांत हो जायेंगे देश फिर पुराने ढर्रे  पर चलने लगेगा मनो कुछ हुआ ही नहीं, उन्हें एक असभ्य जाग्रति का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका में तब तक सुख-शांति नहीं होगी जब तक नीग्रोज़ को नागरिकता का अधिकार नहीं मिल जाता है। विद्रोह का बवंडर तब तक हमारे देश की नीव हिलाता रहेगा जब तक न्याय की सुबह नहीं हो जाती।
लेकिन मैं अपने लोगों, जो न्याय के महल की देहलीज पर खड़े हैं, से ज़रूर  कुछ कहना चाहूंगा। अपना उचित स्थान पाने कि प्रक्रिया में हमें कोई गलत काम करने का दोषी नहीं बनना है। हमें अपनी आजादी की प्यास घृणा और कड़वाहट का प्याला पी कर नहीं बुझानी है।
हमें हमेशा अपना संघर्ष अनुशासन और सम्मान के दायरे में रह कर करना होगा। हमें कभी भी अपने रचनात्मक विरोध को शारीरिक हिंसा में नहीं बदलना है। हमें बार-बार खुद को उस स्तर तक ले जाना है , जहां हम शारीरिक बल का सामना आत्म बल से कर सकें। आज नीग्रो  समुदाय , एक अजीब  आतंकवाद से घिरा हुआ है, हमें ऐसा कुछ नहीं करना है कि सभी श्वेत लोग  हमपर अविश्वास न करने लगें , क्योंकि हमारे कई श्वेत बंधू  इस बात को जान चुके हैं की उनका भाग्य हमारे भाग्य से जुड़ा हुआ है , और ऐसा आज उनकी यहां पर उपस्थिति से प्रमाणित होता है। वो इस बात को जान चुके हैं कि उनकी स्वतंत्रता हमारी स्वतंत्रता से जुडी हुई है । हम अकेले नहीं चल सकते।
हम जैसे जैसे चलें , इस बात का प्रण करें कि हम हमेशा आगे बढ़ते रहेंगे।हम कभी वापस नहीं  मुड़ सकते।कुछ ऐसे लोग भी हैं जो हम नागरिक अधिकारों के भक्तों से पूछ रहे हैं कि, “आखिर हम कब संतुष्ट होंगे?”
हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे  जब तक एक नीग्रो, पुलीस की अनकही भयावहता और बर्बरता का शिकार होता रहेगा।हम तब तक नहीं संतुष्ट होंगे जब तक  यात्रा से थके हुए हमारे शारीर , राजमार्गों के ढाबों और शहर  के होटलों में विश्राम नहीं कर सकते। हम तब तक नहीं संतुष्ट होंगे जब तक एक नीग्रो छोटी सी बस्ती से निकल कर एक बड़ी बस्ती में  नहीं चला जाता। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक हमारे बच्चों से उनकी पहचान  छीनी जाती रहेगी और उनकी गरिमा को ,” केवल गोरों के लिए” संकेत लगा कर लूटा जाता रहेगा।हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे  जब तक मिस्सीसिप्पी में रहने वाला नीग्रो मतदान  नहीं कर सकता और जब तक न्यू योर्क में रहने वाला नीग्रो ये नहीं यकीन करने लगता कि अब उसके पास चुनाव करने के लिए कुछ है ही नहीं। नहीं, नहीं हम संतुष्ट नहीं हैं और हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक न्याय जल की  तरह और धर्म एक तेज धरा की तरह प्रवाहित नहीं होने लगते।
मैं इस बात से अनभिज्ञ नहीं हूं कि आप में से कुछ लोग बहुत सारे कष्ट सह कर यहां आए हैं। आपमें से कुछ तो अभी-अभी जेल से निकल कर आए हैं। कुछ लोग ऐसी जगहों से आए हैं जहां स्वतंत्रता की खोज में उन्हें  अत्याचार के थपरड़ों और पुलिस की बर्बरता से पस्त होना पड़ा है।  आपको सही ढंग से कष्ट सहने का अनुभव है । इस विश्वास के साथ कि आपकी पीड़ा  का फल अवश्य मिलेगा आप अपना काम जारी रखिये।
मिसीसिपी वापस जाइए , अलबामा वापस जाइए, साउथ कैरोलिना वापस जाइए , जोर्जिया  वापस जाइए, लूजीआना  वापस जाइए, शहरों की झोपड़ियों और बस्तियों में वापस जाइए, ये जानते हुए कि किसी न किसी तरह ये  स्थिति बदल सकती है और बदलेगी आप अपने स्थानों पर वापस जाइए। अब हमें निराशा की घाटी में वापस नहीं जाना है।
मित्रों , आज आपसे मैं ये कहता हूं , भले ही हम आज-कल कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं , पर फिर भी मेरा एक सपना है (I have a dream), एक ऐसा सपना जिसकी जडें अमेरिकी सपने में निहित है ।
मेरा एक सपना है  कि एक दिन ये देश ऊपर उठेगा और सही मायने में अपने सिद्धांतों को जी पायेगा।” हम इस सत्य को प्रत्यक्ष मानते हैं कि : सभी इंसान बराबर पैदा हुए हैं”
मेरा एक सपना है कि एक दिन  जार्जिया के लाल पहाड़ों पर पूर्व गुलामो के पुत्र  और पूर्व गुलाम मालिकों के पुत्र भाईचारे की मेज पर एक साथ बैठ सकेंगे।
मेरा एक सपना है कि एक दिन मिसीसिपी राज्य भी , जहां अन्याय और अत्याचार की तपिश है , एक आजादी और न्याय के नखलिस्तान में बदल जाएगा।
मेरा एक सपना है कि एक दिन मेरे चारों छोटे बच्चे एक ऐसे देश में रहेंगे जहां उनका मूल्यांकन उनकी चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्र की ताकत से किया जाएगा।
आज मेरा एक सपना है।
मेरा एक सपना है कि एक दिन  अलबामा में , जहां भ्रष्ट जातिवाद है, जहां राज्यपाल के मुख से बस बीच-बचाव और संघीय कानून को न मानने के शब्द निकलते हैं, एक दिन उसी अलबामा में , छोटे-छोटे अश्वेत लड़के और लड़कियां छोटे-छोटे श्वेत लड़के और लड़कियों का हांथ भाई-बहिन के सामान थाम सकेंगे।
मेरा एक सपना है।
मेरा एक सपना है कि एक दिन हर एक घाटी उंची हो जाएगी , हर एक पहाड़ नीचे हो जाएगा, बेढंगे स्थान सपाट हो जायेंगे, और टेढ़े-मेधे रास्ते सीधे हो जायेंगे , और तब इश्वर की महिमा दिखाई देगी और सभी मनुष्य उसे एक साथ देखेंगे।
यही हमारी आशा है, इसी विश्वास  के साथ मैं दक्षिण वापस जाऊंगा। इसी  विश्वास से हम निराशा के पर्वत को आशा के पत्थर से काट पाएंगे। इसी विश्वास से हम कलह के कोलाहल को भाई-चारे के मधुर स्वर में बदल पाएंगे।इसी  विश्वास से हम एक साथ काम कर पाएंगे,पूजा कर पाएंगे,संघर्ष कर पाएंगे,साथ जेल जा पाएंगे , और ये जानते हुए कि हम एक दिन मुक्त  हो जायंगे , हम स्वतंत्रता के लिए साथ- साथ  खड़े हो पायंगे।
ये एक ऐसा दिन होगा जब प्रभु की सभी संताने एक नए अर्थ के साथ गा सकेंगी, “My country
’tis of thee, sweet land of liberty, of thee I sing। Land where my fathers died, land of the pilgrim’s pride, from every mountainside, let freedom ring।”
और यदि अमेरिका को एक महान देश बनना है इसे सत्य होना ही होगा।
इसलिए  न्यू  हैम्पशायर के विलक्षण टीलों से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए।
न्यू योर्क के विशाल पर्वतों से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
पेंसिलवानिया के अल्घेनीज़ पहाड़ों से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
बर्फ से ढकी कोलराडो की चट्टानों से  आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
कैलिफोर्निया की घूमओदार ढलानों से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
यही नहीं, जार्जिया के इस्टोन माउंटेन से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
टेनेसी के  लुकआउट माउंटेन से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
मिसीसिपी के टीलों और पहाड़ियों से आजादी की गूंज होने दीजिए।
हर एक पर्वत से से आजादी की गूंज होने दीजिए।
और जब ऐसा होगा , जब हम आजादी की गूंज होने देंगे , जब हर एक गांव और कसबे से, हर एक राज्य और शहर से आजादी की गूंज होने लगेगी तब हम उस दिन को और जल्द ला सकेंगे जब इश्वर की सभी संताने , श्वेत या अश्वेत, यहूदी या किसी अन्य जाती की , प्रोटेस्टंट या कैथोलिक, सभी हाथ में हाथ डालकर नीग्रोज का आध्यात्मिक गाना गा सकेंगे, ‘Free at last! free at last! thank God Almighty, we are free at last!’

बुधवार, 7 अगस्त 2013

अगले 3 से 4 महीने में पलटने वाले हैं सूरज के चुंबकीय ध्रुव

सूरज अब एक बड़े बदलाव से गुजरने वाला है। सूरज के चुंबकीय क्षेत्र अगले तीन से चार महीनों में पलटने वाले है। इससे हमें या धरती को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं है। इससे घबराने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि सूरज के चुंबकीय क्षेत्र हर 11 साल में एक बार पलटते हैं।
सोलर एक्टिविटी की साइकिल 11 साल की होती है। सोलर एक्टिविटी साइकिल के चरम पर जब सूरज का आंतरिक मैग्नेटिक डायनामो खुद को जैसे ही पुर्नस्थापित करता है, सूरज के चुंबकीय क्षेत्र पलट जाते हैं। सूरज के चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव जब भी होता है, तो इससे पहले चुंबकीय क्षेत्र कमजोर होते-होते एकदम से खत्म हो जाते हैं। फिर अचानक से सूरज के चुंबकीय क्षेत्र पलटे हुए ध्रुवों के साथ फिर से पैदा हो जाते हैं।
सूरज के चुंबकीय क्षेत्रों का पलटना कोई आपदा नहीं है, लेकिन फिर भी इसके असर पूरे सौरमंडल पर पड़ता है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की विलकॉक्स सोलर ऑब्जरवेटरी के निदेशक और सोलर फिजिसिस्ट टोड ह़ॉक्समा बताते हैं कि सूरज के ध्रुवों के पलटने से पूरा सौरमंडल मानो कांप सा उठता है।
चुंबकीय क्षेत्रं के पलटने के दौरान सूरज से होने वाली आवेशित कणों की बौछार एकदम से तेज हो उठती है। पृथ्वी सूरज की परिक्रमा के दौरान कई बार सूरज के इन आवेशित कणों के बादल में डूबती और ऊपर आती रहती है। इसका मतलब ये हुआ कि आने वाले समय में हम स्पेस वेदर में तेज उतार-चढ़ाव देखेंगे और आने वाले समय में औरोरा बोरेलिस यानि रात में आसमान में नजर आनेवाली रंग-बिरंगी रोशनी की घटनाएं और भी ज्यादा और तीव्र नजर आएगी।
सूरज के चुंबकीय क्षेत्रों में बदलाव से कॉस्मिक किरणों की बौछार भी प्रभावित होगी। कॉस्मिक किरणें दरअसल हाई इनर्जी पार्टिकिल्स की बौछार हैं, जो दूर आकाशगंगाओँ में हुए सुपरनोवा धमाकों या ऐसी ही दूसरी विनाशकारी घटनाओं से फूटती हैं। कॉस्मिक किरणें अंतरिक्षयात्रियों और स्पेस प्रोब्स के लिए बेहद खतरनाक होती हैं। सौर विज्ञानियों का कहना है कि सूरज के चुंबकीय क्षेत्रों के पलटने से पृथ्वी पर बादलों की स्थिति और मौसम पर असर पड़ सकता है।
स्टैनफोर्ड के एक अन्य सोलर फिजिसिस्ट फिल शेरेर बताते हैं कि सूरज का उत्तरी ध्रुव पहले से ही बदलाव के संकेत दे चुका है, जबकि दक्षिणी ध्रुव अभी पलटने की प्रक्रिया में है। जल्दी ही सूरज के दोनों चुंबकीय़ ध्रुव पलट जाएंगे और इसके साथ ही सोलर मैक्स की शेष आधी अवधि भी शुरू हो जाएगी

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

13 प्रकाशवर्ष दूर, पृथ्वी से मिलता-जुलता ग्रह !


धरती के नजदीक के अंतरिक्ष में भी कई रहस्य छिपे हैं। शायद हमसे महज 13 प्रकाशवर्ष दूर, पृथ्वी से मिलता-जुलता एक ग्रह अपने मध्यम रेड जाइंट सितारे की परिक्रमा कर रहा है। 13 प्रकाशवर्ष भी काफी बड़ी दूरी है और वहां जाना फिलहाल मुमकिन नहीं, लेकिन भविष्य के टेलिस्कोप्स पृथ्वी के नजदीक मौजूद ऐसी 'अनजान धरतियों' को न सिर्फ देख सकेंगे, बल्कि वहां जावन की जांच भी कर सकेंगे। महज 13 प्रकाश वर्ष दूर मौजूद अनजान धरती की ये चौंकानेवाली खबर नासा के केप्लर टेलिस्कोप के आंकड़ों की जांच से सामने आई है। केप्लर टेलिस्कोप से मिली इस जानकारी को सार्वजनिक किया है हॉवर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स की वैज्ञानिक कर्टनी ड्रेसिंग ने। 
जब भी कोई परिक्रमा करता ग्रह अपने सितारे के सामने से गुजरता है तो उस सितारे की रोशनी कुछ धीमी हो जाती है। कैप्टर टेलिस्कोप ने ऐसे ही सितारों की जांच की है जिनकी रोशनी में एक तय अंतराल में बदलाव आता है। सितारे की रोशनी में इस तरह का बदलाव उसकी कक्षा में मौजूद बृहस्पति जैसे किसी विशाल ग्रह की मौजूदगी की ओर इशारा करता है।
 लेकिन इस तकनीक से हमारी पृथ्वी जैसे छोटे ग्रह की तलाश थोड़ी मुश्किल है। क्योंकि पृथ्वी जैसे किसी छोटे ग्रह के सामने से गुजरने पर सितारे की रोशिनी में कोई प्रभावी बदलाव नहीं आता। ऐसे में वैज्ञानिकों ने मध्यम श्रेणी के रेड जाइंट सितारों को लिया, क्योंकि ये अपेक्षाकृत ठंडे होते हैं और इनकी रोशनी सामान्य सितारे की अपेक्षा काफी कम होती है। इसलिए मध्यम श्रेणी के रेड जाइंट सितारे के सामने जब कोई छोटा ग्रह गुजरता है तो उसकी रोशनी में आई कमी को महसूस किया जा सकता है।   
कैप्टर टेलिस्कोप के कैटेलॉग में शामिल हजारों सितारों में से एस्ट्रोनॉमर कर्टनी ने ऐसे 95 संभावित ग्रहों को तलाशा है जो रेड ड्वार्फ सितारों की परिक्रमा कर रहे हैं। इनमें से तीन ग्रह ऐसे हैं जो अपने सितारे के हैबिटेट जोन में मौजूद हैं, यानि उनकी सतह पर पानी तरल स्वरूप में मौजूद रह सकता है। एस्ट्रोनॉमर कर्टनी ड्रेसिंग इससे काफी उत्साहित हैं और उनका कहना है कि इसका एक मतलब ये भी है कि हमारी आकाशगंगा में मौजूद सभी रेड ड्वार्फ सितारों में से 666छह फीसदी सितारे ऐसे हो सकते हैं जिनके हैबिटेट जोन में धरती से मिलता-जुलता ग्रह मौजूद है।
एस्ट्रोनॉमर कर्टनी ने बताया कि हमारे सूरज के आसपास मौजूद प्रोक्सिमा सेंचुरी समेत ज्यादातर सितारे रेड ड्वार्फ ही हैं। इसलिए ये पूरी तरह मुमकिन है कि हमारी पृथ्वी से मिलता-जुलता ग्रह हमसे महज 13 प्रकाश वर्ष ही दूर हो।