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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

एक जीनियस की मृत्यु...

18 अप्रैल 1955 को दुनिया ने महानतम वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन को खो दिया। करीब एक महीने बाद उनके करीबी मित्र मैक्स टालमड ने टाइम मैगजीन में एक संस्मरणात्मक लेख लिखकर आइंस्टीन को श्रद्धांजलि अर्पित की। ‘वॉयेजर’ अपने पाठकों के लिए 2 मई 1955 को टाइम मैगजीन में प्रकाशित ये पूरा लेख प्रस्तुत कर रहा है।



2 मई 1955

बेतरतीब सी शर्ट, बैगी पैंट और सिर पर नीली कैप पहने खुद से लापरवाह छोटे कद की एक शख्सियत 22 साल तक करीब हर सुबह न्यूजर्सी, प्रिंसटन की 112 वीं मर्सर स्ट्रीट में मौजूद अपने घर की सीढ़ियों से उतर कर भारी कदमों से पैदल चलते हुए इंस्टीट्यूट आप एडवांस स्टडीज की ओर जाती थी। पहली नजर में देखने पर ये लापरवाह सा व्यक्ति बगीचे की देखभाल करने वाले माली जैसा लगता था। उनके होठों पर कोमलता के साथ पाइप दबी रहती थी, सड़कों पर वो हमेशा किनारे की ओर सिमटे हुए से चलते थे और जब तक कुछ कहना बहुत जरूरी न हो वो खामोश ही रहते थे। लेकिन सिर पर बिखरे सफेद बालों और बेहद आत्मीय आंखों वाले इस शख्स की एक बहुत बड़ी विशेषता थी....वो एक जीनियस थे। उनकी बौद्धिकता प्रखरतम और कल्पनाशीलता विविधता से भरी थी। अल्बर्ट आइंस्टीन ने मानव जाति के प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान को एक अतुलनीय ऊंचाई प्रदान की और पदार्थ के रहस्य को सबसे ज्यादा गहराई के साथ समझा। आइंस्टीन से पहले किसी ने ब्रह्मांड के रहस्य को इतनी पूर्णता के साथ कभी नहीं समझा था।
प्रोफेसर आइंस्टीन के भारी कदमों की आहट पिछले हफ्ते से उनके प्रिय इंस्टीट्यूट के रास्तों और गलियारों में नहीं गूंज रही है। गॉल ब्लॉडर के इंफैक्शन, जिसे लेकर वो हमेशा लापरवाह रहते थे, ने उन्हें अस्पताल जाने पर मजबूर कर दिया। इंफैक्शन इतना बढ़ चुका है कि उनकी मुख्य धमनियों से खून रिसने लगा था। मध्यरात्रि से कुछ मिनट बाद वो जर्मन भाषा में कुछ बुदबुदाए, जिसे उनकी नर्स नहीं समझ सकी और इस तरह आधुनिक युग के महानतम वैज्ञानिक के अंतिम शब्द कहीं खो गए। रात 1 बजकर 15 मिनट पर 76 साल के अल्बर्ट आइंस्टीन का नींद में ही निधन हो गया।
अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने इस महानतम वैज्ञानिक के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा, “ 20 वीं शताब्दी के ज्ञान में किसी और शख्स ने इतना व्यापक योगदान नहीं दिया।”
सोवियत संघ के सरकारी अखबार प्रावदा ने उन्हें नेचुरल साइंस के महान रूपांतरकर्ता का विशेषण दिया।
इस्राइल के प्रधानमंत्री ने कहा, “ विश्व ने महानतम जीनियस को खो दिया।”
हजारों बहुत से श्रद्धांजलि संदेश भी आए, लेकिन कोई भी संदेश असली विश्व भावना को अभिव्यक्त नहीं कर सका। केवल उनके साथी और कुछ वैज्ञानिक ही ये समझ सके कि उनके न रहने से ज्ञान के विस्तार को कितनी बड़ी क्षति पहुंची है।

एक व्यक्ति के तौर पर अल्बर्ट आइंस्टीन बिल्कुल अलग थे, काफी हद तक एक बच्चे के जैसे। एक वैज्ञानिक के तौर पर उन्होंने इतिहास की चुनिंदा वैज्ञानिक हस्तियों पाइथागोरस, आर्किमिडीज, कोपरनिकस और न्यूटन से भी कहीं आगे का और युगांतरकारी विजन सामने रखा।
एक छोटा सा स्क्रैचपैड और एक पेंसिल आइंस्टीन के उपकरण बस यही थे, उनकी प्रयोगशाला उनकी कैप के नीचे थी। फिर भी वो एक सूक्ष्मदर्शी से ज्यादा गहराई और एक टेलिस्कोप से भी दूर तक झांकने में सफल रहे। गणित की मदद से उन्होंने वो चीज साबित कर के दिखा दी धार्मिक आस्थावान जिसके गीत प्राचीन काल से गाते रहे थे कि एक अदृश्य कण को संचालित करने वाले नियम ब्रह्मांड के विशालतम पिंड पर भी समान रूप से लागू होते हैं। आइंस्टीन के स्क्रैचपैड पर लिखे प्रमेयों (theorems) ने ज्ञान को सीमाओं के बंधन से मुक्त कर दिया और ब्रह्मांड के आधारभूत वैज्ञानिक नियम उन्होंने फिर से लिखे। एटॉमिक फिशन और हाइड्रोजन फ्यूजन के बदनाम मशरूम जैसे बादल, उनके अनैच्छिक स्मारक हैं। धरती को थर्रा देने वाली इस अपार ऊर्जा का इस्तेमाल मानवता की भलाई के लिए किया जाए यही उनकी सच्ची विरासत है।
वो आंतरिक बल जिसने आइंस्टीन को जीनियस बना दिया, आइंस्टीन मजाक में उसे प्रेत बाधा का नाम देते थे, कि मेरे ऊपर भूत सवार है...या फिर इसकी तुलना एक नौजवान प्रेमी जैसी जिद और उसके उत्साह से भरे जोश से करते थे। अदभुत वैज्ञानिक बौद्धिकता के बावजूद आइंस्टीन के स्वभाव में बिल्कुल एक बच्चे जैसी मासूमियत थी। रोजमर्रा की छोटी-बड़ी समस्याओं पर उनके चेहरे पर बिल्कुल किसी मेमने जैसी बेबसी छा जाती थी। अपने दो-मंजिला घर के लिए एकबार आइंस्टीन ने एक लिफ्ट खरीद ली, उनसे जब इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने मासूमियत से जवाब दिया कि इसे बेचने आया सेल्समैन मुझे इतना पसंद आया कि मैं उसे ना नहीं कह सका। उन्हें मजाक बहुत पसंद था और छोटी-छोटी बातों पर वो हंस देते थे। वो गहरे मानवतावादी थे, लेकिन ये भी सच है कि वो केवल उन चंद लोगों से ही खुल पाते थे जो उनके बेहद करीब थे। 1949 में आइंस्टीन ने लिखा था, “ सामाजिक न्याय में मेरा गहरा यकीन है, लेकिन दूसरे लोगों के साथ मैं उतनी गहराई के साथ घुल-मिल नहीं पाता हूं। मैं कभी अपने देश का नहीं रहा, मेरा घर...यहां तक कि मेरे परिवार के करीबी रिश्तेदारों के साथ भी मैं कभी पूरे दिल से करीबी नहीं महसूस कर सका।”
आइंस्टीन का परिवार जर्मनी के बावरिया राज्य में रहता था, जहां उनके पिता बिजली के उपकरण बेचने का काम करते थे। आइंस्टीन का जन्म जर्मनी के उल्म में 1879 में हुआ था। बचपन में उन्हें छोटे-छोटे गीत रचने का शौक था, जिन्हें वो अपने कमरे में गाते रहते थे। लेकिन स्कूल में वो एक शर्मीले और पिछड़े छात्र के तौर पर जाने जाते थे। उन्हें लेकर मां-बाप हमेशा परेशान रहते कि कहीं वो मंदबुद्धि तो नहीं? 12 बरस की उम्र में उन्हें किसी ने यूक्लिड की ज्योमिट्री की किताब दी। 30 साल बाद इसे याद करते हुए आइंस्टीन ने बताया, “ इस किताब से पहली बार महसूस हुआ कि केवल विचार की ताकत भी मानव को अदभुत क्षमतावान बना सकती है।” 13 बरस की उम्र में उन्होंने केंट की ‘क्रिटिक आफ प्योर रीजन’ पढ़ी, लेकिन फिरभी ज्यूरिख पॉलिटेक्निकम की परीक्षा पास करने के लिए उन्हें दो-दो बार कोशिश करनी पड़ी।
ग्रैजुएशन के बाद आइंस्टीन ने एक सर्बियाई गणितज्ञ मिलेवा मैरी से शादी कर ली और स्विटजरलैंड में सैटल हो गए। परिवार के सहयोग से उन्हें स्विस पेटेंट ऑफिस में एक्जामिनर का जॉब भी मिल गया। लेकिन वहां भी काम के बाच भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और प्रकृति के मूलभूत नियमों की गुत्थी को समझने की शुरुआत की। लेकिन इसमें वो इस कदर रम गए कि काम के बीच जब भी मौका मिलता वो अपनी डायरी और रद्दी कागज के टुकड़ों में नोट्स लिखने में जुट जाते। एक दिन शाम के वक्त वो दफ्तर से लौट रहे थे, तभी उन्होंने एक मां को देखा जो बच्चागाड़ी ले कर जा रही थी। अचानक उन्हें कुछ सूझा और वो वहीं थम गए, जेब से कागजों का पुलिंदा निकाला और गणितीय चिन्हों से भरी एक सिरीज लिखने में खो गए।
1905 में आइंस्टीन के पांच रिसर्च पेपर्स प्रकाशित हुए। इनमें से पांचवां रिसर्च पेपर जो कि सबसे छोटा था, उसने फिजिक्स की दुनिया बदल कर रख दी। ये पेपर इस पर आधारित था कि क्या किसी बॉडी का इनर्शिया उसके इनर्जी कॉन्सटेंट पर निर्भर होता है? आइंस्टीन के इस पेपर को आधुनिक परमाणु युग का गणितीय केंद्र समझा जाता है।
200 साल से भी ज्यादा वक्त तक न्यूटन के गति संबंधी नियमों को साइंस की दुनिया में सर्वोच्च समझा जाता था। माना जाता था कि न्यूटन के इन नियमों में न तो किसी सुधार की जरूरत है और न ऐसा किया जा सकता है। मान्यता थी कि ये नियम गैसों के व्यवहार से लेकर गर्मी की प्रकृति तक हर चीज की व्याख्या कर सकते हैं। लेकिन 1880 में जब कुछ और संवेदनशील उपकरण सामने आए, तो कुछ असंगत से तथ्य सामने आने लगे, खासतौर पर प्रकाश में। प्रकाश के बारे में कुछ ऐसी नई बातें पता चलीं जो न्यूटन के नियमों का खुलेआम उल्लंघन कर रहीं थीं। नए तथ्यों की रोशनी में न्यूटन के नियमों को समायोजित करने में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी चीज के अस्तित्व की अवधारणा सामने रखी जो पूरी तरह काल्पनिक थी, इसका नाम था – ईथर
न्यूटन की साख बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने तर्क गढ़ा कि जिस तरह हवा हर जगह मौजूद है, उसी तरह ईथर भी हर जगह मौजूद है और ये ईथर ही प्रकाश की तरंगों को अंतरिक्ष से यहां तक आने में मदद करता है। लेकिन प्रयोगों से जल्दी ही साबित हो गया कि ईथर जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीं है। अब वैज्ञानिक एक अजीब दुविधा से घिर उठे, क्या वो न्यूटन के पुराने नियमों को जकड़े रहें या फिर उन नतीजों पर भरोसा करें जो उनके प्रयोगों से सामने आ रहे थे? फिजिक्स की दुनिया 20 साल तक इसी दुविधा से घिरी रही।
आइंस्टीन की गणनाओं ने फिजिक्स की ये दुविधा खत्म की। उन्होंने प्रकृति के अदभुत रहस्यों से पर्दा उठाया और वो भी इतने सीधे-सरल समीकरण से जो कि बिथोवन की पांचवीं धुन की तरह लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गया, ये था - E=mc² । इस समीकरण का मतलब है कि एक ग्राम पदार्थ (जैसे एक चम्मच चीनी) (m) खुद में अपार ऊर्जा (E) छिपाए रखता है जो कि 1 सेकेंड में 1 सेंटीमीटर की प्रकाश की गति के वर्ग (c²) के बराबर होता है। इस समीकरण के साथ आइंस्टीन ने साबित किया कि अगर किसी चीज की गति बढ़ाई जाए, तो न केवल उसका वजन बढ़ने लगता है, बल्कि फिजिक्स के तमाम पैमाने भी बदलने लगते हैं। आइंस्टीन ने बताया, ‘द्रव्यमान कुछ और नहीं, बल्कि ऊर्जा का ही एक दूसरा स्वरूप है।’
साइंस की दुनिया में 2000 साल बाद, आइंस्टीन करीब-करीब रातोंरात एक जबरदस्त हलचल बनकर छा गए। एक स्विस पेटेंट क्लर्क दुनिया का सबसे मशहूर वैज्ञानिक बन गया, जिसे हासिल करने के लिए विश्वविद्यालयों में होड़ शुरू हो गई और अंत में 1912 में वो बर्लिन के मशहूर कैसर विल्हेल्म इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर बन गए। 1915 में आइंस्टीन ने अपने सिद्धांत का विस्तार किया और इस तरह ‘जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी’ सामने आई।
आइंस्टीन की नई कॉस्मिक अवधारणाओं का पहला प्रायोगिक प्रमाण 1919 के सूर्यग्रहण के वक्त सामने आया, जब वैज्ञानिकों ने प्रकाश किरणों को ठोस वस्तु के चारों ओर मुड़ते हुए देखा। 1921 में आइंस्टीन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस मौके पर ब्रिटिश दार्शनिक बर्टरैंड रसल ने लिखा, “ आइंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी मानव ज्ञान की अब तक की सबसे महान उपलब्धि है। 2000 साल तक अर्जित फिजिक्स और गणित के ज्ञान की सीढ़ियों को चढ़कर ही हमने ये महान उपलब्धि हासिल की है। पाइथागोरस से लेकर रीमन तक की विशुद्ध ज्यॉमिट्री, गैलीलियो और न्यूटन की डायनामिक्स और एस्ट्रोनॉमी, फैराडे-मैक्सवेल और बाद में इनकी खोज को आगे बढ़ाने वाले इनके वारिसों की रिसर्च से सामने आने वाली थ्योरी आफ इलेक्ट्रो-मैग्नेटिज्म – आइंस्टीन के सिद्धांतों में आवश्यक संशोधनों के साथ ये सभी नियम और सिद्धांत समाहित हैं।”
आइंस्टीन ने एक बार इंटरव्यू लेने आए रिपोर्टर्स से कहा था, “मेरी जिंदगी बिल्कुल साधारण सी है, भला इसमें किसी को क्या दिलचस्पी होगी?” जर्मनी का ये महान विद्धान अमेरिका के लिए आश्चर्य का केंद्र था। अमेरिकियों ने उन्हें जीनियस कहा, क्योंकि वो अक्सर कहते थे कि मुझे पैसों की परवाह नहीं है। आइंस्टीन ने एक बार $1,500 की चेक को अपनी एक किताब में बुकमार्क बना डाला था। कुछ दिनों बाद जब ये किताब खो गई तो उनके एक मित्र ने चेक खो जाने का अफसोस जताया, इसपर आइंस्टीन ने कहा मुझे असली दिक्कत पढ़ने में हो रही है, मैं बुकमार्क के लिए दूसरी चेक के आने का इंतजार कर रहा हूं। वो हमेशा खुद में ही खोए रहते थे, अपने विचारों में गुम एक बार वो ट्रांसऐटलांटिक लाइनर के सैलून में घरल का पजामा पहने चले गए थे।
1952 में आइंस्टीन से इस्राइल का राष्ट्रपति बनने की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने मुस्कराते हुए ठुकरा दिया। जब नाजियों ने यहूदियों पर अत्याचार की सीमाएं तोड़ दीं तब उन्होंने युद्ध का सबसे विनाशक हथियार को बनाने की सिफारिश की। 1939 को एक दिन आइंस्टीन ने राष्ट्रपति रूजवेल्ट को एक पत्र लिखा। उन्होंने इस पत्र में लिखा, “ नाजी वैज्ञानिक यूरेनियम की भारी मात्रा में जल्दी ही चेन रिएक्शन शुरू करने में सफल हो जाएंगे।”

इसके जवाब में रूजवेल्ट ने कहा, “इसके मद्देनजर हमें तुरंत कुछ करना चाहिए।”

… और इस तरह पहला नाभिकीय बम बनाने वाले मैनहट्टन प्रोजेक्ट की शुरुआत हो गई।

अल्बर्ट आइंस्टीन को जब हिरोशिमा पर एटम बम से हमले की जानकारी मिली, तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। ये ऐसी हकीकत थी वो जिसे मानने को तैयार ही नहीं थे। वो अपार दुख और क्षोभ से भर उठे। उन्हें गहरा धक्का लगा और वो बुदबुदाए – भयानक...बहुत ही भयानक !
बाद में आइंस्टीन ने कहा, “ अगर मैं जानता कि जर्मन एटम-बम कभी नहीं बना सकेंगे, तो मैं इस मुद्दे पर अपनी संस्तुति देना तो दूर, अपनी उंगली भी नहीं हिलाता।”
दुनिया के पहले नाभिकीय हथियार को विकसित करने के मुद्दे पर 10 दिसंबर 1945 को एक व्याख्यान के जरिए आइंस्टीन ने अपना नजरिया दुनिया के सामने रखा। आइंस्टीन के इस व्याख्यान का शीर्षक था – ‘द वॉर इज वन, बट पीस इज नॉट।’
इस व्याख्यान में आइंस्टीन ने कहा, “ इस नए हथियार को विकसित करने में हमने मदद की, क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि इंसानियत के दुश्मन इसे हमसे पहले हासिल कर लें। कल्पना से परे तबाही और बर्बादी मचाना और शेष विश्व को अपना गुलाम बनाना ही हमेशा से नाजियों की मानसिकता रही है। हमने ये नया हथियार अमेरिकी और ब्रिटिश जनता के हाथों में, उन्हें संपूर्ण मानवजाति का प्रतिनिधि और शांति तथा स्वाधीनता का संरक्षक मानते हुए सौंपा है। लेकिन शांति तथा स्वाधीनता की वो गारंटी, जिसका वादा अटलांटिक चार्टर के देशों से किया गया था, हमें अब तक देखने को नहीं मिली है। जंग जरूर जीत ली गई है...लेकिन शांति नहीं...दुनिया को भय से मुक्ति दिलाने का वादा किया गया था, लेकिन असलियत में जब से जंग खत्म हुई है डर कई गुना और बढ़ गया है। दुनिया से वादा किया गया था कि रोजमर्रा की चीजों की तमाम किल्लतें-तमाम दिक्कतें सब खत्म हो जाएंगी। लेकिन दुनिया का ज्यादातर हिस्सा भुखमरी का शिकार है, जबकि दूसरे जरूरत से ज्यादा चीजों का लुत्फ उठा रहे हैं।”

मैक्स टलमड, आइंस्टीन के करीबी मित्र और भौतिकशास्त्री

टाइम मैगजीन - 2 मई 1955