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शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

'मैंने शून्य से एक अद्भुत, नया ब्रह्मांड रच डाला है'

अट्ठारह साल के एक नौजवान ने अपने पिता को लिखे पत्र में बड़े उत्साह से अपने रिसर्च टॉपिक के बारे में बताया। जवाब में भेजी गई चिट्ठी में पिता ने लिखा- मेरे बेटे, समानांतर रेखाओं के फेरे में तो तुम हरगिज न पड़ना। यह रास्ता मेरे लिए अच्छी तरह जाना-बूझा है। न जाने कितनी अंतहीन रातें जाग कर मैंने इसकी थाह लेने की कोशिश की है लेकिन मेरे जीवन की सारी रोशनी, मेरी सारी खुशी इस प्रयास में स्वाहा हो गई। इसे उतनी ही हिकारत से त्याग दो, जैसे कोई सच्चरित्र व्यक्ति अवैध यौन संबंध के प्रस्ताव से नजरें फेर लेता है। यह तुम्हें जीवन के हर आनंद से वंचित कर देगा। तुम्हारा स्वास्थ्य चौपट हो जाएगा, आराम छिन जाएगा और तुम्हारे जीवन से प्रसन्नता सदा के लिए लुप्त हो जाएगी।'
हंगरी के दो महान गणितज्ञों जानोस बोल्याई और फर्कास बोल्याई के बीच 1820 में हुआ यह पत्र-व्यवहार गणित के इतिहास में सदियों संजो कर रखने लायक चीज बन गया है। यहां वे ज्योमेट्री (रेखागणित) की आधारशिला रखने वाले यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना के बारे में बात कर रहे हैं, जो इस प्रकार है- किसी रेखा के बाहर स्थित एक बिंदु से होकर उस रेखा के समानांतर एक और केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है। ईसा के तीन सौ साल पहले दी गई यूक्लिड की प्रस्थापनाओं को पूरी दुनिया में अंतिम सत्य माना जाता था, लेकिन यूरोप के आधुनिक गणितज्ञों में पांचवीं प्रस्थापना को लेकर कुछ शंका मौजूद थी। सोलहवीं सदी से ही वे इसे सही या गलत साबित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कहीं पहुंच नहीं पा रहे थे।
जानोस और फर्कास की कहानी को आगे बढ़ाने पर इसका एक कोण विश्व इतिहास के पांच महानतम गणितज्ञों में एक कहे जाने वाले जर्मन मैथमेटिशियन कार्ल फ्रेडरिक गॉस से जुड़ता है। फर्कास अपने बेटे को दस साल की उम्र में गॉस के यहां ले गए थे और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया था। गॉस इसके लिए तैयार नहीं हुए और जानोस को पढ़ाई के लिए विएना भेज दिया गया। वहां घूम-फिर कर उनकी रुचि यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना में ही अटक गई, जो उनके पिता की पूरी जवानी खा गई थी। लेकिन फर्कास से विपरीत जानोस की कोशिश कामयाब रही। यूक्लिड को सही या गलत साबित करने के प्रयास में वे नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री की नींव रखने की ओर चले गए। 1822 में उन्होंने फर्कास को लिखा- 'मैंने शून्य से एक अद्भुत, नया ब्रह्मांड रच डाला है।'
फर्कास बोल्याई को अपने बेटे का काम अपनी तपस्या पूरी होने जैसा लगा। अगले दस वर्षों में उन्होंने अपना ग्रंथ ' टेंटामेन ' पूरा किया और उसके परिशिष्ट में जानोस बोल्याई की खोज को महत्वपूर्ण जगह दी। 1932 में प्रकाशित अपनी इस किताब को उन्होंने मूल्यांकन के लिए गॉस के पास भेजा और उनसे खास तौर पर अपने बेटे के काम के बारे में राय मांगी। जवाब में गॉस ने लिखा - ' इसकी प्रशंसा करना मेरे लिए खुद की प्रशंसा करने जैसा होगा। क्योंकि इस काम की लगभग पूरी अंतर्वस्तु .... मेरे खुद के सोच - विचार के संपूर्णत : समतुल्य है। ' जानोस के लिए गॉस का यह जवाब दिल तोड़ देने वाला साबित हुआ। उनकी नौकरी छूट गई। वे धीरे - धीरे घुलने लगे और कुल 57 साल की उम्र में 10 हजार पृष्ठों की गणितीय पांडुलिपियां अपने पीछे छोड़कर दुनिया से विदा हो गए।
अपने जवाब में गॉस किसी खलनायक जैसे नजर आते हैं , लेकिन यहां उनका दोष सिर्फ थोड़े अतिरेक का है। नॉन - यूक्लिडियन ज्योमेट्री में उनका काम जानोस बोल्याई से मिलता - जुलता है , लेकिन दोनों में संपूर्ण समतुल्यता जैसा कुछ नहीं है। गॉस का सबसे कमजोर पक्ष यह था कि ज्योमेट्री के पुराण - पुरुष यूक्लिड की बात काटने की हिम्मत वे नहीं कर पाए और अपने काम को सार्वजनिक करने से रह गए। जानोस और गॉस के आसपास ही लोबाचेव्स्की ने और फिर रीमान ने नॉन - यूक्लिडियन ज्योमेट्री को मुकम्मल शक्ल दी और आज की गणित या भौतिकी की कल्पना इसके बगैर नहीं की जा सकती।
एक विज्ञान के रूप में गणित की छवि किसी तपस्वी की साधना जैसी ही है। इसकी क्रांतिकारी खोजें भी प्राय : अचर्चित रह जाती हैं। या चर्चित होने में उन्हें इतना वक्त लगता है कि खोजी के लिए अपनी खोज ही बेमानी हो जाती है। इसके दो उज्ज्वल अपवाद यूनान के आर्किमिडीज और ब्रिटेन के आइजक न्यूटन हैं , जो जितने बड़े गणितज्ञ थे , उतने ही बड़े मिलिट्री साइंटिस्ट भी थे। उनका असर जितना आने वाले समय पर पड़ा , उतना ही अपने समय पर भी दर्ज किया गया। बतौर गणितज्ञ उनकी हैसियत को उनके शाही रुतबे के चलते कम करके नहीं आंका गया। लेकिन पिछली सदी में इस खेल के नियम बदल गए।
जी . एच . हार्डी ने ( भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को दुनिया के सामने लाने के लिए हम जिनके प्रति कृतज्ञ हैं ) अपने निबंध ' अ मैथमेटिशियंस अपॉलजी ' में प्योर मैथमेटिक्स और एप्लाइड मैथमेटिक्स को बिल्कुल अलग - अलग चीजों की तरह देखा है। वे अपना जीवन एक ऐसे गणित के प्रति समर्पित बताते हैं , जिसका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है। इसका उन्हें कोई दुख नहीं है। बस एक संतोष है कि अपनी जिंदगी उन्होंने एक सौंदर्य की खोज में लगाई है , किसी के लिए मुनाफा कमाने या युद्ध जीतने की कवायद में नहीं। यह बात और है कि अंकगणित से जुड़ा हार्डी और रामानुजन का बहुत सारा काम द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ( यानी अपॉलजी लिखे जाते समय भी ) कूट संकेतों के विज्ञान क्रिप्टॉलजी में इस्तेमाल हो रहा था और इसके बारे में उन्हें पता तक नहीं था।
इंसान का लालच और उसकी खुदगर्जी संसार की हर चीज का इस्तेमाल कर सकती है। प्योर मैथमेटिक्स के पुजारी किसी भी गिरि - कंदरा में छिप जाएं , धंधेबाज लोग वहां से भी उनके काम को खोज लाएंगे और अपने धंधे में लगा लेंगे। लेकिन हार्डी के निबंध का मूल तत्व प्योर मैथमेटिक्स को महिमामंडित करने का नहीं , गणित के उस दूसरे पहलू को सामने लाने का है , जो अपने सौंदर्य में पेंटिंग , संगीत या कविता जैसा और सत्य के प्रति अपने आग्रह में दर्शन जैसा है। अभी के समय में रूसी गणितज्ञ ग्रिगोरी पेरेलमान हार्डी के इन मानकों पर खरे उतरते हैं।
गणित के सामने मौजूद सहस्राब्दी की सात सबसे बड़ी चुनौतियों में एक प्वांकारे कंजेक्चर को उन्होंने हल किया लेकिन इसके लिए मिले फील्ड्स मेडल और दस लाख डॉलर के मिलेनियम अवार्ड को यह कह कर ठुकरा दिया कि गणित के क्षेत्र में आई अनैतिकता या अनैतिक तत्वों को बर्दाश्त करने की प्रवृत्ति उन्हें इनको अपनाने से रोक रही है।

सौजन्य- चंद्रभूषण

मिशन केप्लर से आई पहली खबर

हमारे सौरमंडल से बाहर एक दूसरी पृथ्वी की तलाश कर रहे नासा की स्पेस ऑब्जरवेटरी मिशन केप्लर से पहली खबर आ गई है। मिशन केप्लर पर सभी की निगाहें टिकीं हैं और सभी बस यही जानना चाहते हैं कि दूसरी पृथ्वी का पता मिला या नहीं? 26 अगस्त की रात नासा ने केप्लर मिशन की पहली महत्वपूर्ण प्रेस कांफ्रेंस में इस सवाल का जवाब तो दिया, लेकिन इशारों में।
मिशन केप्लर ने हमसे 2000 प्रकाशवर्ष दूर एक नया सौरमंडल खोज निकाला है। इस सौरमंडल में हमारे शनि के आकार वाले दो विशाल ग्रह हैं जो एक विशाल सितारे की परिक्रमा कर रहे हैं। लेकिन असली खबर इस सौरमंडल के अंदरूनी हिस्से में छिपी है, यहां पृथ्वी से करीब डेढ़ गुना बड़ा एक पथरीला ग्रह इस सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। तो क्या, दूसरी पृथ्वी यही है? नासा ने इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया है। केप्लर मिशन की नई खोज की ये खबर ऐसे वक्त में आई है जब यूरोपियन साउदर्न ऑब्जरवेटरी की सात ग्रहों वाले नए सौरमंडल की खोज की चर्चा जारी है। इससे केप्लर मिशन की खोज के महत्व को लेकर लोगों का ध्यान बंट गया है। केप्लर मिशन की खोज इसलिए महत्वपूर्ण है, कि हम अंतरिक्ष में 2000 प्रकाशवर्ष की गहराई तक झांककर नए सौरमंडल को खोज निकालने में सफल हुए हैं। नासा ने तीन ग्रहों वाले इस नए सौरमंडल का नाम इसके सितारे के नाम पर केप्लर-9 यानि K-9 रखा है और इस सौरमंडल के दोनों बाहरी विशाल गैसीय ग्रहों के नाम केप्लर-9बी, केप्लर-9सी और अंदरूनी हिस्से में मौजूद पृथ्वी से मिलती-जुलती संभावना वाले ग्रह का नाम केप्लर-9ए रखा है।
सबसे बड़ी बात ये कि यूरोपियन साउदर्न ऑब्जरवेटरी धरती पर काम कर रही है, जबकि मिशन केप्लर ऑब्जरवेटरी अंतरिक्ष में। और हमारे सौरमंडल से परे नए सौरमंडलों और ग्रहों की खोज में ये दोनो तरीके कामयाब साबित हुए हैं।

बुधवार, 25 अगस्त 2010

विशालकाय सौर परिवार की खोज

एस्ट्रोनॉमर्स ने सात ग्रहों वाला एक विशालकाय सौर परिवार खोज निकाला है। ये सातों ग्रह सूर्य जैसे तारे के आसपास चक्कर काटते हैं। 

ये सौर परिवार धरती से करीब 127 प्रकाश वर्ष दूर है। एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है, जितनी दूरी प्रकाश की एक किरण एक साल में तय करती है। एक इंटरनैशनल टीम को पांच ग्रहों की जानकारी थी और इससे उत्सुक वैज्ञानिकों ने और दो ग्रहों को खोज निकाला। माना जा रहा है कि सूर्य की खोज के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा तारा है। इस नए परिवार में सूर्य जैसे पैरंटल स्टार का नाम एचडी-10180 है। यह 127 प्रकाश वर्ष दूर दक्षिणी नक्षत्र हाइड्रस में स्थित है। एस्ट्रोनॉमर्स का कहना है कि ये सातों ग्रह एक सौर परिवार की तरह हैं। ये सारे ग्रह पैतृक तारे से एक निश्चित दूरी पर हैं।
यूरोप के वैज्ञानिकों की अगुआई करने वाले डॉ. क्रिस्टोफे लोविस का कहना है कि इन ग्रहों के चक्कर काटने की स्पीड से हमें उनके बीच के जटिल संबंधों का पता चलता है।

शनिवार, 21 अगस्त 2010

सितारों भरे मेले में, मां पृथ्वी की उंगली थामे नन्हा चंद्रमा

अपनी मां की उंगली थामकर सितारों के मेले का मजा लेता एक छोटा सा बच्चा। इस तस्वीर में बाईं ओर नीचे की ओर देखिए, एक बड़ा चमकदार सितारा और उसके बिल्कुल करीब मौजूद एक दूसरा नन्हा चमकीला तारा। जुड़वां सितारों के जैसे नजर आ रहे ये दोनों हमारी पृथ्वी और चंद्रमा हैं। पृथ्वी की ये अनोखी तस्वीर ली है हमारे सौरमंडल के पहले ग्रह बुध की कक्षा में मौजूद नासा के पहले मिशन मैसेंजर ने। मैसेंजर ने ये तस्वीर उस वक्त ली है जबकि बुध सूरज के दूसरी ओर था। सूरज हमसे 15 करोड़ किलोमीटर दूर है, लेकिन जब मैसेंजर ने अपना कैमरा हमारी ओर फोकस किया उस वक्त वो 18 करोड़ 30 लाख किलोमीटर दूर था। 
पृथ्वी और चंद्रमा की एकसाथ ली गई ये अब तक की सबसे अद्भुत तस्वीर है। इसे एक बार फिर देखिए, क्या ऐसा नहीं लगता कि सितारों भरे मेले में एक नन्हें बच्चे जैसा चंद्रमा अपनी मां पृथ्वी की उंगली थामे घूम रहा हो। मैसेंजर अपने मिशन में एक ऐसी स्थिति में है जब वो बुध और सूरज के बीच रहकर उल्काओं की तरह वहां आवारा घूमने वाले छोटे पथरीले पदार्थों वॉल्केनोइड्स की खोज कर रहा है। माना जाता है कि वॉल्केनोइड्स बुध और सूर्य के बीच घूमते रहते हैं, लेकिन अब तक इनके कोई भी निशान नहीं मिले हैं।

नासा ने 3 अगस्त 2004 को मैसेंजर लांच किया था, इस मिशन का मकसद था बुध की कक्षा में रहकर इस ग्रह के वातावरण, यहां के धरातल की रासायनिक संरचना, बुध के भौगोलिक इतिहास, चुंबकीय क्षेत्र की प्रकृति और बुध के केंद्र यानि कोर के आकार और उसकी स्थिति का पता लगाना। मैसेंजर बुध पर पिछले 30 साल में गया नासा का पहला मिशन है। इससे पहले मैरिनर-10 ने 1975 में बुध का जायजा लिया था। 2004 से लेकर 2009 तक बुध को करीब से देखने-समझने के लिए मैसेंजर तीन फ्लाई-बाई अभियान पूरे कर चुका है। मैसेंजर ने बुध के ऐसे अनोखे नजारे दिखाए, जैसे पहले कभी किसी ने नहीं देखे थे। मैसेंजर ने बुध से सबसे बड़ी खबर भेजी थी जुलाई 2008 में, उस पल को याद करके मिशन मैसेंजर के टीम मेंबर थॉमस जर्बुकेन अब भी उत्साह से भर उठते हैं। जर्बुकेन बताते हैं मैसेंजर ने बुध के एक्सोस्फियर में भारी मात्रा में पानी की मौजूदगी की खबर भेजी थी। बुध से आई अबतक की ये सबसे बड़ी खबर थी। बुध ऐसा अनोखा ग्रह है जहां दिन का तापमान करीब 500 डिग्री सेंटीग्रेड तक चढ़ जाता है लेकिन रात शून्य से 183 डिग्री सेंटीग्रेड तक ठंडी होती है। सूरज के बेहद करीब, दहकती हुई दुनिया में पानी की मौजूदगी मुमकिन हो सकती है, किसी ने इसके बारे में कभी सपने में भी नहीं सोंचा था। मैसेंजर ने इस बात के सबूत दिए हैं कि बुध की धरती पर ज्वालामुखियों का विस्फोट लगातार जारी है और इस ग्रह का कोर पृथ्वी के जैसा तरल है।
मैसेंजर से करीब 30 साल पहले बुध को नजदीक से देखने की हिम्मत सबसे पहले नासा के प्रोब मैरिनर-10 ने की थी। मैरिनर-10 के कैमरे से ही हम पहली बार बुध की झलक करीब से देख सके थे। बुध के करीब जाने के आठ दिन बाद 24 मार्च 1975 को मैरिनर-10 का ईंधन खत्म हो गया और इस प्रोब का कंप्यूटर बंद हो गया। मैरिनर-10 खत्म हो गया, लेकिन वो बुध पर नहीं जा गिरा, बल्कि माना जाता है कि करीब 35 साल पहले बुध के सफर पर गया ये स्पेस प्रोब अब भी बुध और सूरज के बीच कहीं मौजूद रहकर सूरज की परिक्रमा कर रहा है।

सोमवार, 16 अगस्त 2010

अंतरिक्ष का ओवन- शुक्र

अंतरिक्ष अन्वेषण की अब तक की कोशिशों के दौरान हमने सूर्य के करीब मौजूद सौरमंडल के पहले दो ग्रहों पर बहुत कम नजर डाली है। जबकि पृथ्वी के दूसरी ओर मौजूद मंगल, बृहस्पति और शनि के बारे में हमने व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन किए हैं। सौरमंडल का पहले ग्रह बुध और दूसरे ग्रह शुक्र के बारे में हमारी जानकारी बेहद कम है। शीत युद्ध के दौरान इन ग्रहों को कुछ मिशन्स भेजे गए थे, फिर लंबे समय तक यहां कोई साइंटिफिक मिशन नहीं भेजा गया। नासा अब हमारे पड़ोसी ग्रह शुक्र पर एक लैंडर मिशन ‘सेज’ भेजने की योजना पर काम कर रहा है। इस अवसर पर शुक्र ग्रह के बारे में पेश है वायेजर की खास प्रस्तुति -
हमारे सौरमंडल का दूसरा ग्रह, ऐसी अनोखी दुनिया है जिसके बारे में हम अब भी बहुत कम जानते हैं। शुक्र ग्रह के बारे में मशहूर है कि ये ऐसी जगह है, शैतान भी जहां कदम रखने से घबराता है। ऐसा क्यों ? इसे ऐसे समझिए मान लीजिए कि आपने ओवन को ऑन करके उसमें अपना आईपॉड रख दिया, कुछ ही देर में आईपॉड की जगह आपको पिघली एल्यूमीनियम और प्लास्टिक का एक खदबदाता सा ढेर नजर आएगा। ये ओवन शुक्र ग्रह की जमीन है और ये आईपॉड वहां भेजा गया एक स्पेसक्राफ्ट। अब मान लीजिए कि आपने एक ऐसी नई डिवाइस बना ली है जो ओवन में आईपॉड के पिघलने की प्रक्रिया को थोड़े वक्त के लिए टाल कर उसे लंबा खींच सकती है। शुक्र ग्रह पर किसी रोवर मिशन को भेजने के लिए भी बिल्कुल ऐसा ही करना होगा।
शुक्र ग्रह पर पहली लैंडिंग 40 साल पहले हुई थी, जब सोवियत प्रोब वेरेना-7 पहली बार शुक्र की पथरीली जमीन पर उतरा था। लैंडिग के 25 मिनट बाद ही वेरेना-7 की बैटरियां खत्म हो गईं, लेकिन तब तक ये प्रोब शुक्र की जमीन के बारे में काफी जानकारी भेज चुका था। शुक्र के बारे में अब भी बहुत से सवालों के जवाब हम नहीं जानते और जिन्हें तलाशने के लिए हमें एक बार फिर शुक्र ग्रह पर जाना होगा। शुक्र ग्रह पर कभी महासागर भी थे और शायद उसमें जिंदगी भी कुछ रूप भी पनप रहे होंगे। लेकिन इस ग्रह पर कुछ ऐसा हुआ कि सारा महासागर बहुत जल्दी ही भाप बनकर उड़ गया। यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मिशन वीनस एक्सप्रेस ने बताया है कि शुक्र ग्रह का सारा हाइड्रोजन तेजी से अंतरिक्ष में लीक होता जा रहा है। सूरज की किरणें जब पानी के अणुओं को तोड़ती हैं तो उसमें से हाइड्रोजन निकलता है।
राडार और इंफ्रारेड मैपिंग से हमें इस बात के काफी सबूत मिले हैं कि शुक्र की जमीन पर मौजूद ऊंचे-ऊंचे विशाल पठार कभी इस ग्रह के महाद्वीप थे। अगर इस ग्रह पर गए किसी लैंडर मिशन को यहां की जमीन पर ग्रेनाइट मिलता है तो इस तथ्य की पुष्टि हो जाएगी। क्योंकि ग्रेनाइट तभी बनता है जब बेहद शक्तिशाली दबाव पर लावा और समुद्र का पानी आपस में मिलते हैं। ये भी मुमकिन है कि जब समंदर सूखने लगा होगा तब समंदर के बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीवों ने यहां के वायुमंडल को अपना घर बना लिया होगा। क्योंकि शुक्र का वायुमंडल बेहद घना है, हालांकि इसमें मुख्य रूप से गैस के रूप में सल्फ्यूरिक एसिड ही है, लेकिन फिर भी पानी की भाप के बादल भी भारी तादाद में मौजूद हैं। शुक्र के वातावरण की पर्त बेहद मोटी है और सतह से करीब 60-70 किलोमीटर की ऊंचाई पर वातावरण की ऐसी पर्त मिलती है, जहां पानी की भाप के बेहद घने बादल मौजूद हैं और यहां का तापमान सतह से बेहद कम करीब 60 डिग्री सेंटीग्रेड तक है। शुक्र ग्रह में केवल यही ऐसी जगह है, जहां हम बसने की सोंच सकते हैं। ये बात अलग है कि इसके लिए हमें अपनी बस्तियां हवा में ही बनानी होंगी।
शुक्र ग्रह के ऐसे कई रहस्य हैं जिन्हें समझने के लिए नासा अब वहां अपना पहला लैंडर मिशन भेजने की तैयारी कर रहा है। शुक्र पर लैंड करने वाले नासा के इस पहले मिशन का नाम होगा सरफेस एंड एटमॉस्फियर जियोकेमिकल एक्सप्लोरर यानि ‘सेज।’ लैंडर मिशन सेज के साथ एक रोवर भी होगा, जो कुछ देर तक शुक्र की जमीन पर चहल-कदमी करके वैज्ञानिक प्रयोग करेगा और फिर इसके बाद 500 डिग्री सेंटीग्रेड के प्रचंड तापमान से दहकती शुक्र की उस नारंगी दुनिया में पिघलने लगेगा, बिल्कुल ओवन में रखे उस आईपॉड की तरह।

शुक्र का मानव मिशन, जो कभी लांच ही नहीं हुआ!

हमारा पड़ोसी ग्रह शुक्र, आकार और भौगोलिक रूप से पृथ्वी जैसा ही पथरीला ग्रह, लेकिन 3 करोड़ 80 लाख किलोमीटर के फासले ( शुक्र की पृथ्वी से न्यूनतम दूरी) ने एक ग्रह को जीवन का वरदान दे दिया, जबकि दूसरे को सूखा-बेजान और भट्ठी से भी गर्म बना डाला। साइंस फिक्शन में कई ऐसी कहानियां हैं जिनमें वीनस यानि शुक्र ग्रह पर हवा में तैरती मानव बस्तियों की कल्पना की गई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि शुक्र की सतह का तापमान 500 डिग्री सेंटीग्रेड है और सतह पर वायुदाब पृथ्वी से करीब 95 फीसदी ज्यादा है। यानि अगर आप 500 डिग्री के भीषण तापमान को झेल सकने वाले खास सूट को पहनकर शुक्र की धरती पर खड़े हों तो भी आप सुरक्षित नहीं होंगे, क्योंकि शुक्र का भयानक वायुमंडलीय दबाव ही आपकी जान ले लेने के लिए काफी होगा। लेकिन ऐसा शुक्र की सतह पर है, सतह से ऊपर नहीं। शुक्र की सतह से 50 किलोमीटर ऊपर कार्बन डाई ऑक्साइड की सघन हवा और सल्फ्यूरिक एसिड के बादलों के बीच तापमान और वायुमंडलीय दबाव पृथ्वी की सतह जैसा ही है। इसलिए कल्पना की जा रही है कि शुक्र के बादलों में जमीन की भट्ठी से 50 किलोमीटर ऊपर हवा में तैरती मानव बस्तियां बसाई जा सकती हैं।
लेकिन शुक्र ग्रह के बादलों पर बसने के सपने देखने से पहले वहां जाना और उस अनोखी दुनिया को करीब से जानना जरूरी है। बेहद कम लोगों को ये बात मालूम है कि चंद्रमा पर गए अपोलो मिशन की कामयाबी से उत्साहित नासा के वैज्ञानिकों ने शुक्र ग्रह पर मानव मिशन भेजने की तैयारी कर ली थी। जो ऐन वक्त पर किसी गोपनीय वजह से रद्द करनी पड़ी थी।

1960 के बीच के महीनों में जब कि चंद्रमा पर उतरने की तैयारी चल ही रही थी, नासा ने एक अजीब सपना देखा। नासा वैज्ञानिकों ने योजना बनाई कि अपोलो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर एक मानव मिशन शुक्र ग्रह के सफर पर भेजा जाए। शुक्र पर पहली बार भेजे जाने वाले इस तीन सदस्यीय मानव मिशन की सारी रूपरेखा तैयार कर ली गई और तीन स्टेज वाला एक खास स्पेसक्राफ्ट भी तैयार कर लिया गया। नासा की योजना तीन सदस्यीय मानव मिशन को शुक्र ग्रह पर लैंड कराने की नहीं थी, बल्कि नासा वैज्ञानिक शुरुआत में मानव मिशन को बस शुक्र ग्रह के करीब से गुजारना चाहते थे। सारी तैयारी पूरी हो गई और तय हो गया कि शुक्र को जाने वाला पहला मानव मिशन सैटर्न फाइव रॉकेट के जरिए 31 अक्टूबर 1973 को लांच किया जाएगा, जो 3 मार्च 1974 को शुक्र के करीब से, यानि शुक्र की जमीन से लगभग 5000 किलोमीटर की ऊंचाई से गुजरेगा और फिर मिशन पूरा करके 1 दिसंबर 1974 को धरती पर वापस आ जाएगा। शुक्र तक जाने वाले करीब एक साल की अवधि वाले इस मानव मिशन की सारी तैयारियां बेहद गोपनीय ढंग से पूरी की गईं। लेकिन फिर न जाने ऐसा क्या घटा कि 31 अक्टूबर 1973 की मिशन वीनस की लांचिंग कभी नहीं हो सकी।

शुक्र तक पहले पहुंचने की होड़!

मेरे एक 'स्पेस शो' के दौरान एक बच्चे ने मुझसे पूछा कि दूसरे ग्रहों के लिए अंतरिक्ष अभियानों की शुरुआत कब हुई और वो ग्रह कौन सा था, जिसके लिए पहला स्पेस मिशन भेजा गया? मैंने उस छात्र को ये तो बता दिया कि हमने पहला प्लेनेटरी स्पेस मिशन वीनस यानि शुक्र ग्रह को भेजा था, लेकिन मिशन की डेट्स को लेकर मैं थोड़ा कन्फ्यूज था, इसलिए मैंने इस सवाल का पूरा जवाब देने के लिए उस छात्र की बात इसरो के एक प्लेनेटरी साइंटिस्ट से कराई और बच्चे को उसका जवाब मिल गया। लेकिन अब मेरे मन में वीनस यानि शुक्र ग्रह को लेकर कई सारे सवाल थे, जिनके जवाब मैंने तलाशने की कोशिश की है।
12 फरवरी 1961 वो तारीख थी जब, हमने पृथ्वी के अलावा किसी और ग्रह के लिए पहला स्पेस मिशन भेजा। ये मिशन था वेरेना-1 प्रोब जो धरती को पीछे छोड़ते हुए बढ़ा जा रहा था शुक्र ग्रह की ओर, और इस मिशन की कमांड और कट्रोल थी पूर्व सोवियत संघ के वैज्ञानिकों के हाथों। अकसर हमें सूरज डूबने के बाद पश्चिमी आसमान या सुबह सूरज निकलने से ठीक पहले पूरब दिशा में सबसे चमकीला नजर आने वाला ग्रह शुक्र, जो भोर या साझ के तारे के नाम से भी मशहूर है। पहले प्लेनेटरी मिशन के लिए इसी को चुना गया और इसकी बड़ी वजह ये थी कि शुक्र ग्रह को भौगोलिक रूप से पृथ्वी का जुड़वा कहा जाता है।
शुक्र को भेजा गया पहला मिशन सोवियत प्रोब वेरेना-1 डायरेक्ट इम्पैक्ट ट्राजेक्टरी यानि सीधे-सीधे शुक्र पर लैड करने के लिए भेजा गया था, लेकिन लांचिग के सात दिन बाद जब वेरेना-1 धरती से करीब बीस लाख किलोमीटर की दूरी पर था, इसका संपर्क कंट्रोल रूम से टूट गया और ये अंतरिक्ष में कहीं खो गया। सोवियत स्पेस एजेंसी और नासा दोनों ही अंतरिक्ष अभियानों में बराबरी की हो़ड़ में जुटे थे, नासा ने भी मैरिनर मिशन के साथ अपना शुक्र अभियान छेड़ दिया। लेकिन सोवियत वेरेना-1 की तरह शुक्र अभियान पर निकला नासा का मिशन मैरिनर-1 भी नाकामयाब रहा। लेकिन नासा का मैरिनर-2 मिशन सफल रहा और 14 दिसंबर 1962 को मैरिनर-2 शुक्र ग्रह की कक्षा में प्रवेश करने में सफल रहा। इसी के साथ मैरिनर-2 दुनिया का पहला इंटरप्लेनेटरी मिशन बन गया। मैरिनर-2 ने बताया कि शुक्र ग्रह के सल्फरडाई ऑक्साइड के बादल बेहद गर्म हैं और शुक्र की सतह का तापमान करीब 425 डिग्री सेंटीग्रेड तक हो सकता है।
सोवियत संघ के इंटरप्लेनेटरी मिशन वेरेना के तहत शुक्र को भेजा गया प्रोब वेरेना-3,1 मार्च 1966 को शुक्र की सतह पर लैंड करने में कामयाब रहा। वेरेना-3 हमारी बनाई वो पहली चीज थी जो किसी दूसरे ग्रह के वायुमंडल में प्रवेश करने और उसकी सतह पर लैंड करने में कामयाब रही थी। हालांकि शुक्र पर लैंड करते ही वेरेना-3 का संचार सिस्टम खराब हो गया और एक इतिहास बनाने के बावजूद वेरेना-3 हमें शुक्र की दुनिया के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सका।

18 अक्टूबर 1967 को सोवियत प्रोब वेरेना-4 ने शुक्र के वायुमंडल में सफलतापूर्वक प्रवेश किया और शुक्र की धरती पर लैंड करने के दौरान हवा में ही इसने तमाम प्रयोग कर डाले और शुक्र के वायुमंडल के बारे में पहली बार हमें जानकारी दी। वेरेना-4 ने बताया कि शुक्र के वायुमंडल में 90 से 95 फीसदी तक कार्बन डाई ऑक्साइड मौजूद है और हमारे लिए जहरीली और अजनबी ये हवा धरती के मुकाबले कई गुना ज्यादा सघन है। अपने पैराशूट की मदद से वेरेना-4 शुक्र की सतह पर लैंड कर गया और शुक्र की धरती से हमें 93 मिनट तक नई-नई जानकारियां भेजता रहा। वेरेना-4 ने बताया कि 500 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान वाली शुक्र की सतह किसी भट्ठी से भी ज्यादा दहक रही है। लैंड करने के 93 मिनट बाद वेरेना-4 से संपर्क टूट गया और सूरज की प्रचंड गर्मी में ये प्रोब पूरी तरह पिघल गया। वेरेना-4 के पिघल जाने के बाद अगले ही दिन यानि 19 अक्टूबर 1967 को नासा का मिशन मैरिनर-5 शुक्र ग्रह के करीब से गुजरा। नासा ने मंगल अभियान पर गए अपने पहले स्पेसक्राफ्ट मैरिनर-4 के बैकअप के तौर पर मैरिनर-5 को बनाया था। लेकिन मैरिनर-4 की शानदार कामयाबि के बाद नासा ने इसके बैकअप मैरिनर-5 को शुक्र के सफर पर भेज दिया। मैरिनर-5 ने वीनस फ्लाईबाई से पता लगाया कि शुक्र ग्रह का वायुमंडल किन-किन गैसों से बना है, उसका दबाव कितना है और शुक्र की हवा का घनत्व कितना है।
सोवियत वेरेना मिशन और नासा का मैरिनर अभियान शुक्र ग्रह की टुकड़ों-टुकड़ों में तस्वीर पेश कर रहे थे। इन टुकड़ों को मिलाकर शुक्र की असली तस्वीर देखने-समझने के लिए वैज्ञानिक मजबूर हो गए और तब अंतरिक्ष के क्षेत्र का पहला अंतरराष्ट्रीय सहयोग सामने आया। सोवियत और अमेरिकी वैज्ञानिक एकसाथ मिलकर बैठे और वेरेना और मैरिनर मिशन की जानकारियां साझा की गईं।
मिशन वीनस के अपने शुरुआती मिशन्स से सबक लेते हुए सोवियत वैज्ञानिकों ने जनवरी 1969 को पांच दिन के अंतर से दो प्रोब वेरेना-5 और वेरेना-6 शुक्र ग्रह को रवाना कर दिए और ये दोनों एक दिन के अंतर से 16 मई और 17 मई को उसी साल शुक्र पहुंच गए। ये दोनों प्रोब शुक्र के बेहद घने वायुमंडल में दाखिल हुए और रास्ते में कई वैज्ञानिक प्रयोग करते और उनके डेटा धरती को भेजते हुए दोनों शुक्र की जमीन की ओर बढ़ चले लेकिन वायुमंडलीय दबाव इतना जबरदस्त था कि वेरेना-5 और 6 शुक्र की जमीन से करीब 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर ही नष्ट हो गए।
सोवियत वैज्ञानिकों ने अगले चार साल के दौरान वेरेना कार्यक्रम के तहत शुक्र पर चार प्रोब्स और भेजे। वेरेना-11 और 12 ने शुक्र के गर्म और तूफानी बादलों में कौंधने वाली बिजली का पता लगाया। 1 मार्च 1982 को वेरेना-13 और 5 मार्च 1982 को वेरेना-14 शुक्र की धरती पर लैंड करने में कामयाब रहे। इन दोनों प्रोब्स ने रंगीन तस्वीरें भेजकर शुक्र की दुनिया की पहली झलक हमें दिखाई। यहां लगी शुक्र की धरती की ये तस्वीर भी वेरेना-13 की ली हुई है। वेरेना-13 ने अपने उपकरण एक्स-रे फ्लोरेसेंस स्पेक्ट्रोमीटर की मदद से शुक्र की मिट्टी के नमूनों की जांच की। वेरेना-14 ने अपने ही कैमरे की पहले अलग हो चुकी कैप पर लैंडिंग की, इस वजह से वो शुक्र की मिट्टी को छू नहीं सका। शुक्र की धरातल की जो भी तस्वीर हम देखते हैं वो वेरेना-13 और 14 प्रोब्स की ही ली हुई है। कुछ मिनटों तक काम करते रहने के बाद शुक्र पर दिन के 500 डिग्री सेंटीग्रेड के भीषण तापमान में ये दोनों प्रोब पिघलने लगे और कुछ ही पलों में इनका संपर्क धरती से टूट गया।

आइए चलें, शुक्र की दहकती दुनिया में


पृथ्वी का जुड़वा ग्रह शुक्र, दोनों का आकार और वजन लगभग एक सा। सौरमंडल के किसी दूसरे ग्रह की अपेक्षा, शुक्र का परिक्रमा पथ पृथ्वी के परिक्रमा मार्ग के ज्यादा नजदीक से होकर गुजरता है। फिरभी, इतने करीब होकर भी ये जुड़वा ऐसे हैं, जिनकी प्रकृति बात एक-दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाती। पृथ्वी को पानी और ऑक्सीजन की जिंदगी का वरदान मिला है, जबकि शुक्र इससे बिल्कुल विपरीत है। सौरमंडल का दूसरा ग्रह शुक्र सूरज से इतने करीब है कि इस ग्रह का सारा पानी भाप बनकर उड़ चुका है। शुक्र पर पृथ्वी से दसियों गुना ज्यादा घने बादल हैं,लेकिन इनमें से ज्यादातर सल्फ्यूरिक एसिड यानि गंधक के तेजाब की भाप से बने हैं। शुक्र की दुनिया सूरज की सीधी किरणों से तो दहकती ही है, साथ ही यहां लगातार फूटते ज्वालामुखी और खौलते लावे का साम्राज्य है। सल्फ्यूरिक एसिड यानि गंधक के तेजाब की भाप इन्हीं ज्वालामुखियों के विस्फोट से निकलती है, जिससे शुक्र के बादल और भी घने होते चले जाते हैं। ये बादल इतने घने हैं कि शुक्र की कक्षा से भी देखने पर इस ग्रह की जमीन नजर नहीं आती। शुक्र का चुंबकीय क्षेत्र तो है, लेकिन ये पृथ्वी के जैसा शक्तिशाली कवच नहीं है, बल्कि ये इतना कमजोर है कि जैसे ही सौर विकिरण के तूफान सूरज से फूटकर इससे टकराते हैं, ये बिखर जाता है और खतरनाक सौर विकिरण इस ग्रह को और भी ज्यादा सुखा डालता है। कमजोर चुंबकीय क्षेत्र की वजह से सौर तूफान के थपेड़ों ने इस ग्रह से सूख चुके पानी के सारे हाइड्रोजन को इस ग्रह से बाहर फेंक दिया है। शुक्र की सतह का तापमान 500 डिग्री सेंटीग्रेड है, वायुमंडलीय दबाव धरती के मुकाबले करीब 95 गुना ज्यादा और यहां बहने वाली तूफानी हवाओं की रफ्तार है 360 किलोमीटर प्रति घंटा।
शुक्र ग्रह के बारे में ये तमाम जानकारियां जुटाई हैं 1990-91 के नासा के प्रोजेक्ट मैगेलेन और 2005 में शुक्र पर भेजे गए यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मिशन वीनस एक्सप्रेस ने। 16 वीं शताब्दी के पुर्तगाली दुस्साहसी जहाजी मैगेलन के नाम पर आधारिता नासा का ये वीनस मिशन 4 मई 1989 को लांच किया गया था, 10 अगस्त 1990 को स्पेसक्राफ्ट मैगेलेन शुक्र की कक्षा मे पहुंच गया था। प्रोजेक्ट मैगेलेन ने शुक्र के 98 फीसदी की मैपिंग कर इस ग्रह का पहला भौगोलिक नक्शा बनाया। मैगेलेन ने बताया कि शुक्र के वातावरण में सल्फर यानि गंधक भरी पड़ी है, इससे वहां ज्वालामुखियों की जारी सक्रियता का पता चलता है।
9 नवंबर 2005 को लांच हुआ यूरोपियन स्पेस एजेंसी का स्पेसक्राफ्ट वीनस एक्सप्रेस 11 अप्रैल 2006 को शुक्र की ध्रुवीय कक्षा में स्थापित हुआ था। शुक्र ग्रह की धरती और इस अनोखी दुनिया के तापमान की जांच के साथ इस ग्रह के बादलों, वायुमंडल के प्लाज्मा जैसे माहौल का गहराई से अध्ययन करना वीनस एक्सप्रेस का मकसद है। वीनस एक्सप्रेस अब भी शुक्र के अध्ययन में व्यस्त है। अक्टूबर 2006 और जून 2007 को सौरमंडल के पहले ग्रह बुध के अध्ययन के लिए भेजे गए नासा का स्पेसक्राफ्ट मैसेंजर शुक्र के करीब से दो बार गुजरा था। इस दौरान मैसेंजर ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं। यूरोपियन स्पेस एजेंसी की योजना 2013 में शुक्र की कक्षा में एक खास मिशन बेपीकोलंबो भेजने की है।
इसी साल 20 मई को जापान की स्पेस एजेंसी जाक्सा ने अपने वीनस मिशन की शुरुआत की है। जापान ने शुक्र ग्रह के लिए एक ऑरबिटर मिशन आकात्सुकी भेजा है। मिशन आकात्सुकी दिसंबर तक शुक्र ग्रह पहुंच जाएगा। आकात्सुकी का मकसद इस ग्रह के तूफानी वायुमंडल का अध्ययन करना है और ये पता लगाना है कि क्या इस ग्रह की धरती पर अब भी ज्वालामुखी सक्रिय हैं या नहीं। नासा शुक्र ग्रह पर एक रोवर भेजने की योजना पर काम कर रहा है, इस मिशन का नाम होगा वीनस-इन-सिटू-एक्सप्लोरर। इस रोवर को खास धातु से बनाया जाएगा ताकि ये शुक्र की प्रचंड गर्मी के बीच काम कर सके। मंगल पर मौजूद नासा के जुड़वा रोवर की तरह वीनस-इन-सिटू-एक्सप्लोरर भी शुक्र की मिट्टी के नमूनों की जांच करेगा और वहां के पत्थरों में छेद करके उनमें मौजूद खनिज पदार्थों की खोज करेगा।

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

'धरती को छोड़ देने का वक्त, आ चुका'

प्रो. स्टीफन हॉकिंग ने पोर्टल बिगथिंक को दिए एक इंटरव्यू में धरती के अलावा दूसरे ग्रहों और सितारों पर मानव बस्तियां बसाने की जरूरत पर जोर दिया है। उनके मुताबिक ऐसा करना मानव जाति के वजूद को बचाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। वॉयेजर में प्रस्तुत है प्रो. हॉकिंग का वो पूरा इंटरव्यू -
आइए सच का सामना करें, हमारा ग्रह लगातार गर्म हो रहा है, धरती की जनसंख्या लगातार अनियंत्रित ढंग से बढ़ती जा रही है और हमारी जिंदगी के लिए जो प्राकृतिक संसाधन जरूरी हैं वो तेजी से खत्म होते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हम वैकल्पिक संसाधनों का विकास नहीं कर रहे, लेकिन प्राकृतिक संसाधन जितनी तेजी से खत्म हो रहे हैं, उसकी तुलना में हमारे वैकल्पिक संसाधनों के विकास की गति बेहद धीमी है। अगर मानव जाति नाभिकीय हथियारों के जरिए अपना नामो-निशान मिटा डालने की बेवकूफी न भी करे, तो भी करीब 7.6 अरब साल में हमारा सूरज ही गुब्बारे की तरह फूलकर इतना विशाल हो जाएगा कि वो समूची पृथ्वी को ही निगल जाएगा। आपको शायद सुनकर अच्छा न लगे, लेकिन इस वक्त की सच्चाई यही है कि धरती माता को छोड़ देने का वक्त, मानव जाति के सामने आ चुका है।
मेरा मानना है कि मानव जाति का असली भविष्य अंतरिक्ष में है, पृथ्वी पर ही टिके रहने में नहीं! आने वाले सौ साल पृथ्वी पर आबाद जीवन के सभी विविध स्वरूपों के लिए कठिन चुनौतियों से भरे होंगे, क्योंकि तब धरती को दहलाने वाली आपदाओं को टालना बेहद मुश्किल होगा। ऐसा ही अगले हजार साल और इसके बाद लाख और दस लाख साल बाद होगा, जिंदगी को सहारा देने वाली सभी चीजें धरती से एक-एक करके खत्म होती चली जाएंगी। मानव जाति को अपने सभी अंडे एक ही टोकरी यानि एक ही ग्रह, में नहीं रख देने चाहिए। आइए, उम्मीद करें कि जब तक हम एक ही टोकरी यानि एक ही ग्रह पर बसी मानव जाति के प्रतीक इन अंडों को अन्य जगहों पर फैला नहीं देते, तब तक इस टोकरी को हाथ से छूटने नहीं देंगे।
मैं आशावादी हूं, लेकिन जब मैं मानव जाति के भविष्य की ओर नजरें दौड़ाता हूं, तो सरकारों और समाजों की मौजूदा प्राथमिकताओं को देख घोर निराशा से भर उठता हूं। अभी हाल तक मानव जाति के वजूद पर गहरा खतरा मंडराता रहा है। मिसाल के तौर पर, 1962-63 का क्यूबा मिसाइल संकट , जिसने पूरी मानव जाति को नाभिकीय हमले के खतरे से हिला कर रख दिया था। हिरोशिमा-नागासाकी के बाद एक और बहुत बड़ी नाभिकीय विभीषिका से मानव जाति, बस बाल-बाल ही बची थी।
(क्या था क्यूबा का मिसाइल संकट : शीतयुद्घ के दौरान 1962-63 में सोवियत संघ और अमेरिका के बीच परमाणु युद्घ का खतरा पैदा हो गया था। तब सोवियत संघ और अमेरिका में हथियारों की होड़ चल रही थी। सोवियत संघ की मिसाइलें सिर्फ यूरोप तक हमला कर सकती थीं, लेकिन अमेरिकी मिसाइलों की जद में पूरा सोवियत संघ था। अप्रैल, 1963 में सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता ख्रुशचेव के दिमाग में मध्य दूरी की मिसाइलें क्यूबा में तैनात करने का विचार आया क्योंकि इससे सोवियत संघ को प्रतिरोधक क्षमता हासिल हो सकती थी। क्यूबा के तत्कालीन राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो भी इसके लिए तैयार हो गए। क्यूबा में सोवियत मिसाइलों की तैनाती को अमेरिका ने अपने लिए खतरा माना। दोनों देश परमाणु युद्घ के कगार पर पहुंच गए, लेकिन सौभाग्यवश ऐसा नहीं हुआ। उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी थे )
अमेरिकी वैज्ञानिकों के फेडरेशन के अनुसार, समूची पृथ्वी पर कुल 22,600 नाभिकीय हथियार मौजूद हैं, जिनमें से 7,770 नाभिकीय हथियार अब भी सक्रिय स्थिति में हैं। नाभिकीय हथियारों वाले ज्यादातर देश अंतरराष्ट्रीय नाभिकीय अप्रसार संधि को लेकर प्रतिबद्ध नहीं हैं, ऐसे में किसी भावी नाभिकीय विभीषिका की आशंका खारिज नहीं की जा सकती। सच्चाई तो ये है कि भविष्य में नाभिकीय टकराव के नाजुक मौके और भी बढ़ने की आशंका है। ऐसे नाजुक मोड़ से मानव जाति को बिना किसी नुकसान के आगे ले जाने के लिए हममें बहुत ज्यादा सावधानी और कठिन समस्याओं को राजनयिक बातचीत के जरिए कामयाबी से सुलझाने की काबीलियत होनी चाहिए।
अगले हजार साल तक अगर मानव जाति नाभिकीय विभीषिकाओं के तमाम संभावित टकरावों से बच कर निकलने में कामयाब भी हो जाए, फिर भी इस ग्रह पर हमारे भविष्य पर सवालिया निशान बना ही रहेगा। यूनिवर्सिटी आप ससेक्स के मेरे मित्र एस्ट्रोफिजिसिस्ट डॉ. रॉबर्ट स्मिथ बताते हैं कि बूढ़ा होता सूरज ग्लोबल वॉर्मिंग के ऐसे हालात पैदा कर देगा जब धरती से सारा पानी भाप बनकर उड़ जाएगा। मानव जाति तो आने वाले 7.6 अरब साल से काफी पहले ही इस ग्रह से मिट जाएगी। वैज्ञानिकों ने साबित कर दिखाया है कि सूरज में हो रहा सूक्ष्म विस्तार धरती की सतह के तापमान को किस तरह बढ़ा देगा। समंदर का सारा पानी भाप बनकर उड़ जाएगा और पानी की ये भाप वायुमंडल में भर जाएगी, जो कि कार्बन डाई ऑक्साइड की तरह ही ग्रीन हाउस प्रभाव को जन्म देगी। अंत में सागर उबल-उबल कर सूख जाएंगे और वायुमंडल की सारी भाप अंतरिक्ष में रिस जाएगी। अब से महज एक अरब साल बाद ही पृथ्वी बहुत ज्यादा गर्म, सूखी और जिंदगी के टिके रहने के काबिल नहीं रहेगी।
अंत में, उससे भी हजार साल बाद या बीच में ही मानव जाति को धरती छोड़ देने या फिर चुपचाप अपना नामोनिशान खत्म होते देखने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। ये वो वक्त होगा जब धरती किसी के लिए भी जिंदा रहने के काबिल नहीं रह जाएगी। इसके एक अरब साल बाद लगातार बदलावों से गुजरता सूरज ऐसी हालत में जा पहुंचेगा कि उसकी प्रचंड गर्मी पृथ्वी को पूरी तरह से सूखी-बंजर और बेजान बना देगी। ऐसा नहीं है कि हमें आज इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सौरमंडल के करीब होने वाला कोई सुपरनोवा धमाका, किसी विशाल उल्का की धरती से टक्कर, या फिर अचानक आ खड़ा हुआ कोई ब्लैकहोल, शायद कल ही एक ही झटके में संपूर्ण मानव जाति का सफाया कर सकता है।
ऐसा नहीं है कि मानव जाति पर पहले कभी कोई बड़ा खतरा नहीं आया। मानव जाति के इतिहास में ऐसे कई बेहद मुश्किल मौके आए हैं, जब पूरी जाति पर सफाए का संकट आ खड़ा हुआ था, लेकिन हम आज भी जिंदा हैं। इसकी वजह ये कि आसानी से हार न मानने और विपरीत स्थितियों से जूझने और जीत कर दिखाने की जिद और हमलावर प्रवृत्ति ने हमें जिंदा रखा और यहां तक पहुंचाया है। लेकिन कल भी हम ऐसा ही करेंगे ये कहना मुश्किल है, क्योंकि अब हम कहीं ज्यादा स्वार्थी, आरामतलब और मुसीबतों को झेलने के बजाय उनसे बचने के आदी हो गए हैं।
- प्रो. स्टीफन हॉकिंग

रविवार, 8 अगस्त 2010

सावन की शाम और ग्रहों का त्रिकोण


सावन का मौसम यूं तो घटाओं और रिमझिम फुहारों के लिए मशहूर है...लेकिन इस बार का सावन कुछ अलग है। आसमान में उड़ते बादल और धरती पर धूप-छांप के खेल के बीच, क्षितिज अकसर बादलों से ढ़ंका नजर आता है। लेकिन अगर सूरज के डूबने की दिशा किसी रोज बादलों से खाली हो, तो आप पश्चिमी आसमान में क्षितिज से थोड़ा ऊपर कुदरत का अनोखा नजारा देख सकते हैं। यहां आपको बेहद चमकदार सितारे के रूप में शुक्र ग्रह और उससे ठीक ऊपर शनि और शनि के बिल्कुल सामने मंगल ग्रह एक त्रिकोण की शक्ल में नजर आएंगे। ग्रहों का ये त्रिकोण हर साल नहीं बनाता और बिना किसी टेलिस्कोप की मदद से अपने सौरमंडल के चार ग्रहों को एकसाथ देखने का ये सबसे शानदार मौका है। चार ग्रह से आप कहीं चक्कर में तो नहीं पड़ गए? कि भई ग्रहों के त्रिकोण के तीन ग्रह तो शुक्र, शनि और मंगल हैं, फिर चौथा ग्रह कौन सा है? भई, चौथा ग्रह हमारी पृथ्वी है, जहां से आप आसमान में ग्रहों की इस तिकड़ी को देखेंगे। आसमान के कैनवस पर सजा ये खूबसूरत नजारा 11 अगस्त से बेहद रोमांचक हो उठेगा, जब 'परसीड मेट्योर शॉवर' अपने पीक पर होगा। यानि 11 अगस्त से आपको ग्रहों के इस त्रिकोण से उल्काओं की बारिश का नजारा भी दिखने लगेगा। 12 अगस्त को सीन फिर से बदलेगा और ग्रहों का ये त्रिकोण तब और भी आकर्षक हो उठेगा जब पतला सा अर्धचंद्र चमकदार शुक्र के ठीक नीचे नजर आने लगेगा। पतला सा चंद्रमा और इसके ऊपर ग्रहों का त्रिकोण और उससे होती उल्काओं की बारिश का ये शानदार नजारा आपको 13 अगस्त तक नजर आएगा। इसके बाद आसमान के शो के सारे कलाकार अपनी-अपनी राह पर निकल जाएंगे। यहां खास ध्यान रखने की बात ये, कि आसमान के इस शानदार शो को देखने के लिए पश्चिमी क्षितिज पर बादल नहीं होने चाहिए। इसके अलावा मुमकिन है कि परसीड मेट्योर शॉवर आपको शहरों से नजर न आए। इसकी वजह शहरों की चमकदार रोशनी है, जो मेट्योर शॉवर की चमक को ढंक लेती है। अगर बादल नहीं हैं तो शहरी इलाकों से दूर ग्रामीण या कस्बाई इलाकों से मेट्योर शॉवर यानि टूटते तारों का नजारा बिल्कुल साफ नजर आएगा। 'ग्रहों का त्रिकोण' तो आपको पश्चिमी आसमान पर सूरज डूबने के फौरन बाद से नजर आने लगेगा और साफ आसमान पर ये त्रिकोण रात करीब 9 बजे तक नजर आ सकता है। तो फिर तैयार हो जाइए, सावन की शाम, आसमान में चल रहे इस अनोखे शो के लिए।

गुरुवार, 5 अगस्त 2010

नासा के मंगल मिशन की जिम्मेदारी भारतीय वैज्ञानिक को


हम भारतीयों के लिए नासा से एक खुशखबरी आई है। मंगल ग्रह की कक्षा में मौजूद नासा के सबसे आधुनिक ऑरबिटर मिशन 'मार्स रिकॉनिसां ऑरबिटर' यानि एमआरओ की जिम्मेदारी भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. फिल वर्गीज को सौंप दी गई है। मूल रूप से केरल के रहने वाले डॉ. फिल वर्गीज को नासा ने मिशन एमआरओ का प्रोजेक्ट मैनेजर बना दिया है। डॉ. वर्गीज अमेरिका के लॉस एंजिल्स में रहते हैं। नासा वैज्ञानिक डॉ. वर्गीज के लिए मंगल की निगरानी कोई नई बात नहीं, क्योंकि इससे पहले 2004 से वो नासा के एक पुराने ऑरबिटर मिशन द मार्स ओडिसी का कामकाज देख रहे थे। डॉ. वर्गीज अमेरिका के कैलिफ में मौजूद नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी में 1989 से बतौर वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। डॉ. वर्गीज फुलब्राइट स्कालरशिप पर फिजिक्स की पढ़ाई करे के लिए 1971 में केरल से अमेरिका आए थे। यूनिवर्सिटी आफ ओरेगॉन से उन्होंने फिजिक्स में पीएचडी पूरी की और इसके बाद करियर के शुरुआती दौर में उन्होंने कंप्यूटर और एयरोस्पेस कंपनियों में काम किया।
नासा ने जब मंगल ग्रह पर ऑरबिटर मिशन भेजे तो उन्हें जेट प्रोपल्शन लैबोरेट्री के मार्स ऑरबिटर प्रोजेक्ट में बतौर इंजीनियर काम करने का मौका मिला। जेपीएल के जिम एरिक्सन ने दिसंबर 2006 से लेकर फरवरी 2010 तक मंगल ग्रह पर मौजूद नासा के सबसे महत्वपूर्ण ऑरबिटर मिशन एमआरओ के प्रोजेक्ट मैनेजर की जिम्मेदारी संभाली। अब नासा ने ये जिम्मेदारी भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. फिल वर्गीज को सौंप दी है।
मिशन एमआरओ

मार्स रिकॉनिसां ऑरबिटर मंगल ग्रह की कक्षा में मौजूद नासा के मंगल अभियान का अब तक का सबसे सफल और बहुउद्देश्यीय मिशन है। नवंबर 2006 में मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित हो जाने के बाद से अब तक मिशन एमआरओ ने मंगल ग्रह की हाई रेजोल्यूशन इतनी तस्वीरें भेजीं हैं, जितनी कि नासा को अपने पूरे चंद्रमा अभियान यानि अपोलो मिशन से भी नहीं मिली थीं। करीब 720 मिलियन अमेरिकी डॉलर की लागत वाला मिशन एमआरओ खास कैसरों, स्पेक्ट्रोमीटर्स और राडार जैसे उपकरणों से लैस है और मंगल ग्रह की भौगोलिक संरचना, वहां की मिट्टी में मौजूद खनिजों की पहचान और मंगल ग्रह पर पानी की खोज करना(जो कि ये कर चुका है) इस मिशन का मुख्य मकसद है। साथ ही मिशन एमआरओ को उन जगहों की पहचान भी करनी है, जहां मंगल ग्रह जाने वाला पहला मानव मिशन लैंड करेगा और जहां पहली मानव बस्तियां बसाई जा सकती हैं।

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

क्या हम किसी ब्लैक होल के भीतर हैं?

हो सकता है कि हम सब एक ब्लैक होल के भीतर मौजूद हैं ! ये बड़ी अदभुत और चौंका देने वाली बात है। लेकिन ये हैरान कर देने वाला बयान, आइंस्टीन की जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी में संशोधन पर आधारित एक कॉस्मोलॉजिस्ट का अनोखा निष्कर्ष है। आइंस्टीन की जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी में संशोधन ने ब्लैक होल के कोर यानि केंद्र में जारी हलचल के बारे में हमारी जानकारी बिल्कुल बदलकर रख दी है। इंडियाना यूनिवर्सिटी, ब्लूमिंगटन के कॉस्मोलॉजिस्ट डॉ. निकोडेम पोप्लाव्स्की ने ब्लैक होल के भीतर प्रवेश करने वाले अणुओं की गति का विश्लेषण कर ये दर्शाया है कि हर ब्लैक होल के केंद्र में एक दूसरा ब्रह्मांड मौजूद हो सकता है। डॉ. निकोडेम की इस अनोखी रिसर्च के पेपर्स हाल ही में कई मशहूर फिजिक्स जर्नल्स में प्रकाशित हुए हैं। डॉ. निकोडेम बताते हैं," हमारी आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद विशाल बेलैक होल और दूसरी आकाशगंगाएं शायद किसी दूसरे ब्रह्मांड तक ले जाने वाले पुल से ज्यादा कुछ और नहीं। और 'अगर' ये सही है, और ये 'बहुत बड़ा' अगर है, तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारा ब्रह्मांड खुद एक ब्लैक होल के भीतर मौजूद है।"
आइंस्टीन की जनरल थ्योरी आफ रिलेटिविटी के मुताबिक ब्लैक होल्स के भीतर 'सिंगुलैरिटीज' यानि ऐसे क्षेत्र होते हैं जहां पदार्थ का घनत्व अनंत तक पहुंच जाता है। अब ये 'सिंगुलैरिटी' क्या अनंत घनत्व का वास्तविक बिंदु है, या फिर जनरल रिलेटिविटी के महज एक गणितीय खामी, ये स्पष्ट नहीं है। ब्लैक होल्स के भीतर आइंस्टीन की थ्योरी आफ जनरल रिलेटिविटी के समीकरण खत्म हो जाते हैं। जबकि डॉ. निकोडेम के संशोधन के बाद सामने आए आइंस्टीन के समीकरण के इस नए संस्करण में सिंगुलैरिटी बिल्कुल दरकिनार कर दिया गया है।
अपनी रिसर्च के लिए डॉ. निकोडेम ने आइंस्टीन-कार्टेन-किब्बले-सियामा (ECKS) थ्योरी आफ ग्रेविटी के नाम से मशहूर जनरल रिलेटिविटी के एक वैरिएंट का इस्तेमाल किया है। आइंस्टीन के समीकरणों के विपरीत ECKS का गुरुत्व सिद्धांत प्राथमिक कणों के स्पिन या एंगुलर मोमेंटम पर आधारित है। गुरुत्व की गणना में पदार्थ के स्पिन यानि घूर्णन को शामिल करने से स्पेस-टाइम की जियोमिट्री के एक खास गुण 'टॉर्सन' की गणना संभव हो जाती है।
जब किसी ब्लैक होल के भीतर पदार्थ का घनत्व विशालतम अनुपात (यानि, 10 टु द पावर 50 किलोग्राम पर क्यूबिक मीटर से भी ज्यादा) तक पहुंच जाता है, ऐसे में 'टॉर्सन' एक ऐसे बल के रूप में सामने आ जाता है जो लगातार बढ़ते गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित करने लगता है। इससे पदार्थ के अनंत घनत्व तक दबने-सिकुड़ने की लगातार जारी प्रक्रिया धीमी पड़ने लगती है, और एक बिंदु के बाद ये प्रक्रिया रुक जाती है। इससे सिंगुलैरिटी की घटना टल जाती है। डॉ. निकोडम बताते हैं कि इसके बजाय ब्लैक होल के भीतर पदार्थ जबरदस्त प्रतिक्रिया करता है और वापस दोबारा फैलने लगता है।
इससे इस संभावना को बल मिलता है कि ब्लैक होल के भीतर एक नया ब्रह्मांड मौजूद हो सकता है। अब हमें इस बात का पता कैसे चले, कि हम किसी ब्लैक होल के भीतर हैं या नहीं? डॉ. निकोडम इसका जवाब देते हुए बताते हैं," एक घूमता हुआ ब्लैक होल अपने भीतर के स्पेस-टाइम पर असर डालते हुए उसे कुछ न कुछ स्पिन जरूर प्रदान करता होगा और इस स्पिन से हमारे ब्रह्मांड को कोई न कोई एक तय दिशा भी जरूर मिलती होगी। ब्रह्मांड को मिलने वाली ऐसी तय दिशा लॉरेंट्ज सिमिट्री के नाम से मशहूर स्पेस-टाइम के गुण के उल्लंघन के नतीजे के रूप में सामने आती होगी। अगर हम वाकई एक ब्लैक होल के भीतर मौजूद हैं, तो इसने हमारे ब्रह्मांड को जरूर कोई विशेष तय दिशा दे रखी होगी। दुर्भाग्य से हम इस बात का अध्ययन नहीं कर सकते कि किसी दूसरे ब्लैक होल के भीतर ब्रह्मांड मौजूद है या नहीं। जैसे-जैसे आप ब्लैक होल के करीब जाएंगे, समय की रफ्तार अपने आप धीमी, और धीमी होती चली जाएगी। इसलिए ब्लैक होल के बाहर मौजूद किसी पर्यवेक्षक के लिए ब्लैक होल के भीतर कोई नया ब्रह्मांड केवल तभी जन्म लेगा जब समय की अनंत मात्रा व्यतीत हो चुकी होगी।
कॉस्मोलॉजिस्ट डॉ. निकोडेम पोप्लाव्स्की की ये रिसर्च बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए इसे प्रकाशित करने से मैं खुद को रोक नहीं पाया। लेकिन इस हाई फिजिक्स रिसर्च पेपर को अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करने से पहले मैंने सोंच-विचार में लंबा वक्त लगाया, कि अपने पाठकों को मैं इस रिसर्च की जानकारी सरल शब्दों में कैसे दूं। जब कोई रास्ता नहीं सूझा तो तय किया कि सबसे पहले हाई फिजिक्स के शब्दों में ही इस रिसर्च को पेश किया जाए और अंत में अपनी विशेष टिप्पणी के जरिए मैं पाठकों के दिल में उठ रहे सवालों के जवाब के साथ उन तकनीकी बातों को भी स्पष्ट कर दूं जिनका जिक्र इस रिसर्च पेपर में किया गया है।
सबसे पहले सिंगुलैरिटी -
आइंस्टीन और भौतिकी के नियमों के मुताबिक अगर मैं इस पूरी धरती को चारों ओर से कुछ इस तरह दबाना शुरू कर दूं कि ये धरती एक टेनिस बॉल की शक्ल में आ जाए। तो दो चीजें सामने आएंगी,पहली तो ये कि धरती के पदार्थ का घनत्व सामान्य से हजारों-लाखों गुना ज्यादा बढ़ जाएगा और दूसरा इसी अनुपात में धरती का गुरुत्वाकर्षण बल भी बढ़ता चला जाएगा। अब अगर मैं धरती को और ज्यादा दबाना जारी रखूं कि वो एक अणु की शक्ल में आ जाए तो ऐसी स्थिति में गुरुत्वाकर्षण बल इस कदर बढ़ जाएगा कि उसके जबरदस्त असर से एक अणु की शक्ल में सिमटा धरती का पूरका पदार्थ ही कोलैप्स कर जाएगा, जिसकी परिणति एक भीषणतम धमाके के रूप में होगी। सृष्टि की शुरुआत भी ऐसे ही महाविस्फोट से हुई थी, जिसे बिगबैंग के नाम से जाना जाता है। यानि गुरुत्वाकर्षण बल की उस उच्चतम स्थिति को ही सिंगुलैरिटी कहते हैं, जब बिगबैंग की घटना सामने आती है।
डॉ. निकोडम की रिसर्च ब्लैक होल के बारे में सबसे ज्यादा प्रचलित दो अहम बातों को खारिज करती है...पहला, कि ब्लैक होल के भीतर गुरुत्वाकर्षण बल इतना जबरदस्त और विनाशकारी होता है कि एक बार उसमें फंसने के बाद कोई भी चीज उससे बाहर नहीं निकल सकती। डॉ. निकोडम के सिद्धांत के मुताबिक ब्लैक होल के भीतर गुरुत्वाकर्षण बल एक बिंदु तक ही बढ़ता जाता है, इसके बाद 'टॉर्सन' सामने आ जाता है, जो इस विशाल गुरुत्वाकर्षण बल को संतुलित करने लगता है।
दूसरा ये कि ब्लैक होल के भीतर गुरुत्वाकर्षण इतने विनाशकारी स्तर पर होता है कि वहां सिगुलैरिटी की घटनाएं जारी रहती हैं। यानि अगर कोई पदार्थ या ग्रह किसी ब्लैक होल में फंसकर उसमें गिर जाता है तो वो बिगबैंग जैसे महाविस्फोट के साथ खत्म हो जाएगा। डॉय निकोडम की रिसर्च के मुताबिक ब्लैक होल के भीतर बहुत मुमकिन है कि सिंगुलैरिटी यानि ऊर्जा के महाविस्फोट जैसी घटना होती ही न हो।