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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

चेर्नोबिल-एक हादसा जिसे हमने भुला दिया


 25 वीं वर्षगांठ पर विशेष

 चेर्नोबिल महज एक न्यूक्लियर दुर्घटना नहीं, बल्कि मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी है
- टाइम मैगजीन 

मेरे दिल में उन सबके लिए गहरा सम्मान है जिन्होंने हादसे के बाद वहां जाकर रिएक्टर सील करने का काम किया...वो सभी जानते थे कि 90 फीसदी संभावना इस बात की है कि रेडिएशन उनकी जान ले लेगा...मुझे खेद है, मैं बोल नहीं पा रहा...और उनमें से ज्यादातर नहीं रहे
- व्लादिमीर नोवोच्शेनोव, नाभिकीय ऊर्जा सलाहकार, पूर्व सोवियत संघ 

26 अप्रैल 1986, आधी रात हो चली थी और साढ़े तीन लाख की आबादी वाला उत्तरी यूक्रेन का शहर प्रिप्यट गहरी नींद में था। लेकिन यहां से 3 किलोमीटर दूर मौजूद सोवियत की शान न्यूक्लियर पॉवर प्लांट चेर्नोबिल की यूनिट नंबर 4 के कंट्रोल रूम में भारी हलचल थी। उस रात रिएक्टर के इंजीनियर एक नए सेल्फ फ्यूलिंग सिस्टम का पहला परीक्षण करने जा रहे थे। ऊपर से आए आदेशों में साफ लिखा था कि ये परीक्षण 700 से 1000 मेगावाट पावर लिमिट के बीच किया जाए, लेकिन उस वक्त ड्यूटी पर मौजूद चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ ने उच्च अधिकारियों को खुश करने के लिए एकतरफा फैसला ले लिया। डिएटलॉफ ने इंजीनियरों को हुक्म दिया कि परीक्षण और भी कम पॉवर लिमिट यानि 200 मेगावॉट पर किया जाए। वहां मौजूद इंजीनियर चीफ इंजीनियर के इस आदेश पर भौचक्के रह गए। ड्यूटी पर मौजूद कुछ इंजीनियरों ने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन डिएटलॉफ जो एक नाभिकीय वैज्ञानिक भी था, वो भड़क उठा। उसके इस फैसले से ड्यूटी पर मौजूद इंजीनियर खुश नही थे, और कंट्रोल रूम में काम कर रहे उनमें से एक ने तो अपना करियर दांव पर लगाकर ये हुक्म मानने से इनकार कर दिया। इसपर डिएटलॉफ ने उसे काम से हटाकर उसकी जगह दूसरे इंजीनियर को तैनात कर प्रयोग शुरू करने का आदेश दिया।
परीक्षण से पहले चेर्नोबिल के रिएक्टर नंबर-4 को बंद किया गया। लेकिन इंजीनियर ये नहीं जानते थे कि रिएक्टर के कोर में पानी बहुत कम है। रात एक बजकर 23 मिनट पर इंजीनियरों ने रिएक्टर कोर को पानी से भरने से पहले ही परीक्षण शुरू कर दिया। कम पॉवर में रिएक्टर ऑन करते ही कोर में जो भी थोड़ा-बहुत पानी था वो तुरंत भाप में बदल गया। पानी के बिना चेर्नोबिल रिएक्टर कोर में मौजूद फ्यूल एसेंबली की 50-50 मीटर लंबी यूरेनियम की 1661 छड़ें दहकने लगीं। चारों तरफ अलार्म बज उठे और चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ समेत कंट्रोल रूम में मौजूद हर आदमी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। इंजीनयरों ने हड़बड़ी में कोर को पानी से भरने का काम शुरू कर दिया। पानी ने जैसे ही कोर में दहकती हुई यूरेनियम की छड़ों का स्पर्श किया, वो तुरंत भाप में बदल गया। चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर में प्रेशर कुकर जैसे हालात बन गए, जहां दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। दहकती हुई यूरेनियम की छड़ें पिघलने लगीं और रिएक्टर कोर में धमाके शुरू हो गए। रेडिएशन से सुलगती भाप का दबाव इस कदर तेज हो उठा कि यूरेनियम की हर छड़ के ऊपर लगे 350 किलो कंक्रीट से बने फ्यूल रॉड कैप उछलने लगे और देखते ही देखते एक जबरदस्त धमाके के साथ पूरा रिएक्टर कोर ही उड़ गया। इस धमाके की ताकत इतनी विनाशकारी थी कि रिएक्टर कोर के ऊपर लगा 1200 टन का सेफ्टी कैप उड़कर दूर जा गिरा। रिएक्टर की जगह एक खौफनाक स्याह गड्ढ़ा बन गया, जिससे रेडिएशन से भरी भाप तेज रफ्तार के साथ बाहर फूट रही थी।
 लेकिन असली आफत तो अब आने वाली थी। कुछ सेकेंड बाद इस भीषण धमाके से बने चेर्नोबिल रिएक्टर के उस स्याह गड्ढ़े से यूरेनियम और ग्रेफाइट जैसे दहकते हुए रेडियोएक्टिव अणुओं की एक बौछार सी फूट पड़ी। ये घातक बौछार वातावरण में एक हजार मीटर तक ऊपर उठती चली गई, जिससे रिएक्टर के ऊपर मौजूद बादल भी रेडिएशन के जहर से भर उठे। न्यूक्लियर ईंधन की इस खौफनाक बौछार ने करीब 700 टन रेडियोएक्टिव पदार्थों को वातावरण में यहां-वहां बिखेर दिया। चेर्नोबिल हादसे से वातावरण में फैल गया जहरीला रेडिएशन हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 100 गुना ज्यादा था। 
दुनिया को इस हादसे की पहली खबर दी समाचार एजेंसी नोवोस्टी के फोटो पत्रकार इगोर कॉस्टीन ने। कॉस्टीन वो पहले शख्स थे जो चेर्नोबिल हादसे के बाद सबसे पहले वहां हेलीकॉप्टर से पहुंचे। ये इगोर कॉस्टीन के कैमरे से ली गई हादसे के बाद चेर्नोबिल रिएक्टर की पहली तस्वीर है। चेर्नोबिल पावर प्लांट की जगह अब एक स्याह गहरा गड्ढ़ा नजर आ रहा था, जिससे लहराती हुई भाप ऊपर उठ रही थी। ये खौफनाक मंजर देखते ही कॉस्टीन समझ गए कि यहां कुछ बहुत बुरा घट चुका है। 
इगोर कॉस्टीन ने बाद में बताया कि उन्होंने रेडियो में एक लाइन की खबर सुनी थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर में कुछ गड़बड़ी आई है। उन्होंने तुरंत कैमरा संभाला और वहां जाकर हेलीकॉप्टर से सर्वे करने का फैसला किया। इगोर ने बताया, “ जल्दी ही हम चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर चार के ऊपर उड़ान भर रहे थे, हालात किस कदर संगीन थे, उस वक्त मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था। मैंने हेलीकॉप्टर की खिड़की खोल ली, जो एक बहुत बड़ी गलती थी। जब मैंने खिड़की खोली मुझे बाहर कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा। चेर्नोबिल रिएक्टर के अवशेष हमारे ठीक नीचे थे। वहां मौत का सन्नाटा छाया था। मैं इतने सदमे में था कि हेलीकॉप्टर की आवाज भी सुनाई नहीं दे रही थी। वहां कुछ नहीं था, बस एक स्याह खौफनाक गड्ढ़ा नजर आ रहा था।” 
27 अप्रैल 1986 की सुबह, प्रिप्यट शहर के बाशिंदे इस बात से बेखबर थे कि रात में कितनी बड़ी कयामत टूट चुकी है। लोग अपने-अपने काम में जुटे थे, बच्चे स्कूल जा रहे थे और आम शहरी जिनमें से ज्यादातर चेर्नोबिल रिएक्टर में काम करने वाले कर्मचारी ही थेस अपनी ड्यूटी पर जाने की तैयारी कर रहे थे। चेर्नोबिल हादसे के 30 घंटे बाद अधिकारियों ने चेर्नोबिल रिएक्टर से महज 3 किलोमीटर दूर मौजूद इस शहर की सुध ली। सुरक्षात्मक उपाय शुरू किए गए और थोड़ी ही देर में धड़धड़ाती हुई करीब एक हजार बसें वहां आ पहुंची। अधिकारियों ने लोगों को शहर तुरंत खाली करने का फरमान सुना दिया। लोगों को अपना सामान लेने के लिए महज दो घंटे का वक्त दिया गया। लोगों को केवल उतना ही सामान साथ ले जाने की इजाजत थी, जितना वो खुद उठा सकते थे। अधिकारियों के इस फरमान से शहर में बेचैनी फैल गई। कुछ ही देर में पूरा शहर बसों पर सवार हो गया। लोग अपनी जिंदगी की पूरी कमाई पीछे छोड़ अनजान मंजिल की ओर चल दिए, ये लोग फिर कभी दोबारा अपने घर वापस नहीं लौट सके। 
प्रिप्यट शहर खाली कराने के बाद पूर्व सोवियत संघ की सेना ने दुनिया का सबसे खतरनाक बचाव अभियान शुरू किया, जिसका मकसद था चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करना। सरकार ने अफगानिस्तान मोर्च से सबसे कुशल पायलट तलब किए और उन्हें चेर्नोबिल रिएक्टर के ऊपर हेलीकॉप्टर उड़ाने का आदेश दिया। सैनिकों के साथ ये पायलट हर उड़ान में बोरिक एसिड मिली 80 किलो बालू की बोरियां भी ले गए। कोशिश ये थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर को कई टन बालू और बोरिक एसिड से भर दिया जाए, जो रेडिएशन को सोख सके। पहले दिन 110 टन बालू रिएक्टर के गड्ढ़े में गिराई गई और अगले दिन 300 टन। चेर्नोबिल के खौफनाक खुले मुंह के ऊपर रेडिएशन की मात्रा जानलेवा स्तर से भी कई गुना ज्यादा थी। लेकिन काम में जुटे सभी सैनिक इस बात को नहीं जानते थे। कई पायलटों ने तो चेर्नोबिल के ऊपर एक दिन में 33 उड़ानें भरीं। इसका नतीजा ये हुआ कि काम में जुटे कई सैनिक और पायलट जहरीली हवा से मारे गए और हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने लगे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को स्टील की मोटी चादरों से ढंकने और सील करने का काम तूफानी रफ्तार से शुरू कर दिया गया। काम में जुटे सभी लोग इस बात को समझ चुके थे कि उनके यहां से जिंदा बच निकलने की संभावना बहुत कम है। लेकिन फिर भी दूसरों की जान बचाने के लिए इन जांबाजों ने अपनी हस्ती दांव पर लगा दी। बस एक मामूली सर्जिकल मास्क पहनकर लोग रेडिएशन का सामना करने के लिए आ डटे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करने का वीडियो शूट करने के लिए रूसी सेना का फोटोग्राफर शेवचेन्को चेर्नोबिल पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर तीन की छत पर चढ़ गया। वहां से उसने अपने कैमरे से शूट किया कि किस तरह लोग रेडिएशन से दहकती रेडियोएक्टिव ग्रेफाइट का हाथों से उठाकर ले जा रहे थे। काम पूरा हो जाने के बाद इस्तेमाल की गई हर चीज, दमकल गाड़ियां, क्रेन, हेलीकॉप्टर सब की सब वहीं की वहीं छोड़ दी गई। क्योंकि सबके सब जहरीले रेडिएशन से भर उठे थे। शेवचेन्को के कैमरे ने जो शूट किया वो शायद दुनिया का सबसे दुखद वीडियो है, क्योंकि चेर्नोबिल से लौटने के 10 दिन के भीतर ही इसे शूट करने वाले फोटोग्राफर शेवचेन्को और इसमें नजर आने वाले हर शख्स की मौत हो गई। इस वीडियो को जिस कैमरे से शूट किया गया था, उस कैमरे को भी शेवचेन्को के साथ कब्र में दफना दिया गया, क्योंकि वो भी रेडिएशन से भर उठा था।
पूर्व सोवियत संघ के सरकारी अखबार प्रावदा में कई दिन बाद इस हादसे की एक छोटी सी खबर छपी, वो भी पेज नंबर तीन के बॉटम में सिंगल कॉलम।
 चेर्नोबिल की बाहरी सीमा पर एक बोर्ड लगा है, जिसमें रूसी भाषा में यात्रियों के लिए सुरक्षित सफर की शुभकामनाएं लिखी हैं। लेकिन इससे आगे 30 किलोमीटर दायरे का पूरा इलाका और चेर्नोबिल के कामगारों का शहर प्रिप्यट वीरान पड़ा है। इस शहर में रेडिएशन की मात्रा इतनी ज्यादा है कि अगले 800 साल तक ये रहने के काबिल नहीं है। फिर भी इन नामुमकिन हालात में भी जिंदगी ने अपने लिए रास्ता बना लिया है।
साढ़े तीन लाख लोगों से ये शहर खाली करा लिए जाने के एक साल बाद करीब 400 बुजुर्गों का एक दल अपने शहर वापस लौट आया था। पुरानी यादों भरे अपने घर में जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने के लिए। 75 साल की ओल्गा गेवरिलेन्कोव भी उन्हीं में शामिल थीं। हैरानी की बात ये कि रेडिएशन से भरे इस शहर में ओल्गा मजे से रह रही हैं। प्रिप्यट शहर की जमीन का एक-एक कण घातक रेडिएशन से भरा होने के बावजूद ओल्गा इसी में अपने लिए सब्जियां उगाती हैं।
सर्दियों में जब बर्फबारी होती है तो प्रिप्यट शहर में रेडिएशन का स्तर काफी कम हो जाता है, क्योंकि बर्फ में ही ये खासियत होती है कि वो रेडिएशन को बेहतर तरीके से रोक सकती है। बर्फ से ढंके प्रिप्यट में अब कुछ टूरिस्ट भी आने लगे हैं। यहां आने वाले लोग दादी ओल्गा से जरूर मिलते हैं, और ओल्गा उन्हें गर्व से बताती हैं, “मैं घर के बाहर जमीन पर आलू और हर वो चीज पैदा कर लेती हूं, जो मुझे चाहिए। धरती जो मुझे देती है, मैं उसे खा लेती हूं। मैं नहीं डरती, मैं अब किसी चीज से नहीं डरती।” 
चेर्नोबिल हादसे की त्रासदी केवल इस शहर तक ही सीमित नहीं रही। रेडिएशन से भरे बादलों ने रेडियोएक्टिव कणों को दूर-दूर तक बिखेर दिया। यूक्रेन, बेलारूस, रूस और कीव रेडिएशन की चपेट में आ गए। चेर्नोबिल हादसे के निशान यूरोप के हर देश में देखे गए। लेकिन इस त्रासदी का सबसे अफसोसनाक पहलू ये रहा कि इतिहास की हर त्रासदी की तरह इसके शिकार भी सबसे ज्यादा बच्चे ही हुए। 

हादसे के वक्त चेर्नोबिल पावर प्लांट में करीब 3500 कर्मचारी मौजूद थे, उनमें से 56 कर्मचारी तुरंत मारे गए

3,50, 000 लोगों को हमेशा के लिए बेघर होना पड़ा

90 बच्चों समेत 4000 लोगों की मौत रेडिएशन से हुई

चेर्नोबिल हादसे में मारे गए लोगों की सही संख्या का अब तक पता नहीं चला

हादसे के बावजूद यूक्रेन सरकार ने चेर्नोबिल के दूसरे रिएक्टरों का इस्तेमाल जारी रखा

चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के सभी रिएक्टर साल 2000 से हमेशा के लिए बंद कर दिए गए 

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

गैगेरिन का 108 मिनट का वो सफर, जिसने दुनिया बदल दी


12 अप्रैल 1961, कजाकस्तान का बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, अनजाने भय और आशंकाओं के बीच मानव अंतरिक्ष के गहन अज्ञात में पहला कदम रखने जा रहा था। ऐसे में अपने स्पेसक्राफ्ट वोस्तोक-1 में बैठने से पहले यूरी गैगेरिन ने दुनिया भर के लोगों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाया - 
प्यारे दोस्तों, भले ही आप मुझे जानते हों, या न जानते हों, मेरे हमवतनों और दुनियाभर के लोगों, अगले कुछ मिनटों में एक शक्तिशाली रॉकेट मुझे ब्रह्मांड की सुदूर गहराइयों में ले जाएगा। अंतरिक्ष के सफर पर निकलने से पहले अब इन अंतिम पलों में मैं आपसे क्या कह सकता हूं। अपनी पूरी जिंदगी अब मुझे एक अकेले खूबसूरत क्षण जैसी लग रही है। मैंने जिंदगी में जो कुछ भी किया, जो भी जीया वो सब कुछ बस इस क्षण के लिए ही था। 
विश्व नागरिकों के नाम ये संदेश रिकार्ड करवाने के बाद यूरी गैगेरिन वोस्तोक रॉकेट में सवार होकर विश्व के पहली मानव अंतरिक्ष अभियान पर निकल गए। अंतरिक्ष में पहला मानव मौजूद होने की खबर जब दुनिया को मिली तो सभी अवाक रह गए। द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद ये सबसे बड़ी और सबसे गौरवशाली खबर थी, जो पूरी दुनिया में बिजली की तेजी से फैल गई। अमेरिका दंग रह गया, लेकिन राजनयिक-कूटनीतिक और सामरिक स्तर पर जारी तमाम स्पर्धाओं को दरकिनार कर वाशिंगटन ने बधाई का संदेश मास्को भेजा। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान ने पूरी दुनिया को मानव होने का अर्थ सही मायनों में समझाया और सभी देशों को एकसाथ गर्व की सुखद अनुभूति से भर दिया।   
यूरी गैगेरिन भारत में 
अंतरिक्ष से वापस आने के करीब आठ महीने बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर यूरी गैगेरिन भारत भी आए। भारत में भी गैगेरिन के लिए भव्य स्वागत यात्रा निकाली गई। गैगेरिन की उपलब्धि ने भारत को भी आत्मविश्वास से भर दिया। डॉ. विक्रम साराभाई भी यूरी की अंतरिक्षयात्रा से बहुत प्रभावित हुए और इस नतीजे पर पहुंचे कि एक प्रभावशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यूरी गैगेरिन के अंतरिक्ष अभियान के 8 साल बाद इसरो की स्थापना के साथ भारत ने अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू कर दिया। और इसके महज 6 साल बाद अपना पहला सेटेलाइट आर्यभट्ट अंतरिक्ष भेजकर दुनिया को चौंका दिया। यूरी गैगेरिन के सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने खास डाकटिकट भी जारी किए। यूरी ने जब पृथ्वी की पहली परिक्रमा की उस वक्त वो केवल 27 वर्ष के थे। 108 मिनट की उनकी अंतरिक्षयात्रा ने विश्व के युवाओं को इस कदर जोश से भर दिया कि इसके बाद दुनिया ही बदल गई।
स्पुतनिक और स्पेस एज
यूरी के अंतरिक्ष अभियान की पृष्ठभूमि तैयार हुई 4 अक्टूबर 1957 को जब पूर्व सोवियत संघ ने दुनिया का पहला सेटेलाइट स्पुतनिक पृथ्वी की कक्षा में भेजा। स्पुतनिक के साथ दुनिया में अंतरिक्ष युग की शुरुआत हुई, जिसे सोवियत वैज्ञानिकों ने आगे बढ़ाया 3 नवंबर 1957 को पृथ्वी की कक्षा में जीवन का पहला रूप मादा कुत्तालाईकाको भेजकर। अंतरिक्ष के माहौल में लाईका केवल 6 घंटे ही जीवित रह सकी, उसके चैंबर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाने की वजह से उसकी मौत हो गई। लाईका नहीं रही, लेकिन वो जिंदगी को अंतरिक्ष का रास्ता दिखा गई। अमेरिका एक बार फिर पिछड़ चुका था, लेकिन सोवियत जानता था कि अब अमेरिका दुनिया को चौंकाने वाला कोई बड़ा कारनामा जरूर करेगा। साम्यवादी सरकार हर कीमत पर अमेरिका को पछाड़ने पर आमादा थी। वक्त कम था और जल्दी ही कुछ बड़ा कर दिखाना था।
मिशन वोस्तोक और मिशन मरकरी
जनवरी 1959 को पूर्व सोवियत संघ ने इंसान को अंतरिक्ष भेजने के लक्ष्य के साथ एक अहम कार्यक्रम शुरू किया, जिसका नाम था वोस्तोक। इसके ठीक तीन महीने बाद अमेरिका ने भी अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने के लिए मिशन मरकरी का ऐलान कर दिया। अब पूर्व सोवियत संघ और अमेरिका में इस बात की होड़ तेज हो गई कि पहले अंतरिक्षयात्री को अंतरिक्ष भेजने में बाजी कौन मारता है। 
अमेरिका की तरह पूर्व सोवियत संघ ने भी अंतरिक्षयात्रियों को चुनने के लिए वायुसेना के पायलट्स को ही लेने का फैसला लिया। पूर्व सोवियत संघ ने गुपचुप ढंग से सारी तैयारियां शुरू कर दीं और देशभर से वायुसेना से सबसे कुशल 2000 पायलट्स को बुला भेजा। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम वोस्तोक के चीफ सेर्गेई कोरोलेव ने इन 2000 में से 200 पायलट्स का चुनाव किया और कड़े इम्तहान के बाद इन 200 में से 20  कैडेट्स को चुना गया। लेकिन किसी को भी ये नहीं बताया गया कि उन्हें करना क्या है। 20 लोगों की इसी टीम में शामिल थे सोवियत एयरफोर्स के सीनियर लेफ्टिनेंट यूरी गैगेरिन।
महज 5 फुट 2 इंच के कद वाले यूरी साथियों के बीच अलग ही नजर आते थे। मजाकिया स्वभाव के साथ उनकी सबसे बड़ी पहचान थी चेहरे पर हर वक्त खिली रहने वाली एक ताजगी भरी मुस्कान। 20 में से यूरी गैगरिन समेत 6 फाइनल कैडेट्स का चुनाव किया गया और तब उन्हें बताया गया कि उन्हें कॉस्मोनट यानि अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण लेने के लिए भेजा जा रहा है। 18 जून 1960 को पहली बार इन सभी छह लोगों को वोस्तोक रॉकेट दिखाया गया। अब जाकर इन्हें पता चला कि छह में से किसी एक भाग्यशाली को दुनिया का पहला अंतरिक्षयात्री बनने का मौका मिलेगा।
यूरी गैगेरिन जिस वक्त अंतरिक्षयात्री बनने का प्रशिक्षण ले रहे थे, उस वक्त तक न तो अच्छे कंप्यूटर्स थे, और न ही वो टेक्नोलॉजी जो एक इंसान को अंतरिक्ष भेजकर सुरक्षित वापस ला सकती थी। उस वक्त तक तो हमें अंतरिक्ष में विकिरण के खतरों की भी सही जानकारी नहीं थी और अंतरिक्ष के खतरनाक माहौल में जिंदगी की हिफाजत करने वाले अच्छे स्पेससूट की तो बात छोड़िए, सुरक्षित हेलमेट तक नहीं थे। ऐसे में एक इंसान को अंतरिक्ष भेजना एक राजनीतिक जिद के सिवाय कुछ नहीं था। राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं इस कदर हावी थीं कि अंतरिक्षयात्री की सुरक्षा जैसे सवाल बेमानी थे।
यूरी का चुनाव
11 महीने का अंतरिक्षयात्री प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, अब आई बारी अंतरिक्ष के पहले सफर के लिए 6 में से एक कॉस्मोनट को चुनने की। चयनकर्ताओं के सामने दो अंतिम नाम थे यूरी गैगेरिन और घेरमान तितोव। तितोव एक शिक्षक के बेटे थे, जबकि यूरी के पिता एक किसान थे। साम्यवादी सरकार ने दुनिया के पहले अंतरिक्षयात्री के तौर पर तितोव के बजाय मेहनतकश किसान के बेटे यूरी का चुनाव किया। पहली अंतरिक्षयात्रा के लिए यूरी के चुनाव की एक वजह और भी थी। दरअसल वोस्तोक कैप्स्यूल के कॉकपिट में लंबे कद के अंतरिक्षयात्री के लिए जगह ही नहीं थी। जबकि मजह 5 फुट 2 इंच कद वाले यूरी इस छोटे से कॉकपिट के लिए बिल्कुल फिट थे।
यूरी लंबे वक्त से घर से बाहर थे। हाल ही में उनकी बेटी लेना का जन्म हुआ था। लेकिन यूरी परिवार को ये नहीं बता सकते थे कि वो कहां हैं और क्या कर रहे हैं। अंतरिक्षयात्रा पर निकलने से पहले उन्होंने अपनी पत्नी वेलेंटीना गोर्याचेवा को खत लिखा-
मेरी प्यारी, तुमसे और बच्चों से मिलने को मैं बेकरार हूं...मैं देश के प्रति अपना फर्ज निभा रहा हूं...मैं एक ऐसे सफर पर जाने वाला हूं, जिसका ख्वाब मैं बचपन से देखता रहा हूं...ये कुछ ऐसा है जिसपर हम हमेशा गर्व करेंगे...इसमें कुछ खतरे भी हैं...लेकिन कई बार लोग अपने कमरे में टहलते हुए भी फिसल जाते हैं और उनकी जान खतरे में आ जाती है...बड़ी बात वो मकसद है, जिसके लिए हम खुद को दांव पर लगा दें...मुझे यकीन है कि मैं इस सबसे बड़े इम्तहान से विजेता बनकर तुम्हारे और बच्चों के पास लौट आउंगा....नन्हीं लेना को मेरा प्यार देना....तुम्हारा...यूरी।
 12 अप्रैल 1961, बायकोनूर कॉस्मोड्रोम, कजाकस्तान। वो एतिहासिक दिन आ पहुंचा, यूरी ने दुनिया के नाम अपना संदेश रिकार्ड करवाया और ड्रेसिंग रूम में आ गए, जहां स्पेस सूट पहनने में साथियों ने  यूरी गैगेरिन की मदद की। स्पेस सूट पहन लेने के बाद यूरी को लांच पैड तक ले जाने के लिए एक खास बस में बिठाया गया। बस में यूरी के साथ बतौर बैकअप कॉस्मोनट घेरमान तितोव भी स्पेस सूट पहनकर पीछे की सीट पर बतौर बैकअप पायलट मौजूद थे। तभी एक साथी  इवानोव ने सौभाग्य के लिए एक चॉकलेट खिलाकर यूरी का मुंह मीठा कराया। बस कॉस्मोड्रॉम की ओर चल दी, और इसके साथ ही तितोव के दिल में एक तूफानी हलचल भी शुरु हो गई।
तितोव किसी भी मायने में यूरी से कम नहीं था, लेकिन इतिहास रचने का मौका यूरी को मिल रहा था। तितोव ने कई साल बाद एक इंटरव्यू में बताया कि जब तक यूरी बस से उतरकर रॉकेट की ओर नहीं चले गए, तब तक उन्हें यही लगता रहा कि शायद अगले ही पल कुछ ऐसा हो जाएगा, कि यूरी की जगह अंतरिक्ष जाने का मौका उन्हें मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, बस कॉस्मोड्रॉम पहुंची, यूरी बस से उतरे और उन्होंने वहां मौजूद सैन्य अधिकारियों और मिशन वैज्ञानिकों को अपना परिचय देने की औपचारिकता निभाई। तितोव बस में ही बैठे रहे, उनके लिए अब कोई उम्मीद नहीं बची और यूरी एक नया इतिहास रचने के लिए रॉकेट की ओर बढ़ गए। तितोव ने निराशा में आंखें बंद कर लीं और एक झपकी लेने में खो गए।
कॉस्मोड्रॉम में आला सरकारी और फौजी अफसरों के साथ सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ सेर्गेई कोरोलेव भी मौजूद थे। खतरों से भरे इस सफर के लिए यूरी का चुनाव उन्होंने ही किया था। कोरोलेव भावुक हो उठे, क्योंकि वो ये बात बखूबी जानते थे कि इस सफर से यूरी के जिंदा वापस आने की संभावना 50 प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। फिरभी यूरी से विदा लेते वक्त उन्होंने स्नेह के साथ कहा, यूरी वापस लौट के आना।
दोस्त ने निभाई दोस्ती
दुनिया की इस पहली अंतरिक्षयात्रा के दौरान वोस्तोक में यूरी के पूरे सफर का नियंत्रण ग्राउंड कंट्रोल के हाथों में था। यूरी को तब तक नियंत्रण हाथ में लेने की इजाजत नहीं थी, जब तक कि कोई आपात स्थिति सामने न आ जाए। आपात स्थिति में यूरी एक खास कोड के जरिए नियंत्रण हाथ में ले सकते थे, लेकिन ये खास कोड सेना के जनरल समेत बस दो-तीन लोगों को ही मालूम था और किसी इमरजेंसी से पहले यूरी को ये कोड न बताने की सख्त ताकीद की गई थी। कोरोलेव से गले मिलने के बाद यूरी रॉकेट पर ले जाने वाली लिफ्ट में सवार हो गए। वोस्तोक कैप्स्यूल में यूरी को बिठाने की जिम्मेदारी निभाई यूरी के एक दोस्त इंजीनियर ने। यूरी को बिठाने के दौरान उसने अपनी दोस्ती निभाई और अपनी जान जोखिम में डालकर यूरी के कान में चुपके से वो इमरजेंसी कोड बता दिया, जिसकी मदद से आपात स्थिति आने पर यूरी नियंत्रण अपने हाथों में ले सकते थे। इसपर यूरी मुस्कुराए और बोले,मैं, जानता हूं, जनरल ने मुझे पहले ही कोड बता दिया है।
रॉकेट लांच होने में अभी कुछ वक्त था। वोस्तोक कैप्स्यूल में बैठकर यूरी कंट्रोल रूम में मौजूद साथियों से माइक्रोफोन पर मजाक करने लगे। इसपर कोरोलेव ने यूरी को सावधान किया कि वो जो कुछ भी कह रहे हैं, वो सब रिकॉर्ड हो रहा है। ये जानकर यूरी झेंप गए और कंट्रोल रूम ठहाकों से गूंज उठा। अंतिम जांच पूरी होने पर, कोरोलेव ने इशारा किया और वोस्तोक के बूस्टर इंजन दहक उठे। रॉकेट लांच होते ही यूरी ने पूरे जोश में भरकर कहा...पियाकली...यानि... आओ चलें। तूफानी रफ्तार से रॉकेट आसमान की ओर बढ़ा चला जा रहा था। वोस्तोक कैप्स्यूल में मौजूद यूरी इन गौरवशाली क्षणों के आनंद में मातृभूमि को समर्पित एक गीत गुनगुना उठे -
the motherland knows...the motherland hears
when her son is flying up i the clouds....
(मातृभूमि जानती है...मातृभूमि सुनती है..
जब उसका बेटा...ऊपर बादलों में उड़ान भरता है) 
रॉकेट लांच के तीन मिनट बाद, वोस्तोक के बूस्टर रॉकेट्स गैरेरिन को 28164 किलोमीटर प्रति घंटे की तूफानी रफ्तार से धरती की सरहदों के पार लिए चले जा रहे थे। 
लांचिंग के 5 मिनट बाद, यूरी गैगरिन अंतरिक्ष से खूबसूरत नीली धरती को निहारने वाले पहले इंसान बन गए। 
वोस्तोक कैप्सूल के कॉकपिट की छोटी सी खिड़की के उसपार चमकीली नीली धरती नजर आ रही थी। धरती की इस खूबसूरती को देखने में यूरी खो गए। उन्होंने माइक्रोफोन से कंट्रोल रूम को बताया, अब मैं धरती के रंगों को देख रहा हूं...ये खूबसूरत है...बेहद खूबसूरत।
 अंतरिक्ष तक की उड़ान के 9 मिनट बाद रफ्तार की तेज सनसनाहट अचानक थम गई। गुरुत्वाकर्षण का असर खत्म हो गया। पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण सीमा को पीछे छोड़कर यूरी पृथ्वी की अपनी कक्षा में पहुंच गए। उन्होंने कंट्रोल रूम को बताया, सबकुछ ठीक है...शून्य गुरुत्वार्षण का अनुभव शानदार है...मुझे मजा आ रहा है। 
धरती पर जारी राजनीति का खेल
मानव इतिहास की सबसे शानदार उपलब्धि हासिल हो गई। किसी इंसान को अंतरिक्ष भेजने का सपना साकार हो गया। अपनी कक्षा में मौजूद यूरी गैगेरिन अब धरती की अपनी पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे। इस ऐतिहासिक कामयाबी के ऐलान के लिए पूर्व सोवियत सरकार अब तैयार थीपहले से ही तीन बिल्कुल अलग-अलग हालात के लिए लिफाफे तैयार किए गए थेपहले लिफाफे में यूरी गैगेरिन के मिशन की शानदार कामयाबी का ऐलान थादूसरे लिफाफे में,तकनीकी खामी के चलते रूस की सीमा से बाहर लैंड हो गए रूसी कॉस्मोनट की मदद करने की अपील थीजबकि तीसरे लिफाफे में एक शोक संदेश था, जिसमें लिखा था कि मिशन के दौरान यूरी गैगरिन की मौत हो गईजब वैज्ञानिक आंकड़ों से मिशन की कामयाबी की पुष्टि हो गई, तो क्रेमलिन के आदेश पर पहला लिफाफा खोला गया और लोगों को साम्यवादी सरकार की इस शानदार कामयाबी की खबर दी सरकारी एजेंसी तास ने। रेडियो एनाउंसर यूराई लैवितान ने बाद में बताया कि पूरे करियर के दौरान कोवल दो मौके ही ऐसे आए, जब बुलेटिन पढ़ने के बाद वो फफक-फफक कर रो पड़े थे। पहला मौका था जब उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की खबर पढ़ी थी और दूसरा मौका अब सामने था, जब लो अंतरिक्ष में यूरी गैगेरिन के मौजूद होने का समाचार लोगों को सुना रहे थे।
धरती से करीब साढ़े तीन सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर एक छोटे से कैप्स्यूल में मौजूद मौजूद गैगेरिन पृथ्वी की पहली परिक्रमा पूरी कर रहे थे, लेकिन ग्राउंड कंट्रोल में मौजूद वैज्ञानिकों का तनाव हर पल बढ़ता जा रहा था। सोवियत मानव अंतरिक्ष कार्यक्रम के चीफ कोरोलोव ने कंट्रोल रूम से पूछा, कंट्रोल, वो कैसा है।
इसपर स्पीकर पर यूरी की आवाज गूंजी,मैं सुरक्षित हूं।
तभी कंट्रोल रूम में लगे टेलीविजन स्क्रीन से यूरी के वीडियो सिगनल टूटने लगे। कोरोलोव यूरी को कुछ बताना चाहते थे कि अचानक टीवी स्क्रीन से यूरी की तस्वीर गायब हो गई। किसी अनहोनी के अंदेशे से कंट्रोल रूम में मौजूद कोरलोव समेत सारे वैज्ञानिक कांप उठे।
दरअसल यूरी टेलीविजन रिसीवर की रेंज से बाहर चले गए थे।
लांच से 30 मिनट से भी कम वक्त के भीतर यूरी गैगेरिन प्रशांत महासागर के ऊपर से गुजरे और उन्होंने आधी धरती को नींद के आगोश में समेटे रात के गहरे साये को देखा। जल्दी ही गैगेरिन का कैप्स्यूल अमेरिका के ऊपर से गुजरा, जिसके नागरिक अंतरिक्ष में पहले इंसान यूरी गैगेरिन की शानदार फतह से बेखबर गहरी नींद में खोए थे।
यूरी की जान खतरे में
अंतरिक्ष में करीब एक घंटा गुजारने के बाद कंट्रोल रूम में रीइंट्री यानि धरती के वातावरण में वापसी की गणना शुरू कर दी गई। पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा कर रहे गैगेरिन को अब बर्न-अप की मदद से वोस्तोक कैप्स्यूल की रफ्तार कम करनी थी। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया जाता तो गैगरिन पृथ्वी की और ऊंची कक्षा में प्रवेश कर जाते, जहां से फिर वापस लौटने का और कोई रास्ता नहीं था। रॉकेट बर्न-अप के साथ यूरी के कैप्स्यूल की रफ्तार तो कम हो गई लेकिन एक बड़ा हादसा सामने आ गया। वोस्तोक के सर्विस मॉड्यूल को कैप्स्यूल से अलग होना था, लेकिन दोनों एक-दूसरे में फंस गए। कंट्रोल रूम में वैज्ञानिक कांप उठे। वोस्तोक सर्विस मॉड्यूल अगर कैप्स्यूल के साथ जुड़ा रहता तो अंतरिक्ष में गैगेरिन की मौत तय थी। यूरी कंट्रोल रूम का रेडियो संपर्क टूट गया। तेज गर्मी से दहकते और एक-दूसरे से टकराते वोस्तोक के दोनों हिस्से धरती के वातारण में प्रवेश कर गए। हालात अब हाथ से निकल गए। कोरलोव अब कंट्रोल रूम के दूसरे वैज्ञानिकों के साथ इंतजार के सिवा कुछ और नहीं कर सकते थे। 
साईबेरिया के सारातोव इलाके में किसान अपने खेतों में काम कर रहे थे। कि तभी अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। खेतों में काम कर रही एक लड़की घबराकर मां से लिपट गई। दोनों ने आसमान की ओर नजरें उठाईं। आसमान से दो चीजें पैराशूट के सहारे नीचे गिर रही थीं। पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश के अंतिम क्षणों में भीषण तापमान से वोस्तोक के एक-दूसरे में फंसे दोनों दोनो अपने आप अलग हो गए और इसके कुछ पल बाद ही टुकड़ों को अलग कर दिया। इसके कुछ ही क्षण बाद धरती से करीब साढ़े छह किलोमीटर की ऊंचाई पर गैगेरिन ने कैप्स्यूल के बाहर पराशूट से छलांग लगा दी।
108 मिनट की इस ऐतिहासिक अंतरिक्षयात्रा के दौरान गैगेरिन ने 40234 किलोमीटर की दूरी तय की और इसके साथ ही वो अंतरिक्ष से पृथ्वी की परिक्रमा करने वाले पहले इंसान बन गए। कंट्रोल रूम में गहरा सन्नाटा था। कोरोलोव ने फोन उठाया और फिर साथियों को यूरी की साईबेरिया में सुरक्षित लैंडिंग की खबर दी। इसके साथ ही कंट्रोल रूम खुशियों से झूम उठा।
अंतरिक्ष में पहला अंतरिक्षयात्री भेजने में पूर्व सोवियत संघ ने बाजी मार ली और अमेरिका स्पेस-रेस में मीलों पीछे छूट चुका था। तात्कालीन सोवियत राष्ट्रपति निकिता खुश्चेव ने गैगेरिन की अंतरिक्षयात्रा को साम्यवादी सिद्धांतों की सर्वोच्च विजय के तौर पर प्रचारित किया। गैगेरिन अब नेशनल हीरो थे।
गैगेरिन की वापसी के दो दिन बाद सोवियत सरकार ने इस शानदार उपलब्धि का सार्वजनिक जश्न मनाया। एयरफोर्स का एक विमान गैगेरिन को लेकर सीधे क्रेमलिन पहुंचा। जीत के गौरव से भरे छोटे कद के गैगेरिन सधे कदमों रेड कारपेट पर चल रहे थे कि तभी उनकी पत्नी ने उनके पैरों में कुछ महसूस किया।
यूरी रेड कारपेट पर चले आ रहे थे, लेकिन उनके जूते का एक फीता खुला हुआ था।
अपने नेशनल हीरो की अगवानी के लिए क्रेमलिन के लाल चौक पर सरकारी अधिकारियों के साथ गैगेरिन का परिवार भी मौजूद था। लेकिन सबसे खास बात ये कि लाखों की भीड़ के साथ यूरी से मिलने राष्ट्रपति खुश्चेव खुद आए थे।
गैगेरिन की मशहूर मुस्कान की चमक पूरी दुनिया में फैल गई। क्यूबा, जापान, मैक्सिको, कनाडा, लीबिया और भी कई देशों में यूरी गैगेरिन जहां भी गए, उन्हें देखने के लिए लाखों की भीड़ उमड़ पड़ी। गैगेरिन की उपलब्धि इतनी बड़ी थी, कि सोवियत प्रतिद्वंदी अमेरिका भी यूरी गैगेरिन की तारीफ किए बिना नहीं रह सका। यूरी गैगेरिन अब किसी एक देश के हीरो नहीं रहे, बल्कि वो पूरी मानव जाति के नायक बन गए। गैगेरिन की 108 मिनट की अंतरिक्षयात्रा ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया। गैगेरिन की उपलब्धि ने वैज्ञानकों और युवाओँ को इस कदर जोश और आत्मविश्वास से भर दिया कि महज आठ साल बाद ही मानव ने चंद्रमा पर अपने कदमों के निशान बना दिए। इंसानियत के इस हीरो के सम्मान में नील आर्मस्ट्रांग यूरी गैगेरिन का एक मैडल अपने साथ ले गए थे, जिसे उन्होंने हमेशा के लिए चंद्रमा पर रख दिया। दुनिया के इस पहले अंतरिक्षयात्री ने पृथ्वी की पहली परिक्रमा के दौरान जिन खतरों का सामना किया, दुनिया ने उनसे सबक लिया और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ अंतरिक्षयात्रियों की नई पीढ़ी तैयार हुई।