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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

चेर्नोबिल-एक हादसा जिसे हमने भुला दिया


 25 वीं वर्षगांठ पर विशेष

 चेर्नोबिल महज एक न्यूक्लियर दुर्घटना नहीं, बल्कि मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी है
- टाइम मैगजीन 

मेरे दिल में उन सबके लिए गहरा सम्मान है जिन्होंने हादसे के बाद वहां जाकर रिएक्टर सील करने का काम किया...वो सभी जानते थे कि 90 फीसदी संभावना इस बात की है कि रेडिएशन उनकी जान ले लेगा...मुझे खेद है, मैं बोल नहीं पा रहा...और उनमें से ज्यादातर नहीं रहे
- व्लादिमीर नोवोच्शेनोव, नाभिकीय ऊर्जा सलाहकार, पूर्व सोवियत संघ 

26 अप्रैल 1986, आधी रात हो चली थी और साढ़े तीन लाख की आबादी वाला उत्तरी यूक्रेन का शहर प्रिप्यट गहरी नींद में था। लेकिन यहां से 3 किलोमीटर दूर मौजूद सोवियत की शान न्यूक्लियर पॉवर प्लांट चेर्नोबिल की यूनिट नंबर 4 के कंट्रोल रूम में भारी हलचल थी। उस रात रिएक्टर के इंजीनियर एक नए सेल्फ फ्यूलिंग सिस्टम का पहला परीक्षण करने जा रहे थे। ऊपर से आए आदेशों में साफ लिखा था कि ये परीक्षण 700 से 1000 मेगावाट पावर लिमिट के बीच किया जाए, लेकिन उस वक्त ड्यूटी पर मौजूद चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ ने उच्च अधिकारियों को खुश करने के लिए एकतरफा फैसला ले लिया। डिएटलॉफ ने इंजीनियरों को हुक्म दिया कि परीक्षण और भी कम पॉवर लिमिट यानि 200 मेगावॉट पर किया जाए। वहां मौजूद इंजीनियर चीफ इंजीनियर के इस आदेश पर भौचक्के रह गए। ड्यूटी पर मौजूद कुछ इंजीनियरों ने उससे बात करने की कोशिश की, लेकिन डिएटलॉफ जो एक नाभिकीय वैज्ञानिक भी था, वो भड़क उठा। उसके इस फैसले से ड्यूटी पर मौजूद इंजीनियर खुश नही थे, और कंट्रोल रूम में काम कर रहे उनमें से एक ने तो अपना करियर दांव पर लगाकर ये हुक्म मानने से इनकार कर दिया। इसपर डिएटलॉफ ने उसे काम से हटाकर उसकी जगह दूसरे इंजीनियर को तैनात कर प्रयोग शुरू करने का आदेश दिया।
परीक्षण से पहले चेर्नोबिल के रिएक्टर नंबर-4 को बंद किया गया। लेकिन इंजीनियर ये नहीं जानते थे कि रिएक्टर के कोर में पानी बहुत कम है। रात एक बजकर 23 मिनट पर इंजीनियरों ने रिएक्टर कोर को पानी से भरने से पहले ही परीक्षण शुरू कर दिया। कम पॉवर में रिएक्टर ऑन करते ही कोर में जो भी थोड़ा-बहुत पानी था वो तुरंत भाप में बदल गया। पानी के बिना चेर्नोबिल रिएक्टर कोर में मौजूद फ्यूल एसेंबली की 50-50 मीटर लंबी यूरेनियम की 1661 छड़ें दहकने लगीं। चारों तरफ अलार्म बज उठे और चीफ इंजीनियर अनाटोली डिएटलॉफ समेत कंट्रोल रूम में मौजूद हर आदमी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। इंजीनयरों ने हड़बड़ी में कोर को पानी से भरने का काम शुरू कर दिया। पानी ने जैसे ही कोर में दहकती हुई यूरेनियम की छड़ों का स्पर्श किया, वो तुरंत भाप में बदल गया। चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर में प्रेशर कुकर जैसे हालात बन गए, जहां दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। दहकती हुई यूरेनियम की छड़ें पिघलने लगीं और रिएक्टर कोर में धमाके शुरू हो गए। रेडिएशन से सुलगती भाप का दबाव इस कदर तेज हो उठा कि यूरेनियम की हर छड़ के ऊपर लगे 350 किलो कंक्रीट से बने फ्यूल रॉड कैप उछलने लगे और देखते ही देखते एक जबरदस्त धमाके के साथ पूरा रिएक्टर कोर ही उड़ गया। इस धमाके की ताकत इतनी विनाशकारी थी कि रिएक्टर कोर के ऊपर लगा 1200 टन का सेफ्टी कैप उड़कर दूर जा गिरा। रिएक्टर की जगह एक खौफनाक स्याह गड्ढ़ा बन गया, जिससे रेडिएशन से भरी भाप तेज रफ्तार के साथ बाहर फूट रही थी।
 लेकिन असली आफत तो अब आने वाली थी। कुछ सेकेंड बाद इस भीषण धमाके से बने चेर्नोबिल रिएक्टर के उस स्याह गड्ढ़े से यूरेनियम और ग्रेफाइट जैसे दहकते हुए रेडियोएक्टिव अणुओं की एक बौछार सी फूट पड़ी। ये घातक बौछार वातावरण में एक हजार मीटर तक ऊपर उठती चली गई, जिससे रिएक्टर के ऊपर मौजूद बादल भी रेडिएशन के जहर से भर उठे। न्यूक्लियर ईंधन की इस खौफनाक बौछार ने करीब 700 टन रेडियोएक्टिव पदार्थों को वातावरण में यहां-वहां बिखेर दिया। चेर्नोबिल हादसे से वातावरण में फैल गया जहरीला रेडिएशन हिरोशिमा पर गिराए गए एटम बम से 100 गुना ज्यादा था। 
दुनिया को इस हादसे की पहली खबर दी समाचार एजेंसी नोवोस्टी के फोटो पत्रकार इगोर कॉस्टीन ने। कॉस्टीन वो पहले शख्स थे जो चेर्नोबिल हादसे के बाद सबसे पहले वहां हेलीकॉप्टर से पहुंचे। ये इगोर कॉस्टीन के कैमरे से ली गई हादसे के बाद चेर्नोबिल रिएक्टर की पहली तस्वीर है। चेर्नोबिल पावर प्लांट की जगह अब एक स्याह गहरा गड्ढ़ा नजर आ रहा था, जिससे लहराती हुई भाप ऊपर उठ रही थी। ये खौफनाक मंजर देखते ही कॉस्टीन समझ गए कि यहां कुछ बहुत बुरा घट चुका है। 
इगोर कॉस्टीन ने बाद में बताया कि उन्होंने रेडियो में एक लाइन की खबर सुनी थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर में कुछ गड़बड़ी आई है। उन्होंने तुरंत कैमरा संभाला और वहां जाकर हेलीकॉप्टर से सर्वे करने का फैसला किया। इगोर ने बताया, “ जल्दी ही हम चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर चार के ऊपर उड़ान भर रहे थे, हालात किस कदर संगीन थे, उस वक्त मुझे इसका जरा भी अंदाजा नहीं था। मैंने हेलीकॉप्टर की खिड़की खोल ली, जो एक बहुत बड़ी गलती थी। जब मैंने खिड़की खोली मुझे बाहर कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा। चेर्नोबिल रिएक्टर के अवशेष हमारे ठीक नीचे थे। वहां मौत का सन्नाटा छाया था। मैं इतने सदमे में था कि हेलीकॉप्टर की आवाज भी सुनाई नहीं दे रही थी। वहां कुछ नहीं था, बस एक स्याह खौफनाक गड्ढ़ा नजर आ रहा था।” 
27 अप्रैल 1986 की सुबह, प्रिप्यट शहर के बाशिंदे इस बात से बेखबर थे कि रात में कितनी बड़ी कयामत टूट चुकी है। लोग अपने-अपने काम में जुटे थे, बच्चे स्कूल जा रहे थे और आम शहरी जिनमें से ज्यादातर चेर्नोबिल रिएक्टर में काम करने वाले कर्मचारी ही थेस अपनी ड्यूटी पर जाने की तैयारी कर रहे थे। चेर्नोबिल हादसे के 30 घंटे बाद अधिकारियों ने चेर्नोबिल रिएक्टर से महज 3 किलोमीटर दूर मौजूद इस शहर की सुध ली। सुरक्षात्मक उपाय शुरू किए गए और थोड़ी ही देर में धड़धड़ाती हुई करीब एक हजार बसें वहां आ पहुंची। अधिकारियों ने लोगों को शहर तुरंत खाली करने का फरमान सुना दिया। लोगों को अपना सामान लेने के लिए महज दो घंटे का वक्त दिया गया। लोगों को केवल उतना ही सामान साथ ले जाने की इजाजत थी, जितना वो खुद उठा सकते थे। अधिकारियों के इस फरमान से शहर में बेचैनी फैल गई। कुछ ही देर में पूरा शहर बसों पर सवार हो गया। लोग अपनी जिंदगी की पूरी कमाई पीछे छोड़ अनजान मंजिल की ओर चल दिए, ये लोग फिर कभी दोबारा अपने घर वापस नहीं लौट सके। 
प्रिप्यट शहर खाली कराने के बाद पूर्व सोवियत संघ की सेना ने दुनिया का सबसे खतरनाक बचाव अभियान शुरू किया, जिसका मकसद था चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करना। सरकार ने अफगानिस्तान मोर्च से सबसे कुशल पायलट तलब किए और उन्हें चेर्नोबिल रिएक्टर के ऊपर हेलीकॉप्टर उड़ाने का आदेश दिया। सैनिकों के साथ ये पायलट हर उड़ान में बोरिक एसिड मिली 80 किलो बालू की बोरियां भी ले गए। कोशिश ये थी कि चेर्नोबिल रिएक्टर के कोर को कई टन बालू और बोरिक एसिड से भर दिया जाए, जो रेडिएशन को सोख सके। पहले दिन 110 टन बालू रिएक्टर के गड्ढ़े में गिराई गई और अगले दिन 300 टन। चेर्नोबिल के खौफनाक खुले मुंह के ऊपर रेडिएशन की मात्रा जानलेवा स्तर से भी कई गुना ज्यादा थी। लेकिन काम में जुटे सभी सैनिक इस बात को नहीं जानते थे। कई पायलटों ने तो चेर्नोबिल के ऊपर एक दिन में 33 उड़ानें भरीं। इसका नतीजा ये हुआ कि काम में जुटे कई सैनिक और पायलट जहरीली हवा से मारे गए और हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने लगे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को स्टील की मोटी चादरों से ढंकने और सील करने का काम तूफानी रफ्तार से शुरू कर दिया गया। काम में जुटे सभी लोग इस बात को समझ चुके थे कि उनके यहां से जिंदा बच निकलने की संभावना बहुत कम है। लेकिन फिर भी दूसरों की जान बचाने के लिए इन जांबाजों ने अपनी हस्ती दांव पर लगा दी। बस एक मामूली सर्जिकल मास्क पहनकर लोग रेडिएशन का सामना करने के लिए आ डटे।
चेर्नोबिल रिएक्टर को सील करने का वीडियो शूट करने के लिए रूसी सेना का फोटोग्राफर शेवचेन्को चेर्नोबिल पावर प्लांट के रिएक्टर नंबर तीन की छत पर चढ़ गया। वहां से उसने अपने कैमरे से शूट किया कि किस तरह लोग रेडिएशन से दहकती रेडियोएक्टिव ग्रेफाइट का हाथों से उठाकर ले जा रहे थे। काम पूरा हो जाने के बाद इस्तेमाल की गई हर चीज, दमकल गाड़ियां, क्रेन, हेलीकॉप्टर सब की सब वहीं की वहीं छोड़ दी गई। क्योंकि सबके सब जहरीले रेडिएशन से भर उठे थे। शेवचेन्को के कैमरे ने जो शूट किया वो शायद दुनिया का सबसे दुखद वीडियो है, क्योंकि चेर्नोबिल से लौटने के 10 दिन के भीतर ही इसे शूट करने वाले फोटोग्राफर शेवचेन्को और इसमें नजर आने वाले हर शख्स की मौत हो गई। इस वीडियो को जिस कैमरे से शूट किया गया था, उस कैमरे को भी शेवचेन्को के साथ कब्र में दफना दिया गया, क्योंकि वो भी रेडिएशन से भर उठा था।
पूर्व सोवियत संघ के सरकारी अखबार प्रावदा में कई दिन बाद इस हादसे की एक छोटी सी खबर छपी, वो भी पेज नंबर तीन के बॉटम में सिंगल कॉलम।
 चेर्नोबिल की बाहरी सीमा पर एक बोर्ड लगा है, जिसमें रूसी भाषा में यात्रियों के लिए सुरक्षित सफर की शुभकामनाएं लिखी हैं। लेकिन इससे आगे 30 किलोमीटर दायरे का पूरा इलाका और चेर्नोबिल के कामगारों का शहर प्रिप्यट वीरान पड़ा है। इस शहर में रेडिएशन की मात्रा इतनी ज्यादा है कि अगले 800 साल तक ये रहने के काबिल नहीं है। फिर भी इन नामुमकिन हालात में भी जिंदगी ने अपने लिए रास्ता बना लिया है।
साढ़े तीन लाख लोगों से ये शहर खाली करा लिए जाने के एक साल बाद करीब 400 बुजुर्गों का एक दल अपने शहर वापस लौट आया था। पुरानी यादों भरे अपने घर में जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने के लिए। 75 साल की ओल्गा गेवरिलेन्कोव भी उन्हीं में शामिल थीं। हैरानी की बात ये कि रेडिएशन से भरे इस शहर में ओल्गा मजे से रह रही हैं। प्रिप्यट शहर की जमीन का एक-एक कण घातक रेडिएशन से भरा होने के बावजूद ओल्गा इसी में अपने लिए सब्जियां उगाती हैं।
सर्दियों में जब बर्फबारी होती है तो प्रिप्यट शहर में रेडिएशन का स्तर काफी कम हो जाता है, क्योंकि बर्फ में ही ये खासियत होती है कि वो रेडिएशन को बेहतर तरीके से रोक सकती है। बर्फ से ढंके प्रिप्यट में अब कुछ टूरिस्ट भी आने लगे हैं। यहां आने वाले लोग दादी ओल्गा से जरूर मिलते हैं, और ओल्गा उन्हें गर्व से बताती हैं, “मैं घर के बाहर जमीन पर आलू और हर वो चीज पैदा कर लेती हूं, जो मुझे चाहिए। धरती जो मुझे देती है, मैं उसे खा लेती हूं। मैं नहीं डरती, मैं अब किसी चीज से नहीं डरती।” 
चेर्नोबिल हादसे की त्रासदी केवल इस शहर तक ही सीमित नहीं रही। रेडिएशन से भरे बादलों ने रेडियोएक्टिव कणों को दूर-दूर तक बिखेर दिया। यूक्रेन, बेलारूस, रूस और कीव रेडिएशन की चपेट में आ गए। चेर्नोबिल हादसे के निशान यूरोप के हर देश में देखे गए। लेकिन इस त्रासदी का सबसे अफसोसनाक पहलू ये रहा कि इतिहास की हर त्रासदी की तरह इसके शिकार भी सबसे ज्यादा बच्चे ही हुए। 

हादसे के वक्त चेर्नोबिल पावर प्लांट में करीब 3500 कर्मचारी मौजूद थे, उनमें से 56 कर्मचारी तुरंत मारे गए

3,50, 000 लोगों को हमेशा के लिए बेघर होना पड़ा

90 बच्चों समेत 4000 लोगों की मौत रेडिएशन से हुई

चेर्नोबिल हादसे में मारे गए लोगों की सही संख्या का अब तक पता नहीं चला

हादसे के बावजूद यूक्रेन सरकार ने चेर्नोबिल के दूसरे रिएक्टरों का इस्तेमाल जारी रखा

चेर्नोबिल न्यूक्लियर पावर प्लांट के सभी रिएक्टर साल 2000 से हमेशा के लिए बंद कर दिए गए 

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