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सोमवार, 28 दिसंबर 2009

हमारा कोई परमपिता नहीं

हमें और हमारे आसपास बिखरी इस अनमोल सृष्टि को बनाने-रचने वाला कोई भगवान, ईश्वर, खुदा या परमपिता नहीं है...बल्कि हम और हमारी दुनिया विकास के उस स्वाभाविक मंथन से उपजे हैं जो सृष्टि की रचना के बाद से अबतक जारी है...इस आदि और अनंत सत्य को जानकर-महसूसकर डार्विन को कैसा लगा होगा ? अच्छा-भला भगवान को पूजने और डरने वाला एक सच्चा ईसाई बीगल के सफर पर जाकर खामखां में सृष्टि और विकास के सत्य में उलझ गया।
हमारा कोई परमपिता नहीं, जिसने हमें रचा और सदआचरण के लिए अपनी बनाई सृष्टि में भेज दिया...इस शर्त के साथ कि तुम मुझे भूलोगे नहीं....और पूजा-पाठ, नमाज या आंसुओं में डूबी प्रार्थनाओं के साथ मुझे रोज याद करोगे, एहसानमंद रहोगे और हमेशा सजदे में झुके रहोगे।
हमारा कोई परमपिता नहीं...जो हर वक्त, हर कहीं मौजूद है और दुनिया के जर्रे-जर्रे कण-कण में मौजूद रहकर पर पल हम मूरख-खल-कामियों की हर गलत-सही हरकतों को देख रहा है...नहीं ऐसा कोई नहीं !
हमारा कोई परमपिता नहीं... प्रभु ज्यूस या राजा इंद्र की तरह आसमां की सल्तनत पर जिसका राज चलता है... बादलों के पार किसी खुदा, पैगंबर या भगवान की खुदाई नहीं, जैसा कि पूर्व सोवियतसंघ के ह्युमन स्पेस मिशन के शुरुआती दिनों में खुश्चेव ने कहा, कि हमारे अंतरिक्षयात्री धरती से बादलों के पार अंतरिक्ष गए, लेकिन उन्हें वहां कोई खुदा, कोई भगवान या कोई परमपिता नहीं दिखा।
कोई परमपिता नहीं... जो आसमान से धरती पर रेंगती अपनी लायक-नालायक औलादों को देख गर्व या अफसोस करता हो !
हमारा कोई परमपिता नहीं...हम किसी महानतम परमशक्ति के अंश नहीं, किसी ईंश्वर ने हमें नहीं रचा ! अपने दुखों और पापों से छुटकारा पाने के लिए हम जिनके आगे मुक्ति के लिए गिड़गिड़ाते थे वो एक छलावा था ! हमारा कोई परमपिता नहीं !
हमारा कोई परमपिता नहीं...हमारे अपार कष्टों को देख जिसकी आंखें छलक उठती हैं...और जो किसी दूसरे रूप में हमारे लिए मदद भेज अपनी करुणा का आशीर्वाद देता है!
हमारा कोई परमपिता नहीं...घोर संकट में हम जिसका नाम लेकर मदद के लिए पुकार सकें...किसी के संकट दूर करने के लिए हम सजदे में बैठकर आंसुओं से भरी प्रार्थना कर सकें !
हमारा कोई परमपिता नहीं...हम जिसके रेवड़ में शामिल भेड़ों की तरह हैं और जो किसी गड़रिए की तरह हमारी देखभाल और रक्षा करता है...हमारा कोई परमपिता नहीं !
हमारा कोई परमपिता नहीं...हम अनाथ हैं...आध्यात्मिक रूप से बेसहारा...हमारे घोर संकट कभी किसी परमपिता की कृपा ने नहीं दूर किए ! हम बस केवल अपने पिता के पुत्र और अपनी संतानों के पिता हैं...हम ही पिता हैं...हम ही परमपिता !
अपने संकटों, मुश्किलों के लिए खुद ही जिम्मेदार और खुद से ही जवाबदेह...आगे बढ़ने के लिए प्रयत्नशील, दिन-रात जद्दोजहद करके अपने परिवार के लिए तमाम साधन-संसाधन जुटाने के लिए जूझते कर्मयोगी ....इस दुनिया के बीचोबीच खड़ा बिल्कुल अकेला, बगैर किसी सहारे का मानव....बस एक मानव।
शायद, इसीलिए बीगल के सफर के बाद डार्विन धार्मिक नहीं रहे, उन्होंने गिरजाघर जाना और प्रार्थना करना सब छोड़ दिया और अपने ही विचारों में खो गए। ओरिजिन आफ स्पीशीज की 150वीं वर्षगांठ पर पेश है, वायेजर की ओर से मानवता के महानतम वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन को एक पुष्पांजलि।
संदीप निगम

डॉर्विन पर बनी फिल्म विवादित

दुनिया को सबसे पहले क्रमगत विकास का सिद्धांत देने वाले महान वैज्ञानिक चाल्र्स डार्विन पर बनी ब्रिटिश फिल्म विवाद बढ़ता नजर आ रहा है। क्रिएशन नाम की यह फिल्म इस कदर विवादास्पद बताई जा रही है कि कोई भी अमेरिकी डिस्ट्रीब्यूटर इसके अधिकार खरीदने के लिए नहीं है। बताया जा रहा है कि इसमें डार्विन के मानव के क्रमगत विकास के सिद्धांतों को इस तरह पेश किया गया है कि इससे अमेरिका के धार्मिक दर्शक भड़क सकते हैं।
फिल्म में विज्ञान की धारणाएं रखने वाले ब्रिटेन के पर्यावरणविद् डार्विन को आस्था और तकरें के बीच संघर्ष करते दिखाया गया है। इन्हीं तर्को के आधार पर उन्होंने 1859 में ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ द स्पीशीज’ नामक किताब लिखी थी। इस फिल्म को जॉन एमिल द्वारा निर्देशित किया गया है। इसे हाल ही में हुए टोरंटो फिल्म फेस्टिवल के शुभारंभ के लिए चुना गया था। अब तक इसे दुनियाभर में बेचा जा चुका है, लेकिन अमेरिका के वितरकों ने इसे खरीदने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि यह फिल्म देश में कोहराम मचा सकती है, क्योंकि जो वैज्ञानिक सिद्धांत डार्विन ने दिए थे, वे अमेरिकी धार्मिक सिद्धांतों से मेल नहीं खाते। मूवीगाइड.ओआरजी नामक एक क्रिश्चियन फिल्म रिव्यू वेबसाइट सहित कई लोगों ने तो डार्विन को जातिवाद भड़काने वाला, धर्माध और सामूहिक हत्याओं की विरासत सौंपने वाला व्यक्ति बताया है। साइट ने यह भी कहा है कि उनके 18वीं सदी में दिए गए कच्चे-पक्के सिद्धांतों ने एडॉल्फ हिटलर जैसे लोगों को प्रभावित किया और अत्याचार, अपराध, क्लोनिंग और जेनेरिक इंजीनियरिंग को बढ़ावा दिया। साइट ने उनके सिद्धांतों का भी खंडन किया है।
इस मामले पर फिल्म के प्रोडच्यूसर ऑस्कर विजेता जेरेमी थॉमस का कहना है कि मैं इस तरह के विवादों से हैरान हूं। मैंने सोचा नहीं था कि ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ द स्पीशीज’ के प्रकाशन के 150 साल बाद लोगों के मन में इस तरह की भावना है। मैं इस तरह के विवाद के खिलाफ हूं। उन्होंने कहा कि इस फिल्म के अधिकारअमेरिका में छोड़कर सभी देशों को बेचे जा चुके हैं। यहां न बिकने का कारण इतना है कि यह डार्विन पर बनी है। जिन लोगों ने इसे देखा है, वे इसे अब तक की सबसे बेहतर फिल्म बता रहे हैं। थॉमस ने कहा कि आश्चर्यजनक है कि कुछ अमेरिकी आज भी मानते हैं कि दुनिया मात्र छह दिनों में बनी थी, जो वैज्ञानिक आधार पर सही नहीं है। उन्होंने कहा कि हमने फिल्म को काफी संतुलित रूप से बनाने का प्रयास किया है। डार्विन ने कभी ऐसा नहीं कहा कि धर्मो को खत्म कर दो। मेरे अनुसार डार्विन इस फिल्म के नायक हैं। फिल्म में अभिनेता पॉल बेटैनी, ने डॉर्विन का किरदार निभाया है। वहीं उनकी पत्नी जेनिफर कोनेली ही इस फिल्म में भी उनकी पत्नी के किरदार में नजर आ रही हैं।

डार्विन का सिद्धांत जानवरों के लिए है

बचपन में डार्विन का सिद्धांत पढ़ा था, योग्यतम की उत्तरजीविता....सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट। दुनिया कुछ भी मानती रहे, मैंने हमेशा यही माना कि डार्विन का सिद्धांत जानवरों के लिए है...इंसानों के लिए नहीं। आखिर कैसे एक इंसान अपने सरवाइवल के लिए दूसरे की बलि ले सकता है? बॉयोलॉजी के सर के साथ इसको लेकर काफी बहस भी की, कुछ दलीलें उन्होंने दीं, कुछ मैंने। १२वीं की बोर्ड परीक्षा में मैंने सिर्फ इसलिए डॉर्विन के सिद्धांत की विशेषताएं नहीं लिखी क्योंकि मैं उसके सिद्धांत पर भरोसा नहीं करती थी।
पत्रकार कंचन पंत के एक लेख से साभार

डॉर्विन और धर्म – मंकी ट्रॉयल

डार्विन के विकासवाद का सिद्धांत, मज़हबों में प्राणी उत्पत्ति के खिलाफ था पर इसका विरोध ईसाई देशों में, खासकर अमेरिका में सबसे अधिक हुआ। यह अभी तक चल रहा है। वहां के अधिकतर राज्यों में, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को स्कूल में पढ़ाने के लिए वर्जित कर दिया गया था। १९२५ में, अमेरिका के टेनेसी राज्य ने, लगभग सर्वसम्मति से (७५ के विरूद्ध ५ वोटों से) कानून पास किया कि स्कूलों में डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत नहीं पढ़ाया जायेगा। डेटन (Dayton), टेनेसी राज्य का शहर है। यहां के लोगों ने सोचा कि उनके शहर को शोहरत दिलवाने का यह बहुत अच्छा मौका है। क्यों न यहीं पर इस कानून को चुनौती दी जाए।
जॉन टी. स्कोपस्, स्कूल में, जीव विज्ञान के अध्यापक थे। वे सरकारी स्कूल की नवीं कक्षा के विद्यार्थियों को डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत पढ़ाने के लिए तैयार हो गये। डार्विन के विकास वाद के सिद्धांत को पढ़ाने के लिए स्कोपस् के विरूद्व बीसवीं शताब्दी में दाण्डिक मुकदमा चला। यह दुनिया के चर्चित मुकदमों में से एक है। इसे मन्की ट्रायल (Monkey trial) भी कहा जाता है। विलियम हेनिंगस ब्रायन (Williams Hennenigs Bryan) डेमोक्रेटिक पार्टी से तीन बार अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए नामित हो चुके थे। वे बाईबिल पर विश्वास करते थे। उन्हें अभियोजन पक्ष की ओर से वकील नामित किया गया। उस समय क्लेरेंस डेरो (Clarence Darrow), अमेरिका के प्रसिद्घ वकीलों में से थे। वे नि:शुल्क बचाव पक्ष की तरफ से पैरवी करने आये। ब्रायन ने बहस शुरू करते समय कहा, 'The trial uncovers an attack on religion. If evolution wins, Christianity goes.' यह परीक्षण मज़हब पर हमला है। यदि विकासवाद जीतता है तो इसाइयत बाहर हो जायेगी।'
डैरो ने उत्तर दिया, 'Scopes is not on trial, civilisation is on trial.'यह मुकदमा स्कोपस् पर नहीं, लेकिन सभ्यता पर चल रहा है।
लोगों की सोच के मुताबिक, यह चर्चित मुकदमा बन गया। अमेरिका और इंगलैंड से प्रेस संवाददाता डेटन पहुँचकर प्रतिदिन इस मुकदमे के बारे में प्रेस विज्ञप्ति देने लग गये। यह मुकदमा अखबारों में छा गया।प्रतिदिन इसे इतने लोग देखने आते थे जिससे लगा कि शायद कोर्ट की पहली मंज़िल का फर्श टूट जाये; भीड़ के कारण गर्मी और उमस भी बढ़ गयी। अन्त में मुकदमे की सुनवायी, न्यायालय के लॉन में स्थांतरित की गयी। जज़, जूरी, और वकीलों के लिये उठा हुआ प्लैटफॉर्म बनाया गया। उस पर उनके बैठने के लिये जगह थी। उसके नीचे अखबार, टेलीग्राफ और रेडिओ के लोगों के बैठने की जगह थी। प्रतिदिन लगभग पांच हज़ार लोग उसे देखने और सुनने आते थे। इस तरह के नज़ारे के साथ, मंकी ट्रायल, जो कि न्यूयॉर्क टाइम के अनुसार इतिहास के सबसे प्रसिद्ध परीक्षण मुकदमा था, सुना गया। यह पहला मुकदमा था जिसमे कि अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता ने स्वयं अपने आपको गवाह के रूप में पेश किया। उसने यह गवाही दी कि बाइबिल में प्राणियों की उत्पत्ति की कथा सही है पर डैरो की प्रतिपृच्छा (cross examination) में उसकी सारी गवाही बेकार साबित हो गयी। लेकिन, अगले ही दिन , न्यायालय ने ब्रायन की सारी गवाही रिकार्ड पर लेने से, यह कहते हुऐ कर मना कर दिया, 'यह सवाल प्रासंगिक नहीं है कि,डार्विन का सिद्वान्त सही है अथवा नहीं। न्यायालय के अनुसार उनका केवल यह देखना है कि,क्या स्कोपस ने डार्विन का सिद्वान्त पढ़ाया अथवा नहीं।' यह बात तो स्वीकृत थी कि स्कोपस् ने डार्विन के विकासवाद के सिद्वान्त को पढ़ाया था। न्यायालय की इस आज्ञा के कारण स्कोपस् को तो सजा होनी थी। उसे सजा में, सौ डालर का दण्ड दे दिया गया। यह दण्ड जूरी ने न तय कर जज ने किया। स्कोपस् ने, टेनेसी सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवायी पांच न्यायधीशों ने की। फैसला आने में साल भर लगा तब तक एक न्यायाधीश की मृत्यु हो गयी। सबने सर्वसम्मति से यह फैसला इसलिये उलट दिया कि दण्ड जूरी को तय करना चाहिये था न कि जज को। आश्चर्य इस बात का है कि केवल एक न्यायाधीश ने कहा कि यह कानून असंवैधानिक है। दो अन्य न्यायाधीशों ने कानून को वैध माना। चौथे न्यायाधीश ने कानून को तो वैध माना पर कहा कि यह न यह विकासवाद के सिद्धांत को पढ़ाने से मना करता है और न ही स्कोपस् पर लागू होता है। स्कोपस् पर यह मुकदमा फिर से चलना चाहिए था पर न्यायाधीशों ने इसे फिर से चलाने पर मनाही कर दी। यही कारण था कि यह मुकदमा अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में नहीं गया।

डॉर्विन और धर्म – कुछ विचार

ईस्वी 1800 का काल यूरोप में नास्तिकों एवं अराजकत्ववादियों के लिये स्वर्णयुग था. लगभग सभी सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं को ध्वस्त करने की कोशिश वहां हर जगह हो रही थी. लेकिन उनको सबसे अधिक कठिनाई ईश्वर के अस्तित्व को नकारने में हो रही थी क्योंकि ऐसा करने के लिये उनके पास कोई ठोस धार्मिक, दार्शनिक, या वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं था. लेकिन चार्ल्स डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत ने उन सब की हैसियत बदल दी. ईश्वर के विरुद्ध वे जीत गये थे एवं वे ईश्वर की ताबूत में आखिरी कील ठोकने में सफल हो गये थे. अब सृष्टि के लिये एक ऊपरी शक्ति पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं थी. लेकिन क्या यह सच था?
विज्ञान हर चीज को प्रयोगों की मदद से देखता है, जांचता है एवं निष्कर्ष पर पहुंचता है. सिद्धांत कितना भी आकर्षक हो, कितने ही बडे व्यक्ति ने प्रतिपादित क्यों न किया हो, वह तब तक एक तथ्य नहीं बन पाता जब तक उसके लिये प्रायोगिक प्रमाण न मिल जाये. डार्विन के प्रसिद्ध सिद्धांत को लगभग 150 साल होने को आ रहे है. मजे की बात यह है कि सिद्धांत अभी भी सैद्धांतिक अवस्था में ही है. बल्कि कई वैज्ञानिकों ने यह मांग करना शुरू कर दिया है कि 150 वर्ष के अनुसंधानों के आधार पर इसका स्थान सिद्धांत से कुछ और नीचे पहुंचा देना चाहिए. कारण कई है: जिन फॉसिलों को प्रमाण माना गया था उन में से अधिकतर फर्जी निकले. जो असली निकले उनकी व्याख्या गलत निकली. कई तथाकथित प्रमाण छल पर अधारित थे, महज छद्म प्रमाण थे. कुल मिला कर यदि डार्विन के समय 100 प्रमाण थे तो अब उनकी संख्या 10 रह गई है. ईश्वर की ताबूत का आखिरी कील अभी नहीं ठोका गया है. अभी तो ताबूत तैयार ही नहीं हुआ है.
साभार – सारथी (http://sarathi.info/archives/896)
डार्विन ... की पुस्तक डिसेंट ऑफ़ मैन ने सचमुच मनुष्य के पृथक सृजन की बाइबिल -विचारधारा पर अन्तिम कील ठोक दी थी तब से बौद्धिकों मे डार्विन के विकास जनित मानव अस्तित्व की ही मान्यता है। इस मुद्दे पर मैं आपसे दो दो हाथ करने को तैयार हूँ। आप कृपया यह बताये कि डार्विन के किस तथ्य को बाइबिल वादियों ने ग़लत ठहराया है? एक एक कर कृपया बताएं ताकि इत्मीनान से उत्तर दिया जा सके।
साभार- अरविंद (http://www.blogger.com/profile/02231261732951391013)
डार्विन एक महानतम वैज्ञानिकों में से एक हैं। वे स्वयं पादरी बनना चाहते थे इसलिये उन्होने Origin of Species प्रकाशित करने में देर की। उनका जीवन संघर्षमय रहा। यदि आप Irving Stone की The Origin पुस्तक पढ़ें तो उनके बारे में सारे तथ्य सही परिपेक्ष में सामने आयेंगे।इस बारे में, अमेरिका में ... मुकदमा चला। पहला तो १९२० के दशक में था। इसमें फैसला Origin of Species के विरुद्ध रहा। यह अमेरिका के कानूनी इतिहास के शर्मनाक फैसलों में गिना जाता है। इसके बाद [के] ... फैसले ... Origin of Species के पक्ष में हुऐ हैं।
साभार- उन्मुक्त (http://unmukt-hindi.blogspot.com/2009/05/charles-darwin-religious-fervour.html)

विकासवाद के सिद्धांत पर बहस

विकासवाद के सिद्धांत ने दुनिया की सबसे प्रसिद्ध बहस को भी जन्म दिया। यह बहस ३० जून, १८६० को, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के संग्रहालय में थॉमस हक्सले और बिशप सैमुअल विलबफोर्स के बीच हुई। बिशप सैमुअल, डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत के विरोधी और हक्सले समर्थक थे। बिशप सैमुअल विलबफोर्सबिशप सैमुअल बहुत अच्छा बोलते थे। वे सोचते थे कि यह बहुत अच्छा तरीका है कि जब डार्विन के विकासवाद को सिद्धांत हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है। इस बहस में क्या बोला गया इसका रिकार्ड तो उपलब्ध नहीं है पर कहा जाता है कि बिशप ने हक्सले से प्रश्न पूछा, 'आप अपने को अपनी माता की तरफ अथवा पिता की तरफ से बंदरो का वंशज कहलाना पसन्द करेंगे।'हक्सले ने सोचा, ईश्वर ने ही बिशप को मेरे हाथ में सौंप दिया है उसने जवाब दिया, 'If..the question is put to me, would I rather have a miserable ape for a grandfather or a may highly endowed by nature and possessed of great means of influence, and yet who employs these faculties and that influence for the mere purpose of introducing ridicule into a grave scientific discussion... I unhesitatingly affirm my preference for the ape.'यदि मुझसे यह प्रश्न पूछा जाए कि क्या मैं बन्दरों से नाता जोड़ना चाहूँगा या ऐसे व्यक्ति से जो शक्तिशाली है, महत्वपूर्ण है, और वह वैज्ञानिक तथ्यों को मज़ाक के रूप में लेना चाहता है तो ऐसे व्यक्ति की जगह, मैं बन्दरों से रिश्ता जोड़ना चाहूँगा।प्रबुद्व लोगों के बीच यह बहस तभी समाप्त हो गयी जब हक्सले ने इसका उत्तर दिया। लेकिन कुछ लोग, सृजनवादी इसे मानने से इंकार करते हैं।

डार्विन का विकासवाद

चार्ल्स डार्विन का मत था कि प्रकृति क्रमिक परिवर्तन द्वारा अपना विकास करती है. विकासवाद कहलाने वाला यही सिद्धांत आधुनिक जीवविज्ञान की नींव बना. डार्विन को इसीलिए मानव इतिहास का सबसे बड़ा वैज्ञानिक माना जाता है.
डार्विन अपने अवलोकनों और विश्लेषणों से इस नतीजे पर पहुंचे थे कि सभी प्रजातियाँ मूलरूप से एकही जाति की उत्पत्ति हैं. परिस्थितियों के अनुरूप अपने आप को ढालने की विवशता प्रजाति-विविधता को जन्म देती है. 1859 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में डार्विन ने यही उद्घोष किया है. सिद्धांत था तो बहुत नया और क्रांतिकारी, लेकिन सारी कसौटियों पर सही उतरता रहा और आज विज्ञान का एक सर्वमान्य सिद्धांत बन गया है. जेम्स वॉटसन आनुवंशिक कोडधारी डीएनए की ऐंठनदार सीढ़ी जैसी संरचना के, जिसे डबलहेलिक्स स्ट्रक्चर कहते हैं, सहखोजी हैं और मानते हैं कि आनुवंशिकी भी पग-पग पर डार्विन की ही पुष्टि करती लगती हैः "मेरे लिए तो चार्ल्स डार्विन इस धरती पर जी चुका सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है."
जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक ने 1953 मे एक ऐसी खोज की, जिससे चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रतिपादित अधिकतर सिद्धांतों की पुष्टि होती है. उन्होंने जीवधारियों के भावी विकास के उस नक्शे को पढ़ने का रासायनिक कोड जान लिया था, जो हर जीवधारी अपनी हर कोषिका में लिये घूमता है. यह नक्शा केवल चार अक्षरों वाले डीएनए-कोड के रूप में होता है. अपनी खोज के लिए 1962 में दोनो को चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला था. एडवर्ड ऑसबर्न विल्सन आजकल के सबसे जानेमाने विकासवादी वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं और वे भी डार्विन के आगे सिर झुकाते हैं: "हर युग का अपना एक मील का पत्थर होता है. पिछले 200 वर्षों के आधुनिक जीवविज्ञान का मेरी दृष्टि में मील का पत्थर है 1859, जब जैविक प्रजातियों की उत्पत्ति के बारे में डार्विन की पुस्तक प्रकाशित हुई थी. दूसरा मील का पत्थर है 1953, जब डीएनए की बनावट के बारे में वॉटसन और क्रिक की खोज प्रकाशित हुई."
डार्विन तथा वॉटसन और क्रिक के बीच एक और ऐसा वैज्ञानिक रहा है, जिसने आधुनिक जीवविज्ञान पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है. वह था ऑस्ट्रिया का एक ईसाई भिक्षु ग्रेगोर मेंडल. वह डार्विन का समकालीन था. विज्ञान-इतिहासकार एरन्स्ट पेटर फ़िशर बताते हैं कि मेंडल मटर की नस्लों के बीच वर्णसंकर के प्रयोग कर रहा था और जो कुछ नया देखता- पाता था, उससे डार्विन को भी अवगत कराता थाः "डार्विन आनुवंशिकी के नियम नहीं जानता था. यह तो मालूम है कि डार्विन को इस समाचारपत्र की एक प्रति मिली थी, लेकिन यह भी मालूम है कि उसने उसे खोला ही नहीं था. यानी, उसे नहीं पता था कि किन नियमों के अनुसार आनुवंशिक गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलते हैं और न ही इस बारे में कोई कल्पना कर सकता था."
ग्रेगोर मेंडल तथा वॉटसन और क्रिक की जोड़ी के कार्यों की बलिहारी से कुलिंग पक्षिय़ों वाली वह पहेली भी हल की जा सकी, जिसने डार्विन को बड़ी उलझन में डाल रखा था. उसने गालापोगोस द्वीपों पर देखा कि वहाँ तरह-तरह के पक्षी रहते हैं. किसी की चोंच छोटी और मोटी है, वह मेवों और बीजों पर जीता है, तो किसी की पतली और लंबी और वह फूलों के भीतर दूर तक अपनी चोंच उतार कर रसपान करता है. उसे लगा कि इन सभी पक्षियों की पूर्वज कोई एक ही प्रजाति रही होनी चाहिये. उन के बीच सारे अंतर समय की देन हैं. डार्वन के समय डीएनए, जीन या क्रोमोसोम जैसे शब्द प्रचलन में नहीं थे.
इस बीच वैज्ञानिक जानते हैं कि डीएनए को न केवल पढ़ा जा सकता है, बल्कि देखा भी जा सकता है कि जीवधारियों का रूप-रंग, आकार-प्रकार किस तरह बदलता है. जब भी कोई जीन सक्रिय होता है, वह कोषिका के भीतर अपने ढंग का कोई विशेष प्रोटीन पैदा करता है. उदाहरण के लिए यदि BMP4 नामके प्रोटीन को पैदा करने वाला जीन सक्रिय होता है, तो कुलिंग पक्षी की चोंच छोटी और चौड़ी बनेगी. लेकिन, यदि वह जीन सक्रिय होता है, जो काल्मोड्यूलीन नाम का प्रोटीन पैदा करता है, तो Bildunterschrift: चोंच लंबी और पतली होगी. वैज्ञानिक अब यह भी जानते हैं कि विकासवाद जीनों में परिवर्तन से नहीं, बल्कि उनके सक्रिय या निष्क्रिय होने के बल पर चलता है. इसीलिए कोई ऐसा जीन भी नहीं होता, जो ठेठ मानवीय जीन कहा जा सके. हमारी हर कोषिका में क़रीब 21 हज़ार जीन होते हैं. क़रीब इतने ही चूहे में भी होते हैं. यानी नयी प्रजाति की उत्पत्ति के लिए प्रकृति को नए जीन नहीं पैदा करने पड़ते. नयी प्रजाति के लिए केवल सक्रिय और निष्क्रिय जीनों के बीच नया जोड़तोड़ काफ़ी होता है. 1995 में चिकित्सा विज्ञान की नोबेल पुरस्कार विजेता रही जर्मनी की क्रिस्टियाने न्युइसलाइन-फ़ोलहार्ड इसी क्षेत्र में शोधकार्य कर रही हैं: "सबसे मूल ग़लती यह होती है कि लोग सोचते हैं कि यदि हम कुछ समझ गये हैं, तो उसे बदल भी सकते हैं. सच्चाई यह है कि यदि मुझे किसी आदमी की किसी विशेषता वाले किसी जीन का पता है, तो मैं उसे इतने भर से बदल नहीं सकती और मैं जीन-अंतरित कोई नया आदमी भी नहीं बना सकती. कोई प्राणी बहुत ही जटिल संरचना होता है. बिना किसी अवांछित अनुषंगी प्रभाव के उसके जीनों में जानबूझ कर हेराफेरी करना संभव नहीं है."
पहली क्लोन भेंड़ डॉली के जनक कहलाने वाले इयान विल्मट इसे नहीं मानेंगे, हालाँकि इस बीच उन्होंने यह ज़रूर मान लिया है कि, उन्होंने नहीं, उनके साथी कीथ कैंपबेल ने 1996 में डॉली की क्लोनिंग की थी. अमेरिका के जीवरसायनज्ञ क्रैग वेंटर भी इसे नहीं मानेंगे. उनकी कंपनी सेलेरा जीनॉमिक्स ने मानवीय जीनोम को क्रमबद्ध किया था. भावी विकास के बारे में उनके विचार बहुत ही अफ़लातूनी हैं: "मेरी बात साइंस फ़िक्शन जैसी लग सकती है, लेकिन डिज़ाइन और जेनेटिकल सेलेक्शन अर्थात आनुवंशिक चयन भविष्य में डार्विन के विकासवाद की जगह लेंगे. " यदि ऐसा होता भी है, तब भी इससे चार्ल्स डार्विन की 200 वर्षों से चल रही ख्याति की महानता कम नहीं होती.

साभार - यूडिथ हार्टल / राम यादव

डॉर्विन की कहानी

चार्ल्स डारविन का जन्म, दो सौ साल पहले, १२ फरवरी, १८०९ को, श्रेस्बरी (Shrewsbury) में हुआ था। उनके पिता चिकित्सक थे। आठ साल की उम्र में उनकी मां का देहान्त हो गया। अगले छ: साल उन्होंने विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई की, जहां वे एक औसत विद्यार्थी रहे।
१६ साल की उम्र में उन्होंने चिकित्सा पढ़नी शुरू की पर यह उन्हें रास नहीं आयी। १८ साल की उम्र में, पिता के कहने पर, आध्यात्मविद्या (Theology) की शिक्षा लेकर पादरी बनने की सोची पर यह न हो सका। उन्हें प्राकृतिक इतिहास (Natural History) में रूचि थी। इसलिए उन्होंने, इसकी पढ़ाई, अपने वनस्पति विज्ञान (Botany) के प्रोफेसर, जान स्टीवेन्स् हेन्सलॉ (John Stevens Henslow) की देख-रेख में शुरू की। २२ वर्ष की उम्र में, डार्विन के पास कोई भी पेशा नहीं था उसका भविष्य अंधकारमय था, उसके समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें। तभी उन्हें अपने प्रोफेसर हेन्सलॉ के कारण, एक पत्र मिला - 'क्या आप एच.एम.एस बीगल नामक पानी की जहाज पर प्राकृतिक विशेषज्ञ के रुप में दुनिया की सैर करना चाहेंगे।' डार्विन ने इसे स्वीकार कर लिया। इस समुद्र यात्रा न केवल उसके जीवन की पर दुनिया की ही दिशा बदल दी। यह समुद्र यात्रा २७ दिसम्बर १८३१ को शुरू हुई। इसे दो साल में समाप्त होना था पर इसे लगभग पांच साल लगे। यह २ अक्टूबर १८३६ में समाप्त हुई। समुद्र यात्रा के समय, डार्विन परम्परा वादी थे और अक्सर बाईबिल को उद्घरित करते थे लेकिन समुद्र यात्रा समाप्त होते- होते यह बदलने लगा। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से उठने लगा। उसे लगा प्राणियों के उत्पत्ति के बारे में बाईबिल में लिखी कथा सच नहीं है। बाद के जीवन में उन्होंने चर्च भी जाना बन्द कर दिया। डार्विन को इस बात की चिन्ता लगने लगी कि मज़हब का, किस तरह से प्रचार किया जाता है। उसे लगने लगा कि यह लोगों को तर्क या तथ्य से नहीं, पर बचपन से ही घुटी पिला कर किया जाता है। जिसके कारण वे अपने बाद के जीवन में उससे बाहर नहीं निकल पाते हैं। डार्विन का बड़ा पुत्र विलियम, रग्बी स्कूल में पढ़ता था। यह स्कूल मज़हबी शिक्षा पर जोर देता था। डार्विन को लगा कि वहां जाकर उसका कौतूहल समाप्त हो रहा है, वह मंद हो रहा है - इसलिए उसने अपने बाकी चार पुत्रों को ग्रामर स्कूल में डाला। यह स्कूल कम जाने माने स्कूल थे पर वहां विज्ञान का वातावरण था।

बीगल का सफर

एचएमएस बीगल, पानी के जहाज ने, तीन समुद्री यात्राएं कीं। इसकी पहली यात्रा में, प्रिंगल स्टोकस् (Pringle Stokes) इसके कप्तान थे। शायद अच्छा साथ न होने के कारण, वे अकेलपन और उदासी के शिकार हो गये। उन्होंने खुदकुशी कर ली। तब रॉबर्ट फिट्ज़रॉय (Robert FitzRoy) को उसका कप्तान बनाया गया था।
बीगल की दूसरी यात्रा में रॉबर्ट ही इसके कप्तान थे। वे जगहों को समझने और सर्वे करने के लिये, किसी पदार्थविज्ञानी (Naturalist) को अपने साथ ले जाना चाहते थे। पहले कप्तान की अकेलेपन और उदासी के कारण मृत्यु ने भी, उन्हें किसी को साथ ले जाने की बात को बल दिया। इसलिये दूसरी यात्रा में डार्विन को, जाने का मौका मिला। यह समुद्र यात्रा २७ दिसम्बर १८३१ को शुरू हुई। इसे दो साल में समाप्त होना था पर इसे लगभग पांच साल लगे। यह २ अक्टूबर १८३६ में समाप्त हुई। इस यात्रा के दौरान, डार्विन गैलापगॉस द्वीप समूह (Galápagos Islands) पर भी गये। यह द्वीप समूह प्रशान्त महासागर में इक्वेडर (Ecuador) से लगभग १००० (९७२) किलो-मीटर पश्चिम पर है। यहाँ पर पाये जाने वाले पक्षी और जानवर दक्षिण अमेरिका में पाये जाने वाले पक्षी और जानवरों से कुछ भिन्न थे पर उनमें महत्वपूर्ण समानता भी थी। डार्विन ने गैलापगॉस द्वीप समूह पर, १३ तरह की चिड़ियों को एकत्र किया था। उनके अध्ययन से पता चला कि वे सब फिंचेस् (Finches) (छोटी गाने वाली चिड़ियां) हैं पर उनकी चोंच अलग-अलग तरह की थी।

नेचुरल सेलेक्शन और सर्वाइवल आफ फिटेस्ट

डॉर्विन सोचने लगे कि फिंचेस् की चोंच क्यों अलग हो गयी, इसका क्या कारण था? क्या इन फिंचेस् के पूर्वज एक ही थे और समय बीतने के साथ, नये वातावरण में, खाना प्राप्त करने की सुविधानुसार ढ़ालने के कारण, उनकी चोंच ने अलग-अलग रूप ले लिया? डार्विन को लगा कि यदि, फिंचेस् में बदलाव आ सकता है तो यह सारे जैविक जीवन में, प्राणी जगत में क्यों नहीं हो सकता है। क्या सारी जातियों, उपजातियों का विकास (Species) एक ही पूर्वज (common ancestor) से हुआ है? क्या जातियों, उपजातियों में बदलाव प्रकृति के सांयोगिक उत्परिवर्तन (chance mutation) के कारण हुआ, जिसमें प्राकृतिक वरण (natural selection) का महत्वपूर्ण योगदान रहा, और वही जीवित रहा जो उत्तरजीविता के लिए योग्यतम (survival of fittest) था?१८३८ में, डार्विन ने, थॉमस मालथुस (Thomas Malthus) की लिखी पुस्तक 'ऎसे ऑन द प्रिन्सिपल आफ पॉप्युलेशन' (Essay on the principle of Population) पढ़ी। इस पुस्तक ने इस सिद्घान्त को पक्का किया। समुद्र यात्रा के दौरान इकट्ठा किये पक्षी और जानवरों के नमूने भी इसी सिद्वान्त की तरफ इंगित करते थे। लेकिन, इस सिद्वान्त के बाइबिल में दिये प्राणियों की उत्पत्ति (Book of Genesis) के विरूद्व होने के कारण, डार्विन इसे प्रतिपादित करने में चुप रहे पर बाइबिल और भगवान के बारे में उनकी सोच बदल गयी। उनका इन पर से विश्वास उठने लगा। उन्होंने, बाद में, चर्च जाना भी बन्द कर दिया। १८३९ में, डार्विन ने समुद्र यात्रा के संस्मरण 'द वॉयज ऑफ बीगल' (The voyage of Beagle) नाम से लिखी। इस पुस्तक ने उसे प्रसिद्घि दिलवायी। फिर भी, डार्विन प्राणियों की उत्पत्ति के सिद्घान्त को प्रकाशित करने की हिम्मत नहीं जुटा पाये। इसका एक कारण यह भी था कि उसकी पत्नी कट्टर इसाई थीं, वह उसे दुखी नहीं करना चाहते थे। किन्तु एक १८ जून १८५८ में मिले एक पत्र ने, सब कुछ बदल दिया।

वो निर्णायक चिट्ठी

डार्विन को १८ जून १८५८ को मिला पत्र, अल्फ्रेड रसल वॉलेस ने लिखा था। वॉलेस ने अपने पत्र में, प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में उसी सिद्धांत को लिखा था जिस पर डार्विन स्वयं पहुँचे थे। लेकिन, वॉलेस के पास, इसके लिए तथ्य नहीं थे। इस सिद्धांत को विश्वसनीयता का जामा पहनाने के लिए, तथ्य डार्विन के ही पास थे। १ जुलाई १८५८ को, डार्विन और वॉलेस के संयुक्त नाम से, एक पेपर लंदन की लिनियन सोसाइटी में पढ़ा गया। इस पेपर में इस सिद्धांत की व्याख्या की गयी थी। मोटे तौर पर यह बताता है -'Evolution is result of chance mutation and natural selection, where survival of the fittest played crucial role.'प्राणी जगत का विकास संयोगिक उत्तपरिर्वन, प्राकृतिक वरण, और योग्यतम की उत्तर जीविका पर आधारित है। डार्विन बेहतरीन व्यक्तित्व के भी मालिक थे डार्विन के लिए यह आसान था कि वह वॉलेस का पत्र छिपा जाते और तथ्यों के साथ सिद्धांत को अपने नाम से प्रकाशित कर देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। डार्विन के विचार गुलामी के भी विरूद्ध थे जबकि बीगल के कप्तान फिट्ज़रॉय की राय में यह गलत नहीं था। वे इसकी सफाई देते थे। फिट्ज़रॉय के इन विचारों के लिये, डार्विन ने उसकी निन्दा भी की। इसके कारण बीगल से उसकी नौकरी जाते, जाते बची। ब्राज़ील में उन्हें वहां के जंगलों की सुंदरता तो भायी पर गुलामी ने दुखी किया। वहां से निकलने के बाद डार्विन ने कहा - 'I thank God I shall never again visit a slave country ' मैं भगवान को धन्यवाद दूँगा कि मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े।
साभार - उन्मुक्त (http://unmukt-hindi.blogspot.com/2009/05/charles-darwin-religious-fervour.html)