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सोमवार, 28 दिसंबर 2009

हमारा कोई परमपिता नहीं

हमें और हमारे आसपास बिखरी इस अनमोल सृष्टि को बनाने-रचने वाला कोई भगवान, ईश्वर, खुदा या परमपिता नहीं है...बल्कि हम और हमारी दुनिया विकास के उस स्वाभाविक मंथन से उपजे हैं जो सृष्टि की रचना के बाद से अबतक जारी है...इस आदि और अनंत सत्य को जानकर-महसूसकर डार्विन को कैसा लगा होगा ? अच्छा-भला भगवान को पूजने और डरने वाला एक सच्चा ईसाई बीगल के सफर पर जाकर खामखां में सृष्टि और विकास के सत्य में उलझ गया।
हमारा कोई परमपिता नहीं, जिसने हमें रचा और सदआचरण के लिए अपनी बनाई सृष्टि में भेज दिया...इस शर्त के साथ कि तुम मुझे भूलोगे नहीं....और पूजा-पाठ, नमाज या आंसुओं में डूबी प्रार्थनाओं के साथ मुझे रोज याद करोगे, एहसानमंद रहोगे और हमेशा सजदे में झुके रहोगे।
हमारा कोई परमपिता नहीं...जो हर वक्त, हर कहीं मौजूद है और दुनिया के जर्रे-जर्रे कण-कण में मौजूद रहकर पर पल हम मूरख-खल-कामियों की हर गलत-सही हरकतों को देख रहा है...नहीं ऐसा कोई नहीं !
हमारा कोई परमपिता नहीं... प्रभु ज्यूस या राजा इंद्र की तरह आसमां की सल्तनत पर जिसका राज चलता है... बादलों के पार किसी खुदा, पैगंबर या भगवान की खुदाई नहीं, जैसा कि पूर्व सोवियतसंघ के ह्युमन स्पेस मिशन के शुरुआती दिनों में खुश्चेव ने कहा, कि हमारे अंतरिक्षयात्री धरती से बादलों के पार अंतरिक्ष गए, लेकिन उन्हें वहां कोई खुदा, कोई भगवान या कोई परमपिता नहीं दिखा।
कोई परमपिता नहीं... जो आसमान से धरती पर रेंगती अपनी लायक-नालायक औलादों को देख गर्व या अफसोस करता हो !
हमारा कोई परमपिता नहीं...हम किसी महानतम परमशक्ति के अंश नहीं, किसी ईंश्वर ने हमें नहीं रचा ! अपने दुखों और पापों से छुटकारा पाने के लिए हम जिनके आगे मुक्ति के लिए गिड़गिड़ाते थे वो एक छलावा था ! हमारा कोई परमपिता नहीं !
हमारा कोई परमपिता नहीं...हमारे अपार कष्टों को देख जिसकी आंखें छलक उठती हैं...और जो किसी दूसरे रूप में हमारे लिए मदद भेज अपनी करुणा का आशीर्वाद देता है!
हमारा कोई परमपिता नहीं...घोर संकट में हम जिसका नाम लेकर मदद के लिए पुकार सकें...किसी के संकट दूर करने के लिए हम सजदे में बैठकर आंसुओं से भरी प्रार्थना कर सकें !
हमारा कोई परमपिता नहीं...हम जिसके रेवड़ में शामिल भेड़ों की तरह हैं और जो किसी गड़रिए की तरह हमारी देखभाल और रक्षा करता है...हमारा कोई परमपिता नहीं !
हमारा कोई परमपिता नहीं...हम अनाथ हैं...आध्यात्मिक रूप से बेसहारा...हमारे घोर संकट कभी किसी परमपिता की कृपा ने नहीं दूर किए ! हम बस केवल अपने पिता के पुत्र और अपनी संतानों के पिता हैं...हम ही पिता हैं...हम ही परमपिता !
अपने संकटों, मुश्किलों के लिए खुद ही जिम्मेदार और खुद से ही जवाबदेह...आगे बढ़ने के लिए प्रयत्नशील, दिन-रात जद्दोजहद करके अपने परिवार के लिए तमाम साधन-संसाधन जुटाने के लिए जूझते कर्मयोगी ....इस दुनिया के बीचोबीच खड़ा बिल्कुल अकेला, बगैर किसी सहारे का मानव....बस एक मानव।
शायद, इसीलिए बीगल के सफर के बाद डार्विन धार्मिक नहीं रहे, उन्होंने गिरजाघर जाना और प्रार्थना करना सब छोड़ दिया और अपने ही विचारों में खो गए। ओरिजिन आफ स्पीशीज की 150वीं वर्षगांठ पर पेश है, वायेजर की ओर से मानवता के महानतम वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन को एक पुष्पांजलि।
संदीप निगम

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