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रविवार, 19 सितंबर 2010

आइंस्टीन का वो मशहूर खत


3 जनवरी 1954 को आइंस्टीन ने फिलॉसफर एरिक गुटकिंड को एक खत लिखा, जो आगे चलकर बहुत मशहूर हो गया। दरअसल एरिक ने अपनी नई किताब - Choose Life: The Biblical Call to Revolt आइंस्टीन को पढ़ने के लिए भेजी थी, जिसके जवाब में आइंस्टीन ने चिट्ठी में अपने व्यक्तिगत विचार अभिव्यक्त किए थे। ये बात कम ही लोगों को मालूम है कि जन्म से यहूदी आइंस्टीन को इस्राइल से द्वितीय राष्ट्रपति बनने का आमंत्रण मिला था, जिसे उन्होंने एकदम से ठुकरा दिया था, क्योंकि वो यहूदी धर्म की इस बात में यकीन नहीं रखते थे कि - यहूदी ईश्वर की सबसे प्रिय संतानें हैं। ऐसे ही एक दूसरे अवसर पर जब आइंस्टीन येरुशलेम गये थे, तो उन्होंने वहां की प्रसिद्ध 'वेलिंग वॉल' पर कई युवा यहूदियों को प्रार्थना करते, नाक रगड़ते और रोते हुए देखा। ये देखकर आइंस्टीन ने कहा - ये भावुक नौजवान बीते हुए वक्त से दीवानगी की हद तक चिपके हुए हैं, इन्होंने भूतकाल को गले से लगा रखा है, जबकि भविष्य की ओर पीठ कर रखी है। प्रस्तुत है 3 जनवरी 1954 को फिलॉसफर एरिक गुटकिंड को जर्मन भाषा में लिखे आइंस्टीन के खत का हिंदी अनुवाद -
"....भगवान शब्द मेरे लिए मानवीय कमजोरी की अभिव्यक्ति से ज्यादा कुछ और नहीं। बाईबिल, आदरणीय लेकिन बचकानी कहानियों के संग्रह से ज्यादा कुछ और नहीं है। और इसकी कोई भी व्याख्या, चाहे वो कितनी भी परिष्कृत क्यों न हो, इनके बारे में मेरे विचार नहीं बदल सकती। इनकी व्याख्याएं विविधताओं से भरी हैं और मूल लेखन से इनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरे सभी धर्मों की तरह यहूदी धर्म भी बचकाने अंधविश्वास के अवतार से ज्यादा कुछ और नहीं है। यहूदी लोग, जिनमें गर्व के साथ मैं भी शामिल हूं और जिनकी मानसिकता से मैं गहराई से जुड़ा हुआ हूं, उनमें ऐसी कोई विशिष्टता नहीं है जो दूसरे लोगों में न हो। मैं अगर अपने अनुभव की बात करूं तो यहूदी लोग दूसरे लोगों से किसी भी तरह बेहतर नहीं हैं। हालांकि वो सत्ता विहीन हैं, इसलिए संवेदनाएं उनके साथ हैं, अगर इस बात को छोड़ दिया जाए तो मैं उनमें ऐसी कोई खास बात नहीं देखता जो इस धार्मिक धारणा को सही साबित करता हो कि यहूदी लोग ईश्वर की सबसे प्यारी संतानें हैं।
सामान्य तौर पर मैं इसे काफी दुखदायी पाता हूं कि एक तरह आप विशिष्ट होने का दावा करते हैं, और दूसरी ओर आप गर्व के बनावटी दोहरे आवरणों के बीच बचने और छिपने की कोशिश करते हैं। इनमें पहला आवरण बाहरी है जिसमें आप एक व्यक्ति होते हैं, जबकि दूसरा आवरण आंतरिक है जिसमें आप यहूदी हो जाते हैं। अब मैं खुले तौर पर कहता हूं कि जहां तक बौद्धिक प्रतिबद्धता का सवाल है, हमारे विचार नहीं मिलते, लेकिन मानवीय व्यवहार की मूलभूत बातों पर हमारे विचार एक-दूसरे के काफी करीब हैं। इसलिए मैं समझता हूं कि अगर हम वास्तविक मुद्दों की बात करें तो हम एक-दूसरे को कहीं बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।"

एक दोस्ताना शुक्रिया और शुभकामनाओं के साथ

आपका

ए.आइंस्टीन

मुझे कोई समझाए कि ये दुनिया आखिर भगवान ने कैसे बनाई : आइंस्टीन

मैं ये जानना चाहता हूं कि ये दुनिया आखिर भगवान ने कैसे बनाई। मेरी रुचि किसी इस या उस धार्मिक ग्रंथ में लिखी बातों पर आधारित किसी ऐसी या वैसी अदभुत और चमत्कारिक घटनाओं को समझने में नहीं है। मैं भगवान के विचार समझना चाहता हूं (1)। किसी व्यक्तिगत भगवान का आइडिया एक एंथ्रोपोलॉजिकल कॉन्सेप्ट है, जिसे मैं गंभीरता से नहीं लेता (2)। अगर लोग केवल इसलिए भद्र हैं, क्योंकि वो सजा से डरते हैं, और उन्हें अपनी भलाई के बदले किसी दैवी ईनाम की उम्मीद है, तो ये जानकर मुझे बेहद निराशा होगी कि मानव सभ्यता में दुनियाभर के धर्मों का बस यही योगदान रहा है।
मैं ऐसे किसी व्यक्तिगत ईश्वर की कल्पना भी नहीं कर पाता तो किसी व्यक्ति के जीवन और उसके रोजमर्रा के कामकाज को निर्देशित करता हो, या फिर वो, जो सुप्रीम न्यायाधीश की तरह किसी स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हो और अपने ही हाथों रचे गए प्राणियों के बारे में फैसले लेता हो। मैं ऐसा इस सच्चाई के बावजूद नहीं कर पाता कि आधुनिक विज्ञान के कार्य-कारण के मशीनी सिद्धांत को काफी हद तक शक का फायदा मिला हुआ है ( आइंस्टीन यहां क्वांटम मैकेनिक्स और ढहते नियतिवाद के बारे में कह रहे हैं)। मेरी धार्मिकता, उस अनंत उत्साह की विनम्र प्रशंसा में है, जो हमारी कमजोर और क्षणभंगुर समझ के बावजूद थोड़ा-बहुत हम सबमें मौजूद है। नैतिकता सर्वोच्च प्राथमिकता की चीज है...लेकिन केवल हमारे लिए, भगवान के लिए नहीं (3)। 
ऐसी कोई चीज ईश्वर कैसे हो सकती है, जो अपनी ही रचना को पुरस्कृत करे या फिर उसके विनाश पर उतारू हो जाए। मैं ऐसे ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता जिसके उद्देश्य में हम अपनी कामनाओं के प्रतिरूप तलाशते हैं, संक्षेप में ईश्वर कुछ और नहीं, बल्कि छुद्र मानवीय इच्छाओं का ही प्रतिबिंब है। मैं ये भी नहीं मानता कि कोई अपने शरीर की मृत्यु के बाद भी बचा रहता है, हालांकि दूसरों के प्रति नफरत जताने वाले कुछ गर्व से भरे डरावने धार्मिक विचार आत्माओं के वजूद को साबित करने में पूरी ताकत लगा देते हैं(4)।
मैं ऐसे ईश्वर को तवज्जो नहीं दे सकता जो हम मानवों जैसी ही अनुभूतियों और क्रोध-अहंकार-नफरत जैसी तमाम बुराइयों से भरा हो। मैं आत्मा के विचार को कभी नहीं मान सकता और न ही मैं ये मानना चाहूंगा कि अपनी भौतिक मृत्यु को बाद भी कोई वजूद में है। कोई अपने वाहियात अभिमान या किसी धार्मिक डर की वजह से अगर ऐसा नहीं मानना चाहता, तो न माने। मैं तो मानवीय चेतना, जीवन के चिरंतन रहस्य और वर्तमान विश्व जैसा भी है, उसकी विविधता और संरचना से ही खुश  हूं। ये सृष्टि एक मिलीजुली कोशिश का नतीजा है, सूक्ष्म से सूक्ष्म कण ने भी नियमबद्ध होकर बेहद तार्किक ढंग से एकसाथ सम्मिलित होकर इस अनंत सृष्टि को रचने में अपना पुरजोर योगदान दिया है। ये दुनिया-ये ब्रह्मांड इसी मिलीजुली कोशिश और कुछ प्राकृतिक नियमों का उदघोष भर है, जिसे आप हर दिन अपने आस-पास बिल्कुल साफ देख और छूकर महसूस कर सकते हैं (5)।
वैज्ञानिक शोध इस विचार पर आधारित होते हैं कि हमारे आस-पास और इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटता है उसके लिए प्रकृति के नियम ही जिम्मेदार होते हैं। यहां तक कि हमारे क्रियाकलाप भी इन्हीं नियमों से तय होते हैं। इसलिए, एक रिसर्च साइंटिस्ट शायद ही कभी ये यकीन करने को तैयार हो कि हमारे आस-पास की रोजमर्रा की जिंदगी में घटने वाली घटनाएं किसी प्रार्थना या फिर किसी सर्वशक्तिमान की इच्छा से प्रभावित होती हैं (6)।
सच्चाई तो ये है कि मेरे धार्मिक विश्वासों के बारे में आप जो कुछ भी पढ़ते हैं, वो एक झूठ के अलावा कुछ और नहीं। एक ऐसा झूठ जिसे बार-बार योजनाबद्ध तरीके से दोहराया जाता है। मैं दुनिया के किसी पंथ या समूह के व्यक्तिगत ईश्वर पर विश्वास नहीं करता और मैंने कभी इससे इनकार नहीं किया, बल्कि हर बार और भी जोरदार तरीके से इसकी घोषणा की है। अगर मुझमें धार्मिकता का कोई भी अंश है, तो वो इस दुनिया के लिए असीमित प्रेम और सम्मान है, जिसके कुछ रहस्यों को विज्ञान अब तक समझने में सफल रहा है (7)।
कॉस्मिक रिलिजन का ये एहसास किसी ऐसे व्यक्ति को करवाना बेहद मुश्किल है जो दुनियावी धर्मों के दलदल में गले तक धंसा हो और जो पीढ़ियों पुराने अपने धार्मिक विश्वास को छोड़, कुछ और सुनने तक को तैयार न हो। ऐसी ही धार्मिक अडिगता, हर युग के शिखर धर्म-पुरुषों की पहचान रही है, जिनके विश्वास तर्क आधारित नहीं होते, वो अपने आस-पास घटने वाली घटनाओं के लिए कारण नहीं तलाशते, यहां तक कि कई धर्म-नेताओं को तो ऐसा भगवान भी स्वीकार्य नहीं होता जिसका आकार मानव जैसा हो। हम सब प्रकृति की संतानें हैं, जिनका जन्म प्रकृति के ही कुछ नियमों के तहत हुआ है, लेकिन अब हम प्रकृति के उन नियमों को ही अपना ईमान नहीं बनाना चाहते। कोई भी चर्च ऐसा नहीं है, जिनके आधारभूत उपदेशों में इन नियमों की बात की गई हो। मेरे विचार से इस सृष्टि को रचने वाले प्राकृतिक नियमों के प्रति लोगों में सम्मान की भावना उत्पन्न करना और इसे आने वाली पीढ़ियों तक प्रसारित करना ही कला और विज्ञान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है (8)।
मैं एक पैटर्न देखता हूं तो उसकी खूबसूरती में खो जाता हूं, मैं उस पैटर्न के रचयिता की तस्वीर की कल्पना नहीं कर सकता। इसी तरह रोज ये जानने के लिए मैं अपनी घड़ी देखता हूं कि, इस वक्त क्या बजा है? लेकिन रोज ऐसा करने के दौरान एक बार भी मेरा ख्यालों में उस घड़ीसाज की तस्वीर नहीं उभरती जिसने फैक्ट्री में मेरी घड़ी बनाई होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि मानव मस्तिष्क फोर डायमेंशन्स ( चार विमाएं – लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई या गहराई और समय) को एकसाथ समझने में सक्षम नहीं है, इसलिए वो भगवान का अनुभव कैसे कर सकता है, जिसके समक्ष हजारों साल और हजारों डायमेंशन्स एक में सिमट जाते हैं (9)। इतनी तरक्की और इतने आधुनिक ज्ञान के बाद भी हम ब्रह्मांड के बारे में कुछ भी नहीं जानते। मानव विकासवाद की शुरुआत से लेकर अब तक अर्जित हमारा सारा ज्ञान किसी स्कूल के बच्चे जैसा ही है। संभवत: भविष्य में इसमें कुछ और इजाफा हो, हम कई नई बातें जान जाएं, लेकिन फिर भी चीजों की असली प्रकृति, कुछ ऐसा रहस्य है, जिसे हम शायद कभी नहीं जान सकेंगे, कभी नहीं (10)।
मैं बार-बार कहता रहा हूं कि मेरे विचार से व्यक्तिगत ईश्वर की अवधारणा बिल्कुल बचकानी है। लेकिन मैं व्यावसायिक नास्तिकों के उस दिग्विजयकारी उत्साह में भागीदारी नहीं करना चाहता जो अपनी बात मनवाने के जुनून में भरकर नौजवानो से उनके धार्मिक विश्वासों को छुड़वाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। बल्कि, प्रकृति को समझने में अपनी बौद्धिक और मानवीय कमियों के साथ मैं विनम्रता भरे व्यवहार को प्राथमिकता दूंगा।
भविष्य का धर्म एक कॉस्मिक रिलिजन होगा। ये दुनियाभर के व्यक्तिगत भगवानों की जगह ले लेगा और बिना तर्क के धार्मिक विश्वासों और तमाम धार्मिक क्रिया-कलापों, कर्म-कांडों को बेमानी कर देगा। ये प्राकृतिक भी होगा और आध्यात्मिक भी, ये उन अनुभवों से बने तर्कों पर आधारित होगा कि सभी प्राकृतिक और आध्यात्मिक चीजें इस तरह एक हैं जिनका समझा जा सकने वाला एक अर्थ है। ये जो कुछ भी मैं कह रहा हूं, इसका जवाब बौद्ध धर्म में है। अगर कोई ऐसा धर्म है जो भविष्य में  आधुनिक वैज्ञानिक जरूरतों के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकता है, तो वो बौद्ध धर्म ही होगा।
- अल्बर्ट आइंस्टीन   
References -
(1) (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, 2000 p.202)
(2) (Albert Einstein, Letter to Hoffman and Dukas, 1946)
(3) (Albert Einstein,The Human Side, edited by Helen Dukas and Banesh Hoffman, Princeton University Press)
(4) (Albert Einstein, Obituary in New York Times, 19 April 1955)
(5) (Albert Einstein, The World as I See It)
(6) (Albert Einstein, 1936, The Human Side. Responding to a child who wrote and asked if scientists pray.)
(7) (Albert Einstein, 1954, The Human Side, edited by Helen Dukas and Banesh Hoffman, Princeton University Press)
(8)  (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, p. 207)
(9) (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, 2000 p. 208)
(10)  (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, Page 208)

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

डिवाइन थ्योरी ऑफ एवरीथिंग !

दुनिया के ज्यादातर धर्मों में इस संसार को ईश्वर की रचना माना गया है। हॉकिंग ने भी अपनी किताब में सीधे-सीधे ईश्वर के अस्तित्व को नकारा नहीं है। लेकिन उनका कहना है कि ब्रह्मांड में अगर हमारे सौरमंडल जैसे दूसरे सौरमंडल हैं तो यह बात गले नहीं उतरती कि ईश्वर ने सिर्फ मनुष्य के रहने के लिए अलग से एक पृथ्वी और उसका सौरमंडल बनाया होगा। इस तरह परोक्ष रूप से ईश्वर का अस्तित्व भी हॉकिंग के निशाने पर है। 
साइंस का यह एक साधारण नियम है कि अहसास या अनुभूति मात्र से किसी के अस्तित्व की पुष्टि नहीं की जा सकती। इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, प्रोट्रॉन आदि कण भले ही नंगी आंखों से न दिखें, लेकिन परोक्ष प्रेक्षणों से उनके होने की पुष्टि की जा सकती है। साथ ही, जो क्रिया प्रयोगों से दोहराई न जा सके, साइंस में उसके वजूद को मानने की गुंजाइश नहीं है। यही वजह है कि आस्तिक और ईश्वरवादी लोग विज्ञानियों का यह कहकर मखौल उड़ाते हैं कि जिसे मन की आंखों से देखना चाहिए, उसे विज्ञान फिजिक्स की तराजू पर तौलने या केमिकल्स में डुबोकर उसकी कलई उतारने की कोशिश कर रहा है। भला ईश्वर या आत्मा-परमात्मा के बारे में साइंस क्या जाने? 
ईश्वर को साइंस ने नहीं देखा, पर सचमुच उसका कोई अस्तित्व है या नहीं, इसे जानने की कोशिश वह लगातार करता रहता है। आखिर जिसके होने पर दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी विश्वास करती हो, उसके वजूद का कोई सिरा साइंस को भी जरूर नजर आना चाहिए। 
ईश्वर के होने-न होने के बारे में किसी भरोसेमंद सिद्धांत को तलाशने की कोशिशें हॉकिंग से पहले भी अनेक वैज्ञानिक कर चुके हैं। जैसे ब्रिटेन के ही फिजिसिस्ट स्टीफन डी. अनविन ने कुछ अरसा पहले अपनी किताब 'द प्रॉबेबिलिटी ऑफ गॉड' के जरिए यह पहेली हल करने की कोशिश की थी। ईश्वर है या नहीं, यह जानने के लिए स्टीफन अनविन ने एक गणितीय फॉर्म्युला विकसित किया। उन्होंने ईश्वर की संभाव्यता की गणना न्यूट्रल पॉइंट, यानी 50-50 से शुरू की। इसके लिए अनविन ने एक 'डिवाइन इंडिकेटर स्केल' बनाया। यह स्केल भलाई, नैतिक बुराई, प्राकृतिक बुराई, प्राकृतिक चमत्कार, गैर प्राकृतिक चमत्कार और धार्मिक अनुभव के आधार पर ईश्वर की उपस्थिति-अनुपस्थिति की गणना कर सकता है। असल में दुनिया इन्हीं मानकों पर ईश्वर का पक्ष या विपक्ष तय करती आई है। 
इस पैमाने पर ईश्वर की प्रॉबैबिलिटी के अंकों का जोड़-घटाव करने के बाद अनविन ने यह नतीजा निकाला कि ईश्वर के होने की संभावना 67 फीसदी है। लेकिन इसके साथ अनविन यह भी कहते हैं कि डिवाइन इंडिकेटर स्केल पर आए अंकों की माप-जोख पूर्णत: ऐच्छिक है। यानी कोई व्यक्ति चाहे, तो उसमें नैतिक बुराई या प्राकृतिक चमत्कार को अपनी इच्छा से ज्यादा या कम अंक भी दे सकता है। पर इससे ईश्वर के होने की संभावना भी कम या ज्यादा हो जाएगी। इसका अर्थ यह हुआ कि अनविन ने जो नतीजा निकाला, वह सिर्फ उनकी भावनाओं को व्यक्त करता है और उनका नतीजा 67 प्रतिशत ईश्वर के पक्ष में खड़ा है। किसी और का नतीजा 23 या 77 प्रतिशत भी हो सकता है। 
सृष्टि के रचयिता के तौर पर ईश्वर के अस्तित्व को नापने वाली इसी तरह की एक गणना अमेरिका के साइंटिस्ट (थ्योरिटिकल फिजिसिस्ट) एंटोनी गैरेट लिसी ने भी की है। साइंस कहता है कि इस सृष्टि के जन्म के लिए चार ताकतों का एक साथ होना जरूरी है। ये ताकतें हैं: इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स (बिजली और रेडियो तरंगों में जाहिर होने वाला बल), स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स (वह ताकत जो एटम के नाभिक में क्वार्क्स को बांधकर टिकाए रखती है), वीक न्यूक्लियर फोर्स (रेडियोएक्टिव विकिरण के लिए जिम्मेदार ताकत) और पृथ्वी समेत दूसरे सभी ग्रह-नक्षत्रों को अंतरिक्ष में टिकाए रखने वाला बल यानी ग्रैविटी। 
साइंटिस्टों का मत है कि चूंकि सृष्टि एक ही बिंदु पर हुए विस्फोट (बिगबैंग) से पैदा हुई, इसलिए ये चारों ताकतें कभी एक स्थान पर रही होंगी, या फिर ये चारों शक्तियां एक ही ताकत का अलग-अलग चेहरा हो सकती हैं। थ्योरी ऑफ एवरीथिंग कही जाने वाली द ग्रैंड यूनिफाइड थ्योरी में पहली तीन ताकतों को एक सूत्र में पिरोया जा चुका है, लेकिन ग्रैविटी इसमें कैसे फिट होगी, इसका कोई रास्ता उन्हें नहीं सूझा। 
इसका एक रास्ता गैरेट लिसी ने सुझाया है। उन्होंने ई8 नामक पहेली को हल करने का दावा किया। 'ई8' एक ज्यामितीय ढांचे की गुत्थी है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे सुलझाने से इस बात का जवाब मिल सकता है कि सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? असल में ई8 के ढांचे में फिट करते वक्त वे कण और फोर्स फील्ड कम पड़ जाते हैं, जिन्हें अभी तक जाना जा सका है। लिसी ने जो हिसाब लगाया, उसके अनुसार इस पहेली को हल करने वाले ऐसे कणों की मौजूदगी संभव है। उन्होंने मैथ्स के जरिए उन कणों की पहचान भी बता दी है, लेकिन साइंस के औजारों से उनकी तलाश होनी बाकी है। जिस दिन वे कण खोज लिए जाएंगे, शायद उस दिन साइंस ईश्वर को पूरी तरह खारिज कर दे। 
2007 में ऑक्सफर्ड के फ्यूचर ऑफ ह्यूमैनिटी इंस्टिट्यूट के डॉ. निक बॉस्ट्रॉम ने यह अवधारणा पेश की कि हम इंसान एक सिमुलेटेड (यानी कंप्यूटर पर रचे गए) संसार के बाशिंदे हो सकते हैं। इस प्रस्थापना के जरिए वे कहना चाहते हैं कि हो सकता है कि शायद किसी विकसित प्रजाति (क्या पता ईश्वर) ने अपने मनोरंजन या अध्ययन के लिए हमें अपने कंप्यूटर प्रोग्राम में वैसे ही बनाया हो, जैसे हमारे विडियो गेम्स होते हैं। इस वर्चुअल दुनिया में सभी ऐंद्रिक अहसास इतने असली हैं कि यह पता करना मुश्किल है कि हम अपने भौतिक रूप में नहीं हैं। 
पर इस बहस के बीच में कोई आकर यह भी कह सकता है कि ईश्वर तो हर तरह की व्याख्या से परे है। उसकी खोज ठीक वैसी ही है जैसे कोई प्रेम शब्द के बारे में पूरा इनसाइक्लोपीडिया चाट जाए, फिर भी प्यार के बारे में कुछ भी जान नहीं पाए। यानी जिस तरह कोई यह साबित नहीं कर पाया है कि ईश्वर होता है, उसी तरह यह भी अब तक सिद्ध नहीं हुआ है कि वह नहीं होता।



साभार - संजय वर्मा

रविवार, 5 सितंबर 2010

आखिर ये ब्रह्मांड ईश्वर की रचना क्यों नहीं है?

वाईकिंग मिथक के अनुसार ग्रहण तब लगता है जब स्कोल और हैती नाम के दो भेड़िए, सूरज या चंद्रमा को जकड़ लेते हैं। इसीलिए जब भी ग्रहण पड़ता था तो वाईकिंग लोग खूब शोर मचाते और ढोल बजाते थे ताकि वो भेड़िए डर कर आसमान से भाग जाएं। कुछ समय बाद लोगों ने महसूस किया कि उनकी गतिविधियों का ग्रहण पर कोई असर नहीं पड़ता और वो चाहे जितनी उछल-कूद मचाएं या शोर-शराबा करें, ग्रहण तो अपने-आप ही खत्म हो जाता है। प्रकृति के तौर-तरीकों की उपेक्षा ने प्राचीन काल में लोगों को उनकी दुनिया के रीति-रिवाजों को तर्कसंगत ठहराने के लिए एक से बढ़कर एक मिथक रचने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इसके बावजूद, लोगों की दिलचस्पी दर्शनशास्त्र यानि हर घटना के पीछे की वजह तलाशने में बढ़ती चली गई। अनुभव से अर्जित सहज ज्ञान को आधार बनाकर लोग अपने आस-पास के माहौल और अंतरिक्ष में घटने वाली घटनाओं के रहस्यों को समझने की कोशिश करते रहे। हम अब भी यही करते हैं, बस फर्क इतना है कि अब हम प्रकृति के रहस्यों को समझने के लिए तर्क, गणित और प्रायोगिक परीक्षण यानि दूसरे शब्दों में आधुनिक साइंस का इस्तेमाल करते हैं।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, ब्रह्मांड एक ऐसी अबूझ पहेली है, जिसे हल करना नामुमकिन नहीं है। उनका आशय था कि ब्रह्मांड हमारे किसी घर की तरह नहीं है, जहां हर सुबह चीजें बेतरतीब सी नजर आती है। ब्रह्मांड की हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज यूं ही इधर-उधर नहीं घूम रही, बल्कि ब्रह्मांड में चीजें पूरी तरह नियमबद्ध और अपने तय रास्तों पर ही हैं। ब्रह्मांड की हर चीज नियमों का पालन कर रही है, और वो भी बिना किसी अपवाद के। न्यूटन को यकीन था कि जीवन से धड़कता हमारा अनोखा सौरमंडल, एक महा उथल-पुथल से केवल प्राकृतिक नियमों की बदौलत ही अस्तित्व में नहीं आया है। बल्कि, ये व्यवस्थित ब्रह्मांड,' सबसे पहले भगवान द्वारा उत्पन्न किया गया है और आज तक ये उसी ईश्वरीय व्यवस्था के तहत काम कर रहा है।'
हाल में खोजे गए प्रकृति के कई गूढ़ नियमों से भी ऐसा लग सकता है कि ब्रह्मांड की ये महान डिजाइन किसी महानतम डिजाइनर का ही काम है। फिर भी, कॉस्मोलॉजी की नई खोजें इस बात को विस्तार से समझाती हैं कि ब्रह्मांड के नियम किसी सर्वशक्तिमान के हस्तक्षेप के बिना भी क्यों मानव जाति के अनुकूल नजर आते हैं।
कई विचित्र घटनाओं ने पृथ्वी की डिजाइन को हम मानवों के अनुकूल ढालने की साजिश की है और इन विचित्र घटनाओं की गुत्थी और भी उलझी नजर आती, अगर हमारा सौरमंडल ही ब्रह्मांड का अकेला और इकलौता सौरमंडल होता। लेकिन ऐसा नहीं है, अब हम सैकड़ों नए सौरमंडलों की खोज कर चुके हैं, और अब हमें लग रहा है कि हमारी आकाशगंगा में मौजूद अरबों सितारों में ऐसे ही अनगिनत सौरमंडल वजूद में हो सकते हैं। हर तरह के ग्रह मौजूद हैं और जब किसी ग्रह पर मौजूद कोई संभावित प्राणी अपने आस-पास के माहौल का मुआयना करता होगा, तो उन्हें अपना वो माहौल-वो दुनिया वैसी ही महसूस होती होगी, जैसा कि उनके जीवन को सहारा देने के लिए जरूरी होगा।
ऊपर लिखी आखिरी लाइन को एक वैज्ञानिक नियम में भी तब्दील किया जा सकता है। हमारे वजूद की सच्चाई, उस माहौल-उस वातावरण की शर्तों से तय होती है, जिनके बीच हम खुद को मौजूद पाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर हम ये नहीं जानते कि पृथ्वी से सूरज कितनी दूर है, तो हम मन मुताबिक अंदाजों पर यकीन करते रहेंगे कि पृथ्वी से सूरज की दूरी कितनी कम या कितनी ज्यादा है। हमें जीने के लिए तरल अवस्था में पानी की जरूरत है, और अगर पृथ्वी सूरज के करीब होती तो हमारे ग्रह का सारा पानी खौल-खौल कर भाप बनकर उड़ गया होता और अगर पृथ्वी सूरज से दूर होती तो ये सारा पानी जमकर पत्थर जैसा बन चुका होता। ये एक वैज्ञानिक सिद्धांत है, जिसे 'वीक एंथ्रॉपिक प्रिंसिपल' कहते हैं। 'वीक एंथ्रॉपिक प्रिंसिपल' कोई बहुत ज्यादा विवादास्पद नहीं है, लेकिन इसका एक प्रभावशाली स्वरूप भी है, जिसे भौतिकशास्त्री हिकारत की नजर से देखते हैं। ' द स्ट्रांग एंथ्रॉपिक प्रिंसिपल' कहता है कि हमारे वजूद की सच्चाई केवल हमारे वातावरण पर ही अवरोध नहीं डालती, बल्कि ये प्राकृतिक नियमों के सभी मुमकिन प्रकारों और खुद कुदरत को भी बंदिशों में बांध देती है।
ये सिद्धांत केवल हमारे सौरमंडल की उन विशेषताओं से ही सामने नहीं आया है, जो कई विपरीत स्थितियों के बावजूद मानव जीवन के विकास को सहारा देती नजर आती हैं। बल्कि ये सिद्धांत संपूर्ण ब्रह्मांड के गुण-धर्म और इसके नियमों से भी संबद्ध है। लगता है ब्रह्मांड की ये ‘डिजाइन’ हम मानवों को सहारा देने के लिए ही खासतौर पर काट-छांट कर तैयार की गई है और अगर हमें अपने अस्तित्व की रक्षा करनी है, तो हमें एक छोटे से कमरे जैसी इस पृथ्वी को नए बदलावों के लिए छोड़ना होगा। इसे विस्तार से बताना कहीं ज्यादा मुश्किल है।
हमारे ब्रह्मांड का शुरुआती रूप हाइड्रोजन, हीलियम और थोड़े से लीथियम के खौलते उमड़ते-घुमड़ते बेहद घने बादल जैसा था, फिर ब्रह्मांड आज के स्वरूप में कैसे ढल गया, जहां कम से कम एक ऐसी दुनिया मौजूद है जहां बुद्धिमान सभ्यता मौजूद है, ये कहानी बेहद दिलचस्प है और कई चैप्टर्स में बंटी है। प्रकृति की शक्तियां कुछ इस तरह काम कर रही थीं कि नवजात सृष्टि के उन उमड़ते-घुमड़ते आदि तत्वों से खासतौर पर कार्बन जैसे भारी तत्व बन सकें और ये भारी तत्व इस काबिल भी हों कि आने वाले अरबों साल तक स्थिर अवस्था में बने रह सकें। ये भारी तत्व उन भट्ठियों में बनते हैं, जिन्हें हम सितारों के नाम से जानते हैं। इसलिए प्राकृतिक शक्तियां सबसे पहले आकाशगंगाओं और सितारों के जन्म लेने की स्थितियां तैयार करती हैं। जिनके बीज ब्रह्मांड के आदिस्वरूप की छोटी-छोटी असमरूपताएं तैयार करती हैं।
केवल इतना ही पर्याप्त नहीं, सितारों के भीतर की जबरदस्त हलचल कुछ ऐसी थी कि इस प्रक्रिया में कई सितारे जबरदस्त विस्फोट के साथ बिखर गए। इस तरह धमाके के साथ नष्ट होते सितारों ने भारी तत्वों को अंतरिक्ष में दूर-दूर तक बिखेर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्राकृतिक नियमों ने उस मृत सितारे के अवशेषों को फिर से समेटना, आसपास लाना और एक बार फिर से संघनित करना शुरू कर दिया। इसी के साथ, सितारों की नई पीढ़ी अस्तित्व में आ गई। ये नए सितारे उन नवजात ग्रहों से घिरे हुए थे जिनका निर्माण ताजा-ताजा बने भारी तत्वों से हुआ था।
मॉडल यूनिवर्स के परीक्षण से हम ये समझ सकते हैं कि फिजिक्स के सिद्धांतों में कुछ खास बदलाव कैसे आते हैं। फिजिक्स के नियमों में सैद्धांतिक तौर पर आए बदलावों के असर का अध्ययन कोई भी कर सकता है। इस तरह की गणनाएं दिखाती हैं कि बेहद मजबूत न्यूक्लियर फोर्स में 0.5 प्रतिशत जितनी या फिर इलेक्ट्रिकल फोर्स में 4 प्रतिशत जितनी कमी सभी सितारों में मौजूद सारे कार्बन या फिर समूची ऑक्सीजन को ही नष्ट कर देगी। इसके साथ ही जीवन की वो सारी संभावनाएं भी खत्म हो जाएंगी जो इन तत्वों से जुड़ी हैं। साथ ही हमारे सिद्धांतों के ज्यादातर आधारभूत स्थिरांक यानि कॉन्सटेंट्स, जो कि बिल्कुल अचूक होते हैं, अगर उनमें हल्का सा भी बदलाव हो जाए तो इस ब्रह्मांड की शक्ल ही बदल जाएगी, जो कि कई मामलों में जीवन के विकास के बिल्कुल प्रतिकूल होगा। उदाहरण के तौर पर अगर प्रोटान 0.2 प्रतिशत और वजनी हो जाएं तो वो न्यूट्रॉन्स में बदल जाएंगे, जिससे पूरा अणु ही अस्थिर हो उठेगा।
अगर हम ये मानें कि ग्रहीय जीवन के विकास के लिए किसी सितारे के स्थिर परिक्रमा पथ पर कुछ हजार लाख साल तक बने रहना ही जरूरी है तो इससे स्पेस डाइमेंशन्स की संख्याएं भी तय हो जाती हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण के नियमों के मुताबिक हमारी पृथ्वी के जैसा दीर्घवृत्ताकार परिक्रमापथ केवल थ्री-डायमेंशन्स में ही संभव हो सकता है। इन तीनों डायमेंशन्स में से किसी भी एक ओर से कोई छोटे से छोटा डिस्टरबेंस, जैसे किसी पड़ोसी ग्रह का शक्तिशाली खिंचाव, अगर सामने आ जाए तो परिक्रमा पथ पर अपने सितारे का चक्कर लगा रहा ग्रह रास्ते से दूर छिटक जाएगा और अपनी धुरी पर घूर्णन करते हुए अपने सितारे से दूर, बहुत दूर निकल जाएगा।
हमारी पृथ्वी जैसा कोई कॉम्पलेक्स स्ट्रक्टचर, जो हम मानवों के जैसे बुद्धिमान जीवन की सार-संभाल करने में सक्षम हो, बेहद भंगुर लगता है। किसी सिस्टम के लिए प्रकृति के नियम बेहद अचूक होते हैं। अब इन संयोगों से हम क्या अर्थ निकालें ? सूक्ष्मतम रूप में सौभाग्य और अपने आस-पास की चीजों में हम जिस सौभाग्य की तलाश करते हैं भौतिकी के आधारभूत नियमों की प्रकृति उससे अलग किस्म का सौभाग्य होता है। ये सहज सवाल खड़े करता है, कि ये चीज ऐसी क्यों है?
बहुत से लोग ‘भगवान के काम’ के सबूत के तौर पर इन संयोगों का इस्तेमाल करना पसंद करेंगे। हजारों साल पुराने पौराणिक और आध्यात्मिक आख्यानों में ऐसे विचार भरे पड़े हैं कि इस ब्रह्मांड को इस तरह से डिजाइन किया गया है, ताकि ये मानव जाति को सहारा दे सके। पश्चिमी संस्कृति में ओल्ड टेस्टामेंट में संपूर्ण सृष्टि को ईश्वरीय रचना बताया गया है, लेकिन परंपरागत ईसाई दृष्टिकोण अरस्तु से भी बहुत ज्यादा प्रभावित है, जो मानते थे कि हमारी बौद्धिक प्राकृतिक दुनिया ईश्वरीय निर्देशानुसार ही संचालित हो रही है।
ये जवाब मॉडर्न साइंस के नहीं है। कॉस्मोलॉजी की ताजा खोजों से पता चलता है कि ये ब्रह्मांड शून्य से खुद-ब-खुद उत्पन्न हुआ है, गुरुत्वाकर्षण के नियम और क्वांटम थ्योरी से इसकी पुष्टि भी होती है। अपनेआप की ये उत्पत्ति, जिसे स्वयंभू उत्पत्ति भी कह सकते हैं, ही वो सबसे बड़ा कारण है जो इशारा करता है कि शून्य के बजाय वहां उत्पत्ति से पहले जरूर कुछ मौजूद रहा होगा। आखिर इस ब्रह्मांड का अस्तित्व क्यों है? आखिर हमारे वजूद की वजह क्या है? अब इसके लिए भगवान से विनती करने की जरूरत नहीं है कि वो अंधकार को रौशन करें और सृष्टि को गतिमान हो जाने का आदेश दें।
हमारा ब्रह्मांड, ऐसे ही दूसरे बहुत सारे ब्रह्मांडों में से एक है और इनमें से हरेक के लिए नियम अलग-अलग हैं। अनेक ब्रह्मांडों यानि ‘मल्टीवर्स’ का ये विचार कोई ऐसी धारणा नहीं है जिसे अचूकता के चमत्कार को समझाने के लिए गढ़ लिया गया हो। बल्कि ये ऐसी तस्वीर है, जिसकी तरफ मॉडर्न कॉस्मोलॉजी के बहुत सारे सिद्धांत इशारा कर रहे हैं। अगर ये हकीकत है, तो ये मजबूत धार्मिक सिद्धांतों को कमजोर कर देगी और पर्यावरण संबंधी कारकों की तरह फिजिकल नियम को भी अचूक बना देगी। इसका सीधा अर्थ ये है कि हमारा कॉस्मिक हैबिटेट – जो कि अब जहां तक हम इसे देख सकते हैं, ये संपूर्ण ब्रह्मांड , ऐसे ही बहुत सारे ब्रह्मांडों में से ही एक है।
हरेक ब्रह्मांड के कई इतिहास और बहुत सारी मुमकिन स्थितियां हो सकती हैं। लेकिन उनमें से बहुत कम ब्रह्मांड ऐसे होंगे जहां हमारे जैसे प्राणियों का अस्तित्व संभव होगा। अगर ब्रह्मांड की विशालता के स्तर पर विचार करें तो हम बेहद तुच्छ और महत्वहीन से नजर आते हैं, लेकिन फिरभी इसने एक मायने में हम मानवों को सृजन का स्वामी बना दिया है।

- प्रो. स्टीफन हॉकिंग की नई किताब ‘द ग्रांड डिजाइन’ के चुनिंदा अंश। ‘द ग्रांड डिजाइन’ को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के एस्ट्रोफिजिसिस्ट प्रो. स्टीफन हॉकिंग और कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट आप टेक्नोलॉजी के फिजिसिस्ट लियोनार्ड म्लोदिनोव ने मिलकर लिखा है।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

ब्रह्मांड का निर्माण भगवान ने नहीं किया : प्रो. हॉकिंग

महान एस्ट्रोफिजिसिस्ट प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग ने अपनी नई किताब The Grand Design में जोरदारी के साथ कहा है कि ब्रह्मांड का निर्माण भगवान ने नहीं किया है। प्रो. हॉकिंग ने लिखा है कि सृष्टि का निर्माण भगवान के बजाय भौतिकी के नियमों ने किया है। ब्रह्मांड का जन्म और इससे हमारा संबंध...ये रहस्य जितना वैज्ञानिक है, उतना ही धार्मिक भी।
ब्रह्मांड का जन्म कैसे हुआ? कौन सी चीजें इसके लिए जिम्मेदार थीं? इसका मकसद क्या था? हमने क्यों जन्म लिया...हमारा मकसद क्या है? ये कुछ ऐसे महान सवाल हैं जहां विज्ञान-धर्म और दर्शन आपस में मिलते नजर आते हैं....अपनी नई किताब The Grand Design में प्रो. हॉकिंग ने एस्ट्रोफिजिक्स की मदद से इन सवालों की गहराई से पड़ताल की है।
ब्रह्मांड ईश्वर ने नहीं बनाया....तो फिर ये कैसे बना? इसका जवाब हमारे ऋगवेद में सदियों पहले से दर्ज है....ऋगवेद की ऋचाएं बिगबैंग के सिद्धांत की उदघोषणा करती हैं....याद कीजिए भारत एक खोज का शीर्षक गीत -

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।

किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासीद्गहनं गभीरम् ।।

ब्रह्मांड के उदभव की सबसे वैज्ञानिक व्याख्या ऋगवेद में दर्ज है...ये और ऊपर की बातें मेरे निजी विचार नहीं हैं। बल्कि ये बातें मशहूर एस्ट्रोफिजिसिस्ट डॉ. कार्ल सगान ने अपनी बेस्ट सेलर 'कॉस्मस' में लिखी हैं। कॉस्मस में डॉ. सगान लिखते हैं -
The Hindu religion is the only one of the world's great faith dedicated to the idea that the Cosmos itself undergoes and immense, indeed an infinite number of deaths and rebirths. It is the only religion in which the time scales correspond, no doubt by accident, to those of modern scientific cosmology. Its cycles run from our ordinary day and night to a day and night of Brahma, 8.64 billion years long, longer than the age of the Earth or the Sun and about half the time since the Big Bang. And there are much longer time scales still.
यानि, वेदों की मान्यता है कि सृष्टि - रचना और प्रलय के अनंत चक्र में चलती है। वेदों में दिया गया सृष्टि रचना का समय, आधुनिक विज्ञान के सबसे करीब है … ये चक्र खरबों साल का है।
डॉ. कार्ल सगान की तरह, फ्रिटजॉफ कापरा ने भी विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में अहम योगदान दिया है। इन्होंने वियना विश्वविद्यालय से फिजिक्स में रिसर्च की है। ब्रह्मांड के जन्म के बारे में कापरा का भी मानना है कि वेदों की कई मान्यतायें आधुनिक विज्ञान के सबसे करीब है। कापरा अपनी किताब 'द टॉओ ऑफ फिज़क्सि' में लिखते हैं-
The Eastern mystics have a dynamic view of the universe similar to that of modern physics, and consequently it is not surprising that they, too, have used the image of the dance to convey their intuition of nature.
The metaphor of the cosmic dance has found its most profound and beautiful expression in Hinduism in the image of the dancing god Shiva. Among his many incarnations, Shiva, one of the oldest and most popular Indian gods, appears as the King of Dancers. According to Hindu belief, all life is part of a great rhythmic process of creation and destruction, of death and rebirth, and Shiva's dance symbolizes this eternal life-death rhythm which goes on in endless cycles.
यानि, भारतीय दर्शन में ब्रह्मांड के उदभव की परिकल्पना फिजिक्स के नियमों के अनुसार ही है। मुझे इस बात पर जरा भी हैरानी नहीं होती कि प्राचीन भारतीय ऋषियों ने इस 'कॉस्मिक डांस' को समझाने के लिए शिव के नृत्य के प्रतीक का सहारा लिया। शिव का नृत्य रचना-प्रलय...और जीवन-मृत्यु का अनूठा प्रतीक है। शिव का नृत्य इस सृष्टि को रचने वाले मूल कणों का नृत्य है।
भविष्यदृष्टा कहे जाने वाले महान वैज्ञानिक और लेखक आर्थर सी क्लार्क भी मानते हैं कि ब्रह्मांड के जन्म को लेकर सबसे वैज्ञानिक और सटीक अनुमान ऋगवेद में दर्ज है। भारतीय दर्शन में दी गई समय की अवधारणा के तो क्लार्क जबरदस्त प्रशंसक थे। अपनी किताब प्रोफाइल्स आफ द फ्यूचर में उन्होंने 'अबाउट टाइम' शीर्षक का एक पूरा खंड ही समय की भारतीय दार्शनिक अवधारणा को समर्पित कर दिया है...आर्थर सी क्लार्क इसमें लिखते हैं -
Time has been a basic element in all religions ... Some faiths (Christianity, for instance) have placed creation and beginning of Time and very recent dates in the past, and have anticipated the end of the Universe in the near future. Other religions, such as Hinduism, have looked back through enormous vistas of Time and forward to even greater ones. It was with reluctance that western astronomers realized that the East was right, and that the age of the Universe is to be measured in billions rather than millions of years – if it can be measured at all.'
यानि, दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों में समय की अवधारणा मूलभूत है। ज्यादातर धर्मों में, खास तौर से ईसाई धर्म में सृष्टि की रचना और प्रलय की समय सीमा बहुत कम बताई गयी है। जबकि भारतीय वैदिक दर्शन एकदम अलग है, क्योंकि इसमें समय की सीमा बहुत ज्यादा आंकी गई है। पश्चिमी खगोलशास्त्रियों ने अब जाकर बड़ी मुश्किल से माना है कि  पूरब में आंकी गयी समय सीमा सही है और सृष्टि रचना की समय सीमा अगर वाकई आंकी जा सकती है तो उसे करोड़ों की बजाय  खरबों में ही आंका जा सकता है।
समय की भारतीय वैदिक अवधारणा और ब्रह्मांड की उत्पत्ति और इसके विनाश के संबंध में एक प्राचीन भारतीय पहेली बेहद दिलचस्प है। इस पहेली का संकलन स्व.गुणाकर मुले जी ने गणित की पहेलियां नाम की अपनी किताब में भी किया है...पहेली एक कथा की तरह है -
'कथा बहुत प्राचीन है। उस समय काशी में एक विशाल मंदिर था। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने जब इस संसार की रचना की, तब उसने इस मंदिर में हीरे की बनी हुई तीन छड़ें रखी और फिर इनमें से एक में छेद वाली सोने की 64 तश्तरियां रखीं सबसे बड़ी नीचे और सबसे छोटी सबसे उपर। फिर ब्रह्मा ने वहां एक पुजारी को नियुक्त किया। उसका काम था कि वह एक छड की तश्तरियां दूसरी छड़ में बदलता जाए। इस काम के लिए वो तीसरी छड़ का सहारा ले सकता था, लेकिन एक नियम का पालन जरूरी था। पुजारी एक समय केवल एक ही तश्तरी उठा सकता था और छोटी तश्तरी के उपर बड़ी तश्तरी वो नहीं रख सकता था। इस विधि से जब सभी 64 तश्तरियां एक छड़ से दूसरी छड़ में पहुंच जाएंगी, सृष्टि का अन्त हो जाएगा।
ये पहेली पहली नजर में बड़ी साधारण सी लगती है। आप कहेंगे - तब तो कथा की सृष्टि का अंत हो जाना चाहिए था। 64 तश्तरियों को एक छड़ से दूसरी छड़ में रखने में समय ही कितना लगता है।
लेकिन, पहेली की गुत्थी यहीं से शुरू होती है। तश्तरियों को एक छड़ से दूसरे छड़ में बदलने का ये ब्रह्म कार्य इतनी जल्दी खत्म नहीं हो सकता। मान लीजिए कि एक तश्तरी के बदलने में एक सेकेंड का समय लगता है। इसके माने यह हुआ कि एक घंटे में आप 3600 तश्तरियां बदल लेंगे। इसी प्रकार एक दिन में आप लगभग 100,000 तश्तरियों और 10 दिन में लगभग 1,000,000 तश्तरियां बदल लेंगे। आप कहेंगे - "इतने परिवर्तनों में तो 64 तश्तरियां निश्चित रूप से एक छड़ से दूसरी छड़ में पहुंच जाएंगी।"
लेकिन आपका ये अनुमान भी गलत है । उपरोक्त 'ब्रम्ह-नियम' के अनुसार 64 तश्‍तरियों को बदलने में पुजारी महाशय को कम से कम 5,00,00,00,00,000 (पांच खरब) साल लगेंगे।
इस बात पर शायद यकायक आप विश्वास न करें । परन्तु गणित के हिसाब से कुल परिवर्तनों की संख्या 264-1, यानि 18,446,744,073,709,551,615 होती है। ये है हमारे प्राचीन विज्ञान की एक छोटी सी झलक।
इस सिलसिले में उपनिषद का एक श्लोक काफी दिलचस्प है -

"तस्मिन् ह विज्ञाने सर्वमिदं विज्ञान भवति"

यानि, सृष्टि का मर्म ही विज्ञान है, उसे जान लेने पर ही सबका ज्ञान हो जाएगा।