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शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

डिवाइन थ्योरी ऑफ एवरीथिंग !

दुनिया के ज्यादातर धर्मों में इस संसार को ईश्वर की रचना माना गया है। हॉकिंग ने भी अपनी किताब में सीधे-सीधे ईश्वर के अस्तित्व को नकारा नहीं है। लेकिन उनका कहना है कि ब्रह्मांड में अगर हमारे सौरमंडल जैसे दूसरे सौरमंडल हैं तो यह बात गले नहीं उतरती कि ईश्वर ने सिर्फ मनुष्य के रहने के लिए अलग से एक पृथ्वी और उसका सौरमंडल बनाया होगा। इस तरह परोक्ष रूप से ईश्वर का अस्तित्व भी हॉकिंग के निशाने पर है। 
साइंस का यह एक साधारण नियम है कि अहसास या अनुभूति मात्र से किसी के अस्तित्व की पुष्टि नहीं की जा सकती। इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन, प्रोट्रॉन आदि कण भले ही नंगी आंखों से न दिखें, लेकिन परोक्ष प्रेक्षणों से उनके होने की पुष्टि की जा सकती है। साथ ही, जो क्रिया प्रयोगों से दोहराई न जा सके, साइंस में उसके वजूद को मानने की गुंजाइश नहीं है। यही वजह है कि आस्तिक और ईश्वरवादी लोग विज्ञानियों का यह कहकर मखौल उड़ाते हैं कि जिसे मन की आंखों से देखना चाहिए, उसे विज्ञान फिजिक्स की तराजू पर तौलने या केमिकल्स में डुबोकर उसकी कलई उतारने की कोशिश कर रहा है। भला ईश्वर या आत्मा-परमात्मा के बारे में साइंस क्या जाने? 
ईश्वर को साइंस ने नहीं देखा, पर सचमुच उसका कोई अस्तित्व है या नहीं, इसे जानने की कोशिश वह लगातार करता रहता है। आखिर जिसके होने पर दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी विश्वास करती हो, उसके वजूद का कोई सिरा साइंस को भी जरूर नजर आना चाहिए। 
ईश्वर के होने-न होने के बारे में किसी भरोसेमंद सिद्धांत को तलाशने की कोशिशें हॉकिंग से पहले भी अनेक वैज्ञानिक कर चुके हैं। जैसे ब्रिटेन के ही फिजिसिस्ट स्टीफन डी. अनविन ने कुछ अरसा पहले अपनी किताब 'द प्रॉबेबिलिटी ऑफ गॉड' के जरिए यह पहेली हल करने की कोशिश की थी। ईश्वर है या नहीं, यह जानने के लिए स्टीफन अनविन ने एक गणितीय फॉर्म्युला विकसित किया। उन्होंने ईश्वर की संभाव्यता की गणना न्यूट्रल पॉइंट, यानी 50-50 से शुरू की। इसके लिए अनविन ने एक 'डिवाइन इंडिकेटर स्केल' बनाया। यह स्केल भलाई, नैतिक बुराई, प्राकृतिक बुराई, प्राकृतिक चमत्कार, गैर प्राकृतिक चमत्कार और धार्मिक अनुभव के आधार पर ईश्वर की उपस्थिति-अनुपस्थिति की गणना कर सकता है। असल में दुनिया इन्हीं मानकों पर ईश्वर का पक्ष या विपक्ष तय करती आई है। 
इस पैमाने पर ईश्वर की प्रॉबैबिलिटी के अंकों का जोड़-घटाव करने के बाद अनविन ने यह नतीजा निकाला कि ईश्वर के होने की संभावना 67 फीसदी है। लेकिन इसके साथ अनविन यह भी कहते हैं कि डिवाइन इंडिकेटर स्केल पर आए अंकों की माप-जोख पूर्णत: ऐच्छिक है। यानी कोई व्यक्ति चाहे, तो उसमें नैतिक बुराई या प्राकृतिक चमत्कार को अपनी इच्छा से ज्यादा या कम अंक भी दे सकता है। पर इससे ईश्वर के होने की संभावना भी कम या ज्यादा हो जाएगी। इसका अर्थ यह हुआ कि अनविन ने जो नतीजा निकाला, वह सिर्फ उनकी भावनाओं को व्यक्त करता है और उनका नतीजा 67 प्रतिशत ईश्वर के पक्ष में खड़ा है। किसी और का नतीजा 23 या 77 प्रतिशत भी हो सकता है। 
सृष्टि के रचयिता के तौर पर ईश्वर के अस्तित्व को नापने वाली इसी तरह की एक गणना अमेरिका के साइंटिस्ट (थ्योरिटिकल फिजिसिस्ट) एंटोनी गैरेट लिसी ने भी की है। साइंस कहता है कि इस सृष्टि के जन्म के लिए चार ताकतों का एक साथ होना जरूरी है। ये ताकतें हैं: इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स (बिजली और रेडियो तरंगों में जाहिर होने वाला बल), स्ट्रांग न्यूक्लियर फोर्स (वह ताकत जो एटम के नाभिक में क्वार्क्स को बांधकर टिकाए रखती है), वीक न्यूक्लियर फोर्स (रेडियोएक्टिव विकिरण के लिए जिम्मेदार ताकत) और पृथ्वी समेत दूसरे सभी ग्रह-नक्षत्रों को अंतरिक्ष में टिकाए रखने वाला बल यानी ग्रैविटी। 
साइंटिस्टों का मत है कि चूंकि सृष्टि एक ही बिंदु पर हुए विस्फोट (बिगबैंग) से पैदा हुई, इसलिए ये चारों ताकतें कभी एक स्थान पर रही होंगी, या फिर ये चारों शक्तियां एक ही ताकत का अलग-अलग चेहरा हो सकती हैं। थ्योरी ऑफ एवरीथिंग कही जाने वाली द ग्रैंड यूनिफाइड थ्योरी में पहली तीन ताकतों को एक सूत्र में पिरोया जा चुका है, लेकिन ग्रैविटी इसमें कैसे फिट होगी, इसका कोई रास्ता उन्हें नहीं सूझा। 
इसका एक रास्ता गैरेट लिसी ने सुझाया है। उन्होंने ई8 नामक पहेली को हल करने का दावा किया। 'ई8' एक ज्यामितीय ढांचे की गुत्थी है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे सुलझाने से इस बात का जवाब मिल सकता है कि सृष्टि का निर्माण कैसे हुआ? असल में ई8 के ढांचे में फिट करते वक्त वे कण और फोर्स फील्ड कम पड़ जाते हैं, जिन्हें अभी तक जाना जा सका है। लिसी ने जो हिसाब लगाया, उसके अनुसार इस पहेली को हल करने वाले ऐसे कणों की मौजूदगी संभव है। उन्होंने मैथ्स के जरिए उन कणों की पहचान भी बता दी है, लेकिन साइंस के औजारों से उनकी तलाश होनी बाकी है। जिस दिन वे कण खोज लिए जाएंगे, शायद उस दिन साइंस ईश्वर को पूरी तरह खारिज कर दे। 
2007 में ऑक्सफर्ड के फ्यूचर ऑफ ह्यूमैनिटी इंस्टिट्यूट के डॉ. निक बॉस्ट्रॉम ने यह अवधारणा पेश की कि हम इंसान एक सिमुलेटेड (यानी कंप्यूटर पर रचे गए) संसार के बाशिंदे हो सकते हैं। इस प्रस्थापना के जरिए वे कहना चाहते हैं कि हो सकता है कि शायद किसी विकसित प्रजाति (क्या पता ईश्वर) ने अपने मनोरंजन या अध्ययन के लिए हमें अपने कंप्यूटर प्रोग्राम में वैसे ही बनाया हो, जैसे हमारे विडियो गेम्स होते हैं। इस वर्चुअल दुनिया में सभी ऐंद्रिक अहसास इतने असली हैं कि यह पता करना मुश्किल है कि हम अपने भौतिक रूप में नहीं हैं। 
पर इस बहस के बीच में कोई आकर यह भी कह सकता है कि ईश्वर तो हर तरह की व्याख्या से परे है। उसकी खोज ठीक वैसी ही है जैसे कोई प्रेम शब्द के बारे में पूरा इनसाइक्लोपीडिया चाट जाए, फिर भी प्यार के बारे में कुछ भी जान नहीं पाए। यानी जिस तरह कोई यह साबित नहीं कर पाया है कि ईश्वर होता है, उसी तरह यह भी अब तक सिद्ध नहीं हुआ है कि वह नहीं होता।



साभार - संजय वर्मा

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुमूल्य ज्ञानवर्धक आलेख!!
    बहुत बहुत आभार।

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  2. सन्दीप जी संकलन और रचना के योग से बना यह ब्लॉग पहली बार नजर आया। अब तो नियमित नई पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी। http://supportinghands.blogspot.com/2008/10/life-is-engineering-of-psychoware-and.html

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