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सोमवार, 27 अगस्त 2012

अलविदा कमांडर, फिर मिलेंगे, किसी और डायमेंशन में...


नील आर्मस्ट्रांग संपूर्ण मानवता के महानतम नायकों में से हैं। उनके निधन पर श्रद्धांजलि स्वरूप वॉयेजरनील आर्मस्ट्रांग का ये साक्षात्कार पुन: प्रकाशित कर रहा है, जिसे मिशन अपोलो-11 की 40 वीं वर्षगांठ के मौके पर लिया गया था। प्रस्तुत है चंद्रमा के सफर की तैयारियों और वहां की उजली जमीन पर लैंड करने के अनोखे अनुभव खुद कमांडर नील आर्मस्ट्रांग की जबानी -
मुझे याद है, जब मैं छोटा बच्चा था तो लकड़ी के एयरक्राफ्ट बनाया करता था। हवा में उड़ते और कलाबाजियां खाते प्लेन्स की वो तस्वीर मेरे दिमाग में अब भी ताजा है, जिन्हें मैंने बचपन में अपने पिता के साथ एयरशो में देखा था। हम सभी वाकई बड़े खुशनसीब हैं, कि कुदरत ने हमारे लिए वक्त का ऐसा दौर चुना जब इतिहास मानव जाति की तकदीर का फैसला कर रहा था। मैं उन सब लोगों का शुक्रिया अदा करता हूं, जिनकी मेहनत और लगन की वजह से अपोलो-11 कार्यक्रम मुमकिन हो सका और हम सब इतिहास के उस गौरवशाली पन्ने पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके।
मिशन अपोलो-11 नासा के अंतरिक्ष अभियानों के इतिहास का सबसे ज्यादा प्रचारित अभियान था। इसे लेकर लोगों की अपेक्षाएं बुलंदी पर थीं। अकसर लोग मुझसे पूछते हैं कि अभियान की तैयारी के दौरान मीडिया हाइप और लोगों की अपेक्षाओं को लेकर क्या मैं किसी तरह के मानसिक दबाव से गुजर रहा था? इसका जवाब मैं आज देता हूं, हमारे अभियान को लेकर बाहर की तमाम हलचल से मैंने पीठ मोड़ ली थी। मेरा पूरा ध्यान उन तीन से चार लाख लोगों की मिलीजुली मेहनत पर था, जो इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए दिन-रात काम में जुटे थे।
मेरा पूरा ध्यान इस मिशन की कामयाबी पर फोकस था, जिसके लिए इतने सारे लोग काम कर रहे थे। बाहर के तमाशे से मैंने खुद को दूर रखा, मेरे दिमाग में केवल यही बात थी कि प्रोजेक्ट अपोलो-11 के लिए काम कर रहा हर व्यक्ति, हर एसेंबलर कुछ न कुछ बनाने में जुटा था, लोग परीक्षण पर परीक्षण कर रहे थे और लैंडर का हर नट-बोल्ट कई-कई बार परखा जा रहा था। इस मिशन से जुड़े लाखों पुरुष और महिलाएं अपने काम को लेकर इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि ये बाते आम थीं कि अगर कुछ गड़बड़ होई तो ये कम से कम हमारे काम की वजह से नहीं होगी। क्योंकि इन सैकड़ों-हजारों लोगों ने अपना काम जितना वो कर सकते थे, उससे बेहतर किया था और जब सारे लोग कुछ बेहतर काम करते हैं तो नतीजा अपने आप शानदार हो जाता है। इसीलिए मिशन अपोलो-11 कामयाब रहा था
जब मैं जॉनसन स्पेस सेंटर के मैन्ड स्पेसक्राफ्ट सेंटर में अपने मिशन का प्रशिक्षण ले रहा था, तो वहां का माहौल ऐसा था कि आप ये नहीं पूछ सकते थे कि बॉस छुट्टी कब होगी? पूरे जुनून के साथ जुटे लोग तब तक काम में जुटे रहते थे, जबतक कि वो पूरा नहीं हो जाता था। कोई अपनी कलाई घड़ी पर नजर नहीं डालता था कि वक्त क्या हुआ है? पाली खत्म होने की बेल बजती जरूर थी, लेकिन घर कोई भी नहीं जाता था। लोगों ने अपनी लगन से प्रोजेक्ट अपोलो-11 को दूसरे सरकारी कामकाजों से बिल्कुल जुदा बना दिया था। हर कोई इस प्रोजेक्ट में पूरी दिलचस्पी, लगन और उत्साह के साथ जुटा हुआ था। सबके दिलोदिमाग में बस यही बात थी कि हमें कामयाब होकर दिखाना है। ऐसे माहौल में मेरा पूरा ध्यान पूरी तरह से अपने मिशन पर टिका था। एडविन बज एल्ड्रिन और माइकल कोलिंस मेरे लिए अजनबी नहीं थे, जेमिनी और अपोलो के शुरुआती मिशन्स के दौरान हम पहले भी साथ काम कर चुके थे। हमारी टीम नासा के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से लगातार नई-नई समस्याओं पर इंप्रोवाइज किया करते थे, कि अगर ये हो गया तो हम क्या करेंगे? अगर वो हो गया तो हमारा प्लान बी क्या होगा? जितनी मुसीबतों के बारे में हम सोच सकते थे, उन्हें सामने रख कर लंबी बहसें किया करते थे।
20 जुलाई 1969 को हमारा लैंडर ईगल चांद पर लैंड कर गया और अगले दिन 21 जुलाई को मैंने चंद्रमा पर पहले कदम रखे। लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैंने पहले से सोचकर रखा था कि चंद्रमा पर उतरने के बाद मैं ये लाइनें बोलूंगा। मैं आज बताता हूं, मैंने पहले से कुछ भी सोचकर नहीं रखा था और न ही कोई तैयारी की थी, हां लैंडर की नौ कदमों वाली सीढ़ी से उतरते वक्त जरूर मेरे दिल में तेज हलचल चल रही थी और इसी बीच मुझे ...जाइंट स्टेप ऑफ मैनकाइंड, वाली लाइनें सूझ गईं। पूरी दुनिया के लिए ये बेहद खास मौका था। मेरे बाद बज एल्ड्रिन उतरे, लोग मुझसे ये भी पूछते हैं कि अपोलो-11 की ज्यादातर फोटोग्राफ्स में बज एल्ड्रिन ही नजर आते हैं, मैं क्यों नहीं? ऐसा इसलिए, क्योंकि चंद्रमा पर हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं था और मैं ज्यादा से ज्यादा फोटोग्राफ्स लेने में जुटा था।
मिशन की तैयारी के दौरान विचार-विमर्श का एक लंबा दौर इस बात को लेकर भी चला कि चंद्रमा पर पहुंचकर हम क्या-क्या करेंगे। तमाम लोगों ने अपने-अपने सुझाव दिए। कुछ का कहना था कि हमें वहां यूनाईटेड नेशंस का झंडा लगाना चाहिए। तो वहीं कुछ लोग चाह रहे थे कि चंद्रमा पर कई देशों के छोटे-छोटे झंडे वहां लगाए जाएं। आखिर में ये फैसला लिया गया और मुझे लगता है कि कांग्रेस ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई कि अपोलो-11 कोई यूनाईटेड नेशंस का मिशन नहीं था और हम कोई वहां किसी मालिकाना हक का दावा करने नहीं जा रहे थे, लेकिन हम चाहते थे कि लोगों को पता चले कि हम यहां हैं, इसलिए हमने तय किया कि अपना राष्ट्रीय ध्वज ही वहां लगाएंगे। अमेरिका के झंडे को वहां लगाना मेरा काम था, चंद्रमा पर इसे लगाया जाना चाहिए या नहीं, इन बातों पर मेरा ध्यान बिल्कुल भी नहीं था। मुझे गर्व है कि अपने देश का झंडा चंद्रमा पर पहली बार मैंने लगाया।
चंद्रमा ने हमें कई तरह से हैरानी में डाल दिया। वहां की कई चीजों से मैं गहरे ताज्जुब में पड़ गया। सबसे ज्यादा हैरानी मुझे वहां के क्षितिज को देखकर हुई, धरती के मुकाबले चंद्रमा का क्षितिज हमारे बेहद करीब था। हमारे कदमों के साथ उड़ती चंद्रमा की धूल, जिसतरह उठकर वापस गिर रही थी, मैं उसे भी देखकर हैरान था। धरती पर आप धूल पर पैर पटकें तो वो उड़कर गुबार की शक्ल में छा जाएगी, लेकिन चंद्रमा पर ऐसा नहीं हो रहा था। हमारे पैर पटकने से धूल उठ रही थी लेकिन कोई गुबार सा नहीं बन रहा था। धरती पर धूल का गुबार वायुमंडल की वजह से बनता है, चंद्रमा पर वायुमंडल न होने से धूल हमारे पैरों के आसपास ही छिटक रही थी। चंद्रमा पर धूल तेजी से जमीन पर वापस गिरकर एक नई पर्त बना देती थी। ऐसा लगता था मानो इस धूल को एक हफ्ते पहले उडा़या गया था। ये वाकई हैरतंगेज था, मैंने ऐसा पहले कभी कुछ देखा-सुना नहीं था।
पब्लिक एड्रेस के दौरान लोग सवाल पूछते हैं कि क्या चीन की दीवार और मोंटाना के फोर्ट रेक डैम जैसी इंसानों की बनाई चीजें हमें चंद्रमा से नजर आ रही थीं या नहीं? ये सब अफवाह है और कुछ नहीं, चंद्रमा के क्षितिज से ऊपर हमें नीली पृथ्वी नजर आ रही थी। हमें महाद्वीप और ग्रीनलैंड दिख रहे थे। पृथ्वी लाइब्रेरी में रखे किसी ग्लोब के जैसी लग रही थी। हमें अंटार्कटिक नहीं दिखा, क्योंकि वो हिस्सा बादलों से ढंका था। पृथ्वी के घूमने के साथ हमें अफ्रीका साफ नजर आ रहा था। सूरज की किरणें किसी चीज से परावर्तित हो रहीं थीं, शायद चाड झील से हमने भारत और एशिया भी देखा। लेकिन हमें चंद्रमा से इंसान की बनाई चीन की दीवार या कोई दूसरी चीज नजर नहीं आई। हां, कई लोग ऐसी बातें करते हैं, लेकिन मैं अब तक किसी ऐसे अंतरिक्षयात्री से नहीं मिला जिसे अंतरिक्ष से मानव निर्मित दीवार या इमारतें दिखाई दी हों। यहां तक कि मैंने बाद में स्पेस शटल के साथ जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों से भी पूछा, लेकिन चीन की दीवार या कोई दूसरी चीज किसी को अंतरिक्ष से अब तक नजर नहीं आई है।
अंत में मैं अपनी पुरानी इच्छा व्यक्त करना चाहूंगा, मैं मंगल पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों के मिशन में शामिल होना चाहता हूं। मैं मंगल जाना चाहता हूं। मुझे लगता है, अब हम मंगल के सफर पर जा सकते हैं। हम मंगल को नजरअंदाज नहीं कर सकते, आज नहीं तो कल हमें मंगल पर जाना ही होगा।
- नील आर्मस्ट्रांग
कमांडर, मिशन अपोलो-11
( कमांडर नील आर्मस्ट्रांग के शब्दों में मिशन अपोलो-11 की यादें)

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

सत्य क्या है ?


बर्लिन से 24 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम की ओर हावेल नदी के तट पर बसा है जर्मनी के राज्य ब्रान्डेनबर्ग का मशहूर शहर पोस्टडैम। इसके करीब एक छोटा सा कस्बा है कापुत। कापुत की एक पहाड़ी की चोटी पर चीड़ के विशाल दरख्तों की झुरमुट के बीच लाल टाइल्स से चमकती लकड़ी के तख्तों और बल्लियों वाली छत और भूरे दरवाजों वाला एक मशहूर घर भी है। ये घर काफी खास है, क्योंकि ये घर है दुनिया के मशहूर गणितज्ञ और फिजिसिस्ट डॉ. अल्बर्ट आइंस्टीन का।
14 जुलाई 1930 दोपहर बाद, करीब 4 बजे गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर यहां की उन धूलभरी पगडंडियों पर गुजरे थे, जो आइंस्टीन के घर की तरफ जाती हैं। गुरुदेव ने उस दिन नीले रंग की हल्की पोशाक पहनी थी। उनका आधा मुड़ा एक हाथ पीठ पर था और सधे कदमों से थोड़ा आगे झुककर चलते हुए उन्होंने यहां आइंस्टीन के साथ कुछ चहलकदमी भी की थी।
गुरुदेव टैगोर और आइंस्टीन की ये एतिहासिक मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड डॉ़. मेंडल के जरिए मुमकिन हुई थी। 14 जुलाई 1930 को टैगोर आइंस्टीन से मिलने कापुत की पहाड़ी पर मौजूद उनके घर गए। इस दोस्ताना सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आइंस्टीन डॉ. मेंडल के घर गए जहां गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर से उनकी दूसरी मुलाकात हुई। टैगोर और आइंस्टीन की ये दोनों मुलाकातें रिकार्ड की गईं और गुरुदेव-आइंस्टीन के फोटोग्राफ भी लिए गए। 
'वॉयेजर' अपने सुधी पाठकों के लिए,14 जुलाई 1930 को कापुत के घर में गुरुदेव और आइंस्टीन के बीच हुई पहली मुलाकात के दौरान हुई बातचीत का पूरा ब्योरा पहली बार हिंदी में पेश कर रहा है। बातचीत का ये पूरा ब्योरा जॉर्ज, एलन एंड अनविन की किताब द रिलिजन आफ मैन में प्रकाशित है।

गुरुदेव आप यहां दो आदि तत्वों, टाइम एंड स्पेस (हमने जानबूझकर इसका अनुवाद नहीं किया) के गणितीय समीकरणों को हल करने में व्यस्त हैं। जबकि मैं इस देश में व्यक्ति में निहित ईश्वरीय शाश्वतता और ब्रह्मांड पर व्याख्यान दे रहा हूं।
आइंस्टीन क्या आप इस दुनिया से परे ईश्वर की सत्ता में यकीन रखते हैं?
गुरुदेव नहीं, परे नहीं। मानव में बसी ईश्वरीय शाश्वतता इस ब्रह्मांड में समाई हुई है। ऐसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं है, जो मानव व्यक्तित्व का हिस्सा न हो। इसलिए ये साबित होता है कि ब्रह्मांड का सत्य ही मानव का सत्य है। 
आइंस्टीन ब्रह्मांड की प्रकृति के बारे में दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। पहली ये कि सृष्टि एक ऐसी इकाई है जो मानवता पर निर्भर करती है और दूसरी ये कि दुनिया एक ऐसी हकीकत है जिसपर मानव के होने या न होने का कोई असर नहीं। 
 गुरुदेव   जब ब्रह्मांड मानव के साथ एक लय एक तालमेल, एक शाश्वत संबंध बनाता है, तो इसी को सत्य कहते हैं और हम इसके सौंदर्य से अभीभूत हो जाते हैं। 
आइंस्टीन ब्रह्मांड को लेकर ये एक विशुद्ध मानवीय अवधारणा है।
गुरुदेव  हमारी दुनिया मानवीय दुनिया है, इसकी वैज्ञानिक अवधारणा भी वैज्ञानिक मानव की ही है। इसलिए हमसे परे किसी भी संसार का अस्तित्व नहीं है। वो एक सापेक्ष संसार है, जिसकी सच्चाई इस बात पर निर्भर होगी कि वो हमारी चेतना पर किस हद तक असर डालता है। कारण और आनंद के कुछ मानक हैं, जो इसे सत्य का स्वरूप प्रदान करते हैं। सर्वशक्तिमान ईश्वर का मानक भी यही है, जिसका अनुभव हम मानवों के अनुभवों के बगैर मुमकिन नहीं।
आइंस्टीन यही है, मानव अस्तित्व को अनुभव करना
गुरुदेव  हां, एक शाश्वत आध्यात्मिक अस्तित्व। हमें अपने कार्यकलापों और अपनी भावनाओं द्वारा इसे गहराई से अनुभूत करना चाहिए। हम उस सर्वशक्तिमान ईश्वर को अनुभूत करते हैं जो असीम और अनंत है और जो हमारी हर सीमा से परे है।
 साइंस का संबंध उन चीजों से है जो किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं। साइंस, हम जो अब तक समझ सके हैं उस सत्य का मानव रचित गैरव्यक्तिवादी संसार है। इसी सत्य की व्याख्या धर्म अपने तरीके से करता है और उसे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरतों से जोड़ देता है। सत्य को लेकर हमारी व्यक्तिगत चेतना एक सार्वभौमिक गौरव अर्जित कर लेती है। धर्म सत्य में नैतिकता का समावेश करता है और इसके साथ हम जितना तालमेल कायम करते हैं, उतनी ही गहराई से इसे समझते जाते हैं।          
आइंस्टीन – तो फिर सत्य, या सुंदरता क्या मानव से निरपेक्ष नहीं है?
गुरुदेव  नहीं, मैंने ऐसा नहीं कहा।
आइंस्टीन – अगर मानव सभ्यता खत्म हो जाए, तो क्या अपोलो बेलवेडेर की प्रतिमा खूबसूरत नहीं रहेगी ?
गुरुदेव  नहीं !
आइंस्टीन – सुंदरता के प्रति इस अवधारणा से मैं सहमत हूं, लेकिन ये बात सत्य पर लागू नहीं होती।
गुरुदेव  क्यों नहीं ? आखिर सत्य की अनुभूति भी मानव द्वारा ही होती है।
आइंस्टीन – मैं ये साबित नहीं कर सकता कि मेरी अवधारणा सही है, लेकिन मेरा मानना यही है।
गुरुदेव  मैं सुंदरता को इस तरह पारिभाषित करूंगा कि सार्वभौम ईश्वर में निहित एक बिल्कुल सही और आदर्श तालमेल। सार्वभौम चेतना की संपूर्ण समझ ही सत्य है। अपनी जाग्रत चेतना के माध्यम से, अपने अर्जित अनुभवों के जरिए, अपनी चूकों और दोषों के साथ हम मानव इस सत्य तक पहुंचने की कोशिश करते रहते हैं। इसके अलावा सत्य को हम और कैसे जान सकते हैं ?
आइंस्टीन – मैं साबित तो नहीं कर सकता, लेकिन मैं इस पाइथागोरियन अवधारणा में यकीन करता हूं कि सत्य मानव पर निर्भर या आश्रित नहीं है। मानव रहें या न रहें, इससे सत्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता वो पूरी तरह से मुक्त है। निरंतरता के तर्क की समस्या भी यही है।
गुरुदेव  सत्य, जो सार्वभौम है, ईश्वर के साथ एकाकार है, वो अनिवार्य रूप से मानव के लिए ही है। अन्यथा हम में से हर कोई सत्य के रूप में जो कुछ अनुभूत करता है, उसे सत्य कभी नहीं कहा जा सकता। कम से कम वो सत्य, जिसे वैज्ञानिक कहा जाता है, उस तक भी केवल तार्किक प्रक्रिया, या दूसरे शब्दों में कहें तो वैचारिक अंग जो कि मानवीय है, के जरिए ही पहुंचा जा सकता है। भारतीय दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही परम सत्य है, जिसे मानव मस्तिष्क न तो एकांतवास से समझ सकता है और न ही जिसकी व्याख्या शब्दों के जरिए संभव है। लेकिन उस परब्रह्म परमात्मा की अनंतता को आत्मसात करके, उसके साथ खुद को समाहित करके उस निरपेक्ष परम सत्य - ब्रहम् का अनुभव किया जा सकता है। लेकिन ऐसे सत्य का साइंस से कोई लेना-देना नहीं है। हम सत्य की जिस प्रकृति पर बातचीत कर रहे हैं, वो इस पर निर्भर है कि हमारे सामने वो किस रूप में प्रकट या उपस्थित होता है। या कहना चाहिए कि मानव मस्तिष्क को लगता है कि यही सत्य है, और इसीलिए ये मानव पर आश्रित है, और शायद इसे माया या भ्रम भी कहा जा सकता है।
आइंस्टीन – ये किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि संपूर्ण प्राणीजगत का भ्रम है।
गुरुदेव  संपूर्ण जीव प्रजातियां भी एक ही इकाई, मानव जाति से संबंध रखती हैं। इसीलिए संपूर्ण मानव मस्तिष्क एकसाथ एक ही सत्य का अनुभव करता है। ये वो बिंदु है जहां भारतीय और यूरोपियन मस्तिष्क एकसमान अनुभव से एकसाथ जुड़ जाते हैं।
आइंस्टीन – जर्मन में जीव प्रजाति शब्द का इस्तेमाल संपूर्ण मानव जाति, और यहां तक कि कपियों और मेंढकों के साथ सभी सजीवों को एकसाथ संबोधित करने के लिए किया जाता है। समस्या ये है कि क्या सत्य हमारी चेतना से निरपेक्ष, अप्रभावित और मुक्त है?
गुरुदेव  हम जिसे सत्य कहते हैं वो वास्तविकता के व्यक्तिपरक और वस्तुपरक पहलुओं के बीच विवेकपूर्ण साम्य में अंतरनिहित है, और ये दोनों ही सुपरपर्सनल पुरुष (ईश्वर) से संबंधित हैं।
 आइंस्टीन – रोजमर्रा की जिंदगी में हम अपने मस्तिष्क से कई ऐसे काम करते हैं, जिनके लिए हम जिम्मेदार नहीं होते। बाहर की वास्तविकताओं पर मस्तिष्क उससे निरपेक्ष रहकर प्रतिक्रिया करता है। उदाहरण के तौर पर इस घर में शायद कोई भी न हो, लेकिन तब भी वो मेज वहीं बनी रहेगी जहां वो है।
गुरुदेव  हां, वो व्यक्तिगत मस्तिष्क से बाहर तो बनी रहेगी, लेकिन यूनिवर्सल माइंड के बाहर नहीं। मेज वो चीज है जो हमारी चेतना द्वारा इंद्रियगोचर है।  
आइंस्टीन – अगर इस घर में कोई भी नहीं हो, तो भी वो मेज वहीं बनी रहेगी, लेकिन आपके दृष्टिकोण से ये पहले ही अनुचित है, क्योंकि हम ये व्याख्या नहीं कर सकते कि इसका क्या अर्थ है कि हमसे निरपेक्ष रहते हुए मेज वहां रखी है। सत्य के अस्तित्व के संबंध में हमारे सहज दृष्टिकोण की मानव जाति से परे न तो व्याख्या की जा सकती है और न इसे साबित किया जा सकता है, लेकिन ये ऐसा विश्वास है, जिसे कोई भी यहां तक कि छोटे से छोटा प्राणी भी छोड़ना नहीं चाहता। हमने सत्य को सुपरह्युमन ऑब्जेक्टिविटी के साथ प्रतिस्थापित कर रखा है। ये हमारे लिए परम आवश्यक है, इसका कोई विकल्प नहीं। ये वास्तविकता हमारे अस्तित्व, हमारे अनुभव और हमारे मस्तिष्क से निरपेक्ष या मुक्त है, हालांकि हम ये नहीं कह सकते कि इसका अर्थ क्या है।
गुरुदेव  किसी भी स्थिति में, अगर कोई ऐसा सत्य है जिसका मानवजाति से कोई सरोकार न हो, तो हमारे लिए ये पूरी तरह से अस्तित्वहीन है
आइंस्टीन – तब तो मैं आपसे भी कहीं ज्यादा धार्मिक और आस्थावान हो जाऊंगा
टैगोर – मेरे स्वयं के व्यक्तित्व में उस सुपरपर्सनल पुरुष - सार्वभौम आत्मा (ईश्वर), के साथ सामंजस्य, एक लय कायम करना ही मेरा धर्म है।