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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

"हमारे सूरज के जुड़वां का वजूद मुमकिन"


साइंस जर्नल इकरस के नवंबर 2010 के अंक में एक ऐसा पेपर पब्लिश हुआ जिसने स्पेस साइंस में एक नई हलचल मचा दी। ये रिसर्च पेपर था एस्ट्रोफिजिसिस्ट जॉन मैटसे और डैनियल व्हिटमायर का और अपने इस पेपर में इन दोनों वैज्ञानिकों ने संभावना जताई थी कि हमारे सौरमंडल के बाहरी आवरण ओर्ट्स क्लाउड रीजन में हमारे सूरज का जुड़वां मौजूद हो सकता है। यानि सूरज से छिटका वो पदार्थ जो सितारा नहीं बन सका और सौरमंडल की रचना की प्रक्रिया के दौरान एक विशाल गैस जाइंट की शक्ल में इस ओर्ट्स क्लाउड रीजन में छिटक गया। इन वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया है कि सूरज का जुड़वा ये गैस जाइंस हमारे बृहस्पति से भी चार गुना ज्यादा विशाल हो सकता है। इन शोधकर्ताओं ने इस संभावित गृह का नाम टाईकी रखा और अपने इस पेपर में सिफारिश की कि उनके आंकलन की जांच वाइड-फील्ड इंफ्रारेड सर्वे एक्सप्लोरर यानि वाइस मिशन से कराई जाए। वाइस नासा का मिशन है, जो ऐसी स्पेस ऑब्जरवेटरी है जो इंफ्रारेड आंखों की मदद से अंतरिक्ष की छानबीन में जुटी है। चार अलग-अलग इंफ्रारेड वेवलेंथ से डेढ़ बार अंतरिक्ष को छान चुकी स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस ने दूर-दराज की आकाशगंगा से लेकर धरती से करीब मंडराती छोटी उल्काओं तक की ढाई करोड़ से ज्यादा तस्वीरें लेकर नासा को भेजी हैं। ये तस्वीरें ही वाइस का वो डेटा हैं जिनकी गहन जांच की जा रही है और जिनके शुरुआती डेटा इस साल अप्रैल में सार्वजनिक किए जाएंगे। स्काई स्कैनिंग के दौरान वाइस ने अल्ट्रा कोल्ड स्टार यानि ब्राउन ड्वार्फ से लेकर 20 नए धूमकेतुओं, 134 नियर अर्थ ऑब्जेक्ट्स और मंगल और बृहस्पति के बीच मौजूद उल्काओं की बेल्ट में 33,000 नई उल्काओं की खोज की है। इस महत्वपूर्ण खोज के बाद वाइस अब फरवरी 2011 से हाइबरनेशन यानि शीतनिद्रा में चली जाएगी, यानि वैज्ञानिक इस स्पेस ऑब्जरवेटरी के कंप्यूटर्स को शट डाउन कर देंगे, ताकि ये ऑब्जरवेटरी अगले एसाइनमेंट के लिए तैयार हो सके। इस दौरान वाइस के डेटा के विश्लेषण का काम चलता रहेगा और वाइस के फाइनल डेटा मार्च 2012 में रिलीज किए जाएंगे। यानि इस सवाल, कि क्या हमारे सौरमंडल के नौंवे ग्रह का अस्तित्व है, का जवाब पूरी तरह से मार्च 2012 में ही मिल सकेगा जब वाइस के फाइनल डेटा जारी किए जाएंगे। इस दौरान हमें इस सवाल से संबधित कुछ प्रमुख सवालो पर नासा की जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी के वैज्ञानिक और प्रमुख ग्रह खोजी व्हिटने क्लेविन के जवाब प्राप्त हुए हैं। पेश हैं ये सवाल-जवाब -
 सवाल - वाइस के डेटा से इस बात की पुष्टि या खंडन कब तक हो सकेगा कि टाइकी नाम का कोई ग्रह है या नहीं?
क्लेविन - अभी ये कहना बहुत जल्दबाजी होगा कि हमें ये सच्चाई कब तक मालूम हो सकेगी कि ओर्ट्स क्लाउड में टाईकी नाम का कोई विशाल ग्रह वजूद में है या नहीं। इसके लिए अभी हमें ऑब्जरवेशन में कुछ और साल लगाने होंगे तभी हम जान सकेंगे कि वाइस ने वाकई कोई ऐसी चीज देखी है या नहीं। स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस के कामकाज शुरू करने के बाद के पहले 14 हफ्तों के डेटा इस साल अप्रैल में जारी किए जा रहे हैं, लेकिन इस सवाल का जवाब देने के लिए ये नाकाफी हैं। वाइस का फुल सर्वे डेटा मार्च 2012 में जारी किया जाएगा, तभी हमें इसमें जवाब की कोई झलक दिख सकेगी। वाइस के डेटा के वैज्ञानिक विश्वेषण का काम पूरा हो जाने के बाद ही पता चलेगा कि मैटसे और व्हिटमायर के आंकलन सही है या नहीं।
सवाल - अगर ओर्ट्स क्लाउड रीजन में टाइकी जैसा कोई ग्रह हुआ तो क्या ये तय है कि वाइस ने उसे जरूर देखा होगा?
क्लेविन - हां इसकी पूरी संभावना है, लेकिन फिरभी टाइकी का वजूद है या नहीं, केवल वाइस के डेटा से इसकी पुष्टि नहीं हो सकती। देखिए पहले वाइस ने पूरे स्काई का सर्वे किया, इसके छह महीने बाद अपनी दो इंफ्रारेड बैंड्स की मदद से उसने फिर उन सभी इलाकों पर दोबारा नजर डाली। अगर टाइकी जैसी कोई बॉडी वहां मौजूद है तो छह महीने के दौरान उसकी पोजीशन में फर्क जरूर आया होगा। ये जो दो खास इंफ्रारेड बैंड्स हैं, इनके इस्तेमाल से दूसरे स्काई सर्वे के दौरान छोटे पिंड, अल्ट्रा कोल्ड स्टार्स या ब्राउन ड्वार्फ की पहचान की गई है, जो कि बृहस्पति से भी विशाल गैसीय ग्रह जैसे भी हो सकते हैं, टाइकी के बारे में भी ऐसा ही बताया गया है। लेकिन इसकी पुष्टि के लिए ग्राउंड ऑब्जरवेशन भी जरूरी है।
सवाल - अगर टाइकी का वजूद वाकई में है, तो अपने ही सौरमंडल में एक और ग्रह की खोज करने में इतना वक्त क्यों लग गया?
क्लेविन - देखिए टाइकी एक अल्ट्रा कोल्ड बॉडी होगी, जो किसी भी दृश्य रोशनी के टेलिस्कोप के लिए अदृश्य होगी। क्योंकि ऐसी अल्ट्रा कोल्ड बॉडीज से ऐसे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियन नहीं निकलते जिन्हें हम देख सकते हैं। हमारे देखने की एक सीमा है, जो बहुत थोड़ी है। ऐसी अल्ट्राकोल्ड चीजों से फूटने वाली ग्लो यानि रोशनी को किसी संवेदनशील इंफ्रारेड टेलिस्कोप की मदद से ही पकड़ा जा सकता है, बशर्ते वो सही दिशा में देख रही हों। स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस एक संवेदनशील इंफ्रारेड ऑब्जरवेटरी है, जो सभी दिशाओं में देख सकती है।
सवाल - इस संभावित ग्रह का नाम टाइकी क्यों रखा गया? आखिर एक यूनानी नाम का चुनाव क्यों किया गया, जबकि बाकी सभी दूसरे ग्रहों के नाम रोमन माइथोलॉजी से लिए गए हैं?
क्लेविन - 1980 में ये संभावना जताई गई कि शायद सूरज का भी कोई साथी है, शायद हमारी दुनिया दो सूरज वाली है, लेकिन ये दूसरा सूरज कहीं छिपा है। यूनानी देवी के नाम पर इस दूसरे सूरज का नाम रखा गया- नेमेसिस। संभावना ये भी जताई गई कि एक निश्चित अंतराल पर पृथ्वी पर हुए सामूहिक विनाश की घटनाओं के रहस्य को नेमेसिस से जोड़कर समझा जा सकता है। गणना की गई कि नेमेसिस का परिक्रमा-पथ बहुत ज्यादा इलिप्टिकल होगा, जिससे शायद हर ढाई करोड़ साल में एक बार ओर्ट्स क्लाउड रीजन में मौजूद धूमकेतुओं को भारी उथल-पुथल को जन्म देता होगा, ये घटना इतनी बड़ी होती होगी कि यहां से आंतरिक सौरमंडल के लिए धूमकेतुओं की एक बौछार सी फूट पड़ती होगी। इनमें से कुछ धूमकेतु पृथ्वी से जा टकराते होंगे, जिससे वहां मौजूद जीवन का बिल्कुल सफाया सा हो जाता होगा।
लेकिन हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से नेमेसिस परिकल्पना की पुष्टि नहीं हुई और नियमित अंतराल से पृथ्वी पर होने वाले जीवन के सफाये की घटनाओं से इसका कोई संबंध नहीं निकला। इसका मतलब ये कि नेमेसिस की परिकल्पना में कोई दम नहीं निकला और ये महज कल्पना की उड़ान से ज्यादा कुछ और साबित नहीं हुई। फिरभी, ये पूरी तरह मुमकिन है कि हमारे सूरज से बहुत दूर इसके एक ऐसे जुड़वां साथी का वजूद हो, जिसे अब तक देखा नहीं गया है और जो एक वृत्ताकार कक्षा में कुछ लाख साल में सूरज की परिक्रमा कर रहा हो। अगर ऐसा है भी तो हमारे सौरमंडल के जीवन पर इसका कोई असर नहीं है। वैज्ञानिकों ने इस जुड़वां सूरज नेमेसिस का संबंध नौंवें संभावित ग्रह से जोड़ने के लिए ही उसका नाम टाइकी रखा, जो यूनानी माइथोलॉजी के मुताबिक देवी नेमेसिस की बहन है।

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

अपने सौरमंडल में ‘दूसरे बृहस्पति’ की खोज!

हमारे सौरमंडल में ही एक नए ग्रह के मौजूद होने की संभावना है। ये दावा किया है यूनिवर्सिटी आफ लुसियाना के एस्ट्रोफिजिसिस्ट जॉन मैटेसे और डेनियल व्हिटमायर ने। इन वैज्ञानिकों का दावा है कि हमारे सौरमंडल का ये नया ग्रह बृहस्पति से भी चार गुना विशाल होगा। यूनिवर्सिटी आफ लुसियाना के एस्ट्रोफिजिसिस्ट जॉन मैटेसे और डेनियल व्हिटमायर का दावा है कि हमारे सूरज से 22500 करोड़ किलोमीटर दूर, बर्फीले मलबे और करोड़ों धूमकेतुओं से भरी सौरमंडल की बाहरी सीमा ओर्ट्स क्लाउड में मौजूद हो सकता है हमारे सौरमंडल का ये नया ग्रह जिसका कामचलाऊ नाम इन वैज्ञानिकों ने रखा है – टाइकी।
सौरमंडल से बाहर अब तक हम 500 नए ग्रहों की खोज कर चुके हैं। प्लूटो की खोज के 81 साल बाद भी शायद अपने सौरमंडल से हमारी जान-पहचान अधूरी है। नासा ने दिसंबर 2009 को स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइड फील्ड इंफ्रारेड एक्सप्लोरर यानि वाइस को लांच किया था। स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस का मकसद ये पता लगाना था कि हमारी धरती के आस-पास छोटे आकार वाली कितनी उल्काएं और धूमकेतु मौजूद हैं और उनके गुजरने का रास्ता क्या है।
उल्काओं और धूमकेतुओं के सर्वे के दौरान वाइस ने हमारे सौरमंडल की बाहरी सीमा यानि ओर्ट्स क्लाउड रीजन पर भी की इंफ्रारेड निगाह डाली है। एस्ट्रोफिजिसिस्ट जॉन मैटेसे और डेनियल व्हिटमायर का दावा है कि स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस के डेटा में यहां एक नए बृहस्पति की मौजूदगी के संकेत मिलने की पूरी संभावना है। दरअसल जॉन और डेनियल 12 साल से ओर्ट्स क्लाउड से आने वाले धूमकेतुओं का अध्ययन कर रहे हैं। इस दौरान इन्होंने पता लगाया कि इस इलाके से सौरमंडल के भीतर आने वाले धूमकेतुओं का रास्ता गणितीय गणना वाले परिक्रमा पथ से मेल नहीं खा रहा है। इससे ये वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि ओर्ट्स क्लाउड रीजन में बृहस्पति से भी विशाल कोई ऐसा विशाल पिंड मौजूद हो सकता है, जिसके गुरुत्वाकर्षण की वजह से जब धूमकेतु इसके करीब से गुजरते हैं तो वो अपने तय रास्ते से विचलित हो जाते हैं।
एस्ट्रोफिजिसिस्ट जॉन मैटेसे और डेनियल व्हिटमायर का दावा है कि सौरमंडल का ये नया बृहस्पति - टाइकी 22500 करोड़ किलोमीटर के विशाल परिक्रमा-पथ से सूरज की परिक्रमा कर रहा है। संभावना ये भी जताई जा रही है कि ये नया बृहस्पति टाइकी दरअसल किसी दूसरे सूरज का ग्रह था, जो वहां से छिटकने के बाद हमारे सूरज के गुरुत्वाकर्षण बल से खिंचकर यहां आ गया है।
वैज्ञानिकों को इंतजार है अप्रैल महीने का जब इंफ्रारेड स्पेस ऑब्जरवेटरी वाइस के डेटा सार्वजनिक किए जाएंगे। इसके बाद जमीन पर मौजूद दूसरी ऑब्जरवेटरीज इन डेटा की जांच करेंगी। कड़ी जांच-पड़ताल के बाद ही अंतिम तौर पर फैसला लिया जाएगा कि ओर्ट्स क्लाउड रीजन में वाकई कोई नया बृहस्पति मौजूद है या नहीं। और अगर वाकई बृहस्पति जैसा ग्रह मौजूद है इस सबसे बड़ी खोज का आधिकारिक नाम क्या रखा जाए और इसका दर्जा क्या हो, ये तय करने की जिम्मेदारी निभाएगा इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन। ये बात तय है कि अगर एस्ट्रोफिजिसिस्ट जॉन मैटेसे और डेनियल व्हिटमायर का दावा सच साबित हुआ तो ग्रहों के बारे में हमारी अवधारणा में एक बहुत बड़ा बदलाव आ जाएगा और दुनियाभर के स्कूलों में साइंस की किताबों में एक बार फिर संशोधन करना पड़ेगा।
(संपादक - ये समाचार टाइम और इंडिपेंडेट में प्रकाशित रिपोर्टो पर आधारित है। इस संबंध में वॉयेजर एस्ट्रोफिजिसिस्ट जॉन मैटेसे और डेनियल व्हिटमायर से संपर्क कर उनका पक्ष जानने की कोशिश कर रहा है। इन वैज्ञानिकों का जवाब मिलते ही प्रकाशित किया जाएगा। बृहस्पति के चार गुना विशाल गैस  जाइंट का होना असंभव नहीं है। 2008 में नीदरलैंड्स के चार अंडरग्रैजुएट छात्रों ने सौरमंडल से बाहर एक मैसिव गैस जाइंट प्लेनेट की खोज की थी। इस नए ग्रह का वैज्ञानिक नाम OGLE2-TR-L9b रखा गया और गैस जाइंट हमारे बृहस्पति से पांच गुना विशाल था। दरअसल कोई ग्रह कितना विशाल हो सकता है ये उसके सितारे के द्रव्यमान पर निर्भर करता है। आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाओं के लिए हृदय से धन्यवाद, कृपया वॉयेजर को अपना समर्थन जारी रखें।)

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

मंगल ग्रह पर 'पहला मानव मिशन' लैंडिग को तैयार

पहला अंतरराष्ट्रीय मानव मंगल मिशन, आठ महीनों के लंबे सफर के बाद मंगल ग्रह की कक्षा में कामयाबी के साथ प्रवेश कर चुका है। चौंकिए मत, तीन देशों के छह मंगलयात्री मंगल ग्रह पर अब लैंड करने की तैयारी में हैं, ये बात अलग है कि ये असली मिशन नहीं, बल्कि एक सिमुलेशन है। जी हां, मंगल ग्रह पर पहला मानव मिशन भेजने से पहले कुछ सवालों के जवाब तलाशना बेहद जरूरी था, जैसे - 8 महीने लंबा मंगल का सफर मंगल यात्रियों की मन:स्थिति पर क्या असर डालेगा? मंगलयात्री इस लंबे सफर के दौरान अकेलेपन की समस्या का सामना कैसे करेंगे? अलग-अलग देशों के मंगलयात्रियों के बीच मानव व्यवहार से संबंधित कैसी-कैसी समस्याएं आ सकती हैं? कोई आपात स्थिति आने पर मंगलयात्री उसका सामना कैसे करेंगे और एक स्पेसक्राफ्ट के बेहद सीमित से माहौल में उनके समाधान क्या होंगे? इन सारे सवालों का जवाब तलाशने के लिए मॉस्को के इंस्टीट्यूट आफ बायोमेडिकल प्रॉब्लम्स में मार्स-500 नाम का एक सिमुलेटेड मानव मंगल अभियान का प्रयोग किया जा रहा है। सिमुलेटेड ह्युमन मार्स मिशन यानि मार्स-500 में तीन रूसी, दो यूरोपियन और एक चीन का यानि कुल छह प्रायोगिक मंगलयात्री एक डिब्बे जैसे स्पेसक्राफ्ट के मॉडल में पिछले आठ महीने से बंद हैं। बिना किसी खिड़की वाले इस मॉडल में बंद ये सभी छह प्रायोगिक मंगलयात्री सिमुलेट कर रहे हैं कि मानो ये सभी मंगल के सफर पर निकल चुके हैं। कुल 520 दिनों के इस मिशन मार्स-500 में आठ महीने बिताने के बाद अब ये सभी प्रायोगिक अंतरिक्षयात्री अपने स्पेसक्राफ्ट के सिमुलेटेड मॉड्यूल के साथ मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश कर चुके हैं।
ये प्रयोग केवल मनोरंजन के लिए नहीं किया जा रहा, बल्कि इसके साथ बेहद गंभीर साइंस और कई अहम अध्ययन जुड़े हैं। मार्स-500 से मिलने वाले नतीजों से भावी मानव मंगल अभियान की रूपरेखा तय होगी। मार्स-500 के चालक दल के सभी सदस्य बिल्कुल इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में मौजूद अंतरिक्ष यात्रियों जैसा ही व्यवहार कर रहे हैं। उन्हें अंतरिक्षयात्रियों को दिया जाने वाला खाना ही दिया जा रहा है और उन्हें अंतरिक्षयाक्षियो की तरह ही रोज व्यायाम भी करना होता है। यहां तक कि मिशन कंट्रोल रूम के कमांड भी हर दिन तय होने वाली दूरी के हिसाब से ही कुछ देरी के साथ इन मंगलयात्रियों को मिलते हैं। मंगल ग्रह तक की वर्चुअल फ्लाइट के 244 दिन पूरे हो जाने के बाद अब मार्स-500 के तीन मंगलयात्री बकायदा स्पेससूट पहकर एक सिमुलेटेड लैंडर में बैठकर अब 12 फरवरी को मंगल ग्रह पर लैंड करेंगे और इसके दो दिन बाद यानि 14 फरवरी को बकायदा हैच खोलकर मंगल ग्रह की प्रायोगिक जमीन पर लैंड करेंगे। इन मंगलयात्रियों को मंगल ग्रह पर तीन ईवीए यानि स्पेसक्राफ्ट से बाहर निकलकर चहल-कदमी करनी है। सबसे पहले 14 फरवरी को एलेक्जेंडर स्मोलेव्स्की और डियेगो उरबिना सबसे पहले मंगल की बनावटी जमीन पर उतरेंगे। इसके बाद 18 फरवरी को स्मोलेव्स्की और वांग यू और 22 फरवरी को स्मोलेव्स्की और उरबिना फिर से और अंतिम सिमुलेटेड मार्स-वॉक करेंगे।
यूरोपियन स्पेस एजेंसी के ह्युमन स्पेसफ्लाइट डायरेक्टर सिमोनेट्टा डि-पिपो कहते हैं," मार्स-500 एक विजनरी एक्सपेरीमेंट है। अंतरिक्ष अनुसंधान में आगे बढ़ने और कुछ ठोस कर दिखाने के लिए यूरोप अब तैयार है। हमारी टेक्नोलॉजी, हमारी साइंस हर दिन और ज्यादा मजबूत होती जा रही है। मार्स-500 अभी एक सिमुलेशन मिशन है, लेकिन हम इसे हकीकत में बदल कर दिखाने के लिए लगातार काम कर रहे हैं।"

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

अंतरिक्ष में वेलेन्टाइन्स-डे !

कॉरनेल यूनिवर्सिटी में उत्साह का माहौल है, नासा के धूमकेतु मिशन 'स्टारडस्ट-नेक्स्ट' ने अपने लक्ष्य कॉमेट टेम्पल-1 की पहली तस्वीर भेजी है और यहां के प्रो. जो वेवेरका समेत वैज्ञानिकों की एक पूरी टीम इसके विश्वलेषण में जुटी है। कॉरनेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की ये टीम नासा के स्टारडस्ट मिशन में अहम भूमिका निभा रही है। अंतरिक्ष के महासागर में एक धूमकेतु जैसे छोटे और तेज रफ्तार लक्ष्य को साधना हमेशा बेहद मुश्किल काम रहा है। लेकिन हम स्पेसक्राफ्ट स्टारडस्ट के जरिए ये कर रहे हैं आखिर मामला वेलेंटाइन्स-डे का जो है।
कॉरनेल यूनिवर्सिटी समेत नासा के वैज्ञानिक इस बार अंतरिक्ष में एक अनोखी मुलाकात के जरिए इस बार के वेलेंटाइन डे को यादगार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। 7 फरवरी को अंतरिक्ष में 12 साल पूरे कर लेने के बाद मिशन स्टारडस्ट-नेक्स्ट ने अब अपने रॉकेट का इस्तेमाल करके खुद को धूमकेतु टेम्पल-1 की दिशा में घुमा लिया है। मिशन स्टारडस्ट ने कैमरे से अपने लक्ष्य धूमकेतु टेम्पल-1 की पहली तस्वीर लेकर हमें भेजी है। स्पेसक्राफ्ट स्टारडस्ट-नेक्स्ट की आंख से ये रहा धूमकेतु टेम्पल-1...वेलेंटाइन डे यानि 14 फरवरी को भारतीय समय के अनुसार सुबह करीब 10.30 बजे नासा का ये खास कॉमेट मिशन- स्पेसक्राफ्ट स्टारडस्ट धूमकेतु टेम्पल-1 के बेहद करीब से गुजरेगा। नासा के इस मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों के अनुसार इस अनोखी फ्लाईबाई में स्टारडस्ट स्पेसक्राफ्ट इस धूमकेतु के 200 किलोमीटर तक करीब जाएगा।
स्टारडस्ट-नेक्स्ट मिशन अब डेढ़ मील प्रति घंटे की रफ्तार से करीब 8 किलोमीटर बड़े धूमकेतु टेम्पल-1 की ओर बढ़ा चला जा रहा है। धूमकेतु टेम्पल-1 पांच साल और छह महीने में सूरज की एक परिक्रमा पूरी करता है। ये वही धूमकेतु है, जिसपर नासा के एक और मिशन डीप इम्पैक्ट ने जुलाई 2005 में इसपर एक भारी इम्पैक्टर की टक्कर करवाई थी। इस इम्पैक्ट एक्सपेरीमेंट से छिटके धूल और गुबार के रासायनिक विश्लेषण के बाद मिशन डीप इम्पैक्ट ने ये खोज की थी कि धूमकेतु टेम्पल-1 जैसे विशाल धूमकेतुओं के धरती पर गिरने से ही हमारे महासागरों का जन्म हुआ है। 2005 के इस इम्पैक्ट एक्सपेरीमेट के बाद अब दोबारा एक और साइंस मिशन स्टारडस्ट-नेक्स्ट इस धूमकेतु की ओर बढ़ा चला जा रहा है।
वैलेंटाइन्स-डे पर अंतरिक्ष में हो रही इस मुलाकात का मकसद ये पता लगाना है कि 2005 के उस इम्पेक्ट एक्सपेरीमेंट के बाद अब इस धूमकेतु में क्या बदलाव आए हैं, ये धूमकेतु किन पदार्थों से बना है और इनका जन्म कैसे हुआ? कॉमेट यानि धूमकेतुओं के रहस्य को समझने के लिए इस मिशन को 1999 में लांच किया गया था। मिशन स्टारडस्ट अपने अभियान में काफी सफल रहा है और इसने 2006 में कॉमेट वाइल्ड-2 की पूंछ से उत्सर्जित हो रहे पदार्थों के सैंपल एक कैप्सूल में लेकर उसे धरती को वापस भेजा था। कॉमेट वाइल्ड-2 की सफल सैंपलिंग के बाद वैज्ञानिकों ने इसे दूसरे मिशन पर कॉमेट टेम्पल-1 की ओर रवाना कर दिया और इसे एक नया नाम दे दिया - मिशन स्टारडस्ट-नेक्स्ट

मिशन कैप्लर के नतीजों से 'सेटी' जोश में

पृथ्वी जैसे नए ग्रहों की स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर की ताजा खोज से सेटी प्रोजेक्ट को जबरदस्त बढ़ावा मिला है। सेटी यानि सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस 40 से ज्यादा साल से किसी परग्रहीय बौद्धिक सभ्यता के रेडियो सिग्नल पकड़ने की कोशिश में जुटा है। एक सितारे के हैबिटेट जोन में पृथ्वी जैसे हैबिटेट ग्रहों की खोज ने उन सबको एक नए जोश से भर दिया है, जो यकीन करते हैं कि हम मानवों जैसी या फिर इससे भी उन्नत बौद्धिक सभ्यता धरती से दूर किसी न किसी ग्रह पर जरूर मौजूद है।
नासा की स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर पृथ्वी से मिलते-जुलते ऐसे नए ग्रहों की तलाश कर रही है, जहां जीवन को सहारा देने वाले सभी जरूरी तत्व मौजूद हों। करीब तीन साल की खोज के बाद मिशन कैप्लर ने पृथ्वी जैसे 68 ग्रह खोज निकाले हैं, इनमें से 54 ग्रह अपने सितारे के हैबिटेट जोन यानि इतने सुरक्षित फासले पर हैं, कि वहां पानी तरल रूप में मौजूद हो सकता है। धरती पर हम जीवन के जितने भी स्वरूपों को जानते-समझते हैं, उन सबकी बुनियाद पानी पर ही टिकी है। इसीलिए हैबिटेट जोन में नए ग्रहों की तलाश होने से सितारों से आने वाले रेडियो सिग्नल्स के जरिए बौद्धिक सभ्यता की तलाश कर रहे सेटी के वैज्ञानिक अब नए उत्साह में नजर आ रहे हैं।
उत्तरी कैलीफोर्निया में खास सेटी प्रोजेक्ट को समर्पित कई रेडियो टेलिस्कोप्स का एक पूरा नेटवर्क काम कर रहा है, जिसका नाम है 'एलेन टेलिस्कोप एरे।' सेटी वैज्ञानिकों ने अब यहां के कुछ रेडियो टेलिस्कोप्स को उस सितारे की दिशा में भी घुमा दिया है, जहां कैप्लर मिशन ने पृथ्वी जैसे पांच ग्रहों को इस सितारे के हैबिटेट जोन में खोजा है। माना जा रहा है कि सेटी प्रोजेक्ट को अब शायद कुछ नए नतीजे मिल सकते हैं। सेटी प्रोजेक्ट के मुख्य वैज्ञानिकों में शामिल शेथ शॉस्टैक कहते हैं," कैप्लर के नतीजों की गहराई से पड़ताल बोहद जरूरी है। क्योंकि ये ग्रह हैबिटेट जोन में हैं और ये कहना बेहद मुश्किल है कि जीवन को सहारा देने की स्थितियां किस ग्रह पर कैसी हैं? कैप्लर की खोज ने ये भी साबित कर दिया है कि पृथ्वी जैसे पथरीले ग्रहों की मौजूदगी कोई बहुत खास बात नहीं है। अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसे ग्रह शायद उसी तादाद में मौजूद हैं, जितनी कि किसी मिठाई को चारों ओर से घेरे चीटियों का एक बड़ा झुंड। असली बात ये कि पृथ्वी जैसे उस नए ग्रह में जीवन को सहारा देने वाली स्थितियां हैं या नहीं।"

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

‘मानव जाति की सबसे बड़ी खोज के लिए सबका साथ आना जरूरी’


मिशन कैप्लर के वैज्ञानिक डॉ. ज्योफ मर्सी का इंटरव्यू
हमने अपने सौरमंडल से बाहर पहले नए ग्रह की खोज की 1992 में, और तब से नए ग्रहों की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है। इस लिस्ट में अबतक 500 नए ग्रह शामिल हो चुके हैं। नए ग्रहों की खोज में अब तक की सबसे महत्वपूर्ण घटना के तौर पर नासा ने स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर की करीब तीन साल तक की खोज के तमाम डेटा सार्वजनिक कर दिए हैं। नए ग्रहों की खोज मानवजाति की सबसे महान उपलब्धियों में से एक है और हम इन नए और अजनबी ग्रहों के अध्ययन के नए युग में प्रवेश कर रहे हैं। इन एलियन ग्रहों की अदभुत दुनिया का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों में से एक हैं बर्कले की यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के एस्ट्रोनॉमर डॉ. ज्योफ मर्सी। डॉ. मर्सी पृथ्वी जैसे ग्रह की तलाश में जुटे मिशन कैप्लर के सह-निरीक्षक हैं। डॉ. मर्सी ऐसे चुनिंदा वैज्ञानिकों में से हैं जिनके नाम सबसे ज्यादा नए ग्रहों की खोज दर्ज है। उन्होंने पहले 100 नए ग्रहों में से 70 ग्रहों की खोज में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने ही सबसे पहले एक नया सौरमंडल खोज निकाला था। डॉ. मर्सी जनवरी में अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की विंटर मीटिंग में शामिल होने के लिए सिएटल आए थे, वहां उनका ये विशेष इंटरव्यू लिया गया। इस इंटरव्यू में डॉ. मर्सी से नए ग्रहों की खोज की लगातार तेज होती रफ्तार और धरती के अलावा कहीं और जीवन की संभावनाओं पर खास सवाल पूछे गए। पेश है वॉयेजर की खास पेशकश -
सवाल लग रहा है मानो नए ग्रहों की एकदम से बाढ़ सी आ गई है, आखिर इसकी वजह क्या है? क्या बेहतर उपकरण और बेहतर तकनीक ही इसकी वजह है?
डॉ. मर्सी देखिए मैं आपको एक दूसरा पहलू बताता हूं। हमारे बीच कुछ ऐसे एस्ट्रोनॉमर्स हैं, जो वाकई बेहद इनोवेटिव हैं और बहुत ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। वो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं कर रहे, बल्कि अपनी जरूरत के हिसाब से उसे इनोवेट कर रहे हैं, ताकि बेहतर वैज्ञानिक नतीजे सामने आ सकें। ये लोग रात-रात भर दुनियाभर से आई ऑब्जरवेशंस का करेक्शन किया करते हैं, ताकि पृथ्वी जैसे जीवन के योग्य ग्रह की तलाश मुमकिन हो सके। ये कह देना बेहद आसान है कि अरे ये तो नए कंप्यूटर या एडवांस ऑप्टिक्स का कमाल है। लेकिन यकीन मानिए अब महान खोजें सामने आ रही हैं। क्योंकि ये अदभुत और जुझारू लोग एक नया सपना देख रहे हैं और अपने सपने को अथक परिश्रम से नई खोजों में तब्दील कर रहे हैं।
सवाल अगर हम ये बातचीत 20 साल बाद कर रहे होते, तो आज की रफ्तार से क्या लगता है, उस वक्त तक हम कितने नए ग्रहों की खोज कर चुके होते?
डॉ. मर्सी ईमानदारी से कहूं तो कैप्लर इतना शानदार है कि इसके जैसा अब तक कोई नहीं। इसके नंबर्स शायद कभी खत्म नहीं होंगे। कैप्लर हजारों नए ग्रहों की खोज करने वाला है। यूरोप या अमेरिका में से कोई कैप्लर जैसी या इससे भी शक्तिशाली नए ग्रहों की खोज करने वाली स्पेस ऑब्जरवेटरी भी लांच कर सकता है। इसलिए आने वाले भविष्य में हम हजारों नए ग्रहों की खोज करने वाले हैं। मैं शर्त लगाकर कहता हूं कि 2020 तक हम 10,000 नए ग्रहों को खोज चुके होंगे और 2030 तक नए ग्रहों की तादाद बढ़कर 20,000 या 30,000 या फिर इससे भी ज्यादा हो चुकी होगी।
सवाल नए ग्रहों के बारे में वो कौन से सबसे बड़े रहस्य हैं, जिन्हें अभी समझना बाकी है?
डॉ. मर्सी हां एक बहुत बड़ा रहस्य है, जिसके बारे में कोई भी बात करना नहीं चाहता। ये एक युगों पुराना सवाल है, कि पृथ्वी जैसे ग्रह का वजूद क्या बहुत कॉमन यानि सामान्य सी बात है? हम जानते हैं, कि यकीनन पृथ्वी जैसे ग्रह और भी हैं। मेरा मतलब है, देखिए आसमान में कितने सारे सितारे हैं। लेकिन ये सवाल दो हिस्सों में है, पहला, पृथ्वी जैसे ग्रह से आपका मतलब क्या है? और दूसरा ये कि ऐसे ग्रह कितने कॉमन हैं? देखिए, हम सबको ये जानकर बहुत अच्छा लगेगा कि हमने एक और ऐसी दुनिया ढूंढ़ निकाली है, जहां हम रह सकते हैं, वो जिंदगी, जिससे हमारी जान-पहचान है, मुमकिन हो सकती है। जहां तक पृथ्वी जैसे गुणों का सवाल है, तो ये थोड़ा रहस्यमय है, लेकिन फिरभी हमें इसका कुछ आईडिया तो है। पृथ्वी जैसा ग्रह, यानि वहां पानी तरल स्वरूप में होना चाहिए, उस ग्रह का तापमान अरबों-लाखों सालों से स्थिर रहना चाहिए, ताकि डार्विन के विकासवाद को प्रोत्साहन मिल सके। अपने अक्ष पर ऐसे ग्रह के घूर्णन को व्यवस्थित करने के लिए एक चंद्रमा का होना भी जरूरी होगा। ऐसे ग्रह के सौरमंडल में बृहस्पति जैसे एक विशाल ग्रह की मौजूदगी बेहद जरूरी है, ताकि वो इस ग्रह और इसके आस-पास यहां-वहां बिखरा मलबा अपने शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण बल की मदद से अपने पास खींच सके। इस नए ग्रह पर एक विशाल और स्थिर महासागर का होना भी जरूरी है, ताकि इसका खारा पानी इस ग्रह की बायोकैमिस्ट्री के लिए सॉल्वेंट का काम कर सके। वहां एक सघन वायुमंडल और मजबूत चुंबकीय क्षेत्र का होना भी जरूरी है। मैं समझता हूं कि किसी ग्रह पर मौजूद ये सारी चीजें ही उसे पृथ्वी जैसा बनाएंगी। लेकिन ऐसी नई पृथ्वियां कितनी कॉमन हैं, हम अभी ये नहीं जानते।
सवाल आपका शोध बताता है कि छोटे ग्रहों का वजूद एक सामान्य सी बात है। यानि आस-पास के सूरज जैसे हर सितारे के पास पृथ्वी जैसे आकार वाला ग्रह हो सकता है?
डॉ. मर्सी हां, लेकिन ज्यादातर लोग इस बारे में बात नहीं करना चाहते। क्योंकि बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून जैसे विशाल ग्रहों के मुकाबले पृथ्वी जैसे आकार वाले ग्रह इतने छोटे होते हैं कि ऑब्जरवेशन में इन्हें पहचानना बेहद मुश्किल है। ये बिल्कुल ऐसा है मानो 18-18 पहियों वाले विशाल और भारी-भरकम वाहनों से भरे हाईवे पर किसी बच्चे की एक छोटी सी ट्राईसाइकिल चल रही हो। हमारी पृथ्वी बिल्कुल ऐसी है, मानो 15 बड़ी बिलियर्ड्स की गेंदों के बीच किसी ने बिलियर्ड टेबल पर एक छोटा सा कंचा यानि मारबल रख दिया हो। अब आप जैसे ही इन विशाल गेंदों के बीच शॉट लेना शुरू करते हैं, तो ये छोटा कंचा या मारबल गोली टेबल पर कहां छिप जाती है पता ही नहीं चलता।
सवाल पृथ्वी जैसे ग्रह बन सकते हैं, ये तो एक बात है, लेकिन ऐसे ग्रह लंबे वक्त तक व्यवस्थित और स्थिर रह सकें ये कहना तो बिल्कुल एक अलग सवाल है
डॉ. मर्सी हां, और मेरे विचार से ऐसे ग्रह निश्चित तौर पर बने होंगे। ऐसे ग्रहों की रचना नहीं हुई, ये सोंचना तर्कसंगत नहीं है। अगर बृहस्पति जैसे विशाल ग्रह बन सकते हैं, तो फिर पृथ्वी जैसे छोटे ग्रहों की रचना क्यों नहीं हो सकती। शायद अंतरिक्ष के हाईवे पर हमारा सारा ध्यान इन 18 पहिए वाले विशाल और भारी-भरकम वाहनों पर ही फोकस रहता है, इसलिए हम आसपास से गुजरती छोटी ट्राईसाइकिल देख ही नहीं पाते। धरती जैसे आकार वाले ग्रह ये ट्राईसाइकिल ही हैं। इस हाईवे पर जब भारी-भरकम विशाल ग्रह इन छोटे ग्रहों के करीब से गुजरते होंगे तो भारी गुरुत्वाकर्षण बल का जबरदस्त धक्का इन छोटे ग्रहों को पूरे सिस्टम से ही बाहर कर देता होगा। इसलिए ये भी मुमकिन है कि पृथ्वी जैसे छोटे ग्रहों की रचना तो हुई, लेकिन विशाल ग्रहों के गुरुत्व धक्के से वो ब्रह्मांड के अंधेरे कोनों में ठेल दिए गए। जहां वो खुद के लिए अनुकूल परिस्थिति पैदा होने का इंतजार कर रहे हों। ऐसा पूरी तरह मुमकिन है, हमारा ग्रह पृथ्वी और शायद हम पृथ्वीवासी बेहद दुर्लभ भी हो सकते हैं। 
बाई-द-वे सेटी (सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस) सिगनल्स कहां हैं? अब तक हम उन्हें नहीं खोज सके हैं, ये बिल्कुल वैसा ही है, मानो कमरे में विशाल हाथी मौजूद हो और हम उसे देख ही नहीं पा रहे हों। 40 साल से भी ज्यादा वक्त से फ्रेंक ड्रेक और कार्ल सगान सेटी सिगनल्स की तलाश करते रहे हैं और अब तक हमारे पास नतीजे के नाम पर कुछ भी नहीं है। इसलिए इससे एक इशारा मिलता है, स्पष्ट नहीं तो धुंधला सा ही सही, कि हमारी पृथ्वी जितना हम समझते हैं उससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। 
सवाल पूरे ब्रह्मांड की तुलना में हमारा सौरमंडल काफी युवा है। और ब्रह्मांड इतना विशाल है। इसलिए उन्नत सभ्यताओं के पास हमसे संपर्क करने की कोशिश करने के लिए काफी वक्त और मौके रहे होंगे। कुछ लोग सोंचते हैं कि परग्रहीय सभ्यताओं ने अब तक हमसे संपर्क नहीं किया, इसका मतलब ये भी है कि शायद हम इस ब्रह्मांड में अकेले हैं ?
डॉ. मर्सी आपने बात को घुमा दिया है, किसी बुद्धिमान परग्रहीय सभ्यता की तरफ से किसी इंटेलिजेंस रेडियो या टेलीविजन सिगनल का न आना बस एक इंडिकेशन यानि बस इशारा भर है, कोई प्रमाण नहीं। शायद जीवन के अनुकूल किसी ग्रह पर अरबों साल से डार्विन के विकासवाद का चक्र चल रहा हो- शायद ये दुर्लभ हो। शायद।
सवाल आपका आंकलन क्या है ? आपका मन इस बारे में क्या कहता है?
डॉ. मर्सी अगर मैं शर्त लगा रहा होता, तो जरूर अनुमान लगाता, लेकिन साइंस में हम ऐसा नहीं कर सकते। मैं कहूंगा कि बौद्धिक और टेक्नोलॉजिकली उन्नत सभ्यताएं हमारी मिल्की-वे गैलेक्सी में दुर्लभ हैं। इसके प्रमाण भी धीरे-धीरे सामने आ रहे हैं। हम होमो-सेपियंस तब तक विकसित नहीं हो सके थे, जब तक कि पूर्वी अफ्रीका के सवाना के वातावरण में नाटकीय बदलाव नहीं शुरू हो गए। ये बदलाव इतने महत्वपूर्ण थे कि मानव विकासवाद का अध्ययन करने वाले पुराविशेषज्ञ अब भी हमें ये नहीं बता सकते कि ऑस्ट्रेलोपिथेसिन्स आखिर बड़े मस्तिष्क का विकास कैसे कर सके थे, जो इतने कुशल थे कि आज के पियानो कॉन्सर्ट तक में भाग ले सकते थे। ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सही-सही कहूं तो डार्विन के विकासवाद में नहीं है।
आखिर क्यों पूर्वी अफ्रीका के सवाना मैदानों की ऊंची- ऊंची झाड़ियों और घासों में रहने वाले आदिम मानव खुद को आज के पियानो कॉन्सर्ट में भाग लेने के लायक विकसित क्यों नहीं कर सके ? आखिर वो इवोल्यूशनरी ड्राइवर क्या था, जिसने हमें रॉकेट शिप्स का निर्माण करने वालों में तब्दील कर दिया ? सच्चाई ये है कि विकास के इस आयाम को छूने के लिए हमने आधुनिक मानव के बगैर चार अरब साल तक इंतजार किया है....चार अरब साल तक ? 
सवाल हां, हमें यहां तक पहुंचने में चार अरब साल का वक्त लगा
डॉ. मर्सी पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत से लेकर लाखों-करोड़ों साल तक बहुकोशकीय जीवन के उन्नत स्वरूपों का राज था। जरा अंदाजा लगाइए, इस दौरान मस्तिष्क का आकार कितना विकसित हुआ होगा ? ...मैं बताता हूं कुछ भी नहीं ! क्या आप पृथ्वी पर विचरने वाले सबसे महान प्राणी को जानते हैं ? वो डायनासोर थे हर बच्चा इसे जानता है। और क्यों ? ऐसा इसलिए, क्योंकि 10 करोड़ साल तक डायनासोर पृथ्वी पर राज करते रहे। उनमें विशाल डायनासोर भी थे और छोटे डायनासोर भी। हर पीढ़ी के शिशु डायनासोर को उस वक्त की दुनिया में मौजूद बाकी सभी डायनासोरों से होड़ करनी थी। 10 करोड़ साल बाद हर पीढ़ी का शिशु डायनासोर कुछ ज्यादा स्मार्ट होता गया और इस तरह जीवन आगे बढ़ता रहा। इसलिए निश्चित तौर पर डायनासोर के मस्तिष्क का आकार भी धीरे-धीरे बढ़ता गया। 
अब जरा डायनासोर विशेषज्ञों के रिकार्ड पर नजर डालें। डायनासोर विशेषज्ञों के मुताबिक डायनासोरों का मस्तिष्क मुर्गे के मस्तिष्क जितना था। इससे पता चलता है कि मस्तिष्क का आकार विकासवाद का मुख्य ड्राइवर नहीं है।  
सवाल आपने कहा कि हम नए ग्रहों के सुनहरे दौर में प्रवेश करने वाले हैं। क्या भविष्य इसी में छिपा है कि हम किसी अच्छे, अजनबी ग्रह पर सीधी-सीधी नजर डालें, जो जीवन के फलने-फूलने लायक बनने के लिए खुद को एडजेस्ट कर रहा हो ?
डॉ. मर्सी हमें दो बड़ी चीजें करनी चाहिए। पहली ये कि बतौर मानव जाति यानि इसका मतलब है कि यूरोपियन स्पेस एजेंसी, जापान, चीन, भारत और अमेरिका-कनाडा एक साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के तौर पर काम करें। और ये अंतरराष्ट्रीय एजेंसी एक इंटरफेरोमीट्रिक स्पेस टेलिस्कोप को बनाकर अंतरिक्ष भेजे, ताकि हम इससे पृथ्वी जैसे आकार वाले और पृथ्वी से मिलते-जुलते ग्रहों की तस्वीर ले सकें। हम ये करना जानते हैं। हां, ये सही है कि ये प्रोजेक्ट काफी महंगा होगा, लेकिन साइंस में हम महंगे प्रोजेक्ट्स पर काम करते रहते हैं और फिर ये प्रोजेक्ट मानव जाति की सबसे बड़ी खोज को भी तो अंजाम देगा। तब हम इस सवाल का जवाब जान सकेंगे कि पृथ्वी जैसे और शायद जीवन को सहारा देने वाले दूसरे ग्रह कितने हैं ? और दूसरी चीज जो हमें करनी चाहिए, वो ये कि हमें अपोलो प्रोजेक्ट की तरह फुल-फ्लेज्ड सेटी तलाश में पूरी गंभीरता से जुट जाना चाहिए। आखिर हम अपने संसाधनों को एकसाथ मिलाकर सेटी की तलाश क्यों नहीं शुरू कर देते ?
सवाल किसी एलियन इंटेलिजेंट लाइफ यानि अजनबी बौद्धिक परग्रहीय जीवन की खोज बहुत बड़ी बात होगी। इससे खुद के प्रति और इस ब्रह्मांड में हमारे स्थान के प्रति हम जिस तरह से सोंचते हैं वो पूरा नजरिया ही बदल जाएगा।
डॉ. मर्सी यकीनन। तो फिर आखिर हम सब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकसाथ मिलकर अपने संसाधनों को एकजुट करके एक विशाल रेडियो टेलिस्कोप फेसिलिटी और अगर कुछ पैसे बच जाते हैं तो एक इंफ्रारेड फेसिलिटी का निर्माण क्यों नहीं करते ? और सेटी सिगनल्स की तलाश का एक विशाल अभियान क्यों नहीं छेड़ देते ? हम जानते हैं कि हमें क्या खोजना है ? बार-बार खुद को रिपीट करता हुआ रेडियो सिगनल। वाकई ये मानव जाति की सबसे बड़ी खोज होगी। सेटी रेडियो सिगनल का मिलना और परग्रहीय बौद्धिक सभ्यता की खोज बिल्कुल चंद्रमा पर आर्मस्ट्रांग के पहले कदम जैसी होगी, ये वैसा ही होगा जैसे कि नई दुनिया में कोलंबस के कदम। ये सबसे शानदार, सबसे प्रेरक प्रयास होगा।
Courtesy - space.com

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

एक ‘नई दुनिया’ की खोज !

कैंब्रिज में हॉवर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के अपने ऑफिस में एस्ट्रोनॉमर दिमित्री सासेलोव कुछ देर बाद होने वाले एक इंटरव्यू के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर रहे थे। इस इंटरव्यू के जरिेए वो जो कुछ दुनिया को बताने जा रहे थे, उसे वो बार-बार मन ही मन दोहरा रहे थे और वो इसे जितना दोहराते उतने ही नर्वस होते जा रहे थे। नासा ने स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर 2007 में लांच की थी और इसका मकसद था पृथ्वी से मिलते-जुलते ऐसे नए ग्रहों की, जहां जिंदगी मुमकिन हो सकती है। सासेलोव नासा के मिशन कैप्लर के सह-निरीक्षक हैं और अब लांच के करीब तीन साल बाद, नासा मिशन कैप्लर की अब तक की सारी जानकारियां सार्वजनिक करने की प्रक्रिया में थी और शुरुआत होनी थी सासेलोव के बयान से। सासेलोव की दुविधा ये थी कि कैप्लर की नई खोज के बारे में बताने की शुरुआत वो किस तरह करें ? क्योंकि, कैप्लर ने कोई नया ग्रह नहीं, बल्कि हमारे सौरमंडल से मिलता-जुलता 6 ग्रहों के सदस्यों वाला एक भरा-पूरा सौर परिवार ही खोज निकाला था। सासेलोव ने बाद में बताया, “मैं जरूरत से ज्यादा सावधानी बरत रहा था, क्योंकि एक साल पहले एक कांफ्रेंस में जब मैंने कैप्लर के कुछ डाटा सार्वजनिक किए थे, तो दुनियाभर के अखबारों हेडलाइन छा गई थी कि बहुत सी नई धरतियों की खोज। इस बार तो मामला ज्यादा गंभीर था, बात किसी एक ग्रह की खोज के बारे में नहीं थी, इस बार तो मामला एक नए सौरमंडल का था।”
नासा ने मिशन कैप्लर की अब तक की खोज की तमाम जानकारियां सार्वजनिक कर दी हैं। स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर ने पहली बार हमारी धरती जैसा एक नया ग्रह और अपने सितारे के हैबिटेट जोन में मौजूद एक ऐसा ग्रह खोज निकाला है, जहां पानी तरल अवस्था में ग्रह की सतह पर मौजूद हो सकता है। मिशन कैप्लर ने अपने सितारे की परिक्रमा करते 6 ग्रहों एक ऐसा नया सौरमंडल खोजा है जिसके 5 ग्रहों का आकार हमारी धरती के जैसा ही है। इस सौरमंडल की सूरज हमारे सूर्य के मुकाबले ठंडा है और सबसे खास बात तो ये कि धरती जैसे आकार वाले इसके सभी पांचों ग्रह अपने सितारे के हैबिटेट जोन में हैं। इस मिशन के सम्मान में नए सौरमंडल के सूरज का नाम कैप्लर-11 रखा गया है। कैप्लर-11 और इसका 6 ग्रहों से भरा-पूरा सौरमंडल हमसे 2000 प्रकाश वर्ष दूर है। हमारे सौरमंडल से बाहर अब तक इतना विशाल और इतना व्यवस्थित सौर-परिवार पहले कभी नहीं खोजा गया था।
इस नई खोज के बारे में बात करते वक्त मिशन कैप्लर से जुड़े सभी वैज्ञानिक अतिरिक्त सतर्कता बरत रहे हैं। 1,50,000 सितारों से आती रोशनी और उनके सामने से किसी ग्रह के गुजरने से मंद पड़ते प्रकाश को पकड़ने में स्पेस ऑब्जरवेटरी कैप्लर ने असाधारण कुशलता का परिचय दिया है। लेकिन कैप्लर से अभी ऐसे ग्रह की खोज होनी बाकी है जो आकार में हमारी धरती जैसा छोटा हो, भौगोलिक रूप से पथरीला हो और जो अपने सितारे के हैबिटेट जोन के भीतर हो, ताकि पानी वहां की जमीन पर तरल स्वरूप में बह सके और जीवन को पनपने, फलने-फूलने का मौका मिल सके। मिशन कैप्लर ने अभी जो खोजा है उससे हमें केवल नए ग्रह के आकार के बारे में पता चलता है, इससे हमें उस ग्रह के द्रव्यमान के बारे में कुछ पता नहीं चलता। यानि खोजे गए नए ग्रहों के घनत्व और वहां मौजूद तत्वों के बारे में हमें आमतौर पर कुछ भी पता नहीं चल पाता।
नासा के एडमिनिस्ट्रेटर चार्ल्स बोल्डेन बताते हैं कि मिशन कैप्लर ने नए ग्रहों को कल्पना की उड़ान से निकाल कर उन्हें एक हकीकत में बदल दिया है। मंगलवार 1 फरवरी 2011 को जारी किए गए नासा के डेटा के अनुसार अब हमारे सौरमंडल से बाहर खोजे जा चुके नए ग्रहों की तादाद बढ़कर 1,235 हो चुकी है। इनमें से 500 नए ग्रहों की पुष्टि तो ग्राउंड ऑब्जरवेटरीज कर चुकी हैं, बाकी की पुष्टि दुनिया भर में फैली ऑब्जरवेटरीज से की जानी बाकी है। मिशन कैप्लर ने जिन नए ग्रहों को खोजा है उनमें से 68 नए ग्रहों का आकार करीब-करीब पृथ्वी के बराबर है, 288 नए ग्रहों का आकार पृथ्वी से तीन से पांच गुना तक विशाल है, 662 नए ग्रह नेपच्यून जैसे हैं, 165 नए ग्रह हमारे बृहस्पति की तरह हैं और 19 नए ग्रहों का आकार हमारे सौरमंडल के सबसे विशाल ग्रह बृहस्पति से भी कहीं ज्यादा विशाल है।
54 नए ग्रह ऐसे हैं जो अपने-अपने सितारों के हैबिटेट जोन में हैं और इनमें से 5 ग्रह ऐसे हैं जिनका आकार हमारी धरती के बराबर है। हैबिटेट जोन में मौजूद शेष 49 नए ग्रहों में से कुछ सुपर-अर्थ साइज के हैं, तो कुछ हमारी धरती से दोगुने विशाल और कुछ तो बृहस्पति से भी विशाल हैं। मिशन कैप्लर से आई ये ताजा जानकारियां इस स्पेस ऑब्जरवेटरी के उन ऑब्जरवेशंस पर आधारित हैं जो 12 मई से 17 सितंबर 2009 के बीच किए गए थे। इस दौरान कैप्लर ने 1,56,000 सितारों का अध्ययन किया और इस तरह हमने नई पृथ्वी की तलाश में आसमान के सौवें हिस्से को छानने की पहली कोशिश की।
नासा के एम्स रिसर्च सेंटर, कैलीफोर्निया में काम कर रहे मिशन कैप्लर के मुख्य वैज्ञानिक निरीक्षक विलियम बोरुकी कहते हैं, “ हमने अपनी पहली कोशिश में ही आकाश के एक छोटे से हिस्से में इतने नए ग्रह ढूंढ़ निकाले, इससे पता चलता है कि हमारी आकाशगंगा में अनगिनत ग्रह अपने-अपने सितारों की परिक्रमा कर रहे हैं। हमने शून्य से शुरुआत करके पृथ्वी जैसे आकार वाले 68 नए ग्रह ढूंढ़ निकाले और शून्य से ही शुरुआत करके 54 ऐसे नए ग्रह खोज डाले हैं, जिनमें से कुछ की धरती पर शायद पानी अपने तरल स्वरूप में बहता हो। ”
नए सौरमंडल कैप्लर-11 के सभी 6 ग्रहों की पुष्टि दूसरी ऑब्जरवेटरीज से भी हो चुकी है और इन सबका परिक्रमा-पथ हमारे शुक्र के भी छोटा है। इस नए सौर-परिवार के पांच ग्रहों का परिक्रमा-मार्ग तो बुध से भी छोटा है। इसके अलावा एक दूसरा सितारा जिसके सामने से इसके ग्रह को गुजरता हुआ देखा गया है, वो है कैप्लर-9। सितारे कैप्लर-9 के भी तीन ऐसे ग्रहों का पता चला है जो इसकी परिक्रमा कर रहे हैं।
नासा की एम्स लैब में काम कर रही मिशन कैप्लर की साइंस टीम के सदस्य और प्लेनेटेरी साइंटिस्ट जैक लिसौर कहते हैं, “ कैप्लर-9 सौरमंडल की बनावट और इसका व्यवस्थित क्रम अदभुत है। इससे हमें ये पता चल सकेगा कि इसकी रचना कैसे हुई। सूरज कैप्लर-11 की परिक्रमा कर रहे सभी 6 ग्रह पथरीले भी हैं और गैसीय भी। शायद इनमें से कुछ पर पानी भी मौजूद हो। ये सभी नए ग्रह हमारे सौरमंडल से बाहर खोजे गए सबसे हल्के ग्रहों में से हैं।”

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

झलक ब्रह्मांड के उस छोर की !


हमने अंतरिक्ष में सबसे गहराई तक झांकने का एक नया रिकार्ड बनाया है। नासा की स्पेस ऑब्जवेटरी हब्बल के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष की गहनतम झलक लेने में सफलता हासिल की है। ये झलक है ब्लू स्टार्स की एक सघन आकाशगंगा की, जिसकी रोशनी को हब्बल के कैमरों, यानि हम तक पहुंचने में 13.2 अरब साल का वक्त लगा है। 
हमारी आंखें वाकई ब्रह्मांड की सबसे नायाब कृतियां हैं। इन आंखों से हम सबसे नजदीक और अगले ही पल सबसे दूर की चीज को बस चुटकी बजाते ही देख सकते हैं। कभी सोंचा है, कि आखिर हमारी आंखें कितनी दूरी तक देख सकती हैं, इसका जवाब देना वाकई मुश्किल है। अगर हम अपने घर की छत पर खड़े हों तो हम चारों तरफ वृत्ताकार रूप में क्षितिज को देख सकते हैं। आसमान में चंद्रमा से लेकर तेज चमकदार सितारों और सबसे कम रोशन सितारों तक को हम आराम से देख सकते हैं।
एस्ट्रोनॉमी में कहते हैं कि साफ आसमान और पूरी अंधेरी रात में हम अपनी आंखों से पड़ोसी आकाशगंगा 'एंड्रोमिडा' को भी आसानी से देख सकते हैं। शहरों की बात तो छोड़ दीजिए ग्रामीण इलाकों में भी रात के आसमान की सामान्य स्थितियों में अब ये मुमकिन नहीं। फिरभी, हिल स्टेशंस, हिमालयी क्षेत्रों और ध्रुवीय इलाकों से हम मेसायर 31 या M-31 के नाम से भी मशहूर गैलेक्सी एंड्रोमिडा हमसे करीब 2.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है। इसलिए ये माना जा सकती है कि हमारी आंखों की दृश्यता सीमा भी इतनी ही है, यानि हम अगर अंधेरे आसमान में नजरें जमा कर देखने की कोशिश करें तो करीब 2.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर तक के सितारे देख सकते हैं।
एस्ट्रोनॉमी में जब हम सितारों को देखते हैं तो दरअसल हम थर्ड और फोर्थ डायमेंशन यानि गहराई और समय में झांक रहे होते हैं। यानि हम अंतरिक्ष में जितनी दूर जितनी गहराई में झांकने की कोशिश करेंगे, उतना ही हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति की घटना यानि बिगबैंग के अवशेषों की तरफ बढ़ते जाएंगे। बिगबैंग की घटना करीब 13 अरब 80 करोड़ साल पहले घटी थी और अब अगर हम इस घटना के समय को एक पैमाना मानें तो हमारी दुनिया और मिल्की-वे में हमारे हिस्से का आसमान बिगबैंग के 13.80 अरब साल बाद की सृष्टि है।
आंखों की सीमा से भी आगे देखने के लिए टेलिस्कोप बनाए गए। 1990 में सामान्य ग्राउंड बेस्ड ऑब्जरवेटरी के टेलिस्कोप की मदद से हमने बिगबैंग के 6 अरब साल बाद तक के आसमान की झलक देखी। 1995 में स्पेस ऑब्जरवेटरी हब्बल ने इससे भी आगे यानि बिगबैंग के डेढ़ अरब साल बाद की दुनिया की झलक दिखाई। तबसे हब्बल ऑब्जरवेटरी हर बार अपने ही इस रिकार्ड में हर बार एक नया सुधार करती चली जा रही है। हब्बल ने अब अंतरिक्ष में सबसे गहराई में फोकस करते हुए ब्लू स्टार्स की बनी ऐसी धुंधली सी आकाशगंगा खोज निकाली है, जिसका निर्माण बिगबैंग के महज 48 करोड़ साल बाद हुआ था। अगर इस आकाशगंगा की तुलना हम अपनी मिल्की-वे से करें तो हमारी मिल्की-वे जैसी आकाशगंगा बनाने के लिए इस ब्लू स्टार जैसी 100 आकाशगंगाओं की जरूरत होगी।
हब्बल स्पेस ऑब्जरवेटरी 20 साल से हमें ब्रह्मांड के एक से बढ़कर एक रहस्यों की झलक दिखा कर आश्चर्यचकित कर रही है। लेकिन अब हब्बल हमें ब्रह्मांड के सुदूर छोर से परिचित करा रही है, जो वाकई अपने आप में अदभुत है।