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मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

रॉकेट के साथ विकास का सफर


तमसो मां ज्योर्तिगमय...अंधेरे को दूर करने के लिए घर के कोने-कोने को रोशनी की जगमगाहट से सजा देने का पर्व है दीपावली। और दीपावली का असली मजा है आतिशबाजी में, धूम-धड़ाके और सितारों सी जगमगाती ढेर सारी आतिशबाजी में। अनार, फुलझड़ी, चकरी और न जाने क्या-क्या....एक से बढ़कर एक पटाखे दीपावली को रोशन करते हैं, लेकिन दीपावली का आकाश जगमगाता है तो बस रॉकेट से।
रॉकेट का इस्तेमाल पहली बार 1100 साल पहले किया गया था, तब से लेकर अब तक इसकी डिजाइन में कोई खास बदलाव नहीं आया है। रॉकेट बस एक मामूली आतिशबाजी ही नहीं, बल्कि सॉलिड फ्यूल जेट इंजन का पहला रूप है। इसी रॉकेट से 1100 साल के दौरान मानव सभ्यता के विकास को जेट रफ्तार मिली है। आतिशबाजी के इस रॉकेट से ही हमने आसमान छूने का सपना देखा और चांद की ओर कदम बढ़ाए।
रॉकेट को जेट रफ्तार देने वाले बारूद की खोज ईसा के 800 साल बाद चीन में हुई और नौंवी सदी में चीन में पहली बार रॉकेट का इस्तेमाल आतिशबाजी के लिए किया गया। लेकिन चीनी सेना के लिए हथियार बनाने वाले इंजीनियर जल्दी ही भांप गए कि समंदर की जंग के लिए रॉकेट एक कारगर हथियार है। चीन की नौसेना ने पहला मल्टीस्टेज जंगी रॉकेट बनाया। ड्रैगन की शक्ल वाला ये रॉकेट समंदर की सतह से एक मीटर ऊपर उड़ते हुए एक किलोमीटर के दायरे में दुश्मन के जहाज पर हमला करता था।
रॉकेट तकनीक को चीन से छीनकर यूरोप और भारत तक पहुंचाने का काम किया मंगोल हमलावर चंगेज खान ने। वक्त बदला, शहंशाह बदले, सल्तनतों की सरहदें भी बदलीं, लेकिन रॉकेट का आकार नहीं बदला। ज्यादातर इसका इस्तेमाल आतिशबाजी या फिर जंग में दुश्मन को डराने के लिए ही किया जाता था। दुनिया बदली, लेकिन आसमान में जगमगाते चंद्रमा की खूबसूरती नहीं बदली और नहीं बदली चांद को छूने की जूनून भरी चाहत। आग की लकीर छोड़ते रॉकेट के साथ क्या चंद्रमा के सफर पर जाया जा सकता है, इस ख्याल ने मानो खलबली सी मचा दी और चंद्रमा को छूने का युगों पुराना ख्वाब मुमकिन नजर आने लगा।
रॉकेट की मदद से चंद्रमा को छूने की कोशिश करने वाला पहला नाकाम अंतरिक्षयात्री था चीन का, जिसका नाम था- हू ....चीन की मिंग राजशाही के दौरान हू ने सैकड़ों रॉकेट से बंधे बांस के अंतरिक्षयान पर सवार होकर चांद के सफर पर जाने की पहली कोशिश की थी। लेकिन पलीते में आग लगाते ही एक जोरदार धमाका हुआ और इस जबरदस्त धमाके से बांस के अंतरिक्षयान के परखचे उड़ गए, वहां एक बड़ा गड्ढ़ा नजर आने लगा और अंतरिक्ष जाने की कोशिश कर रहे हू की मौत हो गई।
1638 में दो अंग्रेज बिशप्स ने एक किताब छपवाकर चंद्रमा पर जाने के तरीके सुझाए, लेकिन उस दौर में इसे जादू-टोना समझा गया और शैतान का काम करार देकर बिशप्स की निंदा की गई।
 टीपू सुल्तान (1750-1799)
रॉकेट को जंग के सबसे असरदार हथियार के तौर पर विकसित किया मैसूर के शहंशाह टीपू सुल्तान ने। टीपू सुल्तान ने पहली बार रॉकेट तकनीक के इस्तेमाल से लोहे की मिसाइल्स बनाईं जिनका नाम था तगरत।टीपू सुल्तान की मिसाइलों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए और उनके जीते-जी ईस्ट-इंडिया कंपनी मैसूर में कदम नहीं रख सकी। टीपू की शहादत के बाद अंग्रेज टीपू की मिसाइलों को ब्रिटेन ले गए और इस तरह रॉकेट के नए स्वरूप आधुनिक मिसाइलों का विकास शुरू हुआ।
फिर आया दौर औद्योगिक क्रांति का, जब रफ्तार की जरूरत सबसे ज्यादा महसूस की गई। ऐसे में औद्योगिक क्रांति को रफ्तार दी इसी रॉकेट की जेट तकनीक ने। दीपावली का रॉकेट एक जेट इंजन का सबसे सरल रूप भी है। रॉकेट जब ऊपर जाता है तो उसके पीछे आग की एक तेज लपट...चिंगारियों का फौव्वारा सा छूटता नजर आता है, इसे जेट कहते हैं जिसकी ताकत रॉकेट को आसमान में उछाल देती है। बदलते दौर में जब ढेर सारी भाप को एक छोटे से छेद से गुजारा गया तो रॉकेट के जेट की जबरदस्त ताकत काबू में आ गई और हो गई शुरुआत औद्योगिक क्रांति की।
1903 में रूस में हाईस्कूल के गणित शिक्षक कोन्सटैन्टीन तिओलकोव्स्की ने अंतरिक्ष अभियानों की पहली आधुनिक रूपरेखा सामने रखी और रॉकेट की जबरदस्त जेट ताकत के इस्तेमाल से अंतरिक्ष के सफर पर जाने की बात कही, बस यहीं से एस्ट्रोनॉटिक्स की शुरुआत हो गई
 16 मार्च 1926
आतिशबाजी के रॉकेट की उड़ान के रहस्य को लंबे वक्त से खामोशी के साथ समझने में जुटे अमेरिकी वैज्ञानिक प्रो. रॉबर्ट एच गॉडर्ड ने अपने बनाए लिक्विड फ्यूल रॉकेट का पहला परीक्षण किया। इस परीक्षण के साथ ही मॉडर्न रॉकेटरी की शुरुआत हुई और संपूर्ण मानव जाति के विकास की दिशा ही बदल गई।
क्या आप यकीन करेंगे कि चंद्रमा पर जाने लायक रॉकेट पहली बार एक फिल्म के लिए बनाया गया था। जी हां, बीसवीं सदी की शुरुआत में एक खामोश फिल्म द गर्ल इन द मून के लिए चंद्रमा पर जाने लायक रॉकेट का पहला मॉडल बनाया गया। आधुनिक रॉकेट के विकास में मूक फिल्म द गर्ल इन द मून के रॉकेट वाले सीन का भी महत्वपूर्ण योगदान है। इस फिल्म में प्रदर्शित रॉकेट को प्रो. ओबेट ने पूरी वैज्ञानिक गणना करने के बाद बनाया था। खास बात ये कि प्रो. ओबेट के बनाए इस मॉडल रॉकेट और इसे बनाने के लिए की गई वैज्ञानिक गणना का इस्तेमाल बाद में वाकई रॉकेट टेक्नोलॉजी के विकास में किया गया।
अटलांटिक के दोनों तरफ अमेरिका और यूरोप में रॉकेट टेक्नोलॉजी को विकसित करने के काम जोरों पर था। अमेरिकन रॉकेट सोसाइटी के प्रो. गॉडर्ड पहले लिक्विड प्रोपेलेंट रॉकेट को बनाकर उड़ा चुके थे, जबकि यूरोप के जर्मनी में द सोसाइटी फॉर स्पेस ट्रैवल नौजवान वैज्ञानिक प्रतिभाओं को रॉकेट से जोड़ रही थी। तभी दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया और रॉकेट के विकास की दिशा जंग की ओर मोड़ दी गई। जर्मनी के वैज्ञानिक पहला बैलेस्टिक रॉकेट बनाने में कामयाब रहे और उन्होंने 1942 में पहले बैलिस्टिक रॉकेट वी-वन का परीक्षण किया।
इससे घबराए अमेरिका ने जर्मनी के नौजवान रॉकेट वैज्ञानिकों से अमेरिका आकर रिसर्च करने की पेशकश की। हिटलर के खतरनाक मंसूबों से घबराए जर्मनी के कई रॉकेट साइंटिस्ट अपनी रॉकेट डिजाइन लेकर अमेरिका आ गए। उस वक्त जंग के लिए ही रॉकेट विकसित किए गए, लेकिन रॉकेट की इस्तेमाल अंतरिक्ष के सफर के लिए करने की चाहत सबके दिलों में थी।
 4 अक्टूबर 1957
दुनिया के पहले सेटेलाइट स्पुतनिक के लांच के साथ ही रॉकेट की मदद से अंतरिक्ष जा सकने की पुरानी चाहत भी पूरी हो गई। 60 के दशक में तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने जब देश के सामने चंद्रमा पर जाने का लक्ष्य रखा तो मानो उत्साह की एक बिजली सी कौंध गई। नासा वैज्ञानिकों ने तीन अंतरिक्षयात्रियों और उनके स्पेसक्राफ्ट को अंतरिक्ष भेजने के लिए एक ऐसे ताकतवर रॉकेट को बनाने का काम शुरू किया, जो अब तक बस एक सपना ही था। अपोलो मिशन को लांच करने वाले मल्टी स्टेज एडवांस रॉकेट सैटर्न के साथ अंतरिक्ष युग की शुरुआत करने वाले आधुनिक रॉकेट्स का एक नया दौर शुरू हो गया।
...और फिर वो दिन भी आ गया जब चंद्रमा पर जाने का वो पुराना सपना भी साकार हो गया जिसे आतिशबाजी के रॉकेट के साथ हमने युगों पहले देखा था।
रॉकेट ने भले ही कई रूप बदले हों, लेकिन नील आर्मस्ट्रांग को चांद पर ले जाने वाले रॉकेट और दीपावली के रॉकेट की बुनियाद एक ही है। ये रॉकेट का ही कमाल है कि हमने धरती से दूर अंतरिक्ष में स्टेशन बना लिया है और सौरमंडल के ज्यादातर ग्रहों की कक्षा तक जा पहुंचे हैं।
दीपावली के इसी रॉकेट का एक दूसरा रूप मिसाइलों के रूप में मौजूद है। एक से बढ़कर एक खतरनाक और अचूक मिसाइलें, जो एक बार छोड़े जाने के बाद अपनी दिशा और रास्ता खुद ही तय करती हैं। रॉकेट के साथ हमने ये साबित कर दिखाया है कि सपनों को हकीकत में बदलना पूरी तरह से मुमकिन है।

शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

अंतरिक्ष में ‘जुगनू’


तीन साल पहले इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. डी.वी.ए. राघवमूर्ति कॉलेज के कुछ स्टूडेंट्स को बता रहे थे कि अंतरिक्ष की खोज कितनी रोमांचक है और हमें साइंस क्यों पढ़नी चाहिए । स्मॉल सेटेलाइट्स प्रोजेक्ट के प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. राघवमूर्ति का ये व्याख्यान छात्रों को इतना प्रेरक लगा कि सत्र खत्म होने पर छात्रों की एक टीम ने उनसे मुलाकात की और पूछा कि हम एक छोटा सेटेलाइट बनाना चाहते हैं, इस काम में हम इसरो की मदद कैसे ले सकते हैं? "स्टुडसैट" की कहानी बस यहीं से शुरू होती है।  डॉ. राघवमूर्ति के निर्देशन में छात्रों के सेटेलाइट यानि "स्टुडसैट" को बनाने का प्रोजेक्ट शुरू हुआ और इसमें बैंगलुरु और हैदराबाद के इंजीनियरिंग छात्र भी शामिल होते गए।  बैंगलोर इंजीनियरिंग कालेज की एक छात्रा श्वेता प्रसाद को स्टुडसैट प्रोजेक्ट से इस कदर लगाव हो गया कि इस टीम के साथ काम करने के लिए उन्होंने एक बढ़िया सैलरी वाले एक शानदार जॉब का ऑफर ही ठुकरा दिया। छात्रों का समर्पण कामयाब रहा और उन्होंने वाकई "स्टुडसैट" को साकार कर दिखाया।  पिछले दिनों कार्टोसेट-2 बी के साथ  "स्टुडसैट" को अंतरिक्ष भेजकर इसरो ने भारतीय अंतरिक्ष अभियान में छात्रों को शामिल करने की एक अनोखी शुरुआत कर दी।
 इसरो की इस नई पहल को भारत और फ्रांस के संयुक्त सेटेलाइट मिशन मेघा-ट्रॉपिक्स ने एक नई दिशा दी है। "स्टुडसैट" प्रोजेक्ट की अगली कड़ी के तौर पर मेघा-ट्रॉपिक्स मिशन के साथ छात्रों के बनाए दो नन्हे सेटेलाइट्स भी अंतरिक्ष भेजे गए हैं। इनमें से एक है आईआईटी कानपुर के छात्रों का बनाया सेटेलाइट "जुगनू" और  चैन्नई के नज़दीक एक यूनिवर्सिटी एसआरएम के छात्रों का बनाया सेटेलाइट "एसआरएमसेट । "
चेन्नई के छात्रों का "एसआरएमसेट " साढ़े 10 किलो वजनी है जबकि आईआईटी कानपुर के इस अनोखे "जुगनू" का वजन केवल 3 किलो है।  इसरो ने एक बार फिर देश के युवाओं को एक नई उम्मीद से भर दिया है। आईआईटी कानपुर के छात्रों की टीम ढाई साल से अपने सेटेलाइट  "जुगनू" के प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। मेघा-ट्रॉपिक्स मिशन के साथ अंतरिक्ष भेजे गए,रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट "जुगनू" और "एसआरएमसेट " अपनी-अपनी कक्षाओं में सफलता से स्थापित हो गए है।
 "जुगनू" के टीम लीडर आईाईटी कानपुर के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के  प्रो. नलिनाक्ष व्यास और उनके छात्रों की पूरी टीम  "जुगनू" की कामयाबी के जश्न में डूबी है और इस अनोखी उपलब्धि की ये पार्टी अभी लंबे वक्त तक जारी रहेगी। छात्रों की टीम के साथ प्रो. व्यास  "जुगनू" की लांचिंग को देखने के लिए श्रीहरिकोटा में मौजूद थे। उन्होंने लांचिंग के बाद एक प्रतिक्रिया में कहा कि जुगनू के सफल प्रक्षेपण के साथ ही हमारा वर्षो पुराना सपना साकार हो गया है। उन्होंने बताया कि जुगनू की मानीटरिंग सेंटर और ग्राउंड स्टेशन का काम उनके लौटते ही आईआईटी कानपुर से शुरू हो जाएगा ।
प्रो. व्यास ने बताया कि अंतरिक्ष में जगमगा रहे भारत के इस  "जुगनू" से आने वाले पहले सिगनल्स को रिसीव होते देखना मेरे अब तक के जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि  हमारा "जुगनू" स्वस्थ है और इसरो को इसके सिग्नल लगातार मिल रहे हैं। 800 किलोमीटर की ऊंचाई की कक्षा में होने की वजह से अभी इससे तस्वीरें नहीं मिल पा रही हैं। लेकिन कुछ दिनों बाद जैसे ही इसकी कक्षा में सुधार होगा , तस्वीरें मिलने लगेंगी।  "जुगनू" अपने मूविंग एंगल के समय 10 मिनट के लिए कानपुर समेत आईआईटी के ऊपर से भी गुजर रहा है।
 "जुगनू" ने छात्रों और शिक्षकों के बीच के खो चुके रिश्ते को पुनर्जीवित किया है, ये प्रोजेक्ट बिल्कुल बी आसान नहीं था और इसरो के वैज्ञानिकों को संतुष्ट करना और उन्हें  "जुगनू" को लांच करने के लिए मनाना एक बहुत बड़ी चुनौती थी। साल की शुरुआत में आईआईटी कानपुर के छात्रों ने इसरो वैज्ञानिकों के साथ निर्णायक वीडियो कॉन्फ्रेंसिग की जो 5 घंटे तक चली। इस विडियो कॉन्फ्रेंसिंग में इसरो के स्मॉल सेटेलाइट निदेशक डी. राघवमूर्ति के साथ कंट्रोल एक्सपर्ट, पार्सल एक्सपर्ट, कम्यूनिकेशन एक्सपर्ट, रिसर्च एक्सपर्ट, सेंसर एक्सपर्ट सहित सेटेलाइट तकनीक के दूसरे क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी मौजूद थे। दूसरी तरफ ,संस्थान के निदेशक प्रो. संजय गोविंद धोड़े, विभागाध्यक्ष व प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर प्रो. नलिनाक्ष व्यास, टीम इंचार्ज शांतनु अग्रवाल सहित 35 छात्रों हर सवाल का जवाब दे रहे थे। छात्रों ने इसरो विशेषज्ञों के सामने  "जुगनू" के प्रोटोटाइप का प्रत्येक कोण से प्रदर्शन किया।
सबकी मेहनत सफल रही और हर तरह से संतुष्ट हो जाने पर इसरो वैज्ञानिकों ने छात्रों के  "जुगनू" को अपना लिया और इसे लांच करने के लिए तैयार हो गए।  "जुगनू" इन्फ्रारेड इमेजिंग के माध्यम से आईआईटी में ही फोटो व सूचनाएं भेजेगा। जहां इसका नियंत्रण केंद्र होगा, यहीं परिणामों का अध्ययन भी किया जाएगा।  "जुगनू" अब हर दिन धरती के 14 से 15 चक्कर लगा रहा है और रोज 10 से 15 मिनट तक कानपुर परिक्षेत्र के ऊपर ही रहता है । जुगनू की मदद से कानपुर और आसपास इलाकों में खेती की स्थिति, गंगा नदी के बहाव की दिशा, मिट्टी की उर्वरा शक्ति, पर्यावरण तथा मिट्टी के कटाव की जानकारी के साथ अन्य तमाम महत्वपूर्ण सूचनाएं प्राप्त की जा सकेंगी। 
स्टुडसैट की कामयाबी ने देश में साइंस स्टूडेंट्स के बीच एक्सपेरीमेंट और इनोवेशन का एक नया दौर शुरू कर दिया है। आईआईटी कानपुर के स्टूडेंट्स अपने तीन किलो के सेटेलाइट 'जुगनू' के बाद अब दूसरे सेटेलाइट की डिजाइन पर काम कर रहे हैं। आईआईटी मुंबई के स्टूडेंट्स 'प्रधान' नाम के अपने सेटेलाइट को बनाने में जुटे हैं। अन्ना यूनिवर्सिटी के 40 किलो के सेटेलाइट 'अनुसैट' की कामयाबी के बाद चेन्नई की एसआरएम यूनिवर्सिटी और सत्यभामा यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स भी 10 किलो से कम दो सेटेलाइट्स को विकसित करने में जुटे हैं।