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बुधवार, 25 सितंबर 2013

300 साल पुरानी गुत्थी सुलझी, पता चला कि पृथ्वी के इनर कोर के घूमने की दिशा क्या है?


वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने पृथ्वी का कोर किस दिशा में घूमता है? इस 300 साल पुराने सवाल का जवाब ढूंढ़ निकाला है। वैज्ञानिकों के बनाए नए मॉडल से पता चला है कि ठोस लोहे की बनी पृथ्वी की इनर कोर पूरब की ओर से ‘सुपर रोटेट’ कर रही है। ‘सुपर रोटेट’ का मतलब ये कि इनर कोर की घूमने की रफ्तार पृथ्वी की गति से ज्यादा है। इस मॉडल से ये भी पता चला है कि मुख्यतौर पर पिघले लोहे से बना आउटर कोर अपेक्षाकृत धीमी गति से इनर कोर के विपरीत यानि पश्चिम की ओर से घूम रहा है।
1692 में एडमंड हैले ने पृथ्वी के जियोमैग्नेटिक फील्ड में पश्चिम दिशा को केंद्रित एक ड्रिफ्टिंग मोशन दिखाया था। तब से लेकर अब पहली बार वैज्ञानिक इनर कोर और आउटर कोर के घूमने के तरीकों को लेकर कुछ बता सके हैं। लीड्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि पृथ्वी का जियोमैग्नेटिक फील्ड ही हमारे ग्रह के कोर की इन विरोधी गतियों की वजह है।
लीड्स यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ अर्थ एंड एनवायरमेंट के डॉ। फिलिप लिवरमोर ने बताया कि भूकंप मापने वाले सीस्मोमीटर्स ने ही पहले पहल पृथ्वी की सतह के सापेक्ष ठोस इनर कोर के पूरब की ओर केंद्रित ‘सुपर रोटेशन’ को पहचाना था। न्यूटन के गति के तीसरे नियम की कसौटी पर इसे बराबर और विपरीत क्रिया के तौर पर आसानी से समझाया जा सकता है। इनर कोर पर मैग्नेटिक फील्ड पूरब की ओर केंद्रित नजर आती है, इस वजह से इनर कोर की रफ्तार पृथ्वी की गति से तेज रहती है। लेकिन पूरब की ओर घूमने के क्रम में ठोस इनर कोर अपने चारों ओर मौजूद पिघले आउटर कोर को विपरीत दिशा की ओर ठेलती रहती है, इससे आउटर कोर विपरीत दिशा यानि पश्चिम की ओर केंद्रित होकर घूमता रहता है।
हमारे ठोस इनर कोर का आकार हमारे चंद्रमा जितना है। लेकिन पृथ्वी के केंद्र में मौजूद ये लोहे का ठोस चंद्रमा चारों तरफ से पिघले लोहे के एलॉय से बने आउटर कोर से घिरा है। हालांकि पृथ्वी का इनर कोर हमारे पैरों से 5200 किलोमीटर नीचे है, फिर भी इसकी मौजूदगी प्रभाव पृथ्वी की सतह के लिए विशेषतौर पर महत्वपूर्ण है।  
जैसे-जैसे इनर कोर का आकार बढ़ता है, तो ठोस होने की इस प्रक्रिया में हीट रिलीज होती है, जिससे ऊउटर कोर में बिजली पैदा होती है। इस बिजली से ही हमारा मैग्नेटिक फील्ड जन्म लेता है।
पृथ्वी की सतह पर मौजूद जीवन के लिए ये मैग्नेटिक फील्ड सौर विकिरण से सुरक्षा के लिए एक कवच का काम करता है। इसके बगैर पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। 

रविवार, 22 सितंबर 2013

चंद्रमा पर एटमी धमाका करना चाहता था नासा

अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने मून मिशन के शुरुआती दिनों में चंद्रमा पर न्यूक्लियर बम से एटमी धमाका करने की योजना बनाई थी।

 यह बात भले ही बड़ी अजीब सी लगे, लेकिन है यह एक सच। हालांकि इस अत्यंत गोपनीय मिशन को सेना द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद वापस ले लिया गया था। सेना का मानना था कि यदि यह मिशन फेल हो गया तो पृथ्वीवासियों के लिए इसके परिणाम बेहद खराब होंगे।

एक अंग्रेजी अखबार ने दावा किया है कि स्पेस मिशन को भेजने की होड़ में वर्ष 1950 में अमेरिका ने चांद पर न्यूक्लियर बम का धमाका करने की योजना तैयार की थी। हालांकि इस योजना को कभी लागू नहीं किया जा सका।

अखबार के मुताबिक इस योजना को अत्यंत गोपनीय मिशन के तहत तैयार किया गया था। इस मिशन का नाम स्टडी ऑफ ल्यूनार रिसर्च फ्लाइट था। जिसका कोड नेम प्रोजेक्ट ए119 था। योजना के मुताबिक चांद पर धमाका कर वहां के धूल, मिट्टी समेत यहां मौजूद गैसों का परिक्षण किया जाना था। यह जिम्मा एक युवा खगोलविद को सौंपा गया था। इस योजना को बेहद गोपनीय तरीके से ही अंजाम भी देना था।

अखबार में छपी खबर के मुताबिक इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए अमेरिका को एक मिसाइल जमीन से चांद की ओर भेजनी थी। यह मिसाइल 238000 मील का सफर कर चांद तक जाती और धमाका करती। इसके लिए वैज्ञानिकों ने एटम बम को चुना था क्योंकि हाइड्रोजन बम काफी भारी होने के चलते चांद पर भेजना काफी मुश्किल था। 

लेकिन वैज्ञानिकों के इस मिशन को अमेरिकी सेना ने पूरी तरह से खारिज कर दिया। सेना का कहना था था कि यदि यह मिशन सफल नहीं हुआ तो इसका असर पृथ्वी पर पड़ेगा। सेना ने इसके गंभीर परिणाम होने की आशंका भी जताई थी, जिसके बाद इस योजना से पांव पीछे खींच लिए गए।

शनिवार, 31 जुलाई 2010

'उनको' मनाइए चंद्रमा के फूल से!

जानते हैं, दुनिया का सबसे मुश्किल काम क्या है? अगर शादीशुदा हैं तो रूठी हुई पत्नी, और अगर अभी शादी का इंतजार कर रहे हैं तो नाराज प्रेमिका को मनाना। खैर आने वाले वक्त में ये मुश्किल आसान होने वाली है। नहीं, चांद-तारे तो तोड़कर तब भी नहीं ला पाएंगे, लेकिन हां, रूठी हुई 'उनको' मनाने के लिए आप चंद्रमा के फूल जरूर उन्हें दे पाएंगे। चंद्रमा के फूल की भेंट के बाद आप उन्हें खास मून रेस्टोरेंट में ले जाएंगे जहां चंद्रमा पर उगी सब्जियों और फलों के रोमांटिक 'मून-लाइट डिनर' के साथ यादगार वक्त गुजारेंगे।
आने वाले कल में आप ये सब वाकई कर पाएंगे, क्योंकि चंद्रमा के अध्ययन में जुटे विशेषज्ञों ने सिफारिश की है कि भविष्य में चंद्रमा पर जाने वाले अभियानों का मुख्य मकसद 'चंद्रमा पर खेती' की शुरुआत करना होना चाहिए। इन चंद्र-वैज्ञानिकों का मानना है कि चंद्रमा की धूल से बेशकीमती तत्व हासिल करने में पेड़-पौधे हमारी सबसे ज्यादा मदद कर सकते हैं।
नासा के अपोलो कार्यक्रम के दौरान चंद्रमा से लाए गए धूल और मिट्टी के नमूनों के परीक्षण से साबित हो चुका है कि चंद्रमा की धूल में कोई भी ऐसा जहरीला तत्व मौजूद नहीं है, जो मानवों, जानवरों या फिर पेड़-पौधों के लिए किसी भी तरह से नुकसानदेह हो। अपोलो कार्यक्रम के दौरान एक खास मिशन शुरू किया गया था, जिसका मकसद ये जानना था कि चंद्रमा की मिट्टी पाकर पेड़-पौधे किस तरह की प्रतिक्रिया करते हैं? लेकिन अपोलो मिशन के साथ ही ये कार्यक्रम भी बीच में ही बंद कर दिया गया। अब यूनिवर्सिटी आफ फ्लोरिडा फिर से इस कार्यक्रम की शुरुआत कर रही है। वैज्ञानिकों की दिलचस्पी ये जानने में है कि पौधे चंद्रमा की मिट्टी से पोषक तत्व किस तरह से लेते हैं?

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

चंद्रयान ने खोजी-चांद पर सुरंग

चंद्रमा की सतह पर मध्य रेखा के करीब एक सुरंग मिली है, जो वहां जाने और बसने वाले अंतरिक्षयात्रियों के लिए प्राकृतिक पनाहगाह हो सकती है। इसरो साइंटिस्ट एस. एफ. ए. एस. आर्या के मुताबिक, यह गुफा ज्वालामुखी से बनी एक खाली ट्यूब जैसी है। इसकी लंबाई 2 किलोमीटर और चौड़ाई करीब 360 मीटर है। आर्या इस जानकारी को 1 से 5 मार्च के दौरान ह्यूस्टन में होने वाली समिट में साझा करेंगे। आर्या के मुताबिक, इस सुरंग का पता तब चला जब टीएमसी (टेरियन मैपिंग कैमरा) के आंकड़ों का विश्लेषण किया जा रहा था। इस खोज से चंद्रमा पर स्थायी बेस बनाने की भारत की इच्छा पूरी होगी। यह सुरंग भूमिगत चौकी की तरह है। इसकी छत अंतरिक्षयात्रियों को उल्काओं की खतरनाक बारिश, मौसम के असर और तापमान में उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रखेगी। चंद्रमा के चमकीले हिस्से वाली सतह पर तापमान आमतौर पर 300 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। चंद्रमा पर न तो एनवायरनमेंट है और न ही धरती जैसा गुरुत्वाकर्षण बल। इसलिए सूरज से निकलने वाली रोशनी अंतरिक्षयात्रियों को नुकसान पहुंचा सकती है। ये तेज रोशनी अंतरिक्षयात्रियों की कोशिकाओं को प्रभावित करती है। इसलिए चांद पर ऐसी जगह की जरूरत है, जो चांद पर अंतरिक्षयात्रियों को सूर्य की रोशनी से बचा सके। ये गुफा उसी काम आ सकती है। चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी की खोज के साथ नई तरह की चट्टानों का पता भी लगाया है। अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी में हाल में चंद्रयान पर हुए दो दिन के सम्मेलन में इसकी घोषणा की गई। इन चट्टानों को नासा के उसी मून मिनरॉलजी मैपर (एम3) ने खोजा है, जिसने पानी का पता लगाया था। ये चट्टानें आकार में छोटी हैं। फिलहाल वैज्ञानिक इनका विश्लेषण कर रहे हैं। हालांकि इन चट्टानों में जो खनिज पाए गए हैं, वे पहले की चट्टानों में पाए गए खनिजों की तरह हैं। लेकिन इन चट्टानों में खास बात उन खनिजों का कॉम्बिनेशन है।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

बेवकूफ बन गए शाहरुख-चांद-खान

अगर आप भी अपना नाम चांद पर दर्ज कराना चाहते हैं तो ये इतना मुश्किल काम भी नहीं है। चौंकिए मत। कई ऐसे प्राइवेट ग्रुप हैं जो कुछ पैसे लेकर चांद के किसी क्रेटर को आपका नाम या फिर चांद की जमीन के टुकड़े का मालिकाना हक आपको देने का सटिर्फिकेट बांट रहे हैं। दिल को खुश रखने के लिए खयाल अच्छा है, लेकिन एस्ट्रोनॉमर कम्युनिटी और इंटरनैशनल संगठनों की नजर में इसकी कोई मान्यता नहीं है। यानी न तो चांद पर शाहरुख खान के नाम के क्रेटर की कोई मान्यता है और न ही मायावती को गिफ्ट किए गए चांद के प्लॉट की। कुछ दिनों पहले न्यू यॉर्क स्थित इंटरनैशनल लूनर जियोग्राफिक सोसाइटी ने कहा था कि उसने चांद पर एक क्रेटरयानी गड्ढे का नाम शाहरुख खान रखा है। ये वही संस्था है जो लोगों को चांद पर प्लॉट काटकर इंटरनेशनल लुनर सोसाइटी के नाम से बेच रही है। मायावती को चांद पर प्लॉट इसी संस्था ने दिया है। शाहरुख के नाम पर क्रेटर की खबर आते ही उनके ट्विटर एकाउंट पर बधाई देने वालों का तांता लग गया। इस वाहवाही में शाहरुख भी बहक गए, दो दिन बाद अपना ट्विटर अपडेट करते हुए शाहरुख ने लिखा अब मेरा एक नाम और है..चांद। उन्होंने ये भी लिखा कि दो दिन तक ट्विटर पर न आने की वजह ये थी कि वो चांद पर गए थे, अपने क्रेटर को देखने। शाहरुख मीडिया पर भी खुश-खुश नजर आए और अपनी नई फिल्म माई नेम इज खान के प्रचार के साथ उन्होंने चंद्रमा के क्रेटर को भी भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बस शाहरुख यहीं बेवकूफ बन गए। कोई बयान जारी करने से पहले वो कुछ नहीं तो मुंबई प्लेनेटोरियम के निदेशक से ही मिल लेते तो उन्हें बात समझ में आ गई होती। लेकिन कामयाबी के शिखर पर भी और ऊंचा उड़ने की ख्वाहिश में वो सब कुछ भूल गए। उन्हें भनक भी नहीं हुई कि ये मामला बॉलीवुड की जबान में कहें तो फिल्म 'बंटी और बबली' में ताजमहल बेच देने जैसा ही है। इंटरनैशनल लूनर जियोग्राफिक सोसायटी एक प्राइवेट ग्रुप है जिसका नाम पहले लूनर रिपब्लिक सोसाइटी था। ये दुनिया भर में मोटी रकम के बदले चंद्रमा पर प्लॉट से लेकर लूनर क्रेटर के नाम बेच रही है या गिफ्ट कर रही है। लेकिन सबको, खासतौर पर भारतीयों को ये जानना बेहद जरूरी है कि चंद्रमा बिकाऊ नहीं है। ये किसी एक व्यक्ति या देश की निजी संपत्ति न पहले कभी था - न है - और न कभी भविष्य में होगा।
चंद्रमा के क्रेटर्स के नामकरण से लेकर हमारे सौरमंडल और पूरे ब्रह्मांड में हम जिन नई-नई चीजों को खोज रहे हैं उनके नामकरण का काम केवल एक एजेंसी करती है, जिसका नाम है इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमी यूनियन। मैंने खुद इस मामले पर जांच की है और मेरे मेल के जवाब में इंटरनैशनल एस्ट्रोनॉमिकल यूनियन (आईएयू) के जनरल सेक्रेटरी इएन कॉबेर्ट ने साफ कहा है कि इंटरनैशनल लूनर जियोग्राफिक सोसायटी चंद्रमा के क्रेटर्स का नाम रखने के लिए अधिकृत नहीं है और शाहरुख के नाम पर क्रेटर का नाम रखना फर्जी है। यूनाइटेड नेशन आउटर स्पेस ट्रीटी के मुताबिक भी खगोलीय स्पॉट और बॉडी को बेचने की इजाजत किसी को नहीं है।

रविवार, 20 सितंबर 2009

चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी के पहले ठोस संकेत


चंद्रमा पर पहली बार पानी की मौजूदगी के ठोस संकेत सामने आए हैं...चंद्रमा पर हुई ये अब तक की सबसे बड़ी खोज है...और ये खोज की है चंद्रमा पर मौजूद नासा के स्पेसक्राफ्ट लुनर रिकॉनिसेंस ऑरबिटर ने। हमारे लिए ये खबर और भी खास है, क्योंकि नासा के इस स्पेसक्राफ्ट को.. चंद्रमा पर पानी की खोज हमारे चंद्रयान के साथ मिलकर करनी थी। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी खोजने के मिशन की शुरुआत नासा के लुनर ऑरबिटर ने चंद्रयान के साथ मिलकर की....लेकिन तभी चंद्रयान से रेडियो संपर्क टूट गया। चंद्रयान के बेकाबू हो जाने पर लुनर रिकॉनिसेंस ऑरबिटर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का स्कैनिंग का काम अकेले ही किया...और वहां उम्मीद से कहीं ज्यादा हाइड्रोजन की मौजूदगी खोज निकाली। हाइड्रोजन पानी का मुख्य तत्व है और नासा ने चंद्रमा पर हाइड्रोजन की खोज को चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी का पहला ठोस संकेत माना है।
नासा के लुनर रिकॉनिसेंस ऑरबिटर ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ऐसी जगहों की स्कैनिंग की है जो हमेशा अंधेरे में डूबे रहते हैं और जहां तापमान शून्य से 240 डिग्री नीचे रहता है। 1994 में चंद्रमा पर गए नासा के एक दूसरे मिशन क्लीमेंटाइन ने पहली बार ये संभावना जताई थी कि चंद्रमा के इन भीषण ठंड वाले इलाकों के गड्ढ़ों में पानी बर्फ के रूप में मौजूद हो सकता है। तब से चंद्रमा पर पानी की तलाश की जा रही थी, लेकिन वहां पानी की मौजूदगी साबित करने वाले प्रमाण हमें अब तक नहीं मिल सके थे।
चंद्रमा पर पानी के ठोस संकेत पहली बार मिल जाने के बाद अब दुनियाभर के वैज्ञानिकों की निगाहें 9 अक्टूबर को चंद्रमा पर होने वाले एक महत्वपूर्ण प्रयोग पर जा टिकी हैं। इस दिन नासा का स्पेसक्राफ्ट लुनर रिकॉनिसेंस ऑरबिटर साथ गए एक खास इम्पैक्टर की टक्कर चंद्रमा से करवाएगा। चंद्रमा से होने वाली इस टक्कर से उठने वाले धूल के गुबार में पानी के कणों की मौजूदगी तलाशी जाएगी।

शनिवार, 12 सितंबर 2009

95% नहीं 100% सफल रहा चंद्रयान

करीब 15 रोज पहले जब इसरो ने चंद्रयान-1 से रेडियो संपर्क टूटने और इस मिशन के खत्म हो जाने की बात कही तो दिल एकबारगी धक से रह गया। पहला सवाल मन में उठा कि अपनी तय मियाद से करीब सवा साल पहले ही चुक जाने वाला चंद्रयान देश, समाज और साइंस को बीते दस महीने में क्या ऐसा कुछ दे पाया होगा जिससे न केवल एक मिशन के तौर पर चंद्रयान-1 को सफल ठहराया जा सके, बल्कि चांद के रहस्यों में से कुछ की थाह भी ली जा सके। इसरो के साइंटिस्टों ने भरोसा दिलाया कि चंद्रयान-1 अपने मिशन में 95 फीसदी तक कामयाब रहा है, पर लग रहा था कि यह बात उन्होंने यान को चंद्रमा की कक्षा में पहुंचा देने, चार लाख किलोमीटर दूर चंद्र सतह से मात्र 100 किलोमीटर ऊंचाई वाली कक्षा में उसे तैनात कर देने और उससे नियमित तौर पर कुछ ऐसे डेटा और चित्र प्राप्त कर लेने के विषय में कही होगी, जिनका महत्व सिर्फ एक रस्म निभा लेने से ज्यादा कुछ नहीं होगा। पर चंद्रयान से मिली जानकारियों के आरंभिक वैज्ञानिक विश्लेषणों से ही इस मिशन की ऐतिहासिकता सिद्ध होने लगी है।
चंद्रयान का वैज्ञानिक मकसद था चंद्रमा के जन्म और उसकी बनावट पर रोशनी डालना, उस पर पाए जाने वाले खनिजों की पहचान करना और वहां बर्फ व खनिजों की मौजूदगी की थाह लेना। इसके अलावा इस अहम सवाल का जवाब पाना भी चंद्रयान के उद्देश्यों में शामिल था कि क्या चंद्रमा लंबे स्पेस मिशनों के बेस कैंप की भूमिका निभा सकता है और क्या वहां इंसानी बस्तियां बसाने की भी कोई गुंजाइश बनती है? कुछ ही साल पहले हबल टेलीस्कोप के भेजे चित्रों के आधार पर नासा ने चंद्रमा की तीन जगहों को मानव बस्तियों के लिए उपयुक्त स्थानों के रूप में चिह्नित किया था। इनमें से दो वे हैं, जहां 1971 में अपोलो-15 और 1972 में अपोलो-17 के अंतरिक्षयात्री अपने कदम रख चुके हैं।
अपोलो-15 के अंतरिक्षयात्री डेविड आर. स्कॉट, जेम्स बी. इरविन और अल्फ्रेड एम. वॉर्डन चंद्रमा पर मौजूद हैडली रिले नामक एक नहरनुमा संरचना के पास उतरे थे और लूनर रोवर की सहायता से उस इलाके की खाक छानी थी। उन्होंने वहां की मिट्टी के नमूने भी लिए थे। बाद में नासा के इस चौथे मून मिशन को एक छलावा करार देने की कोशिश हुई। कहा गया कि असल में अपोलो-15 (जो पहले के अपोलो यानों के मुकाबले सबसे ज्यादा लंबे वक्त तक चांद पर रुका था) ही नहीं बल्कि पूरा अपोलो अभियान ही नासा द्वारा रचा गया एक छल था। वर्ष 1999 में गैलप ऑर्गनॉइजेशन द्वारा कराए गए सर्वे में छह फीसदी अमेरिकी इन आरोपों से सहमत पाए गए थे।
चंद्रयान के टेरैन मैपिंग कैमरे (टीएमसी) ने इस साल नौ जनवरी को हैडली रिले और चंद्रमा की एपेनाइन पर्वत श्रृंखला के इर्दगिर्द कई फोटो लिए। इन चित्रों को विभिन्न कोणों से देखने और इनके बारीक विश्लेषण से साइंटिस्टों को अपोलो-15 के पराक्रम को साबित करने का एक और आधार मिल गया है। चंद्रमा की मिट्टी धूसर-सलेटी रंग की है, पर अपोलो-15 की लैंडिंग साइट पर चंद्रयान को एक उजला पैच नजर आया। चांद की जमीन पर ऐसी उजली खाली जगहों को आम तौर पर उल्का गिरने से बने किसी गड्ढे (क्रेटर) से जोड़कर देखा जाता है, पर तीन कोणों से देखने पर यह साफ नजर आया है कि वहां जो 'हालो' या उजला गड्ढा है, ठीक उतना है और उसी जगह है जहां अपोलो यान उतरने का दावा किया जाता है। उसी दायरे में एक आयताकार टुकड़े की मौजूदगी भी नजर आई है, जो असल में अपोलो के अंतरिक्षयात्री द्वारा वहां छोड़ा गया लैंडिंग मॉड्यूल 'फॉल्कन' है।
जिस दूसरी अहम उपलब्धि को चंद्रयान-1 के खाते में फिलहाल दर्ज किया जा सकता है वह है चंद्रमा के जन्म और बनावट से जुड़ी एक परिकल्पना को पुख्ता आधार देना। माना यह जाता रहा है कि हमारा सौरमंडल बनने की प्रक्रिया पूरी होने के लगभग सात करोड़ वर्ष बाद लगभग मंगल के आकार का कोई ग्रह पिंड पृथ्वी से आ टकराया और इस टक्कर से अलग हुआ पिंड बाद में चंद्रमा बना। लेकिन इस टक्कर से निकली ऊर्जा इतनी ज्यादा थी कि अलग हुआ पिंड पूरा का पूरा पिघला हुआ था। मॉल्टेन मून नाम की इस प्रस्थापना को सिद्ध या खंडित करने के प्रायोगिक प्रयास जारी हैं, लेकिन चंद्रयान ने इसके पक्ष में एक आधिकारिक मोहर लगा दी है। चंद्रयान के मून मिनरोलॉजी मैपर ने जो डेटा भेजा है, वह यहां मैग्मा ओशन की पुष्टि करता है। उसके चित्रों से यहां एक खास खनिज एनॉर्थाइट की मौजूदगी साबित हुई है। नासा की साइंटिस्ट कार्ले पीटर्स का कहना है कि चंद्रयान ने मॉल्टेन मून होने तसदीक की है। इसका व्यावहारिक महत्व यह है कि इस जानकारी का फायदा भविष्य में चंद्रमा पर खनिजों की व्यापक खोजबीन में मिलेगा।
चंद्रयान से प्राप्त आंकड़ों और तस्वीरों के विश्लेषण का काम अभी तो बिल्कुल शुरुआती दौर है। इस पर अलग-अलग देशों के और कई तरह के 11 पेलोड (वैज्ञानिक उपकरण) थे। इनमें यूरोपीय स्पेस एजेंसी के तीन- इमेजिंग एक्सरे स्पेक्ट्रोमीटर, स्मार्ट इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर और सब-किलो इलेक्ट्रॉनवोल्ट ऐटम रिफ्लैक्टिंग एनेलाइजर, नासा के दो- मिनी सिथेंटिक अपरचर राडार व मून मिनरोलॉजी मैपर और बुल्गारिया एकेडमी ऑफ साइंस के रेडिएशन डोज मॉनिटर के अलावा इसरो के पांच अपने उपकरण शामिल थे। भारतीय उपकरण थे- मैपिंग कैमरा, हाइपर स्पेट्रल इमेजर, लूनर लेजर रेंजिंग इंस्ट्रूमेंट, हाई एनर्जी एक्सरे स्पेक्ट्रोमीटर और मूल इंपैक्ट प्रोब शामिल हैं। इन सारे उपकरणों के जरिए जमा डेटा व चित्रों का जैसे-जैसे सिलसिलेवार अध्ययन-विश्लेषण होगा, वैसे-वैसे चंदमा के रहस्यों से जुड़े कई खुलासे सामने आएंगे।
यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि इंसानी पहुंच का दायरा वॉएजर और पायनियर जैसे यानों की मार्फत भले ही सौर मंडल से बाहर चला गया हो, पर पृथ्वी के सबसे नजदीकी अंतरिक्षीय पिंड चंद्रमा को अच्छी तरह जाने बगैर स्पेस में दूर-दराज के ठौर-ठिकानों तक धावा मारने का कोई विशेष अर्थ नहीं है। इसलिए चंद्रयान-1 ने अगर चांद की कुछ गुत्थियां सुलझाने में दुनिया की मदद की है, तो इसे उसकी 95 प्रतिशत नहीं, शत प्रतिशत सफलता माना जाना चाहिए।

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

10 फरवरी 09 का चंद्रोदय


कल यानि 10 फरवरी 2009 की रात जब हम अपने घरों में थे या फिर घर लौटते वक्त सड़कों पर जाम में फंसे थे, ठीक उस वक्त पूनम का चांद उदय हो रहा था। सूर्योदय की तरह चंद्रोदय भी काफी खास होता है, लेकिन हम अकसर इसे देख नहीं पाते। क्योंकि सूर्योदय की तरह चंद्रोदय हमेशा एक ही वक्त पर नहीं होता। रात के बाद सूर्योदय एक नए सवेरे का ऐलान करता है, लेकिन चंद्रोदय हमेशा शाम के बाद नहीं होता। एस्ट्रो फोटोग्राफर जॉन स्टेटसन और उनके साथियों ने 10 फरवरी के इस चंद्रोदय को देखने के लिए अमेरिका के पोर्टलैंड के पास मौजूद द्वीप समूहों में से एक मैन के कास्को की खाड़ी में डेरा जमाया और समुद्र के पानी से उगते चंद्रमा की ये खूबसूरत तस्वीर खींची। चंद्रोदय का ये खूबसूरत नजारा देखिए, यकीनन अब आप भी इस बात से सहमत हो जाएंगे कि चंद्रोदय भी सूर्योदय से कम खूबसूरत नहीं होता।