समर्थक

सोमवार, 25 नवंबर 2013

हमें साइंस पर इसलिए खर्च करना चाहिए



भारत का मार्स ऑरबिटर मिशन के साथ ही एक पुराना सवाल फिर सामने है कि क्या भारत जैसे विकासशील देश में, जहां भारी तादाद में लोग अब भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं, वहां 450 करोड़ रुपये मंगल अभियान पर खर्च करना जायज है? ये एक सार्वकालिक सवाल है और केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी वैज्ञानिक समुदाय को इन सवालों का सामना करना पड़ता है। इस बार मंगलयान के साथ ये सवाल कुछ ज्यादा ही जोरदारी के साथ उठाया गया। एक न्यूज चैनल ने तो बकायदा ये भी दिखाया कि 450 करोड़ रुपये में सरकार लोगों के लिए क्या-क्या काम कर सकती थी।
बात केवल मंगलयान की नहीं है। भारत के कुछ और साइंस प्रोजेक्ट्स आने वाले वक्त में पूरे होने हैं, जिनकी लागत करोड़ों में है, मिसाल के तौर पर तमिलनाडु के पास बन रही देश की पहली अंडरग्राउंड न्यट्रिनो लैब, जिसकी लागत 150 करोड़ रुपये से ज्यादा है, उत्तराखंड के देवस्थल में एशिया के सबसे बड़े 13.5 मीटर के टेलिस्कोप की ऑब्जरवेटरी को बनाने का काम जारी है जिसकी लागत करीब 120 करोड़ रुपये है, चंद्रयान-2 जिसकी लागत 426 करोड़ रुपये है और इसके अलावा भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक में स्थायी स्टेशंस चला रहा है, जिसकी सालाना लागत भी कई सौ करोड़ है। सवाल फिर वही कि क्या भारत को साइंस पर भारी खर्च करना चाहिए?
 देश में बीएमडब्लू जैसी करोड़ों की कीमत वाली विदेशी गाड़ियों के बढ़ते महंगे शौक की बात न भी करें तो मंगलयान और साइंस के दूसरे प्रोजेक्ट्स पर हो रहे खर्च पर हाय-तौबा मचाने वाले लोग ये भूल जाते हैं भारत साइंस पर जितना खर्च करता है, उससे कई गुना ज्यादा पैसा इस देश में लोग सिगरेट और शराब पर उड़ा रहे हैं। भारत में सिगरेट का सालाना बाजार 720 अरब रुपये का है। आईटीसी जैसे सिगरेट के बड़े ब्रांड इसे और विस्तार देने के लिए जल्दी ही 25000 करोड़ रुपये और खर्च करने जा रहे हैं। शराब की बात करें तो देश में इस नशे का फुटकर बाजार 2100 अरब रुपये का है। इस नशीले एश्वर्य में झूमते विजय माल्या जैसे लोग फार्मूला-वन और कैसीनो जैसी चीजों को देश में ला रहे हैं और नई पीढ़ी के रोल मॉडल बन रहे हैं। लोग सिगरेट और शराब पर एक साल में 2800 अरब रुपये से ज्यादा उड़ा रहे हैं। ये रकम इस बार के केंद्रीय बजट में दर्शाये गए देश के कुल वास्तविक खर्च से भी ज्यादा है।
जब भी हम साइंस पर खर्च करते हैं, अंतरिक्ष पर खर्च करते हैं या किसी नई खोज के लिए खर्च करते हैं, तो हमेशा ये निवेश बोनस के साथ कई-कई रास्तों से वापस हमारे पास लौटता है। चंद्रयान देश के अंतरिक्ष अनुसंधान का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ था। चंद्रयान की लागत 354 करोड़ रुपये थी, लेकिन जब चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी खोज निकाला तो इससे देश को जो विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा अर्जित हुई वो नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी को दशकों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके भी नहीं मिल सकी थी।
साइंस अनुसंधान पर होने वाला खर्च मानवता के लिए जीवन बीमा के जैसा निवेश है, जो हमेशा मानवता के भविष्य को बेहतर और सुरक्षित बनाने के लिए किया जाता है। यही वजह है कि 100 साल से ज्यादा वक्त और बीत जाने के बावजूद कैंसर पर रिसर्च अब भी जारी है। एड्स पर विजय पाने की जंग भी पिछले 30 साल से लगातार जारी है। इन लड़ाइयों पर अब तक अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं, वैज्ञानिकों की कई पीढ़ियों ने बगैर किसी ठोस नतीजे के अपनी पूरी जिंदगी इन रोगों पर विजय पाने की कोशिश में खपा दी है। लेकिन समय, पैसे और प्रतिभा के इस लंबे और लगातार निवेश के बदौलत ही अब हमें इन रोगों की लड़ाईयों की अंधी सुरंगों के दूसरे सिरे पर उम्मीद की रोशनी नजर आ रही है। एचआईवी पर काबू पा लिया गया है और कैंसर के खिलाफ भी निर्णायक टीका बस आने को है।
 भारत में जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक अनुसंधान पर होने वाले सकल खर्च को व्यवस्थित और जवाबदेह बनाया जाए। मैंने जब सीएसआईआर के महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी से पूछा कि पिछले 5 साल के दौरान आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही? तो काफी याद करने के बाद उन्होंने ई-रिक्शा का नाम लिया। अब अगर देशभर में दर्जनों प्रयोगशालाओं और सरकारी वैज्ञानिकों की भारी-भरकम फौज वाला संगठन सीएसआईआर करोड़ों के बजट को खर्च कर 5 साल में देश के लिए बस ई-रिक्शा ही बना सका है। तो इससे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर जो चल रहा है, उसका खुलासा होता है और ये वाकई गहरी चिंता का विषय है। देश में वैज्ञानिकों को रिसर्च प्रोजेक्ट्स के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये आवंटित करा दिए जाते हैं। इसके बाद ऐसी कोई एजेंसी नहीं है जो वैज्ञानिकों से उनके प्रोजेक्ट्स के बारे में जवाब-तलब करे और पैसों की निगरानी करे। 15 से 20 साल तक वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स चलते रहते हैं और साथ में कई सहायक परियोजनाएं भी शुरू हो जाती हैं, विदेश यात्राएं चलती रहती हैं और पैसा बर्बाद होता रहता है। अंत में कोई भी ठोस वैज्ञानिक खोज सामने नहीं आती। जरूरत इस बात की है कि देश में वैज्ञानिक प्रोजेक्ट के लिए एक नियामक एजेंसी बने, जिसमें शीर्ष वैज्ञानिक शामिल हों और जो ये तय करे कि प्रोजेक्ट्स तय समय सीमा में ही पूरे हों, शोध कर रहे वैज्ञानिकों जवाबदेही तय हो, एक तय समयसीमा में शोध पूरे हों और उन प्रोजेक्ट्स के नतीजों का फायदा केवल उस वैज्ञानिक या उसके परिवार को नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों को मिले।
संदीप निगम

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

रॉकेट पर भारत की उड़ान की गोल्डन जुबली

21 नवंबर को भारत अपने पहले राकेट के प्रक्षेपण की स्वर्ण जयंती क्षणों में प्रवेश कर गया। यहां समीप के तटीय थुम्बा गांव में देश के अंतरिक्ष अभियान ने निर्णायक कदम उठाया था जिसकी परिणति आज चंद्रयान और मंगल अभियान के रूप में हमारे सामने हैं ।

उस वक्त नारियल के पेड़ों के झुरमुट के बीच थुम्बा में बस एक ही लांच पैड हुआ करता था। इस रॉकेट की लांचिंग के लिए वैज्ञानिकों ने लांच पैड के करीब मौजूद एक कैथोलिक चर्च सेंट मैरी मैगेडलेन को मुख्यालय के तौर पर इस्तेमाल किया था। बिशप के घर को रॉकेट तैयार करने वाली वर्कशॉप में तब्दील कर दिया गया था।

मवेशियों को बांधने वाली छायादार जगह को लैबोरेटरी बना दिया गया था, जहां अब्दुल कलाम आजाद जैसे नौजवान वैज्ञानिकों ने काम किया। ऐसी लैब और वर्कशॉप में तैयार देश के पहले रॉकेट के अलग-अलग हिस्सों को साइकिल पर लादकर लांच पैड तक पहुंचाया गया था।

इस उनींदे से गांव के आधुनिक भारत का प्रतीक बन जाने का सपना किसी ने नहीं देखा था लेकिन 21 नवंबर 1963 को यहीं से भारत ने अपना पहला अमेरिका निर्मित राकेट प्रक्षेपित किया और यह गांव रातोंरात सुखिर्यों में आ गया।

दूसरा रॉकेट, जिसे कुछ वक्त बाद लांच किया गया, वो आकार में कुछ बड़ा और वजनी था और इसे लांच पैड तक पहुंचाने के लिए बैलगाड़ी की मदद ली गई थी।  पहले रॉकेट लांच के बाद अगले 12 साल के भीतर भारत ने 350 से ज्यादा साउंडिंग रॉकेट्स बनाए और लांच किए।

बाद में इसे थुम्बा इक्वाटोरियल राकेट लांच स्टेशन (टीईआरएलएस) का नाम दिया गया लेकिन कुछ समय बाद इसे विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) कहा जाने लगा। इसरो के इस प्रमुख सेंटर का नामकरण भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर किया गया।

वो साराभाई ही थे जिन्होंने युवा वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक टीम को एकत्र कर मिशन की खातिर प्रशिक्षण के लिए अमेरिका भेजा था। उनके द्वारा भर्ती किए गए शुरूआती वैज्ञानिकों में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी थे।

केंद्र सरकार ने अंतरिक्ष कार्यक्रम में पहला कदम अगस्त 1961 में उठाया था और परमाणु उर्जा विभाग को अंतरिक्ष शोध तथा बाहरी अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग की जिम्मेदारी सौंपी थी।

1962 में साराभाई की अध्यक्षता में अंतरिक्ष शोध पर एक राष्ट्रीय समिति गठित की गयी जिसने मिशन को आगे बढ़ाया और अगले वर्ष 21 नवंबर को देश ने पहले अमेरिका निर्मित नाइके अपाचे राकेट को थुम्बा से प्रक्षेपित किया।

रविवार, 17 नवंबर 2013

डॉ. भाभा को भारत रत्न से सम्मानित करें: डॉ. राव


देश ने दो दिग्गजों सचिन तेंदुलकर और डॉ.सीएनआर राव को उनके अलग-अलग क्षेत्रों क्रिकेट और साइंस में अतुलनीय योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया है. ये बात अलग है कि सचिन के जश्न में डॉ. राव की खबर दब सी गई है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सचिन और उम्र में उससे दोगुने बड़े डॉ. राव दोनों ही 'मास्टर ब्लास्टर' हैं. सचिन को जहां लोग क्रिकेट का भगवान कहते हैं, वहीं डॉ. राव सॉलिड स्टेट साइंस में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने आप में एक इंस्टीट्यूशन, एक प्राधिकरण के रूप में मशहूर हैं.

 डॉ. सीएनआर राव क्रिकेट के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ये भी सच है कि वो निजी जीवन में क्रिकेट को बहुत ज्यादा पसंद भी नहीं करते हैं. एक यूनिवर्सिटी में अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने कहा भी था कि क्रिकेट ने इस देश में साइंस को पीछे धकेल दिया है. उन्होंने कहा था कि आप सचिन को भारत रत्न देना चाहते हैं तो जरूर दीजिए, लेकिन जरा इस देश के लिए डॉ. भाभा के योगदान को भी याद कर लीजिए, जिन्हें अब तक भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया है. दिसंबर 2011 में डॉ. राव ने बकायदा केंद्र सरकार से मांग की थी कि डॉ. होमी जहांगीर भाभा को उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत रत्न से सम्मानित किया जाए.

ये भी अनोखा संयोग है कि डॉ. भाभा से पहले खुद डॉ. सीएनआर राव को ही भारत रत्न से सम्मानित कर दिया गया और वो भी खुद क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर के साथ. देश ने विज्ञान और क्रिकेट दोनों को एकसाथ सम्मानित किया है. डॉ. सीएनआर राव भारत रत्न से सम्मानित होने वाले देश के तीसरे वैज्ञानिक हैं. उनसे पहले अब तक केवल तीन वैज्ञानिकों डॉ. सीवी रमन और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को ही भारत रत्न से सम्मानित किया गया है.

देश के परमाणु कार्यक्रम के जनक डॉ. होमी जहांगीर भाभा, देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रणेता डॉ. विक्रम साराभाई, सतीश धवन, बीरबल साहनी, जगदीश चंद्र बोस, शांति स्वरूप भटनागर, महान गणितज्ञ रामानुजन, सुब्रमणियम चंद्रशेखर, हरित क्रांति के जनक महान बायोटेक्नोलॉजिस्ट एमएस स्वामीनाथन, आनिल काकोदकर और भी कई महान वैज्ञानिक ऐसे हैं देश के विकास को इस स्तर तक ले आने में जिनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, उन्हें भारत रत्न नहीं मिला. भारत रत्न तो छोड़िए इनमें से कुछ वैज्ञानिकों को तो पद्मश्री तक नहीं दिया गया है. सरकारें अपने वैज्ञानिकों को भूल गईं और अब इनकी कहानियां स्कूलों की किताबों से दूर होते-होते नई पीढ़ी की चेतना से भी लुप्त हो चली हैं.

इसी साल 24 जनवरी को चीन ने भारत और चीन के बीच वैज्ञानिक सहयोग को मजबूत करने के लिए  डॉ. सीएनआर राव को अपने देश के शीर्ष विज्ञान पुरस्कार से सम्मानित किया था. भारत रत्न से सम्मानित किए जाने वाले देश के प्रमुख रसायन वैज्ञानिक डॉ.सीएनआर राव को सॉलिड स्टेट एवं और स्ट्रक्चरल कैमिस्ट्री के क्षेत्र में दुनियाभर में एक अथॉरिटी होने का सम्मान प्राप्त है. वो पदार्थ की ठोस अवस्था और संरचनात्मक रसायन शास्त्र के प्रति पूरी तरह से समर्पित वैज्ञानिक हैं.पदार्थ के गुणों और उनकी आणविक संरचना के बीच आधारभूत समझ को विकसित करने में उन्होंने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है.50 साल से भी ज्यादा वक्त से वो अलग-अलग रिसर्च प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं. दुनिया के अलग-अलग जर्नल्स में उनके करीब 1400 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. उन्होंने करीब 50 पुस्तकों का लेखन अथवा संपादन किया है.

डॉ. राव ने देश की वैज्ञानिक नीतियों को बनाने में भी अग्रणी भूमिका निभाई है. इस समय डॉ. राव प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं. वह सन 1985 में प्रथम बार और सन 2005 में दूसरी बार इस समिति के अध्यक्ष नियुक्त हुए हैं. राव कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हुए. सन 1964 में उन्हें 'इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेस' का सदस्य नामित किया गया. सन 1967 में 'फैराडे सोसायटी ऑफ इंग्लैंड' ने राव को मार्लो मेडल प्रदान किया गया. डॉ. राव ने 1951 में मैसूर यूनिवर्सिटी से अपनी बैचलर डिग्री ली और दो साल बाद बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से मास्टर्स की डिग्री ली. डॉ.राव ने पर्डयू यूनिवर्सिटी से 1958 में पीएच.डी. की. दुनियाभर की दर्जनों यूनिवर्सिटीज ने डॉ. राव को मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया है.

डॉ. राव काफी बेबाक भी हैं, मंगलयान लांचिंग से ऐन पहले जब पूर्व इसरो अध्यक्ष माधवन नायर ने मंगलयान को आधा-अधूरा मिशन बताते हुए इसे महज प्रचार का हथकंडा बताया तो डॉ. राव ने उन्हें जमकर लताड़ लगाई. मंगलयान लांच से पहले अपनी प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा कि इसरो ने मिशन में जल्दबाजी कर दी, उन्हें अभी होमवर्क पर और वक्त देना चाहिए था. लेकिन अब जबकि मिशन तैयार है, हमें वैज्ञानिकों के हौसले और कुछ नया कर दिखाने के जज्बे की सराहना करनी चाहिए.

 डॉ. राव को भारत रत्न सही दिशा में एक बेहतर शुरुआत है, जिससे एक उम्मीद सी बंधती है कि देश अब शायद डॉ. भाभा और डॉ. साराभाई जैसे अपने विज्ञान नायकों को भी देर से ही सही, लेकिन शीर्ष सम्मान से सम्मानित करेगा.

शिक्षा और विज्ञान में निवेश पर टिका है भारत का भविष्य: सीएनआर राव


देश ने विज्ञान की अहमियत को समझा है, डॉ. सीएनआर राव को भारत रत्न दिए जाने से ऐसा प्रतीत होता है. डॉ. राव भारत रत्न से सम्मानित किए जाने वाले देश के तीसरे वैज्ञानिक हैं. देश ने उनसे पहले केवल दो वैज्ञानिकों डॉ. सीवी रमन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को ही भारत रत्न के लायक समझा. 'वॉयेजर' इस शीर्ष सम्मान से विभूषित होने पर डॉ. सीएनआर राव को बधाई देता है. भारत रत्न अलंकरण से सम्मानित होने के बाद डॉ. राव ने बंगलुरू में छात्रों और वैज्ञानिकों को संबोधित किया, 'वॉयेजर' के पाठकों के लिए पेश है डॉ. सीएनआर राव के व्याख्यान का अनुवाद खुद उन्हीं के शब्दों में-

'दोस्तों, भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह शिक्षा एवं विज्ञान में कितना निवेश करता है . अफसोस की बात है कि विज्ञान को जितना समर्थन मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल रहा. मैं आपको बता दूं कि दुनिया में जिन देशों ने वाकई प्रगति की है, वे ऐसे देश हैं जिन्होंने खुद को वैज्ञानिक तौर पर उन्नत बनाया है . जिन्होंने खुद को वैज्ञानिक तौर पर उन्नत नहीं बनाया, उस देश को कोई नहीं जानता.

हमें शिक्षा और विज्ञान में ज्यादा निवेश करना चाहिए ताकि भारत का भविष्य सुरक्षित रहे . देश के सेंसेक्स और कारोबार का अच्छा प्रदर्शन ही काफी नहीं है . यह तो 5-10 साल के लिए है . लंबे समय के लिए क्या होगा और यदि इस मामले में बेहतर करना है तो विज्ञान में आधुनिक बनना पड़ेगा.

‘मूर्ख’ नेताओं ने विज्ञान को पीछे धकेल दिया है. वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए और अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जाने की जरूरत है. सरकार की तरफ से वैज्ञानिक समुदाय को पैसा दिये जाने के लिए हमने बहुत कोशिशें की हैं. लेकिन इन मूर्ख (ईडियट) नेताओं को वैज्ञानिक अनुसंधान की अहमियत समझ में ही नहीं आती. बेहद सीमित संसाधनों के बावजूद हम वैज्ञानिकों ने कुछ तो किया ही है. हमारा निवेश बहुत कम है, देर से मिलता है. हमें जितने पैसे मिल रहे हैं वो कुछ भी नहीं हैं.

चीन की तरक्की और भारत के पिछड़ जाने के लिए हमें खुद को ही जिम्मेदार ठहराना होगा. हम भारतीय कठिन परिश्रम नहीं करते. हम चीन वालों की तरह नहीं हैं. हम बहुत आरामपसंद हैं और उतने राष्ट्रवादी नहीं हैं. अगर हमें थोड़ा ज्यादा धन मिल जाता है तो विदेश जाने को तैयार हो जाते हैं.

विज्ञान आगे बढ़ने का रास्ता है. मुझे इस बात की खुशी है कि हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस बात पर यकीन किया. बदकिस्मती से उनके बाद विज्ञान को सरकारों से वो समर्थन नहीं मिला जितना होना चाहिए. थोड़ा-बहुत समर्थन है पर उतना नहीं है जितना होना चाहिए. इसमें और सुधार की गुंजाइश है.

बुनियादी शिक्षा के लिए, साधारण शिक्षा पर हमें अपनी जीडीपी का कम से कम 6 फीसदी निवेश करना चाहिए . सरकार को यह करना पड़ेगा क्योंकि अन्य लोग इसमें ज्यादा कुछ कर नहीं रहे, निजी क्षेत्र थोड़ा-बहुत कर रहे हैं . हम सिर्फ 2 फीसदी निवेश कर रहे हैं.  भारत का भविष्य इस पर निर्भर करता है कि शिक्षा और विज्ञान में किस तरह निवेश किया जाता है . हमें विज्ञान में अपने निवेश को 1 फीसदी से बढ़ाकर 2 फीसदी करना होगा . मैं उम्मीद करता हूं कि ये चीजें होंगी .

आज की टेक्नोलॉजी पुरानी जैसी नहीं रही . आज की टेक्नोलॉजी आधुनिक विज्ञान के आधार पर बहुत तेजी से विकसित होती है . आज के विज्ञान और कल की टेक्नोलॉजी के बीच का समय बहुत कम रह गया है . मेरा मानना है कि भारत को अभी यह सीखना है कि टेक्नोलॉजी और मौलिक रिसर्च में विज्ञान के नवीनतम नतीजों का इस्तेमाल किस तरह किया जाए . मौलिक रिसर्च में भारत की रैंकिंग काफी खराब है. मौलिक रिसर्च के मामले में हम 140 देशों में 66वीं पायदान पर हैं . हमें 66वीं पायदान से शीर्ष 10 में आना है .

भारत में मौलिक रिसर्च , टेक्नोलॉजीमें निवेश ज्यादा सफल नहीं रहा है और यही वजह रही है कि भारत चीन और दक्षिण कोरिया से प्रतिस्पर्धा करने में कामयाब नहीं हो पाया है . चीन और दक्षिण कोरिया ने मौलिक रिसर्च और शिक्षा के क्षेत्र में बहुत निवेश किए हैं . हमारे प्रधानमंत्री ने वादा तो किया है पर अब तक ऐसा हुआ नहीं है. वैज्ञानिक शोध पत्र प्रकाशित करने के मामले में भारत की स्थिति बदकिस्मती से बहुत खराब है .

अगले साल के शुरू में चीन पहले नंबर पर जाने को तैयार है . अब तक अमेरिका नंबर एक पर था जो दुनिया भर में हो रहे शोध कार्यों में 16.5 फीसदी पेश करता है . चीन करीब 12 फीसदी पेश कर रहा है जो 16.5 से 17 फीसदी होने को है . भारत महज 2.5 से 3 फीसदी पेश कर रहा है. मैं शोध पत्रों की संख्या के प्रति नहीं बल्कि उनकी गुणवत्ता को लेकर चिंतित हूं.

हमें ये समझना होगा कि सूचना-तकनीक का विज्ञान से कुछ लेना..देना नहीं है. अफसोस की बात है विज्ञान का मिजाज नहीं है.  आईटी कुछ लोगों के लिए पैसा बनाने का जरिया है और वहां काम करने वालों में नाखुश लोगों की तादाद ज्यादा है. क्योंकि मैं रोज अखबार में देखता हूं कि किसी ने आत्महत्या कर ली, किसी की हत्या कर दी गई, कुछ लोग नाखुश हैं कि जिंदगी खतरनाक है . मुझे देखिए मैं 80 वर्ष की उम्र में खुश हूं. मुझे कोई शिकायत नहीं है . मेरा मानना है कि खुशी कुछ अलग है.. आप जो कर रहे हैं उसका आनंद उठाईए.