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रविवार, 21 जून 2009

बस कुछ दिन और, हम भी होंगे मंगल पर !

चंद्रमा पर पहुंचने के बाद अब मंगल तक पहुंचना हमारे लिए नामुमकिन नहीं रहा। बैंगलोर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के साइंटिस्ट आजकल एक ऐसे नए स्पेसक्राफ्ट की डिजाइन पर काम कर रहे हैं, जिसका इस्तेमाल मंगल तक जाने में किया जा सके। खास बात ये कि हमें मंगल तक जाने वाले इस स्पेसक्राफ्ट का इंजन सोलर या फिर आयन बेस्ड
भारत ने 2025 तक मंगल तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया है। और इसे साकार कर दिखाने के काम में जुटे हैं इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स के वैज्ञानिक। मंगल तक जाने वाले इस स्पेसक्राफ्ट की डिजाइन के काम में जुटे थ्योरी गुप के प्रोफेसर सी. शिवराम ने बताया कि हमारे पास लंबी दूरी तक स्पेसक्राफ्ट भेजने की शुरुआती तकनीक मौजूद है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर काम किया जाना है कि ये स्पेसक्राफ्ट किस तरह का हो क्योंकि इसे मंगल तक जाने में आठ महीनों का लंबा सफर तय करना पडे़गा। शिवराम दो ऐसे मॉडल्स पर काम कर रहे हैं जिनमें ऊर्जा और समय दोनों की बचत होगी। मार्स स्पेसक्राफ्ट का पहला मॉडल है सोलर सेल मॉडल, इसमें स्पेसक्राफ्ट के साथ नाव के पाल जैसी संरचनाएं लगी होंगी। सूरज की किरणों में मौजूद फोटॉन्स जब इनसे टकराएंगे तो इस टक्कर के मिलने वाले बल से ये स्पेसक्राफ्ट आगे बढ़ेगा। लेकिन इसके लिए बहुत अच्छे किस्म के सोलर स्टोरेज डिवाइस की जरूरत है। लेकिन इस पर अभी काफी काम की जरूरत है क्योंकि फिलहाल सोलर स्टोरेज और डिस्ट्रिब्यूशन बहुत महंगा है। इसी वजह से सोलर तकनीक में जोर फिलहाल इसकी लागत घटाने पर है। शिवराम का दूसरा मॉडल आयन इंजन पर आधारित है। वो बताते हैं, आयन दरअसल उच्च संवेग वाले चार्ज्ड पार्टिकल होते हैं। इनकी मदद से तेज और लंबी फ्लाइट मुमकिन हो है। फिलहाल, इन दोनों इंजनों पर रॉकिट डायनॉमिक्स के तहत इसरो के सहयोग से काम हो रहा है।

ब्रह्मांड में जीवन ढूंढेगा अनोखा चुंबकीय बैक्टीरिया

महाराष्ट्र में वैज्ञानिकों को एक ऐसा बैक्टीरिया मिला है जिनपर चुंबकीय कण पाए जाते हैं और जो भू चुंबकीय क्षेत्र में तैरता है। जैव वैज्ञानिकों ने इस चुंबकीय बैक्टीरिया को बुलढाना जिले में उल्का पिंड से बनी एक प्राचीन लोनर झील से ढूंढा है। इस खोज से ब्रह्मांड में अन्य कहीं जीवन की खोज में मदद मिलने की उम्मीद है। वैज्ञानिकों के लिए रुचि का केंद्र रहे इस चुंबकीय बैक्टीरिया को उल्का पिंड के असर से बनी इस खास झील से अलग किया गया जो कि बसाल्ट चट्टानों से बनी अकेली झील है। कराड के यशवंतराय चव्हाण साइंस कॉलिज के माइक्रोलॉजिस्ट महेश चवादार ने बताया कि इस बैक्टीरिया और उल्का पिंड में कुछ रिश्ता दिखता है। इससे अंतरिक्ष में अन्य कहीं जीवन की खोज में मदद मिलेगी। यह खोज करंट साइंस पत्रिका के हाल के अंक में छपी है। 1975 में पहली बार ऐसे बैक्टीरिया की खोज हुई थी और दुनिया की कुछ प्रयोगशालाओं में ही ऐसे जीवाणु रखे हैं।

शुक्रवार, 19 जून 2009

भारत और जापान का पहला साझा स्पेस मिशन

एशिया की दो महाशक्तियां भारत और जापान पहली बार साथ मिलकर एक संयुक्त स्पेस रिसर्च प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं। इसके तहत इस साल अंतरिक्ष के जीरो ग्रैविटी के माहौल में पौधों को उगाने का प्रयोग किया जाएगा। जापान की समाचार एजेंसी से मिली खबर के मुताबिक इस साल अक्टूबर में भारत और जापान अपने साझा अंतरिक्ष अभियान के तहत एक छोटा सेटेलाइट अंतरिक्ष भेजेंगे। ये सेटेलाइट अपने साथ जापान के खास लैबोरेट्री उपकरण अंतरिक्ष ले जाएगा और करीब 600 किलोमीटर ऊंची अपनी कक्षा में करीब एक हफ्ते तक पृथ्वी की परिक्रमा करेगा।
जापान की स्पेस एजेंसी जाक्सा के प्रोफेसर नोरियाकी इशियोका ने बताया कि अंतरिक्ष में फोटोसेंथेसिस की प्रक्रिया का अध्ययन करना ही भारत के साथ इस संयुक्त मिशन का मकसद है। इसके तहत हम अंतरिक्ष में एक खास किस्म की एल्गी यानि काई के उगने का अध्ययन करेंगे। भारत और जापान के इस संयुक्त प्रोजेक्ट से स्पेस फॉर्मिंग, यानि अंतरिक्ष में खेती के शोध को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।
उधर इसरो के चेयरमैन जी माधवन नायर ने बताया कि हम अपना अगला सेटेलाइट ओशन सैट जुलाई-अगस्त तक लांच करेंगे। उन्होंने बताया कि ओशन सैट की मदद से हमें समुद्री सतह, समुद्री धाराओं के साथ वायु धाराओं और मछली पकड़ने के नए इलाकों का पहचान भी की जाएगी।

पहचानिए ये कौन है ?

ये तस्वीर न तो थ्री-डी एनीमेशन का कमाल है और न ही ये किसी ये किसी कार्टून कलाकार के दिमाग की उपज। देखिए, गौर से देखिए...एक चींटी आपको घूर रही है। जी हां, ये है एक चींटी के चेहरे का माइक्रोस्कोपिक क्लाज-अप। इस तस्वीर की खास बात ये कि किसी चींटी के चेहरे का इतना साफ क्लोजअप पहली बार लिया गया है। चींटी के मुंह और आंखों समेत पूरे चेहरे के भावों को दर्शाने वाली ये अनोखी तस्वीर दरअसल 136 अलग-अलग तस्वीरों को मिलाकर बनाई गई है।
चींटी के चहरे की इस माइक्रोस्कोपिक तस्वीर को लिया है नासा के एम्स रिसर्च सेंटर, कैलीफोर्निया के वैज्ञानिक मॉली गिब्सन ने और इस अदभुत काम में उनकी मदद की नैनोटेक्नोलॉजिस्ट जे लांगसन ने। लांगसन ने चींटी के चेहरे का क्लोजअप लेने के लिए रोबोटिक कैमरे जीगापैन की मदद ली, लेकिन इस काम को करने के लिए उन्हें कैमरे में कुछ बदलाव भी करने पड़े। चींटी के चेहरे के अलग-अलग हिस्सों की तस्वीरें लेकर जब उन्हें कंप्यूटर पर एकसाथ जोड़ा गया, तो चींटी का क्लोजअप देखकर सबके मुंह से बस यही निकला...वाह !

रविवार, 14 जून 2009

"सोनिक ब्लैक होल" की शानदार खोज

सेर्न के लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर में प्रोटॉन्स की टक्कर से ब्लैक होल के बनने की आशंका, फिल्म एंजेल्स एंड डिमॉन्स ने पर्दे पर सही साबित कर दिया है। ये बात अलग है कि एलएचसी में पहला प्रयोग फेल हो जाने के बाद दोबारा प्रयोग शुरू करने में अभी काफी वक्त है। लेकिन इस बीच वैज्ञानिकों को प्रयोगशाला में ब्लैक होल उत्पन्न करने में कामयाबी मिल गई है। ये बात अलग है कि ये ब्लैक होल असली ब्लैक होल जैसा खतरनाक नहीं है...और हमारी धरती सुरक्षित है।
स्टीफन हॉकिंग का सिद्धांत बताता है कि ब्लैक होल से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की एक तेज जेटधारा सी निकलती है। ब्लैक होल से फूटने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन की इस तेज जेटधारा को उन्हीं के नाम पर हॉकिंग रेडिएशन का नाम दिया गया। हॉकिंग के इस सिद्धांत के 35 साल हो गए, लेकिन अब तक किसी ने ब्लैक होल से फूटनेवाली इस रेडिएशन को डिटेक्ट नहीं किया। लेकिन अब इस्राइल के वैज्ञानिकों की एक टीम एक ऐसे तरीके को खोजने में जुटी हैस जिससे प्रयोगशाला में ही एक आर्टीफीशियल ब्लैकहोल उत्पन्न कर उससे ह़किंग रेडिएशन को पैदा किया जा सके।
फिजिक्स की वेबसाइट arxiv.org की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों साइंटिस्टों की ये टीम पदार्थ की एक खास स्थिति, जिसे बोस-आईंस्टीन कंडेन्सेट ( बीईसी) कहते हैं, उसमें सोनिक वेव्स यानि तीव्र ध्वनि तरंगे भेजकर प्रयोगशाला में ही एक आर्टीफीशियल ब्लैक होल बनाने की कोशिशों में जुटी है। बोस-आईंस्टीन कंडेन्सेट या बीईसी पदार्थ की वो गैसीय स्थिति है जो एब्सोल्यूट जीरो के करीब हिमांक तापमान पर पाई जाती है। इस्राइली वैज्ञानिकों की टीम ने खास तौर पर चुनी गई ध्वनि तरंगों के इस्तेमाल से बोस-आईंस्टीन कंडेन्सेट में एक ऐसा क्षेत्र पैदा करने में सफलता हासिल की है, जिससे प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता। ये एक महान खोज है, क्योंकि दुनिया में पहली बार "सोनिक ब्लैक होल" को बनाने में कामयाबी मिली है। दुनिया का पहला "सोनिक ब्लैक होल" प्रयोगशाला में बनाने में वैज्ञानिकों को 30 साल लग गए। यहां तक तो सफलता मिल गई, लेकिन असली ब्लैक होल से फूटती हॉकिंग रेडिएशन ती तीव्र जेटधारा को आंखों के सामने घटित होता देखना अभी बाकी है। इस्राइली टीम को उम्मीद है कि "सोनिक ब्लैक होल" से भी हॉकिंग रेडिएशन की जेटधारा ठीक उसी तरह फूट निकलेगी जैसे कि असली ब्लैक होल में होता है। "सोनिक ब्लैक होल" की कामयाबी से वैज्ञानिकों की टीम बेहद उत्साहित है और इस ऐतिहासिक उपलब्धि को हासिल करने के लिए प्रयोग में जुटी है।

बाल-बाल बचे उल्का से !

अचानक किसी पर आसमान से कोई उल्का आ गिरे....और वो बच जाए ! …तो इसे आप क्या कहेंगे ? ऐसी ही अविश्वसनीय घटना हुई है जर्मनी के एसेन शहर में रहने वाले 14 साल के छात्र गेरिट ब्लैंक के साथ। रोजमर्रा की तरह ब्लैंक एसेन की सड़कों पर मटरगश्ती कर रहा था कि तभी सुपरस्पीड से आसमान से गिरती मटर के दाने जितनी बड़ी उल्का उसके सिर से रगड़ती हुई सड़क पर जा टकराई। अचानक हुए इस हादसे से ब्लैंक एकदम घबरा गया, एक तेज दर्द की लहर उठी और हाथ लगाने पर पता चला कि उसके सिर में तीन इंच लंबा घाव हो गया है। अच्छी बात ये रही कि घाव ऊपरी त्वचा में ही है अंदर सिर की हड्डी में खरोंच भी नहीं आई। मौके पर पहुंचे टेलीग्राफ के रिपोर्टर ने बताया कि वो उल्का ब्लैंक के सिर को रगड़ती हुई सड़क पर इतनी तेजी से जा टकराई कि वहीं पैर जितना बड़ा एक गड्ढ़ा हो गया। इससे पता चलता है कि उस मटर के दाने जितनी बड़ी उल्का की रफ्तार कितनी ज्यादा थी। ब्लैंक यकीनन बाल-बाल बचा है। उससे टकराने वाली उल्का की जांच वाल्टर हॉमैन ऑब्जरवेटरी ने की है।
पृथ्वी के वायुमंडल में हर दिन न जाने कितनी उल्काएं प्रवेश करती हैं, इनमें से ज्यादातर आकार में छोटी ही होती हैं। वायुमंड में प्रवेश के बाद कड़े दबाव और तापमान से ज्यादातर उल्काएं कई छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाती हैं। 7 में से 6 मामले में उल्काओं के ये टुकड़े समुद्र में जा गिरते हैं। धरती और वो भी किसी के ऊपर उल्काओं के गिरने की घटना बहुत दुर्लभ है। फिरभी अगर ऐसा कभी हो तो उल्कापात के बाद कोई जीवित नहीं बच सकता। राजस्थान के एक सीमावर्ती इलाके में कुछ साल पहले दो गड़ेरियों के बीच एक छोटी उल्का आ गिरी थी, जिससे दोनों की मौत हो गई थी। इस नजरिए से ब्लैंक वाकई खुशकिस्मत है।

दुनिया का पहला सोलर-हाइब्रिड पावर प्लांट

एक छोटी सी जगह पर 30 सोलर पैनल और बीच में एक फूल जैसा टॉवर। क्यो आप यकीन करेंगे कि इन चीजों से इतनी बिजली पैदा होगी जिनसे 70 घरों की ऊर्जा संबंधी जरूरतें पूरी होंगीं। ये है दुनिया का पहला सोलर-हाइब्रिड पावर प्लांट। इस प्लांट के सोलर पैनल इस तरह लगाए जाते हैं कि सूरज दिनभर किसी भी दिशा में हो उसकी रोशनी इन पैनल से रिफलेक्ट होकर बीच के टॉवर पर पड़ती रहे। बीच के इस टॉवर में सोलर रिसीवर लगे हुए हैं जो सूरज की किरणों को सोलर थर्मल इनर्जी में बदल देते हैं, जिनसी मिनी टरबाइन चलने लगती है और बिजली बनने लगती है। इस प्लांट की सबसे खास बात ये कि ये प्लांट दिनभर सूरज की रोशनी से बिजली बनाता है और सप्लाई करता है, सूरज डूबते ही इस प्लांट में लगी गैस से चलने वाली टरबाइन्स ऑन हो जाती हैं, जिससे अंधेरे में भी बिजली बनाने में कोई रुकावट नहीं आती। इस तरह ये प्लांट 24 घंटे बिजली की उत्पादन करता रहता है। ये प्लांट बेहद कम जगह में ही लग जाता है और ये उन दूर-दराज के ग्रामीण या पहाड़ी इलाकों के लिए वरदान है जो बड़े ग्रिड से नहीं जुड़े हैं। इस प्लांट को बायोडीजल, नेचुरल गैस या बायो गैस से भी चलाया जा सकता है। इस तरह ये प्लांट बिजली तो बनाता है लेकिन साथ ही पर्यावरण को भी प्रदूषित नहीं करता।
ये अनोखा बिजली का प्लांट बनाया है इस्राइल की कंपनी औरा ने। कंपनी ने शुरुआत में इस्राइल के ग्रामीण इलाकों में ये प्लांट लगाए हैं और इनका उदघाटन होगा 24 जून को।

शनिवार, 6 जून 2009

निगाहें ब्लैक होल पर

अनंत शून्य को निहारती विशाल नीली आंख, हमारी पृथ्वी। पृथ्वी की निगाह टिकी है हमारी आकाशगंगा के केंद्र में। हमसे करीब 30,000 प्रकाश वर्ष दूर हमारी आकाशगंगा के केंद्र में एक अनोखी हलचल जारी है, हम जिसका बड़ी गहराई के साथ अध्ययन कर रहे हैं। आकाशगंगा के केंद्र में विशाल सूरज के झुरमुट के पीछे गर्म गैसों के बादल आपस में टकरा रहे हैं, भयंकर तापमान वाली ये दुनिया हर पल गामा किरणों के विस्फोट से थर्रा उठती है। आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद पदार्थ के इस कब्रिस्तान में एक गहरा साया मौजूद है, ये है एक विशाल ब्लैक होल। ये ब्लैक होल वो जगह है जहां गुरुवाकर्षण बल का साम्राज्य कायम है। ब्लैक होल की खोज साइंस की अब तक की सबसे बड़ी खोजों में से है। सैद्धांतिक तौर पर हम इनके अस्तित्व को साबित कर चुके हैं, लेकिन अब तक हम इन्हें देखने में सफल नहीं हुए हैं। अब हम इसी कोशिश में जुटे हैं कि पृथ्वी को एक विशाल आंख में तब्दील कर अपनी आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद ब्लैक होल को देखने के साथ उसकी तस्वीर भी ली जाए। पृथ्वी को विशाल आंख में बदलने का काम करेंगे माइक्रोवेव टेलिस्कोप का एक विशाल नेटवर्क जिसे पूरी धरती पर बिछाया जा रहा है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि पृथ्वी के घूमने के साथ ही कोई न कोई माइक्रोवेव टेलिस्कोप आकाशगंगा के केंद्र की ओर हमेशा फोकस रहे। आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद जिस विशाल ब्लैकहोल को देखने की कोशिश की जा रही है, उसका कोडनेम रखा गया है - सैगिटैरियस ए। इस अनोखे प्रोजेक्ट का संचालन कर रहा है मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी और इस काम में जुटी साइंटिस्टों की टीम का नेतृत्व कर रहे हैं, डॉ. शेप डोलेमैन। डॉ. डोलेमैन की टीम ने सैगिटैरियस ए की एक पहली तस्वीर लेने में कामयाबी भी हासिल कर ली है, यहां दी गई तस्वीर वही है। लेकिन उनकी टीम अब आकाशगंगा के केंद्र में और गहराई तक झांकने की कोशिश में जुटी है। वो उस पल की झलक देखने की कोशिश में जुटे हैं जब पदार्थ ब्लैकहोल की चपेट में आकर उसमें जा गिरता है, और ब्लैकहोल का शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण स्पेस-टाइम को तोड़-मरोड़ देता है। इससे हमें पता चल सकेगा कि ब्लैकहोल किस तरह से बनते हैं और बड़े होते हैं। एमआईटी का ये प्रयोग आइंस्टीन की थ्योरी आप रिलेटिविटी का टेस्ट भी है। क्योंकि इसी थ्योरी ने सबसे पहले ब्लैक होल के होने की बात कही थी। डॉ. डोलेमैन की टीम के प्रयोग में अगर आइंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी टूटती है, तो उन्हें ब्लैक होल नहीं दिखेगा। बल्कि तब उन्हें उससे भी कहीं ज्यादा हैरान कर देने वाली बिल्कुल नई चीज नजर आएगी, जिसके बारे में हम अब तक अंधेरे में हैं।

एलियन्स का ‘पृथ्वी स्टेशन’ व्यावहारिक नहीं !

फिजिसिस्ट एनरिको फर्मी हमारे वक्त के ऐसे मशहूर वैज्ञानिक हैं जिनका मानना है कि इस ब्रह्मांड में हमारे जैसी और हमसे भी उन्नत कई सभ्यताएं अलग-अलग ग्रहों पर मौजूद हैं। फिर सवाल ये उठता है कि उनसे हमारा संपर्क क्यों नहीं होता ? वो आखिर हैं कहां ? ये सवाल बहुत मशहूर है और इसे फर्मी पैराडॉक्स के नाम से जाना जाता है। सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस यानि सेटी प्रोजेक्ट इसी सवाल का जवाब करीब 40 साल से ज्यादा वक्त से तलाश रहा है। अहम सवाल ये भी है कि अगर ब्रह्मांड में हमारे जैसी या फिर हमसे उन्नत सभ्यताएं मौजूद हैं, तो फिर वो हमारे ग्रह पर कब्जा क्यों नहीं कर लेतीं ? इस पुराने सवाल का ताजा सवाल ढूंढ़ा है पेन्सिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों जैकब डी. हक, मिश्रा और सेट डी बम ने। इन वैज्ञानिकों के मुताबिक एलियन्स की दिलचस्पी हमारी पृथ्वी में इसलिए नहीं है , क्योंकि यहां कब्जा करके एक स्टेशन बनाना उनके लिए व्यावहारिक नहीं होगा। हक, मिश्रा और बम कहते हैं कि हमारे पास दूसरे ग्रहों-चंद्रमाओं पर कालोनी बनाने की टेक्नोलॉजी है, लेकिन फिरभी हम धरती से दूर अपना स्टेशन बनाने बसाने में देरी कर रहे हैं, क्योंकि ऐसा करना व्यावहारिक नहीं होगा। जिस तरह से दूसरे ग्रहों पर स्टेशन बनाना हमारे लिए व्यावहारिक नहीं है, ठीक उसी तरह पृथ्वी पर कब्जा करना भी एलियन सभ्यताओं के लिए व्यावहारिक नहीं होगा।