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मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

मंगल पर जिंदगी के निशान, बस 10 साल के भीतर


पृथ्वी से बाहर जीवन की तलाश अगले दशक में पूरी होने वाली है। ये तलाश पूरी हो रही है इस जवाब के साथ कि जिंदगी केवल पृथ्वी तक ही सीमित नहीं है। पृथ्वी के अलावा जिंदगी की मौजूदगी के सबसे शक्तिशाली निशान हमें मिले हैं अपने पड़ोसी ग्रह मंगल से। मंगल पर मौजूद नासा के फीनिक्स मिशन के मुख्य वैज्ञानिक पीटर स्मिथ का मानना है कि अगले दशक तक हम मंगल में जिंदगी के निशान खोजने में कामयाब रहेंगे।
पीटर स्मिथ यूनिवर्सिटी आफ एरीजोना के प्रोफेसर हैं और उन्होंने मंगल पर जीवन के निशान खोजने के लिए भेजे गए फीनिक्स मार्स मिशन में शामिल साइंटिस्टों की टीम का नेतृत्व भी किया था। अप्रैल के दूसरे हफ्ते में यूनिवर्सिटी आफ डेलावेयर में अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने ये कहकर श्रोताओं में सनसनी फैला दी कि मंगल पर जिंदगी के निशान अगले दशक में मिल सकते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि उनके इस यकीन और आत्मविश्वास की वजह हैं वो अदभुत सुराग जो फीनिक्स ने हमें भेजे हैं। उन्होंने कहा कि मंगल पर जिंदगी की खोज, इस दुनिया और मानव सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी खोज होगी। बहुत मुमकिन है कि मंगल पर जाने वाला अगला मिशन ‘मार्स साइंस लैबोरेटरी’ ही हमें ये सबसे बड़ी खबर भेज दे।
फीनिक्स मिशन मंगल के उत्तरी ध्रुवीय इलाके में 2007 को भेजा गया था, लेकिन सात महीने तक एक ही जगह पर काम करने के बाद फीनिक्स अचानक स्लीप मोड में चला गया। इस साल अक्टूबर में वैज्ञानिक फीनिक्स को दोबारा जगाने की कोशिश करेंगे, लेकिन फीनिक्स अब दोबारा जागेगा, इसकी संभावना कम ही है।

जिंदगी का अनोखा ‘जंगल’


मंगल से मिलते-जुलते हालात वाली जगह पृथ्वी पर एक ही है, और वो है अंटार्कटिक का ब्लड फॉल्स। इस जगह का ये नाम इसलिए पड़ा क्योंकि मिट्टी में आइरन यानि लोहे की भारी मौजूदगी की वजह ये यहां की पूरी जमीन सुर्ख लाल है, बिल्कुल मंगल ग्रह की तरह। यहीं एक ग्लेशियर के नीचे से वैज्ञानिकों ने तरह-तरह के जीवों से भरपूर एक ऐसा जंगल खोज निकाला है, जो 15 लाख साल से पृथ्वी की बाहरी दुनिया और हमारी नजरों से दूर था। यहां जंगल से मतलब विशाल पेड़-पौधों से नहीं, बल्कि बिल्कुल नए पारिस्थितिकी तंत्र और बिल्कुल नए किस्म के बैक्टीरिया की उन तमाम प्रजातियों से है, जो ऐसे हालात में मजे से फल-फूल रहे हैं जहां जिंदगी का वो रूप जिसे हम जानते हैं, एक पल भी सांस नहीं ले सकता। पृथ्वी का बाहरी माहौल यानि ऑक्सीजन इन जीवों के लिए जहर है। इन अनोखे माइक्रोब्स की विशेषताएं इतनी हैरान करने वाली हैं कि वैज्ञानिक बेहद रोमांचित हैं। इन माइक्रोब्स ने लाखों साल बिना हवा और धूप के भी खुद को जिंदा रखा है। इतने लंबे समय तक ये महज खनिजों के अवशेष और मृत समुद्री जीवों के सहारे खुद को जिंदा रख पाए। यह भोजन भी इन्हें शायद ही नसीब होता अगर 1300 फीट नीचे बर्फ में एक तालाब न बना होता। यही नहीं ये माइक्रोब्स ऑक्सीजन लेने की बजाय आयरन को बतौर सांस लेने के अभ्यस्त हो गए और इसी से एनर्जी पैदा करने लगे। ऐसे विपरीत माहौल में इतनी शानदार खोज से वैज्ञानिकों को इसी तरह की परिस्थितियों वाले मंगल सरीखे दूसरे ग्रहों पर भी जीवन मौजूद होने की आशाएं दोगुनी हो गई हैं। इस स्टडी पर काम करने वाली न्यू हंपशर स्थित डार्टमाउथ कॉलिज की जिल मिकुकी के मुताबिक, यह पृथ्वी के इतिहास में दर्ज एक बेहद खास चीज है। मैं नहीं जानती कि पृथ्वी पर कहीं और भी ऐसा माहौल है या नहीं। डॉ. मिकुकी के मुताबिक, अगर ये जीव इतने मुश्किल माहौल में पृथ्वी पर जीवित रह सकते हैं तो फिर शायद बाकी ग्रहों और चंद्रमाओं पर भी रह पाएं। इस खोज से हमें अंतरिक्ष में मौजूद संभावनाओं के बारे में भी पता लगता है। इस स्टडी को अंजाम देने वालों में से एक मैसाचुसेट्स स्थित हार्वर्ड यूनिवसिर्टी के एन पियरसन के शब्दों में, हमने एक तरह से पूरा का पूरा जंगल खोज निकाला है। ऐसा जंगल जिसे 15 लाख साल से किसी ने नहीं देखा।

मंजिल के करीब ‘मिशन न्यू होराइजन्स ’

नासा का न्यू होराइजन्स मिशन स्पेस्क्राफ्ट की खिड़की से अब प्लूटो साफ नजर आने लगा है। प्लूटो तक पहुंचने के लिए न्यू होराइजन्स स्पेस्क्राफ्ट को अभी सात साल का सफर और तय करना है। अब तक स्पेसक्राफ्ट के इंजन्स, कंप्यूटर और तमाम उपकरण बंद थे। ठीक उसी तरह जैसे हम किसी पत्थर को ताकत से घुमाकर दूर फेंकते हैं उसी तरह हमारे सौरमंडल के सबसे विशाल ग्रह बृहस्पति से मिले गुरुत्वाकर्षण खिंचाव की मदद से ये स्पेसक्राफ्ट अपनेआप आगे बढ़ा चला जा रहा था। हाल ही में नासा मिशन कंट्रोल रूम ने इसे गहरी नींद से जगाया है। न्यू होराइजन्स स्पेस्क्राफ्ट के इंजन, कंप्यूटर और तमाम उपकरण ऑन करके देखे गए हैं और सभी ठीक काम कर रहे हैं।
शायद ये सवाल आपको भी परेशान करता हो कि हमारे सौरमंडल से बाहर का माहौल कैसा है ? वहां का नजारा कैसा है ? इन सवालों का जवाब लंबे समय से तलाशा जा रहा था, लेकिन हमें कामयाबी मिली 1992 में, जब हमें सौरमंडल से बाहर करोड़ों छोटी-बड़ी उल्काओं से भरे एक विशाल क्षेत्र का पता चला। इसका नाम रखा गया क्विपर बेल्ट। बाद में पता चला कि ये दरअसल ग्रहों के निर्माण के बाद बचे हुए मलबे की विशाल बेल्ट है, जिसने सौरमंडल को चारोंओर से घेर रखा है। ठीक उसी तरह जैसे हम अपने घर को सुरक्षित रखने के लिए इसके चारों ओर बाड़ लगा देते हैं या एक मजबूत चारदीवारी बना लेते हैं। ठीक इसी तरह क्वीपर बेल्ट हमारे सौरमंडल की चारदीवारी या बाड़ जैसी ही है। उल्काओं और धूमकेतुओं का घर भी क्वीपर बेल्ट ही है। इस क्वीपर बेल्ट में ग्रहों की तरह गोल और विशाल पिंड भी हैं, जिनके अपने चंद्रमा भी हैं।
2003 में दो शौकिया एस्ट्रोनॉमर्स ने यहां एक विशाल पिंड खोजा.....नासा ने इसकी दो साल तक जांच पड़ताल की और 2005 में सौरमंडल के दसवें ग्रह 2003 यूबी 313 को खोजे जाने का ऐलान कर दिया। इसे नाम दिया गया, जेना। जेना का एक चंद्रमा भी है और इसका आकार, कभी हमारे सौरमंडल का नौंवा ग्रह रहे प्लूटो से काफी बड़ा है। चार-चार चंद्रमा होने के बावजूद प्लूटो ग्रह काफी बदकिस्मत साबित हुआ है। प्लूटो की खोज 18 फरवरी 1930 में अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉमबाग ने की थी और तब इसे सौरमंडल के नौंवे सदस्य के तौर पर मान्यता मिल गई थी। इससे हमारे देश के ज्योतिषी काफी खुश हुए थे कि देखा, हमारे शास्त्रों में तो पहले ही नौग्रह की संकल्पना मौजूद है।
प्लूटो के बारे में हमें ज्यादा जानकारी नहीं है, क्योंकि अब तक कोई भी स्पेसक्राप्ट यहां तक नहीं पहुंचा है। इसे करीब से देखने के लिए नासा ने दुनिया का पहला प्लूटो मिशन जनवरी 2006 में अंतरिक्ष भेजा जिसका नाम है न्यू होराइजन्स। नासा का ये रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट न्यू होराइजन्स प्लूटो पर पहुंचेगा 14 जुलाई 2015 को। नासा ने जब मिशन न्यू होराइजन्स रवाना किया था, उस वक्त प्लूटो को सौरमंडल का नौंवा ग्रह होने का रुतबा हासिल था। लेकिन प्लूटो मिशन रवाना होने के 8 महीने बाद ही नए आसमानी पिंडों की खोज को मान्यता देने और उनका नामकरण करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी इंरनेशनल एस्ट्रॉनॉमी यूनियन ने पहली बार ग्रहों की परिभाषा तय करने की बहस छेड़ दी। करीब एक हफ्ते तक चली तीखी बहस के बाद ये तय किया गया कि प्लूटो को ग्रह का दर्जा देना एक भूल थी। प्लूटो से ग्रह का दर्जा छीन लिया गया और सौरमंडल की अवधारणा में सुधार करते हुए तय किया गया कि हमारो सौरमंडल में अब नौ नहीं आठ ग्रह हैं और चार चंद्रमाओं का स्वामी होने के बावजूद प्लूटो की पहचान क्वीपर बेल्ट के मलबे के ढेर में मौजूद एक छुद्र ग्रह से ज्यादा नहीं है।
इंरनेशनल एस्ट्रॉनॉमी यूनियन की ये व्यवस्था नासा के लिए सदमे के जैसी थी, क्योंकि सौरमंडल के अखिरी नौंवे ग्रह को भेजा गया करोड़ों डॉलर का मिशन का उद्देश्य ही खत्म हो गया। ये विचार भी रखा गया कि मिशन को रद्द कर दिया जाए, लेकिन नासा वैज्ञानिकों ने बाद में तय किया कि न्यू होराइजन्स मिशन प्लूटो और उससे आगे क्वीपर बेल्ट तक जाएगा और उस अनोखी दुनिया के बारे में हमारी जानकारी बढ़ाएगा जिसके बारे में हमें ज्यादा कुछ नहीं मालूम।
न्यू होराइजन्स मिशन के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर एलन स्टर्न बताते हैं कि स्पेसक्राफ्ट उपकरणों की जांच कर ली गई है और सब कुछ तय योजना के मुताबिक ही चल रहा है। अब हम तीन महीने तक न्यू होराइजन्स मिशन की मदद से यूरेनस, नेप्च्यून और प्लूटो का अध्ययन करेंगे। इस बीच हमने न्यू होराइजन्स स्पेसक्राफ्ट के साफ्टवेयर के नए वर्जन को इंस्टाल करने का सबसे जरूरी काम कामयाबी से पूरा कर दिखाया है। इसी साफ्टवेयर की मदद से स्पेसक्राफ्ट का कमांड और डाटा हैंडलिग एंड स्टोर सिस्टम काम करेगा। हमने एक तरह से न्यू होराइजडन्स स्पेसक्राफ्ट का ब्रेन ट्रांसप्लांट कर दिया है और अब हम ऐसे स्पेसक्राफ्ट के मुख्य कंप्यूटर समेत सभी उपकरणों को संचालित कर सकते हैं जो धरती से करीब दो अरब किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है।

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

छात्रों का सेटेलाइट-अनुसेट, अब कक्षा में


भारतीय छात्रों के लिए 20 अप्रैल की तारीख एक यादगार दिन बन चुका है। इस दिन इसरो ने अपने सेटेलाइट लांच वेहेकिल से एक ऐसे सेटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जिसकी डिजाइन तैयार करने से लेकर निर्माण तक के पूरे काम में एक भी साइंटिस्ट शामिल नहीं था। इस सेटेलाइट का नाम है अनुसेट और इसे बनाया है अन्ना यूनिवर्सिटी के छात्रों ने। इस तरह अनुसेट देश के छात्रों का बनाया पहला सेटेलाइट है जो अब अंतरिक्ष में मौजूद है। अनुसेट का वजन है 38 किलो और इसे बनाने के पीछे अन्ना यूनिवर्सिटी का का मुख्य मकसद सेटेलाइट और स्पेस टेक्नोलॉजी के बारे में छात्रों की जानकारी और अनुभव को बढ़ाना है। छात्रों के इस सेटेलाइट में स्टोर ऐंड फॉरवर्ड पेलोड के अलावा माइक्रो इलेक्ट्रो मिकैनिकल सिस्टम्स (एमईएमएस), एमईएमएस जाइरोस्कोप, एक एमईएमएस मैग्नेटोमीटर और एक सैटलाइट पजिशनिंग सिस्टम होगा। अनुसेट का जीवनकाल एक साल का है। खास बात ये कि अनुसेट के ग्राउंड स्टेशन को तैयार करने का काम भी देश के छात्रों ने ही किया है। अनुसेट के ग्राउंड स्टेशन को तैयार करने का काम छात्रों ने पुणे यूनिवर्सिटी के फिजिक्स डिपार्टमेंट की हेड एस.ए.गांगल के नेतृत्व में किया है। अनुसेट एक साल तक अपनी कक्षा में परिक्रमा करता रहेगा और इस दौरान छात्र अपने इसे सेटेलाइट की मदद से संचार संबंधी कई प्रयोग करेंगे।

पृथ्वी से टकराया था ग्रह थिया !


खगोल विज्ञान का एक बड़ा रहस्य सुलझने को है। ये रहस्य है हमारे चंद्रमा के बारे में। चंद्रमा पर दर्जनों अभियान भेजने के बावजूद हम अब तक ये ठीक-ठीक नहीं जान पाए कि हमारा चंद्रमा हमें कैसे मिला? इसका जन्म कैसे हुआ ? अब ये रहस्य सुलझने के करीब है और इसका श्रेय जाता है नासा के जुड़वा स्पेसक्राफ्ट स्टीरियो को। साइंस में कई बार हैरतअंगेज खोजें अनायास ही हुई हैं यानि साइंटिस्ट कर कुछ और रहे थे और उनके हाथ अचानक कुछ और लग गया।
इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। नासा ने अपने जुड़वा स्पेसक्राफ्ट स्टीरियो भेजे थे सूरज के अध्ययन के लिए, लेकिन स्टीरियो ने धूल और मलबे का एक ऐसा ढेर खोज निकाला जिसके बारे में कहा जा रहा है कि ये हमारे सौरमंडल के ही एक ऐसे ग्रह के अवशेष हैं जो अब नष्ट हो चुका है। इस तबाह हो चुके ग्रह का नाम था थिया। थिया से हमारा एक खास रिश्ता है, क्योंकि थिया की वजह से ही हमें हमारा चंद्रमा मिला। दरअसल हुआ ये था कि करोड़ों साल पहले थिया पृथ्वी से आ टकराया था । इस भयानक टक्कर में थिया ग्रह तो टुकड़े-टुकड़े मलबे में बदल कर बिखर गया, लेकिन साथ ही उसने पृथ्वी से भी बहुत सारा मलबा अंतरिक्ष में उछाल दिया। बाद में यही मलबा चंद्रमा के आकार में एक जगह जमकर पृथ्वी के चक्कर काटने लगा।
नासा के साइंटिस्ट माइक खाइजर जैसे तमाम साइंटिस्ट हाल तक थिया ग्रह की कहानी को काल्पनिक मानते रहे हैं, क्योंकि थिया ग्रह के पृथ्वी से टकराने का कोई सबूत हमें नहीं मिला था। लेकिन स्टीरियो ने हाल ही में पृथ्वी और सूरज की गुरुत्वाकर्षण सीमारेखा में मौजूद लैगरेंजियन पॉइंट्स में चक्कर काटते धूल और मलबे के विशाल बादल खोज निकाले हैं। लैगरेंजियन पॉइंट्स पृथ्वी और सूरज की गुरुत्वाकर्षण ताकत की वजह से अंतरिक्ष में मौजूद ऐसे इलाके हैं जो सौरमंडल के तमाम मलबे को किसी नदी के भंवर की तरह अपने भीतर खींचते रहते हैं। साइंटिस्टों को अब लग रहा है कि लगभग 4.5 अरब साल पहले हमारे सौरमंडल में थिया नाम का ग्रह भी था, जो पृथ्वी से टकराकर नष्ट हो गया। साइंटिस्टों को उम्मीद है कि स्टीरियो स्पेसक्राफ्ट थिया ग्रह के टुकड़े जरूर खोज निकालेंगे। स्टीरियो थिया के इन टुकड़ों को खेजने का काम करेगा सितंबर, अक्टूबर 2009 में...जब नासा का ये स्पेसक्राफ्ट लैगरेंजियन पॉइंट्स यानि अंतरिक्ष में मौजूद गुरुत्वाकर्षण के इन कुओं की तली के सबसे नजदीक होगा। स्टीरियो की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये जुड़वां सेटेलाइट्स थ्री डी तस्वीरें भी खींचेंगे। इस तरह से मिली इमेज से हम अंतरिक्ष के रहस्यों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

एलियन प्लेनेट पर ट्रिपल सनसेट !

सूर्यास्त, यानि वो घड़ी जब दिन की समाप्ति होती है और दबे पांव आती शाम पूरे माहौल पर छा जाती है। अध्यात्म और प्रेम की भावनाओं के साथ डूबता हुआ सूरज, हमें कुदरत की ताकत का भी अहसास कराता है। लेकिन हमारी पृथ्वी से दूर एक ऐसा दुनिया भी है जहां एक नहीं तीन-तीन सूरज डूबते हैं। हमारी दुनिया एक सूरज से जगमगाती है, लेकिन इस दुनिया के आसमान में तीन-तीन सूरज चमकते हैं। इसीलिए शाम होने पर यहां सूर्यास्त का नजारा एक नहीं बल्कि तीन-तीन बार नजर आता है। तीन-तीन सूरज की परिक्रमा करने वाले इस ग्रह का नाम है - एचडी 188753 एबी और इसकी खोज जुलाई 2005 में की गई थी।
ये तो तय है कि सितारों के उस पार कहीं न कहीं जीवन मौजूद है। हो सकता है इनमें से कुछ ऐसे भी ठिकाने हों जहां जीवन हमारी तरह किसी बुद्धिमान सभ्यता के रुप में मौजूद हो। लेकिन कहां....? साइंस सदियों से इस सवाल का जवाब खोज रही है। इसी चक्कर में कई और बातें भी निकल कर सामने आईं... पृथ्वी से दूर किसी अनजाने जीवन के बारे में 2003 में एक अहम खोज की गई। वैज्ञानिको ने बताया कि मिथुन राशि के सितारों में से 37 वां और सबसे चमकदार सितारा थर्टीसेवन जेम बेहद खास है। ये सितारा हमारे सूरज जैसा ही है। इसके किसी ग्रह पर जीवन के मौजूद होने के आसार बहुत ज्यादा हैं। 2004 में सौरमंडल की दहलीज से बाहर एक नए ग्रह सेडना का पता चला और 2005 जून में धरती से 15 प्रकाश वर्ष दूर एक चट्टानी ग्रह खोज निकाला गया। ये ग्रह एक सितारे के चारों ओर घूम रहा है। इसका नाम रखा गया सुपरअर्थ, क्योंकि इसका आकार हमारी धरती से आठ गुना बड़ा है। अब तो कई सुपरअर्थ की मौजूदगी तलाशी जा चुकी है।
2005 में नासा ने एक ऐसी घोषणा की कि पूरी दुनिया हैरान रह गई, हमारे सौरमंडल का 10वां सदस्य ग्रह खोज निकाला गया। इस ग्रह का एक चंद्रमा भी है। इससे पहले सौरमंडल के 9वें ग्रह प्लूटो की खोज आज से 75 साल पहले हुई थी। प्लूटो की तरह से ये भी बेहद ठंडा है। दूसरी दुनिया में जीवन की खोज अभी जारी है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि कुदरत ने जीवन को लेकर भी एक तयशुदा नियम जरुर बनाया होगा। जो ब्रह्मांड में हर जगह एक समान रूप से लागू होता होगा। जीवन के इस यूनिवर्सल नियम को ही 'थ्योरी आफ एवरीथिंग' का नाम दिया गया है। 'थ्योरी आफ एवरीथिंग' का विचार विज्ञान की दो प्रमुख शाखाओं फीजिक्स और केमेस्ट्री से आया है। साइंस की इन दोनों शाखाओं के नियम हर कहीं एकसमान रूप से लागू होते हैं। लेकिन जीवविज्ञान को लेकर अबतक सार्वभौम नियम की खोज चल रही है। अगर इस नियम की खोज मुमकिन हो पाई तो पहचान किए जा रहे नए खगोलिय पिंडों पर जीवन और वहां के वातावरण के बारे में जानकारी जुटाना काफी आसान हो जाएगा।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

बदल जाएगा ध्रुव तारा




ध्रुव तारे को तो आपने जरूर देखा होगा। अगर नहीं देखा, तो उसे आज ही देखिए। बचपन में बिजली अकसर गुल रहने का फायदा ये था कि हम सब खुले आसमान के नीचे छत पर सोते थे। मेरी मम्मी ध्रुव तारे के बारे में बताती थीं कि ध्रुव तारा सुबह 4 बजे नजर आता है। 4 बजे सुबह उठना केवल परीक्षा के दिनों में ही मुमकिन होता है, और तब उठते ही हम पढ़ने बैठ जाते थे, इसलिए लंबे वक्त तक ध्रुव तारे से मुलाकात नहीं हो पाई। काफी बाद में जब खगोल विज्ञान में दिलचस्पी हुई तब पहली बार मैं ध्रुव तारे के आमने-सामने हुआ, और ये जानकर मुझे खुशी हुई कि ध्रुव तारा तो शाम ढले ही नजर आने लगता है। मैंने ये बात अपनी मां को भी बताई।
उत्तर दिशा की ओर क्षितिज से कुछ ऊपर आपको रोज अपनी जगह अटल जगमगाता सितारा नजर आएगा, यही है ध्रुव तारा। नन्हा ध्रुव जिसने अपनी मां को उसका हक दिलाने के लिए भगवान को भी मजबूर कर दिया था। हमारा ये ध्रुव तारा अब बदल रहा है।
पुराने जमाने में लोग ध्रुव तारे को देख कर दिशा समझते थे। समंदर में भटके जहाजियों को ये ध्रुव तारा उनकी मंजिल की सही राह दिखाता था। आसमान के सारे तारे पृथ्वी के घूमने की दिशा के विपरीत घूमते से दिखते हैं। सिवाय एक..... ध्रुव तारे के। ध्रुव तारा अपनी जगह पर अटल रहता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ये सितारा हमेशा पृथ्वी के ध्रुव के ठीक ऊपर रहता है। लेकिन ऐसा हमेशा नहीं रहेगा। जिस ध्रुव तारे से हमारी जान-पहचान सदियों पुरानी है वो अपनी जगह पर अब कुछ हजार साल का ही मेहमान है। उसे अपनी जगह छोड़नी होगी। इसकी जगह लेने आ रहा है आसमान का सबसे चमकदार सितारा वेगा। 16 हजार साल बाद वेगा पृथ्वी का ध्रुवतारा बन जाएगा।
वेगा पृथ्वी से 25 प्रकाशवर्ष दूर है। अंतरिक्ष विज्ञान में ये दूरी कोई खास मायने नहीं रखती, इसलिए ये भी कहा जाता है कि वेगा पृथ्वी के सबसे नजदीक सितारों में से है। 1983 में इंफ्रारेड एस्ट्रोनॉ़मी सेटेलाइट ने वेगा के चारों ओर धूल के घने बादल देखे। साइंटिस्टों ने संभावना जताई कि धूल के इन बादलों के पीछे वेगा को कोई ग्रह भी मौजूद हो सकता है। इस खोज से अंतरिक्ष विज्ञानी कार्ल सगान सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। उन्होंने अपने मशहूर उपन्यास कॉन्टैक्ट में वेगा के ऐसे ग्रह की परिकल्पना पेश की जहां दूसरी दुनिया के लोग मौजूद हैं। 1998 में जेम्स क्लार्क मैक्सवेल टेलिस्कोप से एक बार फिर सुराग मिले कि वेगा के चारो ओर मौजूद धूल के घने बादलों में कोई ग्रह भी मौजूद हो सकता है। वेगा सदियों से इंसानों को आकर्षित करता रहा है....अब वो ध्रुव तारा बनकर धरती के लोगों से सीधा रिश्ता भी जोड़ना चाहता है।

मंगल की धूल में डीएनए की तलाश


मंगल ग्रह पर एक नए अभियान भेजने की योजना बनाई जा रही है जो मंगल की धूल में मौजूद जीवन के डीएनए पहचानेगा। मंगल की धरती के नीचे छिपा पानी की बर्फ का विशाल भंडार और मंगल के वातावरण में मिला मीथेन के बादल की खोज से इस ग्रह पर जीवन की मौजूदगी के संकेत और मजबूत हुए हैं, क्योंकि बैक्टीरिया जैसे कई सूक्ष्मजीव मीथेन पैदा करते हैं।
हॉवर्ड मेडिकल स्कूल के बायोलॉजिस्ट गैरी रवकुन और उनके सहयोगी मंगल पर डीएनए ढूंढकर उसकी सीक्वेंसिंग करने के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इसके लिए उनका प्लान अगले 10 सालों के दौरान मंगल पर एक डीएनए एंप्लीफायर और सीक्वेंसर भेजने का है। उन्हें भरोसा है कि मंगल पर मिलने वाले जीवन के निशान पृथ्वी के जैव विकास के दौरान लाल ग्रह से उसके संबंध को दिखाएंगे। इस वजह से इनके जिनेटिक कोड भी समान होंगे। इस खोज के लिए एक प्रोजेक्ट चल रहा है जिसका नाम है सर्च फॉर एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल जीनोम्स या एसईटीजी। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा भी इसे सपोर्ट कर रही है। इसके लिए मंगल पर भेजे जाने वाली लैब के प्रोटोटाइप या नमूने पर काम चल रहा है। फिलहाल इसे 2018 में लॉन्च करने का विचार है। यह रोबॉटिक लैब मंगल की सतह पर जाकर मिट्टी या बर्फ का सैंपल खोद कर उसका एक डाई के साथ मिक्सचर बनाएगी। इस डाई की खासियत यह है कि यह डीएनए के संपर्क में आते ही चमकने लगती है। जैसी ही मिक्सचर का कोई हिस्सा चमकेगा उसे डीएनए एंप्लीफिकेशन के लिए भेजा जाएगा। सुनने में यह आसान लग रहा है लेकिन ऐसा करना काफी मुश्किल है। फिलहाल वैज्ञानिक इस कोशिश में लगे हैं कि इस लैब का आकार इतना छोटा रखा जाए कि यह मार्स लैंडर के साथ मंगल तक जा सके।

बन रही हैं नई आकाशगंगाएं

अब तक ये माना जाता रहा है कि सभी आकाशगंगाएं अब से करीब 14 अरब साल पहले हुए ऊर्जा के महाविस्फोट यानि बिगबैंग से बनी हैं। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इस स्थापित सिद्धांत से बिल्कुल अलग नया दावा पेश किया है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि आकाशगंगाओं का निर्माण अब भी जारी है। एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लैटर्स में छपी स्टडी के प्रमुख जांचकर्ता जॉन सेलजर के मुताबिक, ऐसी 15 नई आकाशगंगाएं खोजी गई हैं जो निर्माण कुछ ही अरब साल पहले हुआ है। शुरुआती खोज से पता चला है कि ये नई आकाशगंगाएं विशाल हैं और हमारे मिल्की-वे या दूसरी 'विशालकाय' आकाशगंगाओं जैसी ही हैं। हालांकि, ये कुछ मामले में अजीब भी हैं। मसलन, इनमें भारी मात्रा में मौजूद रासायनिक तत्वों की मौजूदगी बताती है कि इन आकाशगंगाओं में तारों का विकास बहुत कम हुआ होगा। इसी तरह हीलियम से ज्यादा भारी तत्वों की कम मौजूदगी भी बताती है कि इन आकाशगंगाओं की उम्र कम है और इन्हें वजूद में आए ज्यादा वक्त नहीं हुआ है। ये नई आकाशगंगाएं महज 3 से 4 अरब साल ही पुरानी हैं यानि इनका निर्माण बिग बैंग के 9 या 10 अरब साल बाद हुआ है। इंडियाना यूनिवर्सिटी के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने विशाल आकाशगंगाओं की खोज के आधार पर कहा है कि आकाशगंगा के निर्माण और इनके शुरुआती विकास को समझने के लिए अभी और स्टडी की जरूरत है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

सितारों का झुरमुट और इटली का भूकंप !


रिक्टर स्केल पर महज 5.8 से 6.2 की तीव्रता वाले भूकंप ने इटली में भारी तबाही मचाई है। 25,000 से ज्यादा लोग बेघर हो गए हैं और हजार से ज्यादा लोग घायल हैं, मरने वालों की सही तादाद पर लंबे वक्त तक विवाद बना रहेगा। हमारे देश के मीडिया के लिए ये कोई खबर नही है, हां अखबारों में खबरें जरूर छप रही हैं, लेकिन नेताओं की परिक्रमा में जुटे टीवी के पास इतना वक्त नहीं कि इटली में आए भूकंप पर ध्यान दे। देश के मीडिया के लिए इटली का बस एक ही मतलब है और वो है सोनिया गांधी।
इटली का भूकंप 2009 की पहली बड़ी आपदा है। 2008 में भी पूरी दुनिया में आतंकवादी हमलों में उतनी जानें नहीं गईं थीं, जितनी कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आए भूकंप में। इटली में आया भूकंप हमारे लिए चेतावनी की घंटी है, जिससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते। बहरहाल इटली के भूकंप की ही बात करें। हमारे देश के एक प्रमुख खगोल वैज्ञानिक कनाड मांडके इटली की बेलाट्रिक्स ऑब्जरवेटरी में डॉ. जियानलुका मासी के साथ काम कर रहे थे। ये ऑब्जरवेटरी सेंट्रल इटली से 90 किलोमीटर दूर है। भारतीय वक्त के मुताबिक सुबह के 7 बज रहे थे वक्त था भूकंप आने से ठीक पहले का। मांडके और डॉ. मासी M13 ग्लोबुलर क्लस्टर का ऑब्जर्वेशन कर रहे थे और उसकी फोटोग्राफ ले रहे थे। ठीक उसी वक्त जमीन थरथरा उठी, तेज भूकंप के कहर से पूरी इटली कांप उठी। जिस वक्त भूकंप आया मांडके और डॉ. मासी ने बेलाट्रिक्स ऑब्जरवेटरी से M13 ग्लोबुलर क्लस्टर की ये तस्वीर खींची। ग्लोबुलर क्लस्टर की ये तस्वीर उस वक्त की गवाह है जब इटली भूकंप से कांप उठी। भूकंप का असर इस तस्वीर में भी हल्के तौर पर देखा जा सकता है। बहरहाल हमारे वैज्ञानिक और ऑब्जर्वेटरी इस भूकंप से सुरक्षित रहने में कामयाब रहे।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

'तमसो मां ज्योतिर्गमय'

छटपटाहट अंधेरे से उजाले की ओर बढ़ने की ...हमारी ये जद्दोजहद और जिदंगी को हर कीमत पर बचाने की कोशिश, इस तस्वीर में साफ नजर आ रही है। ये तस्वीर रची है प्रकृति की उन ताकतों ने, उस आदि ऊर्जा ने जिसने असंख्य सितारों और ग्रहों को जन्म देकर इस ब्रह्मांड को रच दिया। अंतरिक्ष के गहन अंधकार को चीरकर रोशनी की ओर बढ़ते एक हाथ की तरह नजर आ रही ये तस्वीर ली है नासा की चंद्रा एक्स-रे ऑब्जरवेटरी ने। दरअसल ये तस्वीर है एक मरते हुए सितारे यान नेबुला की, इस नेबुला के चारों ओर बेहद उच्च ऊर्जा वाली एक्स-रे की मानो बाढ़ सी आ गई है। वैज्ञानिकों ने जब इस चंद्रा ऑब्जरवेटरी की इस तस्वीर में नजर आ रही हाई एनर्जी एक्स-रे को नीले रंग में रंगा तो सामने आई...अंधेरे से निकलकर रोशनी को थामने की कोशिश करते एक हाथ की ये अनोखी तस्वीर ।
इस नेबुला से फूट रहा चुंबकीय क्षेत्र हमारी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के मुकाबले 15 अरब गुना से भी ज्यादा शक्तिशाली है। मरते हुए इस सितारे का पदार्थ और इससे फूट रही हाई इनर्जी एक्स-रे 150 प्रकाश वर्ष के दायरे में फैली है। कुदरत के इस अनोखे हाथ का नजारा हमारी पृथ्वी से 17000 प्रकाश वर्ष दूर घटित हो रहा है।