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मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

मंजिल के करीब ‘मिशन न्यू होराइजन्स ’

नासा का न्यू होराइजन्स मिशन स्पेस्क्राफ्ट की खिड़की से अब प्लूटो साफ नजर आने लगा है। प्लूटो तक पहुंचने के लिए न्यू होराइजन्स स्पेस्क्राफ्ट को अभी सात साल का सफर और तय करना है। अब तक स्पेसक्राफ्ट के इंजन्स, कंप्यूटर और तमाम उपकरण बंद थे। ठीक उसी तरह जैसे हम किसी पत्थर को ताकत से घुमाकर दूर फेंकते हैं उसी तरह हमारे सौरमंडल के सबसे विशाल ग्रह बृहस्पति से मिले गुरुत्वाकर्षण खिंचाव की मदद से ये स्पेसक्राफ्ट अपनेआप आगे बढ़ा चला जा रहा था। हाल ही में नासा मिशन कंट्रोल रूम ने इसे गहरी नींद से जगाया है। न्यू होराइजन्स स्पेस्क्राफ्ट के इंजन, कंप्यूटर और तमाम उपकरण ऑन करके देखे गए हैं और सभी ठीक काम कर रहे हैं।
शायद ये सवाल आपको भी परेशान करता हो कि हमारे सौरमंडल से बाहर का माहौल कैसा है ? वहां का नजारा कैसा है ? इन सवालों का जवाब लंबे समय से तलाशा जा रहा था, लेकिन हमें कामयाबी मिली 1992 में, जब हमें सौरमंडल से बाहर करोड़ों छोटी-बड़ी उल्काओं से भरे एक विशाल क्षेत्र का पता चला। इसका नाम रखा गया क्विपर बेल्ट। बाद में पता चला कि ये दरअसल ग्रहों के निर्माण के बाद बचे हुए मलबे की विशाल बेल्ट है, जिसने सौरमंडल को चारोंओर से घेर रखा है। ठीक उसी तरह जैसे हम अपने घर को सुरक्षित रखने के लिए इसके चारों ओर बाड़ लगा देते हैं या एक मजबूत चारदीवारी बना लेते हैं। ठीक इसी तरह क्वीपर बेल्ट हमारे सौरमंडल की चारदीवारी या बाड़ जैसी ही है। उल्काओं और धूमकेतुओं का घर भी क्वीपर बेल्ट ही है। इस क्वीपर बेल्ट में ग्रहों की तरह गोल और विशाल पिंड भी हैं, जिनके अपने चंद्रमा भी हैं।
2003 में दो शौकिया एस्ट्रोनॉमर्स ने यहां एक विशाल पिंड खोजा.....नासा ने इसकी दो साल तक जांच पड़ताल की और 2005 में सौरमंडल के दसवें ग्रह 2003 यूबी 313 को खोजे जाने का ऐलान कर दिया। इसे नाम दिया गया, जेना। जेना का एक चंद्रमा भी है और इसका आकार, कभी हमारे सौरमंडल का नौंवा ग्रह रहे प्लूटो से काफी बड़ा है। चार-चार चंद्रमा होने के बावजूद प्लूटो ग्रह काफी बदकिस्मत साबित हुआ है। प्लूटो की खोज 18 फरवरी 1930 में अमेरिकी खगोलशास्त्री क्लाइड टॉमबाग ने की थी और तब इसे सौरमंडल के नौंवे सदस्य के तौर पर मान्यता मिल गई थी। इससे हमारे देश के ज्योतिषी काफी खुश हुए थे कि देखा, हमारे शास्त्रों में तो पहले ही नौग्रह की संकल्पना मौजूद है।
प्लूटो के बारे में हमें ज्यादा जानकारी नहीं है, क्योंकि अब तक कोई भी स्पेसक्राप्ट यहां तक नहीं पहुंचा है। इसे करीब से देखने के लिए नासा ने दुनिया का पहला प्लूटो मिशन जनवरी 2006 में अंतरिक्ष भेजा जिसका नाम है न्यू होराइजन्स। नासा का ये रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट न्यू होराइजन्स प्लूटो पर पहुंचेगा 14 जुलाई 2015 को। नासा ने जब मिशन न्यू होराइजन्स रवाना किया था, उस वक्त प्लूटो को सौरमंडल का नौंवा ग्रह होने का रुतबा हासिल था। लेकिन प्लूटो मिशन रवाना होने के 8 महीने बाद ही नए आसमानी पिंडों की खोज को मान्यता देने और उनका नामकरण करने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी इंरनेशनल एस्ट्रॉनॉमी यूनियन ने पहली बार ग्रहों की परिभाषा तय करने की बहस छेड़ दी। करीब एक हफ्ते तक चली तीखी बहस के बाद ये तय किया गया कि प्लूटो को ग्रह का दर्जा देना एक भूल थी। प्लूटो से ग्रह का दर्जा छीन लिया गया और सौरमंडल की अवधारणा में सुधार करते हुए तय किया गया कि हमारो सौरमंडल में अब नौ नहीं आठ ग्रह हैं और चार चंद्रमाओं का स्वामी होने के बावजूद प्लूटो की पहचान क्वीपर बेल्ट के मलबे के ढेर में मौजूद एक छुद्र ग्रह से ज्यादा नहीं है।
इंरनेशनल एस्ट्रॉनॉमी यूनियन की ये व्यवस्था नासा के लिए सदमे के जैसी थी, क्योंकि सौरमंडल के अखिरी नौंवे ग्रह को भेजा गया करोड़ों डॉलर का मिशन का उद्देश्य ही खत्म हो गया। ये विचार भी रखा गया कि मिशन को रद्द कर दिया जाए, लेकिन नासा वैज्ञानिकों ने बाद में तय किया कि न्यू होराइजन्स मिशन प्लूटो और उससे आगे क्वीपर बेल्ट तक जाएगा और उस अनोखी दुनिया के बारे में हमारी जानकारी बढ़ाएगा जिसके बारे में हमें ज्यादा कुछ नहीं मालूम।
न्यू होराइजन्स मिशन के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर एलन स्टर्न बताते हैं कि स्पेसक्राफ्ट उपकरणों की जांच कर ली गई है और सब कुछ तय योजना के मुताबिक ही चल रहा है। अब हम तीन महीने तक न्यू होराइजन्स मिशन की मदद से यूरेनस, नेप्च्यून और प्लूटो का अध्ययन करेंगे। इस बीच हमने न्यू होराइजन्स स्पेसक्राफ्ट के साफ्टवेयर के नए वर्जन को इंस्टाल करने का सबसे जरूरी काम कामयाबी से पूरा कर दिखाया है। इसी साफ्टवेयर की मदद से स्पेसक्राफ्ट का कमांड और डाटा हैंडलिग एंड स्टोर सिस्टम काम करेगा। हमने एक तरह से न्यू होराइजडन्स स्पेसक्राफ्ट का ब्रेन ट्रांसप्लांट कर दिया है और अब हम ऐसे स्पेसक्राफ्ट के मुख्य कंप्यूटर समेत सभी उपकरणों को संचालित कर सकते हैं जो धरती से करीब दो अरब किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है।

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