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मंगलवार, 10 अगस्त 2010

'धरती को छोड़ देने का वक्त, आ चुका'

प्रो. स्टीफन हॉकिंग ने पोर्टल बिगथिंक को दिए एक इंटरव्यू में धरती के अलावा दूसरे ग्रहों और सितारों पर मानव बस्तियां बसाने की जरूरत पर जोर दिया है। उनके मुताबिक ऐसा करना मानव जाति के वजूद को बचाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। वॉयेजर में प्रस्तुत है प्रो. हॉकिंग का वो पूरा इंटरव्यू -
आइए सच का सामना करें, हमारा ग्रह लगातार गर्म हो रहा है, धरती की जनसंख्या लगातार अनियंत्रित ढंग से बढ़ती जा रही है और हमारी जिंदगी के लिए जो प्राकृतिक संसाधन जरूरी हैं वो तेजी से खत्म होते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हम वैकल्पिक संसाधनों का विकास नहीं कर रहे, लेकिन प्राकृतिक संसाधन जितनी तेजी से खत्म हो रहे हैं, उसकी तुलना में हमारे वैकल्पिक संसाधनों के विकास की गति बेहद धीमी है। अगर मानव जाति नाभिकीय हथियारों के जरिए अपना नामो-निशान मिटा डालने की बेवकूफी न भी करे, तो भी करीब 7.6 अरब साल में हमारा सूरज ही गुब्बारे की तरह फूलकर इतना विशाल हो जाएगा कि वो समूची पृथ्वी को ही निगल जाएगा। आपको शायद सुनकर अच्छा न लगे, लेकिन इस वक्त की सच्चाई यही है कि धरती माता को छोड़ देने का वक्त, मानव जाति के सामने आ चुका है।
मेरा मानना है कि मानव जाति का असली भविष्य अंतरिक्ष में है, पृथ्वी पर ही टिके रहने में नहीं! आने वाले सौ साल पृथ्वी पर आबाद जीवन के सभी विविध स्वरूपों के लिए कठिन चुनौतियों से भरे होंगे, क्योंकि तब धरती को दहलाने वाली आपदाओं को टालना बेहद मुश्किल होगा। ऐसा ही अगले हजार साल और इसके बाद लाख और दस लाख साल बाद होगा, जिंदगी को सहारा देने वाली सभी चीजें धरती से एक-एक करके खत्म होती चली जाएंगी। मानव जाति को अपने सभी अंडे एक ही टोकरी यानि एक ही ग्रह, में नहीं रख देने चाहिए। आइए, उम्मीद करें कि जब तक हम एक ही टोकरी यानि एक ही ग्रह पर बसी मानव जाति के प्रतीक इन अंडों को अन्य जगहों पर फैला नहीं देते, तब तक इस टोकरी को हाथ से छूटने नहीं देंगे।
मैं आशावादी हूं, लेकिन जब मैं मानव जाति के भविष्य की ओर नजरें दौड़ाता हूं, तो सरकारों और समाजों की मौजूदा प्राथमिकताओं को देख घोर निराशा से भर उठता हूं। अभी हाल तक मानव जाति के वजूद पर गहरा खतरा मंडराता रहा है। मिसाल के तौर पर, 1962-63 का क्यूबा मिसाइल संकट , जिसने पूरी मानव जाति को नाभिकीय हमले के खतरे से हिला कर रख दिया था। हिरोशिमा-नागासाकी के बाद एक और बहुत बड़ी नाभिकीय विभीषिका से मानव जाति, बस बाल-बाल ही बची थी।
(क्या था क्यूबा का मिसाइल संकट : शीतयुद्घ के दौरान 1962-63 में सोवियत संघ और अमेरिका के बीच परमाणु युद्घ का खतरा पैदा हो गया था। तब सोवियत संघ और अमेरिका में हथियारों की होड़ चल रही थी। सोवियत संघ की मिसाइलें सिर्फ यूरोप तक हमला कर सकती थीं, लेकिन अमेरिकी मिसाइलों की जद में पूरा सोवियत संघ था। अप्रैल, 1963 में सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता ख्रुशचेव के दिमाग में मध्य दूरी की मिसाइलें क्यूबा में तैनात करने का विचार आया क्योंकि इससे सोवियत संघ को प्रतिरोधक क्षमता हासिल हो सकती थी। क्यूबा के तत्कालीन राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो भी इसके लिए तैयार हो गए। क्यूबा में सोवियत मिसाइलों की तैनाती को अमेरिका ने अपने लिए खतरा माना। दोनों देश परमाणु युद्घ के कगार पर पहुंच गए, लेकिन सौभाग्यवश ऐसा नहीं हुआ। उस वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी थे )
अमेरिकी वैज्ञानिकों के फेडरेशन के अनुसार, समूची पृथ्वी पर कुल 22,600 नाभिकीय हथियार मौजूद हैं, जिनमें से 7,770 नाभिकीय हथियार अब भी सक्रिय स्थिति में हैं। नाभिकीय हथियारों वाले ज्यादातर देश अंतरराष्ट्रीय नाभिकीय अप्रसार संधि को लेकर प्रतिबद्ध नहीं हैं, ऐसे में किसी भावी नाभिकीय विभीषिका की आशंका खारिज नहीं की जा सकती। सच्चाई तो ये है कि भविष्य में नाभिकीय टकराव के नाजुक मौके और भी बढ़ने की आशंका है। ऐसे नाजुक मोड़ से मानव जाति को बिना किसी नुकसान के आगे ले जाने के लिए हममें बहुत ज्यादा सावधानी और कठिन समस्याओं को राजनयिक बातचीत के जरिए कामयाबी से सुलझाने की काबीलियत होनी चाहिए।
अगले हजार साल तक अगर मानव जाति नाभिकीय विभीषिकाओं के तमाम संभावित टकरावों से बच कर निकलने में कामयाब भी हो जाए, फिर भी इस ग्रह पर हमारे भविष्य पर सवालिया निशान बना ही रहेगा। यूनिवर्सिटी आप ससेक्स के मेरे मित्र एस्ट्रोफिजिसिस्ट डॉ. रॉबर्ट स्मिथ बताते हैं कि बूढ़ा होता सूरज ग्लोबल वॉर्मिंग के ऐसे हालात पैदा कर देगा जब धरती से सारा पानी भाप बनकर उड़ जाएगा। मानव जाति तो आने वाले 7.6 अरब साल से काफी पहले ही इस ग्रह से मिट जाएगी। वैज्ञानिकों ने साबित कर दिखाया है कि सूरज में हो रहा सूक्ष्म विस्तार धरती की सतह के तापमान को किस तरह बढ़ा देगा। समंदर का सारा पानी भाप बनकर उड़ जाएगा और पानी की ये भाप वायुमंडल में भर जाएगी, जो कि कार्बन डाई ऑक्साइड की तरह ही ग्रीन हाउस प्रभाव को जन्म देगी। अंत में सागर उबल-उबल कर सूख जाएंगे और वायुमंडल की सारी भाप अंतरिक्ष में रिस जाएगी। अब से महज एक अरब साल बाद ही पृथ्वी बहुत ज्यादा गर्म, सूखी और जिंदगी के टिके रहने के काबिल नहीं रहेगी।
अंत में, उससे भी हजार साल बाद या बीच में ही मानव जाति को धरती छोड़ देने या फिर चुपचाप अपना नामोनिशान खत्म होते देखने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। ये वो वक्त होगा जब धरती किसी के लिए भी जिंदा रहने के काबिल नहीं रह जाएगी। इसके एक अरब साल बाद लगातार बदलावों से गुजरता सूरज ऐसी हालत में जा पहुंचेगा कि उसकी प्रचंड गर्मी पृथ्वी को पूरी तरह से सूखी-बंजर और बेजान बना देगी। ऐसा नहीं है कि हमें आज इसकी चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि सौरमंडल के करीब होने वाला कोई सुपरनोवा धमाका, किसी विशाल उल्का की धरती से टक्कर, या फिर अचानक आ खड़ा हुआ कोई ब्लैकहोल, शायद कल ही एक ही झटके में संपूर्ण मानव जाति का सफाया कर सकता है।
ऐसा नहीं है कि मानव जाति पर पहले कभी कोई बड़ा खतरा नहीं आया। मानव जाति के इतिहास में ऐसे कई बेहद मुश्किल मौके आए हैं, जब पूरी जाति पर सफाए का संकट आ खड़ा हुआ था, लेकिन हम आज भी जिंदा हैं। इसकी वजह ये कि आसानी से हार न मानने और विपरीत स्थितियों से जूझने और जीत कर दिखाने की जिद और हमलावर प्रवृत्ति ने हमें जिंदा रखा और यहां तक पहुंचाया है। लेकिन कल भी हम ऐसा ही करेंगे ये कहना मुश्किल है, क्योंकि अब हम कहीं ज्यादा स्वार्थी, आरामतलब और मुसीबतों को झेलने के बजाय उनसे बचने के आदी हो गए हैं।
- प्रो. स्टीफन हॉकिंग

1 टिप्पणी:

  1. अब चाहे तो मानव जाति स्टीफन हॉकिंग को चुनौती दे सकती है। इतनी जल्दी नहीं।

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