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सोमवार, 16 अगस्त 2010

आइए चलें, शुक्र की दहकती दुनिया में


पृथ्वी का जुड़वा ग्रह शुक्र, दोनों का आकार और वजन लगभग एक सा। सौरमंडल के किसी दूसरे ग्रह की अपेक्षा, शुक्र का परिक्रमा पथ पृथ्वी के परिक्रमा मार्ग के ज्यादा नजदीक से होकर गुजरता है। फिरभी, इतने करीब होकर भी ये जुड़वा ऐसे हैं, जिनकी प्रकृति बात एक-दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाती। पृथ्वी को पानी और ऑक्सीजन की जिंदगी का वरदान मिला है, जबकि शुक्र इससे बिल्कुल विपरीत है। सौरमंडल का दूसरा ग्रह शुक्र सूरज से इतने करीब है कि इस ग्रह का सारा पानी भाप बनकर उड़ चुका है। शुक्र पर पृथ्वी से दसियों गुना ज्यादा घने बादल हैं,लेकिन इनमें से ज्यादातर सल्फ्यूरिक एसिड यानि गंधक के तेजाब की भाप से बने हैं। शुक्र की दुनिया सूरज की सीधी किरणों से तो दहकती ही है, साथ ही यहां लगातार फूटते ज्वालामुखी और खौलते लावे का साम्राज्य है। सल्फ्यूरिक एसिड यानि गंधक के तेजाब की भाप इन्हीं ज्वालामुखियों के विस्फोट से निकलती है, जिससे शुक्र के बादल और भी घने होते चले जाते हैं। ये बादल इतने घने हैं कि शुक्र की कक्षा से भी देखने पर इस ग्रह की जमीन नजर नहीं आती। शुक्र का चुंबकीय क्षेत्र तो है, लेकिन ये पृथ्वी के जैसा शक्तिशाली कवच नहीं है, बल्कि ये इतना कमजोर है कि जैसे ही सौर विकिरण के तूफान सूरज से फूटकर इससे टकराते हैं, ये बिखर जाता है और खतरनाक सौर विकिरण इस ग्रह को और भी ज्यादा सुखा डालता है। कमजोर चुंबकीय क्षेत्र की वजह से सौर तूफान के थपेड़ों ने इस ग्रह से सूख चुके पानी के सारे हाइड्रोजन को इस ग्रह से बाहर फेंक दिया है। शुक्र की सतह का तापमान 500 डिग्री सेंटीग्रेड है, वायुमंडलीय दबाव धरती के मुकाबले करीब 95 गुना ज्यादा और यहां बहने वाली तूफानी हवाओं की रफ्तार है 360 किलोमीटर प्रति घंटा।
शुक्र ग्रह के बारे में ये तमाम जानकारियां जुटाई हैं 1990-91 के नासा के प्रोजेक्ट मैगेलेन और 2005 में शुक्र पर भेजे गए यूरोपियन स्पेस एजेंसी के मिशन वीनस एक्सप्रेस ने। 16 वीं शताब्दी के पुर्तगाली दुस्साहसी जहाजी मैगेलन के नाम पर आधारिता नासा का ये वीनस मिशन 4 मई 1989 को लांच किया गया था, 10 अगस्त 1990 को स्पेसक्राफ्ट मैगेलेन शुक्र की कक्षा मे पहुंच गया था। प्रोजेक्ट मैगेलेन ने शुक्र के 98 फीसदी की मैपिंग कर इस ग्रह का पहला भौगोलिक नक्शा बनाया। मैगेलेन ने बताया कि शुक्र के वातावरण में सल्फर यानि गंधक भरी पड़ी है, इससे वहां ज्वालामुखियों की जारी सक्रियता का पता चलता है।
9 नवंबर 2005 को लांच हुआ यूरोपियन स्पेस एजेंसी का स्पेसक्राफ्ट वीनस एक्सप्रेस 11 अप्रैल 2006 को शुक्र की ध्रुवीय कक्षा में स्थापित हुआ था। शुक्र ग्रह की धरती और इस अनोखी दुनिया के तापमान की जांच के साथ इस ग्रह के बादलों, वायुमंडल के प्लाज्मा जैसे माहौल का गहराई से अध्ययन करना वीनस एक्सप्रेस का मकसद है। वीनस एक्सप्रेस अब भी शुक्र के अध्ययन में व्यस्त है। अक्टूबर 2006 और जून 2007 को सौरमंडल के पहले ग्रह बुध के अध्ययन के लिए भेजे गए नासा का स्पेसक्राफ्ट मैसेंजर शुक्र के करीब से दो बार गुजरा था। इस दौरान मैसेंजर ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं। यूरोपियन स्पेस एजेंसी की योजना 2013 में शुक्र की कक्षा में एक खास मिशन बेपीकोलंबो भेजने की है।
इसी साल 20 मई को जापान की स्पेस एजेंसी जाक्सा ने अपने वीनस मिशन की शुरुआत की है। जापान ने शुक्र ग्रह के लिए एक ऑरबिटर मिशन आकात्सुकी भेजा है। मिशन आकात्सुकी दिसंबर तक शुक्र ग्रह पहुंच जाएगा। आकात्सुकी का मकसद इस ग्रह के तूफानी वायुमंडल का अध्ययन करना है और ये पता लगाना है कि क्या इस ग्रह की धरती पर अब भी ज्वालामुखी सक्रिय हैं या नहीं। नासा शुक्र ग्रह पर एक रोवर भेजने की योजना पर काम कर रहा है, इस मिशन का नाम होगा वीनस-इन-सिटू-एक्सप्लोरर। इस रोवर को खास धातु से बनाया जाएगा ताकि ये शुक्र की प्रचंड गर्मी के बीच काम कर सके। मंगल पर मौजूद नासा के जुड़वा रोवर की तरह वीनस-इन-सिटू-एक्सप्लोरर भी शुक्र की मिट्टी के नमूनों की जांच करेगा और वहां के पत्थरों में छेद करके उनमें मौजूद खनिज पदार्थों की खोज करेगा।

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