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बुधवार, 25 सितंबर 2013

300 साल पुरानी गुत्थी सुलझी, पता चला कि पृथ्वी के इनर कोर के घूमने की दिशा क्या है?


वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि उन्होंने पृथ्वी का कोर किस दिशा में घूमता है? इस 300 साल पुराने सवाल का जवाब ढूंढ़ निकाला है। वैज्ञानिकों के बनाए नए मॉडल से पता चला है कि ठोस लोहे की बनी पृथ्वी की इनर कोर पूरब की ओर से ‘सुपर रोटेट’ कर रही है। ‘सुपर रोटेट’ का मतलब ये कि इनर कोर की घूमने की रफ्तार पृथ्वी की गति से ज्यादा है। इस मॉडल से ये भी पता चला है कि मुख्यतौर पर पिघले लोहे से बना आउटर कोर अपेक्षाकृत धीमी गति से इनर कोर के विपरीत यानि पश्चिम की ओर से घूम रहा है।
1692 में एडमंड हैले ने पृथ्वी के जियोमैग्नेटिक फील्ड में पश्चिम दिशा को केंद्रित एक ड्रिफ्टिंग मोशन दिखाया था। तब से लेकर अब पहली बार वैज्ञानिक इनर कोर और आउटर कोर के घूमने के तरीकों को लेकर कुछ बता सके हैं। लीड्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि पृथ्वी का जियोमैग्नेटिक फील्ड ही हमारे ग्रह के कोर की इन विरोधी गतियों की वजह है।
लीड्स यूनिवर्सिटी में स्कूल ऑफ अर्थ एंड एनवायरमेंट के डॉ। फिलिप लिवरमोर ने बताया कि भूकंप मापने वाले सीस्मोमीटर्स ने ही पहले पहल पृथ्वी की सतह के सापेक्ष ठोस इनर कोर के पूरब की ओर केंद्रित ‘सुपर रोटेशन’ को पहचाना था। न्यूटन के गति के तीसरे नियम की कसौटी पर इसे बराबर और विपरीत क्रिया के तौर पर आसानी से समझाया जा सकता है। इनर कोर पर मैग्नेटिक फील्ड पूरब की ओर केंद्रित नजर आती है, इस वजह से इनर कोर की रफ्तार पृथ्वी की गति से तेज रहती है। लेकिन पूरब की ओर घूमने के क्रम में ठोस इनर कोर अपने चारों ओर मौजूद पिघले आउटर कोर को विपरीत दिशा की ओर ठेलती रहती है, इससे आउटर कोर विपरीत दिशा यानि पश्चिम की ओर केंद्रित होकर घूमता रहता है।
हमारे ठोस इनर कोर का आकार हमारे चंद्रमा जितना है। लेकिन पृथ्वी के केंद्र में मौजूद ये लोहे का ठोस चंद्रमा चारों तरफ से पिघले लोहे के एलॉय से बने आउटर कोर से घिरा है। हालांकि पृथ्वी का इनर कोर हमारे पैरों से 5200 किलोमीटर नीचे है, फिर भी इसकी मौजूदगी प्रभाव पृथ्वी की सतह के लिए विशेषतौर पर महत्वपूर्ण है।  
जैसे-जैसे इनर कोर का आकार बढ़ता है, तो ठोस होने की इस प्रक्रिया में हीट रिलीज होती है, जिससे ऊउटर कोर में बिजली पैदा होती है। इस बिजली से ही हमारा मैग्नेटिक फील्ड जन्म लेता है।
पृथ्वी की सतह पर मौजूद जीवन के लिए ये मैग्नेटिक फील्ड सौर विकिरण से सुरक्षा के लिए एक कवच का काम करता है। इसके बगैर पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। 

रविवार, 22 सितंबर 2013

मेरी बीमारी ने मुझे उम्दा वैज्ञानिक बना दिया: प्रो.हॉकिंग


'ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ टाइम' के लेखक स्टीफ़न हॉकिंग एक बार फिर चर्चा में हैं. इस बार मौका है उनके जीवन संघर्षों पर बनी फिल्म 'हॉकिंग'का जो जल्दी ही दुनियाभर में रिलीज होने वाली है। प्रो.स्टीफन हॉकिंग एक इंटरव्यू में इस फिल्म और अपने जीवन के बारे में खुल कर बात की। प्रस्तुत है इस इंटरव्यू के खास अंश -

अपने जीवन पर बन रही इस फ़िल्म के बारे में पूछने पर हॉकिंग कहते हैं ''यह फ़िल्म विज्ञान पर केंद्रित है, और शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे लोगों को एक उम्मीद जगाती है। 21 वर्ष की उम्र में डॉक्टरों ने मुझे बता दिया था कि मुझे मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और मेरे पास जीने के लिए सिर्फ दो या तीन साल हैं।

इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है।कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इस बीमारी से लड़ने के बारे में मैने बहुत कुछ सीखा''। हॉकिंग का मानना है कि हमें वह सब करना चाहिए जो हम कर सकते हैं, लेकिन हमें उन चीजों के लिए पछताना नहीं चाहिए जो हमारे वश में नहीं है।

यह पूछने पर कि क्या अपनी शारीरिक अक्षमताओं की वजह से वह दुनिया के सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक बन पाए, हॉकिंग कहते हैं, ''मैं यह स्वीकार करता हूं मैं अपनी बीमारी के कारण ही सबसे उम्दा वैज्ञानिक बन पाया, मेरी अक्षमताओं की वजह से ही मुझे ब्रह्माण्ड पर किए गए मेरे शोध के बारे में सोचने का समय मिला। भौतिकी पर किए गए मेरे अध्ययन ने यह साबित कर दिखाया कि दुनिया में कोई भी विकलांग नहीं है।''

हॉकिंग को अपनी कौन सी उपलब्धि पर सबसे ज्यादा गर्व है? हॉकिंग जवाब देते हैं '' मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के लिए खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।''हॉकिंग के मुताबिक यह सब उनके परिवार और दोस्तों की मदद के बिना संभव नहीं था।

यह पूछने पर कि क्या वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं हॉकिंग कहते हैं, ''लगभग सभी मांसपेशियों से मेरा नियंत्रण खो चुका है और अब मैं अपने गाल की मांसपेशी के जरिए, अपने चश्मे पर लगे सेंसर को कम्प्यूटर से जोड़कर ही बातचीत करता हूँ।''

मरने के अधिकार जैसे विवादास्पद मुद्दे पर हॉकिंग बीबीसी से कहते हैं, ''मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति जो किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित है और बहुत ज्यादा दर्द में है उसे अपने जीवन को खत्म करने का अधिकार होना चाहिए और उसकी मदद करने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह की मुकदमेबाजी से मुक्त होना चाहिए।''
स्टीफन हॉकिंग आज भी नियमित रूप से पढ़ाने के लिए विश्वविद्यालय जाते हैं, और उनका दिमाग आज भी ठीक ढंग से काम करता है।

ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी को समझने में उन्होंने अहम योगदान दिया है। उनके पास 12 मानद डिग्रियाँ हैं और अमरीका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान उन्हें दिया गया है।

चंद्रमा पर एटमी धमाका करना चाहता था नासा

अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा ने मून मिशन के शुरुआती दिनों में चंद्रमा पर न्यूक्लियर बम से एटमी धमाका करने की योजना बनाई थी।

 यह बात भले ही बड़ी अजीब सी लगे, लेकिन है यह एक सच। हालांकि इस अत्यंत गोपनीय मिशन को सेना द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद वापस ले लिया गया था। सेना का मानना था कि यदि यह मिशन फेल हो गया तो पृथ्वीवासियों के लिए इसके परिणाम बेहद खराब होंगे।

एक अंग्रेजी अखबार ने दावा किया है कि स्पेस मिशन को भेजने की होड़ में वर्ष 1950 में अमेरिका ने चांद पर न्यूक्लियर बम का धमाका करने की योजना तैयार की थी। हालांकि इस योजना को कभी लागू नहीं किया जा सका।

अखबार के मुताबिक इस योजना को अत्यंत गोपनीय मिशन के तहत तैयार किया गया था। इस मिशन का नाम स्टडी ऑफ ल्यूनार रिसर्च फ्लाइट था। जिसका कोड नेम प्रोजेक्ट ए119 था। योजना के मुताबिक चांद पर धमाका कर वहां के धूल, मिट्टी समेत यहां मौजूद गैसों का परिक्षण किया जाना था। यह जिम्मा एक युवा खगोलविद को सौंपा गया था। इस योजना को बेहद गोपनीय तरीके से ही अंजाम भी देना था।

अखबार में छपी खबर के मुताबिक इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए अमेरिका को एक मिसाइल जमीन से चांद की ओर भेजनी थी। यह मिसाइल 238000 मील का सफर कर चांद तक जाती और धमाका करती। इसके लिए वैज्ञानिकों ने एटम बम को चुना था क्योंकि हाइड्रोजन बम काफी भारी होने के चलते चांद पर भेजना काफी मुश्किल था। 

लेकिन वैज्ञानिकों के इस मिशन को अमेरिकी सेना ने पूरी तरह से खारिज कर दिया। सेना का कहना था था कि यदि यह मिशन सफल नहीं हुआ तो इसका असर पृथ्वी पर पड़ेगा। सेना ने इसके गंभीर परिणाम होने की आशंका भी जताई थी, जिसके बाद इस योजना से पांव पीछे खींच लिए गए।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

धरती पर सबसे विशाल ज्वालामुखी की खोज


हमारी धरती पर सबसे विशाल ज्वालामुखी की खोज की गई है। ये ज्वालामुखी इतना विशाल है कि इसे पूरे सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा ज्वालामुखी कहा जा रहा है। पृथ्वी का ये सबसे विशाल ज्वालामुखी धरती पर नहीं, बल्कि प्रशांत महासागर के तल पर मौजूद है। ये ज्वालामुखी भौगेलिक आकार में ब्रिटिश या मैक्सिको देशों के जितनी विशाल है। जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जापान के पूर्वी तट से करीब 1609 किलोमीटर दूर मौजूद इस सबसे बड़े ज्वालामुखी का नाम 'टैमू मैसिफ' रखा गया है।
प्रशांत महासागर के भीतर 'शैट्सकाई राइज' नाम की विशाल पर्वतमाला है, जिसका निर्माण 13 से 14।5 करोड़ साल पहले हुआ था। ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' इसी पर्वतमाला का एक बड़ा हिस्सा है। विशालतम ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' प्रशांत महासागर के तल में करीब 310798 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैला है।
अब तक 5179 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हवाई के सक्रिय ज्वालामुखी 'मौना लोआ' को पृथ्वी का सबसे विशाल ज्वालामुखी समझा जाता था, लेकिन  अगर आकार के मामले में इसकी तुलना 'टैमू मैसिफ' से की जाए, तो इसके सामने 'मौना लोआ' महज 2 फीसदी ही है। हमारे सौरमंडल का सबसे विशाल ज्वालामुखी 'ओलिंपस मॉन्स' है, जो कि मंगल ग्रह पर है। लेकिन 'ओलिंपस मॉन्स' भी पृथ्वी के इस नए ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' से केवल 25 प्रतिशत ही बड़ा है।
अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि 'टैमू मैसिफ' एक ज्वालामुखी है या फिर ये कई सारे ज्वालामुखियों का समूह है। ह्युस्टन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट आफ अर्थ एंड एटमॉस्फियरिक साइंसेज के प्रोफेसर विलियम सागर के मुताबिक 'टैमू मैसिफ' को बनाने वाले बासाल्ट की भारी-भरकम मात्रा को देखने से पता चलता है कि ये केंद्र में मौजूद एक ही रास्ते से बाहर आए हैं। इसलिए निश्चित तौर पर 'टैमू मैसिफ' एक ही और दुनिया का विशालतम ज्वालामुखी है।
2009 में 'शैट्सकाई राइज' पर्वतमाला के अध्ययन के लिए गए एक्सपीडीशन-324 के ओशन ड्रिलिंग प्रोग्राम के सदस्यों ने पता लगाया है कि ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' की भौगोलिक रचना कुछ इस प्रकार है कि इसका लावा धरती पर मौजूद किसी दूसरे ज्वालामुखी की तुलना में बहुत ज्यादा दूर तक जाता है। विशेष अध्ययन दलों ने 2010 और 2012 में भी इस ज्वालामुखी के बारे में आंकड़े जुटाए हैं। 'टैमू मैसिफ' की कोर से लेकर कई इलाकों से सैंपल इकट्ठे किए गए हैं।
वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि ज्वालामुखी 'टैमू मैसिफ' का शीर्ष या टॉप समुद्र की ऊपरी सतह से करीब 6500 फुट नीचे है। पृथ्वी के इस विशालतम ज्वालामुखी का अधिकतर बेस पानी के भीतर ही है और ये करीब 6 किलोमीटर गहरा है।

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

'आई हैव ए ड्रीम'

रंग, जाति और धर्म की घुटनभरी दीवारों के उस पार स्वतंत्र, बराबरी के अधिकार वाले लोकतांत्रिक माहौल में ही विज्ञान और कला का विकास संभव है। मानव मुक्ति का इतिहास जोर-जुल्म और जातीय नफरत के स्याह पन्नों से रंगा है। आदमी का आदमी पर अत्याचार, इससे घृणित कुछ भी नहीं। हर दिन उगते सूरज की किरणें उन नायकों के अमर आह्वानों की गूंज चारों दिशाओं में फैला देती है, जिन्होंने युगों की गुलामी और अमानवीय अत्याचारों के आगे हार मान चुकी मानवता को एक नए संघर्ष के लिए उठ खड़े होने की ऊर्जा दी और मुक्ति का रास्ता दिखाया। मानवता के ऐसे ही नायकों में से एक थे मार्टिन लूथर किंग जूनियर। किंग की प्रिय उक्ति थी- 'हम वह नहीं हैं, जो हमें होना चाहिए और हम वह नहीं हैं, जो होने वाले हैं, लेकिन खुदा का शुक्र है कि हम वह भी नहीं हैं, जो हम थे'
साल 1963 गोरे और काले में बंटी नई दुनिया अमेरिका में आजादी और ऐशो-आराम के तमाम साधन केवल गोरों के लिए ही रिजर्व थे घोर नफरत और दमन झेल रहे अश्वेतों की परवाह किसी को भी नहीं थी। ऐसे में एक सार्वजनिक बस में सफर कर रही एक महिला ने अपनी सीट से उठने से इनकार कर दिया। वो बस की आगे वाली सीट को छोड़कर पीछे वाली सीट पर केवल इसलिए बैठने को तैयार नहीं थी, क्योंकि वो अश्वेत या नीग्रो थी। इस  एक इनकार को महान नेता मार्टिन लूथर किंग ने देखते-ही-देखते हजारों-लाखों अश्वेतों के इनकार में तब्दील कर दिया। और 28 अप्रैल 1963 को अमेरिका के लिंकन स्क्वायर पर 250000 अश्वेतों के साथ मुट्ठी तानकर किंग ने पूरी जोरदारी के साथ कहा - 'आई हैव ए ड्रीम'
किंग का ये व्याख्यान मानव सभ्यता के इतिहास में सबसे प्रेरणादायी और जादुई संबोधनों में से एक है। अब से 50 साल पहले दोपहर करीब 2 बजे जब किंग लिंकन स्मारक की सीढ़ियों पर जनता को संबोधित करने के लिए पहुंचे तो व्हाइट हाउस के ओवल ऑफ़िस में राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी भी टेलीविज़न के सामने बैठे उनके भाषण का इंतज़ार कर रहे थे। किंग जब भाषण देने के लिए आए तो उन्होंने वहां मौजूद भीड़ को देखा। चारों तरफ़ बस लोग ही लोग थे।
किंग ने पहले से तैयार किया गया भाषण देना शुरू किया लेकिन उनके भाषण के प्रति जनता में कोई ख़ास उत्साह नहीं दिख रहा था। तभी वहां मौजूद महालिया जैक्सन ने किंग से कहा, "मार्टिन उन्हें सपने के बारे में बताओ..."
महालिया चाहती थीं कि किंग अपने चिर -परिचित खुले अंदाज़ में भाषण दें।
किंग ने अपने भाषण के तैयार किए नोट्स किनारे रख दिए और जोश में भरकर बोले, 'आई हैव ए ड्रीम'
भाषण के बाद किंग और उनके साथी लिंकन स्मारक से राष्ट्रपति केनेडी से मिलने सीधे व्हाइट हाउस गए। व्हाइट हाउस में किंग और उनके साथियों का स्वागत करते हुए केनेडी ने कहा, 'आई हैव ए ड्रीम'
इन महान प्रेरणादायी एतिहासिक भाषण की गोल्डन जुबली के अवसर पर ‘वॉयेजर’ अपने पाठकों के लिए इस एतिहासिक भाषण की एक-एक लाइन का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर इस महान नेता को श्रद्धांजलि अर्पित करता है –
“मैं खुश  हूं कि मैं आज ऐसे मौके पर आपके साथ शामिल हूं जो इस देश के इतिहास में स्वतंत्रता के लिए किए गए सबसे बड़े प्रदर्शन के रूप में जाना जाएगा।
100 साल पहले , एक महान अमेरिकी , जिनकी प्रतीकात्मक छाया  में हम सभी खड़े हैं , ने एक मुक्ति उद्घोषणा (Emancipation Proclamation) पर हस्ताक्षर किए थे। इस महत्त्वपूर्ण निर्णय ने अन्याय सह रहे लाखों गुलाम नीग्रोज़ के मन में उम्मीद की एक किरण जगा दी। ये ख़ुशी उनके लिए लम्बे समय तक अन्धकार कि कैद में रहने के बाद दिन के उजाले में जाने के समान था ।
परन्तु आज 100 वर्षों बाद भी , नीग्रोज़ स्वतंत्र नहीं हैं।100 साल बाद भी , एक नीग्रो की ज़िन्दगी अलगाव की हथकड़ी और भेद-भाव की जंजीरों से जकड़ी हुई हैं। 100 साल बाद भी नीग्रो समृद्धि के विशाल महासागर के बीच गरीबी के एक द्वीप पर रहता है। 100 साल बाद भी नीग्रो, अमेरिकी समाज के कोनों में सड़ रहा है और अपने देश में ही खुद को निर्वासित पाता है। इसीलिए आज हम सभी यहां इस शर्मनाक इस्थिति को दर्शाने के लिए इकठ्ठा हैं।
एक मायने में हम अपने देश की राजधानी में एक चेक कैश करने आए हैं। जब हमारे गणतंत्र के आर्किटेक्ट संविधान और स्वतंत्रता की घोषणा बड़े ही भव्य शब्दों में लिख रहे थे , तब दरअसल वे एक वचनपत्र पर हस्ताक्षर कर रहे थे जिसका हर एक अमेरिकी वारिस होने वाला था।ये पत्र एक वचन था की सभी व्यक्ति , हां सभी व्यक्ति चाहे काले हों या गोरे, सभी को जीवन, स्वाधीनता और अपनी प्रसन्नता के लिए अग्रसर रहने का अधिकार होगा।
आज ये स्पष्ट है कि अमेरिका अपने अश्वेत नागरिकों से ये वचन निभाने में चूक चुका है।इस पवित्र दायित्व का सम्मान करने के बजाय, अमेरिका ने नीग्रो लोगों को एक अनुपयुक्त चेक दिया है, एक ऐसा चेक जिसपर “अपर्याप्त कोष” लिखकर वापस कर दिया गया है। लेकिन हम ये मानने से करने इंकार करते हैं कि न्याय का बैंक दीवालिया हो चुका है। हम ये मानने से इनकार करते हैं कि इस देश में अवसर की महान तिजोरी में ‘अपर्याप्त कोष’ है। इसलिए हम इस चेक को कैश कराने आए हैं-एक ऐसा चेक जो मांगे जाने पर हमें धनोपार्जन कि आजादी और न्याय कि सुरक्षा देगा।
हम इस पवित्र स्थान पर इसलिए भी आए हैं कि हम अमेरिका को याद दिला सकें कि इसे तत्काल करने की सख्त आवश्यकता है।अब और शांत रहने या फिर खुद को दिलासा देने का वक़्त नहीं है।अब लोकतंत्र के दिए वचन को निभाने का वक़्त है। अब वक़्त है अंधेरी और निर्जन घटी से निकलकर नस्लीय  न्याय (racial justice) के प्रकाशित मार्ग पर चलने का। अब वक़्त है अपने देश को नस्लीय अन्याय के दलदल से निकल कर भाई-चारे की ठोस चट्टान खड़ा करने का। अब वक़्त है नस्लीय न्याय को प्रभु की सभी संतानों के लिए वास्तविक बनाने का।
इस बात की तत्काल अनदेखी करना राष्ट्र के लिए घातक सिद्ध होगा। नीग्रोज के वैध असंतोष की गर्मी तब तक ख़तम नहीं होगी जब तक स्वतंत्रता और समानता की बहार नहीं आ जाती। 1963 एक अंत नहीं बल्कि एक शुरुआत है। जो ये आशा रखते हैं कि नीग्रो अपना क्रोध दिखाने के बाद फिर शांत हो जायेंगे देश फिर पुराने ढर्रे  पर चलने लगेगा मनो कुछ हुआ ही नहीं, उन्हें एक असभ्य जाग्रति का सामना करना पड़ेगा। अमेरिका में तब तक सुख-शांति नहीं होगी जब तक नीग्रोज़ को नागरिकता का अधिकार नहीं मिल जाता है। विद्रोह का बवंडर तब तक हमारे देश की नीव हिलाता रहेगा जब तक न्याय की सुबह नहीं हो जाती।
लेकिन मैं अपने लोगों, जो न्याय के महल की देहलीज पर खड़े हैं, से ज़रूर  कुछ कहना चाहूंगा। अपना उचित स्थान पाने कि प्रक्रिया में हमें कोई गलत काम करने का दोषी नहीं बनना है। हमें अपनी आजादी की प्यास घृणा और कड़वाहट का प्याला पी कर नहीं बुझानी है।
हमें हमेशा अपना संघर्ष अनुशासन और सम्मान के दायरे में रह कर करना होगा। हमें कभी भी अपने रचनात्मक विरोध को शारीरिक हिंसा में नहीं बदलना है। हमें बार-बार खुद को उस स्तर तक ले जाना है , जहां हम शारीरिक बल का सामना आत्म बल से कर सकें। आज नीग्रो  समुदाय , एक अजीब  आतंकवाद से घिरा हुआ है, हमें ऐसा कुछ नहीं करना है कि सभी श्वेत लोग  हमपर अविश्वास न करने लगें , क्योंकि हमारे कई श्वेत बंधू  इस बात को जान चुके हैं की उनका भाग्य हमारे भाग्य से जुड़ा हुआ है , और ऐसा आज उनकी यहां पर उपस्थिति से प्रमाणित होता है। वो इस बात को जान चुके हैं कि उनकी स्वतंत्रता हमारी स्वतंत्रता से जुडी हुई है । हम अकेले नहीं चल सकते।
हम जैसे जैसे चलें , इस बात का प्रण करें कि हम हमेशा आगे बढ़ते रहेंगे।हम कभी वापस नहीं  मुड़ सकते।कुछ ऐसे लोग भी हैं जो हम नागरिक अधिकारों के भक्तों से पूछ रहे हैं कि, “आखिर हम कब संतुष्ट होंगे?”
हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे  जब तक एक नीग्रो, पुलीस की अनकही भयावहता और बर्बरता का शिकार होता रहेगा।हम तब तक नहीं संतुष्ट होंगे जब तक  यात्रा से थके हुए हमारे शारीर , राजमार्गों के ढाबों और शहर  के होटलों में विश्राम नहीं कर सकते। हम तब तक नहीं संतुष्ट होंगे जब तक एक नीग्रो छोटी सी बस्ती से निकल कर एक बड़ी बस्ती में  नहीं चला जाता। हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक हमारे बच्चों से उनकी पहचान  छीनी जाती रहेगी और उनकी गरिमा को ,” केवल गोरों के लिए” संकेत लगा कर लूटा जाता रहेगा।हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे  जब तक मिस्सीसिप्पी में रहने वाला नीग्रो मतदान  नहीं कर सकता और जब तक न्यू योर्क में रहने वाला नीग्रो ये नहीं यकीन करने लगता कि अब उसके पास चुनाव करने के लिए कुछ है ही नहीं। नहीं, नहीं हम संतुष्ट नहीं हैं और हम तब तक संतुष्ट नहीं होंगे जब तक न्याय जल की  तरह और धर्म एक तेज धरा की तरह प्रवाहित नहीं होने लगते।
मैं इस बात से अनभिज्ञ नहीं हूं कि आप में से कुछ लोग बहुत सारे कष्ट सह कर यहां आए हैं। आपमें से कुछ तो अभी-अभी जेल से निकल कर आए हैं। कुछ लोग ऐसी जगहों से आए हैं जहां स्वतंत्रता की खोज में उन्हें  अत्याचार के थपरड़ों और पुलिस की बर्बरता से पस्त होना पड़ा है।  आपको सही ढंग से कष्ट सहने का अनुभव है । इस विश्वास के साथ कि आपकी पीड़ा  का फल अवश्य मिलेगा आप अपना काम जारी रखिये।
मिसीसिपी वापस जाइए , अलबामा वापस जाइए, साउथ कैरोलिना वापस जाइए , जोर्जिया  वापस जाइए, लूजीआना  वापस जाइए, शहरों की झोपड़ियों और बस्तियों में वापस जाइए, ये जानते हुए कि किसी न किसी तरह ये  स्थिति बदल सकती है और बदलेगी आप अपने स्थानों पर वापस जाइए। अब हमें निराशा की घाटी में वापस नहीं जाना है।
मित्रों , आज आपसे मैं ये कहता हूं , भले ही हम आज-कल कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं , पर फिर भी मेरा एक सपना है (I have a dream), एक ऐसा सपना जिसकी जडें अमेरिकी सपने में निहित है ।
मेरा एक सपना है  कि एक दिन ये देश ऊपर उठेगा और सही मायने में अपने सिद्धांतों को जी पायेगा।” हम इस सत्य को प्रत्यक्ष मानते हैं कि : सभी इंसान बराबर पैदा हुए हैं”
मेरा एक सपना है कि एक दिन  जार्जिया के लाल पहाड़ों पर पूर्व गुलामो के पुत्र  और पूर्व गुलाम मालिकों के पुत्र भाईचारे की मेज पर एक साथ बैठ सकेंगे।
मेरा एक सपना है कि एक दिन मिसीसिपी राज्य भी , जहां अन्याय और अत्याचार की तपिश है , एक आजादी और न्याय के नखलिस्तान में बदल जाएगा।
मेरा एक सपना है कि एक दिन मेरे चारों छोटे बच्चे एक ऐसे देश में रहेंगे जहां उनका मूल्यांकन उनकी चमड़ी के रंग से नहीं बल्कि उनके चरित्र की ताकत से किया जाएगा।
आज मेरा एक सपना है।
मेरा एक सपना है कि एक दिन  अलबामा में , जहां भ्रष्ट जातिवाद है, जहां राज्यपाल के मुख से बस बीच-बचाव और संघीय कानून को न मानने के शब्द निकलते हैं, एक दिन उसी अलबामा में , छोटे-छोटे अश्वेत लड़के और लड़कियां छोटे-छोटे श्वेत लड़के और लड़कियों का हांथ भाई-बहिन के सामान थाम सकेंगे।
मेरा एक सपना है।
मेरा एक सपना है कि एक दिन हर एक घाटी उंची हो जाएगी , हर एक पहाड़ नीचे हो जाएगा, बेढंगे स्थान सपाट हो जायेंगे, और टेढ़े-मेधे रास्ते सीधे हो जायेंगे , और तब इश्वर की महिमा दिखाई देगी और सभी मनुष्य उसे एक साथ देखेंगे।
यही हमारी आशा है, इसी विश्वास  के साथ मैं दक्षिण वापस जाऊंगा। इसी  विश्वास से हम निराशा के पर्वत को आशा के पत्थर से काट पाएंगे। इसी विश्वास से हम कलह के कोलाहल को भाई-चारे के मधुर स्वर में बदल पाएंगे।इसी  विश्वास से हम एक साथ काम कर पाएंगे,पूजा कर पाएंगे,संघर्ष कर पाएंगे,साथ जेल जा पाएंगे , और ये जानते हुए कि हम एक दिन मुक्त  हो जायंगे , हम स्वतंत्रता के लिए साथ- साथ  खड़े हो पायंगे।
ये एक ऐसा दिन होगा जब प्रभु की सभी संताने एक नए अर्थ के साथ गा सकेंगी, “My country
’tis of thee, sweet land of liberty, of thee I sing। Land where my fathers died, land of the pilgrim’s pride, from every mountainside, let freedom ring।”
और यदि अमेरिका को एक महान देश बनना है इसे सत्य होना ही होगा।
इसलिए  न्यू  हैम्पशायर के विलक्षण टीलों से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए।
न्यू योर्क के विशाल पर्वतों से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
पेंसिलवानिया के अल्घेनीज़ पहाड़ों से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
बर्फ से ढकी कोलराडो की चट्टानों से  आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
कैलिफोर्निया की घूमओदार ढलानों से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
यही नहीं, जार्जिया के इस्टोन माउंटेन से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
टेनेसी के  लुकआउट माउंटेन से आजादी  की गूंज  होने  दीजिए,
मिसीसिपी के टीलों और पहाड़ियों से आजादी की गूंज होने दीजिए।
हर एक पर्वत से से आजादी की गूंज होने दीजिए।
और जब ऐसा होगा , जब हम आजादी की गूंज होने देंगे , जब हर एक गांव और कसबे से, हर एक राज्य और शहर से आजादी की गूंज होने लगेगी तब हम उस दिन को और जल्द ला सकेंगे जब इश्वर की सभी संताने , श्वेत या अश्वेत, यहूदी या किसी अन्य जाती की , प्रोटेस्टंट या कैथोलिक, सभी हाथ में हाथ डालकर नीग्रोज का आध्यात्मिक गाना गा सकेंगे, ‘Free at last! free at last! thank God Almighty, we are free at last!’

बुधवार, 7 अगस्त 2013

अगले 3 से 4 महीने में पलटने वाले हैं सूरज के चुंबकीय ध्रुव

सूरज अब एक बड़े बदलाव से गुजरने वाला है। सूरज के चुंबकीय क्षेत्र अगले तीन से चार महीनों में पलटने वाले है। इससे हमें या धरती को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं है। इससे घबराने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि सूरज के चुंबकीय क्षेत्र हर 11 साल में एक बार पलटते हैं।
सोलर एक्टिविटी की साइकिल 11 साल की होती है। सोलर एक्टिविटी साइकिल के चरम पर जब सूरज का आंतरिक मैग्नेटिक डायनामो खुद को जैसे ही पुर्नस्थापित करता है, सूरज के चुंबकीय क्षेत्र पलट जाते हैं। सूरज के चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव जब भी होता है, तो इससे पहले चुंबकीय क्षेत्र कमजोर होते-होते एकदम से खत्म हो जाते हैं। फिर अचानक से सूरज के चुंबकीय क्षेत्र पलटे हुए ध्रुवों के साथ फिर से पैदा हो जाते हैं।
सूरज के चुंबकीय क्षेत्रों का पलटना कोई आपदा नहीं है, लेकिन फिर भी इसके असर पूरे सौरमंडल पर पड़ता है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की विलकॉक्स सोलर ऑब्जरवेटरी के निदेशक और सोलर फिजिसिस्ट टोड ह़ॉक्समा बताते हैं कि सूरज के ध्रुवों के पलटने से पूरा सौरमंडल मानो कांप सा उठता है।
चुंबकीय क्षेत्रं के पलटने के दौरान सूरज से होने वाली आवेशित कणों की बौछार एकदम से तेज हो उठती है। पृथ्वी सूरज की परिक्रमा के दौरान कई बार सूरज के इन आवेशित कणों के बादल में डूबती और ऊपर आती रहती है। इसका मतलब ये हुआ कि आने वाले समय में हम स्पेस वेदर में तेज उतार-चढ़ाव देखेंगे और आने वाले समय में औरोरा बोरेलिस यानि रात में आसमान में नजर आनेवाली रंग-बिरंगी रोशनी की घटनाएं और भी ज्यादा और तीव्र नजर आएगी।
सूरज के चुंबकीय क्षेत्रों में बदलाव से कॉस्मिक किरणों की बौछार भी प्रभावित होगी। कॉस्मिक किरणें दरअसल हाई इनर्जी पार्टिकिल्स की बौछार हैं, जो दूर आकाशगंगाओँ में हुए सुपरनोवा धमाकों या ऐसी ही दूसरी विनाशकारी घटनाओं से फूटती हैं। कॉस्मिक किरणें अंतरिक्षयात्रियों और स्पेस प्रोब्स के लिए बेहद खतरनाक होती हैं। सौर विज्ञानियों का कहना है कि सूरज के चुंबकीय क्षेत्रों के पलटने से पृथ्वी पर बादलों की स्थिति और मौसम पर असर पड़ सकता है।
स्टैनफोर्ड के एक अन्य सोलर फिजिसिस्ट फिल शेरेर बताते हैं कि सूरज का उत्तरी ध्रुव पहले से ही बदलाव के संकेत दे चुका है, जबकि दक्षिणी ध्रुव अभी पलटने की प्रक्रिया में है। जल्दी ही सूरज के दोनों चुंबकीय़ ध्रुव पलट जाएंगे और इसके साथ ही सोलर मैक्स की शेष आधी अवधि भी शुरू हो जाएगी

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

13 प्रकाशवर्ष दूर, पृथ्वी से मिलता-जुलता ग्रह !


धरती के नजदीक के अंतरिक्ष में भी कई रहस्य छिपे हैं। शायद हमसे महज 13 प्रकाशवर्ष दूर, पृथ्वी से मिलता-जुलता एक ग्रह अपने मध्यम रेड जाइंट सितारे की परिक्रमा कर रहा है। 13 प्रकाशवर्ष भी काफी बड़ी दूरी है और वहां जाना फिलहाल मुमकिन नहीं, लेकिन भविष्य के टेलिस्कोप्स पृथ्वी के नजदीक मौजूद ऐसी 'अनजान धरतियों' को न सिर्फ देख सकेंगे, बल्कि वहां जावन की जांच भी कर सकेंगे। महज 13 प्रकाश वर्ष दूर मौजूद अनजान धरती की ये चौंकानेवाली खबर नासा के केप्लर टेलिस्कोप के आंकड़ों की जांच से सामने आई है। केप्लर टेलिस्कोप से मिली इस जानकारी को सार्वजनिक किया है हॉवर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स की वैज्ञानिक कर्टनी ड्रेसिंग ने। 
जब भी कोई परिक्रमा करता ग्रह अपने सितारे के सामने से गुजरता है तो उस सितारे की रोशनी कुछ धीमी हो जाती है। कैप्टर टेलिस्कोप ने ऐसे ही सितारों की जांच की है जिनकी रोशनी में एक तय अंतराल में बदलाव आता है। सितारे की रोशनी में इस तरह का बदलाव उसकी कक्षा में मौजूद बृहस्पति जैसे किसी विशाल ग्रह की मौजूदगी की ओर इशारा करता है।
 लेकिन इस तकनीक से हमारी पृथ्वी जैसे छोटे ग्रह की तलाश थोड़ी मुश्किल है। क्योंकि पृथ्वी जैसे किसी छोटे ग्रह के सामने से गुजरने पर सितारे की रोशिनी में कोई प्रभावी बदलाव नहीं आता। ऐसे में वैज्ञानिकों ने मध्यम श्रेणी के रेड जाइंट सितारों को लिया, क्योंकि ये अपेक्षाकृत ठंडे होते हैं और इनकी रोशनी सामान्य सितारे की अपेक्षा काफी कम होती है। इसलिए मध्यम श्रेणी के रेड जाइंट सितारे के सामने जब कोई छोटा ग्रह गुजरता है तो उसकी रोशनी में आई कमी को महसूस किया जा सकता है।   
कैप्टर टेलिस्कोप के कैटेलॉग में शामिल हजारों सितारों में से एस्ट्रोनॉमर कर्टनी ने ऐसे 95 संभावित ग्रहों को तलाशा है जो रेड ड्वार्फ सितारों की परिक्रमा कर रहे हैं। इनमें से तीन ग्रह ऐसे हैं जो अपने सितारे के हैबिटेट जोन में मौजूद हैं, यानि उनकी सतह पर पानी तरल स्वरूप में मौजूद रह सकता है। एस्ट्रोनॉमर कर्टनी ड्रेसिंग इससे काफी उत्साहित हैं और उनका कहना है कि इसका एक मतलब ये भी है कि हमारी आकाशगंगा में मौजूद सभी रेड ड्वार्फ सितारों में से 666छह फीसदी सितारे ऐसे हो सकते हैं जिनके हैबिटेट जोन में धरती से मिलता-जुलता ग्रह मौजूद है।
एस्ट्रोनॉमर कर्टनी ने बताया कि हमारे सूरज के आसपास मौजूद प्रोक्सिमा सेंचुरी समेत ज्यादातर सितारे रेड ड्वार्फ ही हैं। इसलिए ये पूरी तरह मुमकिन है कि हमारी पृथ्वी से मिलता-जुलता ग्रह हमसे महज 13 प्रकाश वर्ष ही दूर हो।