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शनिवार, 2 जनवरी 2010

सृष्टि के रहस्य और हम

न सिर्फ आम लोग बल्कि बड़े-बड़े फिलॉसफर और पहुंचे हुए महापुरुष भी हमारी सृष्टि को अक्सर अनादि और अनंत बताते हैं। उनका मानना है कि यह संसार हमेशा था और हमेशा रहेगा। इसका कोई ओर-छोर नहीं। उन्नीसवीं सदी की साइंस ने भी इस धारणा पर यह कहकर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी कि मैटर और एनर्जी अमिट हैं। वे न क्रिएट हो सकते हैं न डेस्ट्रॉय। उनका केवल रूप परिवर्तन होता रहता है। इसके विपरीत कुछ लोगों का विचार है कि सृष्टि सत्य नहीं, एक भ्रम है, छाया है, माया है। यह संसार हमारी चेतना की उपज है, अपने-आप में उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं। सृष्टि के सब रूप-रंग हमारे अनुभव के मुहताज हैं और हमारे अनुभवों से ही वे बनते-बिगड़ते रहते हैं। इस मायावी विश्वास को बीसवीं सदी की दो महान वैज्ञानिक थ्योरियों- रिलेटिविटी और क्वांटम मकैनिक्स ने बल प्रदान किया। रिलेटिविटी थ्योरी ने सृष्टि के अति विशाल स्वरूप की व्याख्या करते हुए बताया कि वस्तुओं की मापतौल उनकी मोशन और एनर्जी पर निर्भर करती है, वह अचल, अटल और निरपेक्ष नहीं होती। क्वांटम थ्योरी ने बताया कि मैटर के अति महीन कण इतने अस्थिर होते हैं कि वे कब-कहां है, यह निश्चित करना संभव नहीं होता। उनकी स्थिति और गति दोनों की एक साथ मापतौल मुमकिन नहीं होती। केवल कोशिश-भर से उनकी स्थिति अथवा गति विचलित हो जाती है। इक्कीसवीं सदी की साइंस शक्तिशाली दूरबीनों की मदद से न केवल सृष्टि के ओर-छोर की मापतौल कर रही है, बल्कि वह गहन अतीत में झांक कर पता लगा रही है कि हमारी सृष्टि का जन्म कब और कैसे हुआ, उसका बचपन कैसा था, और कैसे उसमें धीरे-धीरे अरबों गैलेक्सियों और खरबों-खरब तारों का विकास हुआ। किस-किस द्रव्य से सृष्टि का गठन हुआ है, कहां तक उसका विस्तार है और कैसे वह अपने अंत की ओर बढ़ रही है। आज की शक्तिशाली दूरबीनें शून्यमय और अंधकारमय अंतरिक्ष में झांकते हुए ऐसे-ऐसे दृश्यों को हमारे लिए उजागर कर रही हैं जो हमसे अरबों प्रकाश वर्ष दूर हैं। दूसरे शब्दों में, हम दूरबीनों की मदद से ऐसे-ऐसे दृश्य देख पा रहे हैं जो अरबों साल पुराने हैं। आज का आकाश निहारते वक्त हम प्राचीन संसार का इतिहास देख रहे होते हैं। सृष्टि को समझने और उसकी मापतौल की दूरबीनी कोशिश आज से चार सौ साल पहले शुरू हुई थीं। सन 1609 में गैलीलियो ने नई-नई ईजाद हुई दूरबीन का रुख जब आकाश की ओर मोड़ा तब मानो अनंत दर्शन के लिए मनुष्य जाति के मस्तिष्क में एक नया और विशाल नेत्र खुल गया। तब मनुष्य ने पहले-पहल चांद की सतह पर टीले और गड्ढे देखे, शुक्र ग्रह की घटती-बढ़ती कलाएं देखीं, बृहस्पति के आंगन में विचरते चार चांद देखे और सूरज के चेहरे पर काले-काले दाग देखे। सन 1930 में खगोलशास्त्री हब्बल ने पाया कि विश्व में हमारी आकाशगंगा अकेली नहीं, उस जैसी अनगिनत प्रकाश की दूधिया बदलियां 'नेबुला' आकाश में विचर रही हैं। वे बदलियां हमारी आकाशगंगा जैसी ही गैलेक्सियां हैं। उन एक-एक में करोड़ों, अरबों या शायद खरबों सूरज-सरीखे तारे हैं। हब्बल के देखने में आया कि ये सब गैलेक्सियां बड़ी तेजी से हम से और एक-दूसरे से, दूर होती जा रही हैं। उन्नीसवीं-बीसवीं सदियों की दूरबीनें अक्सर शहरों से दूर, पर्वतों की ऊंचाइयों पर स्थापित की जाती थीं। फिर भी इन दूरबीनों के दर्पणों पर तारे पृथ्वी के वातावरण से कंपित होकर झिलमिलाते और टिमटिमाते रहते थे। पृथ्वी का वातावरण बहुत-से रेडिएशन को चूस भी लेता था। इसलिए जरूरत थी ऐसी दूरबीनों की जो पृथ्वी के वातावरण को पीछे छोड़कर और आगे बढ़कर, अंतरिक्ष में ठहरे-ठहरे, तारों और गैलेक्सियों को निहार सकें। इसलिए हब्बल, कॉम्पटन, कोबे और चंदा नाम की दूरबीनों की पृथ्वी के आंगन में, लेकिन पृथ्वी की सतह से दूर, स्थापना की गई। इसी क्रम में जून 2001 में एक नई दूरबीन की स्थापना की गई, जिसे प्रिंस्टन के भूतपूर्व वैज्ञानिक डेविड विल्किनसन के सम्मान में डब्ल्यू.एम.ए.पी (विमैप) नाम दिया गया। यह दूरबीन हर वक्त पृथ्वी से 16 लाख किलोमीटर का फासला बनाए हुए पृथ्वी के साथ-साथ सूरज की परिक्रमा करती रहती है। विमैप द्वारा हुए निरीक्षणों के आधार पर सृष्टि की उत्पत्ति, विकास तथा उसके स्वरूप के बारे में जो तथ्य सामने आए हैं, वे वैज्ञानिकों की आशाओं के अनुकूल निकले हैं। पाया गया कि हमारी सृष्टि सचमुच एक महाविस्फोट के साथ वजूद में आई थी। यह घटना 13 अरब 73 करोड़ साल पहले घटी थी। उसी के साथ काल की गति शुरू हुई थी और चार आयामी स्पेस-टाइम का सूत्रपात हुआ था। उत्पत्ति के क्षण सृष्टि का तापमान अरबों डिग्री था। अगले ही पल बिग बैंग से उत्पन्न हुई ऊष्मा अंतरिक्ष में फैल गई और उसका तापमान गिर गया। 3 लाख 80 हजार साल बाद यह ऊष्मा लगभग एकरस होकर सर्वत्र छा गई। इस दौर के तापमान के जो चित्र विमैप द्वारा उपलब्ध हुए हैं, उनसे पता चलता है कि यहां-वहां तापमान में कुछ-कुछ अंतर है। ये अंतर बहुत मामूली हैं - एक डिग्री के दो-चार लाखवें भाग से ज्यादा नहीं। महाविस्फोट के कुछ ही समय बाद इस ऊष्मा ने द्रव्य को जन्म दिया जो मुख्यत: हाइड्रोजन और हीलियम गैसों के रूप में प्रकट हुआ। बिग बैंग के लगभग 20 करोड़ साल बाद इन गैसों से पहले-पहले तारे गठित हुए। आगे चलकर ये तारे खरबों-खरब की संख्या में प्रकट होने लगे, चमकने लगे और करोड़ों अथवा अरबों साल का जीवन भोग कर बुझने लगे। आज ये खरबों-खरब तारे अरबों टोलियां यानी गैलेक्सियां बना कर ग्रैविटी के अदृश्य तागों से बंधे-बंधे सृष्टि में विचर रहे हैं। विमैप के यंत्र पिछले आठ साल से सुचारु रूप से काम कर रहे हैं। फिर भी नासा ने अगले साल, 2010 में, उसे सुला देने का मंसूबा बना लिया है। उसकी जगह, उससे भी शक्तिशाली एक और दूरबीन, जिसे प्लैंक नाम दिया गया है, इसी साल मई में भेज दी गई है। विमैप प्रॉजेक्ट के मुख्य वैज्ञानिक चार्ल्स बैनेट से जब हाल में पूछा गया कि सृष्टि की शुरुआत के बारे में तो आप लोगों ने बहुत जानकारी प्राप्त कर ली है, उसका अंत कब और कैसे होने वाला है, क्या इसका जवाब भी साइंस के पास है? उन्होंने कहा, बिग बैंग से उत्पन्न होने के बाद से हमारी सृष्टि लगातार फैल रही है, इसके स्पष्ट संकेत मिले हैं। भविष्य में भी विस्तार का यह सिलसिला जारी रहेगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।
साभार - बलदेव राज दावर

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