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रविवार, 14 नवंबर 2010

क्या हम धार्मिक-ज्योतिषीय हिस्टीरिया के युग में जी रहे हैं?

हम आज ऐसे युग में हैं जब साइंस और खगोल विज्ञान के बारे में जागरूकता सबसे ज्यादा है। टेक्नोलॉजी और ज्ञान का इतना व्यापक विस्तार पहले कभी नहीं था। लेकिन फिर भी आज अंधविश्वास पहले से कहीं ज्यादा है, तरह-तरह के बाबाओं के आलीशान पंडालों से लेकर क्रूज पर विलासिता और मनोरंजन के तमाम हथकंड़ों के बीच फाइव-स्टार कथाओं का प्रचलन अपने शीर्ष पर है। मनौती-मन्नतों से लेकर करामाती बाबाओं तक की भक्ति का दौर खूब जोर-शोर से जारी है। ये अजीब विरोधाभास है कि अत्याधुनिक वैज्ञानिक युग में भी हम धार्मिक-ज्योतिषीय हिस्टीरिया में जी रहे हैं। यथार्थवादी और व्यावहारिक होने के तमाम दंभ के बीच भी हम आखिर इतने भाग्यवादी क्यों हैं? ये एक अहम सवाल है, क्योंकि ये हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। अमेरिका के एक थिंक टैंक ने दुनिया के सभी प्रमुख देशों के बीच एक सर्वे कराया, इस सर्वे के नतीजे बताते हैं कि ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा बढ़ी है जो रोज अपना राशिफल देखते हैं और उसी के मुताबिक अपना काम करते हैं। भारत में तो ज्योतिष और धार्मिक आडंबर में इतना जबरदस्त उछाल है कि ये क्षेत्र बेरोजगारों के लिए आकर्षक विकल्प बन चुका है।
मेरे वैज्ञानिक और एस्ट्रोनॉमर साथियों की तरह अकसर मुझे ऐसी स्थितियों से दो-चार होना पड़ता है, जब कोई मुस्कराते हुए मुझे अपनी राशि बताता है और मुझसे मेरी राशि पूछ बैठता है। संपूर्ण मानव इतिहास में वैज्ञानिक रूप से सबसे उन्नत दौर में भी हम बेहद अतार्किक और रूढ़िवादी हैं। सौरमंडल के ग्रह हमारे भाग्य को बना या बिगाड़ सकते हैं, इस पर यकीन करने से पहले आप खुद ये विचारकर देखिए कि हमारी चार स्पेस सोलर ऑब्जरवेटरीज हर पल सूरज की निगरानी कर रही हैं। स्पेसक्राफ्ट मैसेंजर बुध की कक्षा में प्रवेश करने वाला है और वीनस एक्सप्रेस की आंख से हम शुक्र के वातावरण और भौगोलिक संरचनाओं की अध्ययन कर रहे हैं। हमारे ही स्पेसक्राफ्ट चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी की खोज की है। मंगल के आकाश और धरती दोनों जगह हमारी बनाई मशीनें काम कर रही हैं। हमने मंगल का इतने विस्तार से अध्ययन किया है कि इतना तो हम अपनी पृथ्वी के बारे में भी नहीं जानते। करीब आधा दर्जन स्पेसक्राफ्ट के जरिए हम बृहस्पति की दुनिया में झांक चुके हैं और शनि की कक्षा में तो हमारा स्पेसक्राफ्ट कसीनी शानदार काम कर रहा है। इससे भी आगे की दुनिया को देखने-समझने के लिए मिशन न्यू-होराइजन बढ़ा चला जा रहा है।
मजे की बात ये कि खगोल विज्ञान और ज्योतिष दोनों की शुरुआत मानव विकास के इतिहास में एक ही बिंदु से और लगभग एकसमान घटनाओं से ही हुई है। मेरे मित्र इतिहासकार और खगोलशास्त्री बलदेवराज दावर के मुताबिक भाग्यवादिता और धार्मिकता के बीज विकासवाद की शुरुआती परिस्थितियों ने ही मानव अंतरमन में बो दिए थे। लाखों साल पहले जब आदिमानव गुफाओं और पेड़ों में रहता था, और कई मानव प्रजातियां अस्तित्व में थीं, तब कभी-कभी ऐसा भी होता था कि आदिमानवों के ये झुंड हमलावरों का निशाना बन जाते थे। ये हमलावर हिंसक पशु भी होते थे और दूसरी मानव प्रजातियां भी। झुंड पर हमला होने की सूरत में बचाव के दो ही रास्ते अमल में लाए जाते थे, या तो कुछ ताकतवर मर्द हमलावरों का बहादुरी से मुकाबला करते थे और पूरा झुंड बिखर जाता था, बूढ़े, बच्चे और महिलाऐं सब अलग-अलग दिशाओं में अंधाधुंध भाग निकलते थे। या फिर सभी एक ही जगह एक-दूसरे से ज्यादा से ज्यादा सटकर दुश्मन की ओर पीठ करके एक गोल झुंड बनाकर खड़े हो जाते थे। इस झुंड के बीचोंबीच बच्चों और महिलाओं को रखा जाता था और सभी पुरुष उन्हें चारों ओर से कई दायरों में घेरे रहते थे। ऐसे में हमलावर पशु बाहर से एक-दो पुरुषों का शिकार करके अपनी राह चला जाता था। सबसे बदतर हालात में भी महिलाएं-बच्चे और कुछ पुरुष तो बच ही जाते थे।
 ऐसे में जो लोग बच जाते थे वो इसे आसमान पर चमक रहे चंद्रमा या सूरज की कृपा मानकर उन्हें भेंट चढ़ाना और पूजा-पाठ करना शुरू कर देते थे। झुंड बनाकर एक जगह खड़े हो जाना ही हमलावरों से बचाव का सबसे कारगर तरीका था, क्योंकि मुकाबला करने वाले और बिखर जाने वाले लोग वापस नहीं आ पाते थे, जबकि सबसे खतरनाक हमले में भी एक जगह जमकर खड़े हो गए आदिमानवों के झुंड में काफी लोग बच जाते थे, जो अपने झुंड को आगे ले जाते थे।
आदिमानवों की यही प्रजाति बची रही, जबकि दूसरी सभी प्रजातियां एक के बाद एक खत्म हो गईं। हम उन लोगों की संतानें नहीं हैं जिन्होंने हमलावरों का बहादुरी से मुकाबला किया और खेत रहे, बल्कि हम उन लोगों की संतानें हैं जिन्होंने अपनी जान देकर भी झुंड के बच्चों और औरतों को जिंदा रखा, और प्राकृतिक शक्तियों का आभार मानते हुए आने वाली पीढ़ियों को जन्म दिया। आने वाले कल में भी झुंड सुरक्षित रहे इसलिए पूजा-पाठ के तमाम कर्मकांडों की शुरुआत हुई। इसीबीच सूरज-चांद-सितारों को देख लोग आने वाले भविष्य में घटने वाली घटनाओं का अनुमान लगाने लगे, ज्योतिष की शुरुआत बस यहीं से हुई।
आदिमानवों के एक से दो परिवार मिले, कबीले बसे, गांव-शहर बने और विकास की सीढ़ियां तय करते-करते हम मौजूदा अंतरिक्ष युग तक आ पहुंचे। विकास के दौरान ही कुछ लोगों को लगा कि देवताओं को खुश रखने के हमारे कर्मकांड और ज्योतिष शायद बेमानी हैं। हमारे भाग्य के मालिक आसमानों पर रहने वाले देवता नहीं बल्कि हम ही हैं। इस सोंच के साथ ही वैज्ञानिकता की शुरुआत हुई। हमने अपने कौशल और गलतियों से सीख लेते हुए अर्जित अनुभवों के बल पर परिस्थितियों को बदलना शुरू कर दिया। इस बदलाव की शुरुआत मौसम के प्रकोप से अपनी आबादी को बचाने के साथ हुई, लेकिन धरती के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को अपने फलने-फूलने लायक बना देने के बाद भी चीजों को बदलने की जिद अब भी जारी है।
इस जिद ने ही ये समझ दी कि मानव जाति के भविष्य को बनाने या बिगाड़ने के पीछे कोई अज्ञात दैवी शक्ति काम नहीं कर रही है। यहीं से ज्योतिष और खगोल विज्ञान की धाराएं अलग हो गईं। फसलों को बोने-काटने का समय जानने, आसमान में होने वाली पूर्णिमा-अमावस-ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं और ग्रहों के नजर आने और छिपने के समय को जानने के लिए गणित की जरूरत हुई और इसी के साथ खगोल विज्ञान आगे बढ़ता गया। वहीं ज्योतिष शास्त्रियों ने आसमान पर हर रोज नजर आने वाले सितारों के झुरमुट में कुछ तस्वीरों का एक काल्पनिक पैटर्न खोज लिया और उन्हें राशियों का नाम दे दिया। ज्योतिष अब भी हजारों साल पुराने नियमों पर टिका है, जबकि खगोल विज्ञान लाखों साल आगे निकल चुका है। ज्योतिषी अब भी मानते हैं कि आसमान में तारामंडल 12 राशियों की शक्ल में मौजूद हैं, जबकि ये सच नहीं है। सच कहें तो राशियां 12 नहीं 13 हैं और 13 वीं राशि का नाम है ऑफिकस। लेकिन दुनिया की किसी भी ज्योतिषीय गणना में इस 13 वीं राशि के असर और इसके प्रकोप को शांत के अनुष्ठान का जिक्र नहीं है।
 मौजूदा ज्योतिषीय नियमों के मुताबिक किसी ने अगर जुलाई में जन्म लिया है, तो इसका अर्थ ये है कि जब वो पैदा हुआ उस वक्त सूरज कर्क राशि में था। ये गणना भी गलत है, दरअसल जब 2000 साल पहले ज्योतिष के नियम बनाए गए थे उस वक्त जुलाई महीने में सूरज कर्क राशि में ही होता था, लेकिन आज ये स्थिति बदल चुकी है। आमतौर पर हम अपने ग्रह पृथ्वी की दो तरह की गति के बारे में ही जानते हैं, एक तो लट्टू की तरह अपने अक्ष पर गति, जिससे दिन-रात का चक्र चलता है और दूसरी सूरज के चारों ओर परिक्रमा की गति जिससे मौसम बदलते हैं और साल बीतता है। लेकिन धरती की एक तीसरी गति भी है, और वो है लट्टू की तरह घूमती धरती के अक्ष की वृत्ताकार गति। किसी घूमते हुए लट्टू को ध्यान से देखें, लट्टू तो अपने अक्ष पर घूम की रहा होता है, लेकिन साथ ही लट्टू के अक्ष से जुड़ी आधार लकड़ी का ऊपरी सिरा भी गोल-गोल घूम रहा होता है। यही है पृथ्वी की तीसरी गति जिसे प्रिसेशन कहते हैं।
इस तीसरी गति के कारण करीब 2000 साल में पृथ्वी का ध्रुवतारा बदल जाता है, क्योंकि प्रिसेशन गति के कारण धरती का अपने अक्ष पर झुकाव भी बदलता रहता है। 2000 साल पहले हमारी धरती का ध्रुव तारा वेगा नाम का सितारा था, जो अब अक्ष के झुकाव के साथ बदलकर पोलारिस हो गया है। ज्योतिषीय गणनाओं में ध्रुवतारे का खास महत्व है, क्योंकि ध्रुव तारे को रेफरेंस मान कर ही आसमान में ग्रहों-नक्षत्रों की स्थिति की ज्योतिषीय गणना की जाती है। अब जबकि हमारा ध्रुव तारा ही बदल चुका है, ऐसे में 2000 साल पुराने ज्योतिषीय नियम और गणनाएं अपने आप ही बेमानी हो चुकी हैं, क्योंकि धरती की इस तीसरी गति के बारे में प्राचीन से लेकर आधुनिक ज्योतिषियों तक किसी को कोई जानकारी नहीं रही है, इसीलिए ज्योतिषीय नियमों को कभी बदलते आसमान के मुताबिक शुद्ध नहीं किया गया। आधुनिक विज्ञान को भी धरती की इस तीसरी गति के बारे में जानकारी भी अभी ही मिली है। पृथ्वी की इस तीसरी गति के कारण अक्ष के झुकाव में आए बदलाव के कारण 2000 साल पुराने आसमान और आज के आसमान में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। आज के आसमान के इस हिसाब से जुलाई में पैदा होने वाले व्यक्तियों के लिए सूरज जैमिनी राशि में होता है, कर्क में नहीं।
ज्योतिषीय कॉलम पर यकीन रखने वाले लोगों को शायद ये जानकर धक्का लगे, लेकिन सच्चाई यही है कि अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाली तमाम ज्योतिषीय गणनाएं जाली और मनगढ़ंत होती हैं। इन भविष्यवाणियों का किसी गणित-किसी नियम से कोई ताल्लुक नहीं होता। ज्योतिषी अकसर ग्रहों की चाल और उनकी छाया का नाम लेकर लोगों को डराते हैं। हकीकत ये है कि 1781 तक दुनिया को पृथ्वी के अलावा केवल पांच ग्रहों के बारे में ही जानकारी थी, जिन्हें आसमान में देखा जा सकता था और ये पांच ग्रह थे- बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि। 1781 में खगोल वैज्ञानिक सर विलियम हर्शेल ने आसमान में अपनी जगह बदलने वाले एक खगोलीय पिंड की खोज की, शुरुआत में लगा कि ये कोई धूमकेतु है, लेकिन बाद में इस पिंड की ग्रहीय पृवत्ति का पता लगा। हर्शेल ने जिसकी खोज की थी, वो था सातवां ग्रह यूरेनस। 1846 में एक और ग्रह की खोज हुई, ये था हमारे सौरमंडल का आठवां ग्रह नेप्च्यून। नेप्च्यून की खोज गणित और गहन खगोलीय ऑब्जरवेशन का कमाल था।
खास बात ये इन नए ग्रहों की खोज होने तक ज्योतिष इनसे अनजान था। भारतीय ज्योतिष की बात करें तो उसमें सूरज और चंद्रमा को भी ग्रह माना गया है, जो बुनियादी तौर पर ही एक बड़ी गलती है। इसके अलावा राहु-केतु नाम के दो छाया ग्रहों और उनके असर की बात की गई है। जो खुद छाया ग्रह हैं, उनकी छाया से आपका नुकसान हो सकता है, क्या ये बात हास्यास्पद नहीं। क्या बैंगलोर के किसी घर में रखी एक बाल्टी दिल्ली में रहने वाले किसी शर्मा जी की सेहत पर असर डाल सकती है? अगर नहीं तो हमसे लाखों किलोमीटर दूर मौजूद ये ग्रह हमारी-आपकी सेहत और किस्मत पर कैसे असर डाल सकते हैं? सबसे बड़ा सवाल ये कि अब खोजे जा रहे नए ग्रहों के असर के बारे में ज्योतिषी कुछ क्यों नहीं बताते? ज्योतिषीय गणनाओं का खोखलापन बस इसी से जाहिर हो जाता है।

5 टिप्‍पणियां:

  1. टेक्नोलॉजी और ज्ञान का इतना व्यापक विस्तार पहले कभी नहीं था। लेकिन फिर भी आज अंधविश्वास पहले से ज्यादा है......

    संदीप!
    इस का कारण है, कि मौजूदा संकटग्रस्त शोषण पर आधारित व्यवस्था की उम्र को इसी तरह बढ़ाया जा सकता है, वही इसे बनाए रखती है। लेकिन पुरानी अतीत हुई व्यवस्थाओं की तरह यह समाज व्यवस्था भी अमर नहीं है। तमाम कोशिशों के बावजूद रोशनी फैलने से नहीं रुक सकती। इस व्यवस्था को भी अतीत होना ही होगा।

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  2. अच्छा वैज्ञानिक चिंतन परक आलेख ...अनुष्ठानों के प्रादुर्भाव को लेकर प्रस्तुत विचार रोचक लगे ...मगर विवाद की गुंजाईश रखते हैं ..हम कभी इस पर शास्त्रार्थ कर सकते हैं ....दरअसल मनुष्य का मन ही सब खुराफातों की जड़ है ...वह कुछ अलौकिक और विचित्रता की खोज में रहता है ....इसलिए ही कभी कभी घोर वैज्ञानिक भी अध्यात्मिक प्रवृत्तियों की और मुड जाते हैं ,विज्ञानं दरअसल निरपेक्ष रखकर तथ्यों का निरूपण करता है ..वह कोई जीवन दर्शन नहीं देता ..मगर फिर भी आज के युग में गलत मान्यताओं को तरजीह नहीं दी जानी चाहिए ....
    संदीप जी ,अपने बहुत अच्छा लिखा है -हम संवाद करते रहेगें !

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  3. संदीप जी, आप अरविंद जी से आपके ब्‍लॉग का लिंक मिला। आपका श्रम देखकर अभीभूत हूँ। इस सार्थक चिंतन के लिए हमारी आरे से बधाई स्‍वीकारें।

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  4. sir ji jis rahu ketu ko aap chhaya keh rahe hai wo kahin dark matter to nahi hai

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  5. aur rahi baat banglore me rakhi balti ka delhi me rehne wale par kaya asar padega mai aisa manta hoon ki universe main jo kuchh bhi hai uska asar ek dusre par padta zaroor hai ab use hum ehsaas karen ya na kare

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