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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

इस तरह शुरु हुई गॉड पार्टिकिल की खोज

शिकागो के बटाविया की फर्मी लैब में लगी मेरी तस्वीर और उसके नीचे लिखा वाक्य – टॉप क्वार्क की अविष्कारक – मुझे लगातार कुछ और बेहतर करने को प्रेरित करता रहता है। मैं 1995 का वो पल नहीं भूल सकती जब फर्मी लैब की पार्टिकिल कोलाइडर मशीन में 20 अरब कणों की टक्कर से जब सिंगल टॉप क्वार्क्स कण पैदा हुए थे। ये अविश्वसनीय था, असाधारण, मानो कोई सपना सच हो गया हो। दुनियाभर के भौतिकशास्त्रियों ने परमाणु के नाभिक में मौजूद प्रोटान के भीतर टॉप क्वार्क की खोज पर कहा था कि इस खोज के बाद अब कुछ भी नामुमकिन नहीं रहा। अब आधुनिक भौतिक विज्ञान की धारा ही बदल जाएगी। 
सिंगल टॉप क्वार्क, हिग्स बोसॉन के जैसा ही एक सैद्धांतिक कण है। दरअसल 14 अरब साल पहले जब ऊर्जा के महाविस्फोट के बाद पदार्थ के शुरुआती कणों ने जन्म लिया तो उन कणों का गुण-धर्म तय करने वाले कई दूसरे अनजाने कण भी अस्तित्व में आ गए, मिसाल के तौर पर सिंगल टॉप क्वार्क और हिग्स बोसॉन। आधुनिक भौतिकी के सिद्धांत बताते हैं कि हिग्स-बोसॉन की मौजूदगी ने ही पदार्थ के कणों में वजन पैदा किया। लेकिन हिग्स बोसॉन इस कदर रहस्यमय हैं कि वैज्ञानिकों ने उन्हें गॉड पार्टिकिल यानि ईश्वरीय कणों का नाम दे रखा है। सिंगल टॉप क्वार्क कण की खोज के बाद पूरे भौतिक विज्ञान जगत का यकीन पुख्ता हो गया है कि वो गॉड-पार्टिकिल को भी खोज निकालने में कामयाब रहेंगे।
दरअसल, वैज्ञानिक एक सवाल पर हमेशा से बहस करते रहे हैं कि ब्रह्मांड की संरचनाओं, यहां तक कि इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन जैसे मूल अणुओं में मास यानि द्रव्यमान कहां से आता है। द्रव्यमान को बोलचाल की भाषा में हम वजन समझ लेते हैं लेकिन ये वजन से बिल्कुल अलग है। असल में जब द्रव्यमान पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति काम करती तो वजन पैदा होता है। मिसाल के लिए अगर हम चंद्रमा पर जाएं तो हमारे शरीर का द्रव्यमान वही रहेगा लेकिन उसका वजन कम हो जाएगा। वजह ये कि चांद पर गुरुत्वाकर्षण में कमी आने से हमारा वजन घट जाता है। भौतिक विज्ञान के मुताबिक पदार्थ में वजन का समावेश होता है हिग्स-बोसॉन यानि गॉड पार्टिकिल की वजह से, जो अब तक भौतिक वैज्ञानिकों की आंखों से बचता रहा है।
हिग्स बोसोन कण की खोज 1964 में ब्रिटिश भौतिकविद् पीटर हिग्स और भारतीय भौतिक विज्ञानी सत्येंद्रनाथ बोस ने की थी। 1924 में बोस ने एक सांख्यिकीय गणना का जिक्र करते हुए एक पत्र आइंस्टीन के पास भेजा था, जिसके आधार पर बोस-आइंस्टीन के गैस को द्रवीकृत करने के सिद्धांत का जन्म हुआ। इस सिद्धांत के आधार पर ही प्राथमिक कणों को दो भागों में बांटा जा सका और इनमें से एक का नाम बोसोन रखा गया जबकि दूसरे का नाम इटली के भौतिक वैज्ञानिक इनरिको फर्मी के नाम पर रखा गया। दशकों बाद 1964 में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने बिग बैंग के बाद एक सेकेंड के अरबवें हिस्से में ब्रह्मांड के द्रव्यों को मिलने वाले भार का सिद्धांत दिया, जो बोस के बोसोन सिद्धांत पर ही आधारित था। इसे बाद में 'हिग्स-बोसोन' के नाम से जाना गया। ये सिद्धांत न केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों को जानने में मददगार साबित हुआ बल्कि इसके स्वरूप को परिभाषित करने में भी मदद की।
गॉड पार्टिकिल के रहस्य का एक संक्षिप्त इतिहास है। 30 साल पहले वैज्ञानिकों ने समीकरणों की एक श्रृंखला बनायी थी, जिसे स्टैंडर्ड मॉडल कहा गया। इसके अनुसार मूलभूत कणों और बलों के संबंध से ब्रह्मांड की संरचना समझायी गयी थी। लेकिन मॉडल मे कुछ कमियां हैं। भौतिकी की यह फितरत रही है कि एक गुत्थी सुलझते ही दूसरी आ खड़ी होती है। जिसे सुलझाने के लिए फिर नए सिरे से खोज शुरू की जाती है। ऐसी ही एक गुत्थी है, पदार्थ में मौजूद भार के मामले में। समस्या ये थी कि कुछ कणों का भार होता है और कुछ का नहीं। मुख्य थ्योरी ये थी कि कण का भार इस बात पर निर्भर करता है कि वो रहस्यमयी हिग्स फील्ड के साथ किस प्रकार अंतरक्रिया करता है, क्योंकि ये फील्ड सारे अंतरिक्ष में फैला हुआ है। सिंगल टॉप क्वार्क कणों की खोज ने कई गुत्थियां हल कर दीं, और गॉड पार्टिकिल की खोज के नए दरवाजे खोल दिए।

-    डॉ. मीनाक्षी नारायण,प्रोफेसर, ब्राउन यूनिवर्सिटी
(लेखिका गॉड पार्टिकिल की खोज करने वाली वैज्ञानिकों की कोर टीम की महत्वपूर्ण सदस्य हैं)

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