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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

'पेल ब्लू डॉट....'


नासा ने खबर दी है कि 35 साल पहले अंतरिक्ष के सफर पर निकला स्पेसक्राफ्ट ‘वॉयेजर-1’ अब पृथ्वी से 17 अरब 96 करोड़ किलोमीटर से भी दूर जा चुका है। सौरमंडल को पीछे छोड़ गहन अंतरिक्ष में प्रवेश कर चुका ‘वॉयेजर-1’ मानव निर्मित ऐसा अकेला स्पेस प्रोब है जो धरती से सबसे दूर मौजूद है। 1990 में वॉयेजर-1 ने अपना प्राथमिक मिशन पूरा कर लिया था और सौरमंडल से बाहर जाने की तैयारी में था, ऐसे में डॉ. कार्ल सगान के अनुरोध पर नासा ने वॉयेजर-1 का कैमरा पृथ्वी की ओर मोड़ा और पृथ्वी की एक अनोखी तस्वीर ली। वॉयेजर-1 तब धरती से 6 अरब किलोमीटर दूर था और इस रिकार्ड दूरी से अंतरिक्ष के काले महासागर में पृथ्वी एक चमकीले नीले बिंदु की तरह नजर आ रही थी। 6 अरब किलोमीटर की दूरी से ली गई ये पृथ्वी की पहली और अंतिम तस्वीर है। डॉ. कार्ल सगान ने इस तस्वीर को देखा तो वो आध्यात्मिक-दार्शनिक विचारों से भर उठे और उन्होंने इस तस्वीर का नाम रखा ‘पेल ब्लू डॉट’ यानि गहरा नीला बिंदु। इस नाम का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने 1994 में प्रकाशित अपनी किताब का शीर्षक रखा – पेल ब्लू डॉट : ए विजन ऑफ द ह्युमन फ्युचर इन स्पेस। इस किताब में महान एस्ट्रोनॉमर डॉ. कार्ल सगान ने वॉयेजर-1 के कैमरे से ली गई पृथ्वी की इस तस्वीर पर अपने विचार गहराई से व्यक्त किए हैं, वो लिखते हैं –
अंतरिक्ष की इस गहनतम दूरी (6 अरब किलोमीटर) से पृथ्वी शायद कोई खास दिलचस्पी की चीज न लगे। लेकिन हमारे लिए, इसके मायने बिल्कुल अलग हैं। इस तस्वीर में नजर आ रहे इस नीले बिंदु को दोबारा देखिए। ये वहां है। ये हमारा घर है। ये हम हैं। हर वो शख्स जिससे हम मोहब्बत करते हैं, हर वो व्यक्ति जिसे हम जानते हैं, वो हर कोई जिसके बारे में आपने सुना है, वो हर इंसान जो कभी था, उन सबने इसी नीले बिंदु में अपनी उम्र गुजार दी। हमारी सारी खुशियां और तमाम दुख-मुसीबतें, विश्वास से भरे हजारों धर्म, मान्यताएं और आर्थिक नीतियां, हरेक शिकारी और शिकार, प्रत्येक हीरो और कायर, सभ्यताओं को जन्म देने वाला हरेक निर्माता और उन्हें नेस्त-नाबूद कर डालने वाला हरेक हमलावर, हर राजा और उनके गुलाम, प्रेम में डूबे सभी प्रेमी और प्रेमिकाएं, हरेक मां और हरेक पिता, उम्मीदों से भरा हरेक बच्चा, सभी अविष्कारक और खोजी, नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला प्रत्येक शिक्षक, भ्रष्टाचार में डूबा हरेक राजनेता, हरेक सुपरस्टार, सभी महान लीडर, हरेक साधु और पापी जिनसे मानव सभ्यता के इतिहास के पन्ने भरे हैं, वो सभी सूरज की किरण में तैर रहे धूल के एक कण जैसे नजर आ रहे इस नीले बिंदु में ही जीये और फना हो गए। इस अनंत ब्रह्मांड में पृथ्वी की हैसियत नगण्य है। अब उन सभी बर्बर हमलावरों और जनरल्स के बारे में सोंचिए, जिन्होंने इस बिंदु के सूक्ष्म से हिस्से पर कब्जे की हवस में इंसानियत को शर्मिंदा किया और खून की नदियां बहा डालीं। उस खौफनाक अत्याचार को याद कीजिए जो इस बिंदु के एक सिरे के लोगों ने दूसरे सिरे के लोगों पर किए (यहां डॉ. कार्ल सगान द्वितीय विश्व युद्ध की बात कर रहे हैं)। वो एक-दूसरे के प्रति किस तरह नासमझी से भरे हुए थे, वो एक-दूसरे को मार डालने के लिए कितने उतावले थे, एक-दूसरे के लिए उनकी नफरत कितनी गहरी थी। तमाम तड़क-भड़क और दिखावा, हमारा छिछला अहंकार, ये भ्रम कि ब्रह्मांड में हमें एक विशेष दर्जा हासिल है, इन सब बातों को इस तस्वीर में नजर आ रही नीले रंग की ये बिंदु चुनौती दे रही है। ब्रह्मांड के इस गहन अंधकार में हमारा ग्रह एक अकेले भटकते धूलकण के जैसा है। इस अनंत विस्तार में ऐसा कोई इशारा तक नहीं मिलता कि हमें खुद से ही बचाने के लिए कहीं से कोई मदद आएगी। अब तक पृथ्वी ही केवल ऐसी जगह है, जहां जिंदगी फल-फूल रही है। कम से कम निकट भविष्य में भी ऐसी कोई दूसरी जगह नहीं है, जहां हमारी मानव जाति रहने के लिए जा सके। हां, हम धरती से बाहर कुछ जगहों पर गए जरूर हैं, लेकिन अब तक हम कहीं बस नहीं सके हैं। अब आप इसे पसंद करें, या न करें, लेकिन इस वक्त तो पृथ्वी ही वो जगह है, जहां हम मौजूद हैं, जिंदगी आबाद है। ये कहा जाता है कि एस्ट्रोनॉमी या खगोल विज्ञान विनय प्रदान करने वाला और चरित्र निर्माण करने वाला अनुभव देता है। मानव अहंकार में निहित अज्ञानता को साबित करने के लिए संभवत: इस तस्वीर से बेहतर कोई दूसरा प्रदर्शऩ नहीं हो सकता।
मेरे विचार से, ये तस्वीर हमारी इस जिम्मेदारी को रेखांकित करती है कि हमें एक-दूसरे के प्रति कहीं अधिक नरमी और सहनशीलता के साथ पेश आना चाहिए, ताकि हम इस गहरे नीले बिंदु को, जो कि जिंदगी का एक अकेला घर है, इसे संरक्षित करने के साथ जीने के लायक बनाए रख सकें।

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

मंगल ग्रह पर जीवन की खोज


क्या बुध और शुक्र की तरह मंगल ग्रह भी बेजान है? या फिर धरती की तरह वहां भी जीवन का विकास हुआ और जिंदगी की धड़कन अब भी वहां गूंज रही है? ये सवाल विज्ञान की बड़ी गुत्थियों में से एक है। नासा का मार्स साइंस लैबोरेटरी मिशन इस गुत्थी को हल करने की दिशा में हमारी सबसे बड़ी पहल है। मार्स साइंस लैबोरेटरी मिशन जो क्यूरियोसिटी के नाम से भी लोकप्रिय है मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक लैंड करने के बाद मंगल की मिट्टी में जीवन की तलाश के अपने अभियान की शुरुआत कर दी है।
ऐसा नहीं है कि हरे रंग का कोई छोटा अजनबी मंगलवासी उत्सुकता में भरकर बस के आकार वाले हमारे रोबोट से हैलो कहने के लिए अपने किसी बिल से निकलकर सामने आ खड़ा होगा और ऐसा भी नहीं है कि क्यूरियोसिटी जब मंगल की मिट्टी के सैंपल लेगा तो उसमें केंचुए जैसे मंगल के जीव खोज लिए जाएंगे। तो फिर आखिर हम मंगल पर क्या खोज रहे हैं?  क्यूरियोसिटी का लक्ष्य क्या है? और किस चीज के मिलने की उम्मीद  में हम मंगल की मिट्टी खंगाल रहे हैं?
नासा के नए मिशन मार्स साइंस लैबोरेटरी या क्यूरियोसिटी के साथ हम मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिकों को खोज रहे हैं, जो उस लाल ग्रह पर हमारी पृथ्वी के जैसे जीवन या बैक्टीरिया जैसे उसके शुरुआती स्वरूप की मौजूदगी का सबसे बड़ा सबूत होगा। मंगल ग्रह पर जीवन के खोए सूत्रों की पहचान ही करीब एक टन की इस सबसे आधुनिक रोबोटिक लैबोरेटरी का लक्ष्य है। और हमें उम्मीद है कि मंगल की मिट्टी में हमें जीवन के कुछ ऐसे निशान मिल सकते हैं, जो शायद जीव विज्ञान के हमारे अब तक के ज्ञान से बाहर हों।
36 साल पहले मंगल ने पृथ्वी वासियों को बुरी तरह चौंकाया था। नासा का ऑरबिटर मिशन वाइकिंग-1 अपने बाद लांच किए जाने वाले लैंडर मिशऩ वाइकिंग-2 को लैंड कराने के लिए मंगल पर सही जगह की तलाश कर रहा था। तभी वो मंगल के साइडोनिया इलाके के ऊपर से गुजरा, वाइकिंग-1 ने वहां की एक ऐसी तस्वीर भेजी कि नासा वैज्ञानिकों के साथ सारी दुनिया चौंक उठी । मंगल की जमीन से एक विशाल इंसानी चेहरा आसमान की ओर देख रहा था। ये भावशून्य मानव चेहरा मंगल की जमीन पर दो मील के दायरे में फैला था। क्या मंगल ग्रह इस चेहरे के जरिए हम पृथ्वीवासियों को कोई संदेश दे रहा था?  मंगल पर मानव चेहरे की सनसनी ज्यादा वक्त तक कायम नहीं रह सकी, क्योंकि वैज्ञानिकों ने बाद में बताया कि ये मानव चेहरा मंगल का एक पठार है जो डूबते सूरज के साथ धूप-छांव के खेल की वजह से मानव चेहरे जैसा आभास दे रहा है। सनसनी भले ही खत्म हो गई ,लेकिन वाइकिंग-1 की ये तस्वीर, मंगल पर जीवन की तलाश का प्रतीक बन गई।

मंगल से आई उल्काएं

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 9 साल बाद का वक्त, अंग्रेज भारत पर अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे थे। उथल-पुथल से भरे राजनीतिक-सामाजिक हालात के बीच भारत के बिहार में गया जिले के करीब एक छोटे से कस्बे शेरघाटी में कुछ ऐसा हुआ कि वो उस वक्त के वैज्ञानिकों के बीच चर्चा का विषय बन गया। 25 अगस्त 1865 की एक शाम, शेरघाटी के आसमान पर गहरे बादल छाए थे और रुक-रुक कर बारिश का दौर जारी था, कि तभी तेज आवाज के साथ पूरा कस्बा कांप उठा, आवाज भी ऐसी मानो किसी ने आसमान चीर दिया हो। घबराए हुए लोग भागकर घर से बाहर आ गए और सैकड़ों निगाहें आसमान की ओर उठ गईं। लपटों से घिरा एक दहकता हुआ अग्निपिंड क्षितिज के एक ओर से दूसरी ओर बढ़ा चला जा रहा था। पुलिस की मदद लेकर कुछ हिम्मतवाले लोग सामने खेतों में उस जगह की ओर दौड़े जहां वो पिंड गिरा था। आसमान से एक बड़ी उल्का गिरी थी, जिसका वजन 5 किलो था, पुलिस ने उसे तुरंत कब्जे में लेकर कलेक्टर साहब को भिजवा दिया, जहां से वो उल्कापिंड लंदन पहुंचकर लंबे वक्त तक ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ाता रहा। वक्त बदला और विज्ञान की प्रगति के साथ वैज्ञानिकों की दिलचस्पी उस शेरघाटी उल्का में बढ़ी। आधुनिक युग में बकायदा उसकी रेडियोमीट्रिक डेटिंग वैज्ञानिक जांच की गई, तो पता चला कि इसका जन्म 4 अरब 10 करोड़ साल पहले मंगल ग्रह पर किसी ज्वालामुखी के लावे से हुआ था। मंगल ग्रह पर किसी विशाल उल्का के गिरने से उठी धूल और पथरीले मलबे के गुबार के साथ ये पत्थर भी मंगल ग्रह से छिटक कर संयोग से पृथ्वी, वो भी भारत के कस्बे शेरघाटी में आ गिरा था। पृथ्वी पर हमें मिली ये मंगल की सबसे पुरानी उल्का है। शेरघाटी उल्का की हाल की जांच से पता चला है कि इसमें कुछ ऐसे रासायनिक तत्व हैं जिनका संबंध किसी खास बैक्टीरिया से हो सकता है।
मंगल ग्रह से छिटके ऐसे पत्थरों के 34 नमूने अमेरिकन स्पेस एजेंसी नासा के पास सुरक्षित हैं। मंगल ग्रह से पत्थरों का छिटककर धरती पर आ गिरना कुदरत का दुर्लभ संयोग है और विज्ञान विशेषतौर पर मंगल ग्रह के अध्ययन के लिए ये नमूने किसी बेशकीमती खजाने से कम नहीं। ऐसी ही एक उल्का दिसंबर 1984 को अंटार्कटिक में वैज्ञानिकों की एक टीम को मिली थी। जब इसकी जांच की गई तो पता लगा कि ये उल्का करीब दो करोड़ साल पहले मंगल ग्रह से आई थी और खोजे जाने से पहले, यानि 11,000 साल तक अंटार्कटिक का बर्फ में पड़ी रही थी। इस उल्का का नाम रखा गया ALH84001 , नासा की लैब में जब इसकी जांच की गई तो इसमें एक खास तत्व मैगनेटाइट मिला, धरती पर कुछ खास बैक्टीरिया ही इस खास तत्व को बनाते हैं। जब इस उल्का को काटा गया तो इसमें एक ही आकार के ऐसे सूक्ष्म क्रिस्टल्स की लड़ी सी सजी मिली जो सीधे-सीधे किसी बैक्टीरिया की ओर इशारा कर रही थी। तो क्या मंगल ग्रह पर जीवन बैक्टीरिया के रूप में मौजूद है? इस सवाल की सनसनी पूरे विज्ञान जगत में महसूस की गई। नवंबर 2009 को नासा वैज्ञानिकों ने बताया कि अंटार्कटिक में मिली उल्का ALH84001 के सूक्ष्म जांच के बाद हम कह सकते हैं कि मंगल ग्रह पर कभी जीवन मौजूद था।
 
मंगल पर खोई जिंदगी की कड़ियां

जीने के क्रम में हर जीव रोज कचरा निकालता है, निर्जीव चीजें कचरा नहीं निकालतीं। जीवन का हर स्वरूप यहां तक कि बैक्टीरिया भी कचरे के रूप में कुछ ऐसे खास रसायन पीछे छोड़ता है, जो जीवन की तलाश में सूत्र का काम करते हैं। मंगल पर जिंदगी के कचरे, जीवन के इन्हीं खोए सूत्रों की तलाश ही क्यूरियोसिटी का मिशन है। अब तक हम जीवन के उस स्वरूप से ही परिचित हैं, जिसे हमने अपने चारोंओर, इस पृथ्वी के जल, थल और नभ में विचरते देखा है। धरती के भीतर बैक्टीरिया के रूप से लेकर पेड़-पौधे और सकल जीव जगत तक जिंदगी का हर रूप प्रमुख तौर पर केवल 4 तत्वों - हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कार्बन से संयोग से ही बना है। पृथ्वी पर निर्जीव और सजीव के साथ ये संपूर्ण सृष्टि केवल दो यौगिकों के रूप में हमारे सामने है, पहली इनऑर्गेनिक यानि अकार्बनिक यौगिक और दूसरी ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक। इनऑर्गेनिक यानि अकार्बनिक यौगिक का मतलब ऐसी चीजों से है जो कार्बन से नहीं बनीं, यानि जो जलने पर कोयले में नहीं बदल जातीं। ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक का अर्थ ऐसी सभी चीजों से है जो कार्बन से बनीं हैं और जलने पर वापस कार्बन यानि कोयले में बदल जाती हैं। इस धरती पर बैक्टीरिया से लेकर पेड़-पौधे और मछली, पंछी, मानव तक जिंदगी का हर स्वरूप कार्बन से बना है। हम पृथ्वी पर जिंदगी के जिन स्वरूपों से परिचित हैं वो सभी ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक हैं।

मंगल पर जिंदगी की खोज

मंगल पर जिंदगी के इसी जाने-पहचाने ऑर्गेनिक स्वरूप की खोज की कहानी शुरू होती है 1976 से जब नासा के वाइकिंग-2 मिशन ने मंगल ग्रह पर लैंड कर उसकी मिट्टी के नमूने पहली बार जांचे थे। वाइकिंग-2 ने अपनी  रोबोटिक आर्म के सिरे पर बनी चम्मच जैसी संरचना से मंगल की मिट्टी का नमूना उठाया और उसे अपने टेस्ट चैंबर में मौजूद कार्बन-14 न्यूट्रिएंट्स के साथ मिलाया। नासा के कंट्रोल रूम में मौजूद वैज्ञानिकों की टीम करोड़ों किलोमीटर दूर मंगल ग्रह पर हो रहे इस प्रयोग को दम साधे देख रही थी। वैज्ञानिकों की इस टीम में गिल्बर्ट लेविन भी मौजूद थे, लेविन और उनकी टीम ने मंगल पर जीवन की खोज करने वाले इस प्रयोग के उपकरणों को बनाया था, जिसे वाइकिंग अब मंगल पर आजमा रहा था। सबको इंतजार था वाइकिंग के नतीजों का।
वाइकिंग ने मंगल की मिट्टी के नमूने के परीक्षण का नतीजा नासा कंट्रोल रूम को भेजना शुरू किया और अगले ही पल गिल्बर्ट लेविन और उनकी टीम खुशी में भरकर चीख उठी और तमाम वैज्ञानिक अपनी सीटों से उठकर तालियां बजाने लगे। वाइकिंग बता रहा था कि उसने मंगल की मिट्टी से फूटती मीथेन गैस खोजी है। मंगल पर जिंदगी की तलाश की ये पहली कोशिश थी जिसका नतीजा पॉजिटिव था। मंगल पर मीथेन गैस का मिलना सीधे-सीधे इस ओर इशारा था कि वहां इस गैस को बनाने वाले बैक्टीरिया मौजूद हैं। वाइकिंग पर लगे गिल्बर्ट लेविन के उपकरणों ने शानदार काम किया था। मंगल पर जिंदगी की खोज के लिए इस खास प्रयोग की रूपरेखा तय करने वाले और महान एस्ट्रोफिजिसिस्ट डॉ. कार्ल सगान ने मंगल ग्रह पर जिंदगी के रासायनिक हस्ताक्षर की पहली खोज के लिए फोन करके गिल्बर्ट लेविन और उनकी टीम को बधाई दी।
खुशी में झूम रहे लेविन ने शैम्पेन मंगवाई, लेकिन वो बोतल खोली नहीं जा सकी, अगले ही पल सबके चेहरों के भाव बदल गए और कंट्रोल रूम में ठंडी खामोशी छा गई। क्योंकि वाइकिंग अब दूसरे उपकरण से परीक्षण के नतीजे भेज रहा था, जिसे मंगल पर ऑर्गेनिक कणों यानि कार्बन या उसके यौगिकों की पहचान करने के लिए वाइकिंग पर लगाया गया था। सबको यकीन था कि मीथेन की खोज के बाद मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक जरूर मिल जाएंगे, जो मंगल पर जीवन की मौजूदगी का सबसे बड़ा सबूत साबित होंगे। लेकिन वाइकिंग के दूसरे उपकरण के परीक्षण नतीजे निगेटिव थे। वाइकिंग के उपकरण मंगल की मिट्टी के नमूने में कार्बनिक यौगिकों यानि ऑर्गेनिक कंपाउंड्स को नहीं खोज सके। कार्बन नहीं तो जिंदगी भी नहीं। उस वक्त के नासा प्रमुख ने बयान जारी कर कहा कि वाइकिंग ने मंगल की मिट्टी का परीक्षण किया और वहां हमें जिंदगी का कोई निशान नहीं मिला।
 तो क्या गिल्बर्ट लेविन के उपकरणों के नतीजे गलत थे? 36 साल बाद अब भी गिल्बर्ट लेविन ये मानने को तैयार नहीं हैं। वाइकिंग मिशन के उस परीक्षण ने उनकी जिंदगी ही बदल कर रख दी। वाइकिंग पर लगे अपने उपकरणों के नतीजों को सही साबित करना और हर मंच पर पूरी जोरदारी के साथ ये कहना कि मंगल ग्रह पर जिंदगी मौजूद है, उनकी जिंदगी का लक्ष्य बन गया है। गिल्बर्ट मंगल पर जीवन के जिस रूप के मौजूद होने की वकालत कर रहे हैं, वैज्ञानिकों ने उसका नामकरण भी उनके नाम पर करते हुएगिलेविनिया स्ट्राटा रख दिया है। गिलेविनिया स्ट्राटा मीथेन बनाने वाला मंगल ग्रह का एक ऐसा बैक्टीरिया है, जिसपर गिल्बर्ट लेविन को तो यकीन है, लेकिन नासा को अभी उसकी खोज करनी बाकी है। 
मंगल पर नासा का नया मिशन मार्स साइंस लैबोरेटरी या क्यूरियोसिटी के लैंड होते ही गिल्बर्ट एक बार फिर सक्रिय हो उठे हैं। वो हर मंच पर पूरे यकीन के साथ कह रहे हैं कि क्यूरियोसिटी उन्हीं नतीजों की एक बार फिर पुष्टि करेगा जो वाइकिंग मिशन के साथ गए उनके उपकरणों ने 36 साल पहले भेजे थे। मंगल पर जीवन मौजूद है इस पर यकीन करने वाले गिल्बर्ट अकेले नहीं हैं, लॉस एंजिल्स की यूनिवर्सिटी आफ साउदर्न कैलीफोर्निया के सेल बायोलॉजिस्ट जो मिलर ने वाइकिंग के उस पुराने डेटा का फिर से विश्लेषण किया है और उनका मानना है कि मंगल की मिट्टी से फूटती मीथेन वहांसरकाडियन साइकिल यानि दिन और रात के चक्र पर आधारित जीव की ओर इशारा कर रही है, जिसका केवल एक ही मतलब है कि मंगल जिंदा है।
गिल्बर्ट नासा से मांग कर रहे हैं कि अगर क्यूरियोसिटी मंगल पर मीथेन खोज निकालती है तो 36 साल पुराने उनके वाइकिंग प्रयोग के डेटा की दोबारा जांच की जानी चाहिए। गिल्बर्ट कहते हैं, मंगल पर अब तक गए नासा के किसी भी मिशऩ ने वाइकिंग के मेरे प्रयोग के नतीजों का खंडन नहीं किया है। मुझे पूरा यकीन है कि मंगल की मिट्टी में ऑर्गेनिक यानि कार्बनिक यौगिक खोज निकालने में क्यूरियोसिटी कायमाब रहेगा। तब नासा को 36 साल पुराने वाइकिंग के नतीजों का फिर से विश्लेषण करना ही होगा।  
वॉशिंगटन में कार्नेगी इंस्टीट्यूट फार साइंस में भूवैज्ञानिक रॉबर्ट हैजेन कहते हैं, गिल्बर्ट के दावे आधारहीन नहीं हैं, वाइकिंग मिशऩ पर उनके उपकरणों के नतीजे चौंकानेवाले हैं, जिन्हें अब तक ठीक-ठीक समझने की कोशिश भी नहीं की गई है। वाइकिंग मिशन से पहले और काफी हद तक अब भी हम भोजन को पचाने वाले कार्बनिक जीवन को ही असली जिंदगी समझकर खोज रहे हैं। जबकि हो सकता है कि जीवन का एक अकार्बनिक रूप भी मौजूद हो। 

सोमवार, 27 अगस्त 2012

अलविदा कमांडर, फिर मिलेंगे, किसी और डायमेंशन में...


नील आर्मस्ट्रांग संपूर्ण मानवता के महानतम नायकों में से हैं। उनके निधन पर श्रद्धांजलि स्वरूप वॉयेजरनील आर्मस्ट्रांग का ये साक्षात्कार पुन: प्रकाशित कर रहा है, जिसे मिशन अपोलो-11 की 40 वीं वर्षगांठ के मौके पर लिया गया था। प्रस्तुत है चंद्रमा के सफर की तैयारियों और वहां की उजली जमीन पर लैंड करने के अनोखे अनुभव खुद कमांडर नील आर्मस्ट्रांग की जबानी -
मुझे याद है, जब मैं छोटा बच्चा था तो लकड़ी के एयरक्राफ्ट बनाया करता था। हवा में उड़ते और कलाबाजियां खाते प्लेन्स की वो तस्वीर मेरे दिमाग में अब भी ताजा है, जिन्हें मैंने बचपन में अपने पिता के साथ एयरशो में देखा था। हम सभी वाकई बड़े खुशनसीब हैं, कि कुदरत ने हमारे लिए वक्त का ऐसा दौर चुना जब इतिहास मानव जाति की तकदीर का फैसला कर रहा था। मैं उन सब लोगों का शुक्रिया अदा करता हूं, जिनकी मेहनत और लगन की वजह से अपोलो-11 कार्यक्रम मुमकिन हो सका और हम सब इतिहास के उस गौरवशाली पन्ने पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके।
मिशन अपोलो-11 नासा के अंतरिक्ष अभियानों के इतिहास का सबसे ज्यादा प्रचारित अभियान था। इसे लेकर लोगों की अपेक्षाएं बुलंदी पर थीं। अकसर लोग मुझसे पूछते हैं कि अभियान की तैयारी के दौरान मीडिया हाइप और लोगों की अपेक्षाओं को लेकर क्या मैं किसी तरह के मानसिक दबाव से गुजर रहा था? इसका जवाब मैं आज देता हूं, हमारे अभियान को लेकर बाहर की तमाम हलचल से मैंने पीठ मोड़ ली थी। मेरा पूरा ध्यान उन तीन से चार लाख लोगों की मिलीजुली मेहनत पर था, जो इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए दिन-रात काम में जुटे थे।
मेरा पूरा ध्यान इस मिशन की कामयाबी पर फोकस था, जिसके लिए इतने सारे लोग काम कर रहे थे। बाहर के तमाशे से मैंने खुद को दूर रखा, मेरे दिमाग में केवल यही बात थी कि प्रोजेक्ट अपोलो-11 के लिए काम कर रहा हर व्यक्ति, हर एसेंबलर कुछ न कुछ बनाने में जुटा था, लोग परीक्षण पर परीक्षण कर रहे थे और लैंडर का हर नट-बोल्ट कई-कई बार परखा जा रहा था। इस मिशन से जुड़े लाखों पुरुष और महिलाएं अपने काम को लेकर इतने आत्मविश्वास से भरे थे कि ये बाते आम थीं कि अगर कुछ गड़बड़ होई तो ये कम से कम हमारे काम की वजह से नहीं होगी। क्योंकि इन सैकड़ों-हजारों लोगों ने अपना काम जितना वो कर सकते थे, उससे बेहतर किया था और जब सारे लोग कुछ बेहतर काम करते हैं तो नतीजा अपने आप शानदार हो जाता है। इसीलिए मिशन अपोलो-11 कामयाब रहा था
जब मैं जॉनसन स्पेस सेंटर के मैन्ड स्पेसक्राफ्ट सेंटर में अपने मिशन का प्रशिक्षण ले रहा था, तो वहां का माहौल ऐसा था कि आप ये नहीं पूछ सकते थे कि बॉस छुट्टी कब होगी? पूरे जुनून के साथ जुटे लोग तब तक काम में जुटे रहते थे, जबतक कि वो पूरा नहीं हो जाता था। कोई अपनी कलाई घड़ी पर नजर नहीं डालता था कि वक्त क्या हुआ है? पाली खत्म होने की बेल बजती जरूर थी, लेकिन घर कोई भी नहीं जाता था। लोगों ने अपनी लगन से प्रोजेक्ट अपोलो-11 को दूसरे सरकारी कामकाजों से बिल्कुल जुदा बना दिया था। हर कोई इस प्रोजेक्ट में पूरी दिलचस्पी, लगन और उत्साह के साथ जुटा हुआ था। सबके दिलोदिमाग में बस यही बात थी कि हमें कामयाब होकर दिखाना है। ऐसे माहौल में मेरा पूरा ध्यान पूरी तरह से अपने मिशन पर टिका था। एडविन बज एल्ड्रिन और माइकल कोलिंस मेरे लिए अजनबी नहीं थे, जेमिनी और अपोलो के शुरुआती मिशन्स के दौरान हम पहले भी साथ काम कर चुके थे। हमारी टीम नासा के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों से लगातार नई-नई समस्याओं पर इंप्रोवाइज किया करते थे, कि अगर ये हो गया तो हम क्या करेंगे? अगर वो हो गया तो हमारा प्लान बी क्या होगा? जितनी मुसीबतों के बारे में हम सोच सकते थे, उन्हें सामने रख कर लंबी बहसें किया करते थे।
20 जुलाई 1969 को हमारा लैंडर ईगल चांद पर लैंड कर गया और अगले दिन 21 जुलाई को मैंने चंद्रमा पर पहले कदम रखे। लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मैंने पहले से सोचकर रखा था कि चंद्रमा पर उतरने के बाद मैं ये लाइनें बोलूंगा। मैं आज बताता हूं, मैंने पहले से कुछ भी सोचकर नहीं रखा था और न ही कोई तैयारी की थी, हां लैंडर की नौ कदमों वाली सीढ़ी से उतरते वक्त जरूर मेरे दिल में तेज हलचल चल रही थी और इसी बीच मुझे ...जाइंट स्टेप ऑफ मैनकाइंड, वाली लाइनें सूझ गईं। पूरी दुनिया के लिए ये बेहद खास मौका था। मेरे बाद बज एल्ड्रिन उतरे, लोग मुझसे ये भी पूछते हैं कि अपोलो-11 की ज्यादातर फोटोग्राफ्स में बज एल्ड्रिन ही नजर आते हैं, मैं क्यों नहीं? ऐसा इसलिए, क्योंकि चंद्रमा पर हमारे पास ज्यादा वक्त नहीं था और मैं ज्यादा से ज्यादा फोटोग्राफ्स लेने में जुटा था।
मिशन की तैयारी के दौरान विचार-विमर्श का एक लंबा दौर इस बात को लेकर भी चला कि चंद्रमा पर पहुंचकर हम क्या-क्या करेंगे। तमाम लोगों ने अपने-अपने सुझाव दिए। कुछ का कहना था कि हमें वहां यूनाईटेड नेशंस का झंडा लगाना चाहिए। तो वहीं कुछ लोग चाह रहे थे कि चंद्रमा पर कई देशों के छोटे-छोटे झंडे वहां लगाए जाएं। आखिर में ये फैसला लिया गया और मुझे लगता है कि कांग्रेस ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई कि अपोलो-11 कोई यूनाईटेड नेशंस का मिशन नहीं था और हम कोई वहां किसी मालिकाना हक का दावा करने नहीं जा रहे थे, लेकिन हम चाहते थे कि लोगों को पता चले कि हम यहां हैं, इसलिए हमने तय किया कि अपना राष्ट्रीय ध्वज ही वहां लगाएंगे। अमेरिका के झंडे को वहां लगाना मेरा काम था, चंद्रमा पर इसे लगाया जाना चाहिए या नहीं, इन बातों पर मेरा ध्यान बिल्कुल भी नहीं था। मुझे गर्व है कि अपने देश का झंडा चंद्रमा पर पहली बार मैंने लगाया।
चंद्रमा ने हमें कई तरह से हैरानी में डाल दिया। वहां की कई चीजों से मैं गहरे ताज्जुब में पड़ गया। सबसे ज्यादा हैरानी मुझे वहां के क्षितिज को देखकर हुई, धरती के मुकाबले चंद्रमा का क्षितिज हमारे बेहद करीब था। हमारे कदमों के साथ उड़ती चंद्रमा की धूल, जिसतरह उठकर वापस गिर रही थी, मैं उसे भी देखकर हैरान था। धरती पर आप धूल पर पैर पटकें तो वो उड़कर गुबार की शक्ल में छा जाएगी, लेकिन चंद्रमा पर ऐसा नहीं हो रहा था। हमारे पैर पटकने से धूल उठ रही थी लेकिन कोई गुबार सा नहीं बन रहा था। धरती पर धूल का गुबार वायुमंडल की वजह से बनता है, चंद्रमा पर वायुमंडल न होने से धूल हमारे पैरों के आसपास ही छिटक रही थी। चंद्रमा पर धूल तेजी से जमीन पर वापस गिरकर एक नई पर्त बना देती थी। ऐसा लगता था मानो इस धूल को एक हफ्ते पहले उडा़या गया था। ये वाकई हैरतंगेज था, मैंने ऐसा पहले कभी कुछ देखा-सुना नहीं था।
पब्लिक एड्रेस के दौरान लोग सवाल पूछते हैं कि क्या चीन की दीवार और मोंटाना के फोर्ट रेक डैम जैसी इंसानों की बनाई चीजें हमें चंद्रमा से नजर आ रही थीं या नहीं? ये सब अफवाह है और कुछ नहीं, चंद्रमा के क्षितिज से ऊपर हमें नीली पृथ्वी नजर आ रही थी। हमें महाद्वीप और ग्रीनलैंड दिख रहे थे। पृथ्वी लाइब्रेरी में रखे किसी ग्लोब के जैसी लग रही थी। हमें अंटार्कटिक नहीं दिखा, क्योंकि वो हिस्सा बादलों से ढंका था। पृथ्वी के घूमने के साथ हमें अफ्रीका साफ नजर आ रहा था। सूरज की किरणें किसी चीज से परावर्तित हो रहीं थीं, शायद चाड झील से हमने भारत और एशिया भी देखा। लेकिन हमें चंद्रमा से इंसान की बनाई चीन की दीवार या कोई दूसरी चीज नजर नहीं आई। हां, कई लोग ऐसी बातें करते हैं, लेकिन मैं अब तक किसी ऐसे अंतरिक्षयात्री से नहीं मिला जिसे अंतरिक्ष से मानव निर्मित दीवार या इमारतें दिखाई दी हों। यहां तक कि मैंने बाद में स्पेस शटल के साथ जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों से भी पूछा, लेकिन चीन की दीवार या कोई दूसरी चीज किसी को अंतरिक्ष से अब तक नजर नहीं आई है।
अंत में मैं अपनी पुरानी इच्छा व्यक्त करना चाहूंगा, मैं मंगल पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों के मिशन में शामिल होना चाहता हूं। मैं मंगल जाना चाहता हूं। मुझे लगता है, अब हम मंगल के सफर पर जा सकते हैं। हम मंगल को नजरअंदाज नहीं कर सकते, आज नहीं तो कल हमें मंगल पर जाना ही होगा।
- नील आर्मस्ट्रांग
कमांडर, मिशन अपोलो-11
( कमांडर नील आर्मस्ट्रांग के शब्दों में मिशन अपोलो-11 की यादें)

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

सत्य क्या है ?


बर्लिन से 24 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम की ओर हावेल नदी के तट पर बसा है जर्मनी के राज्य ब्रान्डेनबर्ग का मशहूर शहर पोस्टडैम। इसके करीब एक छोटा सा कस्बा है कापुत। कापुत की एक पहाड़ी की चोटी पर चीड़ के विशाल दरख्तों की झुरमुट के बीच लाल टाइल्स से चमकती लकड़ी के तख्तों और बल्लियों वाली छत और भूरे दरवाजों वाला एक मशहूर घर भी है। ये घर काफी खास है, क्योंकि ये घर है दुनिया के मशहूर गणितज्ञ और फिजिसिस्ट डॉ. अल्बर्ट आइंस्टीन का।
14 जुलाई 1930 दोपहर बाद, करीब 4 बजे गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर यहां की उन धूलभरी पगडंडियों पर गुजरे थे, जो आइंस्टीन के घर की तरफ जाती हैं। गुरुदेव ने उस दिन नीले रंग की हल्की पोशाक पहनी थी। उनका आधा मुड़ा एक हाथ पीठ पर था और सधे कदमों से थोड़ा आगे झुककर चलते हुए उन्होंने यहां आइंस्टीन के साथ कुछ चहलकदमी भी की थी।
गुरुदेव टैगोर और आइंस्टीन की ये एतिहासिक मुलाकात एक कॉमन फ्रेंड डॉ़. मेंडल के जरिए मुमकिन हुई थी। 14 जुलाई 1930 को टैगोर आइंस्टीन से मिलने कापुत की पहाड़ी पर मौजूद उनके घर गए। इस दोस्ताना सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आइंस्टीन डॉ. मेंडल के घर गए जहां गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर से उनकी दूसरी मुलाकात हुई। टैगोर और आइंस्टीन की ये दोनों मुलाकातें रिकार्ड की गईं और गुरुदेव-आइंस्टीन के फोटोग्राफ भी लिए गए। 
'वॉयेजर' अपने सुधी पाठकों के लिए,14 जुलाई 1930 को कापुत के घर में गुरुदेव और आइंस्टीन के बीच हुई पहली मुलाकात के दौरान हुई बातचीत का पूरा ब्योरा पहली बार हिंदी में पेश कर रहा है। बातचीत का ये पूरा ब्योरा जॉर्ज, एलन एंड अनविन की किताब द रिलिजन आफ मैन में प्रकाशित है।

गुरुदेव आप यहां दो आदि तत्वों, टाइम एंड स्पेस (हमने जानबूझकर इसका अनुवाद नहीं किया) के गणितीय समीकरणों को हल करने में व्यस्त हैं। जबकि मैं इस देश में व्यक्ति में निहित ईश्वरीय शाश्वतता और ब्रह्मांड पर व्याख्यान दे रहा हूं।
आइंस्टीन क्या आप इस दुनिया से परे ईश्वर की सत्ता में यकीन रखते हैं?
गुरुदेव नहीं, परे नहीं। मानव में बसी ईश्वरीय शाश्वतता इस ब्रह्मांड में समाई हुई है। ऐसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं है, जो मानव व्यक्तित्व का हिस्सा न हो। इसलिए ये साबित होता है कि ब्रह्मांड का सत्य ही मानव का सत्य है। 
आइंस्टीन ब्रह्मांड की प्रकृति के बारे में दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। पहली ये कि सृष्टि एक ऐसी इकाई है जो मानवता पर निर्भर करती है और दूसरी ये कि दुनिया एक ऐसी हकीकत है जिसपर मानव के होने या न होने का कोई असर नहीं। 
 गुरुदेव   जब ब्रह्मांड मानव के साथ एक लय एक तालमेल, एक शाश्वत संबंध बनाता है, तो इसी को सत्य कहते हैं और हम इसके सौंदर्य से अभीभूत हो जाते हैं। 
आइंस्टीन ब्रह्मांड को लेकर ये एक विशुद्ध मानवीय अवधारणा है।
गुरुदेव  हमारी दुनिया मानवीय दुनिया है, इसकी वैज्ञानिक अवधारणा भी वैज्ञानिक मानव की ही है। इसलिए हमसे परे किसी भी संसार का अस्तित्व नहीं है। वो एक सापेक्ष संसार है, जिसकी सच्चाई इस बात पर निर्भर होगी कि वो हमारी चेतना पर किस हद तक असर डालता है। कारण और आनंद के कुछ मानक हैं, जो इसे सत्य का स्वरूप प्रदान करते हैं। सर्वशक्तिमान ईश्वर का मानक भी यही है, जिसका अनुभव हम मानवों के अनुभवों के बगैर मुमकिन नहीं।
आइंस्टीन यही है, मानव अस्तित्व को अनुभव करना
गुरुदेव  हां, एक शाश्वत आध्यात्मिक अस्तित्व। हमें अपने कार्यकलापों और अपनी भावनाओं द्वारा इसे गहराई से अनुभूत करना चाहिए। हम उस सर्वशक्तिमान ईश्वर को अनुभूत करते हैं जो असीम और अनंत है और जो हमारी हर सीमा से परे है।
 साइंस का संबंध उन चीजों से है जो किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं। साइंस, हम जो अब तक समझ सके हैं उस सत्य का मानव रचित गैरव्यक्तिवादी संसार है। इसी सत्य की व्याख्या धर्म अपने तरीके से करता है और उसे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरतों से जोड़ देता है। सत्य को लेकर हमारी व्यक्तिगत चेतना एक सार्वभौमिक गौरव अर्जित कर लेती है। धर्म सत्य में नैतिकता का समावेश करता है और इसके साथ हम जितना तालमेल कायम करते हैं, उतनी ही गहराई से इसे समझते जाते हैं।          
आइंस्टीन – तो फिर सत्य, या सुंदरता क्या मानव से निरपेक्ष नहीं है?
गुरुदेव  नहीं, मैंने ऐसा नहीं कहा।
आइंस्टीन – अगर मानव सभ्यता खत्म हो जाए, तो क्या अपोलो बेलवेडेर की प्रतिमा खूबसूरत नहीं रहेगी ?
गुरुदेव  नहीं !
आइंस्टीन – सुंदरता के प्रति इस अवधारणा से मैं सहमत हूं, लेकिन ये बात सत्य पर लागू नहीं होती।
गुरुदेव  क्यों नहीं ? आखिर सत्य की अनुभूति भी मानव द्वारा ही होती है।
आइंस्टीन – मैं ये साबित नहीं कर सकता कि मेरी अवधारणा सही है, लेकिन मेरा मानना यही है।
गुरुदेव  मैं सुंदरता को इस तरह पारिभाषित करूंगा कि सार्वभौम ईश्वर में निहित एक बिल्कुल सही और आदर्श तालमेल। सार्वभौम चेतना की संपूर्ण समझ ही सत्य है। अपनी जाग्रत चेतना के माध्यम से, अपने अर्जित अनुभवों के जरिए, अपनी चूकों और दोषों के साथ हम मानव इस सत्य तक पहुंचने की कोशिश करते रहते हैं। इसके अलावा सत्य को हम और कैसे जान सकते हैं ?
आइंस्टीन – मैं साबित तो नहीं कर सकता, लेकिन मैं इस पाइथागोरियन अवधारणा में यकीन करता हूं कि सत्य मानव पर निर्भर या आश्रित नहीं है। मानव रहें या न रहें, इससे सत्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता वो पूरी तरह से मुक्त है। निरंतरता के तर्क की समस्या भी यही है।
गुरुदेव  सत्य, जो सार्वभौम है, ईश्वर के साथ एकाकार है, वो अनिवार्य रूप से मानव के लिए ही है। अन्यथा हम में से हर कोई सत्य के रूप में जो कुछ अनुभूत करता है, उसे सत्य कभी नहीं कहा जा सकता। कम से कम वो सत्य, जिसे वैज्ञानिक कहा जाता है, उस तक भी केवल तार्किक प्रक्रिया, या दूसरे शब्दों में कहें तो वैचारिक अंग जो कि मानवीय है, के जरिए ही पहुंचा जा सकता है। भारतीय दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही परम सत्य है, जिसे मानव मस्तिष्क न तो एकांतवास से समझ सकता है और न ही जिसकी व्याख्या शब्दों के जरिए संभव है। लेकिन उस परब्रह्म परमात्मा की अनंतता को आत्मसात करके, उसके साथ खुद को समाहित करके उस निरपेक्ष परम सत्य - ब्रहम् का अनुभव किया जा सकता है। लेकिन ऐसे सत्य का साइंस से कोई लेना-देना नहीं है। हम सत्य की जिस प्रकृति पर बातचीत कर रहे हैं, वो इस पर निर्भर है कि हमारे सामने वो किस रूप में प्रकट या उपस्थित होता है। या कहना चाहिए कि मानव मस्तिष्क को लगता है कि यही सत्य है, और इसीलिए ये मानव पर आश्रित है, और शायद इसे माया या भ्रम भी कहा जा सकता है।
आइंस्टीन – ये किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि संपूर्ण प्राणीजगत का भ्रम है।
गुरुदेव  संपूर्ण जीव प्रजातियां भी एक ही इकाई, मानव जाति से संबंध रखती हैं। इसीलिए संपूर्ण मानव मस्तिष्क एकसाथ एक ही सत्य का अनुभव करता है। ये वो बिंदु है जहां भारतीय और यूरोपियन मस्तिष्क एकसमान अनुभव से एकसाथ जुड़ जाते हैं।
आइंस्टीन – जर्मन में जीव प्रजाति शब्द का इस्तेमाल संपूर्ण मानव जाति, और यहां तक कि कपियों और मेंढकों के साथ सभी सजीवों को एकसाथ संबोधित करने के लिए किया जाता है। समस्या ये है कि क्या सत्य हमारी चेतना से निरपेक्ष, अप्रभावित और मुक्त है?
गुरुदेव  हम जिसे सत्य कहते हैं वो वास्तविकता के व्यक्तिपरक और वस्तुपरक पहलुओं के बीच विवेकपूर्ण साम्य में अंतरनिहित है, और ये दोनों ही सुपरपर्सनल पुरुष (ईश्वर) से संबंधित हैं।
 आइंस्टीन – रोजमर्रा की जिंदगी में हम अपने मस्तिष्क से कई ऐसे काम करते हैं, जिनके लिए हम जिम्मेदार नहीं होते। बाहर की वास्तविकताओं पर मस्तिष्क उससे निरपेक्ष रहकर प्रतिक्रिया करता है। उदाहरण के तौर पर इस घर में शायद कोई भी न हो, लेकिन तब भी वो मेज वहीं बनी रहेगी जहां वो है।
गुरुदेव  हां, वो व्यक्तिगत मस्तिष्क से बाहर तो बनी रहेगी, लेकिन यूनिवर्सल माइंड के बाहर नहीं। मेज वो चीज है जो हमारी चेतना द्वारा इंद्रियगोचर है।  
आइंस्टीन – अगर इस घर में कोई भी नहीं हो, तो भी वो मेज वहीं बनी रहेगी, लेकिन आपके दृष्टिकोण से ये पहले ही अनुचित है, क्योंकि हम ये व्याख्या नहीं कर सकते कि इसका क्या अर्थ है कि हमसे निरपेक्ष रहते हुए मेज वहां रखी है। सत्य के अस्तित्व के संबंध में हमारे सहज दृष्टिकोण की मानव जाति से परे न तो व्याख्या की जा सकती है और न इसे साबित किया जा सकता है, लेकिन ये ऐसा विश्वास है, जिसे कोई भी यहां तक कि छोटे से छोटा प्राणी भी छोड़ना नहीं चाहता। हमने सत्य को सुपरह्युमन ऑब्जेक्टिविटी के साथ प्रतिस्थापित कर रखा है। ये हमारे लिए परम आवश्यक है, इसका कोई विकल्प नहीं। ये वास्तविकता हमारे अस्तित्व, हमारे अनुभव और हमारे मस्तिष्क से निरपेक्ष या मुक्त है, हालांकि हम ये नहीं कह सकते कि इसका अर्थ क्या है।
गुरुदेव  किसी भी स्थिति में, अगर कोई ऐसा सत्य है जिसका मानवजाति से कोई सरोकार न हो, तो हमारे लिए ये पूरी तरह से अस्तित्वहीन है
आइंस्टीन – तब तो मैं आपसे भी कहीं ज्यादा धार्मिक और आस्थावान हो जाऊंगा
टैगोर – मेरे स्वयं के व्यक्तित्व में उस सुपरपर्सनल पुरुष - सार्वभौम आत्मा (ईश्वर), के साथ सामंजस्य, एक लय कायम करना ही मेरा धर्म है।

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

ये सृष्टि ईश्वर की नहीं, गॉड पार्टिकिल की रचना है


4 जुलाई 2012 का दिन हमेशा याद रखा जाएगा, क्योंकि इस दिन हमने अपने ज्ञान की अचंभित कर देने वाली ऊंचाई देखी, क्योंकि इस दिन पहली बार हमने पूरे तार्किक प्रमाणों के साथ जान लिया कि ये ब्रह्मांड-ये सृष्टि किसी ईश्वर की रचना नहीं, बल्कि फिजिक्स के नियमों के तहत काम करने वाले ऊर्जा कणों हिग्स-बोसॉन की रचना है। इस सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई? ये सवाल हमारे अस्तित्व जितना ही पुराना है। खुद को, इस जमीन और आसमान को और इस पूरी दुनिया और उससे परे ब्रह्मांड को समझने की हमारी चाह कितनी गहरी रही है इसका पता इस बात से चलता है कि विश्व की हर संस्कृति में सृष्टि की शुरुआत से जुड़े अलग-अलग और कमाल के मिथक मौजूद हैं। विज्ञान कभी अहंकार से भरे दावे नहीं करता, बल्कि विनम्रता के साथ उन नए तथ्यों को सामने लाता है, जो लगातार प्रयोगों के बाद सामने आते हैं। ये ब्रह्मांड किसने बनाया? इस सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई? वो असली रचनाकार कौन है? विज्ञान इन सवालों के जवाब 40 साल से ढूंढ़ रहा है। इसी क्रम में सत्येंद्रनाथ बोस और आइंस्टीन ने बोसॉन की अवधारणा सामने रखी। फिर पीटर हिग्स ने बोसॉन की प्रकृति से मिलते-जुलते ऊर्जा से दमकते एक अनोखे कण की बात कही, ये सैद्धांतिक कण इतना अनोखा था कि ये एक परमाणु से लेकर सूरज तक के वजन के लिए जिम्मेदार था। इसे हिग्स-बोसॉन कहा गया। हिग्स-बोसॉन की प्रकृति सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है, इसलिए एक पत्रकार ने इसका नाम गॉड पार्टिकिल रख दिया, बस फिर क्या था, दुनिया रोमांच से भर उठी और प्रयोगशालाएं गॉड पार्टिकिल की तलाश में जुट गईं। गॉड पार्टिकिल की तलाश में सबसे ज्यादा तेजी पिछले चार साल के दौरान देखी गई जब फिजिक्स की प्रमुख प्रयोगशालाओं फर्मी लैब, टेवेट्रॉन और सर्न में गॉड पार्टिकिल के निशान मिलने से एक नई सनसनी मचने लगी। गॉड पार्टिकिल की खोज का रास्ता दिखाने का श्रेय जाता है अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी की पार्टिकिल फिजिसिस्ट डॉ. मीनाक्षी नारायण को। डॉ. मीनाक्षी नारायण ने फर्मी लैब में 1995 में सिंगल टॉप क्वार्क की खोज करके साबित कर दिया था कि गॉड पार्टिकिल कोई काल्पनिक कण नहीं है और इसे खोजा जा सकता है। और फिर वो दिन भी आ गया जब, 4 जुलाई को सर्न में हुई एक खास प्रेस कांफ्रेंस में खुद पीटर हिग्स ने एक नए तरह के गॉड पार्टिकिल मिलने की घोषणा कर दुनिया को अचंभे में डाल दिया। अपने पाठकों के लिए वॉयेजर पेश करता है गॉड पार्टिकिल की खोज की कहानी खुद डॉ. मीनाक्षी नारायण की जबानी।


मुझे बेहद खुशी है कि मैं विज्ञान के इस ऐतिहासिक पल की साक्षी बनी। मुझे भारतीय होने का गर्व है कि मैं एक पार्टिकिल फिजिसिस्ट हूं और विज्ञान के भविष्य की दिशा तय करने में मैं भी एक छोटा सा योगदान दे सकी। 4 जुलाई, यानि अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस, लेकिन ये तारीख विज्ञान की दुनिया में एक अलग वजह के लिए याद रखी जाएगी। अज्ञानता के अंधेरे को पीछे छोड़कर ज्ञान की एक नई रोशनी की ओर कदम बढ़ाने के लिए। असतो मां ज्योतिर्गमय।
यूं तो गॉड पार्टिकिल की तलाश 40 साल पुरानी है और अगर सर्न की ही बात करें तो बीते 10 साल से वैज्ञानिक हिग्स-बोसॉन को तलाशने में जुटे थे। लेकिन पिछले तीन साल के दौरान जेनेवा की सर्न लैब में गॉड पार्टिकिल की खोज को लेकर गहमा-गहमी काफी बढ़ गई थी। दुनिया के अलग-अलग देशों से आई वैज्ञानिक टीम्स सर्न में मौजूद प्रोटॉन तोड़ने की मशीन लॉर्ज हैड्रॉन कोलाइडर के सीएमएस और एटलस डिटेक्टर्स में गॉड पार्टिकिल यानि हिग्स-बोसॉन को पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। ये एक लुका-छिपी के खेल जैसा था, कभी तो लगता कि बस हमने बाजी मार ली और कभी प्रयोग के अपने तौर-तरीकों पर ही संदेह होने लगता था।  
और आज वो दिन भी आ गया जब दुनिया के कोने-कोने से आए फिजिसिस्ट के साथ हम सर्न के ऑडिटोरियम में इन प्रयोगों के नतीजों के जाहिर होने का इंतजार कर रहे थे। हिग्स-बोसॉन की खोज परमाणु को समझने के हमारे स्टैंडर्ड मॉडल की वो खोई कड़ी है जिसके बगैर हम ब्रह्मांड की रचना के रहस्य को समझ नहीं सकते।
सर्न में जब खबर मिली कि 1960 में हिग्स-बोसॉन के सिद्धांत को विकसित करने वाले पीटर हिग्स को 4 जुलाई की घोषणा करने के लिए निमंत्रित किया गया है तो यहां मौजूद सभी वैज्ञानिकों के दिलों की धड़कनें तेज हो गईं। हालात ये थि के 3 जुलाई की रात से ही हॉल के बाहर लाइनें लगने लगीं और कई लोगों ने तो रात बकायदा दरवाजा खुलने के इंतजार में बिताई। पीटर हिग्स की मौजूदगी ने लोगों को संकेत दे दिया कि कुछ ऐतिहासिक घटने वाला है। और 4 जुलाई को जेनेवा में ठीक 9 बजे लोग जिस खबर का इंतजार कर रहे थे इसे जो इन्कैडेला ने सार्वजनिक कर दी, “We have observed a new boson… हमने एक बिल्कुल नए तरह का बोसॉन खोज निकाला है।”
सर्न के डायरेक्टर जनरल रॉल्फ ह्युर ने कहा, “I think we have it, We have discovered a particle that is consistent with a Higgs boson... मुझे लगता है कि हमने ढूंढ निकाला। हमने एक ऐसा पार्टिकल खोज निकाला है जो हिग्स-बोसॉन जैसा है।”
पार्टिकिल फिजिक्स में कोई नई खोज कितनी महत्वपूर्ण है, इसका निर्धारण एक खास पैमाने से किया जाता है, जिसे सिगमा कहते हैं। वन सिगमा का अर्थ है कि नतीजे डेटा में अचानक किसी उतार-चढ़ाव की वजह से हैं। थ्री सिगमा तक के नतीजों को ऑब्जर्वेशन का दर्जा दिया जाता है और 5 सिगमा के नतीजों को एक नई खोज का सम्मान प्राप्त होता है। 4 जुलाई को जिन नतीजों की घोषणा की गई है वो शुरुआती हैं, क्योंकि 2012 के प्रयोगों के डेटा का परीक्षण अब भी जारी है। एलएचसी के डिटेक्टर्स एटलस और सीएमएस के प्रयोगों से मिले डेटा की समीक्षा जुलाई के अंत तक पूरी होने की उम्मीद है। जहां तक 4 जुलाई की उदघोषणा का सवाल है तो इसमें हिग्स-बोसॉन जैसे कण के मिलने की बात कही जा रही है, उसके सिगनल 4.3 सिगमा से ऊपर नहीं गए हैं। इसका मतलब ये है कि इस प्रायोगिक नतीजे में हिग्स-बोसॉन यानि गॉड पार्टिकिल के वास्तव में मिलने की संभावना 99.996 प्रतिशत है, शेष 0.0004 प्रतिशत संभावना इस बात की भी हो सकती है कि ये सिगनल महज नॉइस हों। जबकि दूसरी ओर 5 सिगमा सिगनल को पार्टिकिल फिजिक्स में ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ की उपमा दी जाती है। किसी नई खोज की घोषणा तभी की जाती है जब सिगनल 5 सिगमा के जादुई स्तर को स्पर्श कर लेता है।
पिछले दो साल से हिग्स कणों के पकड़ने के लगातार संकेत मिल रहे थे। इसके बाद ये संकेत संभावित साक्ष्य में तब्दील हो गए और अब हमने एक प्रामाणिक खोज करने में सफलता हासिल कर ली है। अगर एलएचसी ने हिग्स पार्टिकिल के संकेत नहीं पकड़े होते तो गॉड पार्टिकिल को खोज निकालने में ये नाकामी, देसी भाषा में कहूं तो मॉडर्न फिजिक्स को उल्टा टांग देती। लेकिन फिजिसिस्ट कभी चैन से नहीं बैठते वो काफी खोजी होते हैं, इसलिए गॉड पार्टिकिल को खोजने में हाथ आई ये नाकामी भी उन्हें एक नए उत्साह से भर देती और वो किसी नए समीकरण की तलाश में ब्लैकबोर्ड पर व्यस्त हो जाते। लेकिन हिग्स को लेकर संदेह जताने वाले सभी लोगों के लिए सबूत सामने हैं, इस बात के प्रबल साक्ष्य हैं कि हिग्स-बोसॉन या गॉड पार्टिकिल कोई काल्पनिक सिद्धांत नहीं बल्कि एक ठोस हकीकत हैं और स्टैंडर्ड मॉडल बिल्कुल उतना ही सटीक है, जितना कि किसी फिजिसिस्ट को उस पर यकीन है।

- डॉ. मीनाक्षी नारायण
प्रोफेसर, ब्राउन यूनिवर्सिटी
(लेखिका गॉड पार्टिकिल की खोज करने वाले वैज्ञानिकों की कोर टीम की सदस्य हैं)

इस तरह शुरु हुई गॉड पार्टिकिल की खोज

शिकागो के बटाविया की फर्मी लैब में लगी मेरी तस्वीर और उसके नीचे लिखा वाक्य – टॉप क्वार्क की अविष्कारक – मुझे लगातार कुछ और बेहतर करने को प्रेरित करता रहता है। मैं 1995 का वो पल नहीं भूल सकती जब फर्मी लैब की पार्टिकिल कोलाइडर मशीन में 20 अरब कणों की टक्कर से जब सिंगल टॉप क्वार्क्स कण पैदा हुए थे। ये अविश्वसनीय था, असाधारण, मानो कोई सपना सच हो गया हो। दुनियाभर के भौतिकशास्त्रियों ने परमाणु के नाभिक में मौजूद प्रोटान के भीतर टॉप क्वार्क की खोज पर कहा था कि इस खोज के बाद अब कुछ भी नामुमकिन नहीं रहा। अब आधुनिक भौतिक विज्ञान की धारा ही बदल जाएगी। 
सिंगल टॉप क्वार्क, हिग्स बोसॉन के जैसा ही एक सैद्धांतिक कण है। दरअसल 14 अरब साल पहले जब ऊर्जा के महाविस्फोट के बाद पदार्थ के शुरुआती कणों ने जन्म लिया तो उन कणों का गुण-धर्म तय करने वाले कई दूसरे अनजाने कण भी अस्तित्व में आ गए, मिसाल के तौर पर सिंगल टॉप क्वार्क और हिग्स बोसॉन। आधुनिक भौतिकी के सिद्धांत बताते हैं कि हिग्स-बोसॉन की मौजूदगी ने ही पदार्थ के कणों में वजन पैदा किया। लेकिन हिग्स बोसॉन इस कदर रहस्यमय हैं कि वैज्ञानिकों ने उन्हें गॉड पार्टिकिल यानि ईश्वरीय कणों का नाम दे रखा है। सिंगल टॉप क्वार्क कण की खोज के बाद पूरे भौतिक विज्ञान जगत का यकीन पुख्ता हो गया है कि वो गॉड-पार्टिकिल को भी खोज निकालने में कामयाब रहेंगे।
दरअसल, वैज्ञानिक एक सवाल पर हमेशा से बहस करते रहे हैं कि ब्रह्मांड की संरचनाओं, यहां तक कि इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन जैसे मूल अणुओं में मास यानि द्रव्यमान कहां से आता है। द्रव्यमान को बोलचाल की भाषा में हम वजन समझ लेते हैं लेकिन ये वजन से बिल्कुल अलग है। असल में जब द्रव्यमान पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति काम करती तो वजन पैदा होता है। मिसाल के लिए अगर हम चंद्रमा पर जाएं तो हमारे शरीर का द्रव्यमान वही रहेगा लेकिन उसका वजन कम हो जाएगा। वजह ये कि चांद पर गुरुत्वाकर्षण में कमी आने से हमारा वजन घट जाता है। भौतिक विज्ञान के मुताबिक पदार्थ में वजन का समावेश होता है हिग्स-बोसॉन यानि गॉड पार्टिकिल की वजह से, जो अब तक भौतिक वैज्ञानिकों की आंखों से बचता रहा है।
हिग्स बोसोन कण की खोज 1964 में ब्रिटिश भौतिकविद् पीटर हिग्स और भारतीय भौतिक विज्ञानी सत्येंद्रनाथ बोस ने की थी। 1924 में बोस ने एक सांख्यिकीय गणना का जिक्र करते हुए एक पत्र आइंस्टीन के पास भेजा था, जिसके आधार पर बोस-आइंस्टीन के गैस को द्रवीकृत करने के सिद्धांत का जन्म हुआ। इस सिद्धांत के आधार पर ही प्राथमिक कणों को दो भागों में बांटा जा सका और इनमें से एक का नाम बोसोन रखा गया जबकि दूसरे का नाम इटली के भौतिक वैज्ञानिक इनरिको फर्मी के नाम पर रखा गया। दशकों बाद 1964 में ब्रिटिश वैज्ञानिक पीटर हिग्स ने बिग बैंग के बाद एक सेकेंड के अरबवें हिस्से में ब्रह्मांड के द्रव्यों को मिलने वाले भार का सिद्धांत दिया, जो बोस के बोसोन सिद्धांत पर ही आधारित था। इसे बाद में 'हिग्स-बोसोन' के नाम से जाना गया। ये सिद्धांत न केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्यों को जानने में मददगार साबित हुआ बल्कि इसके स्वरूप को परिभाषित करने में भी मदद की।
गॉड पार्टिकिल के रहस्य का एक संक्षिप्त इतिहास है। 30 साल पहले वैज्ञानिकों ने समीकरणों की एक श्रृंखला बनायी थी, जिसे स्टैंडर्ड मॉडल कहा गया। इसके अनुसार मूलभूत कणों और बलों के संबंध से ब्रह्मांड की संरचना समझायी गयी थी। लेकिन मॉडल मे कुछ कमियां हैं। भौतिकी की यह फितरत रही है कि एक गुत्थी सुलझते ही दूसरी आ खड़ी होती है। जिसे सुलझाने के लिए फिर नए सिरे से खोज शुरू की जाती है। ऐसी ही एक गुत्थी है, पदार्थ में मौजूद भार के मामले में। समस्या ये थी कि कुछ कणों का भार होता है और कुछ का नहीं। मुख्य थ्योरी ये थी कि कण का भार इस बात पर निर्भर करता है कि वो रहस्यमयी हिग्स फील्ड के साथ किस प्रकार अंतरक्रिया करता है, क्योंकि ये फील्ड सारे अंतरिक्ष में फैला हुआ है। सिंगल टॉप क्वार्क कणों की खोज ने कई गुत्थियां हल कर दीं, और गॉड पार्टिकिल की खोज के नए दरवाजे खोल दिए।

-    डॉ. मीनाक्षी नारायण,प्रोफेसर, ब्राउन यूनिवर्सिटी
(लेखिका गॉड पार्टिकिल की खोज करने वाली वैज्ञानिकों की कोर टीम की महत्वपूर्ण सदस्य हैं)