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शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

क्रायोजनिक टेक्नोलॉजी वाला छठा देश – भारत

नेट पर मैं कुछ रिपोर्ट्स देख रहा था, जीएसएलवी-डी3 का भारतीय अभियान धराशाई, अंतरिक्ष में बादशाहत की भारतीय उम्मीदों को झटका, स्वेदशी क्रायोजनिक इंजन की हवा निकली और भी न जाने क्या-क्या, बातें हैं, बातों का क्या।
मैं केवल इतना कहना चाहूंगा, कि न तो स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन की हवा निकली है और न ही जीएसएलवी-डी3 का भारतीय अभियान ही धराशाई हुआ है। क्रायोजनिक इंजन और इसकी टेक्नोलॉजी पर टिप्पणी नहीं की जा सकती, वो फेल नहीं माना जा सकता, क्योंकि बृहस्पतिवार की लांचिंग के दौरान क्रायोजनिक इंजन तो चालू ही नहीं हो सका और रहा सवाल जीएसएलवी-डी3 के भारतीय अभियान का तो हम बहुत जल्दी दुनिया को इस नाकामी की धूल झाड़कर दिखा देंगे। इसरो प्रमुख राधाकृष्णन ने 2010 बीतने से पहले ही देश से क्रायोजनिक इंजन वाले एक और अभियान की कामयाब लांचिंग की वादा कर लिया है, और हम इसे पूरा करके दिखा देंगे।
मैं बृहस्पतिवार की जीएसएलवी-डी3 लांचिंग के विवरणों पर नहीं जाऊंगा, क्योंकि अब ये बात सबको मालूम है। लांचिंग के 505 सेकेंड बाद जीएसएलवी-डी3 में तीसरे स्टेज पर लगा क्रायोजनिक इंजन बर्न ही नहीं हो पाया। इसके साथ लगे दो छोटे बर्नियर इंजन ऑन ही नहीं हो पाए। इन दो छोटे बर्नियर इंजन्स को ही ऑन होकर तीसरे स्टेज पर लगे क्रायोजनिक इंजन को बर्न करना था। धरती से 60 किलोमीटर से कुछ ऊंचाई पर जाने के बाद ही बर्न प्रक्रिया बंद हो गई और जीएसएलवी-डी3 दीपावली के किसी दग चुके रॉकेट की तरह नीचे गिरकर समंदर में समा गया।
मैं इस असफलता को कम करके नहीं आंक रहा, 330 करोड़ रुपये के मिशन पर पानी फिरना देश के लिए कोई आसान बात नहीं, लेकिन खास बात ये कि हमने गुणवत्ता से समझौता किए बगैर इस मिशन की लागत पर शुरुआत से ही अंकुश रखा। यही वजह है कि जीएसएलवी-डी3 की लांचिंग का फेल होना एक खेद की बात तो है, लेकिन निराशाजनक नहीं। इस मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों के लिए ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी पक्षी की देखभाल के बीच उसका बच्चा अपनी पहली उड़ान भरता है। हां, पहली उड़ान नाकाम रही इसका अर्थ केवल यही है कि अब हम पहले से ज्यादा अनुभवी हो गए।
श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेसपोर्ट पर 15 अप्रैल की सुबह जब जीएसएलवी-डी3 लांच की तैयारियां जारी थीं, तभी मेरे एक इंजीनियर साथी ने मजाक किया, जीएसएलवी एक बार फिर लांच पैड पर है। इसपर किसी वैज्ञानिक ने कहा कि क्या हुआ, तो उस इंजीनियर ने फिर मजाक किया, इसबार जीएसएलवी के साथ इनसेट 4 सी नहीं जीसैट-4 है। इस पर एक गहरी खामोशी छा गई, क्योंकि वो इंजीनियर मजाक में ही सही लेकिन जुलाई 2006 में हुए इनसेट-4 सी हादसे की ओर इशारा कर रहा था, उस वक्त लांच वेहेकिल जीएसएलवी-एफ02 था। शाम होते-होते ये मजाक एक दुखद हकीकत में बदल गया।
स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन हमने किस तरह बनाया इसकी कहानी बताते हुए मिशन डायरेक्टर जी. रवींद्रनाथ के चेहरे पर मुस्कुराहट भले ही कम हुई है, लेकिन उनकी आंखों की चमक बरकरार है। 19 साल तक हम उस टेक्नोलॉजी को विकसित करने में जुटे रहे जो दुनिया की सबसे गोपनीय और सबसे संवेदनशील टेक्नोलॉजी में से है। टनों वजनी संचार सेटेलाइट्स को 38 से 40 हजार किलोमीटर तक की ऊंची कक्षाओं यानि जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑरबिट में स्थापित करने के लिए हमें ऐसा लांच वेहेकिल चाहिए था जिसके तीसरे स्टेज में क्रायोजनिक इंजन फिट हो। क्रायोजनिक इंजन का अपना सामरिक महत्व भी है, इसलिए इसकी टेक्नोलॉजी कड़ी निगरानी में रहती है, और इसीलिए किसी ने हमसे सहयोग नहीं किया। तब हमने 1991 में अपना क्रायोजनिक इंजन बनाने का काम शुरू किया। ये वो वक्त था जब अमेरिका ने रूस पर दबाव डालकर उसे अपना क्रायोजनिक इंजन हमें देने से रोक दिया था।
क्रायोजनिक टेक्नोलॉजी में शून्य से 183 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे के तापमान पर तरल ऑक्सीजन और शून्य से 253 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे के तापमान पर तरल हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन खास बात ये कि इतने कम तापमानपर धातुएं भंगुर हो जाती हैं, इसरो में वैज्ञानिकों ने एक खास मिश्रधातु बनाई जो इतने कम तापमान को आसानी से झेल सकती थी। इतना ही नहीं हमने अपनी प्रयोगशालाओं में इस मिश्रधातु से बनने वाले क्रायोजनिक इंजन के लिए खास वेल्डिंग टेक्नोलॉजी और एक नए लुब्रीकेंट्स की भी इजाद की। इसलिए जब 19 साल की मेहनत के बाद हमने प्रयोगशाला में इसका सफल परीक्षण कर लिया तो दुनियाभर की आंखें फटी रह गईं। जीएसएलवी-डी3 का परीक्षण दुनिया के लिए कितना महत्वपूर्ण था, इस लांच को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की गहमा-गहमी से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
भले ही जीएसएलवी-डी3 की उड़ान पूरी नहीं हुई, लेकिन क्रायोजनिक इंजन की टेक्नोलॉजी हमारे हाथ में है और अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और चीन के बाद हम इस टेक्नोलॉजी वाले छठे देश बन चुके हैं।

डॉ. बी.आर.गुरुप्रसाद
वैज्ञानिक, इसरो

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