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मंगलवार, 15 मार्च 2011

जानिए, कैसे बनती है न्यूक्लियर रिएक्टर में बिजली


11 मार्च को 9 की तीव्रता वाले भूकंप और फिर सुनामी की तबाही झेलने के बाद जापान अब न्यूक्लियर इमरजेंसी का सामना कर रहा है। 11 मार्च से 15 मार्च यानि केवल चार दिनों में जापान के तीन रिएक्टर्स भारी धमाके के साथ फट चुके हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिरोशिमा पर एटम बम गिराए जाने के 66 साल बाद जापान के लोग एक बार फिर रेडिएशन के खतरे से सहमे नजर आ रहे हैं। इस मौके पर वॉयेजर जापान की आपबीती और नाभिकीय पावर प्लांट टेक्नोलॉजी पर जानकारियों की एक श्रृंखला पेश कर रहा है। इस सिलसिले में आप टोक्यो से डॉ. राबर्ट गेलर के अनुभव पहले ही पढ़ चुके हैं, अब पेश है न्यूक्लियर रिएक्टर से जुड़ी एक आधारभूत जानकारी -  
न्यूक्लियर रिएक्टर
न्यूक्लियर रिएक्टर वो मशीन है जिसमें नियंत्रित चेन रिएक्शन करवाकर गर्मी पैदा की जाती है। जिसका इस्तेमाल बिजली को बनाने में किया जाता है। मौजूदा वक्त में दुनियाभर में सेकेंड जेनेरेशन के न्यूक्लियर रिएक्टर्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। जापान में 11 मार्च को 9 की तीव्रता वाले जबरदस्त भूकंप और सुनामी के बाद दुर्घटना का शिकार हुए फुकुशिमा पावर हाउस के रिएक्टर्स भी सेकेंड जेनेरेशन के ही हैं। परंपरागत पावर हाउस में फॉसिल फ्यूल यानि कोयले, तेल या फिर गैस का इस्तेमाल पानी को खौलाने और भाप बनाने में किया जाता है, जबकि न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम जैसे रेडियोएक्टिव पदार्थ के अणुओं को तोड़कर एक नियंत्रित चेन रिएक्शन शुरू करवाया जाता है, जिससे बहुत ज्यादा गर्मी पैदा होती है। ये चेन रिएक्शन रिएक्टर के भीतर करवाया जाता है, जहां सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है। आइए समझते हैं कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स काम कैसे करते हैं। 
कैसे काम करते हैं रिएक्टर 
रिएक्टर में सबसे पहले संशोधित यूरेनियम की 12 फुट लंबी और आधे इंच मोटी छड़ों के बंडल बनाए जाते हैं, जिसे फ्यूल एसेंबली कहते हैं। इस फ्यूल एसेंबली को पानी से भरे 8 इंच मोटी स्टील की चादर से बने कंटेनर में डुबा दिया जाता है। इसी को रिएक्टर का कोर कहते हैं। इस वक्त हम नाभिकीय ऊर्जा से बिजली बनाने के लिए मुख्य रूप से दो रिएक्टर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं - बॉयलिंग वाटर रिएक्टर और प्रेशराइज्ड वॉटर रिएक्टर।
बॉयलिंग वाटर रिएक्टर
सबसे पहले देखते हैं कि बॉयलिंग वाटर रिएक्टर में बिजली कैसे बनती है। बॉयलिंग वाटर रिएक्टर में चेन रिएक्शन यानि अणुओं के टूटने से पैदा हुई गर्मी से पानी को खौलाया जाता है। जिससे पैदा हुई भाप से टरबाइन चलती है और जेनेरेटर में बिजली बनती है। लेकिन वो भाप बेकार नहीं जाती, उसे ठंडाकर फिर से पानी में बदलकर वापस रिएक्टर के कोर में भेज दिया जाता है।
प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर
 अब जायजा लेते हैं प्रेशराइज्ड वाटर रिएक्टर का। जापान के फुकुशिमा न्यूक्लियर रिएक्टर्स भी प्रेशराइज्ड वाटर टेक्नोलॉजी पर ही आधारित हैं। इसमें बिजली बनाने का तरीका थोड़ा सा अलग है। इसमें सबसे पहले रिएक्टर के कोर में मौजूद प्रेशराइज्ड टैंक में चेन रिएक्शन से गर्मी पैदा की जाती है। लेकिन पानी को खौलने नहीं दिया जाता, भले ही पानी का तापमान कितना भी ऊंचा क्यों न चला जाए। इस दहकते हुए पानी को हजारों छोटी पाइप्स से गुजारा जाता है, जहां पानी को भाप में बदल जाने की इजाजत मिलती है। नतीजे में हमें बेहद दबावयुक्त भाप की तेज धारा मिलती है। इस प्रेशराइज्ड भाप की ताकत से टरबाइन चलती है और जनेरेटर बिजली बनाने लगता है। टरबाइन से निकलने वाली भाप एक कंडेसर में ठंडी की जाती है, जिससे पानी बनता है, जिसे फिर से रिएक्टर कोर में फिर से गर्माकर भाप बनाई जाती है और ये प्रकिया चलती रहती है। 
रिएक्टर पर नियंत्रण 
रिएक्टर को जरूरत से ज्यादा गर्म होने से रोकने के लिए चांदी, इंडियम, कैडमियम, बोरॉन, कोबॉल्ट और ऐसे ही कई दूसरे पदार्थों की कंट्रोल रॉड्स बनाई जाती हैं, जो फ्यूल एसेंबली बंडल के यूरेनियम रॉड्स में चेन रिएक्शन को आगे बढ़ाने वाले न्यूट्रॉन्स को सोख लेते हैं। इसके साथ ही कंट्रोल रॉड्स रिएक्टर से छिटकने वाले दूसरे रेडियोएक्टिव अणुओं को भी खुद में समेट लेते हैं। इन कंट्रोल रॉड्स को यूरेनियम की छड़ों के साथ फ्यूल बंडल्स में डाला जाता है। जब ऑपरेटर रिएक्टर में ज्यादा गर्मी पैदा करना चाहता है, तो वो इन कूलेंट रॉड्स को बाहर खींच लेता है और जब रिएक्टर को ठंडा करने की जरूरत होती है, तब इन कंट्रोल रॉड्स को फिर से भीतर डाल दिया जाता है। इन कंट्रोल रॉड्स की मदद से रिएक्टर को बंद भी किया जाता है। 
कूलेंट और मॉडरेटर 
बिजली बनाने के दौरान रिएक्टर को थोड़े-थोड़े वक्त पर ठंडा करना जरूरी होता है। इसके लिए खास कूलेंड और मॉडरेटर्स का इस्तेमाल किया जाता है। आमतौर पर हैवी वाटर का इस्तेमाल कूलेंट के तौर पर किया जाता है जबकि सामान्य पानी और खास पिघले नमक का इस्तेमाल मॉडरेटर के तौर पर किया जाता है। ये कूलेंट और मॉडरेटर रिएक्टर कोर को चारो ओर से घेरे छोटी-छोटी पाइप्स में दौड़ते रहते हैं। जापान में आए भूकंप से फुकुशिमा रिएक्टर के कूलेंट पाइप टूट गए थे,जिससे रिएक्टर का कोर ठंडा नहीं हो सका। 
न्यूक्लियर इमरजेंसी 
हादसे की स्थिति में सारा ध्यान इस बात पर होता है कि रिएक्टर कोर को जल्दी से जल्दी ठंडा किया जाए और भीतर पैदा हो रहे दबाव और गर्मी को रिएक्टर से बाहर निकाला जाए। लेकिन इस दौरान ध्यान ये रखा जाता है कि कोई भी रेडियोएक्टिव अणु कोर से बाहर न छिटकने पाए और रेडिएशन वातावरण में लीक न होने पाए। 
न्यूक्लियर रिएक्टर बिजली बनाने का सबसे सुरक्षित और असरदार साधन हैं। इंटरनेशनल एटॉमिक इनर्जी एजेंसी के मुताबिक दुनियाभर में 439 रिएक्टर काम कर रहे हैं और आने वाले वक्त में इनकी तादाद और भी बढ़ेगी। लेकिन जापान में हो रहे रिएक्टर हादसों ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को रिएक्टर की डिजाइन्स में कुछ और सुधार करने की जरूरत का एहसास दिला दिया है। 

4 टिप्‍पणियां:

  1. न्यूक्लियर रिएक्टर की कार्य-प्रणाली पर अति उत्तम सरल सुगम जानकारी।
    आभार

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  2. बढियां समझाया आपने -सचमुच एक कुशल लोकप्रिय विज्ञान लेखक हैं आप !

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  3. i can not copy this article so please send the copy it via email: kpjajodia@gmail.com

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