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शुक्रवार, 25 मार्च 2011

‘उम्मीद कभी खत्म नहीं हो सकती’


 ऐसे समाज में जहां ज्यादा घबराहट और उथल-पुथल होती है, ज्योतिषियों की जरूरत भी वहीं सबसे ज्यादा होती है प्रो. यशपाल 
जमाना कभी किसी एक चीज का नहीं होता। विज्ञान बड़ा है, तो टेक्नोलॉजी और भी बड़ी, अब तो टेक्नोलॉजी के बगैर जिंदगी सोची भी नहीं जा सकती। लेकिन अब लोगों ने टेक्नोलॉजी को ही साइंस मान लिया है। साइंस ज्ञान है, उत्सुकता है, हमेशा कुछ नया तलाशने की बेचैनी है, जागरूकता है, जबकि टेक्नोलॉजी साइंस का प्रायोगिक रूप। बीते 200 साल में साइंस ने समाज पर असर तो डाला, लेकिन लोगों ने साइंस का मतलब नई-नई मशीनों और नई-नई सुविधाओं को ही समझा। इसलिए समाज भी यांत्रिक होता गया, जिसमें ज्ञान की गहराई, प्रकृति के नियमों को समझने और जागरूक होने की जरूरत खत्म होती चली गई। लोगों को हम साइंस का सही अर्थ नहीं समझा सके। शुरुआत में इंसान ने आसमान को देखा तो सैकड़ों-हजारों तारे छिटके नजर आए। फिर उसने देखा कि कुछ तारे हिलते हैं-चलते हैं, वो अपनी जगह पर नहीं रहते और कुछ वक्त बाद वो फिर से वापस आ जाते हैं। इस तरह ग्रहों की खोज हुई, ये विज्ञान का शुरुआती रूप था। ग्रह केवल खोजे ही नहीं गए बल्कि हमारे पूर्वजों ने सही-सही ये भी बता दिया कि कितने ग्रह हैं  और उनकी स्थिति क्या है ? लेकिन बाद में इसे ज्योतिष से जोड़ दिया गया।
विज्ञान और हम दो चीजें हैं। चीजों को समझने की हममें कितनी क्षमता है, इसका भी फर्क पड़ता है। मुझे तो हैरानी होती है कि हमने इतने सारे सवाल पूछे और कुछ के जवाब मिलने भी लगे। क्या कमाल की जिंदगी हमें मिली है, आंखें हैं जिनसे देख सकते हैं, दिमाग है जिससे सोच-समझ सकते हैं। हर वक्त कुछ नया जानने की उत्सुकता और प्रकृति के रहस्यों को समझने की शक्ति जो हमें मिली है, इससे बड़ी चीज और कुछ हो ही नहीं सकती। बच्चे भी उत्सुकता के चलते ही सीखते हैं, उत्सुकता न हो तो वो चलना भी न सीख पाएं, और अगर ये उत्लुकता ही मर जाए-खत्म कर दी जाए तो मानव जाति का इससे बड़ा नुकसान कोई दूसरा नहीं हो सकता। मुझे दुख होता है कि हम और हमारे स्कूल बच्चों को इस तरह से पढ़ाते हैं कि उनकी उत्सुकता को मारते जाते हैं। ये बहुत अफसोसनाक है। समझने की कोई सीमा नहीं, ये कहना कि हमने सबकुछ जान लिया है और हम जैसा कह रहे हैं वैसा ही करो, ये बिल्कुल नहीं होना चाहिए। नए सवालों की खोज बेहद जरूरी है, अगर खुदा या ईश्वर है तो फिर उसके दिमाग में क्या था ? खुदा या ईश्वर इस तरह से क्यों बना ? किसी दूसरी तरह से क्यों नहीं ? क्या कोई दूसरा भी है, जिसे हम देख नहीं पाते ?
हमारी जो समझने की सीमा है, वो बड़े कमाल की है। हम कितने लंबे हैं, शायद डेढ़ या दो मीटर, अब इसे दस-दस बार गुणा करते जाएं तो ब्रह्मांड तक जा पहुंचेंगे और अगर दस-दस बार के गुणन में हम पीछे जाएं तो अणु के स्तर तक जा पहुंचेंगे। ब्रह्मांड और अणु, हम इनके बीच में फंसे हैं। हम अभी जानते ही कितना हैं ? ऐसे में ये दावा कि हम भविष्यवाणी कर सकते हैं काफी हास्यास्पद है। भविष्य का हाल बताने वाले हम होते कौन हैं ? ये मान लेना कि चीजें वहीं तक सीमित हैं, जो हम समझ पाए हैं, ये तो ज्यादती है।
सत्य किताबों में पढ़ लेना और सत्य की खोज करना दो अलग-अलग चीजें हैं। अगर आप जनरल तरीके से डिस्क्राइब करें तो कुछ भी कह सकते हैं। प्राचीन ज्ञानियों में एक अनोखी ताकत थी, वो बेहद सीमित तथ्यों की मदद से अंदाजा लगा लेते थे। अंदाजा लगाना बड़े काम की चीज है। विज्ञान केवल उपकरणों का मापन और गणना भर नहीं है। परिकल्पना और अंदाजा लगाना भी विज्ञान है। अगर आपमें उत्सुकता न हो, कल्पना न हो तो आप प्रकृति के कई रहस्यों को समझने से महरूम रह जाते हैं। सत्य की तलाश में जितना आनंद है, इसमें जितनी कविता है, इसमें एक किस्म की जो गहरी लगन है, उतनी किसी और चीज में नहीं।
किसी से पूछा गया कि विज्ञान क्या है ? तो जवाब मिला - जो वैज्ञानिक करते हैं। क्यों ? कैसे ? क्या ? इन सवालों की खोज, और यही क्यों, कुछ और क्यों नहीं ? इसकी खोज ने मानव जाति को गुफाओं से निकालकर आज यहां तक पहुंचाया है। विज्ञान एक शिल्प है और वैज्ञानिक शिल्पकार।
विज्ञान एक प्रकृति का दर्शन यानि नेचुरल फिलॉसफी है। विज्ञान में कोई सिद्धांत जिसे गलत न साबित किया जा सके उसे सिद्धांत ही नहीं माना जाता। गैलीलियो एक बच्चे की तरह था, उस वक्त जो बातें बताई जा रहीं थीं, उन्होंने उसे नहीं माना। उसने कहा आओ करके देखें तो सही, क्या नतीजा निकलता है। इसी बच्चों जैसी उत्सुकता से ही गैलीलियो और न्यूटन बनते हैं।
मां अपने बच्चे को प्यार करती है, ये बड़ी सुंदर चीज है। किसी ने मां से कहा नहीं कि बच्चे को प्यार करो, लेकिन जिंदगी खुद को बचाना चाहती है, खुद को प्रसारित करना चाहती है। 50-60 हजार साल पहले कुछ ऐसा हुआ कि पूरी दुनिया में बस मुश्किल से हजार लोग बचे। ये हजार लोग इधर-उधर बिखर गए और दुनिया के अलग-अलग इलाकों में जाकर आबाद हुए। इससे अलग-अलग समाजों, भाषाओं और संस्कृतियों का विकास हुआ, सामाजिक नियम बने। फिर वो सभ्यताएं मिलीं, भले ही इसकी वजह जंग रही हो लेकिन उनमें संपर्क हुआ। इससे हमने कला, संस्कृति, संगीत और परंपराएं सींखीं। हमारे विकास की सबसे मजेदार बात ये कि हमने हंसना सीखा।
पहले हम खुद को ही सबकुछ समझते थे और नहीं समझ पाते थे कि ये अलग-अलग समाज क्यों हैं ? लेकिन अब हम समझ चुके हैं कि मानव जाति का विकास इसी तरह से होना था।  लेकिन फिरभी, आजकल एक तरह का तनाव है। दुनियाभर में फैली विभिन्नताओं और संस्कृतियों को बचाने और संरक्षित रखने के बजाए हम उन्हें अपना दुश्मन समझने लगे हैं। हम दूसरों के दुश्मन और हमलावर क्यों मानते हैं ? हम शिक्षा और ज्ञान की बात करते हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात ये होनी चाहिए कि हम दुनियाभर की सांस्कृतिक विभिन्नताओं का आनंद लें। सांस्कृतिक अलगाव जातिभेद, वर्गभेद, पंथभेद, रंगभेद और इस जैसी दूसरी चीजों को जन्म देता है जो मानव के खिलाफ जाती हैं। विज्ञान हमें बताता है कि हमारी विरासत क्या है ? हम कहां से आए हैं ? विज्ञान की इस देन को हम अब तक लोगों को समझा ही नहीं सके।
धर्म को लेकर अब काफी झगड़ा किया जा रहा है। धर्म से जुड़े सवालों पर मैं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ये कहूंगा कि आप किन चीजों को धर्म कहते हैं ? क्या तमाम कर्मकांडों को ? तो फिर मैं बौद्ध और जैन धर्म का नाम लूंगा, जहां भगवान की अवधारणा ही नहीं है। सदाचार और नैतिकता के कुछ नियमों को मिलाकर धर्म की बुनियाद तैयार की गई, इनमें अध्यात्म भी शामिल था। प्राचीनकाल में धार्मिक दार्शनिकों ने बहुत गहरे-गहरे सवाल पूछे, इनमें से कुछ सवाल अब वैज्ञानिक भी पूछते हैं। इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश शुरू हुई और धर्म अपने रास्ते पर आगे बढ़ा। फंडामेंटल का मतलब है कि कुछ है और उसे बदला नहीं जा सकता, तो इससे मुश्किलें आती हैं। दुनिया बदल रही है, सब चीजें बदल रही हैं, जो चीज कभी न बदले, मेरे विचार से वो खतरे में है। कोशिश हो रही है कि चीजें बिल्कुल न बदलें, इससे बड़ी घबराहट और मुश्किलें आ रही हैं। धर्म वो भी है, जैसा कहा जाता है अहम् ब्रह्मास्मि, कि खुदा या ईश्वर को मैंने बनाया। इसे वैज्ञानिक ढंग से भी कहा जा सकता है कि खुदा या ईश्वर की जरूरत थी इसलिए बनाया। 
शुरुआत में बहुत सी चीजें समझ में नहीं आतीं थीं। ये समझ में नहीं आता था कि वो अमीर क्यों है और मैं गरीब क्यों ? तो फिर पिछले जन्म और कर्म का हिसाब सामने आया। विज्ञान ने कई सवालों के जवाब दिए, लेकिन जिनके जवाब नहीं मिले वो काम धर्म की चादर ओढ़कर पूरा हो गया। अब इसे लेकर झगड़े की जरूरत नहीं, बहुत से धार्मिक लोग बहुत उम्दा इंसान होते हैं। उनका खुद पर पूरा मियंत्रण रहता है वो बहुत नैतिक भी होते हैं। धर्म भी इंसान की विरासत है और विज्ञान भी हमारी विरासत है।
ये कहना कि किताब में लिखा है इसलिए यही सही है और कुछ दूसरा सत्य हो ही नहीं सकता ये गलत है। ये कहना कि यही मानो, यही सही है , ऐसा ही होना चाहिए, ये सही नहीं है। विज्ञान इस तरह से काम नहीं करता। ऐसे समाज में जहां ज्यादा घबराहट और उथल-पुथल होती है, ज्योतिषियों की जरूरत भी वहीं सबसे ज्यादा होती है।
उम्मीद कभी खत्म नहीं हो सकती। बहुत संभव था कि 65-70 में परमाणु युद्ध छिड़ जाता, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ। तो कुछ तो फर्क पड़ा है, शायद ऐसा कभी न हो। शायद और परमाणु परीक्षण भी न हों। एक से बढ़कर एक पागल बैठे हुए हैं, नाभिकीय हथियार इकट्ठा किए जा रहे हैं। कभी-कभी खुद पर हंसी भी आती है। हमारे देश में भी बातें होती हैं कि बम बनाने का हक खत्म हो जाएगा तो हम भी खत्म हो जाएंगे। तो मैं सोंचता हूं कि ये हक खत्म ही हो जाए, हमारा भी और साथ वाले का भी। ये कहना कि वो हमें तीन बार मार सकते हैं और हम केवल दो बार ही उन्हें मार सकते हैं, इसलिए हमें और बम बनाना चाहिए, ये बेवकूफाना है, ये पागलपन है।
जिंदगी को संभालने और उसे विकास के नए रास्तों पर आगे बढ़ाने का नाम ही विज्ञान है। समाज, रिश्तों और जीवन पद्धति के ज्ञान को विज्ञान में पिरो दीजिए, फिर देखिए दुनिया ही बदल जाएगी।
( प्रोफेसर यशपाल से हुई एक लंबी बातचीत पर आधारित)

प्रस्तुति : संदीप निगम

6 टिप्‍पणियां:

  1. धन्यवाद ! प्रोफेस्सर यशपाल से हुयी इस बातचीत को हम तक पहुचाने के लिए ! प्रोफ यशपाल जी को मै दूरदर्शन के कार्यक्रम टर्निंग पॉइंट से जनता रहा हूँ. दुख है कि अब टर्निंग पॉइंट जैसा कोई भारतीय विज्ञान आधारित कार्यक्रम नहीं आता.

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  3. आभार, प्रोफेसर यशपाल जी के यह सुलझे विचार हम तक पहुँचाने के लिये।

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  4. प्रोफ़ेसर यशपाल से रूबरू कराने के लिए धन्यवाद. जब वे कहते हैं कि धर्म भी मनुष्य की विरासत है, तो लगता है कि वे सही मायनों में हमारे प्राचीन रिषी हैं, जो आध्यात्मिक और उतने ही वैज्ञानिक भी होते थे. बचपन में "पराग" में उनका साक्षात्कार पढा था. तब से उनका प्रशंसक हूं. हाल ही में शिक्षा नीति पर उनसे दूरभाष पर चर्चा का अवसर भी मिला. आपने उनसे मुलाकात कराई. आपका आभार.
    - विवेक गुप्ता

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