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शनिवार, 23 जुलाई 2011

मानव अंतरिक्ष अभियान, नई मंजिलों की तलाश में


नासा के स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद मानव अंतरिक्ष अभियान अब नई मंजिलों की तलाश में है । दिसंबर 1972 का अपोलो-17 वो आखिरी मिशन था जो  अंतरिक्षयात्रियों को अंतिम बार चंद्रमा पर ले गया था । इसके बाद अपोलो-18, 19 और 20 मिशन रद्द कर दिए गए क्योंकि स्काईलैब को अंतरिक्ष भेजना था। अपोलो मिशन के बाद स्काईलैब के साथ पृथ्वी की कक्षा में मानव का दखल शुरू हुआ । लेकिन पृथ्वी की कक्षा में मानव की स्थाई मौजूदगी के युगों पुराने सपने को साकार कर दिखाया स्पेस शटल  अभियानों ने । स्पेस शटल यानि अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष ले जाने वाला ऐसा अनोखा स्पेस ट्रांसपोर्टेशन सिस्टम (एसटीएस) स्पेसक्राफ्ट जिसे रॉकेट की तरह लांच किया जाता था और जो एयरक्राफ्ट की तरह लैंड करता था । अंतरिक्ष के सफर के लिए ऐसा शानदार और बार-बार इस्तेमाल किए जा सकने वाला वाहन अब तक दुनिया में कोई दूसरा नहीं है।

21 जुलाई 2011 को भारतीय समय के अनुसार दोपहर 3 बजकर 21 मिनट पर अंतिम स्पेस शटल अटलांटिस की फाइनल लैंडिंग के साथ ही मानव अंतरिक्ष अभियानों का एक गौरवशाली अध्याय पूरा हो गया। स्पेस शटल ने मानव जाति को धरती से बाहर अंतरिक्ष में एक नए घर की सौगात दी है और वो है इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन । मानव सभ्यता के पूरे इतिहास में ये सबसे बड़ी युगांतरकारी घटना है। 15 अलग-अलग देशों और दुनिया की 5 बड़ी स्पेस एजेंसियों की भागीदारी से स्पेस स्टेशन का सपना साकार हुआ है और इसी के साथ हमने सबके साथ मिल-जुलकर रहने और अंतरिक्ष में  मानवता के विकास के लिए काम करने की नई तमीज सीखी है, आने वाले वक्त में यही बात मानव जाति का भविष्य तय करेगी और ये सब कुछ संभव हो सका है पिछले 30 साल के दौरान हुए नासा के स्पेस शटल की एक के बाद एक उड़ानों से । एक भारतीय होने के नाते ये बात मुझे विचलित करती है कि मौका मिलने के बावजूद हम इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के सदस्य देशों में शामिल नहीं हो सके। माधवन नायर जब इसरो के प्रमुख थे तब स्पेस स्टेशन के अभियान में भारत के भी शामिल होने की बात चल रही थी। सब कुछ ठीक था और भारत को स्पेस स्टेशन में भागीदारी करने वाले 16 वें और अकेले एशियाई देश होने का गौरव मिलने ही वाला था कि तभी अज्ञात कारणों से हम ये सम्मान नहीं पा सके।
स्पेस शटल के साथ इस पूरे मिशन से जुड़ी कई परंपराएं भी अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गईं। स्पेस शटल मिशन पर जाने वाले अंतरिक्षयात्रियों को स्पेससूट पहनाने से लेकर शटल के कॉकपिट में उन्हें सीट पर बिठाने और उनकी बेल्ट कसने तक का सारा काम वो साथी अंतरिक्षयात्री करते थे, जिन्हें या तो अगले मिशन में लांच होना होता था, या फिर जिनका चयन बैकअप क्रू के तौर पर किया गया होता था । स्पेस शटल मिशन के सातों अंतरिक्षयात्री जब स्पेससूट पहनकर स्पेस शटल की ओर चलते थे, तो कमांडर सबसे आगे चलता था और वो रास्ते में पड़ने वाली अंतिम चौखट को जरूर छूता था । सौभाग्य की कामना वाली ये परंपरा कैसे शुरू हुई ये बताना मुश्किल है, लेकिन कमांडर के बाद पीछे आ रहे सभी अंतरिक्षयात्री भी अपने हाथ ऊपर उठाकर उस अंतिम चौखट को जरूर छूते थे । अंतरिक्षयात्रियों को स्पेस शटल तक ले जाने के लिए हर बार जो खास बस आती थी उसका रंग हमेशा रजत यानि सिल्वर होता था ।  स्पेस शटल मिशन को सफलता से संचालित कतरने और अंतरिक्षयात्रियों को सुरक्षित वापस ले आने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती थी फ्लाइट डायरेक्टर  की जो अपनी टीम के साथ नासा के ह्युस्टन कंट्रोल रूम से मिशन की कमान संभालते थे । परंपरा ये थी कि स्पेस शटल की लांचिग से ठीक पहले फ्लाइट डायरेक्टर मिशन के बैच वाली एक खास जैकेट पहनते थे, और ये जैकेट तभी उतारी जाती थी जब अंतरिक्षयात्री सकुशल वापस आ जाते थे । इसके अलावा स्पेस शटल भी तब तक लांच नहीं किया जाता था, जब तक कि ह्युस्टन कंट्रोल रूम से फ्लाइट डायरेक्टर शटल कमांडर से हल्का-फुल्का मजाक कर के उन्हें सुरक्षित सफर की शुभकामनाएं नहीं दे देता था। इन सबके अलावा सबसे शानदार परंपरा थी पृथ्वी की कक्षा में मौजूद अंतरिक्षयात्रियों के लिए रोज सुबह बजाई जाने वाली वेक-अप कॉल । स्पेस शटल मिशन के दौरान ह्युस्टन मिशन कंट्रोल रूम रोज सुबह वेक-अप कॉल  यानि अंतरिक्षयात्रियों की पसंद के खास गीत स्पेस शटल में बजाता था । वेक-अप कॉल के साथ ही स्पेस शटल में एक नए दिन की शुरुआत होती थी । अंतरिक्षयात्रियों के लिए बजाए जाने वाले ये वेक-अप कॉल्स सार्वभौम मानव संस्कृति , कला और विज्ञान के अनूठे संगम का सबसे अदभुत उदाहरण हैं।  जब कल्पना चावला अंतरिक्ष में थीं तब कंट्रोल रूम ने उनकी पसंद के वेक-अप कॉल्स में रविशंकर का संगीत और आबिदा परवीन की गजल बजाई थी। ये परंपराएं अब हमेशा याद आएंगी।
नासा के बेड़े में 6 स्पेस शटल थे, जिनमें से एक इंटरप्राइज केवल परीक्षण के लिए बनाया गया था, और पांच दूसरे स्पेस शटल  कोलंबिया, चैलेंजर, डिस्कवरी, अटलांटिस और एंडेवर का इस्तेमाल अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने के लिए किया गया ।  12 जुलाई 1981 को कोलंबिया की टेस्ट फ्लाइट के साथ स्पेस शटलों की उड़ानें शुरू हुई थीं । 1981 में जॉन यंग और रॉबर्ट क्रिपेन शटल कोलंबिया पर सवार हो कर अंतरिक्ष में गए थे । 2 दिन छह घंटे के मिशन में पृथ्वी के 36 चक्कर लगाए गए । तब से अब तक स्पेस शटल 80 करोड़ किलोमीटर का सफर तय कर चुके हैं और इनमें सवार हो कर 350 लोग अंतरिक्ष की सैर कर चुके हैं ।  लेकिन स्पेस शटल उड़ानों को दो बड़ी दुर्घटनाओं के लिए भी याद रखा जाएगा। पहली स्पेस शटल दुर्घटना  28 जनवरी 1986 को हुई,  जिसमें कई स्कूली बच्चे अपनी टीचर क्रिस्टी मैकऑलिफ और छह दूसरे अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में जाते देखने के लिए कैनेडी स्पेस सेंटर में जमा हुए थे । चैलेंजर शटल उड़ान भरने के 73 सेकेंड बाद ही हादसे का शिकार हो गया और सारे यात्री मारे गए । इसके करीब दो दशक बाद 1 फरवरी 2003 को दूसरी बड़ी स्पेस शटल दुर्घटना सामने आई जब स्पेस शटल कोलंबिया पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करते हुए हादसे का शिकार हो गया । इसी हादसे में भारत में जन्मी नासा की महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला भी मारी गईं।
इन हादसों ने शटल उड़ानों पर फिर से विचार करने के लिए वैज्ञानिकों को मजबूर किया और तब तय किया गया कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का निर्माण पूरा होते ही नासा अपने बेड़े के तीनों स्पेस शटल्स को रिटायर कर देगा। स्पेस स्टेशन का निर्माण पूरा हो चुका है और अटलांटिस की फाइनल लैंडिंग के साथ नासा ने अपने स्पेस शटल्स भी रिटायर कर दिए हैं।
नासा के स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद अब निजी कंपनियां ऐसे स्पेसक्राफ्ट्स को बनाने में जुटी हैं जो पृथ्वी के आस पास के ग्रहों और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन तक का सफर तय कर सकेंगे। जब तक ये स्पेसक्राफ्ट  तैयार नहीं हो जाते अमेरिकी वैज्ञानिकों को अपने मानव मिशन के लिए रूस के सोयूज अंतरिक्ष यान पर निर्भर रहना होगा ।
स्पेस शटल के युग की समाप्ति के बाद नासा करोड़ों डॉलर की बचत करने में कामयाब हो जाएगा, लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू भी है। फ्लोरिडा स्थित नासा के स्पेस सेंटर में काम करने वाले हजारों कामगार, इंजीनियर, वैज्ञानिक और अंतरिक्षयात्री बेरोजगार हो जाएंगे। नासा का कहना है कि आगे जब भी कभी अंतरिक्ष यात्रा की जरूरत पड़ेगी, तब इसमें रूसी, यूरोपियन और जापानी रॉकेट के साथ-साथ निजी कंपनियों की मदद ली जाएगी। जाहिर है अब भविष्य में नासा  अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों के विस्तार के लिए इन्हीं देशों की  यानों पर निर्भर हो जाएगा। पिछले कुछ वर्षो से नासा ने धीरे-धीरे स्पेस शटल कार्यक्रमों में लगे 17 हजार कर्मचारियों में कमी करता रहा है। अब इसमें मात्र सात हजार कर्मचारी हैं, लेकिन नासा के स्पेस युग की समाप्ति के बाद ये सात हजार लोग भी बेरोजगार हो जाएंगे। मंदी से जूझ रहे अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है।

भारत का स्पेस शटल कार्यक्रम

चंद्रयान के बाद से ही इसरो मानव अंतरिक्ष अभियान की तैयारियों में जुटा है। नासा के स्पेस शटल की तर्ज पर इसरो भी ऐसे स्पेसक्राफ्ट को विकसित कर रहा है, जिसे अंतरिक्षयात्रियों को अंतरिक्ष भेजने और उन्हें सुरक्षित वापस लाने के लिए बार-बार इस्तेमाल किया जा सके। नासा स्पेस शटल बेड़े के रिटायर हो जाने के बाद अब अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ी निजी कंपनियां अपनी तकनीकी महारत के लिए बेसब्री से नया बाजार तलाश रही हैं। ऐसे में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में इन कंपनियों को खासी संभावनाएं नजर आ रही हैं। इसलिए अमेरिकी कंपनियां मानव अंतरिक्ष मिशन और भारतीय स्पेस शटल विकसित करने की योजनाओं पर काम कर रहे इसरो को लुभाने में लगी है।
इस कड़ी में बीते दिनों बोइंग डिफेंस, स्पेस एंड सिक्यूरिटी ने इसरो को लांच एस्केप सिस्टम देने की पेशकश की है जिसके सहारे आपात स्थितियों में अंतरिक्ष यान का चालक दल सुरक्षित वापस लौट सकता है। भारत के साथ तकनीकी सहयोग की संभावनाएं तलाशने के लिए कुछ दिन पहले बोइंग के अधिकारियों ने इसरो अध्यक्ष के.राधाकृष्णन से मुलाकात की है। इसरो पांच साल के भीतर अंतरिक्ष में मानव अभियान भेजने की तैयारी कर रहा है। इसरो कार्यक्रम के मुताबिक करीब 300 किमी ऊपर धरती के निचले परिक्रमा पथ में दो या तीन चालक दल वाला अभियान 2015-16 के बीच भेजा जाना है। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. भारत को तो हमेशा झटका दिया जाता है और यहाँ के गुलाम मानसिकता वाले लोग हैं भी बहुत हद तक इस लायक।

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  2. स्वतन्त्र विज्ञान के लिए यह एक बुरा समाचार है। स्वतन्त्र विज्ञान से मेरा तात्पर्य बीना की लाभ हानी की चिंता किये नयी खोजों, आविष्कारो के लिए कार्य करना। नासा एक सरकारी संस्थान है जो कि बिना किसी लाभ हानी की चिंता किये कार्य करता है लेकिन सरकारी संस्थानों की अन्य समस्याए जैसे लाल फीता शाही, अकुशल योजना प्रबंधन जैसी समस्याए यहाँ भी है। पिचले कुछ वर्षो से नासा राजनितिज्ञो में अलोकप्रिय होते जा रहा है , वह अपने बजट के अनुसार परिणाम नहीं दे पा रहा है । मंदी के इस दौर में नासा के बजट पर भी असर पड़ा है, उसकी कई महत्वाकांक्षी परियोजनाए रद्द की जा चुकी है। जिसमे प्रोजक्ट ओरीयान भी शामिल है । यह प्रोजेक्ट नयी पीढी के राकेट विकसीत करने का था जो अंतरिक्ष शटल का स्थान लेता ।

    लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहीये कि नासा जिस क्षेत्र में कार्य करता है, उस क्षेत्र में असफलता की संभावना ज्यादा होती है । इस क्षेत्र में 4 में से एक अभियान असफल होता है, नासा का कार्य प्रशंशनीय है। आशा है कि अमरीकी राजनेता राजनीती और सस्ती लोकप्रियता से दूर हट कर हथियारों के बजट में कमी करें और उसे नासा की और मोड़े। नासा ऐसे भी उन्हें अंतरिक्ष से जासूसी में मदत करता है।

    अब इस क्षेत्र में अमरीका ने नीजी कम्पनीयों का दरवाजा खोल दिया है, इससे अंतरिक्ष पर्यटन सस्ता होगा। लेकिन नयी खोजो और आविष्कारो का रास्ता रूक जाएगा! निजी कंपनीयां अपनी योजनाएँ नयी खोज या आविष्कारो की जगह सिर्फ और सिर्फ अपने लाभ पर केंद्रित करेंगी! लाभ की इस होड़ मे मंगल पर मानव के अवतरण का सपना और कितने दशकों बाद पूरा होगा, कह पाना मुश्किल है। पता नही कि कोई और वायेजर अंतरिक्ष यात्रा के लिए जा पायेगा? इन यानो से कोई तात्कालिक व्यावसायिक लाभ नही है!

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