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रविवार, 25 अप्रैल 2010

नर्मदा की सैर को आते थे एलियन !


नर्मदाघाटी के प्रागैतिहासिक शैलचित्रों के शोध में जुटी एक संस्था ने रायसेन से करीब 70 किलोमीटर दूर घने जंगलों के शैलाश्रयों में मिले प्राचीन शैलचित्रों के आधार पर अनुमान जताया है कि प्रदेश के इस हिस्से में दूसरे ग्रहों के प्राणी "एलियन" आए होंगे। संस्था का मानना है कि आदि मानव ने इन शैलचित्रों में उड़नतश्तरी की तस्वीर भी उकेरी है। पत्थर पर दर्ज आकृति नर्मदा घाटी में नए प्रागैतिहासिक स्थलों की खोज में जुटी सिड्रा आर्कियोलाजिकल एन्वॉयरन्मेंट रिसर्च, ट्राइब वेलफेयर सोसाइटी के पुरातत्वविद् मोहम्मद वसीम खान के अनुसार ये शैलचित्र रायसेन जिले के भरतीपुर, घना के आदिवासी गांव के आसपास की पहाडियों में मिले हैं। इनमें से एक शैलचित्र में उड़नतश्तरी (यूएफओ) का चित्र देखा जा सकता है। इसके पास ही एक आकृति दिखाई देती है, जिसका सिर एलियन जैसा है। यह आकृति खड़ी है। जैसा देखा, वैसा बनाया संस्था के अनुसार प्रागैतिहासिक मानव अपने आस-पास नजर आने वाली चीजों को ही पहाड़ों की गुफाओं, कंदराओं में पत्थरों पर उकेरते थे। ऎसे में सम्भव है कि उन्होंने एलियन और उड़नतश्तरी को देखा हो। देखने के बाद ही उन्होंने इनके चित्र बनाए होंगे। रायसेन के पास मिले शैलचित्र आदिमानव के तत्कालीन जीवन शैली से भी मेल नहीं खाते। खान के अनुसार कुछ इसी तरह के चित्र भीम बैठका और रायसेन के फुलतरी गांव की घाटी में भी मिले हैं। सबसे बड़ा रहस्य दूसरे ग्रहों पर भी जीव होने के अनुमान के आधार पर दुनियाभर में एलियन के अस्तित्व पर शोध हो रहे हैं। विभिन्न देशों में कई बार दूसरे ग्रहों से आने वाली उड़नतश्तरी (अनआइडेंटिफाइड फ्लाइंग ऑब्जेक्ट) देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। इसके अलावा, कई बार एलियन को भी देखे जाने के दावे किए जाते रहे हैं। हालांकि, वैज्ञानिक तौर पर अब तक एलियन या उड़नतश्तरी का अस्तित्व साबित नहीं हो पाया है। और शोध की जरूरत इन शैलचित्रों ने शोध की नई और व्यापक सम्भावनाओं को जन्म दिया है। इनका मिलान विश्व के अनेक स्थानों पर मिले शैलचित्रों से भी किया जाएगा। खान का अनुमान है कि दूसरे ग्रहों के प्राणियों का नर्मदाघाटी के प्रागैतिहासिक मानव से कुछ न कुछ संबंध जरूर रहा है। यह संबंध किस प्रकार का था इस पर शोध जारी है। पुरासम्पदा का खजाना कुछ दशक पूर्व जियोलॉजिस्ट डॉ. अरूण सोनकिया ने नर्मदाघाटी के हथनौरा गांव से अति प्राचीन मानव कपाल खोजा था। उसकी कार्बन आयु वैज्ञानिकों ने साढ़े तीन लाख वर्ष बताई है। नर्मदाघाटी का क्षेत्र कई पुरासम्पदाओं का खजाना माना जाता है।

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

क्रायोजनिक टेक्नोलॉजी वाला छठा देश – भारत

नेट पर मैं कुछ रिपोर्ट्स देख रहा था, जीएसएलवी-डी3 का भारतीय अभियान धराशाई, अंतरिक्ष में बादशाहत की भारतीय उम्मीदों को झटका, स्वेदशी क्रायोजनिक इंजन की हवा निकली और भी न जाने क्या-क्या, बातें हैं, बातों का क्या।
मैं केवल इतना कहना चाहूंगा, कि न तो स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन की हवा निकली है और न ही जीएसएलवी-डी3 का भारतीय अभियान ही धराशाई हुआ है। क्रायोजनिक इंजन और इसकी टेक्नोलॉजी पर टिप्पणी नहीं की जा सकती, वो फेल नहीं माना जा सकता, क्योंकि बृहस्पतिवार की लांचिंग के दौरान क्रायोजनिक इंजन तो चालू ही नहीं हो सका और रहा सवाल जीएसएलवी-डी3 के भारतीय अभियान का तो हम बहुत जल्दी दुनिया को इस नाकामी की धूल झाड़कर दिखा देंगे। इसरो प्रमुख राधाकृष्णन ने 2010 बीतने से पहले ही देश से क्रायोजनिक इंजन वाले एक और अभियान की कामयाब लांचिंग की वादा कर लिया है, और हम इसे पूरा करके दिखा देंगे।
मैं बृहस्पतिवार की जीएसएलवी-डी3 लांचिंग के विवरणों पर नहीं जाऊंगा, क्योंकि अब ये बात सबको मालूम है। लांचिंग के 505 सेकेंड बाद जीएसएलवी-डी3 में तीसरे स्टेज पर लगा क्रायोजनिक इंजन बर्न ही नहीं हो पाया। इसके साथ लगे दो छोटे बर्नियर इंजन ऑन ही नहीं हो पाए। इन दो छोटे बर्नियर इंजन्स को ही ऑन होकर तीसरे स्टेज पर लगे क्रायोजनिक इंजन को बर्न करना था। धरती से 60 किलोमीटर से कुछ ऊंचाई पर जाने के बाद ही बर्न प्रक्रिया बंद हो गई और जीएसएलवी-डी3 दीपावली के किसी दग चुके रॉकेट की तरह नीचे गिरकर समंदर में समा गया।
मैं इस असफलता को कम करके नहीं आंक रहा, 330 करोड़ रुपये के मिशन पर पानी फिरना देश के लिए कोई आसान बात नहीं, लेकिन खास बात ये कि हमने गुणवत्ता से समझौता किए बगैर इस मिशन की लागत पर शुरुआत से ही अंकुश रखा। यही वजह है कि जीएसएलवी-डी3 की लांचिंग का फेल होना एक खेद की बात तो है, लेकिन निराशाजनक नहीं। इस मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों के लिए ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी पक्षी की देखभाल के बीच उसका बच्चा अपनी पहली उड़ान भरता है। हां, पहली उड़ान नाकाम रही इसका अर्थ केवल यही है कि अब हम पहले से ज्यादा अनुभवी हो गए।
श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेसपोर्ट पर 15 अप्रैल की सुबह जब जीएसएलवी-डी3 लांच की तैयारियां जारी थीं, तभी मेरे एक इंजीनियर साथी ने मजाक किया, जीएसएलवी एक बार फिर लांच पैड पर है। इसपर किसी वैज्ञानिक ने कहा कि क्या हुआ, तो उस इंजीनियर ने फिर मजाक किया, इसबार जीएसएलवी के साथ इनसेट 4 सी नहीं जीसैट-4 है। इस पर एक गहरी खामोशी छा गई, क्योंकि वो इंजीनियर मजाक में ही सही लेकिन जुलाई 2006 में हुए इनसेट-4 सी हादसे की ओर इशारा कर रहा था, उस वक्त लांच वेहेकिल जीएसएलवी-एफ02 था। शाम होते-होते ये मजाक एक दुखद हकीकत में बदल गया।
स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन हमने किस तरह बनाया इसकी कहानी बताते हुए मिशन डायरेक्टर जी. रवींद्रनाथ के चेहरे पर मुस्कुराहट भले ही कम हुई है, लेकिन उनकी आंखों की चमक बरकरार है। 19 साल तक हम उस टेक्नोलॉजी को विकसित करने में जुटे रहे जो दुनिया की सबसे गोपनीय और सबसे संवेदनशील टेक्नोलॉजी में से है। टनों वजनी संचार सेटेलाइट्स को 38 से 40 हजार किलोमीटर तक की ऊंची कक्षाओं यानि जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑरबिट में स्थापित करने के लिए हमें ऐसा लांच वेहेकिल चाहिए था जिसके तीसरे स्टेज में क्रायोजनिक इंजन फिट हो। क्रायोजनिक इंजन का अपना सामरिक महत्व भी है, इसलिए इसकी टेक्नोलॉजी कड़ी निगरानी में रहती है, और इसीलिए किसी ने हमसे सहयोग नहीं किया। तब हमने 1991 में अपना क्रायोजनिक इंजन बनाने का काम शुरू किया। ये वो वक्त था जब अमेरिका ने रूस पर दबाव डालकर उसे अपना क्रायोजनिक इंजन हमें देने से रोक दिया था।
क्रायोजनिक टेक्नोलॉजी में शून्य से 183 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे के तापमान पर तरल ऑक्सीजन और शून्य से 253 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे के तापमान पर तरल हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन खास बात ये कि इतने कम तापमानपर धातुएं भंगुर हो जाती हैं, इसरो में वैज्ञानिकों ने एक खास मिश्रधातु बनाई जो इतने कम तापमान को आसानी से झेल सकती थी। इतना ही नहीं हमने अपनी प्रयोगशालाओं में इस मिश्रधातु से बनने वाले क्रायोजनिक इंजन के लिए खास वेल्डिंग टेक्नोलॉजी और एक नए लुब्रीकेंट्स की भी इजाद की। इसलिए जब 19 साल की मेहनत के बाद हमने प्रयोगशाला में इसका सफल परीक्षण कर लिया तो दुनियाभर की आंखें फटी रह गईं। जीएसएलवी-डी3 का परीक्षण दुनिया के लिए कितना महत्वपूर्ण था, इस लांच को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की गहमा-गहमी से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
भले ही जीएसएलवी-डी3 की उड़ान पूरी नहीं हुई, लेकिन क्रायोजनिक इंजन की टेक्नोलॉजी हमारे हाथ में है और अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और चीन के बाद हम इस टेक्नोलॉजी वाले छठे देश बन चुके हैं।

डॉ. बी.आर.गुरुप्रसाद
वैज्ञानिक, इसरो

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

एक दुखभरी प्रेम कहानी और हैबिटेट जोन

महान योद्धा और उससे भी बड़ा प्रेमी मार्स और उसकी अमर प्रेमिका वीनस लंबे वक्त बाद एकबार फिर आसमान पर हैं। लेकिन जुपिटर के श्राप का असर अब भी है, इसीलिए ये दोनों अबभी मिलन के लिए तरस रहे हैं, वीनस सूरज डूबने के बाद आसमान में आकर मार्स की राह देखती है...लेकिन मार्स तब आता है, जब अंधेरा घिर आता है, और तब तक वीनस निराश होकर जा चुकी होती है।
ये अनोखा संयोग है कि आजकल आसमान में मंगल और शुक्र दोनों ही ग्रह नजर आ रहे हैं और देर रात हमारा-जाना पहचाना चंद्रमा भी दमकता नजर आ जाता है। शुक्र, पृथ्वी, चंद्रमा और मंगल इनमें एक ऐसी चीज है जो इन चारों में हर जगह मौजूद है...और वो है हमारा जाना-पहचाना पानी। शुक्र के बादलों में पानी भाप के रूप में मौजूद है, तो वहीं पृथ्वी पर बर्फ, महासागर और भाप तीनों ही रूपों में, चंद्रमा तो पूरी तरह पानी-पानी है, लेकिन यहां ज्यादातर पानी बर्फ के रूप में है, हाल ही में चंद्रयान के आंकड़ो के विश्लेषण से पता चला कि दक्षिणी ध्रुव की तरह चंद्रमा का उत्तरी ध्रुव भी पानी की बर्फ से भरा हुआ है। चंद्रमा पर भाप भी है, लेकिन लगभग न के बराबर। धरती और चंद्रमा से आगे बढ़े तो मंगल से मुलाकात होती है। और मंगल पर पानी बर्फ, तरल और भाप तीनों ही रूपों में मौजूद है। मंगल पर बर्फ के रूप में पानी का अथाह भंडार जमीन के नीचे दबा हुआ है, तो वहीं मंगल के वायुमंडल में पानी भाप के रूप में मौजूद है, जो रात की ठंड में कंडेंस यानि सघन होकर सुबह-सुबह ओस की लाखों-करोड़ों बूंदों की शक्ल में मंगल की मिट्टी और चट्टानों पर बिछा नजर आता है...और जैसे ही सूरज की पहली किरण इस ओस की चादर को छूती है, सारी ओस भाप बनकर वायुमंडल में समा जाती है।
मैंने बात शुरू की थी कि आजकल हमें शुक्र, और मंगल दोनों ही ग्रह नजर आ रहे हैं, और वो भी बिना किसी टेलिस्कोप की मदद से। शुक्र ग्रह की तो लंबे वक्त बाद शाम के आसमान पर वापसी हुई है। सूरज डूबने के फौरन बाद पश्चिम दिशा की लाली में एक चमकते हुए सितारे के रूप में आप शुक्र ग्रह को आसानी से देख सकते हैं। रात घिरते ही अपने सिर के ठीक ऊपर की ओर देखें, वहां एक सुनहरे सितारे के रूप में मंगल ग्रह भी दमकता हुआ नजर आ जाएगा।
शुक्र, पृथ्वी और मंगल आपस में एक खास रिश्ते की डोर से बंधे हुए हैं, और ये रिश्ता है जिंदगी का। जी हां, किसी भी सौरमंडल में जिंदगी वहां के एक खास इलाके में ही फलती-फूलती है, वो इलाका उस सौरमंडल के सूरज के आसपास ही होता है और इसे हैबिटेट जोन कहते हैं। हमारे सौरमंडल में ये हैबिटेट जोन शुक्र ग्रह से शुरू होता है और पृथ्वी को छूते हुए ये मंगल ग्रह तक जाता है। हमारे सौरमंडल में जिंदगी की मौजूदगी की सबसे आदर्श जगह भी यही हैबिटेट जोन ही है। पृथ्वी इस जोन के बीचोबीच में है, यही वजह है कि जीवन के फलने-फूलने की सबसे आदर्श स्थितियां और माहौल भी यहीं है। आजकल शाम होते ही हमें अपने सौरमंडल का ये हैबिटेट जोन आंखों के सामने नजर आने लगता है जो शुक्र से शुरू हो कर मंगल ग्रह तक जाता है, और आप इसके बीचोंबीच मौजूद होते हैं। आसमान के थिएटर पर एक शो चल रहा है, वीनस और मार्स की दुखभरी प्रेम कहानी का, एक-दूसरे का इंतजार करते मार्स और वीनस को क्या आप देखना नहीं चाहेंगे।
संदीप निगम

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

न्यूटन की साइकिल और हैप्पी होली

होली से तीन दिन पहले 26 की सुबह-सुबह जब सूरज भी नहीं उगा था, ठीक 6 बजकर 8 मिनट पर जैसा मैंने बताया था, दिल्ली के अपने घर की छत से मैंने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के गुजरने का शानदार नजारा देखा। पांच मिनट तक मद्धम चाल से चलता एक बड़े सितारे जैसा स्पेस स्टेशन आसमान के एक ओर से दूसरी ओर तक गया। खुशी में भरकर मैंने पत्नी को जोर से आवाज दी, जिसके बारे में बाद में पड़ोस की सहेलियां पत्नी से पूछताछ कर रहीं थीं, कि भई सुबह-सुबह इतनी खुशी क्यूं? पत्नी ने भी मुस्कराते हुए मजाक में जवाब दे दिया कि भई फागुन है, कुछ भी और कभी भी संभव है।
हिंदी में साइंस को लोकप्रिय बनाने की तपस्या में लंबे समय से रमे मेरे मित्र बलदेव राज दावर जी ने अपनी ये कविता मुझे होली की शुभकामना के साथ भेजी है। ये कविता उन्होंने आल्हा के तर्ज पर लिखी है और साइकिल को सामने रखते हुए बड़ी खूबसूरती और सादगी के साथ न्यूटन के तीनों नियम समझाए हैं। दावर जी, आप एक बार फिर छा गए...
मेरी साइकिल
(न्यूटन के तीनों नियम- आल्हा की तर्ज पर)
(न्यूटन का पहला नियम - अगर कोई चीज गतिमान या स्थिर है तो वो तब तक गतिमान या स्थिर रहेगी, जब तक कि कोई बाहरी बल उसे स्थिर या गतिमान नहीं कर दे)
साइकिल मेरी ढीठम-ढीठ, हिलती नाहीं बिना हिलाए
पत्थर की मूरत जैसे हो, चलती नहीं बिना चलाए।
टस से मस ना होने वाली, कोई ताकत बिना लगाए।
या फिर वो चंदा के जैसी, उड़न-खटोली उड़ती जाए
बादल नीचे साइकिल ऊपर, हर पल सीधी-सीधी जाए।
कैसे रोकूं, कैसे मोडूं, कैसे उसकी ब्रेक लगाऊं
कैसे उसको तेज करूं मैं, कोई ताकत बिना लगाए।
टस से मस ना होने वाली, कोई ताकत बिना लगाए।
( दूसरा नियम - किसी चीज का बल, उसके द्रवमान यानि वजन और एक्सीलरेशन यानि लगातार बढ़ती रफ्तार के गुणन के बराबर होता है)
जितनी ताकत उतनी हरकत, जितना धक्का उतनी धाए,
दुगुना-तिगना जोर लगाऊं, दुगनी-तिगनी चाल बढ़ाए।
पर कुछ साइकिल पर भी निर्भर, वो भी अपने पैर जमाए।
जितनी भारी साइकिल होगी, उतनी धीमी-धीमी जाए।
टस से मस न होने वाली कोई ताकत बिना लगाए।
(तीसरा नियम- हर क्रिया की प्रतिक्रिया भी जरूर होती है)
उसकी मेरी खींचा-तानी, जैसे को तैसा बतलाए
जितना ही मैं उसे दबाऊं, उतना ही वो मुझे उठाए।
मैं उसको जब दाएं मोड़ूं, वो मुझको बाएं लटकाए।
सड़कें उसको आगे फेंके, वो पीछे को सड़क हटाए।
टस से मस न होने वाली कोई ताकत बिना लगाए।
सौजन्य- बलदेवराज दावर

बुधवार, 24 फ़रवरी 2010

खतरनाक होता ई-कचरा

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की संचालन परिषद की बैठक के दौरान जारी एक रिपोर्ट में कहा गया कि अगले 10 सालों में भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बिक्री बहुत तेजी से बढ़ेगी। इस तरह इनसे निकलने वाले -कचरे का पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, इस समय भारत में फ्रिज से 100,000 टन, टीवी से 275,000 टन, कंप्यूटर से 56,300 टन, प्रिंटर से 4,700 टन और मोबाइल फोन से 1,700 टन -कचरा हर साल निकलता है। अनुमान है कि 2020 तक पुराने कंप्यूटरों की वजह से इलेक्ट्रॉनिक कचरे का आंकड़ा भारत में 500 फीसदी और दक्षिण अफ्रीका चीन में 200 से लेकर 400 फीसदी तक बढ़ जाएगा।
2020
तक भारत में मोबाइल फोन से निकला -कचरा 2007 की तुलना में 18 फीसदी और चीन में सात फीसदी अधिक होगा। साथ ही चीन और भारत में टीवी के -कचरे में डेढ़ से दोगुना तक का इजाफा होगा जबकि रेफ्रिजरेटर से निकलने वाला इलेक्ट्रॉनिक कचरा दो से तीन गुना तक बढ़ जाएगा। भारत में असंगठित रूप से रिसाइकलिंग करने वाले लोग सोने जैसी धातु हासिल करने के लिए ज्यादातर -कचरा जला देते हैं। इससे काफी मात्रा में विषैली गैसें निकलती हैं। इस प्रदूषण के खतरे की तुलना में प्राप्त धातुओं की कीमत हालांकि बहुत कम होती है।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

आसमान में 5 मिनट का शो

फागुन का महीना है और इस खिली-खिली सी फिजा में सुबह जल्दी उठने से बेहतर कुछ भी नहीं। दोस्तों अगर आप शुक्रवार की सुबह साढ़े पांच- छह बजे तक बिस्तर छोड़ दें तो आसमान में एक शानदार नजारा देख सकते हैं। एक तेज चमकीली रोशनी आसमान में एक ओर से दूसरी ओर तक दौड़ती नजर आएगी। ये गुजरती हुई तेज रोशनी न तो कोई उल्का है और न कोई धूमकेतु या कुदरत का कोई करिश्मा। ये हमारा करिश्मा है, ये है आपके सिर से करीब 400 किलोमीटर ऊपर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन जिसमें चार अंतरिक्षयात्री अब भी मौजूद हैं।
यूं तो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन एक चकमीली रोशनी के रूप में अकसर आसमान में गुजरता नजर आता है, लेकिन 26 फरवरी को ये इस सीजन में सबसे ज्यादा देर यानि 5 मिनट तक गुजरता हुआ दिखेगा। इसे देखने के लिए सूरज डूबने की दिशा में मुंह करके खड़े हो जाएं और अपने दाहिने हाथ की तरफ आसमान में क्षितिज से कुछ ऊपर देखें यहीं आपको एक तेज चमकीली रोशनी सी नजर आएगी। क्षितिज के पास आप इसे ठीक से देख पाएंगे, क्योंकि जैसे-जैसे ये रोशनी ऊपर आएगी, संभव है कि दिन के आसमान की चमक इसे छिपा ले। लेकिन जैसे ही ये चमक विपरीत दिशा की क्षितिज को छुएगी आप इसे फिर से देख पाएंगे। 26 फरवरी को अलग-अलग शहरों में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के नजर आने का समय इस प्रकार है -
दिल्ली और आसपास सुबह 06 बजकर 08 मिनट अवधि 5 मिनट
चंडीगढ़ और आसपास सुबह 06 बजकर 08 मिनट अवधि 4 मिनट
पुणे और आसपास सुबह 06 बजकर 09 मिनट अवधि 3 मिनट
नागपुर और आसपास सुबह 06 बजकर 09 मिनट अवधि 5 मिनट
मुंबई और आसपास सुबह 06 बजकर 08 मिनट अवधि 3 मिनट
कोलकाता और आसपास सुबह 04 बजकर 36 मिनट अवधि 2 मिनट
जामनगर और आसपास सुबह 06 बजकर 08 मिनट अवधि 3 मिनट
हैदराबाद और आसपास सुबह 07 बजकर 18 मिनट अवधि 1 मिनट
चेन्नई और आसपास सुबह 06 बजकर 11 मिनट अवधि 1 मिनट
बैंगलोर और आसपास सुबह 06 बजकर 10 मिनट अवधि 3 मिनट

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

चंद्रयान ने खोजी-चांद पर सुरंग

चंद्रमा की सतह पर मध्य रेखा के करीब एक सुरंग मिली है, जो वहां जाने और बसने वाले अंतरिक्षयात्रियों के लिए प्राकृतिक पनाहगाह हो सकती है। इसरो साइंटिस्ट एस. एफ. ए. एस. आर्या के मुताबिक, यह गुफा ज्वालामुखी से बनी एक खाली ट्यूब जैसी है। इसकी लंबाई 2 किलोमीटर और चौड़ाई करीब 360 मीटर है। आर्या इस जानकारी को 1 से 5 मार्च के दौरान ह्यूस्टन में होने वाली समिट में साझा करेंगे। आर्या के मुताबिक, इस सुरंग का पता तब चला जब टीएमसी (टेरियन मैपिंग कैमरा) के आंकड़ों का विश्लेषण किया जा रहा था। इस खोज से चंद्रमा पर स्थायी बेस बनाने की भारत की इच्छा पूरी होगी। यह सुरंग भूमिगत चौकी की तरह है। इसकी छत अंतरिक्षयात्रियों को उल्काओं की खतरनाक बारिश, मौसम के असर और तापमान में उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रखेगी। चंद्रमा के चमकीले हिस्से वाली सतह पर तापमान आमतौर पर 300 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। चंद्रमा पर न तो एनवायरनमेंट है और न ही धरती जैसा गुरुत्वाकर्षण बल। इसलिए सूरज से निकलने वाली रोशनी अंतरिक्षयात्रियों को नुकसान पहुंचा सकती है। ये तेज रोशनी अंतरिक्षयात्रियों की कोशिकाओं को प्रभावित करती है। इसलिए चांद पर ऐसी जगह की जरूरत है, जो चांद पर अंतरिक्षयात्रियों को सूर्य की रोशनी से बचा सके। ये गुफा उसी काम आ सकती है। चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी की खोज के साथ नई तरह की चट्टानों का पता भी लगाया है। अहमदाबाद की फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी में हाल में चंद्रयान पर हुए दो दिन के सम्मेलन में इसकी घोषणा की गई। इन चट्टानों को नासा के उसी मून मिनरॉलजी मैपर (एम3) ने खोजा है, जिसने पानी का पता लगाया था। ये चट्टानें आकार में छोटी हैं। फिलहाल वैज्ञानिक इनका विश्लेषण कर रहे हैं। हालांकि इन चट्टानों में जो खनिज पाए गए हैं, वे पहले की चट्टानों में पाए गए खनिजों की तरह हैं। लेकिन इन चट्टानों में खास बात उन खनिजों का कॉम्बिनेशन है।