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सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

‘दो आदिम समूहों की मिलीजुली देन हैं भारतीय’

भारतीयों के मानव विज्ञान के इतिहास में अपने तरह के पहले जीनोम विश्लेषण ने यह निष्कर्ष पेश किया है कि भारतीय आबादी दो आदिम समूहों की मिलीजुली देन है और इससे कुछ अनुवांशिकी विकृतियां होने की संभावना अधिक है।
भारतीय और अमेरिकी वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि भारतीय आबादी अनुवांशिक रूप से एक विशाल आबादी नहीं है, बल्कि इसमें छोटी-छोटी अलग-अलग आबादियां शामिल हैं। हैदराबाद के सेंट्रर फॉर सेल्युलर एंड मॉलीक्युलर बायोलॉजी [सीसीएमबी] और अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में ऐसा कहा है। इस अध्ययन के निष्कर्षों को माने तो भारतीयों में अनुवाशिंक बीमारियों के मामले शेष दुनिया की आबादी से अलग हैं। यह अध्ययन विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ है।
वैज्ञानिकों ने यह अनुमान भी लगाया है कि भारत में एक जीन की विकृति संबंधी बीमारियां बहुतायत में होंगी, जिनका अनुवांशिकी आधार पर अध्ययन संभव होना चाहिए। वैज्ञानिकों के दल ने इस बारे में पुख्ता प्रमाण पाए हैं कि सभी भारतीय समूह दो अलग-अलग समूहों के मिलेजुले वंशज हैं। ये दो अलग-अलग समूह क्रमश: एनसेस्ट्रल नॉर्थ इंडियन्स [एएनआई] और एनसेस्ट्रल साउथ इंडियन्स [एएसआई] हैं।
एएनआई की अनुवांशिकी पश्चिम यूरेशियाई लोगों से मिलती-जुलती है। एएसआई की अनुवांशिकी बिल्कुल अलग है और दुनिया में कहीं भी ऐसी अनुवांशिकी नहीं मिलती। बहरहाल, दो अलग अलग लोगों के जीनोम के क्रम में केवल 0.1 फीसदी अंतर होता है, लेकिन यह नन्हा अंतर कई सूचनाओं का केंद्र होता है। इससे आधुनिक आबादी के ऐतिहासिक स्रोत को पुन: तैयार करने में मदद मिलने के संकेत पाए गए हैं।
अध्ययन में जीनों में भिन्नता के कारण कुछ बीमारियों का खतरा अत्यधिक होने का संकेत भी है। हाल के वर्षों में मानव जीनों में भिन्नता के क्रम ने दुनिया भर की आबादी की विविधता के बारे में नई जानकारी दी है। लेकिन अब तक भारत में ऐसे संकेत नहीं मिले थे।
सीसीएमबी के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक कुमारस्वामी थंगराज ने बताया यह परिणाम मिला है कि सभी भारतीय समूह दो पूर्वज आबादियों की मिलीजुली देन हैं। यही बात परंपरागत जातियों और जनजातियों पर भी लागू होती है। उन्होंने कहा अलग- अलग भारतीय समूहों के पास उनके पूर्वजों के 40 से 80 फीसदी लक्षण विरासत में उस आबादी से मिले हैं जिसे हम एएनआई कहते हैं।
थंगराज ने कहा एएनआई पश्चिमी यूरेशियाई लोगों से संबंधित हैं। शेष लक्षण एएसआई से हैं जिनका संबंध भारत से बाहर किसी भी समूह से नहीं है। अध्ययन में अंडमान द्वीप समूह के मूलनिवासी लोगों को अपवाद बताया गया है। आज हिंद महासागर क्षेत्र के अंडमान द्वीप समूह में इन मूलनिवासियों की संख्या एक हजार से भी कम पर सिमटी हुई है। प्रतीत होता है कि ये लोग एएसआई से संबंधित हैं। इनमें एएनआई समूह के लक्षणों का अभाव है।
यह बात साबित हो चुकी है कि आधुनिक मानव की उत्पत्ति करीब 1.6 लाख साल पहले अफ्रीका में हुई थी और फिर उसकी आबादी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैली। थंगराज ने कहा कि पूर्व के अनुसंधानों से पता चला था कि अंडमान की जनजातियां [ओंगो] पहले आधुनिक मानव हैं जो अफ्रीका से 65,000 साल से 70,000 साल पूर्व अन्यत्र गए। उन्होंने कहा कि करीब 5,000 साल पहले द्रविड़ों का आगमन हुआ और लोग इधर-उधर पहुंच कर छोटे-छोटे समुदाय बनाने लगे। यूरेशियाई लोगों के आगमन के बाद द्रविड़ों को दक्षिण की ओर जाना पड़ा।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही शोध है ये और सत्य भी.......

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  2. बहुत ही जबरजस्त लेख है,धन्यवाद

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    1. Satish Jaraa bheje kaa istmaal kiyaa ya bass....aise hi bol rahe ho?

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    2. satish tunehi kahaa hai : मैं गुजरे हुए कल की तरफ खीचा चला जाता हूँ,क्युकी वही पे हमारे सारे सवालो के जवाब मिलते है!!!
      magar thik tarike se adhyayan karna ....varnaa apanaa vinaash karne par tulaa hai tu.

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  3. satish is a foolish so is writing such a note . i say him stop such a dirty mind . ok if i found u foolish i will beat you . you are doing dog mind planning for them those says indians dog . nalayak kahi ka boka manush

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  4. Haram Khore first you study the real history think on it and then write anything on the internet.

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  5. अब मै आपसे ये जानना चाहूँगा के मानव निर्माण सर्वप्रथम अफ्रिका में १.६ लाख पहेले हुआ और उसके बाद अफ्रीका से सम्पूर्ण दुनिया में कैसे बसा...? मुझे आप बताओ की आफ्रीकी मानव ने विश्व में प्रवास कैसे किया? वह प्रवास करने की तिथि और साधन कैसे थे ? और मुझे यह प्रमाण के साथ आपको बताना होगा.

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  6. महात्मा, महात्मा ही है !

    अगर गांधीजी के ऐसे कोई सम्बन्ध होते तो वह स्वयं ही उसे बतलाते.,
    यह बातें JAD ADAM किसी पुस्तक में बताने की कोई आवश्यकता नहीं.,
    अपने आपको फेम करने के अंग्रेजियत के ऐसे ही घिनोने तरीके होते है.
    हमारे देश के लोगोके आख में धुल झोक कर यहाँ के महापुरुषों से हमें घृणा करने की वृत्ति को पैदा किया गया है. और इसमें कई संस्थाए (पाश्चात्य और यहाँ की ) कार्य कर रही है.
    उनका मानना है के अगर किसी देश में कोई व्यक्ति को महत्त्व है, और उस महत्ता की उलटी दिशा में ले जाने वाला प्रचार करे तो लोगो का सम्पूर्ण लक्ष उलटे प्रचार करने वाले व्यक्ति पर केन्द्रित हो जाता है.
    और यही पुस्तक को फेमस करने का तरीका है. जिससे उनकी आमदनी में बढ़ोतरी होगी. ,
    यह पुस्तक कोई देश सेवा या देश को बचाने निमित्त किया हूवा प्रयास नहीं.
    और सिर्फ गाँधी के बारे में ही नहीं,. ऐसा ही काम स्वामी विवेकानंद, शिवाजी महाराज, भगवान बुद्ध, आदि -आदि को भी इस्तमाल करके यह लोग फेमस होने के प्रयास में लगे रहेते है.
    और इन सब बतोमें इनका प्रयास रहेता है के : तुम्हारे देश के उच्चकोटि के लोग भी वैसेही नालायक है, जैसी हमारी नालायक संस्कृति है.! हा....
    पाश्चात्य संस्क्रुतियोमे सेक्स को इतना महत्त्व है के अगर सेक्स करके बच्चा हुआ तो उसे पालने में समय अधिक जाएगा और सेक्स करने के लिए समय नहीं रहेगा. इसीलिए बच्चो को जन्म के तुरंत बाद चर्च या घरके द्वार के बाहर रख दिया जाता था / है (जबसे एबोशन तंत्र आया तबसे यह कम हुआ.) जिससे वह मर जाए या कही भी जी लें. वहा पर ऐसी संस्कृति के कारण कोई भी महात्मा नहीं बन पाया.
    और कही किसी महात्मा को (किसी देश में) देख लेते है तो इनकी मानसिकता के अनुसार महात्मा से भी ज्यादा अपने को प्रसिद्धि कैसे करना है इस लिए प्रयास करते रहते है.
    उन प्रयासों में अपनी मुर्खता भरे प्रमाण देते रहेते है. और उलटा प्रचार करने में जुट जाते है.
    इतने मूर्खों के मुर्ख है के इन्हें, भारतीय इतिहास, धर्म और निति का तिनकाभर भी ज्ञान नहीं होता. ये पाशवि संस्कृति से जुड़े हुए लोग ब्रम्हचर्य के महत्त्व को नहीं समझ पाते.,
    मै जानता हूँ के कोई भी मनुष्य बिना ब्रम्हचर्य के महात्मा नहीं बन सकता. क्योकि ब्रम्हचर्य से ही बुद्धि का विकास बना रहेता है.

    ये अंग्रेज इतने हरामी है के आज भी हमारा अन्न खाकर हमारे देश को ही पुवर इंडिया ( वास्तविकता उलट है.) कह पुकारते है.
    इनके बिछाए हुवे जाल में सबसे महत्त्व पूर्ण भूमिका टीवी चानेल और प्रेस मिडिया की रही है.
    मिडिया भी हमें क्या सिखा रही है.? ( देश को बर्बाद करने हेतु)
    आजकल जो भी अभिनेत्री जितना नंगा होती है उतना फेमस होती है., स्त्रियों ने नंगा होकर प्रसिद्द होने की कला पाश्चात्य विकृत संस्कृति की देन है.
    पाश्चात्य संस्कृति की यही पहचान है के खुद नंगे है और दुनिया को भी नंगा देखना ( चरित्रहीन ) चाहते है.
    इसीलिए भारत के युग पुरुषो पर उन्हें बदनाम करने हेतु लेख लिखते रहते है.
    मै इन सारी बातो का गहन अध्ययन करके अनुभव से अनुरोध करता हूँ के, इन हरामजादो कें बहकावे में आकर अपने देश भक्तो को गलत ना समझे.

    मुझे पूरा विश्वास है के, इस विश्व से एक ना एक दिन अंग्रेजो का नकाब उतर जाएजा और तब सम्पूर्ण विश्व सुखी हो जाएगा.

    अधिक माहिती के लिए आप सीधे संपर्क कर सकते हो. :
    प्रशांत शिखरे.
    ९२२४२३२३१५

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    1. Bilkul satya kaha hai shriman (phototric)Aapne, Ye jo yaha par lekh ko sahi karaar de rahe hain ye maatra nire moorkh hain,,, gadhe hain......

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