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शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

इतनी खामोशी क्यों ?

बीते सोमवार जब उनकी मृत्यु की सूचना मिली तो लगा जैसे कोई गाली दे रहा हो। गुणाकर मुले ऐसे चले जाएंगे? इतने चुपचाप, अपनी बहसों से माहौल में चिनगारियां छोड़े बगैर? पहली बार उनसे 1990 में फोन पर मेरी बात हुई थी, एक तरह का सीधा परिचय। उसके चार साल बाद दिल्ली में पांडव नगर के उनके अधबने घर में उनसे मुलाकात हुई। बहुत धीरे-धीरे बनता हुआ यह घर करीब दस साल में पूरा हुआ। इसी के एक कमरे में किताबों से भरी अलमारियों के बीच, कई सारी खुली किताबों से लदी मेज पर वह टाइपराइटर ठोंकते रहते थे। विज्ञान की बहसों में निजी मामलों जैसी सघनता के साथ उनका उत्तेजित होना, क्षमाप्रार्थी होना और आगे की बहसों के लिए हिम्मत बढ़ाना उनका कद और बढ़ा देता था। बगैर किसी पैतृक संपत्ति के, कोई नौकरी किए बिना पूरी जिंदगी विज्ञान के लिए लगा देना और बगैर किसी के आगे हाथ फैलाए अपना गुजारा भी कर लेना- यह युद्ध गुणाकर मुले ने लड़ा और इसमें जीत हासिल की। ऐसी धर्म-धुरी को धारण करने वाला आगे कोई और पता नहीं आएगा भी या नहीं। हिंदी की दशा-दिशा पर काफी रोया जा चुका है। फिर भी पूछना वाजिब है कि हिंदी में ज्ञान सर्जना के अंतिम प्रयास क्या जरा भी लगाव के हकदार नहीं हैं? अपनी भाषा में मौलिक ज्ञान रचने की जिद इस देश में अब थोड़े ही दिनों की मेहमान है। गुणाकर मुले में तो यह इतनी सख्त थी कि इसे ही उनके व्यक्तित्व की बुनियाद समझा जा सकता था। खगोलशास्त्र (एस्ट्रोनॉमी) पर उन्होंने बहुत सारे परिचयात्मक लेख और किताबें लिखीं। हिंदी के लोक दायरे में उनकी पहचान भी इन्हीं के जरिए बनी। लेकिन एस्ट्रोनॉमी मुले जी के लिए रोजी-रोटी चलाने की चीज थी। उनका असल काम विज्ञान की संस्कृति पर था और उनका पूरा जीवन इस क्षेत्र में भारत के योगदान को खोजने और इसे रेखांकित करने में गुजरा था। उन्होंने भारत की अंकपद्धति, लिपियों और सिक्कों के विकास पर काम किया और उनका यह काम इतिहासकारों की खोजों की जुगाली भर नहीं था। हिंदी में ज्यादातर बौद्धिकों का जीवन रोजी-रोटी की मशक्कत में ही निकल जाता है, इसके बावजूद अक्षर, गिनती और मुद्रा पर गुणाकर मुले का किया-धरा डी. डी. कोसांबी की याद दिलाता है। अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं के लिए किए गए उनके लेखन की भी खासियत भारतीय संदर्भों के प्रति उनका विशेष आग्रह हुआ करती थी। उनके जैसे कुछ गिने-चुने लोगों के लिखे का ही असर है कि भारतीय समाज में गणित और विज्ञान को लेकर अब पहले जैसा परायेपन वाला भाव नहीं रह गया है।- चंद्रभूषण

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